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28 दिसंबर 2011

Gangasagar : Faith and fun combine


आस्था-श्रद्धा एवं मस्ती का संगम



Rajesh Mishra (The Wake Hindi Monthly Magzine-News
Editor) on Visit 
Gangasagar, Kapilmuni Mandir

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22 दिसंबर 2011

Kharmas are not in the good work?

खरमास में शुभ कार्य क्यों नहीं होते?



भारतीय पंचांग पद्धति में प्रतिवर्ष सौर पौष मास को खर मास कहते हैं। इसे मल मास काला महीना भी कहा जाता है। इस महीने का आरंभ 16 दिसम्बर से होता है और ठीक मकर संक्रांति को खर मास की समाप्ति होती है। खर मास के दौरान हिन्दू जगत में कोई भी धार्मिक कृत्य और शुभमांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। इसके अलावा यह महीना अनेक प्रकार के घरेलू और पारम्परिक शुभकार्यों की चर्चाओं के लिए भी वर्जित है। देशाचार के अनुसार नवविवाहिता कन्या भी खर मास के अन्दर पति के साथ संसर्ग नहीं कर सकती है। और उसे इस पूरे महीने के दौरान अपने मायके में आकर रहना पड़ता है ।

इस वर्ष भी खर मास 16 दिसम्बर 2011 से आरम्भ हो चुका है। और 14 जनवरी 2012 को मल मास यानी खर मास की समाप्ति होगी। खर मास में सभी प्रकार के हवन, विवाह चर्चा, गृह प्रवेश, भूमि पूजन, द्विरागमन, यज्ञोपवीत, विवाह या अन्य हवन कर्मकांड आदि तक का निषेध है। सिर्फ भागवत कथा या रामायण कथा का सामूहिक श्रवण ही खर मास में किया जाता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार खर मास में मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति नर्क का भागी होता है। अर्थात चाहे व्यक्ति अल्पायु हो या दीर्घायु अगर वह पौष के अन्तर्गत खर मास यानी मल मास की अवधि में अपने प्राण त्याग रहा है तो निश्चित रूप से उसका इहलोक और परलोक नर्क के द्वार की तरफ खुलता है।

इस बात की पुष्टि महाभारत में होती है जब खर मास के अन्दर अर्जुन ने भीष्म पितामह को धर्म युद्ध में बाणों की शैया से वेध दिया था। सैकड़ों बाणों से विद्ध हो जाने के बावजूद भी भीष्म पितामह ने अपने प्राण नहीं त्यागे। प्राण नहीं त्यागने का मूल कारण यही था कि अगर वह इस खर मास में प्राण त्याग करते हैं तो उनका अगला जन्म नर्क की ओर जाएगा। इसी कारण उन्होंने अर्जुन से पुनः एक ऐसा तीर चलाने के लिए कहा जो उनके सिर पर विद्ध होकर तकिए का काम करे। इस प्रकार से भीष्म पितामह पूरे खर मास के अन्दर अर्द्ध मृत अवस्था में बाणों की शैया पर लेटे रहे और जब सौर माघ मास की मकर संक्रांति आई उसके बाद शुक्ल पक्ष की एकादशी को उन्होंने अपने प्राणों का त्याग किया। इसलिए कहा गया है कि माघ मास की देह त्याग से व्यक्ति सीधा स्वर्ग का भागी होता है।

खर मास को खर मास क्यों कहा जाता है यह भी एक पौराणिक किंवदंती है। खर गधे को कहते हैं। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार सूर्य अपने साथ घोड़ों के रथ में बैठकर ब्रह्मांड की परिक्रमा करता है। और परिक्रमा के दौरान कहीं भी सूर्य को एक क्षण भी रुकने की इजाजत नहीं है। लेकिन सूर्य के सातों घोड़े सारे साल भर दौड़ लगाते-लगाते प्यास से तड़पने लगे। उनकी इस दयनीय स्थिति से निबटने के लिए सूर्य एक तालाब के निकट अपने सातों घोड़ों को पानी पिलाने हेतु रुकने लगे। लेकिन तभी उन्हें यह प्रतिज्ञा याद आई कि घोड़े बेशक प्यासे रह जाएं लेकिन उनकी यात्रा ने विराम नहीं लेना है। नहीं तो सौर मंडल में अनर्थ हो जाएगा। सूर्य भगवान ने चारों ओर देखा... तत्काल ही सूर्य भगवान पानी के कुंड के आगे खड़े दो गधो को अपने रथ पर जोत कर आगे बढ़ गए और अपने सातों घोड़े तब अपनी प्यास बुझाने के लिए खोल दिए गए। अब स्थिति ये रही कि गधे यानी खर अपनी मन्द गति से पूरे पौष मास में ब्रह्मांड की यात्रा करते रहे और सूर्य का तेज बहुत ही कमजोर होकर धरती पर प्रकट हुआ। शायद यही कारण है कि पूरे पौष मास के अन्तर्गत पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य देवता का प्रभाव क्षीण हो जाता है और कभी-कभार ही उनकी तप्त किरणें धरती पर पड़ती हैं। अपने इस अघोर कर्म से निवृत्त होने के लिए 14 जनवरी यानि  मकर संक्रांति के दिन से सूर्य पुनः अपने सात अश्वों पर सवार होकर आगे बढ़े और धरती पर सूर्य का तेजोमय प्रकाश धीरे-धीरे बढ़ने लगा।

मकर संक्रांति एक महत्व यह भी है कि उस दिन सूर्य अपने अधम सवारी से मुक्त होकर असली अश्व रथ पर आरूढ़ हुए और दुनिया को अपनी ऊर्जा से प्रभावित करते रहे। इस साल यह खर मास अभी 14 जनवरी 2012 तक जारी रहेगा। श्रद्धालु जन तब तक शुभकार्यों की निवृत्ति हेतु प्रतीक्षा करेंगे। जिस दिन सूर्य गधे यानी खर के रथ को छोड़कर अपने असली अश्व रथ पर सवार होंगे उस दिन भारत में सर्वत्र मकर संक्रांति का पर्व भी मनाया जाएगा।

19 दिसंबर 2011

Weapons of mass instruction?



A Siberian court is to decide on banning the Bhagavad Gita, based on complaints that the text, distributed locally by Iskcon, apparently 'advocates war' and forms 'extremist literature'. This case reflects a deep mis- understanding of the Gita - and possibly severe anxieties within Russian society.

In a recent interview to The a News Paper, outgoing Delhi Metro chief E Sreedharan said the Gita was the ultimate 'administrator's handbook', illuminating a calm and clear way forward through the pettifogging of relationships, desires and fears. The Gita obviously has many facets and can mean different things to different people. But " extremist literature"?

At its simplest, the Bhagavad Gita, 18 chapters nestled within the epic Mahabharata, is the story of Krishna advising Arjuna, facing kin in battle, on how to proceed. Hearing the overwrought warrior's fears, Krishna tells Arjuna he must walk the path of moral correctness and do his duty by humanity, not be bound by the ties of love, fear and pride we battle continually in life.

These are ephemeral, transient and meaningless, says Krishna; the truth is the divine, literally larger than life, despite all of life's beguiling colours and its devastating sadness. It is to fight life's illusions and find the path of truth that is the 'battle' Krishna elaborates on. Voiced by the one termed ran-chor, he who escaped battle, any correct interpretation of the Gita cannot find the text advocating physical warfare.

However, it is simple to be confused by the Gita. It was the intriguing quality of this text, a complex piece of philosophy within an extremely human story, delving into the mind's deepest recesses, its shallowest instincts, which impressed numerous Europeans. The first British Governor General of India, Warren Hastings, had the ancient text translated to English in 1785. Thereafter, from American scholar Ralph Waldo Emerson to Swiss psychoanalyst Carl Jung, Western thinkers immersed themselves in the Gita, its layers reflecting the difficulties - and ultimate simplicity - of human life.

Before them, non-Hindus too found the Gita an absorbing text. Pakistani scholar Akbar S Ahmed illustrates how the 17th century Mughal prince Dara Shikhoh was so enamoured by the Gita translated to Persian that some feared he had turned apostate. The prince however knew what complainants in Siberia don't-the Gita transcends religion.

In its discussion of universal human values, it escapes the pettiness of caste or creed, Krishna mentioning that a human being is defined by deeds, not birth. It is to his duty a person's loyalty truly lies.

Yet, it is precisely the fears that Gita seems to have touched on. Academic Madhavan Palat, an eminent expert on Soviet history, remarks of the Siberian situation, "This mirrors post-Soviet anxiety. Russia doesn't seem to be going anywhere. Areas are losing local population while facing influxes of Chinese and other migrants. Russians are more isolated and monochrome than other Europeans. This reflects a dogmatic attitude where you hit out at the small things since you can't touch the bigger ones. Here, if it's about a particular cult or sect, it shows concern about the sect getting even one new convert. It reflects a loss of confidence."

Coming from the nation that once gave the world the complexities of Dostoyevsky, the polished violence of Turgenev, banning the Gita due to nervousness is an irony. However, the episode marks how social anxieties, uncontrolled and eventually overwhelming, target grand ideas -especially those offering multiple understandings and views, a lesson familiar from the recent controversy over A K Ramanujan's essay exploring the Ramayana.

However, making war on diverse, free thought never leads to peace; it is only by reading works like the Gita - and Tolstoy - that we truly learn this.

Constraints on Bhagavad Gita?

भगवद्‍गीता पर लग सकता है बैन?

 


हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ भगवद्‍गीता को समूचे रूसमें कट्टरपंथी साहित्य करार देते हुए बैन किए जाने कीआशंका पैदा हो गई है। पब्लिक प्रॉसिक्यूटरों ने गीता परबैन लगाने के लिए साइबेरिया के तोमस्क शहर की एकअदालत में मामला दर्ज कराया है। इस पर सोमवार कोअदालत अपना अंतिम फैसला सुनाने वाली है।

भगवद्‍गीता के बारे में यह फैसला प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह का रूस दौरा समाप्त होने के ठीक दो दिन बाद आनेवाला है। मनमोहन सिंह रूसी राष्ट्रपति दमित्री मेदवेदेव केसाथ द्विपक्षीय शिखर बैठक के लिए 15 से 17 दिसंबर तकरूस के दौरे पर थे।

मामला तोमस्क की अदालत में इस साल जून से चल रहाहै। इस मामले में इस्कॉन के संस्थापक ए . सी . भक्तिवेदांतस्वामी प्रभुपाद द्वारा रचित ' भगवद्‍गीता एज इट इज ' पर प्रतिबंध लगाने और इसे सामाजिक कलह फैलानेवाला साहित्य घोषित करने की मांग की गईहै। साथ ही रूस में इसके बांटने - बेचने को भी गैरकानूनी घोषितकरने की भी मांग की गई है।

मॉस्को में बसे लगभग 15 हजार भारतीयों और इस्कॉन के अनुयायियों ने मनमोहन सिंह से अपील की है कि वेभगवद्‍गीता के पक्ष में इस मुद्दे को सुलझाने के लिए कूटनीतिक हस्तक्षेप करें। रूस में इस्कॉन के अनुयायियों ने भीनई दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय को इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने के लिए लिखा है।


मॉस्को के 40 वर्ष पुराने श्रीकृष्ण मंदिर के पुजारी और इस्कॉन से जुडे़ साधु प्रिय दास ने कहा , ' इस मामले मेंसोमवार को तोमस्क अदालत का अंतिम फैसला आने वाला है। हम चाहते हैं कि भारत सरकार रूस में हिंदुओं केधार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए हरसंभव कोशिश करे। '

पब्लिक प्रॉसिक्यूटरों द्वारा मामला दायर किए जाने के बाद अदालत ने इस ग्रंथ पर विशेषज्ञों की राय लेने केलिए इसे इस साल 25 अक्टूबर को तोमस्क यूनिवर्सिटी भेज दिया था। रूस के हिंदू संगठनों , खासतौर से इस्कॉनके अनुयायियों का कहना है कि यूनिवर्सिटी इस काम में सक्षम नहीं है , क्योंकि वहां इंडॉलॉजिस्ट्स नहीं हैं।

हिंदुओं ने अदालत में कहा है कि यह मामला धार्मिक पक्षपात और रूस के एक बहुसंख्यक धार्मिक समूह कीअसहिष्णुता से प्रेरित है। हिंदुओं ने मांग की है कि धार्मिक परंपराओं के पालन के लिए उनके अधिकारों की रक्षाकी जानी चाहिए।

दास ने कहा , ' उन्होंने न केवल भगवद्‍गीता पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की है , बल्कि हमारे धार्मिकविश्वासों और उपदेशों को चरमवादी करार देने की भी कोशिश की है। '

03 दिसंबर 2011

SHYAM MAHAKUMBH 2011 VIDEO



Maha-aarti by Suresh Raj Bhopali at SHYAM MAHAKUMBH 2011 

at Netaji Indoor Stadium , Kolkata on 2nd Jan 2011



Shyam Akhan Jyoti Path by Shiv Kr Jalan at SHYAM MAHAKUMBH 2011
at Netaji Indoor Stadium , Kolkata

30 नवंबर 2011

Shri Shyam Mandir Ghusuridham, Howrah

श्री श्याम महाकुम्भ मेला 31 दिसंबर से 1 जनवरी 2012 तक शिवम् गार्डेन्स अलीपुर में 

हावड़ा स्थित घुसुड़ीधाम में विराजमान हैं हारे का सहारा बाबा श्याम | जो श्याम प्रेमियों के हर सुख-दुःख के भागीदार बनते हैं | जहाँ वर्ष भर में सैकड़ों पूजा आयोजित होते है | पर सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र होता है फाल्गुन मेला और श्याम प्रभु का जयंती महोत्सव | साथ ही प्रत्येक वर्ष श्रीश्याम महाकुम्भ का आयोजन किया जाता है जिसमें हजारों की संख्या श्यामप्रेमी भक्तजन कार्यक्रम में बाबा का मनोहारी श्रृंगार, भजन कीर्तन एवं श्याम अखंड ज्योति पाठ का आनंद उठाते हैं | इस बार भी यह कार्यक्रम शिवम् गार्डेन्स अलीपुर-कोलकाता में  31  दिसंबर 2011  एवं 1 जनवरी 2012  को आयोजित होने जा रहा है | कार्यक्रम की जानकारी देते हुए नवल सुल्तानिया, बिनोद टिबड़ेवाल, सुरेन्द्र अग्रवाल, वरुण अग्रवाल एवं कपिल अग्रवाल ने संयुक्त बयान में बताया की प्रातः 8 बजे से प्रभु इच्छा तक आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान श्री श्याम अखंड ज्योति पाठ, नृत्य नाटिका, भजन कीर्तन का आयोजन होगा | नृत्य नाटिका पर आधारित श्री श्याम अखंड ज्योति पाठ के प्रधान पाठ वाचक हैं संदीप सुलतानियाँ, नृत्य नाटिका का संचालन करेंगे श्याम अग्रवाल एवं भजनों की रसवर्षा करेंगे पप्पू शर्मा (खाटूवाले), मनोज-अजित, संजय-नवीन, संजय मित्तल  एवं कई भजन मंडलियाँ|  


प्रेम से बोलो- घुसुरी नरेश की- जय
जोर से बोलो- शीश के दानी की- जय
प्यार से बोलो- हारे का सहारा की- जय
हरदम बोलो- जय श्री श्याम- जय घुसुड़ीधाम 

21 नवंबर 2011

SHIRDI SAI KA ORIGINAL PHOTO


शिर्डी के सांई बाबा का असली दुर्लभ फोटो



शिर्डी के सांई बाबा के भक्त दुनियाभर में फैले हैं। उनके फकीर स्वभाव और चमत्कारों की कई कथाएं है। सांई बाबा के भक्तों की संख्या काफी अधिक है। सभी भक्त बाबा के चित्र या मूर्ति अपने घरों में अवश्य ही रखते हैं। यहां देखिए शिर्डी के सांई बाबा का दुर्लभ और असली फोटो। ऐसा माना जाता है कि यह फोटो सांई का ही है।

सांई ने अपना पूरा जीवन जनसेवा में ही व्यतीत किया। वे हर पल दूसरों के दुख दर्द दूर करते रहे। बाबा के जन्म के संबंध में कोई सटीक उल्लेख नहीं मिलता है। सांई के सारे चमत्कारों का रहस्य उनके सिद्धांतों में मिलता है, उन्होंने कुछ ऐसे सूत्र दिए हैं जिन्हें जीवन में उतारकर सफल हुआ जा सकता है। हमें उन सूत्रों को केवल गहराई से समझना होगा।

सांई बाबा के जीवन पर एक नजर डाली जाए तो समझ में आता है कि उनका पूरा जीवन लोककल्याण के लिए समर्पित था। खुद शक्ति सम्पन्न होते हुए भी उन्होंने कभी अपने लिए शक्ति का उपयोग नहीं किया। सभी साधनों को जुटाने की क्षमता होते हुए भी वे हमेशा सादा जीवन जीते रहे और यही शिक्षा उन्होंने संसार को भी दी। सांई बाबा शिर्डी में एक सामान्य इंसान की भांति रहते थे। उनका पूरा जीवन ही हमें हमारे लिए आदर्श है, उनकी शिक्षाएं हमें एक ऐसा जीवन जीने की प्रेरणा देती है जिससे समाज में एकरूपता और शांति प्राप्त हो सकती है।

19 नवंबर 2011

Shirdi Wale Sai Baba


मनोरथ सिद्ध करते हैं 
शिरडी के सांई बाबा



सांई बाबा जगतगुरु कहलाते हैं। हिन्दू धर्म मान्यताओं में सांई बाबा को महायोगी भगवान दत्तात्रेय का अवतार भी माना जाता है। दत्तात्रेय भक्ति की तरह ही सांई भक्ति और नाम स्मरण जीवन पर मण्डराएं संकट का फौरन अंत करने वाले और मनोरथ को सिद्ध करने वाले माने गए हैं। 

साईं बाबा (28 सितंबर, 1835– 15 अक्तूबर, 1918), एक भारतीय संत एवं गुरू हैं जिनका जीवन शिरडी में बीता। साईं बाबा ने कई लोक कल्याणकारी कार्यों को किया तथा जनता में भक्ति एवं धर्म की धारा बहाई। इनके अनुयायी भारत के सभी प्रांतों में हैं एवं इनकी मृत्यु के लगभग 90 वर्षों के बाद आज भी इनके चमत्कारों को सुना जाता है।

गुरुवार का दिन सांई बाबा की पूजा व स्मरण का विशेष व शुभ दिन माना जाता है। धार्मिक आस्था कहती है कि सांई बाबा का किसी भी रूप में स्मरण मंगलकारी ही है। किंतु हर भक्त का भी यह कर्तव्य बनता है कि सांई बाबा की बताई तीन बातों को हमेशा जेहन में रखें। अन्यथा सांई भक्ति की सार्थकता कहीं खो जाएगी। क्या है वे तीन बातें? जानते हैं -

श्रद्धा - सांई का यह सूत्र मात्र धार्मिक अर्थों में नहीं बल्कि व्यावहारिक रूप से भी अहम है। श्रद्धा के पीछे यही संदेश है कि जीवन में आप जिस भी रिश्ते या काम से जुड़ें उसके प्रति समर्पण, निष्ठा और ईमान के साथ-साथ त्याग भाव रखें।

सबूरी - सांई का एक ओर सूत्र जीवन में सुखी रहने का श्रेष्ठ उपाय है। यह है - सबूरी। इसके पीछे भाव यही है कि संतोष, धैर्य या संयम द्वारा जीवन में स्थिरता और आनंद लाएं। असंतोष या असंयम बैचेनी, कलह या संताप का ही कारण बनते हैं।

एकता - सांई बाबा का यह सूत्र बताता है कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है। धर्म की कट्टरता व संकीर्णता से बचकर हर धर्म का सम्मान व अलग-अलग ईश्वर के रूपों को एक मानकर दर्शन और विश्वास प्रेम, परोपकार, दया, त्याग जैसी धर्म भावों को बनाए रखता है। सांई बाबा ने इसी भावना को 'सबका मालिक एक' बोलकर एक सूत्र में पिरोया।

साईं का सन्देश :

सबका मालिक एकसाई बाबा की सबसे बडी शिक्षा और सन्देश है कि जाति, धर्म्, समुदाय, आदि व्यर्थ की बातो मे ना पड कर आपसी मतभेद भुलाकर आपस मे प्रेम और सदभावाना से रहना चाहिए क्योकि सबका मलिक एक है।श्रद्धा और सबूरीसाई बाबा ने अपने जीवन मे यह सन्देश दिया है कि हमेशा श्रद्धा और विश्वास के साथ जीवन यापन करते हुए सबूरी (सब्र)के साथ जीवन व्यतीत करे।

मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है
साई बाबा ने कभी भी किसी को धर्म की अवहेलना नही की अपितु सभी धर्मों का सम्मान करने की सलाह देते हुए हमेशा मनवता को ही सबसे बडा धर्म और कर्म बताते हुए जीवन जीने की अमूल्य शिक्षा प्रदान की है।

जातिगत भेद भुला कर प्रेम पूर्वक रहना
साई बाबा ने कहा है की जाति,समाज,भेद-भाव,आदि सब बाते ईश्वर ने नही बल्कि इंसानों द्वारा बनाया गया है इसलिए ईश्वर की नजर मे न तो कोई उच्च है और न ही कोई निम्न इसलिए जो काम ईश्वर को भी पसद नही है वह मनुष्य को तो करना ही नही चाहिए अर्थात जात-पात,धर्म,समाज आदि मिथ्या बातों में न पड़ कर आपस मे प्रेमपूर्वक रहकर जीवन व्यतीत करना चाहिए।

गरीबो और लाचार की मदद करना सबसे बड़ी पूजा है
साई बाबा ने हमेशा ही सभी जनमानस से यही बार-बार कहा है कि सभी के साथ ही समानता का व्यवहार करना चाहिए। गरीबों और लाचारों की यथासम्भव मदद करना चाहिए और यही सबसे बडी पूजा है। क्योकि जो गरीबों, लाचारों की मदद करता है ईश्वर उसकी मदद करता है।

माता-पिता, बुजुर्गो, गुरुजनों, बडो का सम्मान करना चाहिए
साई बाबा हमेशा ही समझाते थे कि अपने से बडो का आदर सम्मान करना चाहिए। गुरुजनो बुजर्गो को सम्मान करना जिसस उनका आर्शीवाद प्राप्त होता है जिससे हमारे जिवन की मुश्किलों मे सहायता मिलती है।

क्या-क्या देखें : 

शिरडी ही साई बाबा है और साई बाबा ही शिरडी,एक दूसरे का प्रत्यक्ष पर्यायवाची होने के साथ-साथ यह आध्यामिक भी है। यहां स्थित सभी उद्यम,रेस्तरां,शोरूम,स्कूल,कॉलेज और होटल शहर के 10 किलोमीटर के दायर में ही है। इन सबके साथ साई का नाम जुड़ा हुआ है। साई शब्द के उच्चारण से आशा और आदर का भाव उत्पन्न होता है।

परिसर में बाबा का म्यूज़ियम  है जहाँ साईं बाबा का कुरता, चिलम, उनका भिक्षा लेने कापात्र, पालकी, जिसमे बाबा ने खिचडी बनाई थी वो ताम्बे की हंडी, बाबा का नहाने का पत्थर और बहुत सी चीजे हैं. इसी परिसर में बाबा का लेंडी बैग भी है जहाँ बाबा पेड़-पौधों में पानी लगते थे. यहाँ वो कुआँ भी है जिसमे से बाबा पानी भरते थे.

इसके आलावा यहाँ श्रधालुओं के लिए रेलवे आरक्षण, रक्तदान, चिकित्सालय, बैंक ATM भी है. आपको एक खास बात बता दूं की इस परिसर में कैमरा या मोबाइल ले जाना सख्त माना है. इसलिए आप कैमरा या मोबाइल अपने होटल में ही छोड़ कर जाएँ. 

भारत के किसी भी कोने से आप शिरडी आराम से पहुँच सकते हैं...

साईं की चर्चित भजन 

शिरडी वाले सांई बाबा आया है तेरे दर पे सवाली

जमाने ने कहा टूटी हुई तश्वीर बनती है,
तेरे दरबार में बिगड़ी हुई तक्दीर बनती है ।

तारीफ तेरी निकली है दिल से,
आयी है लव बनके कवाली
शिरडी वाले सांई बाबा
आया है तेरे दर पे सवाली ।

शिरडी वाले सांई बाबा
आया है तेरे दर पे सवाली ।

लव पे दुआएँ आँखो में आंसू
दिल में उम्मीदें पर झोली खाली
शिरडी वाले सांई बाबा
आया है तेरे दर पे सवाली ।

दर पे सवाली आया दर पे सवाली,
शिरडी वाले सांई बाबा
आया है तेरे दर पे सवाली ।

ओ मेरे सांई देवा तेरे सब नाम लेवा ।
ओ मेरे सांई देवा तेरे सब नाम लेवा ।

खुदा इनसान सारे सभी, तुझको हैं प्यारे,
सुने फरियाद सबकी, तुझे है याद सबकी,
बड़ा या कोई छोटा, नहीं मायूस लूटा,
अमीरों का सहारा, गरीबों का गुजारा,
तेरी रहमत का किस्सा ब्यान अकबर करे क्या,
दो दिन की दुनिया, दुनिया है गुलशन,
सब फूल कांटे, तू सब का माली,
शिरडी वाले सांई बाबा
आया है तेरे दर पे सवाली ।

खुदा की शान तुझमें,
दिखें भगवान तुझमें--------2


तुझे सब मानते है,
तेरा घर जानते है,
चले आते है दौड़े,
जो खुश किस्मत है थोड़े,
ये हर राही की मन्जिल,
ये हर कश्ती का साहिल,
जिसे सब ने निकाला,
उसे तूने सम्भाला,

जिसे सबने निकाला, उसे तूने सम्भाला.......

तू बिछड़ों को मिलाये,
बुझे दीपक जलाये---------2


ये गम की रातें, रातें ये काली,
इनको बनादे ईद और दीवाली

शिरडी वाले सांई बाबा
आया है तेरे दर पे सवाली ।

लव पे दुआएँ आँखो में आंसू
दिल में उम्मीदें पर झोली खाली

शिरडी वाले सांई बाबा
आया है तेरे दर पे सवाली--------४


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  • World wide radio-Radio Garden - *प्रिये मित्रों ,* *आज मैं आप लोगो के लिए ऐसी वेबसाईट के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसमे आप ऑनलाइन पुरे विश्व के रेडियों को सुन सकते हैं। नीचे दिए गए ल...
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