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15 जून 2011

चंद्र ग्रहण कब से कब तक

चंद्रग्रहण कब से कब तक

आज रात्रि को पूर्ण चंद्रग्रहण होगा। ज्योतिषीयमान्यताओं के अनुसार, चंद्रग्रहण के समय पूजा-अर्चना वर्जित है, जबकि साधना से आध्यात्मिक ऊर्जा अर्जित की जा सकती है..
ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा, बुधवार 15जून की रात्रि को पूर्ण चंद्रग्रहण होगा। इस ग्रहण को पूरे भारत में देखा जा सकेगा। ज्योतिषीयगणना के अनुसार, चंद्रमा को ग्रहण के ग्रास का स्पर्श [ग्रहण का प्रारंभ] बुधवार 15जून को रात्रि में 11.53बजे होगा। इसके उपरांत चंद्रबिंबपर ग्रहण का ग्रास क्रमश:बढता जाएगा और रात्रि में 12.52पर खग्रास प्रारंभ होगा, जब चंद्रमा पूर्णत:ग्रसित हो जाएगा। पूर्ण चंद्रग्रहण [खग्रास] की स्थिति रात्रि 2.33बजे तक रहेगी। इसके बाद चंद्रबिंबपर ग्रहण का ग्रास क्रमश:कम होता जाएगा और ग्रहण का मोक्ष [समापन] रात्रि 3.33बजे होगा। इस प्रकार इस ग्रहण की अवधि 3घंटा 40मिनट होगी तथा ग्रासमान1.705होगा।
ग्रहण का सूतक :ज्योतिषीयगणना के अनुसार, चंद्रग्रहण का सूतक [वेध] ग्रहण के स्पर्श [प्रारंभ] के समय से 9घंटे पूर्व यानी 15जून को दोपहर 2.53बजे प्रारंभ होगा। इसकी समाप्ति ग्रहण के मोक्ष [अंत] के साथ होगी।
मान्यता के अनुसार, ग्रहण के सूतककालमें भोजन-शयन, हास्य-विनोद, रतिक्रीडा,देवमूर्ति का स्पर्श, तेल-मालिश वर्जित माने जाते हैं। लेकिन बालक, रोगी, वृद्ध और अशक्त सायं 7.23बजे तक आहार और औषधि ग्रहण कर सकते हैं। सूतक के समय देवालयों के पट बंद रहते हैं।
  • पुराणों में ग्रहण का स्वरूप

राजेश मिश्रा, कोलकाता, प.बंगाल 
श्रीमद्भागवत पुराण के अष्टम स्कंध के नवम अध्याय में 24वेंसे 26वेंश्लोक तक ग्रहण के विषय में उल्लेख है। इसके अनुसार, समुद्र-मंथन के उपरांत दैत्यों को अमृतपानसे वंचित करने के उद्देश्य से जब भगवान विष्णु मोहिनी बनकर देवताओं को अमृत पिलाने लगे, तब एक दैत्य देवताओं का रूप बनाकर पंक्ति में बैठ गया और अमृत पीने में सफल हो गया। इस घटना की सूचना सूर्य और चंद्रमा ने श्रीहरिविष्णु को दी। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उस दैत्य के सिर को काट दिया। परंतु उसे अमृत पीकर अमरत्व प्राप्त हो चुका था, इसलिए उसका कटा हुआ सिर राहु तथा धड केतु कहलाया। भगवान विष्णु ने उनको नवग्रहों में सम्मिलित कर दिया। परंतु वैर के कारण वह पूर्णिमा में चंद्रमा को व अमावस में सूर्य को ग्रसित करता है।
  • खगोलीयकारण

सूर्यसिद्धांत के चंद्रग्रहणाधिकारमें चंद्रग्रहण के खगोलीयकारण का वर्णन मिलता है। उसके अनुसार, चंद्रग्रहण उसी पूर्णिमा को संभव है, जब सूर्य और चंद्रमा के ठीक बीचोबीच पृथ्वी होती है। जब ये तीनों एक सीध में आ जाते हैं, तब चंद्रमा पृथ्वी की छाया में होकर गुजरता है। इसीलिए चंद्र ग्रसित दिखता है।
भारतीय संस्कृति में ग्रहण को आध्यात्मिक साधना का महापर्वमाना जाता है। मान्यता है कि ग्रहण काल में साधना करने का फल कई गुना होकर मिलता है। ऐसे में आज के व्यस्त युग में संक्षिप्त अवधि का चंद्रग्रहण साधना का पर्वकालबनकर ऊर्जा संचयनका अवसर प्रदान करता है।

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