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22 जून 2011

घृष्णेश्वर मन्दिर | Grishneshwar Jyotirlinga


12. घृष्णेश्वर मन्दिर (Grishneshwar Temple) | Grishneshwar Jyotirlinga


घृष्‍णेश्‍वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है . घृष्णेश्वर मन्दिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है. इसे  घुसृणेश्वर एवं घृष्णेश्वर के नाम से भी जाना जाता है. इस मंदिर का निर्माण अहिल्याबाई होल्कर द्वारा करवाया गया था. शहर के शोर से से दूर स्थित यह मंदिर शांति एवं सादगी से परिपूर्ण है. दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं. भगवान शिव के  द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है. बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएँ इस मंदिर के समीप स्थित हैं. यहीं पर श्री एकनाथ जी गुरु श्री जनार्दन महाराज जी की समाधि भी है.

घृष्णेश्वर मन्दिर पौराणिक कथा | Grishneshwar Temple Katha in Hindi

इस ज्योतिर्लिंग के बारे मे एक कथा प्रचलित है कहते हैं भारत के दक्षिण प्रदेश के देवगिरि पर्वत के निकट सुकर्मा नामक ब्राह्मण और उसकी पत्नी सुदेश निवास करते थे. दोनों ही भगवान शिव के परम भक्त थे. परंतु इनके कोई संतान सन्तान न थी इस कारण यह बहुत दुखी रहते थे जिस कारण उनकी पत्नि उन्हें दूसरी शादी करने का आग्रह करती थी अत: पत्नि के जोर देने सुकर्मा ने अपनी पत्नी की बहन घुश्मा के साथ विवाह कर लिया. 
घुश्मा भी शिव भगवान की अनन्य भक्त थी और भगवान शिव की कृपा से उसे एक पुत्र की प्राप्ति हुई. पुत्र प्राप्ति से घुश्मा का मान बढ़ गया परंतु इस कारण सुदेश को उससे ईष्या होने लगी जब पुत्र बड़ा हो गया तो उसका विवाह कर दिया गया यह सब देखकर सुदेहा के मन मे और अधिक ईर्षा पैदा हो गई. जिसके कारण उसने पुत्र का अनिष्ट करने की ठान ली ओर एक दिन रात्रि में जब सब सो गए तब उसने घुश्मा के पुत्र को चाकू से मारकर उसके शरीर के टुकड़े कर दिए और उन टुकड़ों को सरोवर में डाल दिया जहाँ पर घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव लिंग का विसर्जन किया करती थी. शव को तालाब में फेंककर वह आराम से घर में आकर सो गई.
रोज की भाँति जब सभी लोग अपने कार्यों मे व्यस्त हो गए और नित्यकर्म में लग गये तब सुदेहा भी आनन्दपूर्वक घर के काम-काज में जुट गई. परंतु जब बहू नींद से जागी तो बिस्तर को ख़ून में सना पाया तथा मांस के कुछ टुकड़े दिखाई दिए यह भयानक दृश्य देखकर व्याकुल बहू अपनी सास घुश्मा के पास जाकर रोने लगी और पति के बारे मे पूछने लगी और विलाप करने लगी. सुदेहा भी उसके साथ विलाप मे शामिल हो गई ताकी किसी को भी उस पर संदेह न हो बहू के क्रन्दन को सुनकर घुश्मा जरा भी दुखी नहीं हुई और अपने नित्य पूजन व्रत में लगी रही व सुधर्मा भी अपने नित्य पूजा-कर्म में लगे रहे. दोनों पति-पत्नि भगवान का पूजन भक्ति के साथ बिना किसी विघ्न, चिन्ता के करते रहे. जब पूजा समाप्त हुई तब घुश्मा ने अपने पुत्र की रक्त से भीगी शैय्या को देखा यह विभत्स दृश्य देखकर भी उसे किसी प्रकार का विलाप नहीं हुआ.
उसने कहा की जिसने मुझे पुत्र दिया है वही शिव उसकी रक्षा भी करेंगे वह तो स्वयं कालों के भी काल हैं, सत्पुरूषों के आश्रय हैं और वही हमारे संरक्षक हैं. अत: चिन्ता करने से कुछ न होगा इस प्रकार के विचार कर उसने शिव भगवान को याद किया धैर्य धारण कर शोक से मुक्त हो गईं. और प्रतिदिन की तरह शिव मंत्र ऊँ नम: शिवाय का उच्चारण करती रही तथा पार्थिव लिंगों को लेकर सरोवर के तट पर गई जब उसने पार्थिव लिंगों को तालाब में प्रवाहित किया तो उसका पुत्र सरोवर के किनारे खड़ा हुआ दिखाई पड़ा अपने पुत्र को देखकर घुश्मा प्रसन्नता से भर गई इतने में ही भगवान शिव उसके सामने प्रकट हो गये. 
भगवान शिव घुश्मा की भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा भगवाने ने कहा यदि वो चाहे तो वो उसकी बहन को त्रिशूल से मार डालें. परंतु घुश्मा ने श्रद्धा पूर्वक महेश्वर को प्रणाम करके कहा कि सुदेहा बड़ी बहन है अत: आप उसकी रक्षा करे उसे क्षमा करें. घुश्मा ने निवेदन किया की मैं दुष्कर्म नहीं कर सकती और बुरा करने वाले की भी भलाई करना ही अच्छा माना जाता है. अत: भगवान शिव घुश्मा के भक्तिपूर्ण विचारों को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हो उठे और कहा घुश्मा तुम कोई और वर मांग सकती हो घुश्मा ने कहा हे महादेव मुझे वर देना ही चाहते हैं तो लोगों की रक्षा और कल्याण के लिए आप यहीं सदा निवास करें घुश्मा की प्रार्थना से प्रसन्न महेश्वर 
शिवजी ने उस स्थान पर सदैव वास करने का वरदान दिया तथा तालाब के समीप ज्योतर्लिंग के रूप में वहां पर वास करने लगे और घुश्मेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए उस तालाब का नाम भी तब से शिवालय हो गया. 

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग महत्व | Grishneshwar Jyotirlinga Importance

मान्यता है की शिवालय सरोवर का दर्शन करने से सब प्रकार के अभीष्ट प्राप्त होते हैं. निसंतानों को संतान की प्राप्ति होती है. घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन व पूजन करने से सब प्रकार के सुखों की वृद्धि होती है. जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने भी घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा अराधना की थी.

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