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22 जून 2011

केदारनाथ धाम | Kedarnath Dham


11.केदारनाथ धाम | Kedarnath Dham - (Kedarnath Jyotirlinga) | Kedarnath Mahadev Katha

KEDARNATH JOTIRLING AND TEMPLE
बाबा भोले नाथ कृपालु एवं भक्तों पर दया करने वाले हैं. जो भी सच्चे मन से इनका ध्यान करता है उसकी पुकार भोलेनाथ अवश्य सुनते हैं. इन्द्र की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव सोमनाथ ज्योर्तिलिंग के रूप में प्रकट होकर आज भी इन्द्र की भक्ति की कथा सुना रहा है. इसी प्रकार नर-नारायण की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ भारत के उत्तराखंड में हिमालय पहार पर मंदाकिनी नदी के पास केदारनाथ ज्योर्तिलिंग के रूप में प्रकट हुए. बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है. केदारनाथ समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है. केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी हुआ. यह तीर्थ शिव का अत्यंत प्रिय स्थान है. जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है. 

केदारनाथ महादेव की कथा | Kedarnath Mahadev Katha in Hindi

केदारनाथ महादेव के विषय में कई कथाएं हैं. स्कन्द पुराण में लिखा है कि एक बार केदार क्षेत्र के विषय में जब पार्वती जी ने शिव से पूछा तब भगवान शिव ने उन्हें बताया कि केदार क्षेत्र उन्हें अत्यंत प्रिय है. वे यहां सदा अपने गणों के साथ निवास करते हैं. इस क्षेत्र में वे तब से रहते हैं जब उन्होंने सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा का रूप धारण किया था.
स्कन्द पुराण में इस स्थान की महिमा का एक वर्णन यह भी मिलता है कि एक बहेलिया था जिस हिरण का मांस खाना अत्यंत प्रिय था. एक बार यह शिकार की तलाश में केदार क्षेत्र में आया. पूरे दिन भटकने के बाद भी उसे शिकार नहीं मिला. संध्या के समय नारद मुनि इस क्षेत्र में आये तो दूर से बहेलिया उन्हें हिरण समझकर उन पर वाण चलाने के लिए तैयार हुआ. 
जब तक वह वाण चलाता सूर्य पूरी तरह डूब गया. अंधेरा होने पर उसने देखा कि एक सर्प मेंढ़क का निगल रहा है. मृत होने के बाद मेढ़क शिव रूप में परिवर्तित हो गया. इसी प्रकार बहेलिया ने देखा कि एक हिरण को सिंह मार रहा है. मृत हिरण शिव गणों के साथ शिवलोक जा रहा है. इस अद्भुत दृश्य को देखकर बहेलिया हैरान था. इसी समय नारद मुनि ब्राह्मण वेष में बहेलिया के समक्ष उपस्थित हुए. 
बहेलिया ने नारद मुनि से इन अद्भुत दृश्यों के विषय में पूछा. नारद मुनि ने उसे समझाया कि यह अत्यंत पवित्र क्षेत्र है. इस स्थान पर मृत होने पर पशु-पक्षियों को भी मुक्ति मिल जाती है. इसके बाद बहेलिया को अपने पाप कर्मों का स्मरण हो आया कि किस प्रकार उसने पशु-पक्षियों की हत्या की है. बहेलिया ने नारद मुनि से अपनी मुक्ति का उपाय पूछा. नारद मुनि से शिव का ज्ञान प्राप्त करके बहेलिया केदार क्षेत्र में रहकर शिव उपासना में लीन हो गया. मृत्यु पश्चात उसे शिव लोक में स्थान प्राप्त हुआ. 

केदारनाथ ज्योर्तिलिंग की कथा | Kedarnath Jyotirlinga Katha in Hindi

केदारनाथ ज्योर्तिलिंग की कथा के विषय में शिव पुराण में वर्णित है कि नर और नारयण नाम के दो भाईयों ने भगवान शिव की पार्थिव मूर्ति बनाकर उनकी पूजा एवं ध्यान में लगे रहते. इन दोनों भाईयों की भक्तिपूर्ण तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव इनके समक्ष प्रकट हुए. भगवान शिव ने इनसे वरदान मांगने के लिए कहा तो जन कल्याण कि भावना से इन्होंने शिव से वरदान मांगा कि वह इस क्षेत्र में जनकल्याण हेतु सदा वर्तमान रहें. इनकी प्रार्थना पर भगवान शंकर ज्योर्तिलिंग के रूप में केदार क्षेत्र में प्रकट हुए. 

केदारनाथ से जुड़ी पाण्डवों की कथा | Kedarnath Pandavas Katha in Hindi

शिव पुराण में लिखा है कि महाभारत के युद्ध के पश्चात पाण्डवों को इस बात का प्रायश्चित हो रहा था कि उनके हाथों उनके अपने भाई-बंधुओं की हत्या हुई है. वे इस पाप से मुक्ति पाना चाहते थे. इसका समाधान जब इन्होंने वेद व्यास जी से पूछा तो उन्होंने कहा कि बंधुओं की हत्या का पाप तभी मिट सकता है जब शिव इस पाप से मुक्ति प्रदान करेंगे. शिव पाण्डवों से अप्रसन्न थे अत: पाण्डव जब विश्वानाथ के दर्शन के लिए काशी पहुंचे तब वे वहां शंकर प्रत्यक्ष प्रकट नहीं हुए. शिव को ढ़ूढते हुए तब पांचों पाण्डव केदारनाथ पहुंच गये. 
पाण्डवों को आया देखकर शिव ने भैंस का रूप धारण कर लिया और भैस के झुण्ड में शामिल हो गये . शिव की पहचान करने के लिए भीम एक गुफा के मुख के पास पैर फैलाकर खड़ा हो गया. सभी भैस उनके पैर के बीच से होकर निकलने लगे लेकिन भैस बने शिव ने पैर के बीच से जाना स्वीकार नहीं किया इससे पाण्डवों ने शिव को पहचान लिया.
इसके बाद शिव वहां भूमि में विलीन होने लगे तब भैंस बने भगवान शंकर को भीम ने पीठ की तरह से पकड़ लिया. भगवान शंकर पाण्डवों की भक्ति एवं दृढ़ निश्चय को देखकर प्रकट हुए तथा उन्हें पापों से मुक्त कर दिया. इस स्थान पर आज भी द्रौपदी के साथ पांचों पाण्डवों की पूजा होती है. यहां शिव की पूजा भैस के पृष्ठ भाग के रूप में तभी से चली आ रही है. 

केदारनाथ मंदिर | Kedarnath Temple

केदारनाथ मंदिर का निर्माण पाण्डवों ने करवाया था. लेकिन, वह मंदिर नष्ट हो गया है. वर्तमान मंदिर के विषय में मान्यता है कि इसका निर्माण 8 वी सदी में आदि गुरू शंकराचार्य ने करवाया था. यह कत्यूरी शैली में निर्मित है. मंदिर लगभग 6फुट ऊँचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है. मण्डप और गर्भगृह के चारों तरफ प्रदक्षिणा पथ बना हुआ है जहां से भक्त शिव की प्रदक्षिणा करते हैं. 
मंदिर के गर्भ गृह में नुकीली चट्टान की पूजा शिव के रूप में होती है. सामने की तरफ से भक्तगण शिव को जल एवं पुष्प चढ़ाते हैं. दूसरी तरफ से घृत अर्पित करके भक्त शिव से बॉह भरकर मिलते हैं.  मंदिर का पट भक्तों के लिए 7 बजे सुबह खुल जाता है. दोपहर एक बजे से दो बजे तक यहां विशेष पूजा होती है. इसके बाद मंदिर का पट बंद कर दिया जाता है. शाम में 5 बजे पुन: मंदिर का पट खुलता है. 7.30 बजे के आस-पास शिव का श्रृंगार करके उनकी आरती की जाती है. इसके बाद मंदिर का पट सुबह तक के लिए बंद कर दिया जाता है. मंदिर के पास ही कई कुण्ड हैं.

केदारनाथ धाम का महात्म्य | Kedarnath Dham Mahatmya

केदारनाथ का महात्म्य इस बात से सिद्ध होता है कि यहां बहेलिया शिव की पूजा करने से जीवहत्या के पाप से मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त हुआ. पाण्डवों को महाभारत के युद्ध में बंधुओं की हत्या का जो पाप लगा था उनसे मुक्ति उन्हें इसी तीर्थ स्थल पर मिली थी. कहा जाता है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन के बिना बद्रीनाथ का दर्शन करता है उसे बद्रीनाथ की यात्रा का पुण्य फल नहीं मिलता है. केदरनाथ पर चढ़ाया गया जल पीने से मनुष्य के कई-कई जन्मों के पाप समाप्त हो जाते हैं जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है. जो व्यक्ति केदारनाथ यात्रा करता है उनके पूर्वजों को भी मुक्ति मिल जाती है. 

केदारनाथ यात्रा | Kedarnath Yatra

केदारनाथ की यात्रा अप्रैल माह के मध्य से नवम्बर मध्य तक की जा सकती है. नवम्बर मध्य से अप्रैल मध्य तक बाबा केदारनाथ का पट बंद रहता है. प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालु भक्त यहां शिव के दर्शनों के लिए यहां आते हैं. केदारनाथ मार्ग में गौरी कुण्ड है. माना जाता है कि पार्वती जी ने गणेश जी को यहीं जन्म दिया था. यहां जाने के लिए हरिद्वार एवं ऋषिकेश से कई प्रकार के साधन उपलब्ध रहते हैं. गौरी कुण्ड के बाद तीव्र ढ़लान है जहां से तीर्थयात्रियों को पैदल आगे जाना होता है. जो तीर्थयात्री पैदल चलने में असमर्थ होते हैं वह पिट्ठू, पालकी अथवा घोड़े पर चढ़कर बाबा केदारनाथ के दरबार तक पहुंच सकते हैं. 

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