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16 जून 2011

MARYADA PURUSHOTTAM SHRIRAM

श्रीरामचन्द्रजी  को मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों कहा जाता है..

जीवन जीने की कला सीखें भगवान श्रीराम से...
श्रीरामचंद्र_सीता_लक्ष्मण_हनुमान : फोटो : राजेश मिश्रा 
राम भगवान से पहले एक व्यक्ति हैं। उन्होंने अपने जीवन में कई ऐसे कार्य किए, जिन्हें हम दैनिक जीवन में अपना सकते हैं।
राम नटखट बालक राम के रूप में कई लीलाएं दिखाते हैं। वे एक आदर्श पुत्र, पति और प्रतापी राजा भी हैं, जिनकी वजह से लोग उन्हें भगवान मानते हैं। लेकिन भगवान राम ने एक साधारण मनुष्य के रूप में कई ऐसे कार्य किए, जो आज राम-मार्ग बन चुका है, जिस पर हम सभी को चलना चाहिए।
सत्य के स्वरूप राम
राम राजा होते हुए भी स्वयं को साधारण व्यक्ति के रूप में दर्शाते हैं। सीता रानी नहीं, बल्कि जगत जननी हैं। भाई, मां, पत्नी, मित्र, सेवक, सखा, राजा, शत्रु सभी को अपनी-अपनी मर्यादाओं में बांधने वाले तुलसी अपने नायक राम को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि उसे धर्म की सीमा में बांधना संकीर्णता होगी। राम सबके हैं। उन्होंने अधर्म से लडने के लिए अवतार लिया। रावण से उनका युद्ध सत्य और असत्य के बीच लडाई है।
नियतिवादी नहीं, कर्मवादी
तुलसी के राम भाग्यवादी या नियतिवादी नहीं हैं। पुरुषार्थ उनका कर्म है। इस कर्म में एक ओर राक्षसी ताडकाका वध करना है, तो दूसरी ओर शबरी के झूठे बेर खाकर मानव मात्र की समानता को प्रतिष्ठित करना भी है। युवराज होकर भी अपने क‌र्त्तव्य पालन के लिए वे जंगल में खुशी-खुशी रहते हैं। लक्ष्मण को शक्ति बाण लगने पर वे एक साधारण बडे भाई की तरह विलाप करते हैं।
राजेश मिश्रा, कोलकाता 
जीवन की सीख
हालांकि रामकथा एक राजघराने की कहानी है, फिर भी उसके सभी घटनाक्रम घर-घर की कहानी की तरह हैं। आज के समाज में जो पैसे और शक्ति को मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य समझते हैं, उन्हें यह सुनकर हैरत होती है कि भरत राजगद्दी पर बैठने के बदले अपनी मां कैकेयीको लांछना देते हुए कहते हैं कि मुझे यह राज्य नहीं चाहिए। मेरे बदले सिंहासन पर बडे भैया की खडाऊं ही विराजेगी। इससे हमारे कथित राजनीतिज्ञ सीख ले सकते हैं। आज संकीर्ण विचारों वाले मनुष्य जब धर्म के नाम पर कायरतापूर्ण कार्य कर रहे हैं, उन्हें राम के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए कि आतंक की आयु लंबी नहीं होती।
राम के प्रिय हनुमान बडी वीरता और साहस के साथ राक्षसों का सामना करते हैं। निशाचरों की गुप्तचरीकर वे राम-रावण युद्ध में सत्य को विजयी बनाने में बडी भूमिका निभाते हैं। धर्म युद्ध का यह स्वरूप भारतीय संस्कृति की नैतिक विरासत है।
राम का संपूर्ण जीवन त्याग, तपस्या, क‌र्त्तव्य और मर्यादित आचरण का उत्कृष्ट स्वरूप है। उससे सभी मनुष्य प्रेरणा ले सकते हैं। मर्यादा निर्माण का यह अभ्यास विश्व इतिहास में अनूठा है। यही कारण है कि विज्ञान और विकास के दौर में भी राम जनमानस के देवता हैं।
त्याग का संदेश
राम शक्ति ही नहीं, विरक्ति के भी प्रतीक हैं। वे लंका जीत कर विभीषण को सौंप देते हैं।
ऐसे यशस्वी और तपस्वी राम को रामनवमी के दिन स्मरण करने का अर्थ उनके उन सद्गुणों को याद करना है, जिन्हें हम अपने जीवन में उतार सकते हैं।
राम के नए संदर्भ
भगवान राम ने धरती पर एक साधारण मनुष्य के रूप में जन्म लिया। हम सभी जानते हैं कि उत्तरकांडऔर बालकांडको काफी समय बाद रामायण में जोडा गया, जिसमें पौराणिक कथाओं का प्रभाव दीखता है। कथा के अनुसार, देवताओं की सभा हुई, जिसमें निर्णय लिया गया कि पृथ्वी को आसुरी शक्तियों से बचाने के लिए विष्णु जी को अवतार लेना होगा! अब तक हम मानते आए हैं कि जनकल्याण के लिए राम ने अवतार लिया था। उनकी लीलाएं वर्तमान समय और परिस्थितियों में सच्ची सीख देती हैं।
रामायण एक हिंदू महाकाव्य है, जिसमें विभिन्न पात्रों के माध्यम से देवी-देवताओं की अद्भुत लीलाओं का वर्णन किया गया है। हिंदुस्तान और दक्षिण-पूर्वी एशिया में अब तक रामायण को लगभग 300अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किया जा चुका है।
रिसर्च स्कॉलर्सकी शोध में यह बात सामने आ चुकी है कि वाल्मीकि रामायण की 1/3भाग ही मौलिक हैं और शेष में समय और स्थान का स्पष्ट प्रभाव दिखता है।
दरअसल, तत्कालीन समय में भाटऔर चारण विभिन्न सभाओं में राम के गुणों को स्थानीय भाषा में गाते रहते थे, जो कालक्रम में रामायण से जुडते चले गए।
कई ऐसे प्रसंग, जैसे-हम रामायण के आधार पर मानते आए हैं कि सीता की अग्निपरीक्षा हुई थी, जबकि उनकी ऐसी किसी प्रकार की परीक्षा नहीं हुई। ठीक उसी प्रकार, कथा में हम पाते हैं कि शूर्पणखाएक राक्षसी है, जो समय-समय पर अपना रूप बदल लेती है और मनुष्यों को अपना ग्रास बनाती है। वास्तव में, वह एक राजा की बहन और राजकुमारी थी।

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