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18 जून 2011

NEPAL : PASHUPATINATH YATRA

शुपतिनाथ मन्दिर (नेपाल)


निर्माण तिथि:400 ईसवी
प्रमुख आराध्य : पशुपतिनाथ
स्थापत्य:पगोडा़
स्थिति : काठमांडू, नेपाल
Pashupatinathskc.JPG
PASHUPATINATH:NEPAL:RAJESH MISHRA

पशुपतिनाथ शिवजी का एक नाम है। शिव के बिना पुरुष पशु है। मानव पाश में बँधा तभी मुक्त होता है जब वह शिव को पा लेता है।

पशुपतिनाथ मंदिर, नेपाल की राजधानी काठमांडू के पूर्वी भाग में बागमती नदी के किनारे पर स्थित एक हिंदू मंदिर है। नेपाल के एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनने से पहले यह मंदिर राष्ट्रीय देवता, भगवान पशुपतिनाथ का मुख्य निवास माना जाता था। यह मंदिर यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में सूचीबद्ध है।

पशुपतिनाथ में आस्थावानों (मुख्य रूप से हिंदुओं) को मंदिर परिसर में प्रवेश करने की अनुमति है। गैर हिंदू आगंतुकों बागमती नदी के दूसरे किनारे से इसे बाहर से देखने की अनुमति है।

यह मंदिर नेपाल में शिव का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है।

पशुपतिनाथ मंदिर (नेपाली: मन्दिर पशुपतिनाथको) काठमांडू, नेपाल की राजधानी के पूर्वी हिस्से में बागमती नदी के तट पर स्थित दुनिया के सबसे बड़े भगवान शिव के मंदिर के एक है. मंदिर राष्ट्रीय देवता, भगवान पशुपतिनाथ की सीट के रूप में सेवा की है, जब तक नेपाल secularized था. मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की सूची में सूचीबद्ध है.

पशुपतिनाथ (मुख्य रूप से हिंदुओं) के विश्वासियों के लिए मंदिर परिसर में प्रवेश की अनुमति है. किसी को भी जन्म होता है मंदिर के अधिकारियों ने एक गैर हिंदू नहीं माना नेपाल या भारत में. गैर हिंदू आगंतुकों बागमती नदी के दूसरे बैंक से मंदिर पर एक नजर है की अनुमति है.

यह सबसे भगवान शिव (पशुपति) के मंदिरों में पवित्र माना जाता है.

पशुपतिनाथ मंदिर, काठमांडू [नेपाल]
Pashupatinath Temple, Kathmandu [Nepal]





काठमांडू के पूर्वी हिस्से में बागमती नदी के तट पर स्थित पशुपतिनाथ मंदिर हिंदू धर्म के आठ सबसेपवित्र स्थलों में से एक माना जाता है। नेपाल में यह भगवान शिव का सबसे पवित्र मंदिर माना जाताहै। यह मंदिर दुनिया भर के हिंदू तीर्थयात्रियों के अलावा गैर-हिंदू पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी रहा है।यह मंदिर यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में सूचीबद्ध है।
पशुपतिनाथ मंदिर में गैर हिंदू आगंतुकों को बागमती नदी के दूसरे किनारे से इसे बाहर से देखने कीअनुमति है। नेपाल में भगवान शिव का मंदिर विश्वभर में विख्यात है। इसका असाधारण महत्व भारतके अमरनाथ व केदारनाथ से किसी भी प्रकार कम नहीं। इस अंतर्राष्ट्रीय तीर्थ के दर्शन के लिए भारत केही नहीं, विदेशों के असंख्य यात्री और पर्यटक काठमांडू पहुंचते हैं। इस नगर के चारों ओर पर्वतमालाएं हैंजिनकी घाटियों में यह नगर अपना पर्वतीय सौंदर्य मुक्तहस्त से बिखेरने के लिए थोड़ी-सी भी कंजूसीनहीं करता।

एक समय इस नगर का नाम कांतिपुर था। काठमांडू मेंबागमती व विष्णुमती का संगम है। मंदिर का शिखरस्वर्णवर्णी अपनी छटा बिखेरता रहता है, साथ में डमरू सहितत्रिशूल है। मंदिर एक मीटर ऊंचे चबूतरे पर विराजमान है।मंदिर के चारों ओर पशुपतिनाथ जी के सामने चार दरवाजे हैं।दक्षिणी द्वार पर तांबे की परत पर स्वर्णजल चढ़ाया हुआ है।बाकी तीन पर चांदी की परत है। मंदिर चौकोर है। दोनों छतों केचार कोनों पर उत्कृष्ट कोटि की कारीगरी से सिंह की शक्ल बनाई गई है। मुख्य मंदिर में महिष रूपधारीभगवान शिव का शिरोभाग है जिसका पिछला हिस्सा केदारनाथ में है। इसका प्रसंग स्कंद पुराण में है।

मंदिर का अधिकतर भाग काष्ठ-निर्मित है। गर्भगृह में पंचमुखी शिवलिंग-विग्रह है जो अन्यत्र नहीं है।मंदिर परिसर में अनेक मंदिर हैं जिनमें पूर्व की ओर गणेश जी का मंदिर है। मंदिर के प्रांगण की दक्षिणीदिशा में एक द्वार है जिसके बाहर एक सौ चौरासी शिवलिंगों की कतारें हैं।

पशुपतिनाथ मंदिर के दक्षिण में उन्मत्त भैरव के दर्शन भैरवउपासकों के लिए बहुत कल्याणकारी है। पशुपतिनाथङ्क्षलग-विग्रह में चार दिशाओं में चार मुख और ऊपरी भाग मेंपांचवां मुख है। प्रत्येक मुखाकृति के दाएं हाथ में रुद्राक्ष कीमाला और बाएं हाथ में कमंडल है। हरेक मुख अलग-अलगगुण प्रकट करता है। पहला मुख अघोर मुख है, जो दक्षिण कीओर है। पूर्व मुख को तत्पुरुष कहते हैं। उत्तर मुख अर्धनारीश्वररूप है। पश्चिमी मुखी को सद्योजात कहा जाता है। ऊपरी भागईशान मुख के नाम से पुकारा जाता है। यह निराकार मुख है।यही भगवान पशुपतिनाथ का श्रेष्ठतम मुख है।

1747 से नेपाली राजाओं ने पूजा-अर्चना के लिए भारतीय ब्राह्मणों को आमंत्रित करना शुरू किया।उनकी धारणा थी कि भारतीय ब्राह्माण हिंदू धर्मशास्त्रों और रीतियों में ज्यादा पारंगत होते हैं। इसीपरंपरा को आगे बढ़ाते हुए माल्ला राजवंश के एक राजा ने एक दक्षिण भारतीय ब्राह्मण को पशुपतिनाथ मंदिर का प्रधान पुजारी नियुक्त किया। यही परंपरा आगे भी जारी रही और दक्षिण भारतीय भट्टब्राह्मण ही इस मंदिर के प्रधान पुजारी होते चले आए।

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