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29 जुलाई 2011

SABHI MANORATH PURA KARTE HAIN TIRUPATI BALAJI


सभी मनोरथ पूरा करते हैं- तिरुपति बालाजी


Tirupati Balaji : photo by Rajesh Mishra

भारत में तिरुपति मंदिर सबसे वैभवशाली मंदिरों में एक है। यह दक्षिण भारत में आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले में है। तिरुपति बालाजी मंदिर विश्व भर के हिंदुओं का प्रमुख वैष्णव तीर्थ है। यह पूरी दुनिया में हिंदु धर्म का सबसे अधिक धनी मंदिर माना जाता है। सात पहाडों का समूह शेषाचलम या वेंकटाचलम पर्वत श्रेणी की चोटी तिरुमाला पहाड पर तिरुपति मंदिर स्थित है । तिरुमाला पहाड पूरी दुनिया में दूसरी सबसे प्राचीन चट्टानें मानी जाती है। इसलिए इसे तिरुपति बालाजी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। 

भगवान वेंकटेश को विष्णु का अवतार भी माना जाता है। भगवान विष्णु यहां वेंकटेश्वर, श्रीनिवास और बालाजी नाम से प्रसिद्ध है। हिंदू धर्मावलंबी तिरुपति बालाजी के दर्शन अपने जीवन का ऐसा महत्वपूर्ण पल मानते हैं, जो जीवन को सकारात्मक दिशा देता है। इस मंदिर की यात्रा कर श्रद्धालु स्वयं को धन्य मानते हैं। देश-विदेश के हिंदू भक्त और श्रद्धालुगण यहां आकर यथाशक्ति दान करते हैं, जो धन, हीरे, सोने-चांदी के आभूषणों के रुप में होता है। इस दान के पीछे भी प्राचीन मान्यताएं जुड़ी है। जिसके अनुसार भगवान से जो कुछ भी मांगा जाता है, वह कामना पूरी हो जाती है। इसलिए भक्तगण दिल खोलकर दान दान करते हैं। यहां पर होने वाला दान का मूल्य करोड़ों रुपयों का होता है। माना जाता है कि दान की यह परंपरा विजयनगर के राजा कृष्णदेवराय द्वारा इस मंदिर में सोने-चांदी-हीरे के आभुषण का दान दिया था। उसी समय से भक्तगण इस मंदिर को खूब दान देते आ रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि अनेक लोग गलत तरीकों से कमाए धन का कुछ हिस्सा दान कर मन की शांति और संतुष्टि पाते हैं, जो वास्तव में पाप मुक्ति ही रुप है। श्रद्धालुओं क ी यह आस्था है कि तिरुपति बालाजी भी दु:खों, कष्टों का अंत कर देते हैं। 

अनेक श्रद्धालु यहां आकर मनोकामनाओं को पूरा करने और सुख समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं। मनोरथ पूरा होने पर भगवान की कृ पा मानकर श्रद्धा और आस्था के साथ श्रद्धालु अपने सिर के बालों को कटवाते हैं। यहां प्रतिदिन हजारों की संख्या में तीर्थयात्री मुण्डन कराते हैं। यहां मंदिरों में इन कटे बालों से बहुत राजस्व मिलता है। साथ ही इनके निर्यात से विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होती है। मुण्डन करने वाले लोगों का स्थानीय भाषा में तमिल मोत्ताई कहा जाता है। 

यह एक ऐसा तीर्थ है जहां पर लाखों की संख्या में तीर्थयात्री निरंतर आते हैं। हर समय इस मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। 

पौराणिक महत्व - तिरुमाला तिरुपति मंदिर का हिन्दु धर्म के अनेक पुराणों में अलग-अलग महत्व बताया गया है। वाराह पुराण में वेंकटाचलम या तिरुमाला को आदि वराह क्षेत्र लिखा गया है। वायु पुराण में तिरुपति क्षेत्र को भगवान विष्णु का वैकुंठ के बाद दूसरा सबसे प्रिय निवास स्थान लिखा गया है। स्कंदपुराण में वर्णन है कि तिरुपति बालाजी का ध्यान मात्र करने से व्यक्ति स्वयं के साथ उसकी अनेक पीढिय़ों का कल्याण हो जाता है और व विष्णुलोक को पाता है। इसी प्रकार भविष्यपुराण में उल्लेख है कि भगवान विष्णु को शयनकाल में महर्षि भृगु ने आकर छाती पर पैर से आघात किया। इससे माता लक्ष्मी बहुत दु:खी होकर वहां से चली गई। तब भगवान विष्णु भी देवी लक्ष्मी के चले जाने से दु:खी होकर पापों का नाश करने वाले देवता के रुप में निवास करने लगे। ऐसी मान्यता है कि इसीलिए भगवान का नाम श्रीनिवास हुआ। 

पुराणों की मान्यता है कि वेंकटम पर्वत वाहन गरुड द्वारा भूलोक में लाया गया भगवान विष्णु का क्रीड़ास्थल है। वैंकटम पर्वत शेषाचलम के नाम से भी जाना जाता है। शेषाचलम को शेषनाग के अवतार के रुप में देखा जाता है। इसके सात पर्वत शेषनाग के फन माने जाते है। 

वराह पुराण के अनुसार तिरुमलाई में पवित्र पुष्करिणी नदी के तट पर भगवान विष्णु ने ही श्रीनिवास के रुप में अवतार लिया। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर स्वयं ब्रहदेव भी रात्रि में मंदिर के पट बंद होने पर अन्य देवताओं के साथ भगवान वेंकटेश की पूजा करते हैं। 

पूजा और आरती का समय - भगवान तिरुपति बालाजी की आरती प्रात: ७:३० से १२:०० बजे और सांय ६:०० बजे से रात्रि १०:३० के मध्य होती है। 

पहुंच के संसाधन - वायु मार्ग - तिरुपति बालाजी मंदिर पहुंचने के लिए प्रमुख हवाई अड्डे हैं तिरुपति, हैदाराबाद, बैंगलोर और चेन्नई। 

रेलमार्ग - रेलमार्ग से तिरुपति बालाजी मंदिर पहुंचने के लिए प्रमुख रेल्वे स्टेशन हैं - चेन्नई सेंट्रल, हैदराबाद, बैंगलोर, तिरुपति और कुर्नूल। 

सड़क मार्ग - तिरुपति बालाजी सडक मार्ग से पहुंचने के लिए प्रमुख स्टेशन में बैंगलोर, चेन्नई, हैदराबाद और कुर्नुल प्रमुख हैं।
RAJESH MISHRA, KOLKATA, WEST BENGAL

28 जुलाई 2011

27 जुलाई 2011

खाटूश्याम मंदिर | KhatuShyamji : हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा



"हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा "
खाटू श्यामजी  : राजेश मिश्र द्वारा
खाटू वाले श्याम बाबा की अमर कहानी



राजस्थान के सीकर जिले में स्थित है भगवान खाटू श्याम जी का मुख्य मंदिर. खाटू श्याम जी को बर्बरीक के रूप जाना जाता है. बर्बरीक को खाटू श्याम नाम भगवान श्री कृष्ण द्वारा प्राप्त हुआ था. और उन्हीं के वरदान स्वरूप खाटू श्याम जी इस रूप में सभी की भक्ति का केन्द्र रहे हैं. भीम के पुत्र घटोत्कच और नाग कन्या अहिलवती के पुत्र बर्बरीक अपनी वीरता एवं साहस के लिए प्रसिद्ध रहे वह एक महान योद्धा थे. 
बाबा श्याम खाटूवाले 
श्री कृष्ण भगवान के कलयुग के अवतार के रूप में यहां पर खाटू में विराजमान हैं. खाटू श्याम जी को हारे का सहारा माना जाता है. बर्बरीक को अनेक नामों से पुकारा जाता है यह खाटू श्याम, श्याम सरकार, सूर्यावर्चा, सुहृदय, शीश के दानी, तीन बाणधारी, खाटू नरेश और कलयुग के अवतार जैसे नामों से जाना जाते हैं. 
बर्बरीक की बलिदान गाथा ने ही उन्हें देव स्थान दिया भगवान कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया था की कालांतर में तुम श्याम नाम से प्रसिद्ध होगे क्योंकि कलियुग में खाटू श्याम ही दुखियों एवं निर्बलों का सहारा बनेगा. खाटू श्याम मंदिर सनातन धर्म मतावलम्बियों की आस्था का प्रमुख केन्द्र भी रहा है. भारत के कोने-कोने से लोग इस मंदिर के दर्शन हेतु आते रहते हैं. 



खाटू श्याम पौराणिक महत्व | Khatu Shyam Mythological Importance

खाटू श्याम जी के संदर्भ में कुछ पौराणिक गाथाएं भी जुड़ी हुई हैं. एक कथा के अनुसार भीम के पुत्र घटोत्कच व नाग कन्या अहिलवती के पुत्र बर्बरीक वीर महान योद्धा थे. भगवान शिव की तपस्या करके वह तीन अभेद्य बाण प्राप्त करते हैं जिससे तीनो लोकों में विजय प्राप्त की जा सकती थी जिस कारण उन्हें तीन बाणधारी नाम भी प्राप्त हुआ था. महाभारत के युद्ध प्रारम्भ होने पर बर्बरीक ने मां से युद्ध में भाग लेने की इच्छा प्रकट की.
श्याम मंदिर खाटूधाम  में आरती करते भक्तजन
तब माता ने इन्हें युद्ध में भाग लेने की आज्ञा दे दी व वचन लिया की युद्ध में निर्बल और हारने वाले पक्ष का साथ निभाओगे. इस पर बर्बरीक कुरुक्षेत्र की ओर चल पडे़ जब कृष्ण ने उनकी परीक्षा ली और ब्राह्मण वेश धारण करके बर्बरीक से मिले तो यह सुनकर मुस्कुराए कि केवल तीन बाणों के साथ ही युद्ध में शामिल हो रहा है. इस पर बर्बरीक ने कहा कि यदि तीनों बाणों का उपयोग किया गया तो तीनों लोक ध्वस्त हो जाएंगे.
तब श्री कृष्ण ने बर्बरीक को एक चुनौती दी जिसमें उसे पीपल के वृक्ष के सभी पत्रों को भेदना था बर्बरिक ने चुनौती स्वीकार कर ली तथा अपने एक बाण से समस्त पत्तों को भेद डाला इस पर श्री कृष्ण ने एक पत्ता अपने पैरों के नीचे दबा रखा था. जिस कारण तीर श्री कृष्ण के पैर के चक्कर लगाने लगा तब बर्बरीक रहस्य जान गया तथा श्री कृष्ण से कहा की यदि वह अपना पाँव पत्ते पर से नही हटाते हैं तो यह तीर आपके पाँव को घायल कर देगा.
यह सब देख कर भगवान कृष्ण बर्बरीक से अत्यंत प्रभावित हुए. इस पर श्री कृष्ण बर्बरीक से पूछते हैं की तुम युद्ध में किसके साथ हो इस प्रश्न पर बर्बरीक ने कहा कि युद्ध भाग लेने के लिए आते समय मां ने कहा था की पुत्र उस ओर से लड़ना जो हार रहा हो तथा निर्बल हो कृष्ण ने सोचा की इस समय तो कौरव ही हार रहे हैं और इस समय में वह कौरवों का ही साथ देगा और यदि ऐसा हुआ तो पांडवों के लिए अच्छा न होगा. 
इस पर उन्होंने ब्राह्मण रूप में ही बालक बर्बरीक से दान स्वरूप बर्बरीक का सर मांग लिया इस पर बर्बरीक ने उन्हें यह दान देने का वचन दिया किंतु ब्राह्मण के असली रूप को जानने की इच्छा व्यक्त की इस पर श्री कृष्ण ने बालक को अपने वास्तविक रूप के दर्शन दिए. श्री कृष्ण ने बर्बरीक से कहा की युद्ध भूमि की पूजा करने के लिए किसी एक वीर के शिश के दान की जरूरत है.
और जब मैने तुम्हें देखा तो मुझे तुम ही वह योग्य वीर लगे. इस पर बर्बरीक ने श्री कृष्ण से प्रार्थना स्वरूप कहा की वह संपूर्ण युद्ध को देखना चाहता है. श्री कृष्ण ने बर्बरीक की प्रार्थना को स्वीकार किया तथा फाल्गुन महीने की द्वादश तिथि को बर्बरीक ने अपना शीश दान स्वरूप दे दिया. श्री कृष्ण ने बर्बरीक को युद्ध में प्रथम वीर की उपाधि प्रदान कि 
और बालक बर्बरीक का शीश युद्धभुमि के समीप ही पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर रख दिया. इस प्रकार बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का दृष्टा बना एवं एक महान वीर की उपाधि से अलंकृत हुए. भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक के शीश को अमृत से सींचा था तथा उन्हें कलयुग में उनके नाम से श्याम रुप में अवतार लेने का आशीर्वाद प्रदान किया. 
KHATU SHAYAMJI MANDIR, KHATUDHAM

खाटू श्याम मंदिर कथा | Khatu Shyam Temple Story In Hindi 


खाटू में स्थित श्याम मंदिर एक प्राचीन मंदिर है इसकी स्थापना 1720 के आस पास की मानी जाती है कहा जाता है की सन 1679 में मुगल राजा औरंगजेब ने इस मंदिर को नष्ट करने का आदेश दिया था जिस पर अनेक राजपूतों ने मंदिर की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया था. 
खाटू श्याम मंदिर में वीर बर्बरीक को श्याम के रूप में पूजा जाता है क्योंकी महाभारत के युद्ध समय भगवान कृष्ण ने बर्बरीक की वीरता एवं उनके  बलिदान स्वरूप वरदान दिया था कि कलयुग समय बर्बरीक को कृष्ण के श्याम स्वरूप के नाम से पूजा जाएगा. अत: इस कारण खाटू में स्थित श्याम मंदिर में बर्बरीक अर्थात श्याम के शीश स्वरूप की पूजा का विधान है. और उसी के पास स्थित रींगस स्थल में उनके शरीर स्वरूप की पूजा होती है.
SHYAM KUND : PHOTO BY RAJESH MISHRA
खाटू की स्थापना के विषय में कई मत प्रचलित है जिसमें कहा गया है की श्याम जी का शीश खाटू में रखा गया था जहां पर वर्तमान में खाटू श्यामजी मंदिर का निर्माण किया गया. कहा जाता है की एक गाय इस स्थान पर दुग्ध की धार बहा रही थी इस घटना को देखकर लोगों ने वहां खुदाई की तो शीश प्रकट हुआ था.
जिसे एक ब्राह्मण को कुछ समय के लिये रखने के लिए दे दिया गया जब खाटू के राजा को सपने में शीश के स्थान के लिए मंदिर निर्माण का आदेश प्राप्त हुआ तो उसने इस स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया तथा कार्तिक एकादशी की पवित्र तिथि के दिन शीश को मन्दिर में सुशोभित किया गया. 

खाटू श्याम मंदिर महत्व | Khatu Shyam Temple Importance

बाबा श्याम मंदिर खाटू धाम

खाटू श्याम मंदिर हज़ारों श्रद्धालु की आस्था का केन्द्र है यहां पर वर्ष भर भक्तों का आवागमन लगा ही रहता है अनेक भक्त पदयात्रा करते हुए इस पवित्र स्थान के दर्शन करने के लिए आते हैं. तो कई श्रद्धालु दंडवत करते हुए श्याम मंदिर में पहुँचते हैं. खाटू श्यामजी मंदिर में फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष में बड़े मेले का आयोजन किया जाता है और देश के कोने-कोने से लोग इस पावन अवसर पर यहां दर्शनों के लिए पहुँचते हैं. 
नवमी से द्वादशी तक लगने वाले इस मेले का बहुत महत्व होता है. रविवार एवं एकादशी के समय भी मंदिर में दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं की भारी संख्या देखी जा सकती है. लोगों की मान्यता है की यहां आकर श्याम जी के दर्शन प्राप्त करने से पापों से मुक्ति मिलती है जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं तथा समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. तभी तो कहा जाता है "हारे का सहारा, खाटू श्याम जी हमारा".
श्री श्याम मंदिर कमिटी कार्यालय में राजेश मिश्रा 


निशान यात्रा 

रिंग्स से खाटू जाते राजेश मिश्रा 

फाल्गुन महोत्सव में सजा श्याम बाबा का खाटू मंदिर 


रिग्स से खाटू मार्ग में जगकल्याण पत्रिका भक्तो बांटते राजेश मिश्रा 

बाबा श्याम गर्भगृह (मंडप) 

खाटूधाम में बाबा श्याम के दर्शन के बाद राजेश मिश्रा

सभी श्याम भक्तों को राजेश मिश्रा
की ओर से
"जय श्री श्याम"

महादेव रहस्यों के भंडार हैं

अनादि, अनंत, देवाधिदेव, महादेव शिव परंब्रह्म हैं| सहस्र नामों से जाने जाने वाले त्र्यम्बकम् शिव साकार, निराकार, ॐकार और लिंगाकार रूप में देवताओं, दानवों तथा मानवों द्वारा पुजित हैं| महादेव रहस्यों के भंडार हैं| बड़े-बड़े ॠषि-महर्षि, ज्ञानी, साधक, भक्त और यहाँ तक कि भगवान भी उनके संम्पूर्ण रहस्य नहीं जान पाए| आशुतोष भगवान अपने व्यक्त रूप में त्रिलोकी के तीन देवताओं में ब्रह्मा एवं विष्णु के साथ रुद्र रूप में विराजमान हैं| ये त्रिदेव, हिन्दु धर्म के आधार और सर्वोच्च शिखर हैं| पर वास्तव में महादेव त्रिदेवों के भी रचयिता हैं| महादेव का चरित्र इतना व्यापक है कि कइ बार उनके व्याख्यान में विरोधाभाष तक हो जाता है| एक ओर शिव संहारक कहे जाते हैं तो दूसरी ओर वे परंब्रह्म हैं जिस लिंगाकार रूप में वे सबसे ज्यादा पूज्य हैं| जहां वे संसार के मूल हैं वहीं वे अकर्ता हैं| जहां उनका चित्रण श्याम वर्ण में होता है वहीं वे कर्पूर की तरह गोरे, कर्पूर गौरं, माने जाते हैं| जिन भगवान रूद्र के क्रोध एवं तीसरे नेत्र के खुलने के भय से संसार अक्रांत होता है और जो अनाचार करने पर अपने कागभुष्डीं जैसे भक्तों तथा ब्रह्मा जैसे त्रिदेवों को भी दण्डित करने से नहीं चुकते, वही आसुतोष भगवान अपने सरलता के कारण भोलेनाथ हैं तथा थोडी भक्ति से ही किसी से भी प्रसन्न हो जाते हैं| एक ओर रूद्र मृत्यु के देवता माने जाते हैं तो महामृत्यंजय भी उनके अलावा कोई दुसरा नहीं …
पर उस विरोधाभाष में भी एका स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है| आइए जानने की कोशिश करतें हैं आसुतोष भगवान के उन मनमोहन रूपों को जिसकी व्याख्यान प्राचीन आचार्यों तथा देवगणों ने कलमबद्ध किया है|

शिव परंब्रह्म हैं

शिव अनादि हैं, अनन्त हैं, विश्वविधाता हैं| सारे संसार में एक मात्र शिव ही हैं जो जन्म, मृत्यू एवं काल के बंधनो से अलिप्त स्वयं महाकाल हैं| शिव सृष्टी के मूल कारण हैं, फिर भी स्वयं अकर्ता हैं, तटस्थ हैं| सृष्टी से पहले कुछ नहीं था – न धरती न अम्बर, न अग्नी न वायू, न सूर्य न ही प्रकाश, न जीव न ही देव। था तो केवल सर्वव्यपी अंधकार और महादेव शिव। तब शिव ने सृष्टी की परिकल्पना की ।
सृष्टी की दो आवश्यकतायँ थीं – संचालन हेतु शक्ति एवं व्यवस्थापक । शिव ने स्वंय से अपनी शक्ति को पृथक किया तथा शिव एवं शक्ति ने व्यवस्था हेतु एक कर्ता पुरूष का सृजन किया जो विष्णु कहलाय। भगवान विष्णु के नाभि से ब्रह्मा की उतपत्ति हुई। विष्णु भगवान ने ब्रह्मदेव को निर्माण कार्य सौंप कर स्वयं सुपालन का कार्य वहन किया। फिर स्वयं शिव जी के अंशावतार रूद्र ने सृष्टी के विलय के कार्य का वहन किया। इस प्रकार सृजन, सुपालन तथा विलय के चक्र के संपादन हेतु त्रिदेवों की उतपत्ति हुई। इसके उपरांत शिव जी ने संसार की आयू निरधारित की जिसे एक कल्प कहा गया। कल्प समय का सबसे बड़ा माप है। एक कल्प के उपरातं महादेव शिव संपूर्ण सृष्टी का विलय कर देते हैं तथा पुन: नवनिर्माण आरंभ करते हैं जिसकी शुरुआत त्रिदेवों के गठन से होती है| इस प्रकार शिव को छोड शेष सभी काल के बंधन में बंधे होते हैं|
इन परमात्मा शिव का अपना कोई स्वरूप नहीं है, तथा हर स्वरूप इन्हीं का स्वरूप है। शिवलिंग इन्ही निराकार परमात्मा का परीचायक है तथा परम शब्द ॐ इन्हीं की वाणी। (अवश्य देखें शिवलिंग का महत्व)

अर्धनरनारीश्वर…

सृष्टी के निर्माण के हेतु शिव ने अपनी शक्ति को स्वयं से पृथक किया| शिव स्वयं पुरूष लिंग के द्योतक हैं तथा उनकी शक्ति स्त्री लिंग की द्योतक| पुरुष (शिव) एवं स्त्री (शक्ति) का एका होने के कारण शिव नर भी हैं और नारी भी, अतः वे अर्धनरनारीश्वर हैं|
जब ब्रह्मा ने सृजन का कार्य आरंभ किया तब उन्होंने पाया कि उनकी रचनायं अपने जीवनोपरांत नष्ट हो जायंगी तथा हर बार उन्हें नए सिरे से सृजन करना होगा। गहन विचार के उपरांत भी वो किसी भी निर्णय पर नहीं पहुँच पाय। तब अपने समस्या के सामाधान के हेतु वो शिव की शरण में पहुँचे। उन्होंने शिव को प्रसन्न करने हेतु कठोर तप किया। ब्रह्मा की कठोर तप से शिव प्रसन्न हुए। ब्रह्मा के समस्या के सामाधान हेतु शिव अर्धनारीश्वर स्वरूप में प्रगट हुए। अर्ध भाग में वे शिव थे तथा अर्ध में शिवा। अपने इस स्वरूप से शिव ने ब्रह्मा को प्रजन्नशिल प्राणी के सृजन की प्रेरणा प्रदान की। साथ ही साथ उन्होंने पुरूष एवं स्त्री के सामान महत्व का भी उपदेश दिया। इसके बाद अर्धनारीश्वर भगवान अंतर्धयान हो गए।
शक्ति शिव की अभिभाज्य अंग हैं। शिव नर के द्योतक हैं तो शक्ति नारी की। वे एक दुसरे के पुरक हैं। शिव के बिना शक्ति का अथवा शक्ति के बिना शिव का कोई अस्तित्व ही नहीं है। शिव अकर्ता हैं। वो संकल्प मात्र करते हैं; शक्ति संकल्प सिद्धी करती हैं। तो फिर क्या हैं शिव और शक्ति?

शिव कारण हैं; शक्ति कारक।
शिव संकल्प करते हैं; शक्ति संकल्प सिद्धी।
शक्ति जागृत अवस्था हैं; शिव सुशुप्तावस्था।
शक्ति मस्तिष्क हैं; शिव हृदय।
शिव ब्रह्मा हैं; शक्ति सरस्वती।
शिव विष्णु हैं; शक्त्ति लक्ष्मी।
 शिव महादेव हैं; शक्ति पार्वती।
शिव रुद्र हैं; शक्ति महाकाली।
शिव सागर के जल सामन हैं। शक्ति सागर की लहर हैं।
आइये हम समझने की कोशिश करते हैं। शिव सागर के जल के सामान हैं तथा शक्ति लहरे के सामान हैं। लहर क्या है? जल का वेग। जल के बिना लहर का क्या अस्तित्व है? और वेग बिना सागर अथवा उसके जल का? यही है शिव एवं उनकी शक्ति का संबंध। आएं तथा प्रार्थना करें शिव-शक्ति के इस अर्धनारीश्वर स्वरूप का इस अर्धनारीश्वर स्तोत्र द्वारा ।

विलयकर्ता रूद्र

शिव के सभी स्वरूपों में विलयकर्ता स्वरूप सर्वाधिक चर्चित, विस्मयकारी तथा भ्रामक है। सृष्टी का संतुलन बनाए रखने के लिए सृजन एवं सुपालन के साथ विलय भी अतिआवश्यक है| अतः ब्रह्मा एवं विष्णु के पुरक के रूप में शिव ने रूद्र रूप में विलयकर्ता अथवा संहारक की भुमिका का चयन किया| पर यह समझना अतिआवश्यक है कि शिव का यह स्वरूप भी काफी व्यापक है| शिव विलयकर्ता हैं पर मृत्यूदेव नहीं | मृत्यू के देवता तो यम हैं| शिव के विलयकर्ता रूप के दो अर्थ हैं|
विनाशक के रूप में शिव वास्तव में भय,अज्ञान, काम, क्रोध, लोभ, हिंसा तथा अनाचार जैसे बुराईयों का विनाश करते हैं। नकारात्मक गुणों का विनाश सच्चे अर्थों में सकारात्मक गुणों का सुपालन ही होता है। इस प्रकार शिव सुपालक हो विष्णु के पुरक हो जाते हैं। शिव का तीसरा नेत्र जो कि प्रलय का पर्याय माना जाता है वास्त्व में ज्ञान का प्रतीक है जो की प्रत्यक्ष के पार देख सकता है। शिव का नटराज स्वरूप इन तर्कों की पुष्टी करता है।
दुसरे अर्थों में सृजन, सुपालन एवं संहार एक चक्र है और किसी चक्र का आरंभ या अंत नहीं होता| अतः संहार एक दृष्टी से सृजन का प्रथम चरण है| लोहे को पिघलाने से उसका आकार नष्ट हो जाता है पर नष्ट होने के बाद ही उससे नय सृजन हो सकते हैं| तो लोहे के मुल स्वरूप का नष्ट होना नव निर्माण का प्रथम चरण है| उसी प्रकार संहार सृजन का प्रथम चरण है| इस दृष्टी से शिव ब्रह्मा के पुरक होते हैं|

नटराज शिव

नटराज शिव का स्वरूप न सिर्फ उनके संपुर्ण काल एवं स्थान को ही दर्शाता है; अपितु यह भी बिना किसी संशय स्थापित करता है कि ब्रह्माण मे स्थित सारा जिवन, उनकी गति कंपन तथा ब्रह्माण्ड से परे शुन्य की नि:शब्दता सभी कुछ एक शिव में ही निहत है।
नटराज दो शब्दों के समावेश से बना है – नट (अर्थात कला) और राज। इस स्वरूप में शिव कालाओं के आधार हैं| शिव का तांडव नृत्य प्रसिद्ध है| शिव के तांडव के दो स्वरूप हैं|
पहला उनके क्रोध का परिचायक, प्रलंयकारी रौद्र तांडव तथा दुसरा आनंद प्रदान करने वाला आनंद तांडव| पर ज्यदातर लोग तांडव शब्द को शिव के क्रोध का पर्याय ही मानते हैं| रौद्र तांडव करने वाले शिव रुद्र कहे जाते हैं, आनंद तांडव करने वाले शिव नटराज|
प्राचीन आचार्यों के मतानुसार शिव के आनन्द तांडव से ही सृष्टी अस्तित्व में आती है तथा उनके रौद्र तांडव में सृष्टी का विलय हो जाता है| शिव का नटराज स्वरूप भी उनके अन्य स्वरूपों की ही भातिं मनमोहक तथा उसकी अनेक व्याख्यायँ हैं।
नटराज शिव की प्रसिद्ध प्राचीन मुर्ति के चार भुजाएं हैं, उनके चारो ओर अग्नि के घेरें हैं। उनका एक पावं से उन्होंने एक बौने को दबा रखा है, एवं दुसरा पावं नृत मुद्रा में उपर की ओर उठा हुआ है।
उन्होंने अपने पहले दाहिने हांथ में (जो कि उपर की ओर उठा हुआ है) डमरु पकड़ा हुआ है। डमरू की आवाज सृजन का प्रतीक है। इस प्रकार यहाँ शिव की सृजनात्मक शक्ति का द्योतक है।
उपर की ओर उठे हुए उनके दुसरे हांथ में अग्नि है। यहाँ अग्नी विनाश की प्रतीक है। इसका अर्थ यह है कि शिव ही एक हाँथ से सृजन करतें हैं तथा दुसरे हाँथ से विलय।
उनका दुसरा दाहिना हाँथ अभय (या आशिस) मुद्रा में उठा हुआ है जो कि हमें बुराईयों से रक्षा करता है।
उठा हुआ पांव मोक्ष का द्योतक है। उनका दुसरा बांया हांथ उनके उठे हुए पांव की ओर इंगित करता है। इसका अर्थ यह है कि शिव मोक्ष के मार्ग का सुझाव करते हैं। इसका अर्थ यह भी है कि शिव के चरणों में ही मोक्ष है।
उनके पांव के नीचे कुचला हुआ बौना दानव अज्ञान का प्रतीक है जो कि शिव द्वारा नष्ट किया जाता है। शिव अज्ञान का विनाश करते हैं।
चारों ओर उठ रही आग की लपटें इस ब्रह्माण्ड की प्रतीक हैं। उनके शरीर पर से लहराते सर्प कुण्डलिनि शक्ति के द्योतक हैं। उनकी संपुर्ण आकृति ॐ कार स्वरूप जैसी दीखती है। यह इस बाद को इंगित करता है कि ॐ शिव में ही निहित है।
आइये स्मरण करते हैं उन्ही नाटराज शिव को इस नटराज स्तुति में|

योगेश्वर महादेव

शिव योग के जन्मदाता तथा श्रोत हैं। योग विज्ञान का उल्लेख प्राचीनतम हिन्दु ग्रंथों में मिलता है| सभी विज्ञानों से परे, यह विज्ञान शरीर एवं आत्मा दोने का ही अध्यन करता है| स्वसन प्रणाली का प्राचीनतम एवं आधिकारिक वर्णन भी सिर्फ योग के पास ही है| योग शारीरिक एवं मानसिक दोनो ही के स्वास्थ के लिए एक सरल मार्ग है|
हमारा शरीर तथा मस्तिष्क जिसमें अपार क्षमताएं हैं पर हम उनका सदोपयोग साधारणत: नहीं कर पातें हैं। योग हमें अपने अधिकतम क्षमता पर पहूँने में सहायक होता है।
शिव अपने व्यक्त स्वरूप में योगी सदृश्य हैं तथा नित योग साधना में निरत रहते हैं। उनकी योग साधना से जिस उर्जा का प्रजनन होता है उसी से यह ब्रह्माण्ड चलायमान है। तो शिव इस संसार में व्याप्त संपुर्ण उर्जा के श्रोत हैं।

महाकाल कालभैरव

तांत्रिक कलाओं के साधक एवं जानकार शिव को कालभैरव अथवा महाकाल के रूप में पूजते हैं| उन अघोरी साधकों का साधनास्थल ज्यादातर श्मशान, वन अथवा ऐसे ही विरान स्थल होते हैं जो भय उत्तपन्न करतें हैं| शिव का यह रूप भी उनके साधकों के अनुरूप ही भय उत्तपन्न करने वाला है|

पशुपतिनाथ

शिव सृष्टि के स्रोत हैं| सभी प्राणीयों के अराध्य हैं| मानवों और देवों के अलावा दानवों एवं पशुओं के भी द्वारा पूज्य हैं, अतः पशुपतिनाथ हैं| प्राचीनतम हरप्पा एवं मोहनजोदारो संकृति के अवशेषों में शिव के पशुपति रूप की कई मुर्तियाँ एवं चिन्ह उपलब्ध हैं|

दिगंबर शिव

दिगंबर शब्द का अर्थ है अंबर (आकाश) को वस्त्र सामान धारण करने वाला। दुसरे किसी वस्त्र के आभाव में इसका अर्थ ( या शायद अनर्थ ) यह भी निकलता है कि जो वस्त्र हिन हो (अथवा नग्न हो)। सही अर्थों में दिगंबर शिव के सर्वव्यापत चरीत्र की ओर इंगित करता है। शिव ही संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं। यह अनंत अम्बर शिव के वस्त्र सामान हैं।
शिव का एक नाम व्योमकेश भी है जिसका अर्थ है जिनके बाल आकाश को छूतें हों। इनका यह नाम एक बार फिर से उनके सर्वव्यापक चरीत्र की ओर ही इशारा करती है।
शिव सर्वेश्वर हैं। सर्वशक्तिमान तथा विधाता होने के बाद भी वे अत्यंत ही सरल हैं – भोलेनाथ हैं। वे शिघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। उन्हें प्रसनन करने के लिए किसी जटील विधान अथवा आडंबर की आवश्यकता नहीं पड़ती। वे तो भक्ति मात्र देखतें हैं। कोई भी किसी मार्ग द्वारा शिव को प्राप्त कर सकता है।
शिव देवाधिदेव हैं, पर उनमें कोई आडंबर नहीं है, वे सरल हैं, वस्त्र के स्थान पे बाघंबर, आभुषण के नाम पर सर्प और मुण्ड माल, श्रृंगार के नाम भस्म यही उनकी पहचान है| गिरीश योगी मुद्रा में कैलाश पर्वत पर योग में नित निरत रहते हैं| भक्तों के हर प्रकार के प्रसाद को ग्रहण करने वाले महादेव बिना किसी बनावट और दिखावा के होने के कारण दिगंबर कहे जाते हैं|
RAJESH MISHRA
(FRONT VICTORIA MEMORIAL KOLKATA)

RAKSHABANDHAN : BHAI-BAHAN KE PYAR KA BANDHAN


स्नेह बंधन रक्षाबंधन
यह है प्यार का बंधन भाई-बहन का 




सज गए हैं दुकानों  में कलाई पर बंधने वाले राखी 
रक्षाबंधन पर बहनें भाइयों की दाहिनी कलाई में राखी बांधती हैं, उनका तिलक करती हैं और उनसे अपनी रक्षा का संकल्प लेती हैं. हालांकि रक्षाबंधन की व्यापकता इससे भी कहीं ज्यादा है. राखी बांधना सिर्फ भाई-बहन के बीच का कार्यकलाप नहीं रह गया. राखी देश की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा, हितों की रक्षा आदि के लिए भी बांधी जाने लगी है. विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर ने इस पर्व पर बंग-भंग के विरोध में जनजागरण किया था और इस पर्व को एकता और भाईचारे का प्रतीक बनाया था.

प्रकृति की रक्षा के लिए वृक्षों को राखी बाधने की परंपरा भी शुरू हो चुकी है. हालांकि रक्षा सूत्र सम्मान और आस्था प्रकट करने के लिए भी बांधा जाता है.

रक्षाबंधन का महत्व आज के परिप्रेक्ष्य में इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि आज मूल्यों के क्षरण के कारण सामाजिकता सिमटती जा रही है और प्रेम व सम्मान की भावना में भी कमी आ रही है. यह पर्व आत्मीय बंधन को मजबूती प्रदान करने के साथ-साथ हमारे भीतर सामाजिकता का विकास करता है. इतना ही नहीं यह त्योहार परिवार, समाज, देश और विश्व के प्रति अपने कर्तव्यों के प्रति हमारी जागरूकता भी बढ़ाता है.
भाई-बहन के प्यार का अनमोल तोहफा है राखी (रक्षाबंधन)

पौराणिक प्रसंग

वामनावतार नामक पौराणिक कथा में रक्षाबंधन का प्रसंग मिलता है. कथा इस प्रकार है- राजा बलि ने यज्ञ संपन्न कर स्वर्ग पर अधिकार का प्रयत्‍‌न किया, तो देवराज इंद्र ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की. विष्णु जी वामन ब्राह्मण बनकर राजा बलि से भिक्षा मागने पहुंच गए. गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी. वामन भगवान ने तीन पग में आकाश-पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया. उसने अपनी भक्ति के बल पर विष्णु जी से हर समय अपने सामने रहने का वचन ले लिया. लक्ष्मी जी इससे चिंतित हो गई. नारद जी की सलाह पर लक्ष्मी जी बलि के पास गई और रक्षासूत्र बाधकर उसे अपना भाई बना लिया. बदले में वे विष्णु जी को अपने साथ ले आई. उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी.
तैयारी भाई के कलाई पर राखी बाँधने की 

ऐतिहासिक महत्व

इतिहास में भी राखी के महत्व के अनेक उल्लेख मिलते हैं. मेवाड़ की महारानी कर्मावती ने मुगल राजा हुमायूं को राखी भेज कर रक्षा-याचना की थी. हुमायूं ने मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज रखी. कहते हैं, सिकंदर की पत्‍‌नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु पुरु को राखी बांध कर उसे अपना भाई बनाया था और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया था. पुरु ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी का और अपनी बहन को दिए हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दिया था.

23 जुलाई 2011

BAHUT YAAD AATI HAI MAA....


बहुत याद आती है माँ……


मेरी माँ पवन देवी की पुण्यतिथि 23 जुलाई पर विशेष श्रद्धा सुमन


पथरीलेँ रास्तोँ पर जीवन के,
घाव जलते हैँ जब तन मन के,
RAJESH MISHRA'S FATHER AND MOTHER
LATE SHIVNATH AND LT. PAWAN MISHRA
बहुत याद आती है माँ।।

याद आती है मेरे लिये आँखोँ मेँ कटती उसकी रातेँ,
याद आती है हर कदम पर मुझे समझाती उसकी बातेँ,
मेरी गलतियोँ पर मुझको डाँटती फिर दुलारती,
मेरी बिखरी फैली चीजोँ को ध्यान से संभालती,
अपने हाथोँ से बनी चपाती चाव से खिलाना,
मेरी बिमारी मेँ बहलाकर कड़वा काड़ा पिलाना,
चाहे दिन रात कितनी ही मेहनत वो करती,
फिर भी मेरे काम को कभी न वो थकती,

उसके आँचल मेँ पले बढ़े दिन कितने अच्छे थे वो बचपन के,
बहुत याद आती है माँ।।
RAJESH MISHRAKOLKATA, WEST BENGAL

मुझको हर दिन बढ़ते वो देखना चाहती थी,
आसमान पर मुझको चढ़ते वो देखना चाहती थी,
मुझसे ज्यादा मेरे लिये मेहनत वो दिनभर करती थी,
मेरी इच्छाओँ पर अपनी हर इच्छा न्यौच्छावर करती थी,
मेरे बढ़ते कदमोँ को दिशा वो दिखाती थी,
मेरी सफलता मेँ अपना जीवन सफल होता पाती थी,
गिरता जब मैँ उठकर चलना वो जीवन है वो बताती थी,
उसकी लगन ही थी जो मुझे सपने देखना सिखाती थी,

मेरे सारी सफलतायेँ परिणाम है बस उसी की लगन के,
बहुत याद आती है माँ।।

चलते चलते मैँ ये कहाँ आज आ गया हूँ,
देखकर दुनिया के रंग बहुत घबरा गया हुँ,
आज कोई नहीँ है मेरे साथ,
सर पर नहीँ है किसी का हाथ,
भीड़ भरी दुनिया मेँ अकेला हो गया हूँ,
बहुत कुछ पाकर मैँ खुद ही कहीँ खो गया हूँ,
ये दिन ये रात अब मुझे बहुत सताते हैँ,
मेरे नयन अब बस यूँ ही आँसू बहाते हैँ,

आ मेरी माँ और फिर आसूँ पोँछ मेरे नयन के,
तु….
बहुत याद आती है माँ ।।

बहुत याद आती है माँ ।
संकलन : राजेश मिश्रालेखक * तरुण राज गोस्वामी 

21 जुलाई 2011

Why are dear to "Lord Shiva Shambhu" "Sawan" : RAJ

सावन क्यों प्रिय है भगवान शिव को
Lord Shiva, Goddess Parvati and Lord Ganesha


सावन का महीना। चैत्र मास से शुरू होनेवाले भारतीय कैलेंडर का पांचवा महीना। पांच यानि सृष्टि के पंचभूत का प्रतीक। तो फिर क्यों न हो भूताधिपति महादेव को प्रिय यह पांचवां महीना। जो स्वयं जल की तरह तरल और भोले हैं। जिनके माथे पर चंद्रमा है जो कि जल तत्व का प्रतीक है। जिनकी जटाओं में गंगा है जो जल ही नहीं आप है। आप यानी आस्था से सिक्त जल।शिव जो स्वयं केदार हैं। केदार अर्थात जल से भरा हुआ खेत। जो शिव है। शिव जो कल्याणकारी तो हैं हीं मगर शिव का एक अर्थ पशु धन को थामनेवाला खूंटा भी होता है। शिव का वाहन नंदी है। जो कि किसान के हल में जुतकर उसकी हर समस्या हल कर देता है। इस कृषिप्रधान देश की अस्मिता का प्रतीक है किसान। और इस समग्र किसान चेतना का प्रतीक है- शिव। टकटकी लगाए वर्ष भर किसान इंतजार करता है आकाश में घुमड़ते काले-काले बादलों का। सावन में चारों तरफ हरीतिमा बिखरने से धरती पर उल्लास का भाव होता है। वर्षा की बूंदों से बरसता यह अलौकिक उल्लास ही शिव है। इस वर्षा का ही सम्मान है कि हम अपने देश भारत को भारतवर्ष कहते हैं। जो वर्षा को धारण करे वह वर्ष है। हम एक वर्षा से दूसरी वर्षा की अवधि को एक वर्ष कहते हैं। यानि की काल को नापने का पैमाना भी हमारे यहां वर्षा है। तो फिर काल को संचालित करनेवाला महाकाल तो स्वयं सावन होता है। वैदिक संस्कृति में एक सूर्योदय से एक सूर्यास्त का जो काल है उसे भी सावन कहा गया है। तो फिर जब स्वयं शिव सावन है तो फिर क्यों सनत कुमारों ने महादेव से उनके सावन के महीने को पसंद करने का कारण पूछा। ऐसा नहीं कि ब्रह्मा पुत्र इस सत्य को नहीं जानते होंगे। अगर वे प्रश्न नहीं पूछते तो कैसे ये तथ्य उदघाटित होता कि हिमालय में जन्मी कन्या पार्वती वही सती है जिसने कि पिछले जन्म में अपने पति शिव का पिता द्वारा उपहास करने पर योग शक्ति से अपने प्राण त्याग दिए थे। और इस मास में ही निराहार रहकर अपनी कठोर तपस्या से पार्वती ने शिव को प्रसन्न किया था। इस तरह सावन शक्ति (पार्वती) और शक्तिमान (शिव) दोनों के मिलन का केन्द्र हैं। चातुर्मास्य में जब भगवान विष्णु शयन के लिए जाते हैं, तब शिव ही तो हैं जो तीनों लोकों की सत्ता संभालते हैं। श्मशानी रुद्र ग्रहस्थ बनकर विवाह रचाते हैं। लेकिन यह लौकिक विवाह नहीं है। यह ब्रह्म और प्रकृति का विवाह है। यही सावन की शिवरात्रि है। इस शिवरात्रि के बाद आती है- नाग पंचमी। नाग काल का प्रतीक है। जो काल सापेक्ष नहीं है उसका कोई विकास संभव नहीं। शिव तो स्वयं त्रिकालदर्शी हैं। प्रकारांतर से नाग की पूजा महाकाल के साथ-साथ काल की ही पूजा है। रक्षा बंधन से ठीक पहले घर के द्वार पर नाग बनाकर उनकी पूजा करने का हमारे यहां विधान है। श्रावण मास की पंचमी को जहां नागों की पूजा की जाती है, वहां नवमी तिथि को नेवलों की पूजा की जाती है। नउरी नवमी पर नेवला पूजन इस बात की घोषणा है कि जीव ही जीव का भक्षक है। और सांप कितना ही विषैला क्यों न हो अंततः वह नेवले से हार ही जाता है। विषपायी शिव को जिसने देवासुर संग्राम में निकले संसार के सबसे तीक्ष्ण विष हलाहल को कंठ में धारण कर लिया हो, विष के उस दाह को शमित करने के लिए ही देवों और भक्तों द्वारा किया गया पवित्र जल से उनका विराट अभिषेक। तभी से चली आ रही है अभिषेक की परिपाटी। उसी का सामाजिकरूप है-कांवर यात्रा। संसार का पहला कंवरिया था-महाशिवभक्त-रावण। जिसकी एक कांवर में थे शिव और दूलरी कांवर में था गंगाजल। अपने आराध्य को कैलास से लंका ले जाने को रावण चल पड़ा कंधे पर लिए कांवर। मगर बिहार के वैद्यनाथ धाम तक आते-आते वह श्रमश्लथ हो गया। बालक बने नारद को उसने कांवर थमाई। थोड़ी देर बाद जब रावण शंका निवृत होकर आय़ा तो जमीन पर कांवर रख कर बालक गायब दो चुका था। कांवर जमीन पर न रखने का विधान जो है। इसलिए शिव पत्थर के होकर वहीं रह गए। मगर भगवान शिव की भक्ति और आराधना से जुडे़ भक्तगण आज भी देश की विभिन्न पवित्र नदियों से जल इकट्ठा करके प्रसिद्ध शिवलिंगों पर जलाभिषेक करते हुए गृह स्थल पर जाकर अपनी कांवर यात्रा संपन्न करते हैं। 1857 की क्रांति का एक मात्र चश्मदीद गवाह पुणे से वाराणसी तक पैदल कांवर लेकर चलनेवाला विष्णुभट्ट गोडसे भी परम शिवभक्त था। कांवरिये वे तपस्वी होते हैं जो जप, तप और व्रत, इन तीनों त्यागमयी वृत्तियों को एक साथ उपलब्ध होते हैं।
कांवर काटता है काम को
कावर शब्द बना ही कामरि से है। कांवर यानी काम की अरि। जो काम को काट दे वह कांवर। मगर दुर्भाग्य से आज कांवर यात्रा में ऐसे कांवरिये भी शरीक हो जाते हैं जिनके आचरण और व्यवहार से यह पवित्र तीर्थ-यात्रा महज एक मौज-मस्ती और सैर सपाटे का जरिया बनती जा रही है। कभी कांवर परंपरा धार्मिक आस्थाओं की पूर्ति के साथ-साथ भारत की चारों दिशाओं में रह रहे लोगों में एक सामाजिक-सांस्कृतिक संवाद स्थापित करने का लोक माध्यम हुआ करती थी वही कांवर यात्रा आज के बाज़ारवादी दौर में अपने मूल उद्श्य से भटककर सामाजिक और धार्मिक संगठनों की शक्ति के दिखावे और पाखंड का प्रदर्शन बनती जा रही हैं। कुछ कांवरियों को अभद्रता और ड्रग तस्करी में शामिल भी पाया गया। इस कुकृत्य ने पर्यावरण और राष्ट्रीय एकता के यज्ञ को भी दूषित कर दिया। हर वर्ष कांवरियों की संख्या जहां लगातार बढ़ रही है वहीं पर्यावरण और प्रशासन के लिए अनियंत्रित भीड़ एक समस्या भी बनती जा रही है। गोमुख, नीलकंठ व हरिद्वार से लेकर पवित्र कैलास और मानसरोवर तक धीरे-धीरे प्लास्टिक,पॉलीथिन और मानव कचरे के बोझ और कार,मोटरों की चौं-चौं,पौं-पौं से चरमरा उठे हैं। साढे बाहर हजार फुट ऊंचे अमरनाथ का सबसे बड़ा ग्लेशियर कोलेहोई जो कभी 17 कि.मी. तक फैला था आज प्रदूषण की मार झेलते हुए सिकुड़कर 2.63 कि.मी. रह गया है। कारों और बसों से निकलनेवाले जहरीले धुएं ने सदानीरा नदियों का कत्ल कर दिया है। इस प्रदूषण ने वनस्पति और प्राणियों के अस्तित्व को भी खतरे में डाल दिया है। जिस गंगाजल और अन्य पवित्र नदियों के जल से अभिषेक कर के भक्तगण शिव को प्रसन्न करना चाहते हैं उन्हीं नदियों को हमने नाला बना दिया है। समय आ गया है कि कांवर की आस्था में पर्यावरण की चेतना को भी जोड़ा जाए।
सावन में होते हैं तंत्र
पौराणिक ग्रंथों में भगवान शंकर को तंत्र का अधिपति भी माना गया है। इसलिए सावन के महीने में मनोकामना की पूर्ति हेतु लोग तंत्र विधान से बम-बम भोले को प्रसन्न करने में भी लग जाते हैं। आज के दौर में ये टोने-टोटे कितने प्रासंगिक हैं इस तथ्य को खंगाले बिना भी तमाम अंधविश्वासी तंत्रसिद्धि में जुट जाते हैं। इस साधना के मूल में व्यापारी वर्ग, नौकरीपेशा और बेरोजगार लोगों को शीघ्र धन लाभ और पदोन्नति पाने की महत्वाकांक्षा मुख्य होती है।
जब महज जल, बिल्वपत्र और फूल चढ़ाने से ही शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं तो फिर इस निर्रथक व्यायाम की जरूरत रह ही कहां जाती है। लेकिन सोच का क्या किया जाए।सावन का असर होता ही कुछ ऐसा है कि सावन के तो अंधे को भी सब जगह हरा-ही-हरा दिखाई देता है। अब हरा दिखे या काला अंधे को दिखे यह भी तो सावन का कमाल और भोले बाबा की कृपा ही है।
सावन और आयुर्वेद-
आयुर्वेद के अनुसार सावन में दूध नहीं पीना चाहिए क्योंकि सावन में कच्ची घास होती है। उस घास में बहुत सारे कीड़े-मकोड़े होते हैं। चरने के दौरान जब गाय-भैंस यह घास खाती है तो उसके दूध में बहुत से रोगों के जीवाणु भी साथ में पहुंच जाते हैं। हमारे ऋषियों ने जोकि आयुर्वेद के मर्मज्ञ भी होते थे यह बात जनता को अपने तरीके से समझायी। उन्होंने नियम बना दिया कि सावन में शिवजी पर दूध चढ़ाया जाए। शिवजी तो हलाहल पी सकते हैं। फिर दूध का क्या है।
सिद्ध ज्योतिर्लिंग
शिव साकार भी हैं और निराकार भी। इनके निराकार स्वरूप का प्रतीक शिवलिंग है। शिव रूपवान हैं, इसलिए साकार हैं। इसीलिए भगवान शिव की पूजा दोनों रूपों में की जाती है। शिव के 12 अवतार इस प्रकार हैं-
सोमनाथ: यह सौराष्ट्र के प्रभास क्षेत्र में हैं। पुराणों के अनुसार शिव का यह प्रथम अवतार चंद्रमा के दुख का विनाश करने वाला है। सोमेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा स्वयं चंद्रमा ने की थी।
मल्लिकार्जुन: यह ज्योतिर्लिंग श्रीशैल पर्वत पर है। कृष्णा नदी के तट पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग को दक्षिण का कैलाश भी कहलाता हैं। पुत्र प्राप्ति के लिए इनकी स्तुति की जाती है।
महाकाल: पुरातन काल की अवंतिकापुरी यानी उज्जैन के क्षिप्रा नदी के तट पर विराजमान यह ज्योतिर्लिंग भक्तों की रक्षा करने वाला माना गया है। पहले पंचांग की काल गणना इसी महाकाल से की जाती थी।
ओंकारेश्वर: विंध्यगिरि ने शिव का पार्थिव लिंग स्थापित किया, उनकी कामना पूरी करने प्रकट हुए शिव देवताओं की प्रार्थना पर दो रूपों में विभक्त हो गए। एक भाग ओंकारेश्वर तथा दूसरा परमेश्वर नाम से प्रसिद्ध हुआ। नर्मदा तट पर स्थित ये एक ही ज्योतिर्लिंग के दो स्वरूप हैं।
केदारेश्वर: शिव का पांचवां अवतार है- केदारेश्वर, जिन्हें केदारनाथ कहा जाता है। यह ज्योतिर्लिंग हिमालय के उत्तराखंड के केदार नामक पर्वत-शिखर पर है। श्रीहरि के नर-नारायण अवतार की प्रार्थना पर शिव हिमगिरि के केदार शिखर पर विराजित हुए।
भीमाशंकर: यह शंभु का छठा अवतार है, जिसमें शिवजी ने अनेक लीलाएं की और भीमासुर का विनाश भी किया था। राजा सुदक्षिण की प्रार्थना पर स्वयं शंकर डाकिनी में भीमशंकर नामक ज्योतिर्लिंग स्वरूप में स्थित हो गए।
विश्वनाथ: भोलेनाथ का सातवां अवतार विश्वनाथ है, जो काशी (वाराणसी) में ज्योतिर्लिंग स्वरूप में स्थित हैं। विश्वेश्वर नामक इस अवतार की पूजा रोज विष्णु समेत समस्त देवता एवं भैरव करते हैं।
त्र्यंबकेश्वर: यह स्थान नासिक के पास है। शिव का त्र्यंबक नामक आठवां अवतार गौतम ऋषि की प्रार्थना पर गौतमी नदी के तट पर हुआ। मुनि की प्रार्थना पर भगवान शिव ज्योतिर्लिंग स्वरूप अचल होकर स्थित हो गए।
वैद्यनाथ : शिव का नवां अवतार वैद्यनाथ ( बैजनाथ ) से प्रसिद्ध है। रावण द्वारा अपने लिए लाए जाने का कारण मानकर महेश्वर ज्योतिर्लिंग स्वरूप चिताभूमि में प्रतिष्ठित हो वैद्यनाथेश्वर नाम से विख्यात हुए।
नागेश्वर : शिव का दसवां अवतार नागेश्वर है , जो दुष्टों को दंड ित करनेवाला है। इसमें शिव ने दारुक नामक राक्षस का वध करके सुप्रिय नामक भक्त की रक्षा की थी। भगवान शिव अंबिका सहित महाज्योतिर्लिंग स्वरूप स्थित हुए।
रामेश्वर : शिव का 11 वां अवतार है रामेश्वर , जिन्हें श्रीराम ने स्थापित किया था। भक्त वत्सल महादेव ने प्रसन्न होकर श्रीराम को लंका युद्ध में विजयी होने का वर यहीं दिया था।
घुश्मेश्वर : यह शंकर का 12 वां अवतार है। घुश्मा का कल्याण करने के लिए भगवान शिव देव शैल के निकट एक सरोवर में प्रकट हुए थे। घुश्मा के पुत्र को जीवित करने के बाद घुश्मा की प्रार्थना पर भगवान शिव तड़ाग में ज्योतिर्लिंग स्वरूप स्थित हो गए। ये सभी 12 ज्योतिर्लिंग एश्वर्य और मोक्ष के प्रदाता हैं।
विरही संवेग का दूतःसावन
सावन जहां भक्तों को शिव के नजदीक ले जाता है वहीं साहित्य में यही सावन का बादल बेचारा विरहियों का पोस्टमैन बनकर रह जाता है। चाहे कालिदास का मेघदूत हों जहां बादल कुबेर की अल्कापुरी से निष्कासित कामदग्ध यक्ष का उसकी प्रेमिका तक संदेश पहुंचानेवाला दूत हो या फिर महाभारत का “नलोपाख्यान में जहां यही बादल नल तथा दमयंती दोनों का दूत बनकर अपनी चाकरी निभाता है। तो वही सावन का बादल तीर्थकर पार्श्वनाथ के लिए “पार्श्वाभ्युदय” में और कवि “विक्रम” के “नेमिदूत” में भी दूत ही बनकर प्रकट हुआ है। सावन के मस्त-मस्त मौसम में जहां नवविवाहिता दुल्हने अपनें मायके चली जाती हों और अपनी सहेलियों के साथ झुंड बनाकर घरों में,बाग़-बग़ीचों में पेड़ों पर झूले डालकर सावन के गीतों और झूले के झोटों की पींग में अपना गम ग़लत कर लें मगर बेचारे पतिदेव क्या करें। सिवाय कांवर लेकर बम-बम भोले कहते हुए तीर्थ पर निकल जाने के। इसी कारण तो शिवभक्त, तीन लोक से न्यारी काशी नगरी प्यारी के शिवभक्त कविवर भारतेंदु ने भी सावन के मर्म को समझकर और बढ़िया ठंडाई पीकर खूब कजरी लिखीं। झमाझम सावन की फुहारों में प्यार का मजा ही अलग है। अगर आप कांवर लेकर नहीं निकल सकते और कजरी भी नहीं लिख सकते तो सावन के महीने में अपनी उनके साथ एक ही छतरी में भीगते हुए मौका देखकर छत्रपति तो बन ही जाइए। या फिर अपनी गौरी के साथ लांग ड्राइव पर किसी हिल स्टेशन जरूर चले जाइए। सावन के आराध्य सिव की शुभ कामनाएं सदैव आपके साथ हैं। शिवास्ते संतु पंथानः। भगवान आपकी यात्रा शुभ करे। हर-हर महादेव..।


RAJESH MISHRA, KOLKATA, WEST BENGAL
(
On the upper floor of his flat)

20 जुलाई 2011

LORD SHIVA KE 108 NAAM

भगवान शिव के १०८ नाम



LORD SHIVA : HAR HAR MAHADEV




  1. शिव - कल्याण स्वरूप
  2. महेश्वर - माया के अधीश्वर
  3. शम्भू - आनंद स्स्वरूप वाले
  4. पिनाकी - पिनाक धनुष धारण करने वाले
  5. शशिशेखर - सिर पर चंद्रमा धारण करने वाले
  6. वामदेव - अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले
  7. विरूपाक्ष - भौंडी आँख वाले
  8. कपर्दी - जटाजूट धारण करने वाले
  9. नीललोहित - नीले और लाल रंग वाले
  10. शंकर - सबका कल्याण करने वाले
  11. शूलपाणी - हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले
  12. खटवांगी - खटिया का एक पाया रखने वाले
  13. विष्णुवल्लभ - भगवान विष्णु के अतिप्रेमी
  14. शिपिविष्ट - सितुहा में प्रवेश करने वाले
  15. अंबिकानाथ - भगवति के पति
  16. श्रीकण्ठ - सुंदर कण्ठ वाले
  17. भक्तवत्सल - भक्तों को अत्यंत स्नेह करने वाले
  18. भव - संसार के रूप में प्रकट होने वाले
  19. शर्व - कष्टों को नष्ट करने वाले
  20. त्रिलोकेश - तीनों लोकों के स्वामी
  21. शितिकण्ठ - सफेद कण्ठ वाले
  22. शिवाप्रिय - पार्वती के प्रिय
  23. उग्र - अत्यंत उग्र रूप वाले
  24. कपाली - कपाल धारण करने वाले
  25. कामारी - कामदेव के शत्रु
  26. अंधकारसुरसूदन - अंधक दैत्य को मारने वाले
  27. गंगाधर - गंगा जी को धारण करने वाले
  28. ललाटाक्ष - ललाट में आँख वाले
  29. कालकाल - काल के भी काल
  30. कृपानिधि - करूणा की खान
  31. भीम - भयंकर रूप वाले
  32. परशुहस्त - हाथ में फरसा धारण करने वाले
  33. मृगपाणी - हाथ में हिरण धारण करने वाले
  34. जटाधर - जटा रखने वाले
  35. कैलाशवासी - कैलाश के निवासी
  36. कवची - कवच धारण करने वाले
  37. कठोर - अत्यन्त मजबूत देह वाले
  38. त्रिपुरांतक - त्रिपुरासुर को मारने वाले
  39. वृषांक - बैल के चिह्न वाली झंडा वाले
  40. वृषभारूढ़ - बैल की सवारी वाले
  41. भस्मोद्धूलितविग्रह - सारे शरीर में भस्म लगाने वाले
  42. सामप्रिय - सामगान से प्रेम करने वाले
  43. स्वरमयी - सातों स्वरों में निवास करने वाले
  44. त्रयीमूर्ति - वेदरूपी विग्रह करने वाले
  45. अनीश्वर - जिसका और कोई मालिक नहीं है
  46. सर्वज्ञ - सब कुछ जानने वाले
  47. परमात्मा - सबका अपना आपा
  48. सोमसूर्याग्निलोचन - चंद्र, सूर्य और अग्निरूपी आँख वाले
  49. हवि - आहूति रूपी द्रव्य वाले
  50. यज्ञमय - यज्ञस्वरूप वाले
  51. सोम - उमा के सहित रूप वाले
  52. पंचवक्त्र - पांच मुख वाले
  53. सदाशिव - नित्य कल्याण रूप वाले
  54. विश्वेश्वर - सारे विश्व के ईश्वर
  55. वीरभद्र - बहादुर होते हुए भी शांत रूप वाले
  56. गणनाथ - गणों के स्वामी
  57. प्रजापति - प्रजाओं का पालन करने वाले
  58. हिरण्यरेता - स्वर्ण तेज वाले
  59. दुर्धुर्ष - किसी से नहीं दबने वाले
  60. गिरीश - पहाड़ों के मालिक
  61. गिरिश - कैलाश पर्वत पर सोने वाले
  62. अनघ - पापरहित
  63. भुजंगभूषण - साँप के आभूषण वाले
  64. भर्ग - पापों को भूंज देने वाले
  65. गिरिधन्वा - मेरू पर्वत को धनुष बनाने वाले
  66. गिरिप्रिय - पर्वत प्रेमी
  67. कृत्तिवासा - गजचर्म पहनने वाले
  68. पुराराति - पुरों का नाश करने वाले
  69. भगवान् - सर्वसमर्थ षड्ऐश्वर्य संपन्न
  70. प्रमथाधिप - प्रमथगणों के अधिपति
  71. मृत्युंजय - मृत्यु को जीतने वाले
  72. सूक्ष्मतनु - सूक्ष्म शरीर वाले
  73. जगद्व्यापी - जगत् में व्याप्त होकर रहने वाले
  74. जगद्गुरू - जगत् के गुरू
  75. व्योमकेश - आकाश रूपी बाल वाले
  76. महासेनजनक - कार्तिकेय के पिता
  77. चारुविक्रम - सुन्दर पराक्रम वाले
  78. रूद्र - भक्तों के दुख देखकर रोने वाले
  79. भूतपति - भूतप्रेत या पंचभूतों के स्वामी
  80. स्थाणु - स्पंदन रहित कूटस्थ रूप वाले
  81. अहिर्बुध्न्य - कुण्डलिनी को धारण करने वाले
  82. दिगम्बर - नग्न, आकाशरूपी वस्त्र वाले
  83. अष्टमूर्ति - आठ रूप वाले
  84. अनेकात्मा - अनेक रूप धारण करने वाले
  85. सात्त्विक - सत्व गुण वाले
  86. शुद्धविग्रह - शुद्धमूर्ति वाले
  87. शाश्वत - नित्य रहने वाले
  88. खण्डपरशु - टूटा हुआ फरसा धारण करने वाले
  89. अज - जन्म रहित
  90. पाशविमोचन - बंधन से छुड़ाने वाले
  91. मृड - सुखस्वरूप वाले
  92. पशुपति - पशुओं के मालिक
  93. देव - स्वयं प्रकाश रूप
  94. महादेव - देवों के भी देव
  95. अव्यय - खर्च होने पर भी न घटने वाले
  96. हरि - विष्णुस्वरूप
  97. पूषदन्तभित् - पूषा के दांत उखाड़ने वाले
  98. अव्यग्र - कभी भी व्यथित न होने वाले
  99. दक्षाध्वरहर - दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले
  100. हर - पापों व तापों को हरने वाले
  101. भगनेत्रभिद् - भग देवता की आंख फोड़ने वाले
  102. अव्यक्त - इंद्रियों के सामने प्रकट न होने वाले
  103. सहस्राक्ष - अनंत आँख वाले
  104. सहस्रपाद - अनंत पैर वाले
  105. अपवर्गप्रद - कैवल्य मोक्ष देने वाले
  106. अनंत - देशकालवस्तुरूपी परिछेद से रहित
  107. तारक - सबको तारने वाला
  108. परमेश्वर - सबसे परे ईश्वर
    Baba Baidyanath (Babadham) : Rajesh Mishra

    Baba Basukinath : Rajesh Mishra




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