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19 अगस्त 2011

महानायक कृष्ण

Mahanayak Shri Krishna

हिन्दू धर्म में तैंतीस करोड देवी देवताओं के बारे में बताया गया है। इस तैंतीस करोड में भगवान विष्णु के चौबीस अवतार हैं जिनका अपना विशिष्ट स्थान इस धर्म में है। वैसे तो सभी देवी देवताओं का समान आदर व सम्मान किया जाता है लेकिन जो स्थान कृष्ण को प्राप्त है वह शायद ही किसी देवी या देवता को प्राप्त हो। कृष्ण को आज तक के विष्णु के अवतारों में से सम्पूर्ण अवतार के रूप में देखा जाता है। अगर भगवान कृष्ण को भारतीय जनमानस का महानायक कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

इस बात को अगर इस दृष्टिकोण से देखे कि जितनी धूमधाम व उत्साह से कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है उतनी धूमधाम से व उत्साह रामनवमी का उत्सव नहीं होता। मेरे कहने का यह कदापि मतलब नहीं है कि राम को मानने वाले कम हैं या राम का महत्च नहीं है लेकिन व्यवहार में अगर देखें तो मेरी बात शायद सब को सही भी लगे। जो महौल पूरे देश में कृष्ण जन्माष्टमी को होता है वह किसी भी अवतार के जन्मदिवस पर नहीं होता। कृष्ण भगवान विष्णु का सम्पूर्ण अवतार अर्थात सोलह कलाओं से युक्त पूर्ण अवतार माना गया है। कृष्ण के अनुयायी भी बडी मात्रा में हिन्दू धर्म में आपको मिल जाएंगे और यही एक बडा कारण है कि कृष्ण जन्म की जो गूंज सुनाई देती है वह किसी ओर की सुनाई नहीं देती।

भगवान कृष्ण का जो प्रभाव भारतीय जनमानस पर है वह शायद ही किसी और अवतार का देखने को मिले। कृष्ण का पूरा जीवन ही लीलाओं व किस्सों व कहानियों से भरा पडा है। कृष्ण जन्म से ही भारतीय जनमानस से जुडे नजर आते हैं और मोक्ष पर्यन्त वे पूरी तरह से जुडे रहते हैं। जन्म के समय जेल के सारे दरवाजों के तोडने से शुरू होता उनका सफर भील के तीर से मोक्ष तक कायम रहता है। वह अपने पूरे जीवन में भारतीय जनमानस का प्रतिनिधित्व करते दिखाई देते ह। बचपन से ही अपनी लीलाओं से प्रभावित करते है और ग्वाल बाल सहित गोपियों को व अपने नंदगाँव के हर व्यक्ति पर अपनी छाप छोडते हैं। वास्तव में कृष्ण के पूरे चरित्र से जुडा हर व्यक्ति भारत के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करता दिखाई देता है। बचपन में इंद्र का घमण्ड तोडकर गोवर्धन पर्वत की पूजा करवाने की बात में वे किसानों के व ग्रामीणों का प्रतिनिधित्व देवताओं के सामने करते हैं तो किशोरावस्था में कंस का वध कर पूरे समाज को व अपने परिवार को अन्याय से मुक्त करवाते ह। आगे चलकर गीता का संदेश जहाँ पूरी मानवता को संदेश है वहीं गरीब सुदामा का प्रकरण एक आम गरीब आदमी को संदेश देता है कि अगर कृष्ण के प्रति उसका समर्पण है तो उसका दरीद्र दूर हो जाएगा। बचपन से लेकर अंत तक कृष्ण का जीवन पूरी भारतीयता को समर्पित है और नेतृत्व करता है कि भारत का हर वर्ग कृष्ण से जुडा है।

एक राजपरिवार में पैदा होकर दूसरी माँ के पास बडा होना और ये संदेश देना कि माता का प्यार सिर्फ पैदा होने से नहीं भाव से भी मिलता है। कृष्ण ने अपने जीवन में प्रत्येक घटना से संदेश दिया है कि मानव कल्याण से बडा कोई काम नहीं है और धर्म व सत्य के मार्ग पर चलने वाला कभी हारता नहीं। कृष्ण का जीवन यहाँ तक संदेश देता है कि अगर हालात इतने बिगड गए कि मनुष्य की पहच से बाहर हो गए तो भगवान स्वयं धर्म की स्थापना करने के लिए और पापियों का विनाश करने के लिए धरती पर आएंगे जरूरत है सिर्फ विश्वास की और धर्म की।
कृष्ण अपने पूरे अवतार में कहीं योगी दिखाई देते हैं तो कहीं रसिक तो कहीं कूटनीति करते नजर आते है तो कहीं चमत्कार करते, कहीं कृष्ण अपनी मर्यादा को भूलकर भीष्म के सामने शस्त्र भी उठाते हैं तो कहीं भक्त की पुकार पर द्रोपदी का चीर भी बचाते हैं। इस प्रकार मानव जीवन की हर घटना कृष्ण के जीवन से जुडी नजर आती है।
मनुष्य जीवन के जितने आयाम है वे जितने कृष्ण जन्म में दिखाई देंगे उतने किसी विष्णु अवतार में देखने को नहीं मिलते। प्यार, श्रद्धा, समर्पण, त्याग, योग सहित सारी सिद्धियों व निधियों से परिपूर्ण कृष्ण वास्तव में पूरे भारतीय जनमानस के एक महानायक के रूप में प्रकट होते है।


कृष्ण जन्माष्टमी


कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौंहार किसे कहते हैं? कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार क्यों मनाया जाता है? कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार किस प्रकार मनाया जाता है?

भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रात के बारह बजे मथुरा के राजा कंस की जेल मे वासुदेव जी की पत्नि देवी देवकी के गर्भ से सोलह कलाओ से युक्त भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था । इस तिथि को रोहिणी नक्षत्र का विशेष माहात्म्य है। इस दिन देश के समस्त मन्दिरो का श्रृंगार किया जाता है कृष्णावतार के उपलक्ष मे झाँकियाँ सजायी जाती है। भगवान कृष्ण का श्रृगार करके झूला सजाया जाता है। स्त्री-पुरूष रात के बारह बजे तक व्रत रखते है रात को बारह बजे श्ंाख तथा घंटो की आवाज से श्रीकृष्ण की जन्म की खबर चारो दिशाओ में गूज उठती है। भगवान श्रीकृष्ण की आरती उतारी जाती है और प्रसाद वितरण किया जाता है प्रसाद ग्रहण कर व्रत को खोला जाता है ।
कथाः द्वापर युग में पृथ्वी पर राक्षसो के अत्याचार बढने लगे पृथ्वी गाय का रूप धारण कर अपनी कथा सुनाने के लिए तथा उदार के लिए ब्रह्याजी के पास गई। ब्रह्याजी सब देवताओ को साथ लेकर पृथ्वी को विष्णु के पास क्षीर सागर ले गए। उस समय भगवान विष्णु अन्नत शैया पर शयन कर रहे थे। स्तुति करने पर भगवान की निद्रा भंग हो गई भगवान ने ब्रह्या एवं सब देवताओ को देखकर उनके आने का कारण पूछा तो पृथ्वी बोली-भगवान मैं पाप के बोझ से दबी जा रही हूँ। मेरा उद्धार किजिए। यह सुनकर विष्णु बोले - मैं ब्रज मण्डल में वासुदेव की पत्नी देवकी गर्भ से जन्म लूँगा। तुम सब देवतागण ब्रज भूमि में जाकर यादव वंश में अपना शरीर धारण कर लो। इतना कहकर अन्तर्ध्यान हो गए । इसके पश्चात् देवता ब्रज मण्डल में आकर यदुकुल में नन्द यशोदा तथा गोप गोपियो के रूप में पैदा हुए । द्वापर युग के अन्त में मथुरा में उग्रसेन राजा राज्य करता था। उग्रसेन के पुत्र का नाम कंस था कंस ने उग्रसेन को बलपूर्वक सिंहासन से उतारकर जेल में डाल दिया और स्वंय राजा बन गया कंस की बहन देवकी का विवाह यादव कुल में वासुदेव के साथ निशिचत हो गया । जब कंस देवकी को विदा करने के लिए रथ के साथ जा रहा था तो आकाशवाणी हुई कि ”हे कंस! जिस देवकी को तु बडे प्रेम से विदा करने कर रहा है उसका आँठवा पुत्र तेरा संहार करेगा। आकाशवाणी की बात सुनकर कंस क्रोध से भरकर देवकी को मारने को तैयार हो गया। उसने सोचा- ने देवकी होगी न उसका पुत्र होगा । वासुदेव जी ने कंस को समझाया कि तुम्हे देवकी से तो कोई भय नही है देवकी की आठवी सन्तान में तुम्हे सौप दूँगा। तुम्हारे समझ मे जो आये उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना कंस ने वासुदेव जी की बात स्वीकार कर ली और वासुदेव-देवकी को कारागार में बन्द कर दिया । तत्काल नारदजी वहाँ पहुँचे और कंस से बोले कि यह कैसे पता चला कि आठवाँ गर्भ कौन सा होगा गिनती प्रथम से या अन्तिम गर्भ से शुरू होगा कंस ने नादरजी के परामर्श पर देवकी के गर्भ से उत्पन्न होने वाले समस्त बालको को मारने का निश्चय कर लिया । इस प्रकार एक-एक करके कंस ने देवकी के सात बालको को निर्दयता पूर्वक मार डाला । भाद्र पद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ उनके जन्म लेते ही जेल ही कोठरी में प्रकाश फैल गया। वासुदेव देवकी के सामने शंख, चक्र, गदा, एव पदमधारी चतुर्भुज भगवान ने अपना रूप प्रकट कर कहा,”अब मै बालक का रूप धारण करता हूँ तुम मुझे तत्काल गोकुल में नन्द के यहाँ पहुँचा दो और उनकी अभी-अभी जन्मी कन्या को लाकर कंस को सौप दो । तत्काल वासुदेव जी की हथकडियाँ खुल गई । दरवाजे अपने आप खुल गये पहरेदार सो गये वासुदेव कृष्ण को सूप में रखकर गोकुल को चल दिए रास्ते में यमुना श्रीकृष्ण के चरणो को स्पर्श करने के लिए बढने लगी भगवान ने अपने पैर लटका दिए चरण छूने के बाद यमुना घट गई वासुदेव यमुना पार कर गोकुल में नन्द के यहाँ गये बालक कृष्ण को यशोदाजी की बगल मे सुंलाकर कन्या को लेकर वापस कंस के कारागार में आ गए। जेल के दरवाजे पूर्ववत् बन्द हो गये। वासुदेव जी के हाथो में हथकडियाँ पड गई, पहरेदारजाग गये कन्या के रोने पर कंस को खबर दी गई। कंस ने कारागार मे जाकर कन्या को लेकर पत्थर पर पटक कर मारना चाहा परन्तु वह कंस के हाथो से छूटकर आकाश में उड गई और देवी का रूप धारण का बोली ,”हे कंस! मुझे मारने से क्या लाभ? तेरा शत्रु तो े गोकुल में पहुच चुका है“। यह दृश्य देखकर कंस हतप्रभ और व्याकुल हो गया । कंस ने श्री कृष्ण को मारने के लिए अनेक दैत्य भेजे श्रीकृष्ण ने अपनी आलौलिक माया से सारे दैत्यो को मार डाला। बडे होने पर कंस को मारकर उग्रसेन को राजगद्दी पर बैठाया । श्रीकृष्ण की पुण्य तिथी को तभी से सारे देश में बडे हर्षोल्लास से मनाया जाता है । कृष्ण जन्माष्टमी हिंदुओं के सबसे बड़े त्यौंहारों में से एक है. कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौंहार हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. भगवान विष्णु ने द्वापर युग में अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना के लिये भगवान श्री कृष्ण के रूप में पृथ्वी पर अवतार लिया था. भगवान श्री कृष्ण ने भाद्रपद महीने की अष्टमी तिथि को पृथ्वी पर अवतार लिया था. भगवान श्री कृष्ण के जन्म की खुशी में सब नगरवासियों ने उत्सव मनाया. इसी उत्सव को कृष्ण जन्माष्टमी के नाम से जाना जाता है. तब से इसी दिन प्रत्येक वर्ष कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौंहार मनाया जाता है. कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौंहार पूरे भारत में बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है.

कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौंहार क्यों मनाया जाता है?

कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौंहार भगवान कृष्ण के जन्म की खुशी में मनाया जाता है. द्वापर युग में अनेक दैत्य घमंडी राजाओं के रूप में पैदा हुए और पाप और घमंड से सारी पृथ्वी को रौंदने लगे. तब पृथ्वी गौ का रूप धारण करके ब्रह्माजी के पास गई और अपनी दुखभरी कथा सुनाई. तब ब्रह्माजी शिवजी और अनेक देवताओं को साथ लेकर क्षीर सागर के तट पर जा पहुंचे और भगवान विष्णु की स्तुति की. भगवान विष्णु ने आकाशवाणी के माध्यम से कहा कि वे शीघ्र ही कृष्ण के रूप में पृथ्वी पर जन्म (अवतार) लेंगे और अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना करेंगे.

उस समय मथुरा नगरी का राजा कंस था जो कि बहुत अत्याचारी था. भगवान श्री कृष्ण ने कंस की बहिन देवकी के आठवें पुत्र के रूप में भाद्रपद महीने की अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि में जन्म लिया. कंस ने कृष्ण के माता पिता देवकी और वासुदेव को बंदी बनाकर कारागृह में डाल रखा था. कंस अपनी बहिन देवकी के शिशुओं को जन्म लेते ही मार देता था. लेकिन भगवान कृष्ण ने जब जन्म लिया तो भगवान कृष्ण की योगमाया से मोहित होकर कंस सहित सारा मथुरा नगर गहरी नींद में सोता रहा. कृष्ण के जन्म लेते ही कारागृह (जेल) के सब ताले अपने आप खुल गए, सारे पहरेदार मूर्छित होकर सो गए. तब भगवान कृष्ण की माया से मोहित होकर वसुदेवजी ने शिशु कृष्ण को एक टोकरी में लिटाया और उस टोकरी को सिर पर रखकर उन्हें गोकुल गाँव के प्रधान नंदजी के घर ले चले. उस समय मध्यरात्रि में बहुत तेज वर्षा होने लगी. वसुदेवजी यमुना नदी को पार करने लगे. उस समय भगवान कृष्ण के चरण स्पर्श करने के लिये यमुना जी का जल बहुत ऊँचा उठने लगा. जब यमुना जी का जल वसुदेवजी के कंठ तक आ गया तो भगवान श्री कृष्ण ने अपने पैर टोकरी से बाहर निकालकर नीचे लटका दिये. भगवान कृष्ण के चरणों को स्पर्श कर यमुनाजी का जल पुनः नीचे उतर गया. वासुदेवजी गोकुल में नन्द राय जी के घर पहुंचे और वहां नन्दजी की पत्नी यशोदा जी के निकट कृष्ण को लिटा दिया. और ठीक उसी समय नंदजी की पत्नी यशोदा जी के गर्भ से बालिका के रूप में जन्मी भगवान कृष्ण की योगमाया को टोकरी में लिटाकर पुनः मथुरा को लौट चले. वासुदेवजी के मथुरा में कारागृह में पहुँचने के बाद सब दरवाजे पुनः बंद हो गए और उन पर ताले लग गये. बालिका योगमाया का रोना सुनकर पहरेदार उठे और कंस को सूचना दी. कंस ने आकर जैसे ही उस बालिका को मारने की चेष्टा की त्यों ही वह उछलकर आकाश में अष्टभुजा रूप धारण करके स्थित हो गई और उसने कंस से कहा कि "हे कंस! तुझको मारने वाला देवकी का आठवाँ पुत्र किसी स्थान पर पैदा हो चुका है."

इधर गोकुल में जब भगवान कृष्ण ने देखा कि योगमाया के वशीभूत होकर सब सो रहे है, तब उनहोंने शिशु की भांति रोना आरम्भ किया. उनका रोना सुनकर यशोदा जी और दासियों को चेत हुआ और सबने यशोदा जी के गर्भ से कृष्ण का जन्म होना समझा. पूरे गाँव में भगवान कृष्ण के जन्म की सूचना फ़ैल गई. घर घर बधावे गाये जाने लगे. सब लोग श्री कृष्ण के जन्म की खुशी में अपने अपने घरों को सजाने लगे. कृष्ण के लिये तरह तरह के उपहार देने लगे. तरह तरह के पकवान बनाए जाने लगे. सब लोग खुशी से नृत्य करने लगे. पूरे गोकुल में कृष्ण जन्म का उत्सव बड़ी धूम धाम से मनाया गया.

कृष्ण के जन्म के इस अवसर को कृष्ण जन्माष्टमी के त्यौंहार के नाम से जाना और मनाया जाता है.

कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौंहार किस प्रकार मनाया जाता है?

कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौंहार भारत में बड़ी ही धूम धाम से मनाया जाता है. भगवान के भक्त कृष्ण जन्माष्टमी के त्यौंहार के दिन सुबह से ही भगवान कृष्ण के लिये व्रत रखते हैं. सभी भक्तजन अपने घरों में अशोक के पत्तों की बंदनवार आदि लगाकर घरों को सजाते हैं. भगवान कृष्ण के लिये धनिये की पंजिरी बनाई जाती है. भक्तजन खूब दान पुण्य करते हैं. कृष्ण जन्माष्टमी के दिन पूरे भारत में भगवान कृष्ण के मंदिरों को खूब सजाया जाता है. मंदिरों में दिन भर बहुत आनंद एवं भक्तिपूर्वक भगवान कृष्ण के भजन गाये जाते हैं. भगवान कृष्ण के शिशु रूप की बहुत सुन्दर सुन्दर झांकियां सजाई जाती हैं. मध्यरात्रि के समय भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव हर्षोल्लास से मनाया जाता है. उस समय भगवान कृष्ण की विशेष आरती एवं पूजा की जाती है. अनेक सुन्दर और मधुर भजनों के द्वारा भगवान की स्तुतियाँ की जाती हैं.

अगले दिन सभी कृष्ण मंदिरों में एक और भव्य उत्सव का आयोजन किया जाता है. यह उत्सव कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव का एक अभिन्न अंग है जिसे नन्द उत्सव के नाम से जाना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि कृष्ण उत्सव के अगले दिन नन्द जी ने भगवान कृष्ण के जन्म की खुशी में सारे गोकुलवासियों को बहुमूल्य उपहार, कपड़े, गहने, मिठाइयां, फल इत्यादि भेंट किये थे. नन्द उत्सव नन्द जी और गोकुलवासियों की इसी खुशी को आपस में बांटने का उत्सव है. नन्द उत्सव में मंदिर प्रबंधन की ओर से सभी श्रद्धालुओं को उपहार, मिठाई, फल, कपड़े आदि वितरित किये जाते हैं.
Rajesh Mishra (in Village : Bheldi)


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