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31 अगस्त 2011

Ganeshotsav : Ganesh Chaturthi

गणेश चतुर्थी



भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी गणेश चतुर्थी के नाम से प्रसिद्ध है,इस प्रात:काल स्नानादि से निवृत होकर सोना तांबा चांदी मिट्टी या गोबर से गणेश की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करनी चाहिये,पूजने के समय इक्कीस मोदकों का भोग लगाते है,तथा हरित दूर्वा के इक्कीस अंकुर लेकर यह दस नाम लेकर चढाने चाहिये- ऊँ गताप नम: ऊँ गोरीसुमन नम:, ऊँ अघनाशक नम:, ऊँ एक दन्ताय नम:,ऊँ ईश पुत्र नम:,ऊँ सर्वसिद्धिप्रद नम: ऊँ विनायक नम:,ऊँ कुमार गुरु नम:,ऊँ इम्भववक्त्राय नम:,ऊँ मूषकवाहन संत नम:, तत्पश्चात इक्कीस लड्डुओं में दस लड्डू ब्राह्मणों को दान देना चाहिये,और ग्यारह लड्डू स्वयं खाने चाहिये।

कथा

एक बार भगवान शंकर स्नान करने के लिये भोगवती नामक स्थान पर गये,उनके चले जाने के पश्चात पार्वती ने अपने मैल से एक पुतला बनाया जिसका नाम उन्होने गणेश रखा,गणेश को मुदगर देकर द्वार पर बैठा दिया,और कहा कि जब तक मै स्नान करूं किसी भी पुरुष को अन्दर मत आने देना,भोगवती पर स्नान करने के बाद जब भगवान शंकर वापस आये,तो गणेशजी ने उन्हे द्वार पर ही रोक दिया,क्रुद्ध होकर भगवान शंकर ने उनका सिर धड से अलग कर दिया,और अन्दर चले गये,पार्वती जी ने समझा कि भोजन में बिलम्ब होने से शंकरजी नाराज है,उन्होने फ़ौरन दो थालियों में भोजन परोस कर शंकरजी को भोजन के लिये बुलाया,शंकरजी ने दो थालियों को देखकर पूछा कि यह दूसरा थाल किसके लिये है,पार्वती ने जबाब दिया कि यह दूसरा था पुत्र गणेश के लिये है,जो बाहर पहरा दे रहा है,यह सुनकर शंकर जी ने कहा कि मैने तो उसका सिर धड से अलग कर दिया है,यह सुनकर पार्वती जी को बहुत दुख हुआ,और प्रिय पुत्र गणेश को जीवित करने की प्रार्थना करने लगीं,शंकरजी ने तुरन्त के पैदा हुये हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड से जोड दिया,तब पार्वती जी ने प्रसन्नता पूर्वक पति पुत्र को भोजन कराकर स्वयं भोजन किया,यह घटना भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी को हुयी थी,इस लिये इस तिथि का नाम गणेश चतुर्थी रखा गया।

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