prabhodhini_ekadashi
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकाद्शी या देव उठावनी एकादशी के नाम से जाना जाता है. कुछ स्थानों में इसे प्रबोधनी एकाद्शी भी कहा जाता है. देवोत्थानी एकाद्शी के संबन्ध में एक मान्यता प्रसिद्ध है. भाद्रपद की एकादशी को ही भगवान श्री विष्णु ने अपना चार मास का विश्राम समाप्त किया था. इस तिथि के बाद ही शादी-विवाह आदि के शुभ कार्य शुरु होते है. वर्ष 2011 में 6 नवम्बर की रहेगी.     

प्रबोधनी एकाद्शी व्रत कथा | Prabodhini Ekadashi Vrat Katha

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रबोधनी एकाद्शी के व्रत का फल एक सहस्त्र अश्वमेघ यज्ञों के बराबर होता है. इस व्रत को करने से व्यक्ति के सात जन्मों के पाप नष्ट होते है. इस व्रत के विषय में कहा जाता है, कि जिस वस्तु को प्राप्त करना कठिन होता है. वह वस्तु इस व्रत को करने से प्राप्त हो जाती है. यह एकादशी महान पाप भी क्षण मात्र में नष्ट करती है. 
अनेक जन्मों के बुरे पाप इस प्रबोधनी एकादशी का व्रत करने से समाप्त हो जाते है. जो मनुष्य अपने स्वभावनुसार इस प्रबोधनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करतें है. उन्हें इस व्रत के शुभ फल प्राप्त होता है. इस व्रत को करने के बाद जो व्यक्ति रात्रि में जागरण भी करता है, उसकी दस पीढियां विष्णु लोक में जाकर वास करती है. और नरक में अनेक दु:खों को भोगते हुए उसके पितृ विष्णु लोक में जाकर सुख भोगते है.
प्रबोधनी एकादशी के विषय में कहा गया है,कि समस्त तीर्थों में जाने था, गौ, स्वर्ण, भूमि आदि के दान का फल और कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रबोधनी एकादशी के रात्रि के जागरण के फल एक बराबर होते है. इस संसार में उसी का जीवन सफल है, जिसने प्रबोधनी एकादशी का व्रत किया है. संसार में जितने तीर्थ स्थान है, वे सभी एकत्र होकर इस एकादशी को करने वाले व्यक्ति के घर में होते है. देवोत्थानी एकादशी करने से व्यक्ति धनवान, योगी, तपस्वी तथा इन्द्रियों को जीतने वाला बनता है. इस व्रत को करने से व्यक्ति भगवान श्री विष्णु का प्रिय बन जाता है.  

प्रबोधिनी एकादशी व्रत विधि | Prabodhini Ekadasi Vrat Vidhi

व्रत करने वाले को दशमी के दिन मांस और प्याज तथा मसूर की दान इत्यादि वस्तुओं का त्याग करना चाहिए. दशमी तिथि की रात्रि को ब्रह्माचार्य का पालन करना चाहिए. प्रात: काल में लकडी की दातुन का प्रयोग नहीं करना चाहिए. निम्बू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा ले और ऊंगळी से कंठ शुद्ध करना चाहिए. वृ्क्ष से पत्ता तोडना भी वर्जित होता है. चबाने के लिये गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करना चाहिए. फिर स्नान कर मंदिर में जाना चाहिए. गीता पाठ करना या गीता पाठ का श्रवण करना चाहिए. प्रभु के सामने यह प्रण करना चाहिए कि, मै, इस व्रत को पूरी श्रद्वा और विश्वास के साथ करूंगा. व्रत के दिन "ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय"   इस द्वादश अक्षर के मंत्र का जाप करना चाहिए. 
एकादशी के दिन झाडू नहीं देनी चाहिए. क्योकि इससे सूक्ष्म जीव मर जाते है. तथा बाल नहीं कटाने चाहिए. अधिक नहीं बोलना चाहिए. अन्न दान में नहीं लेना चाहिए. झूठ आदि से बचके रहना चाहिए. इस दिन भोग लगाने के लिये मूळी, आम, अंगूर, केला और बादाम का प्रयोग किया जा सकता है. द्वादशी के दिन ब्राह्माणों को मिष्ठान दक्षिणा से प्रसन्न कर परिक्रमा लेनी चाहिए.