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24 सितंबर 2011

Sugandha Shakti Peeth


सुगंधा-सुनंदा शक्ति पीठ 
 Sugandha Shakti Peeth 

सनातन धर्म सदा से शक्ति का उपासक रहा है. देवताओं की तुलना में देवियों की उपासना अधिक होती रही है.  देवताओं के नामों के उच्चारण में उनकी शक्ति का ही नाम पहले आता है. साधारण देवों की बात क्या करें, संसार के पालनकर्ता विष्णु और महेश के साथ भी यही बात है. विष्णु अथवा नारायण की पत्नी हैं लक्ष्मी, इसलिए हम लक्ष्मीनारायण उच्चारण करते हैं. 
इसी प्रकार गौरीशंकर या भवानीशंकर संबोधित किया जाता है. विष्णु के अवतार राम और कृष्ण की बात करें, तो हम सीताराम, राधाकृष्ण संबोधित करते हैं. किसी भी देव को शीघ्र प्रसन्न करने के लिये देव से पूर्व जब उसकी पत्नी के नाम का संम्बोधन किया जाता है. तो देव शीघ्र प्रसन्न होते है. यही कारण है कि शक्ति की पीठों की पूजा-उपासना को अधिक महत्व दिया गया है. 
तात्पर्य यह है कि ईश्वर या देवता से उसकी शक्ति का महत्व अधिक है. इसीलिए एक कवि ने राधा को कृष्ण से ऊपर मानते हुए लिखा.

मेरी भवबाधा हरौ, राधानागरि सोय। 

जा तन की झांई पड़े, श्याम हरित दुति होय।। 

अपनी सांसारिक बाधा दूर करने के लिए महाकवि बिहारी राधा से ही प्रार्थना करते हैं, न कि कृष्ण से. उनका मानना है कि राधा के प्रकाश के कारण ही कृष्ण का रंग हरा हो गया, अन्यथा वे काले रहते. और तो और, श्रीराम के परम भक्त गोस्वामी तुलसीदास ने भी सीता का उल्लेख पहले और राम का बाद में किया. उनकी यह पंक्ति सर्वविदित है- 

सियाराममय सब जग जानी। 

करहुं प्रनाम जोरि जुग पानी।। 

माता के शक्ति पीठों के विषय में एक पौराणिक कथा प्रसिद्ध है. जो इस प्रकार है. राजा दक्ष के यज्ञ-कुंड में शिवप्रिया सती ने अपनी आहुति दे दी थी. इसे देखकर शिव ने रौद्र रूप धारण कर लिया. उन्होंने सती को अपने कंधे पर लादकर अंतरिक्ष में चक्कर काटना शुरू कर दिया. सड़ते हुए शव के, देवताओं के अनुरोध पर विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से टुकड़े-टुकड़े कर दिया. जहां-जहां ये टुकड़े गिरे, वहां-वहां एक शक्तिपीठ का निर्माण हो गया. 
ऐसे इक्यावन शक्तिपीठों के अलावा, कुछ ऐसे भी शक्तिपीठ हैं, जो सती के अंगों के कारण नहीं बने. उस स्थान पर श्रद्धालु युगों से देवी की पूजा करते आ रहे हैं, इसलिए वह स्थान ऊर्जा-पूरित हो गया और उसे शक्तिपीठ की संज्ञा मिल गई. ऐसे स्थानों में हिमाचल की चिंत्यपूर्णी, नैनीताल की नैना देवी, प्रसिद्ध तीर्थस्थान वैष्णो देवी, उत्तर प्रदेश की विंध्यवासिनी आदि के नाम लिए जा सकते हैं. इसलिए कई स्थानों पर शक्तिपीठों की संख्या एक सौ आठ बताई जाती है. उन्हीं में से के प्रसिद्ध शक्ति पीठ सुगंधा के नाम से प्रसिद्ध है, जिसे सुनंदा के नाम से भी जाना जाता है.   

सुगंधा- सुनंदा शक्ति पीठ | Sugandha (Sunanda) Shakti Peeth

बांग्लादेश के शिकारपुर में बरिसल से 20 किमी दूर सोंध नदी के किनारे स्थित है माँ सुगंध, जहाँ माता की नासिका गिरी थी. इसकी शक्ति है सुनंदा और भैरव को त्र्यंबक कहते हैं. 

शक्ति पीठों की उपासना का महत्व | Shakti Peeth Upasna Importance

विभिन्न शक्ति पीठों के दर्शन और यहां आकर पूजा-उपासना करने का महत्व नवरात्री समय में बढ जाता है. यहीं कारण है कि जो व्यक्ति शक्ति पीठों के दर्शन के लिये नहीं जा पाते है, उन्हें घर में ही इन दिनों में दुर्गा सप्तशती का पाठ कर लेना चाहिए.   
सामान्य दिनों में भी कई लोग इसका पाठ कर मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं. ब्रह्म देव को पिता स्वरुप माना गया है. सभी देवों में उन्हें अधिक महत्व दिया गया है.  परन्तु शक्ति पूजा को ब्रह्मा से भी श्रेष्ठतर माना गया है. वह सृष्टि के निर्माण, पालन या संहार का कारण नहीं है. यह सब ब्रह्म की शक्ति द्वारा ही संपन्न होता है. इसीलिए शक्ति पीठ सदा भक्तों से भरे रहते है.
इनके दर्शन मात्र से सभी अभीष्ट पूरे होते है. शक्ति के महत्व के कारण ही भारत में अनेक शक्तिपीठ हैं. शक्तिपीठों की संख्या के संबंध में भिन्न-भिन्न मत हैं, लेकिन 'तंत्रचूड़ामणि' ग्रंथ के अनुसार, ऐसे 51 शक्तिपीठ हैं. इनमें कुछ प्रमुख के नाम हैं-ज्वालामुखी, कामाख्या, त्रिपुरसुंदरी, वाराही, काली, अंबिका, भ्रामरी, ललिता आदि। 

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