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31 अक्तूबर 2011

Shri Mehandipur Balaji' History


श्री मेंहदीपुर बालाजी


Shri Menhdipur Balaji
(by : Rrajesh Mishra, News Editor-
 
Jagkalyan, Kolkata)

राजस्थान के सवाई माधोपुर और जयपुर की  सीमा रेखा पर स्थित मेंहदीपुर कस्बे में बालाजी का एक अतिप्रसिद्ध तथा प्रख्यात मन्दिर है जिसे श्री मेंहदीपुर बालाजी मन्दिर के नाम से जाना जाता है । भूत प्रेतादि ऊपरी बाधाओं के निवारणार्थ यहां आने वालों का तांता लगा रहता है। तंत्र मंत्रादि ऊपरी शक्तियों से ग्रसित व्यक्ति भी यहां पर बिना दवा और तंत्र मंत्र के स्वस्थ होकर लौटते हैं । सम्पूर्ण भारत से आने वाले  लगभग एक हजार रोगी और उनके  स्वजन यहां नित्य ही डेरा डाले रहते हैं ।

Shri Menhadipur Balaji Mandir, Rajasthan

बालाजी का मन्दिर मेंहदीपुर नामक स्थान पर दो पहाड़ियों के बीच स्थित है, इसलिए इन्हें घाटे वाले बाबा जी भी कहा जाता है । इस मन्दिर में स्थित बजरंग बली की बालरूप मूर्ति किसी कलाकार ने नहीं बनाई, बल्कि यह स्वयंभू है । यह मूर्ति पहाड़ के अखण्ड भाग के रूप में मन्दिर की पिछली दीवार का कार्य भी करती है । इस मूर्ति को प्रधान मानते हुए बाकी मन्दिर का निर्माण कराया गया है । इस मूर्ति के सीने के बाईं तरफ़ एक अत्यन्त सूक्ष्म छिद्र है, जिससे पवित्र जल की धारा निरंतर बह रही है । यह जल बालाजी के चरणों तले स्थित एक कुण्ड में एकत्रित होता रहता है, जिसे भक्त्जन चरणामृत के रूप में अपने साथ ले जाते हैं । यह मूर्ति लगभग 1000 वर्ष प्राचीन है किन्तु  मन्दिर का निर्माण इसी सदी में कराया गया है । मुस्लिम शासनकाल में कुछ बादशाहों ने इस मूर्ति को नष्ट करने की कुचेष्टा की, लेकिन वे असफ़ल रहे । वे इसे जितना खुदवाते गए मूर्ति की जड़ उतनी ही गहरी होती चली गई । थक हार कर उन्हें अपना यह कुप्रयास छोड़ना पड़ा । ब्रिटिश शासन के दौरान सन 1910  में बालाजी ने अपना सैकड़ों वर्ष  पुराना चोला स्वतः  ही त्याग दिया । भक्तजन इस चोले को लेकर समीपवर्ती मंडावर रेलवे स्टेशन पहुंचे, जहां से उन्हें चोले को गंगा में प्रवाहित करने जाना था । ब्रिटिश स्टेशन मास्टर ने चोले को निःशुल्क ले जाने से रोका और उसका लगेज करने लगा, लेकिन चमत्कारी चोला कभी मन भर ज्यादा हो जाता और कभी दो मन कम हो जाता । असमंजस में पड़े स्टेशन मास्टर को अंततः चोले को बिना लगेज ही जाने देना पड़ा और उसने भी बालाजी के चमत्कार को नमस्कार किया । इसके बाद बालाजी को नया चोला चढाया गया । यज्ञ हवन और ब्राह्मण भोज एवं धर्म ग्रन्थों का पाठ किया गया । एक बार फ़िर से नए चोले से एक नई ज्योति दीप्यमान हुई । यह ज्योति सारे विश्व का अंधकार दूर करने में सक्षम है । बालाजी महाराज के अलावा यहां श्री प्रेतराज सरकार और श्री कोतवाल कप्तान ( भैरव ) की मूर्तियां भी हैं । प्रेतराज सरकार जहां द्ण्डाधिकारी के पद पर आसीन हैं वहीं भैरव जी कोतवाल के पद पर । यहां आने पर ही सामान्यजन को ज्ञात होता है कि भूत प्रेतादि किस प्रकार मनुष्य  को कष्ट पहुंचाते हैं और किस तरह सहज ही उन्हें कष्ट बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है । दुखी कष्टग्रस्त व्यक्ति को मंदिर पहुंचकर तीनों देवगणों को प्रसाद चढाना पड़ता है । बालाजी को लड्डू प्रेतराज सरकार को चावल और कोतवाल कप्तान (भैरव) को उड़द का प्रसाद चढाया जाता है । इस प्रसाद में से दो लड्डू रोगी को खिलाए जाते हैं और शेष प्रसाद पशु पक्षियों को डाल दिया जाता है । ऐसा कहा जाता है कि पशु पक्षियों के रूप में देवताओं के दूत ही प्रसाद ग्रहण कर रहे होते हैं । प्रसाद हमेशा थाली या दोने में रखकर दिया जाता है । लड्डू खाते ही रोगी व्यक्ति झूमने लगता है और भूत प्रेतादि स्वयं ही उसके शरीर में आकर बड़बड़ाने लगते है । स्वतः ही वह हथकडी और बेड़ियों में जकड़ जाता है । कभी वह अपना सिर धुनता है कभी जमीन पर लोट पोट कर हाहाकार करता है । कभी बालाजी के इशारे पर पेड़  पर उल्टा लटक जाता है । कभी आग जलाकर उसमें कूद जाता है । कभी फ़ांसी या सूली पर लटक जाता है । मार से तंग आकर भूत प्रेतादि स्वतः ही बालाजी के चरणों में  आत्मसमर्पण कर देते हैं अन्यथा समाप्त कर दिये जाते हैं । बालाजी उन्हें अपना दूत बना लेते हैं। संकट टल जाने पर बालाजी की ओर से एक दूत मिलता है जोकि रोग मुक्त व्यक्ति को भावी घटनाओं के प्रति सचेत करता रहता है । बालाजी महाराज के मन्दिर में प्रातः और सायं लगभग चार चार घंटे पूजा होती है । पूजा में भजन आरतियों और चालीसों का गायन होता है। इस समय भक्तगण जहां पंक्तिबद्ध हो देवताओं को प्रसाद अर्पित करते हैं वहीं भूत प्रेत से ग्रस्त रोगी चीखते चिल्लाते उलट पलट होते अपना दण्ड भुगतते हैं ।

श्री प्रेतराज सरकार 
बालाजी मंदिर में प्रेतराज सरकार दण्डाधिकारी पद पर आसीन हैं। प्रेतराज सरकार के विग्रह पर भी चोला चढ़ाया जाता है। प्रेतराज सरकार को दुष्ट आत्माओं को दण्ड देने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है ।  भक्ति-भाव से उनकी आरती, चालीसा, कीर्तन, भजन आदि किए जाते हैं । बालाजी के सहायक देवता के रूप में ही प्रेतराज सरकार की आराधना की जाती है। 
पृथक रूप से उनकी आराधना - उपासना कहीं नहीं की जाती, न ही उनका कहीं कोई मंदिर है। वेद, पुराण, धर्म ग्रन्थ आदि में कहीं भी प्रेतराज सरकार का उल्लेख नहीं मिलता। प्रेतराज श्रद्धा और भावना के देवता हैं। 
कुछ लोग बालाजी का नाम सुनते ही चैंक पड़ते हैं। उनका मानना है कि भूत-प्रेतादि बाधाओं से ग्रस्त व्यक्ति को ही वहाँ जाना चाहिए। ऐसा सही नहीं है। कोई भी - जो बालाजी के प्रति भक्ति-भाव रखने वाला है, इन तीनों देवों की आराधना कर सकता है। अनेक भक्त तो देश-विदेश से बालाजी के दरबार में मात्र प्रसाद चढ़ाने नियमित रूप से आते हैं।
किसी ने सच ही कहा है, नास्तिक भी आस्तिक बन जाते हैं, मेंहदीपुर दरबार में ।
प्रेतराज सरकार को पके चावल का भोग लगाया जाता है, किन्तु भक्तजन प्रायः तीनों देवताओं को बूंदी के लड्डुओं का ही भोग लगाते हैं और प्रेम-श्रद्धा से चढ़ा हुआ प्रसाद बाबा सहर्ष स्वीकार भी करते हैं।
कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव
कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव भगवान शिव के अवतार हैं और उनकी ही तरह भक्तों की थोड़ी सी पूजा-अर्चना से ही प्रसन्न भी हो जाते हैं । भैरव महाराज चतुर्भुजी हैं। उनके हाथों में त्रिशूल, डमरू, खप्पर तथा प्रजापति ब्रह्मा का पाँचवाँ कटा शीश रहता है । वे कमर में बाघाम्बर नहीं, लाल वस्त्र धारण करते हैं। वे भस्म लपेटते हैं । उनकी मूर्तियों पर चमेली के सुगंध युक्त तिल के तेल में सिन्दूर घोलकर चोला चढ़ाया जाता है । 
शास्त्र और लोककथाओं में भैरव देव के अनेक रूपों का वर्णन है, जिनमें एक दर्जन रूप प्रामाणिक हैं।  श्री बाल भैरव और श्री बटुक भैरव, भैरव देव के बाल रूप हैं। भक्तजन प्रायः भैरव देव के इन्हीं रूपों की आराधना करते हैं । भैरव देव बालाजी महाराज की सेना के कोतवाल हैं। इन्हें कोतवाल कप्तान भी कहा जाता है। बालाजी मन्दिर में आपके भजन, कीर्तन, आरती और चालीसा श्रद्धा से गाए जाते हैं । प्रसाद के रूप में आपको उड़द की दाल के वड़े और खीर का भोग लगाया जाता है। किन्तु भक्तजन बूंदी के लड्डू भी चढ़ा दिया करते हैं ।
सामान्य साधक भी बालाजी की सेवा-उपासना कर भूत-प्रेतादि उतारने में समर्थ हो जाते हैं। इस कार्य में बालाजी उसकी सहायता करते हैं। वे अपने उपासक को एक दूत देते हैं, जो नित्य प्रति उसके साथ रहता है।
कलियुग में बालाजी ही एकमात्र ऐसे देवता हैं , जो अपने भक्त को सहज ही अष्टसिद्धि, नवनिधि तदुपरान्त मोक्ष प्रदान कर सकते हैं ।


Mehandipur Balaji



Sri Mehandipur Balaji Temple is situated in Dausa,Rajasthan.Basically Shri Mehendipur Balaji Temple is Lord Hanuman Ji's Temple.Long ago the image of Lord Balaji and that of Pret Raja (the King of spirits) appeared from the Arawali hills. Now people suffering from malignant spirits and black magic or spell get their relief when they make an appeal for relief to Shri Bhairav ji and Shri Pret Raj Sarkar who holds his court and awards punishment to the malignant spirits, ghosts, goblins, ghouls, evil eyed witches etc.Shrine of Balaji, Court of Pret Raja, Pooja griha, Bhairav ji temple and Ram Darbar are some of the spots worth seeing here.

Religious ritualistic performances, charity, feeding the poor, homeless and incapacitated people, water supply for all and fodder for cows and stray animals are the activities of this temple.

Balaji temple at Mehandipur in Rajasthan is very Powerful place. It is believed that the deity in this temple has divine power to cure a person possessed with evil spirit.Hundreds of 'Sankatwalas', as the possessed people are refereed to in local lingo, throng to the temple everyday to offer prayers and have 'darshan'. The temple has also become a home and the last respite for the victims.The 'Mahant' of the temple, Shri Kishor Puri Ji, prescribes the treatment. It can include reading holy texts, following a strict vegetarian and simple diet, and even afflicts physical pain to one's body.

One can witness people going through various physical therapies like keeping heavy stones on their body , on arms, legs and chest , to ease their pain. There are others who inhale the smoke that fumes out of the sweet Patasa's kept on smoldering cowpats. The ones with serious case of spirit possession, who tends to get violent, are even shackled in chains within the temple premises.

This may appear a bit anachronistic at the first glance, but thousands of people are believed to have been cured in this way. Festival time (Holi, Hanuman Jayanti and Dusshera etc) are regarded as the most auspicious time to emancipate from the evil spirit

Medical science may discard such approach to the ailment as self-deceptions based on blind faith, but for the believers, the power of Balaji is something supernatural, something beyond metaphysics.  

Places of Interest

Nilkanth Mahadev Temple - 
A large stone Linga, was also found whose top only is visible above the ground. It originally belonged to a Shiv Temple on the summit of the hill and a temple of Nilkanth Mahadev now occupies the site. The Temple is situated on the Aravali mountain range is at the centre of Dausa district. The temple is situated at the top of a hill. The temple is said to be 100-200 years old. Rajput kings used to have security arrangements adjacent to the temple. Cannons are still seen on the temple complex. Another interesting aspect linked to faith held by the devotees is the tiny stone structures bearing the semblance of houses at the sidewalks on the way to temple. These are built by pilgrims on their way to the shrine believing that this would fulfill their wishes of having a house of their own.
Mataji Ka Mandir - 
Another group of finely carved sculptures dating back to12th century AD that are worshipped are built in the front wall of a modern temple (built in 1965) known as Mataji ka Mandir etc. On the way to the Bawdi is the Harshd Mata Temple. It is dedicated to a goddess. It was built by King Chand or Chandra of Nikumbha Rajputs of Chahamana Dynasty who was ruling at Abaneri or ancient Abha-Nagari (City) during 8th - 9th century A.D. Facing East, this temple is raised over double terraced platform. Originally hails the super structure of the Mahameru Style. The Sanctum is Pancharatha on plan and consists of Sandhara Garbhagriha, pillared Mandapa, crowned by a domical ceiling. Each niche of the buttress of Garbagriha has beautiful Brahmanical deities. Sculptures curved in deep relief fixed in the niches around the plinth of the upper terrace are the main attraction of this temple.
Pratap Vatika - 
A few kilometres away from Dausa lay Vair. This is where the historic Pratap Vatika spreads itself. The once-lively fort-palace complex is now in ruins, and this makes an ideal location for a quiet picnic. The Pratap Mahal with its rounded roofs and small pillared balconies is very much in keeping with Rajput architecture. Within the complex is a small temple - Mohanji ka Mandir - made of red sandstone. Mohan is another name for Krishna, the dark and mischievous Hindu god with a flute. The arches and pillars of the temple, badly damaged, add to the romantic ambience greatly. The Lal Mahal topped by chhatris (cenotaphs) has a beautiful kund (tank) adjoining it. There are people inhabiting a part of the mahal, so the entire complex is not desolate. If not anything else, you might bump into their cows and goats at least.

Kaila Devi Temple - 
Kaila Devi(Goddess) Temple is situated on the banks of the Kalisil river in Karauli district. The temple is dedicated to the tutelary diety, goddess Kaila, of the erstwhile princely rulers of the Karauli state.It is a marble structure with a large courtyard of a checkered floor.In one place are a number of red flags planted by devotees.The place is also famous for its fair held during the dark half of 'chaitra'(March-April) and lasts for a fortnight.

Getting there and Around
By Air - The nearest airport is Sanganer, Jaipur (113 kms)
By Rail - The Nearest Railway station is Bandikui (40 kms)
By Road - Mehandipur Balaji is well connected to All major cities of North India .There is very frequent service of buses on Agra Jaipur highway. The journey can be performed by car from delhi either via Alwar-Mahwa or mathura-Bharatpur-mahwa.

Accomodation
Dausa has few good hotels of quality services like the Hotel Madhuban.There are many budget hotels too. There is a Dharamshala around the temple too that provides accommodation at very nominal charges.

Things to Remember
  • The disciples and Sankawalasare advised to contact Enquiry office for information required.
  • During the festive season & Mela please maintain discipline,wait patiently and coordinate with trust authorities.
  • Please Treat Sankatwalas humbly.
  • Bath, bear fresh clothes, be in queue & chant Jai shri Balaji-2 while for Darshan.
  • Leave the children at home/dharmshala/hotel as they may urinate etc in temple area and make place untidy. Lying/playing is not allowed in temple premises.
  • The people are not allowed to enter in girbh grigh area of temple. Offerings/prasadam should be handed over to pujariji.
  • For offerings 'sawamani', 'Bhandara', 'Bhramin Bhojan', 'Hawan', 'chola to Deity' , etc please contact Trust office in temple premises.
  • Disciples are intimated that entry in inhabited state or after smoking is totally banned.
  • Ladies, insane and evil spirited person must be accompanied by a attendant.
  • Spiritual water after arti of Lord shri Balaji shall be obtained with discipline and calm.
  • Taking photograph of deities and Sankatwalas is prohibited.
  • Insane and evil spirited person are cured by blessings of lord shri balaji.The attendant must take the help of representative of trust for cure/relief of sankat. The disciples are advised not to contact Sadhus,Sanyasies and fakirs etc for this purpose.
  • No trusty/self worker is supposed to take any favour from the devotees.
  • If any person faces harassment from any employee or self worker of trust.Please lodge a complain in office of sri balaji trust.
  • Beware of Pickpockets around the temple.As far as possible carry minimum cash and jewellery .Keep your precious belongings like Mobile phones, Gold jewellery at hotel room itself while going for Darshanas.
    Jai Balaji Maharaj ki- Rajesh Mishra, Kolkata


30 अक्तूबर 2011

Chhath Puja Video Song

छठ पूजा के विडियो गीत



















राजेश मिश्रा छठ पूजा के दौरान पानिहाटी गंगा
घाट पर छठ व्रतियों के साथ 

28 अक्तूबर 2011

Chhath Puja

Bihar and Chhath


To us festivals are not like festivals they are like carnivals which are enjoyed by those also who have no connection with that festival. We have grown up watching Holi, Dusherra and Diwali as carnivals. Ganesh Chaturthi was celebrated by only Marathis, Durga Puja by Bengalis and Dandi Garba was played only by Gujratis. Onam and Pongal were South Indian festivals only. Today in big cities this is not the picture. Even if all the rituals can't be completed but everyone used to participate in the carnival of festivals of various regions. Very soon a new name is going to be added in the list of festivals celebrated in big cities which the Chhath Festival which stands for the identity of Bihar. The motto behind this festival is the prayer for well being of the family. Gautam Budhha, Mahavira, Valmiki, Ashoka, Aryabhatta, Chanakya, Guru Govind Singh, Nalanda University and the list goes on. These are the contibution to the nation and to the world by Bihar which makes us feel proud but nowadays when Bihar is refered then they are never discussed. The discussion always happens which is concerned with Bihar's Politicians; even though of their presence the Bihari population have to go to outside Bihar leaving their family and home in search of jobs. Now the discussions about Bihar are shifting to Chhath Festival which is the truly represents this state. Chhath Festival in all aspects is an alldifferent festival. It is an arduous observance, requiring the worshipers to fast without water for around 36 hours continuously. The country which runs with the rise of the Sun also celebrates Chhath in which setting Sun is also worshipped in which water and milk are offered as oblation to the Sun which is considered as a visible God.

Chhath is among those few festivals which still haven't been changed by the market till date. Six days after Diwali which has been now completely metamorphosed by market and companies, the Chhath Festival comes which still has the ethinic smell of the east and has remained safe from corporate colorization. During this festival a basket which is calledDaura, is made ready which contains one or more Sup (household item made from bamboo for winnowing) which contains fruits and prasad (edible offerings) among which the most important is sugarcane, guava, a big lemon which is locally called Gagar. The sugarcane is erected in the soil and is decorated with glowing lamps from all side. One day the setting sun is worshipped in which water is offered (Aragh) and the next day the rising sun is worshipped in which milk is offered . The new changes to Chhath is may be the replacement of Sharda Sinha songs to new singers but apart from that everything is intact.


Spreaded all across the nation for bread and butter, the Bihari Population tries to reach their native home at the time of Chhath and if they are not able to reach Bihar they create a small Bihar whereever they are present. They clean river banks and ponds bringing back the real colour and ambience to the stagnant and flowing water bodies. Chhath is not only an annual festival of Bihar but it is also an ideal exemplar of the delicate but strongly bonded relationship of Bihari population and the Bihar state. This relationship tells that if the masses would have got jobs at home then why would have they left their homes, why would they have been bearing the bad-mouth of fanatics like Raj Thakrey, why would they have been bearing the insults when they attend entrance exams for jobs at other states.

But when Bihari poiliticians weren't able to provide the sources of income then the masses had to leave their home. Their condition is exactly like those Indian who are living for years in abroad for their bread but still have their heart right in the motherland which still cries for the India. The important thing that comes out is that culture also flows together with the rivers carrying the dust and soil of the society with the alterations of time. This culture has also flown with the rivers all across the nation and is sparkling with the gleaming lamps of Chhath. Also a very significant message is conveyed that civilization travels and so are the memories because they remains alive by this and take constant rebirths in different places. In Bihar where a lot of disorder and destruction has been done in past few decades, the festival of Chhath is trying to integrate it strongly as well as gradually bridging it with newer connections as well.


Before I end this entry; one special sweet i.e. made in this festival is Thekua. I can bet it's the Indian competition to the American Cookies and I returned from home with a big jar of that.
Wish you Happy Chhath Puja
RAJESH MISHRA

Chhath Puja

छठ पूजा : परम्परा एवं माहत्म्य

नहा खा- २७ अक्टूबर २०१४, सोमवार

खरना - २८ अक्टूबर २०१४, मंगलवार,
साँझा अर्घ्य - २९ अक्टूबर २०१४, बुधवार,
सुबह अर्घ्य (पारण)- ३० अक्टूबर २०१४, गुरुवार


सूर्य पूजन की परम्परा अति प्राचीन है| 'निरोगीकाया, दुधारू गायां और घर में माया' के ध्येय से सूर्य की पूजा की जाती है| लोक गीतों में सूर्य को लेकर जो मान्यताएं हैं, उनमें सात घोड़ों के सवार को प्रात: होते ही रोजगार बांटने वाला, पूर्वान्ह में भोजन देने वाला, अपरान्ह में विश्राम देने वाला कहा गया है| सूर्यपुराण में कहा गया है की अंशुमाली सूर्य भगवान ज्योतिर्मय, वरेण्य, वरदायी, अनंत, अजय हैं, इसलिए वेप्रणम्य हैं:

नमो नमो वरेण्याय वरदायान्शुमालिने |
ज्योतिर्मय नमस्तुभ्यं अनंतायाजितय ते ||


सूर्य के कई व्रत हैं| वारव्रत के रूप में सुर्यनाक्त व्रत (वीरवार को व्रत), वर्ष व्रत के रूप में सूर्य पूजा प्रशंसाव्रत, यात्रा पर्व के रूप में सूर्य रथयात्रा पर्व , तिथि व्रत के रूप में सूर्यष्ठी जैसे व्रतों का उलेख पुराणों में मिलता है|  इस क्रम में डाला छठ को समस्त मनोकामनाएं पूरी करने वाला व्रत कहा गया है|

व्रत विधान:

सूर्य वह विशवात्मा देवता है जो प्रत्यक्षत: ज्योतिर्मय है|उनकी नियमित पूजा का विधान है|पुरावशेषसिद्ध करते हैं की सभ्यता के आरंभिक काल से ही लोक समुदाय ने सूर्य पूजन का महत्त्व जान लियाथा|वैदिक और उपनिषद काल से इनके अनेक प्रमाण मिलतें हैं|

डाला छठ न केवल महिलाएं करती हैं, बल्कि बड़ी संख्या में पुरुष भी करते हैं| यह चार दिवसीय पर्व है जिसमे चतुर्थी से व्रत की तैयारियों और संकल्प से लेकर पंचमी को एक समय भोजन और दुर्वचनों का त्याग, जागरण, षष्ठी को निराहार रहकर अस्त होते हुए और सप्तमी को उदय होते हुए सूर्य को फलों सहित अर्घ्य  देने की परम्परा है :

सूर्य को यह सारे फल बांस की टोकरी में रखकर दिए जाते हैं,  इसलिए यह पर्व संभवत:डाला छठ कहा जाता है|

पूर्वांचल की परम्परा:

लोकांचल में सूर्य पूजन से जुड़े पर्वों में डाला छठ का बड़ा महत्त्व है| यह पर्व मूलत: बिहार-भोजपुर क्षेत्र का है, किन्तु वहां के लोगो के देश भर में बसे होने से अब यह पर्व हर जगह मनाया जाता है| जहाँ कहीं भी नदीया सागर का तट होता है, वहां गंगा के भाव को रखकर छठी माता का मिटटी से स्थानक बनाया जाता है और सूर्यास्त के समय उसका पूजन किया जाता है| इसी समय आकंठ पानी में खड़े होकर डूबते हुए सूर्य को फलों का अर्घ्य दिया जाता है| वहां घी, अगरु, चन्दन आदि कई प्रकार की धूप दी जाती है| घी में तैयार अच्छे पकवानों का नैवेद्य चढ़ाया जाता है और सूर्य की अर्चना की जाती है|

सूर्य आराधना से लाभ:

सूर्य की अर्चना से आराधक को कई लाभ मिलते हैं| नेत्र और चर्मरोग से पीड़ित अनेक लोग सूर्य के पूजन से लाभान्वित हुए हैं| सूर्य के अनेक स्तोत्रों में विभिन व्याधियों के निवारण के लिए प्राथनाएं प्राप्त होती हैं| चाक्षुषोपनिषद से नेत्रज्योति सहित चाक्षुष रोगों का निवारण होता है|

27 अक्तूबर 2011

Chhath Puja

सूर्य की आराधना की प्राचीन परम्परा
छठ पूजा

प्रकाशोत्सव के ठीक छह दिन बाद मनाए जाने वाले छठ महापर्व का हिंदू धर्म में विशेष स्थान है। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्य षष्ठी का व्रत करने का विधान है । अथर्ववेद में भी इस पर्व का उल्लेख है जिसे वैज्ञानिक दृष्टि से भी लाभकारी माना गया है। सच्चे मन से की गई व्रती की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। छठ व्रत को करने वाला परिवार धन-धान्य, पुत्रादि तथा सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहती हैं। इतिहास में छठ पूजा का जिक्र मिलता है . इसका आरम्भ महाभारत काल में कुंती द्वारा सूर्य की आराधना व पुत्र कर्ण के जन्म के समय से माना जाता है। जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर ( तालाब ) के किनारे यह पूजा की जाती है। प्राचीन काल में इसे बिहार और उत्तर प्रदेश में ही मनाया जाता था। लेकिन आज इस प्रान्त के लोग विश्व में जहाँ भी रहते हैं वहाँ इस पर्व को उसी श्रद्धा और भक्ति से मनाते हैं।
यह व्रत बहुत हीं नियम तथा निष्ठा से किया जाता है। इसमे तीन दिन के कठोर उपवास का विधान है । इस व्रत को करने वाली स्त्रियों को पंचमी को एक बार नमक रहित भोजन करना पडता है। षष्ठी को निर्जल रहकर व्रत करना पडता है । षष्ठी को अस्त होते हुए सूर्य को विधिपूर्वक पूजा करके अर्घ्य देते हैं। सप्तमी के दिन प्रात:काल नदी या तालाब पर जाकर स्नान करती हैं। सूर्योदय होते ही अर्घ्य देकर जल ग्रहण करके व्रत को खोलती हैं।
सूर्यषष्ठी-व्रतके अवसरपर सायंकालीन प्रथम अर्घ्यसे पूर्व मिट्टीकी प्रतिमा बनाकर षष्ठीदेवीका आवाहन एवं पूजन करते हैं। पुनः प्रातः अर्घ्यके पूर्व षष्ठीदेवीका पूजन कर विसर्जन कर देते हैं। मान्यता है कि पंचमीके सायंकालसे ही घरमें भगवती षष्ठीका आगमन हो जाता है। इस प्रकार भगवान्‌ सूर्यके इस पावन व्रतमें शक्ति और ब्रह्म दोनोंकी उपासनाका फल एक साथ प्राप्त होता है । इसीलिये लोकमें यह पर्व ‘सूर्यषष्ठी’ के नामसे विख्यात है।
छठ का पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है। इसे छठ से दो दिन पहले चौथ के दिन शुरू करते हैं जिसमें दो दिन तक व्रत रखा जाता है। इस पर्व की विशेषता है कि इसे घर का कोई भी सदस्य रख सकता है तथा इसे किसी मन्दिर या धार्मिक स्थान में न मना कर अपने घर में पूजा-स्थल व प्राकृतिक जल राशि के समक्ष मनाया जाता है। तीन दिन तक चलने वाले इस पर्व के लिए महिलाएँ कई दिनों से तैयारी करती हैं इस अवसर पर घर के सभी सदस्य स्वच्छता का बहुत ध्यान रखते हैं जहाँ पूजा स्थल होता है वहाँ नहा धो कर ही जाते हैं यही नही तीन दिन तक घर के सभी सदस्य पूजा स्थल के सामने जमीन पर ही सोते हैं।
पर्व के पहले दिन ‍’नहाय-खाय’ {कदुआ -भात } को पूजा में चढ़ावे के लिए सामान तैयार किया जाता है जिसमें सभी प्रकार के मौसमी फल, केले की पूरी गौर (गवद), इस पर्व पर खासतौर पर बनाया जाने वाला पकवान ठेकुआ , नारियल, मूली, सुथनी, अखरोट, बादाम, नारियल, इस पर चढ़ाने के लिए लाल/ पीले रंग का कपड़ा, एक बड़ा घड़ा जिस पर बारह दीपक लगे हो गन्ने के बारह पेड़ आदि। पहले दिन महिलाएँ अपने बाल धो कर चावल, लौकी और चने की दाल का भोजन करती हैं और पूजा घर में पूजा का सारा सामान रख कर दूसरे दिन आने वाले व्रत की तैयारी करती हैं।
छठ पर्व पर दूसरे दिन पूरे दिन व्रत ( उपवास) रखा जाता है और शाम को गन्ने के रस की बखीर बनाकर देवकरी में पांच जगह कोशा ( मिट्टी के बर्तन) में बखीर रखकर उसी से हवन किया जाता है। बाद में प्रसाद के रूप में बखीर का ही भोजन किया जाता है व सगे संबंधियों में इसे बाँटा जाता है।

तीसरे यानी छठ के दिन 24 घंटे का निर्जल व्रत रखा जाता है, सारे दिन पूजा की तैयारी की जाती है और पूजा के लिए एक बांस की बनी हुई बड़ी टोकरी, जिसे दौरी /डलिया कहते हैं, में पूजा का सभी सामान डाल कर पूजा स्थल पर रख दिया जाता है। वहां गन्ने के पेड़ से एक छत्र बनाकर और उसके नीचे मिट्टी का एक बड़ा बर्तन, दीपक, तथा मिट्टी के हाथी बना कर रखे जाते हैं और उसमें पूजा का सामान भर दिया जाता है। वहाँ पूजा अर्चना करने के बाद शाम को एक सूप में नारियल कपड़े में लिपटा हुआ नारियल, पांच प्रकार के फल, पूजा का अन्य सामान ले कर दौरी में रख कर घर का पुरूष इसे अपने हाथों से उठा कर नदी, समुद्र या पोखर पर ले जाता है। यह अपवित्र न हो जाए इसलिए इसे सिर के उपर की तरफ रखते हैं। पुरूष, महिलाएँ, बच्चों की टोली एक सैलाब की तरह दिन ढलने से पहले नदी के किनारे सोहर गाते हुए जाते हैं :-

बाटै जै पूछेले बटोहिया ई भार केकरै घरै जाय
आँख तोरे फूटै रे बटोहिया जंगरा लागै तोरे घूम
छठ मईया बड़ी पुण्यात्मा ई भार छठी घाटे जाय

नदी किनारे जा कर नदी से मिट्टी निकाल कर छठ माता का चौरा बनाते हैं वहीं पर पूजा का सारा सामान रख कर नारियल चढ़ाते हैं और दीप जलाते हैं। उसके बाद टखने भर पानी में जा कर खड़े होते हैं और सूर्य देव की पूजा के लिए सूप में सारा सामान ले कर पानी से अर्घ्य देते हैं और पाँच बार परिक्रमा करते हैं। सूर्यास्त होने के बाद सारा सामान ले कर सोहर गाते हुए घर आ जाते हैं और देवकरी में रख देते हैं। रात को पूजा करते हैं। कृष्ण पक्ष की रात जब कुछ भी दिखाई नहीं देता श्रद्धालु भोर को सूर्योदय से दो घंटे पहले सारा नया पूजा का सामान ले कर नदी किनारे जाते हैं। पूजा का सामान फिर उसी प्रकार नदी से मिट्टी निकाल कर चौक बना कर उस पर रखा जाता है और पूजन शुरू होता है।

सूर्य देव की प्रतीक्षा में महिलाएँ हाथ में सामान से भरा सूप ले कर सूर्य देव की आराधना व पूजा नदी में खड़े हो कर करती हैं। जैसे ही सूर्य की पहली किरण दिखाई देती है सब लोगों के चेहरे पर एक खुशी दिखाई देती है और महिलाएँ अर्घ्य देना शुरू कर देती हैं। शाम को जल से और सुबह दूध से अर्घ्य दिया जाता है। इस समय सभी नदी में नहाते हैं तथा गीत गाते हुए पूजा का सामान ले कर घर आ जाते हैं। घर पहुँच कर देवकरी में पूजा का सामान रख दिया जाता है और महिलाएँ प्रसाद ले कर अपना व्रत खोलती हैं तथा प्रसाद परिवार व सभी परिजनों में बांटा जाता है।

छठ पूजा का आयोजन आज बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त देश के हर कोने में किया जाता है दिल्ली, कलकत्ता, मुम्बई चेन्न्ई जैसे महानगरों में भी समुद्र किनारे जन सैलाब दिखाई देता है पिछले कई वर्षों से प्रशासन को इसके आयोजन के लिए विशेष प्रबंध करने पड़ते हैं। इस पर्व की महत्ता इतनी है कि अगर घर का कोई सदस्य बाहर है तो इस दिन घर पहुँचने का पूरा प्रयास करता है। मात्र दिल्ली से इस वर्ष 6 लाख लोग छठ के अवसर पर बिहार की तरफ गए। देश के साथ-साथ अब विदेशों में रहने वाले लोग अपने -अपने स्थान पर इस पर्व को धूम धाम से मनाते हैं।

Chhath Puja – Surya Shashthi

शक्ति और ब्रह्म की उपासना का पर्व



कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को सूर्य षष्ठी का व्रत करने का विधान है । इसे करने वाली स्त्रियाँ धन-धान्य, पति-पुत्र तथा सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहती हैं। यह व्रत बडे नियम तथा निष्ठा से किया जाता है। इसमे तीन दिन के कठोर उपवास का विधान है । इस व्रत को करने वाली स्त्रियों को पंचमी को एक बार नमक रहित भोजन करना पडता है। षष्ठी को निर्जल रहकर व्रत करना पडता है । षष्ठी को अस्त होते हुए सूर्य को विधिपूर्वक पूजा करके अर्घ्य देते हैं। सप्तमी के दिन प्रात:काल नदी या तालाब पर जाकर स्नान करती हैं। सूर्योदय होते ही अर्घ्य देकर जल ग्रहण करके व्रत को खोलती हैं।

सूर्यषष्ठी-व्रत के अवसर पर सायंकालीन प्रथम अर्घ्य से पूर्व मिट्टी की प्रतिमा बनाकर षष्ठी देवी का आवाहन एवं पूजन करते हैं। पुनः प्रातः अर्घ्य के पूर्व षष्ठी देवी का पूजन कर विसर्जन कर देते हैं। मान्यता है कि पंचमी के सायंकालसे ही घर में भगवती षष्ठी का आगमन हो जाता है। इस प्रकार भगवान्‌ सूर्य के इस पावन व्रत में शक्ति और ब्रह्म दोनों की उपासना का फल एक साथ प्राप्त होता है । इसीलिये लोक में यह पर्व ‘सूर्यषष्ठी’ के नाम से विख्यात है।

सूर्यषष्ठी-व्रत के प्रसाद में ऋतु-फल के अतिरिक्त आटे और गुडसे शुद्ध घी में बने ‘ठेकुआ’ का होना अनिवार्य है; ठेकुआ पर लकडी के साँचे से सूर्य भगवान्‌ के रथ का चक्र भी अंकित करना आवश्यक माना जाता है। इस व्रत का प्रसाद माँगकर खाने का विधान है।

CHHATH POOJA

आस्था और भक्ति का अनूठा पर्व
छठ पूजा



कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से ही यह पर्व शुरू हो जाती है. चतुर्थी को नहा-खा, पंचमी को सूर्य भगवान की पहली पूजा गुड से बनी खीर और रोटी से, षष्ठी को पहला अर्घ्य, सप्तमी को दूसरा अर्घ्य और पारण. वैसे हमारे यहाँ छपरा जिले के भेल्दी गाँव में तो कार्तिक मास के शुरू होते ही सारे नियम शुरू हो जाते हैं.. घर में ये आएगा, ये नहीं आएगा, ये खाना, ये छठ तक मत खाना... वगैरह-वगैरह.


षष्ठी को गंगा और यमुना के तट पर 'हमहूं अरघिया देबै हे छठि मैया... ' का लोक गीत गाते श्रद्धालुओं की जो अपार भीड़ एकत्र होती है, वह एक क्षेत्र विशेष के लोगों की अटल आस्था का परिचायक है।

छठ मुख्य रूप से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है। बिहार में तो इसे राजकीय पर्व जैसा दर्जा मिला हुआ है। अब कोलकाता, दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों और इनके उपनगरों में भी प्रवासी बिहारी और उत्तर प्रदेश के लोग यह पर्व बड़े पैमाने पर मनाने लगे हैं।

वैसे तो प्रत्येक पर्व में ही स्वच्छता एवं शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता है, पर इस पर्व के संबंध में ऐसी धारणा है कि किसी ने यदि भूल से या अनजाने में भी कोई त्रुटि की तो उसका कठिन दंड भुगतना होगा। इसलिए पूरी सतर्कता बरती जाती है कि पूजा के निमित्त लाए गए फल- फूल किसी भी कारण अशुद्ध न होने पाएं। उनमें किसी प्रकार की कोई कमी न रह जाए।



इस पर्व के नियम बड़े कठोर हैं। सबसे कठोर अनुशासन बिहार के दरभंगा में देखने को मिलता है। संभवत: इसीलिए इसे छठ व्रतियों का सिद्धपीठ भी कहा जाता है। इस लोकपर्व का संबंध बिहार के उस क्षेत्र से है, जो इतिहास के किसी दौर में महान सूर्योपासक रहा है। यह संबंध पूर्वी बिहार अथवा प्राचीन 'अंग' प्रदेश से जोड़ा जा सकता है, जिसमें भागलपुर, मुंगेर, पटना, गया, राजगृह, चंपा नगरी और मिथिला आदि क्षेत्र आते हैं।

ऐसा समझा जाता है कि इस पूजा के दौरान अर्घ्यदान के लिए साधक जल पूरित अंजलि ले कर सूर्याभिमुख होकर जब जल को भूमि पर गिराता है, तब सूर्य की किरणें उस जल धारा को पार करते समय प्रिज्म प्रभाव से अनेक प्रकार की किरणों में विखंडित हो जाती हैं। साधक के शरीर पर ये किरणें परा बैंगनी किरणों जैसा प्रभाव डालती हैं, जिसका उपचारी प्रभाव होता है।

छठ पर्व हिंदी महीने के कार्तिक मास के छठे दिन मनाया जाता है। यह कुल चार दिन का पर्व है। प्रथम दिन व्रती गंगा स्नान करके गंगाजल घर लाते हैं। दूसरे दिन, दिन भर उपवास रहकर रात में उपवास तोड़ देते हैं। फिर तीसरे दिन व्रत रहकर पूरे दिन पूजा के लिए सामग्री तैयार करते हैं। इस सामग्री में कम से कम पांच किस्म के फलों का होना जरूरी होता है।

केले का घौद (कांधी) व ठेकुआ (आटा व चीनी से बना हुआ मीठा पकवान) दौरी या टोकरी में सजाकर सूप (बेंत या पीतल का) में जलता हुआ दीया अपने सामने रखकर व्रतधारी बैठते हैं और महिलाएं छठ का गीत गाती हैं।

तीसरे दिन ही शाम को जलाशयों या गंगा में खड़े रहकर व्रती सूर्यदेव की उपासना करते हैं और उन्हें अर्घ्य देते हैं। अगले दिन तड़के पुन: तट पर पहुंचकर पानी में खड़े रहकर सूर्योदय का इंतजार करते हैं। सूर्योदय होते ही सूर्य दर्शन के साथ उनका अनुष्ठान पूरा हो जाता है। पूरे चौबीस घंटे व्रतधारियों का निर्जला बीतता है।

इस व्रत में पहले दिन खरना होता है। पूरे दिन उपवास रखकर व्रती शाम को गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण करते हैं। साथ ही लौकी की सब्जी खाने की भी परंपरा है। कहा जाता है कि गुड़ की खीर खाने से जीवन और काया में सुख-समृद्धि के अंश जुड़ जाते हैं। इस प्रसाद को लोग मांगकर भी प्राप्त करते हैं अथवा व्रती अपने आसपास के घरों में स्वयं बांटने के लिए जाते हैं, ताकि जीवन के सुख की मिठास समाज में भी फैले।

इस पर्व के संबंध में कई कहानियां प्रचलित हैं। एक कथा यह है कि लंका विजय के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे तो दीपावली मनाई गई। जब राम का राज्याभिषेक हुआ, तो राम और सीता ने सूर्य षष्ठी के दिन तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए सूर्य की उपासना की। इसके अलावा एक कथा यह भी है कि सूर्य षष्ठी को ही गायत्री माता का जन्म हुआ था। इसी दिन ऋषि विश्वामित्र के मुख से गायत्री मंत्र फूटा था। पुत्र की प्राप्ति के लिए गायत्री माता की भी उपासना की जाती है।

एक प्रसंग यह भी है कि अपना राजपाट खो चुके जंगलों में भटकते पांडवों की दुर्दशा से व्यथित दौपद्री ने सूर्यदेव की आराधना की थी।

24 अक्तूबर 2011

Dhantrayodashi : Dhanteras Diwali


धनत्रयोदशी : धनतेरस



हिंदुओं के महत्वपूर्ण त्यौहार दीवाली का आरंभ धन त्रयोदशी के शुभ दिन से हो जाता है. इस समय हिंदुओं के पंच दिवसीय उत्सव प्रारंभ हो जाते हैं जो क्रमश: धनतेरस से शुरू हो कर नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली फिर दीवाली, गोवर्धन (गोधन) पूजा और भाईदूज तक उत्साह के साथ मनाए जाते हैं. पौराणिक मान्यताओं अनुसार धनतेरस के दिन ही भगवान धन्वंतरि जी का प्रकाट्य हुआ था, आयुर्वेद के जनक धन्वंतरि समुद्र मंथन के समय इसी शुभ दिन अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे. इस कारण इस दिवस को धनवंतरि जयंती के रूप में भी मनाया जाता है. धनत्रयोदशी के दिन संध्या समय घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाए जाते हैं. 

धन त्रयोदशी कथा | Dhan Trayodashi Story

धन त्रोदोदशी के पर्व के संदर्भ में एक पौराणिक कथा प्रचलित है इस कथा के अनुसार  समुद्र-मन्थन के दौरान भगवान धन्वन्तरि इसी दिन समुद्र के दौरान एक हाथ में अमृतकलश लेकर तथा दूसरे हाथ में आयुर्वेदशास्त्र लेकर प्रकट होते हैं उनके इस अमृत कलश और आयुर्वेद का लाभ सभी को प्राप्त हुआ धन्वंतरि जी को आरोग्य का देवता, एवं आयुर्वेद का जनक माना जाता है. भगवान धनवीतरि जी तीनों लोकों में विख्यात देवताओं के वैद्य और चिकित्सा के देवता माने गए हैं. इसके साथ ही साथ यह भगवान विष्णु के अंशावतार भी कहे जाते हैं. 
यमदेव की पूजा करने तथा उनके नाम से दीया घर की देहरी पर रखने की एक अन्य कथा है जिसके अनुसार प्राचीन समय में हेम नामक राजा थे, राजा हेम को संतान रूप में पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है. वह अपने पुत्र की कुंडली बनवाते हैं तब उन्हें ज्योतिषियों से ज्ञात होता है कि जिस दिन उनके पुत्र का विवाह होगा उसके ठीक चार दिन के बाद उनका पुत्र मृत्यु को प्राप्त होगा. इस बात को सुन राजा दुख से व्याकुल हो जाते हैं. 
कुछ समय पश्चात जब राजा अपने पुत्र का विवाह करने जाता है तो राजा की पुत्रवधू को इस बात का पता चलता है और वह निश्चय करती है कि वह पति को अकाल मृत्यु के प्रकोप से अवश्य बचाएगी.  राजकुमारी विवाह के चौथे दिन पति के कमरे के बाहर गहनों एवं सोने-चांदी के सिक्कों का ढेर बनाकर लगा देती है तथा स्वयं रात भर अपने पति को जगाए रखने के लिए उन्हें कहानी सुनाने लगती है. 
मध्य रात्रि जब यम रूपी सांप उसके पति को डसने के लिए आता है तो वह उन स्वर्ण चांदी के आभूषणों के पहाड़ को पार नहीं कर पाता तथा वहां बैठकर राजकुमारी का गाना सुनने लगाता है. ऐसे सारी रात बीत जाती है और सांप प्रात: काल समय उसके पति के प्राण लिए बिना वापस चला जाता है. इस प्रकार राजकुमारी अपने पति के प्राणों की रक्षा करती है मान्यता है की तभी से लोग घर की सुख-समृद्धि के लिए धनतेरस के दिन अपने घर के बाहर यम के नाम का दीया निकालते हैं और यम से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें अकाल मृत्यु के भय से मुक्त करें. 

धनतेरस कथा | Dhanteras katha In hindi

एक बार भगवान विष्णु जी देवी लक्ष्मी के साथ पृथ्वी में विचरण करने के लिए आते हैं. वहां पहुँच कर भगवान विष्णु लक्ष्मी जी सकते हैं कि वह दक्षिण दिशा की ओर जा रहे हैं अत: जब तक वह आपस न आ जाएं लक्ष्मी जी उनका इंतजार करें और उनके दिशा की ओर न देखें. विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी जी बैचैन हो जाती हैं और भगवान के दक्षिण की ओर जाने पर लक्ष्मी भी उनके पीछे चल देती हैं. मार्ग में उन्हें एक खेत दिखाई पड़ता है उसकी शोभा से मुग्ध हो जाती हैं.
खेत से सरसों के फूल तोड़कर अपना श्रृंगार करती हैं और कुछ आगे जाने पर गन्ने के खेत से गन्ने तोड़ कर उन्हें खाने लगती हैं. तभी विष्णु जी उन्हें वहां देख लेते हैं अपने वचनों की अवज्ञा देखकर वह लक्ष्मी जी को क्रोधवश श्राप देते हैं कि जिस किसान के खेतों में उन्होंने बिना पूछे आगमन किया वह उस किसान की बारह वर्षों तक सेवा करें. इतना कहकर विष्णु भगवान उन्हें छोड़ कर अंतर्ध्यान हो जाते हैं. देवी लक्ष्मी वहीं किसान के घर सेवा करने लगती हैं.
किसान बहुत गरीब होता है उसकी ऐसी दशा देख कर लक्ष्मी जी उसकी पत्नि को देवी लक्ष्मी अर्थात अपनी मूर्ति की पूजा करने को कहती हैं. किसान कि पत्नि नियमित रूप से लक्ष्मी जी पूजा करती है तब लक्ष्मी जी प्रसन्न हो उसकी दरिद्रता को दूर कर देती हैं. किसान के दिन आनंद से व्यतीत होने लगते हैं और जब लक्ष्मीजी वहां से जाने लगती हैं तो वह लक्ष्मी को जाने नहीं देता. उसे पता चल जाता है कि वह देवी लक्ष्मी ही हैं अत: किसान देवी का का आंचल पकड़ लेता है. तब भगवान विष्णु  किसान से कहते हैं की मैने इन्हें श्राप दिया था जिस कारण वो यहां रह रही थी अब यह शाप से मुक्त हो गईं हैं.सेवा का समय पूरा हो चुका है. 
इन्हें जाने दो परंतु किसान हठ करने लगता है तब लक्ष्मी जी किसान से कहती हैं कि 'कल तेरस है, मैं तुम्हारे लिए धनतेरस मनाऊंगी तुम कल घर को लीप-पोतकर स्वच्छ रखना संध्या समय दीप जलाकर मेरा पूजन करना इस दिन की पूजा करने से मैं वर्ष भर तुम्हारे घर से नहीं जाऊंगी. यह कहकर देवी चली अगले दिन किसान ने लक्ष्मीजी के कहे अनुसार लक्ष्मी पूजन किया और उसका घर धन-धान्य से भरा रहा अत: आज भी इसी प्रकार से हर वर्ष तेरस के दिन लक्ष्मीजी की पूजा कि जाती है. ऎसा करने से लक्ष्मी जी का आशिर्वाद प्राप्त होता है. 

धनत्रयोदशी पूजा | Dhantrayodashi Puja

धन त्रयोदशी के दिन घरों को लीप पोतकर कर स्वच्छ किया जाता है ,रंगोली बना संध्या समय दीपक जलाकर रोशनी से लक्ष्मी जी का आवाहन करते हैं. धन त्रयोदशी के दिन नए सामान, गहने, बर्तन इत्यादि ख़रीदना शुभ माना जाता है. इस दिन चांदी के बर्तन ख़रीदने का विशेष महत्व होता है. मान्यता अनुसार इस दिन स्वर्ण, चांदी या बर्तन इत्यादी खरीदने से घर में सुख समृद्धी बनी रहती है. इस दिन आयुर्वेद के ग्रन्थों का भी पूजन किया जाता है.
आयुर्वेद चिकित्सकों का यह विशेष दिन होता है आयुर्वेद विद्यालयों, तथा चिक्कित्सालयों में इस दिन भगवान धन्वन्तरि की पूजा की जाती है. आरोग्य प्राप्ति के लिए तथा जिन व्यक्तियों को शारीरिक एवं मानसिक बीमारियां अकसर परेशान करती रहती हैं, उन्हें भगवान धनवंतरि  का धनत्रयोदशी को श्रद्धा-पूर्वक पूजन करना चाहिए ऐसा करने से आरोग्य की प्राप्ति होगी.  धनत्रयोदशी को  यम के निमित्त दीपदान भी करते हैं जिससे व्यक्ति अकाल मृत्यु के भय से मुक्त होता है. 

DHANTERAS : धनतेरस

मनुष्य के भाग्य और कर्म का बहीखाता

धनतेरस, धनवंतरी त्रयोदशी या धन त्रयोदशी का दीपावली से ठीक पहले मनाया जाना अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह भारतीय त्योहारों को मनाये जाने के पीछे छिपे वैज्ञानिक और सामाजिक कारणों को प्रकट करता है। इस दिन आरोग्य के देवता धनवंतरी, मृत्यु के अधिपति यम, वास्तविक धन सम्पदा की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी तथा वैभव के स्वामी कुबेर की पूजा की जाती है। यह त्योहार मनाया जाना इस बात का संकेत है कि लक्ष्मी के आह्वान के पहले आरोग्य की प्राप्ति और यम को प्रसन्न करने के लिये कर्मों का शुद्धिकरण अत्यंत आवश्यक है। और चूंकि कुबेर भी आसुरी प्रवृत्तियों का हरण करने वाले देव हैं, अत: मां लक्ष्मी के आगमन को सुनिश्चित करने के लिये आरोग्य, कर्म और सात्विक प्रवृतियों में विस्तार निरंतर आवश्यक है।

आचार्य धनवंतरी और मां लक्ष्मी का अवतरण समुद्र मंथन से हुआ था। दोनों ही कलश लेकर अवतरित हुए थे। यह इस बात का संकेत है कि मनुष्य को सदैव अपने कर्मो और दृष्टिकोण को लेकर मंथन करते रहना चाहिए। जब यह मंथन निष्पक्ष और नि:स्वार्थ होगा तो समुद्र मंथन की ही तरह लक्ष्मी और धनवंतरी प्रकट होंगे, जो आरोग्य और वास्तविक समृद्धि का सृजन करेंगे। धनवंतरी और मां लक्ष्मी दोनों ही कलश के साथ प्रगट हुए थे और दोनों ही देवों को प्राप्त हुए। इस घटना से यह स्पष्ट है कि स्वास्थ्य और वास्तविक लक्ष्मी का सान्निध्य सदैव सुकर्मी तथा अच्छे लोगों को प्राप्त होता है।

श्री सूक्त में लक्ष्मी के स्वरूपों का विवरण कुछ इस प्रकार मिलता है। ‘धनमग्नि, धनम वायु, धनम सूर्यो धनम वसु:’ अर्थात प्रकृति ही लक्ष्मी है और प्रकृति की रक्षा करके मनुष्य स्वयं के लिये ही नहीं, अपितु नि:स्वार्थ होकर पूरे समाज के लिये लक्ष्मी का सृजन कर सकता है। श्री सूक्त में आगे यह भी लिखा गया है-‘न क्रोधो न मात्सर्यम न लोभो ना अशुभा मति:’ इससे तात्पर्य यह कि जहां क्रोध और किसी के प्रति द्वेष की भावना होगी, वहां मन की शुभता में कमी आयेगी, जिससे वास्तविक लक्ष्मी की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न होगी। मानसिक विकृतियों से चूंकि व्यक्ति और पूरे समाज को हानि होती है, अत: यह लक्ष्मी की प्राप्ति में बाधक हैं।

अत: हम यह स्पष्ट रूप से महसूस कर सकते हैं कि लक्ष्मी प्रकृति स्वरूपा है, चंद्र, सूर्य की आभा प्रदान करने वाली हैं। अत: लक्ष्मी की वास्तविक परिकल्पना प्रकृति की सुन्दरता को बढ़ा कर ही साकार हो सकती है। इससे आचार्य धनवंतरी के बताये गये मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य सम्बंधी उपायों को हम अपना कर सबल हो सकेंगे।

श्री सूक्त में वर्णन है कि, लक्ष्मी जी भय और शोक से मुक्ति दिलाती हैं तथा धन-धान्य और अन्य सुविधाओं से युक्त करके मनुष्य को निरोगी काया और लम्बी आयु भी देती हैं।

धनवंतरी पूजन से लक्ष्मी जी का आह्वान
कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धनवंतरी का जन्म हुआ था, इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है । धनवंतरी जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। भगवान धनवंतरी चूंकि कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है। अत: कोई भी नया बर्तन अवश्य खरीदें, ऐसा करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं।

इस दिन धनवंतरी जी का पूजन इस तरह करें - 
नवीन झाडू एवं सूपड़ा खरीदकर उनका पूजन करें। सायंकाल दीपक प्रज्ज्वलित कर घर, दुकान आदि को सुसज्जित करें। मंदिर, गौशाला, नदी के घाट, कुओं, तालाब, बगीचों में भी दीपक लगाएं। यथाशक्ति तांबे, पीतल, चांदी के गृह-उपयोगी नवीन बर्तन व आभूषण क्रय करें । हल जुती मिट्टी को दूध में भिगोकर उसमें सेमर की शाखा डालकर तीन बार अपने शरीर पर फेरें। कार्तिक स्नान करके प्रदोष काल में घाट, गौशाला, बावड़ी, कुआं, मंदिर आदि स्थानों पर तीन दिन तक दीपक जलाएं। शुभ मुहूर्त में अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठान में नई गद्दी बिछाएं अथवा पुरानी गद्दी को ही साफ कर पुन: स्थापित करें।

स्पष्ट है कि धनवंतरी जी की पूजा से तात्पर्य आसपास के वातावरण और स्वयं के शरीर की सफाई से है। समूह में दीपक जलाने से तापमान बढ़ता है, जिससे सूक्ष्म कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और प्रकृति स्वरूपा साक्षात् लक्ष्मी के अवतरण का मार्ग प्रशस्त होता है।



आंतरिक ज्ञान जगा कर समृद्धि देते हैं कुबेर

शिवभक्त व समस्त धन सम्पदा के स्वामी कुबेर के लिये भी धनतेरस को सायंकाल के समय तेरह दीप समर्पित किए जाते हैं। कुबेर धन सम्पदा की दिशा उत्तर के लोकपाल हैं। ये भूगर्भ के भी स्वामी हैं। कुबेर की पूजा से मनुष्य की आंतरिक ऊर्जा और ज्ञान जागृत होता है और धन अर्जन का मार्ग सुलभ होता है। निम्न मंत्र द्वारा चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजन करें-
कुबेर मंत्र :
‘यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये
धन-धान्य समृद्धि में देहि दापय स्वाहा ।’

धनतेरस : पूजन विधि राशी के अनुसार

आज ही के दिन समुद्र से
प्रकट हुए थे धनवंतरि!


प्रकाश पर्व दीपावली के दो दिन पूर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस मनाने की पुरानी परम्परा है। लोगों का मानना है कि समुद्र मंथन के अंतिम दिन भगवान विष्णु कलश में अमृत लेकर 'धनवंतरि' के अवतार में प्रकट हुए थे। भगवान धनवंतरि की पूजा से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती है।

किंवदंती है कि देवताओं और दानवों के बीच हुए समझौते के बाद जब समुद्र मंथन किया गया तब समुद्र से चौदह रत्न निकले थे, जिनमें एक अमृत-कलश भी था। भगवान विष्णु देवताओं को अमर करने के लिए धनवंतरि के अवतार में प्रकट होकर अमृत-कलश के साथ समुद्र से निकले थे। इस दिन धनवंतरि की पूजा करने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होकर धन-वर्षा करती है। इसी वजह से भगवान धनवंतरि के प्रकटोत्सव को 'धनतेरस' के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई।

बांदा जनपद के तेंदुरा गांव में रहने वाले धर्मग्रंथों के जानकार पंडित मना महाराज गौतम का कहना है कि भगवान धनवंतरि भगवान विष्णु के अवतार है, इनकी पूजा से ग्रहस्थ जीवन जीने वालों के अलावा व्यापारी वर्ग को भी लाभ होता है।

पूजा-अर्चना के बारे में वह कहते है कि त्रयोदश की सुबह स्नान के बाद पूर्व दिशा की ओर मुख कर भगवान धनवंतरि की मूर्ति या चित्र की स्थापना करनी चाहिए, उसके बाद मंत्रोच्चारण करना चाहिए और आचमन के लिए जल चढ़ना चाहिए। धनवंतरि की पूजा भगवान विष्णु की पूजा है, इसलिए लक्ष्मी जी प्रसन्न होकर दीपावली में धन-वर्षा करती है।


24 अक्टूबर 2011



इस बार 24 अक्टूबर, सोमवार से दीपावली का पर्व धनतेरस प्रारंभ हो रहा है। महापर्व धनतेरस/धनत्रयोदशी इस बार दो दिन तक मनाया जायेगा ..यह योग नो वर्षों के बाद आ रहा हें...इसका कारण यह है कि 24 अक्टूबर को सूर्य शाम को स्वाती नक्षत्र( 04 :45 बजे) में आ जायेगा..इसी दिन उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र भी रहेगा..यह उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र 25 अक्टूबर को तड़के/प्रातः तीन बजकर 45 मिनट तक रहेगा..इसके बाद में हस्त नक्षत्र आ जायेगा..शास्त्रानुसार उत्तराफाल्गुनी नक्षण में अबूझ मुहूर्त, मांगलिक कार्य,और खरीददारी करने का श्रेष्ठ मुहूर्त होता हें..वहीँ हस्त नक्षत्र भी इन कार्यो हेतु उत्तम हें..चौबीस(24 ) अक्टूबर,2011 को धन त्रयोदशी दोपहर में 12 :35 से शुरू होकर अगले दिन सुबह नो (09 )बजे तक रहेगी...चूँकि दीपदान शाम को त्रयोदशी और प्रदोष कल में किया जाता हें..और धन्वन्तरी जयंती उदियत तिथि में त्रयोदशी होने पर मनाई जाती हें..इसी कारण 24 अक्टूबर,2011 की शाम को त्रयोदशी होने पर दीपदान किया जा सकेगा...जबकि 25 अक्टूबर,2011 को सूर्योदय के समय त्रयोदशी होने के कारन इसी दिन भगवन धन्वन्तरी की जयंती धूम धाम से मनाई जाएगी...25 अक्टूबर,2011 की शाम को चतुर्दशी तिथि होने के कारन इस दिन रूप चतुर्दशी पर्व मनाया जायेगा।

इस दिन यदि आप अपनी राशि के अनुसार नीचे लिखे उपाय करें तो धन-संपत्ति आदि का लाभ होगा।

ये उपाय इस प्रकार हैं-

मेष- यदि आप धनतेरस के दिन शाम के समय घर के मुख्य द्वार पर तेल का दीपक में दो काली गुंजा डाल दें, तो साल भर आर्थिक अनुकूलता बनी रहेगी। आपका उधार दिया हुआ धन भी प्राप्त हो जाएगा।

वृषभ- यदि आपके संचित धन का लगातार खर्च हो रहा है तो धनतेरस के दिन पीपल के पांच पत्ते लेकर उन्हे पीले चंदन में रंगकर बहते हुए जल में छोड़ दें।

मिथुन-
बरगद से पांच फल लाकर उसे लाल चंदन में रंगकर नए लाल वस्त्र में कुछ सिक्कों के साथ बांधकर अपने घर अथवा दुकान में किसी कील से लटका दें।

कर्क- यदि आपको अचानक धन लाभ की आशा हो तो धनतेरस के दिन शाम के समय पीपल वृक्ष के समीप तेल का पंचमुखी दीपक जलाएं।

सिंह- यदि व्यवसाय में बार-बार हानि हो रही हो या घर में बरकत ना रहती हो तो धनतेरस के दिन से गाय को रोज चारा डालने का नियम लें।

कन्या- यदि जीवन में आर्थिक स्थिरता नहीं हो तो धनतेरस के दिन दो कमलगट्टे लेकर उन्हें माता लक्ष्मी के मंदिर में अर्पित करें।

तुला- यदि आप आर्थिक परेशानी से जुझ रहे हैं तो धनतेरस के दिन शाम को लक्ष्मीजी के मंदिर में नारियल चढ़ाएं।

वृश्चिक- यदि आप निरंतर कर्ज में उलझ रहें हो तो धनतेरस के दिन श्मशान के कुएं का जल लाकर किसी पीपल वृक्ष पर चढ़ाएं।

धनु-
धनतेरस के दिन गुलर के ग्यारह पत्तों को मोली से बांधकर यदि किसी वट वृक्ष पर बांध दिया जाए, तो आपकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी।

मकर-
यदि आप आर्थिक समस्या से परेशान है, किंतु रूकावटें आ रही हों, तो आक की रूई का दीपक शाम के समय किसी तिहारे पर रखने से आपको धन लाभ होगा।

कुंभ- जीवन स्थायी सुख-समृद्धि हेतु प्रत्येक धनतेरस की रात में पूजन करने वाले स्थान पर ही रात्रि में जागरण करना चाहिए।

मीन- यदि व्यवसाय में शिथिलता हो तो केले के दो पौधे रोपकर उनकी देखभाल करें तथा उनके फलों को नहीं खाएं।

18 अक्तूबर 2011

JAI SHRI SHAYAM OR BARBARIK


बर्बरीक जो बाबा श्याम बने



ये महान पाण्डव भीम के पुत्र घटोत्कच और नाग कन्या अहिलवती के पुत्र थे। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान यौद्धा थे। उन्होंने युद्ध कला अपनी माँ से सीखी। भगवान शिव की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अभेद्य बाण प्राप्त किये और तीन बाणधारी का प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। अग्नि देव ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जो कि उन्हें तीनो लोकों में विजयी बनाने में समर्थ था। महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य अपरिहार्य हो गया था, यह समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुये तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा जाग्रत हुई। जब वे अपनी माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुँचे तब माँ को हारे हुये पक्ष का साथ देने का वचन दिया। वे अपने नीले घोडे, जिसका रंग नीला था, पर तीन बाण और धनुष के साथ कुरूक्षेत्र की रणभूमि की ओर अग्रसर हुये।

सर्वव्यापी कृष्ण ने ब्राह्मण वेश धारण कर बर्बरीक से परिचित होने के लिये उसे रोका और यह जानकर उनकी हँसी भी उडायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आया है। ऐसा सुनने पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को ध्वस्त करने के लिये पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापिस तरकस में ही आयेगा। यदि तीनों बाणों को प्रयोग में लिया गया तो तीनों लोकों में हाहाकार मच जायेगा। इस पर कृष्ण ने उन्हें चुनौती दी की इस पीपल के पेड़ के सभी पत्रों को छेद कर दिखलाओ, जिसके नीचे दोनो खड़े थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तूणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया। तीर ने क्षण भर में पेड़ के सभी पत्तों को भेद दिया और कृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होनें अपने पैर के नीचे छुपा लिया था, बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिये नही तो ये आपके पैर को चोट पहुँचा देगा। कृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर से सम्मिलित होगा तो बर्बरीक ने अपनी माँ को दिये वचन दोहराये कि वह युद्ध में उस ओर से भाग लेगा जो कि निर्बल हो और हार की ओर अग्रसर हो। कृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की ही निश्चित है, और इस पर अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम उनके पक्ष में ही होगा।
ब्राह्मण ने बालक से दान की अभिलाषा व्यक्त की, इस पर वीर बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया कि अगर वो उनकी अभिलाषा पूर्ण करने में समर्थ होगा तो अवश्य करेगा। कृष्ण ने उनसे शीश का दान माँगा। बालक बर्बरीक क्षण भर के लिये चकरा गया, परन्तु उसने अपने वचन की दृढ़ता जतायी। बालक बर्बरीक ने ब्राह्मण से अपने वास्तविक रूप से अवगत कराने की प्रार्थना की और कृष्ण के बारे में सुन कर बालक ने उनके विराट रूप के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त की, कृष्ण ने उन्हें अपना विराट रूप दिखाया। उन्होनें बर्बरीक को समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पहले युद्धभूमि की पूजा के लिये एक वीर्यवीर क्षत्रिय के शीश के दान की आवश्यकता होती है, उन्होनें बर्बरीक को युद्ध में सबसे वीर की उपाधि से अलंकृत किया, अतैव उनका शीश दान में माँगा। बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वह अंत तक युद्ध देखना चाहता है, श्री कृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। फाल्गुन माह की द्वादशी को उन्होनें अपने शीश का दान दिया। भगवान ने उस शीश को अमृत से सींच कर सबसे ऊँची जगह पर रख दिया, ताकि वह महाभारत युद्ध देख सके। उनका सिर युद्धभूमि के समीप ही एक पहाडी पर सुशोभित किया गया, जहां से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे। युद्ध की समाप्ति पर पांडवों में ही आपसी तनाव हुआ कि युद्ध में विजय का श्रेय किस को जाता है, इस पर कृष्ण ने उन्हें सुझाव दिया कि बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है अतैव उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है। सभी इस बात से सहमत हो गये। बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि कृष्ण ही युद्ध मे विजय प्राप्त कराने में सबसे महान पात्र हैं, उनकी शिक्षा, उनकी उपस्थिति, उनकी युद्धनीति ही निर्णायक थी। उन्हें युद्धभूमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जो कि शत्रु सेना को काट रहा था, महाकाली दुर्गा कृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थीं। कृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफ़ी प्रसन्न हुये और वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे, क्योंकि कलियुग में हारे हुये का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ है। खाटूनगर तुम्हारा धाम बनेगा। उनका शीश खाटू में दफ़नाया गया। एक बार एक गाय उस स्थान पर आकर अपने स्तनों से दुग्ध की धारा स्वतः ही बहा रही थी, बाद में खुदायी के बाद वह शीश प्रकट हुआ, जिसे कुछ दिनों के लिये एक ब्राह्मण को सुपुर्द कर दिया गया। एक बार खाटू के राजा को स्वप्न में मन्दिर निर्माण के लिये और वह शीश मन्दिर में सुशोभित करने के लिये प्रेरित किया गया। तदन्तर उस स्थान पर मन्दिर का निर्माण किया गया और कार्तिक माह की एकादशी को शीश मन्दिर में सुशोभित किया गया, जिसे बाबा श्याम के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। खाटू श्याम जी का मुख्य मंदिर राजस्थान के सीकर ज़िले के गांव खाटू में बना हुआ है।

प्रेम से बोलो : खाटू नरेश  की जय!
जोर से बोलो : तीन बाणधारी की जय!!
सभी बोलो : लिले के असवार की जय!!!
प्यारे बोलो : शीश के दानी की जय!!!!
हरदम बोलो : जय श्री श्याम!!!!!!

KHATUSHYAMJI, RAJASTHAN

खाटूश्यामजी मंदिर में
अब टोकन से होंगे दर्शन!



करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केन्द्र विश्व प्रसिद्ध खाटू स्थित श्याम प्रभु के मंदिर में दक्षिण भारत के मंदिरों की तर्ज पर कूपन से दर्शन सुविधा शुरू करने पर विचार चल रहा है। अगर यह व्यवस्था शुरू हो गई तो यह राज्य का पहला मंदिर होगा।

इस व्यवस्था के तहत श्रद्धालु को तय राशि का कूपन दिया जाएगा। कूपन प्रतिदिन से लेकर मासिक, सालाना अवधि के होंगे। इसके राशि अभी तय नहीं हुई है। लेकिन सूत्रों से पता चला है कि न्यूनतम कूपन 1100 रुपए का होगा। श्री श्याम मंदिर कमेटी के नए अध्यक्ष शम्भू सिंह इस नई व्यवस्था को लागू करने पर जोर दे रहे हैं। हालांकि अभी कमेटी के सभी सदस्यों की इश पर सहमति नहीं बनी है। पारिवारिक विवाद के चलतेे अभी इस व्यवस्था पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। उल्लेखनीय है कि गत खाटू मेले की तैयारियों को लेकर संपन्न हुई बैठक में भी कूपन सिस्टम लागू करने का मुद्दा उठा था। लेकिन मेला नजदीक होने से कूपन व्यवस्था लागू नहीं हो पाई।

हालांकि बैठक में इस व्यवस्था के विरोध में भी स्वर उठे। गौरतलब है कि शम्भू सिंह, राजेन्द्र सिंह की जगह अध्यक्ष बने है। राजेन्द्र सिंह का हाल ही में निधन हो गया था। शम्भू सिंह राजेन्द्र सिंह के छोटे भाई है। शम्भू सिंह ने कार्यभार संभालते ही कुछ नए नियम लागू करने की शुरुआत कर दी है। सवामणी के लिए नए काउंटर बनाए जा रहे है। प्रतिदिन कितनी सवामणी हो रही है। सवामणी कराने वाले का नाम सहित विभिन्न जानकारी सबको मिलेगी।

शम्भू सिंह कुछ पारिवारिक विवादों को निपटाने में भी रूचि ले रहे हैं। गौरतलब है कि खाटू नरेश के दरबार में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु दर्शन पहुंचते हैं। एकादशी-द्वादशी को तो अन्य राज्यों के श्रद्धालु भी आते हैं। इनमें ज्यादातर प्रवासी राजस्थानी होते हैं।

ये मंदिर कमेटी को सालाना मोटा चंदा देते हैं। मंदिर कमेटी इनके दर्शनों के लिए वीआईपी व्यवस्था रखती है। इन्हें मंदिर कमेटी कार्यालय के गेट से प्रवेश कराकर दर्शन कराया जाता है। लेकिन कई बार इसमें गड़बड़ी हो जाती है। कमेटी सदस्य से सम्पर्क नहीं होने से अन्य राज्यों से आए श्रद्धालुओं को काफी इंतजार करना पड़ता है। स्वयंसेवक इन्हें वीआईपी गेट से जाने से रोक देते हैं। इसलिए कमेटी ने इस व्यवस्था को नियमित ही करने का मानस बना लिया है हालांकि इसके विरोध से भी इंकार नहीं किया जा रहा

14 अक्तूबर 2011

FURSAT KE PAL: पतित पावनी गंगा : एक परिचय

FURSAT KE PAL: पतित पावनी गंगा : एक परिचय: गंगा का अस्तित्व खतरे में काहे का पतित पावनी भैया अब तो ये चिंता लगी है की पूजा करने के लिए भी गंगाजल मिलेगा की नहीं. यह बहुत ही सोचनीय वि...

11 अक्तूबर 2011

श्री लक्ष्मीजी की आरती






महालक्ष्मी नमस्तुभ्यं, नमस्तुभ्यं सुरेश्र्वरी |
हरिप्रिये नमस्तुभ्यं, नमस्तुभ्यं दयानिधे ॥


ॐ जय लक्ष्मी माता मैया जय लक्ष्मी माता |
तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥ॐ जय लक्ष्मी माता....

उमा रमा ब्रम्हाणी तुम जग की माता |
सूर्य चद्रंमा ध्यावत नारद ऋषि गाता ॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

दुर्गारुप निरंजन सुख संपत्ति दाता |

जो कोई तुमको ध्याता ऋद्धि सिद्धी धन पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

तुम ही पाताल निवासनी तुम ही शुभदाता |
कर्मप्रभाव प्रकाशनी भवनिधि की त्राता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

जिस घर तुम रहती हो ताँहि में हैं सदगुण आता |
सब सभंव हो जाता, मन नहीं घबराता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

तुम बिन यज्ञ ना होता, वस्त्र न कोई पाता |
खान पान का वैभव, सब तुमसे आता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

शुभ गुण मंदिर सुंदर क्षीरनिधि जाता |
रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहीं पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

महालक्ष्मी जी की आरती जो कोई नर गाता |
उँर आंनद समाता पाप उतर जाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

स्थिर चर जगत बचावै कर्म प्रेर ल्याता |
रामप्रताप मैया जी की शुभ दृष्टि पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

ॐ जय लक्ष्मी माता मैया जय लक्ष्मी माता |
तुमको निसदिन सेवत हर विष्णु विधाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

श्री लक्ष्मी चालीसा



॥ दोहा॥
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्घ करि, परुवहु मेरी आस॥

॥ सोरठा॥
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करुं।
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥

॥ चौपाई ॥
सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही।
ज्ञान बुद्घि विघा दो मोही ॥
तुम समान नहिं को‌ई उपकारी।
सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
जय जय जगत जननि जगदम्बा।
सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥
तुम ही हो सब घट घट वासी।
विनती यही हमारी खासी॥
जगजननी जय सिन्धु कुमारी।
दीनन की तुम हो हितकारी॥
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी।
कृपा करौ जग जननि भवानी॥
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी।
सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी।
जगजननी विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता।
संकट हरो हमारी माता॥
क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो।
चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी।
सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा।
रुप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा।
लीन्हे‌उ अवधपुरी अवतारा॥
तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं।
सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
अपनाया तोहि अन्तर्यामी।
विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी।
कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करै सेवका‌ई।
मन इच्छित वांछित फल पा‌ई॥
तजि छल कपट और चतुरा‌ई।
पूजहिं विविध भांति मनला‌ई॥
और हाल मैं कहौं बुझा‌ई।
जो यह पाठ करै मन ला‌ई॥
ताको को‌ई कष्ट न हो‌ई।
मन इच्छित पावै फल सो‌ई॥
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि।
त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी॥
जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै।
ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥
ताकौ को‌ई न रोग सतावै।
पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥
पुत्रहीन अरु संपति हीना।
अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै।
शंका दिल में कभी न लावै॥
पाठ करावै दिन चालीसा।
ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै।
कमी नहीं काहू की आवै॥
बारह मास करै जो पूजा।
तेहि सम धन्य और नहिं दूजा ॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माही।
उन सम को‌इ जग में कहुं नाहीं॥
बहुविधि क्या मैं करौं बड़ा‌ई।
लेय परीक्षा ध्यान लगा‌ई॥
करि विश्वास करै व्रत नेमा।
होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा॥
जय जय जय लक्ष्मी भवानी।
सब में व्यापित हो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं।
तुम सम को‌उ दयालु कहुं नाहिं॥
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै।
संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥
भूल चूक करि क्षमा हमारी।
दर्शन दजै दशा निहारी॥
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी।
तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्घि है तन में।
सब जानत हो अपने मन में॥
रुप चतुर्भुज करके धारण।
कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
केहि प्रकार मैं करौं बड़ा‌ई।
ज्ञान बुद्घि मोहि नहिं अधिका‌ई॥

॥ दोहा॥
त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास।
जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश ॥
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर।
मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥

दीपावली : पूजन सामग्री

जलभरा कलश (धातु का या मिट्टी का) ऊपर चावल भरी कटोरी उस पर नारियल। कलश में मौली बांध दीजिए तथा स्वास्तिक (सतिया) रोली से बनाइए। दीपक सजाकर रखिए। श्रीयंत्र, कनकधारा, कुबरे यंत्र हो तो थाली में रखिए और ‘‘श्री’’ रोली से लिखकर उस पर चांदी के सिक्के या कुछ आभूषण गहना रख लीजिए। पान (डंठल सहित) 11, सुपारी-11, कपूर, रोली, मौली, सिंदूर, अगरबत्ती, धूपबत्ती, चावल, दूब, दूध, पंचमेवा, कुछ फल, यज्ञोपवीत (जनेऊ) मिष्ठान्न, पुष्पमाला-5, कुछ गुलाब के फूल, इत्र की शीशी, लौंग, इलायची, एक किलो आम की लकड़ी, रूई, माचिस, कुछ खाली पात्र, एक जलभरा पूजन के लिए लोटा। (दूब का गच्छा लोटे में डाल लें) इस पूजा के लोटे में थोड़ा गुलाब जल व गंगाजल डाल लें। तुलसीदल, हल्दी, कमल, गट्टे, घी, एक पाव हवन सामग्री, गरी का गोला, केसर, वेदी या पात्र जिसमें हवन किया जाए।

-- पूजा विधि --

गणेश लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र (गणेश बाईं ओर लक्ष्मी दाईं ओर) चौकी पर स्थापित करें। नीचे लाल या पीला वस्त्र बिछावें जैसा कहा जाए वैसा करते रहें, मंत्र सुनते रहें या बोलें। मन में लक्ष्मी जी का ध्यान ‘‘महालक्ष्मी देव्यै नमः’’ कहते रहें।

दीपावली : रोचक तथ्य

दीपावली अपने आप में बहुत सी घटनाओं और प्रसंगों को समेटे हुए है। दीवाली केवल भगवान श्री राम के अयोध्या आगमन पर दीप जलाकर स्वागत और खुशियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि दीवाली और भी बहुत कुछ है। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ रोचक तथ्यों को-

जब शिव लेटे चरणों में
राक्षसों का संहार करने के बाद जब महाकाली का क्रोध शांत नहीं हुआ तो भगवान शिव उनके चरणों में लेट गए। भगवान भोलेनाथ के स्पर्श मात्र से ही महाकाली का क्रोध शांत हो गया। इसलिए दीवाली के दिन देवी के शांत स्वरूप लक्ष्मी की पूजा की जाती है। दीवाली की ही रात महाकाली की पूजा का भी विधान है।

नरकासुर का वध
दीवाली से एक दिन पहले चतुर्दशी को श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध किए जाने की खुशी में अगले दिन अमावास्या को ब्रजवासियों ने दीए जलाए थे।

तीन पगों में नापे ‌तीनों लोक
भगवान वामन ने राजा बलि की पृथ्वी तथा शरीर को तीन पगों में इसी दिन नाप लिया था। राजा बलि की दानशीलता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राज्य देते हुए कहा कि उनकी याद में पृथ्वीवासी हर साल दीवाली का त्योहार मनाएंगे।

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  • World wide radio-Radio Garden - *प्रिये मित्रों ,* *आज मैं आप लोगो के लिए ऐसी वेबसाईट के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसमे आप ऑनलाइन पुरे विश्व के रेडियों को सुन सकते हैं। नीचे दिए गए ल...
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  • जीवन का सच - एक बार किसी गांव में एक महात्मा पधारे। उनसे मिलने पूरा गांव उमड़ पड़ा। गांव के हरेक व्यक्ति ने अपनी-अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी। एक व्यक्ति ने महात्मा से...
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