आपका स्वागत है...

मैं
135 देशों में लोकप्रिय
इस ब्लॉग के माध्यम से हिन्दू धर्म को जन-जन तक पहुचाना चाहता हूँ.. इसमें आपका साथ मिल जाये तो बहुत ख़ुशी होगी.. इस ब्लॉग में पुरे भारत और आस-पास के देशों में हिन्दू धर्म, हिन्दू पर्व त्यौहार, देवी-देवताओं से सम्बंधित धार्मिक पुण्य स्थल व् उनके माहत्म्य, चारोंधाम,
12-ज्योतिर्लिंग, 52-शक्तिपीठ, सप्त नदी, सप्त मुनि, नवरात्र, सावन माह, दुर्गापूजा, दीपावली, होली, एकादशी, रामायण-महाभारत से जुड़े पहलुओं को यहाँ देने का प्रयास कर रहा हूँ.. कुछ त्रुटी रह जाये तो मार्गदर्शन करें...
वर्ष भर (2017) का पर्व-त्यौहार नीचे है…
अपना परामर्श और जानकारी इस नंबर
9831057985 पर दे सकते हैं....

धर्ममार्ग के साथी...

लेबल

आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

11 अक्तूबर 2011

दीपावली की कथा


एक बार देवराज इन्द्र से भयभीत होकर दैत्यराज बलि कहीं जा छिपा। इन्द्र ने उसे ढूंढने का बहुत प्रयत्न किया तभी उन्होंने देखा कि बलि गधे का रूप धारण कर एक खाली घर में समय व्यतीत कर रहा है। इन्द्र वहां पहुंचे और बलि से उनकी बातचीत होने लगी। बलि ने इन्द्र को तत्वज्ञान का उपदेश देते हुए काल समय की महत्ता समझाई। उनमें बातचीत चल ही रही थी कि उसी समय दैत्यराज बलि के शरीर से अत्यन्त दिव्यरूपी एक स्त्री निकली।

उसे देखकर इन्द्र ने पूछा—हे दैत्यराज! तुम्हारे शरीर से निकलने वाली यह आभायुक्त स्त्री देवी है अथवा आसुरी या मानवी’

दैत्यराज बलि ने उत्तर दिया—‘राजन, यह देवी है न आसुरी और न ही मानवी। यदि तुम इसके संबन्ध में अधिक जानना चाहते हो तो फिर इसी से पूछो।’

इतना सुनकर इन्द्र ने हाथ जोड़कर पूछा—‘देवी, तुम कौन हो और दैत्यराज का परित्याग कर मेरी ओर क्यों बढ़ रही हो?’

तब मुस्कुराती हुई शक्तिरूपा स्त्री बोली—‘हे देवेन्द्र, मुझे न तो दैत्यराज प्रह्लाद के पुत्र विरोचन ही जानते हैं और न उनके पुत्र यह बलि ही।

शास्त्रवेत्ता मुझे दुस्सहा, भूति और लक्ष्मी के नामों से पुकारते हैं, परन्तु तुम तथा अन्य देवगण मुझे भली प्रकार नहीं पहचानते।’

इन्द्र ने प्रश्न किया—‘हे देवी, जब इतने दीर्घकाल तक आपने दैत्यराज में वास किया है तो फिर अब इनमें ऐसा कौन-सा दोष उत्पन्न हो गया, जो आप इनका परित्याग कर रही हैं? आप यह भी बताने की कृपा कीजिए कि आपने मुझमें ऐसा कौन-सा गुण देखा है, जो मेरी ओर अग्रसर हो रही हैं।’

लक्ष्मी जी ने उत्त दिया—‘हे आर्य, मैं जिस स्थान पर निवास कर रही हूं, वहां से मुझे विधाता नहीं हटा सकता क्योंकि मैं सदैव समय के प्रभाव से ही एक को त्याग कर दूसरे के पास जाती हूं। इसलिए तुम बलि का अनादर न कर ते हुए इनका सम्मान करो।’

इन्द्र ने पूछा—‘हे देवी, कृपा कर यह बताइये कि अब आप असुरों के पास क्यों नहीं रहना चाहतीं?’

उपवास एवं तप

लक्ष्मी जी बोलीं— ‘मैं उसी स्थान पर रहती हूं, जहां सत्य, दान, व्रत, तप, पराक्रम तथा धर्म रहते हैं। इस समय असुर इससे परामुख हो गए हैं। पूर्वजन्म में यह सत्यवादी जितेन्द्रिय तथा ब्राह्मणों के हितैषी थे, परंतु अब यह ब्राह्मणों से द्वेष करने लगे हैं। जूठे हाथों से घृत छूते हैं और अभक्ष्य भोजन करते हैं। साथ ही धर्म की मर्यादा तोड़कर विभिन्न प्रकार के मनमाने आचरण करते हैं। पहले ये उपवास एवं तप करते थे, प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व जागते थे और यथासमय सोते थे। परंतु अब यह देर से जागते तथा आधी रात के बाद सोते हैं। पूर्वकाल में यह दिन में शयन नहीं करते थे। दीन-दुखियों, अनाथों, वृद्ध, रोगी तथा शक्ति हीनों को नहीं सताते थे और उनकी अन्न आदि से हर प्रकार की सहायता करते थे। पहले ये गुरुजन के आज्ञाकारी तथा सभी काम समय पर करते थे। उत्तम भोजन बनाकर अकेले नहीं खाते थे, वरन् पहले दूसरों को देकर बाद में स्वयं ग्रहण करते थे। प्राणीमात्र को समान समझते हुए इनमें सौहार्द, उत्साह, निरहंकार, सत्य, क्षमा, दया दान, तप एवं वाणी में सरलता आदि सभी गुण विद्यमान थे। मित्रों से प्रेम-व्यवहार करते थे। परंतु अब इनमें क्रोध की मात्रा बढ़ गई है। आलस्य, निद्रा, अप्रसन्नता, असंतोष, कामुकता तथा विवेकहीनता आदि दुर्गुणों की एकता बढ़ गई है।

कांति क्षीण

अब इनकी सभी बातें नियम-विरुद्ध होने लगी हैं। बड़े-बूढ़ों का सम्मान व आज्ञा-पालन न कर उनका अनादर करते हैं तथा गुरुजन के आने पर आसन छोड़कर नहीं खड़े होते। संतान का विधि से भली प्रकार पालन-पोषण नहीं करते। इन सब कारणों से इनके शरीर व चेहरे की कांति क्षीण हो रही है। परस्त्रीगमन, परस्त्री हरण, जुआ, शराब, चोरी आदि दुर्गुण अधिक आ जाने के कारण इनकी धार्मिक आस्था कम हो गई है। अतः हे देवराज इन्द्र, मैंने निश्चय किया है कि अब मैं इनके घर में वास नहीं करूंगी। इसी कारण मैं दैत्यों का परित्याग कर तुम्हारी ओर आ रही हूं। तुम प्रसन्नतापूर्वक मुझे अंगीकार करो। जहां मेरा वास होगा, वहां आशा, श्रद्धा, धृति, शांन्ति, जय, क्षमा, विजित और संगीत—ये आठ देवियां भी निवास करेंगी। चूंकि तुम देवों में अब धार्मिक भावना बढ़ गई है, इसलिए अब मैं तुम्हारे यहां ही वास करूंगी। कथा का सार यही है कि जो भी व्यक्ति लक्ष्मी को पाना चाहता है, उसे तद्नुकूल ही आचरण करना चाहिए।’

मेरी ब्लॉग सूची

  • World wide radio-Radio Garden - *प्रिये मित्रों ,* *आज मैं आप लोगो के लिए ऐसी वेबसाईट के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसमे आप ऑनलाइन पुरे विश्व के रेडियों को सुन सकते हैं। नीचे दिए गए ल...
    7 माह पहले
  • जीवन का सच - एक बार किसी गांव में एक महात्मा पधारे। उनसे मिलने पूरा गांव उमड़ पड़ा। गांव के हरेक व्यक्ति ने अपनी-अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी। एक व्यक्ति ने महात्मा से...
    6 वर्ष पहले

LATEST:


Windows Live Messenger + Facebook