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24 अक्तूबर 2011

DHANTERAS : धनतेरस

मनुष्य के भाग्य और कर्म का बहीखाता

धनतेरस, धनवंतरी त्रयोदशी या धन त्रयोदशी का दीपावली से ठीक पहले मनाया जाना अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह भारतीय त्योहारों को मनाये जाने के पीछे छिपे वैज्ञानिक और सामाजिक कारणों को प्रकट करता है। इस दिन आरोग्य के देवता धनवंतरी, मृत्यु के अधिपति यम, वास्तविक धन सम्पदा की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी तथा वैभव के स्वामी कुबेर की पूजा की जाती है। यह त्योहार मनाया जाना इस बात का संकेत है कि लक्ष्मी के आह्वान के पहले आरोग्य की प्राप्ति और यम को प्रसन्न करने के लिये कर्मों का शुद्धिकरण अत्यंत आवश्यक है। और चूंकि कुबेर भी आसुरी प्रवृत्तियों का हरण करने वाले देव हैं, अत: मां लक्ष्मी के आगमन को सुनिश्चित करने के लिये आरोग्य, कर्म और सात्विक प्रवृतियों में विस्तार निरंतर आवश्यक है।

आचार्य धनवंतरी और मां लक्ष्मी का अवतरण समुद्र मंथन से हुआ था। दोनों ही कलश लेकर अवतरित हुए थे। यह इस बात का संकेत है कि मनुष्य को सदैव अपने कर्मो और दृष्टिकोण को लेकर मंथन करते रहना चाहिए। जब यह मंथन निष्पक्ष और नि:स्वार्थ होगा तो समुद्र मंथन की ही तरह लक्ष्मी और धनवंतरी प्रकट होंगे, जो आरोग्य और वास्तविक समृद्धि का सृजन करेंगे। धनवंतरी और मां लक्ष्मी दोनों ही कलश के साथ प्रगट हुए थे और दोनों ही देवों को प्राप्त हुए। इस घटना से यह स्पष्ट है कि स्वास्थ्य और वास्तविक लक्ष्मी का सान्निध्य सदैव सुकर्मी तथा अच्छे लोगों को प्राप्त होता है।

श्री सूक्त में लक्ष्मी के स्वरूपों का विवरण कुछ इस प्रकार मिलता है। ‘धनमग्नि, धनम वायु, धनम सूर्यो धनम वसु:’ अर्थात प्रकृति ही लक्ष्मी है और प्रकृति की रक्षा करके मनुष्य स्वयं के लिये ही नहीं, अपितु नि:स्वार्थ होकर पूरे समाज के लिये लक्ष्मी का सृजन कर सकता है। श्री सूक्त में आगे यह भी लिखा गया है-‘न क्रोधो न मात्सर्यम न लोभो ना अशुभा मति:’ इससे तात्पर्य यह कि जहां क्रोध और किसी के प्रति द्वेष की भावना होगी, वहां मन की शुभता में कमी आयेगी, जिससे वास्तविक लक्ष्मी की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न होगी। मानसिक विकृतियों से चूंकि व्यक्ति और पूरे समाज को हानि होती है, अत: यह लक्ष्मी की प्राप्ति में बाधक हैं।

अत: हम यह स्पष्ट रूप से महसूस कर सकते हैं कि लक्ष्मी प्रकृति स्वरूपा है, चंद्र, सूर्य की आभा प्रदान करने वाली हैं। अत: लक्ष्मी की वास्तविक परिकल्पना प्रकृति की सुन्दरता को बढ़ा कर ही साकार हो सकती है। इससे आचार्य धनवंतरी के बताये गये मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य सम्बंधी उपायों को हम अपना कर सबल हो सकेंगे।

श्री सूक्त में वर्णन है कि, लक्ष्मी जी भय और शोक से मुक्ति दिलाती हैं तथा धन-धान्य और अन्य सुविधाओं से युक्त करके मनुष्य को निरोगी काया और लम्बी आयु भी देती हैं।

धनवंतरी पूजन से लक्ष्मी जी का आह्वान
कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धनवंतरी का जन्म हुआ था, इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है । धनवंतरी जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। भगवान धनवंतरी चूंकि कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है। अत: कोई भी नया बर्तन अवश्य खरीदें, ऐसा करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं।

इस दिन धनवंतरी जी का पूजन इस तरह करें - 
नवीन झाडू एवं सूपड़ा खरीदकर उनका पूजन करें। सायंकाल दीपक प्रज्ज्वलित कर घर, दुकान आदि को सुसज्जित करें। मंदिर, गौशाला, नदी के घाट, कुओं, तालाब, बगीचों में भी दीपक लगाएं। यथाशक्ति तांबे, पीतल, चांदी के गृह-उपयोगी नवीन बर्तन व आभूषण क्रय करें । हल जुती मिट्टी को दूध में भिगोकर उसमें सेमर की शाखा डालकर तीन बार अपने शरीर पर फेरें। कार्तिक स्नान करके प्रदोष काल में घाट, गौशाला, बावड़ी, कुआं, मंदिर आदि स्थानों पर तीन दिन तक दीपक जलाएं। शुभ मुहूर्त में अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठान में नई गद्दी बिछाएं अथवा पुरानी गद्दी को ही साफ कर पुन: स्थापित करें।

स्पष्ट है कि धनवंतरी जी की पूजा से तात्पर्य आसपास के वातावरण और स्वयं के शरीर की सफाई से है। समूह में दीपक जलाने से तापमान बढ़ता है, जिससे सूक्ष्म कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और प्रकृति स्वरूपा साक्षात् लक्ष्मी के अवतरण का मार्ग प्रशस्त होता है।



आंतरिक ज्ञान जगा कर समृद्धि देते हैं कुबेर

शिवभक्त व समस्त धन सम्पदा के स्वामी कुबेर के लिये भी धनतेरस को सायंकाल के समय तेरह दीप समर्पित किए जाते हैं। कुबेर धन सम्पदा की दिशा उत्तर के लोकपाल हैं। ये भूगर्भ के भी स्वामी हैं। कुबेर की पूजा से मनुष्य की आंतरिक ऊर्जा और ज्ञान जागृत होता है और धन अर्जन का मार्ग सुलभ होता है। निम्न मंत्र द्वारा चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजन करें-
कुबेर मंत्र :
‘यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये
धन-धान्य समृद्धि में देहि दापय स्वाहा ।’

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