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30 नवंबर 2011

Shri Shyam Mandir Ghusuridham, Howrah

श्री श्याम महाकुम्भ मेला 31 दिसंबर से 1 जनवरी 2012 तक शिवम् गार्डेन्स अलीपुर में 

हावड़ा स्थित घुसुड़ीधाम में विराजमान हैं हारे का सहारा बाबा श्याम | जो श्याम प्रेमियों के हर सुख-दुःख के भागीदार बनते हैं | जहाँ वर्ष भर में सैकड़ों पूजा आयोजित होते है | पर सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र होता है फाल्गुन मेला और श्याम प्रभु का जयंती महोत्सव | साथ ही प्रत्येक वर्ष श्रीश्याम महाकुम्भ का आयोजन किया जाता है जिसमें हजारों की संख्या श्यामप्रेमी भक्तजन कार्यक्रम में बाबा का मनोहारी श्रृंगार, भजन कीर्तन एवं श्याम अखंड ज्योति पाठ का आनंद उठाते हैं | इस बार भी यह कार्यक्रम शिवम् गार्डेन्स अलीपुर-कोलकाता में  31  दिसंबर 2011  एवं 1 जनवरी 2012  को आयोजित होने जा रहा है | कार्यक्रम की जानकारी देते हुए नवल सुल्तानिया, बिनोद टिबड़ेवाल, सुरेन्द्र अग्रवाल, वरुण अग्रवाल एवं कपिल अग्रवाल ने संयुक्त बयान में बताया की प्रातः 8 बजे से प्रभु इच्छा तक आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान श्री श्याम अखंड ज्योति पाठ, नृत्य नाटिका, भजन कीर्तन का आयोजन होगा | नृत्य नाटिका पर आधारित श्री श्याम अखंड ज्योति पाठ के प्रधान पाठ वाचक हैं संदीप सुलतानियाँ, नृत्य नाटिका का संचालन करेंगे श्याम अग्रवाल एवं भजनों की रसवर्षा करेंगे पप्पू शर्मा (खाटूवाले), मनोज-अजित, संजय-नवीन, संजय मित्तल  एवं कई भजन मंडलियाँ|  


प्रेम से बोलो- घुसुरी नरेश की- जय
जोर से बोलो- शीश के दानी की- जय
प्यार से बोलो- हारे का सहारा की- जय
हरदम बोलो- जय श्री श्याम- जय घुसुड़ीधाम 

21 नवंबर 2011

SHIRDI SAI KA ORIGINAL PHOTO


शिर्डी के सांई बाबा का असली दुर्लभ फोटो



शिर्डी के सांई बाबा के भक्त दुनियाभर में फैले हैं। उनके फकीर स्वभाव और चमत्कारों की कई कथाएं है। सांई बाबा के भक्तों की संख्या काफी अधिक है। सभी भक्त बाबा के चित्र या मूर्ति अपने घरों में अवश्य ही रखते हैं। यहां देखिए शिर्डी के सांई बाबा का दुर्लभ और असली फोटो। ऐसा माना जाता है कि यह फोटो सांई का ही है।

सांई ने अपना पूरा जीवन जनसेवा में ही व्यतीत किया। वे हर पल दूसरों के दुख दर्द दूर करते रहे। बाबा के जन्म के संबंध में कोई सटीक उल्लेख नहीं मिलता है। सांई के सारे चमत्कारों का रहस्य उनके सिद्धांतों में मिलता है, उन्होंने कुछ ऐसे सूत्र दिए हैं जिन्हें जीवन में उतारकर सफल हुआ जा सकता है। हमें उन सूत्रों को केवल गहराई से समझना होगा।

सांई बाबा के जीवन पर एक नजर डाली जाए तो समझ में आता है कि उनका पूरा जीवन लोककल्याण के लिए समर्पित था। खुद शक्ति सम्पन्न होते हुए भी उन्होंने कभी अपने लिए शक्ति का उपयोग नहीं किया। सभी साधनों को जुटाने की क्षमता होते हुए भी वे हमेशा सादा जीवन जीते रहे और यही शिक्षा उन्होंने संसार को भी दी। सांई बाबा शिर्डी में एक सामान्य इंसान की भांति रहते थे। उनका पूरा जीवन ही हमें हमारे लिए आदर्श है, उनकी शिक्षाएं हमें एक ऐसा जीवन जीने की प्रेरणा देती है जिससे समाज में एकरूपता और शांति प्राप्त हो सकती है।

19 नवंबर 2011

Shirdi Wale Sai Baba


मनोरथ सिद्ध करते हैं 
शिरडी के सांई बाबा



सांई बाबा जगतगुरु कहलाते हैं। हिन्दू धर्म मान्यताओं में सांई बाबा को महायोगी भगवान दत्तात्रेय का अवतार भी माना जाता है। दत्तात्रेय भक्ति की तरह ही सांई भक्ति और नाम स्मरण जीवन पर मण्डराएं संकट का फौरन अंत करने वाले और मनोरथ को सिद्ध करने वाले माने गए हैं। 

साईं बाबा (28 सितंबर, 1835– 15 अक्तूबर, 1918), एक भारतीय संत एवं गुरू हैं जिनका जीवन शिरडी में बीता। साईं बाबा ने कई लोक कल्याणकारी कार्यों को किया तथा जनता में भक्ति एवं धर्म की धारा बहाई। इनके अनुयायी भारत के सभी प्रांतों में हैं एवं इनकी मृत्यु के लगभग 90 वर्षों के बाद आज भी इनके चमत्कारों को सुना जाता है।

गुरुवार का दिन सांई बाबा की पूजा व स्मरण का विशेष व शुभ दिन माना जाता है। धार्मिक आस्था कहती है कि सांई बाबा का किसी भी रूप में स्मरण मंगलकारी ही है। किंतु हर भक्त का भी यह कर्तव्य बनता है कि सांई बाबा की बताई तीन बातों को हमेशा जेहन में रखें। अन्यथा सांई भक्ति की सार्थकता कहीं खो जाएगी। क्या है वे तीन बातें? जानते हैं -

श्रद्धा - सांई का यह सूत्र मात्र धार्मिक अर्थों में नहीं बल्कि व्यावहारिक रूप से भी अहम है। श्रद्धा के पीछे यही संदेश है कि जीवन में आप जिस भी रिश्ते या काम से जुड़ें उसके प्रति समर्पण, निष्ठा और ईमान के साथ-साथ त्याग भाव रखें।

सबूरी - सांई का एक ओर सूत्र जीवन में सुखी रहने का श्रेष्ठ उपाय है। यह है - सबूरी। इसके पीछे भाव यही है कि संतोष, धैर्य या संयम द्वारा जीवन में स्थिरता और आनंद लाएं। असंतोष या असंयम बैचेनी, कलह या संताप का ही कारण बनते हैं।

एकता - सांई बाबा का यह सूत्र बताता है कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है। धर्म की कट्टरता व संकीर्णता से बचकर हर धर्म का सम्मान व अलग-अलग ईश्वर के रूपों को एक मानकर दर्शन और विश्वास प्रेम, परोपकार, दया, त्याग जैसी धर्म भावों को बनाए रखता है। सांई बाबा ने इसी भावना को 'सबका मालिक एक' बोलकर एक सूत्र में पिरोया।

साईं का सन्देश :

सबका मालिक एकसाई बाबा की सबसे बडी शिक्षा और सन्देश है कि जाति, धर्म्, समुदाय, आदि व्यर्थ की बातो मे ना पड कर आपसी मतभेद भुलाकर आपस मे प्रेम और सदभावाना से रहना चाहिए क्योकि सबका मलिक एक है।श्रद्धा और सबूरीसाई बाबा ने अपने जीवन मे यह सन्देश दिया है कि हमेशा श्रद्धा और विश्वास के साथ जीवन यापन करते हुए सबूरी (सब्र)के साथ जीवन व्यतीत करे।

मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है
साई बाबा ने कभी भी किसी को धर्म की अवहेलना नही की अपितु सभी धर्मों का सम्मान करने की सलाह देते हुए हमेशा मनवता को ही सबसे बडा धर्म और कर्म बताते हुए जीवन जीने की अमूल्य शिक्षा प्रदान की है।

जातिगत भेद भुला कर प्रेम पूर्वक रहना
साई बाबा ने कहा है की जाति,समाज,भेद-भाव,आदि सब बाते ईश्वर ने नही बल्कि इंसानों द्वारा बनाया गया है इसलिए ईश्वर की नजर मे न तो कोई उच्च है और न ही कोई निम्न इसलिए जो काम ईश्वर को भी पसद नही है वह मनुष्य को तो करना ही नही चाहिए अर्थात जात-पात,धर्म,समाज आदि मिथ्या बातों में न पड़ कर आपस मे प्रेमपूर्वक रहकर जीवन व्यतीत करना चाहिए।

गरीबो और लाचार की मदद करना सबसे बड़ी पूजा है
साई बाबा ने हमेशा ही सभी जनमानस से यही बार-बार कहा है कि सभी के साथ ही समानता का व्यवहार करना चाहिए। गरीबों और लाचारों की यथासम्भव मदद करना चाहिए और यही सबसे बडी पूजा है। क्योकि जो गरीबों, लाचारों की मदद करता है ईश्वर उसकी मदद करता है।

माता-पिता, बुजुर्गो, गुरुजनों, बडो का सम्मान करना चाहिए
साई बाबा हमेशा ही समझाते थे कि अपने से बडो का आदर सम्मान करना चाहिए। गुरुजनो बुजर्गो को सम्मान करना जिसस उनका आर्शीवाद प्राप्त होता है जिससे हमारे जिवन की मुश्किलों मे सहायता मिलती है।

क्या-क्या देखें : 

शिरडी ही साई बाबा है और साई बाबा ही शिरडी,एक दूसरे का प्रत्यक्ष पर्यायवाची होने के साथ-साथ यह आध्यामिक भी है। यहां स्थित सभी उद्यम,रेस्तरां,शोरूम,स्कूल,कॉलेज और होटल शहर के 10 किलोमीटर के दायर में ही है। इन सबके साथ साई का नाम जुड़ा हुआ है। साई शब्द के उच्चारण से आशा और आदर का भाव उत्पन्न होता है।

परिसर में बाबा का म्यूज़ियम  है जहाँ साईं बाबा का कुरता, चिलम, उनका भिक्षा लेने कापात्र, पालकी, जिसमे बाबा ने खिचडी बनाई थी वो ताम्बे की हंडी, बाबा का नहाने का पत्थर और बहुत सी चीजे हैं. इसी परिसर में बाबा का लेंडी बैग भी है जहाँ बाबा पेड़-पौधों में पानी लगते थे. यहाँ वो कुआँ भी है जिसमे से बाबा पानी भरते थे.

इसके आलावा यहाँ श्रधालुओं के लिए रेलवे आरक्षण, रक्तदान, चिकित्सालय, बैंक ATM भी है. आपको एक खास बात बता दूं की इस परिसर में कैमरा या मोबाइल ले जाना सख्त माना है. इसलिए आप कैमरा या मोबाइल अपने होटल में ही छोड़ कर जाएँ. 

भारत के किसी भी कोने से आप शिरडी आराम से पहुँच सकते हैं...

साईं की चर्चित भजन 

शिरडी वाले सांई बाबा आया है तेरे दर पे सवाली

जमाने ने कहा टूटी हुई तश्वीर बनती है,
तेरे दरबार में बिगड़ी हुई तक्दीर बनती है ।

तारीफ तेरी निकली है दिल से,
आयी है लव बनके कवाली
शिरडी वाले सांई बाबा
आया है तेरे दर पे सवाली ।

शिरडी वाले सांई बाबा
आया है तेरे दर पे सवाली ।

लव पे दुआएँ आँखो में आंसू
दिल में उम्मीदें पर झोली खाली
शिरडी वाले सांई बाबा
आया है तेरे दर पे सवाली ।

दर पे सवाली आया दर पे सवाली,
शिरडी वाले सांई बाबा
आया है तेरे दर पे सवाली ।

ओ मेरे सांई देवा तेरे सब नाम लेवा ।
ओ मेरे सांई देवा तेरे सब नाम लेवा ।

खुदा इनसान सारे सभी, तुझको हैं प्यारे,
सुने फरियाद सबकी, तुझे है याद सबकी,
बड़ा या कोई छोटा, नहीं मायूस लूटा,
अमीरों का सहारा, गरीबों का गुजारा,
तेरी रहमत का किस्सा ब्यान अकबर करे क्या,
दो दिन की दुनिया, दुनिया है गुलशन,
सब फूल कांटे, तू सब का माली,
शिरडी वाले सांई बाबा
आया है तेरे दर पे सवाली ।

खुदा की शान तुझमें,
दिखें भगवान तुझमें--------2


तुझे सब मानते है,
तेरा घर जानते है,
चले आते है दौड़े,
जो खुश किस्मत है थोड़े,
ये हर राही की मन्जिल,
ये हर कश्ती का साहिल,
जिसे सब ने निकाला,
उसे तूने सम्भाला,

जिसे सबने निकाला, उसे तूने सम्भाला.......

तू बिछड़ों को मिलाये,
बुझे दीपक जलाये---------2


ये गम की रातें, रातें ये काली,
इनको बनादे ईद और दीवाली

शिरडी वाले सांई बाबा
आया है तेरे दर पे सवाली ।

लव पे दुआएँ आँखो में आंसू
दिल में उम्मीदें पर झोली खाली

शिरडी वाले सांई बाबा
आया है तेरे दर पे सवाली--------४


15 नवंबर 2011

FURSAT KE PAL: Goddess of music Lata Mangeshkar

FURSAT KE PAL: Goddess of music Lata Mangeshkar: माता सरस्वती जिनके कंठ में बस्ती हैं..... संक्षिप्त परिचय : लता मंगेशकर लता का परिवार लता मंगेशकर का जन्म इंदौर, मध्यप्रदेश में सितम्ब...

14 नवंबर 2011

Shri Swaminarayan Mandir London, Britain


Shri Swaminarayan Mandir London



Shri Swaminarayan Mandir, Neasden (also commonly known as the Neasden Temple), is a Hindu temple in the London Borough of Brent in northwest London. Built entirely using traditional methods and materials, Neasden’s Swaminarayan Mandir is Britain’s first authentic Hindu temple. It was also Europe’s first traditional Hindu stone temple, as distinct from converted secular buildings. It is a part of the Bochasanwasi Shri Akshar Purushottam Swaminarayan Sanstha (BAPS) organization and was inaugurated on August 20, 1995 by Pramukh Swami Maharaj.

The Mandir was cited in Guinness World Records 2000, as follows:
“ Biggest Hindu Temple outside India: The Shri Swaminarayan Temple in Neasden, London, UK, is the largest Hindu temple outside India. It was built by His Holiness Pramukh Swami Maharaj, a 79-year-old Indian sadhu (holy man), and is made of 2,828 tonnes of Bulgarian limestone and 2,000 tonnes of Italian marble, which was first shipped to India to be carved by a team of 1,526 sculptors. The temple cost £12 million to build. ”


The Mandir was built and funded entirely by the Hindu community. The entire project spanned 5 years although the Mandir construction itself was completed in two and a half years. Building work began in August 1992. On 24 November 1992, the temple recorded the biggest-ever concrete-pour in the UK, when 4,500 tons was put down in 24 hours to create a foundation mat 6 ft (1.8m) thick. The first stone was laid in June 1993; two years later, the building was complete.

Angkor Wat in Cambodia is larger, but is no longer used as a Hindu temple.

The Neasden Temple complex consists of:
A traditional Hindu temple (mandir), constructed mainly from hand-carved ItalianCarrara marble and Bulgarian limestone. The temple is the focal point of the complex
A permanent exhibition entitled ‘Understanding Hinduism’
A cultural centre, known as the BAPS Shri Swaminarayan Haveli, designed in traditional Gujarati haveli architecture, housing an assembly hall, gymnasium, bookshop, and offices.

The Mandir


The Mandir is the focal point of the complex. Designed according to the Shilpa-Shastras, a Vedic text that develops Hindu architecture to metaphorically represent the different attributes of God, it was constructed almost entirely from Indian marble, Italian marble, Sardinian granite and Bulgarian limestone. No iron or steel was used in the construction, a unique feature for a modern building in the UK.

From the conceptual design and vision of His Holiness Pramukh Swami Maharaj, the architect C. B. Sompura and his team created the mandir entirely from stone. It is ashikharbaddha (or pinnacled) mandir: seven tiered pinnacles topped by golden spires crowd the roofline, complemented by five ribbed domes. The temple is noted for is its profusely carved cantilevered central dome, believed to be the only one in Britain that does not use steel or lead. Inside, serpentine ribbons of stone link the columns into arches, creating a sense of levitation.

Light cream Vartza limestone from Bulgaria was chosen for the exterior, and for the interior, Italian Carrara marble supplemented by Indian Ambaji marble. The Bulgarian and Italian stone were shipped to the port of Kandla in Gujarat, where most of the carving was eventually completed, by over 1,500 craftsmen in a workshop specially set up for the project. More than 26,300 individually numbered stones pieces which were shipped back to London, and the building was assembled like a giant three-dimensional jigsaw.

The Mandir was inaugurated on 20 August 1995 by Pramukh Swami Maharaj, the spiritual leader of BAPS – the organisation behind the temple.

The entire Mandir complex represents an act of faith and collective effort. Inspired by Pramukh Swami Maharaj, more than 1,000 volunteers worked on the building, and many more contributed and solicited donations, or organised sponsored walks and other activities; children raised money by collecting aluminium cans and foil for recycling.

The Mandir serves as the centre of worship. Directly beneath each of the seven pinnacles seen from the outside is a shrine. Each of these seven shrines houses murtis (sacred images of the Deities) within altars. Each murti is revered like God in person and devoutly attended to each day by the sadhus (monks) who live in the temple ashram.

Beneath the Mandir is the permanent exhibition ‘Understanding Hinduism’. Through 3-D dioramas, paintings, tableaux and traditional craftwork, it provides an insight into the wisdom and values of Hinduism. Visitors can learn about the origin, beliefs and contribution of Hindu seers, and how this ancient religion is being practiced today through traditions such as the BAPS Swaminarayan Sampraday.

The Mandir is open to people of all faiths and none. Entrance is free, except to the ‘Understanding Hinduism’ exhibition where there is a £2 fee.

The Haveli

Haveli

Carvings on the Haveli

Adjoining the Mandir is BAPS Shri Swaminarayan Haveli, a multi-function cultural centre. Whereas the Mandir is carved from stone, the Haveli uses wood: English Oak and Burmese Teak have been fashioned into panels, arches and screens, all carved by craftsmen in India with a cornucopia of geometric patterns, stylised animal heads and flower garlands.

The Burmese teak used was harvested from sustainable forests. To compensate for the 226 English oak trees used, over 2,300 English oak saplings were planted in Devon. The Haveli also incorporates energy-saving features such as light-wells.

Richly carved haveli (courtyard house)-style woodwork from Gujarat is the most striking characteristic of the building’s façade and foyer.[1] It has been designed according to traditional Indian haveli architecture, to evoke feelings of being in Gujarat, India, where such havelis were once commonplace. It required over 150 craftsmen from all over India three years to carve 17,000 square feet (1,600 m2) of wood. Behind the traditional wooden façade, the cultural centre houses a vast pillarless prayer hall with space for 3,000 people, a gymnasium, medical centre, dining facilities, bookstall, conference facilities, and offices.

History
BAPS Shri Swaminarayan Mandir, LondonJune 1970:
The first BAPS Swaminarayan Mandir in the UK was
opened in a converted disused church in Islington,
North London, by Yogiji Maharaj
1982: Having outgrown the temple, the congregation moved from the Islington temple to a small, former warehouse in Neasden.
1990: BAPS was again in search of a building that could cope with the growing congregation, and plans for the present temple were made.
1995: They moved to their present temple, built on the site of a disused truck warehouse opposite the previous temple. The old temple building was retained and converted into Shayona, an Indian grocery shop and vegetarian restaurant.

The Mandir and Haveli were built and funded entirely by the Hindu Community and the entire project spanned five years although the construction itself was completed in two-and-a-half years. Building work began in August 1992. On 24 November 1992, the temple recorded the biggest-ever concrete-pour in the UK, when 4,500 tons were laid in 24 hours to create a foundation mat 6 ft (1.8m) thick. The first stone was laid in June 1993; two years later, the building was complete.

Shayona

The Shayona restaurant offers vegetarian curries, snacks, and a wide range of breads, salads, chutneys and yogurts. Shayona has enhanced these traditional items to bring an authentic taste of India to visitors of the Mandir, and also catering for private events.

Akshar IT Centre
Adjacent to the Shayona restaurant is the Akshar IT Centre, an adult learning centre providing government-accredited IT course to the public.
The Swaminarayan School
Main article: The Swaminarayan School

Opposite the Mandir is The Swaminarayan School, Europe’s first independent Hindu school. Founded in 1992 by Pramukh Swami Maharaj, it follows the National Curriculum while promoting aspects of Hinduism and Hindu culture, such as dance, music and language. The school was formerly known as Sladebrook High School which closed down in 1990.

The 2007 GCSE results placed the school fourth among all independent schools in the country.

Daily rituals

Before sunrise, the Murtis which are adorned in their night attire are woken by the sadhus and the shrine doors are opened for the MangalaAarti, which is the first of five Aarti rituals offered during the day. Aarti is a ritual wherein a specific prayer is recited to a poetic format with music while the sadhus wave a lighted lamp in front of the murtis. The sadhus recite some shlokas (prayers), serve the deities, offer them food and bathe them, and close the shrine doors.

The shrines are opened again for the second arti (Shangar Arti). The shrines remain open from 9:00am to approximately 11:00am, when the shrines are closed and offered thal (food for lunch). At 11.45am, the shrines are opened for the midday arti (Rajbhog Arti), and the thal (offering hymn) is recited before the Deities. The shrines are closed after this to allow the Deities to rest during the afternoon.

The shrines re-open at 4:00pm (3:30pm on weekends) until 6:30pm for darshan. The Sandhya Arti (sunset arti) follows at 7:00 pm. Thereafter, a selection of prayers are recited by the devotees including dhun (where the names of God are chanted and verses of praise are sung). The shrines are closed again for approximately one hour so they can be offered their final meal by the sadhus (monks).

The Deities are then prepared for the night and adorned in their evening attire by the sadhus. The shrines are opened a final time for the Shayan Arti (nighttime arti), with the lights dimmed and music lowered. The devotees recite a few hymns, gently sending the Deities to sleep, before the shrines are finally closed for the night.
Awards and recognition


Pride of Place Award

The Mandir was awarded the ‘UK Pride of Place’ award in December 2007 by Government authorities after a nationwide online poll. After weeks of voting, the Mandir registered the largest number of votes across the country as well as in London, with an overwhelming 81% of votes from the London Borough of Brent.

Seven wonders of London

Time Out, the highly respected international city-guide publishers, declared the Mandir as one of the "Seven Wonders of London". In an "epic series... to pay tribute to... the capital’s seven most iconic buildings and landmarks", they embarked upon an ambitious search of London’s best. The Mandir featured among the choice seven.

Guinness World Records

In 2000, Guinness World Records presented two certificates to recognise the world record of offering 1,247 vegetarian dishes during the Annakut Festival held at the Shri Swaminarayan Mandir, London on 27 October 2000, and secondly to recognise the largest traditionally built Hindu temple outside India.

The Eventful 20th Century – 70 Wonders of the Modern World

This prestigious Reader’s Digest publication (1998) prominently features the Shri Swaminarayan Mandir, London, lauding its scale, intricate detail and the extraordinary story of how it was built and inspired by Pramukh Swami Maharaj.

Royal Commission on the Historical Monuments of England

In the 1997/8 Annual Report of the Royal Commission on the Historical Monuments of England, the Mandir is featured, and is referred to as a "modern building of major importance in our multicultural society."

Most Enterprising Building Award
The Most Enterprising Building Award 1996 was awarded by the Royal Fine Art Commission & British Sky Broadcasting to the Swaminarayan Mandir in London on 5 June 1996.

Natural Stone Award

The Stone Federation issued a special award to the Swaminarayan Hindu Mandir in 1995 as part of its Natural Stone Awards.

12 नवंबर 2011

मेहंदीपुर बाला जी का पंचम वार्षिकोत्सव 18 दिसंबर को


बालाजी कोलकाता में पधारेंगे  
बाबा श्याम और दादी जी के साथ

कोलकाता I प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी श्री बालाजी जागरण मंडल, कोलकाता द्वारा बंगाल हाल, सिटी सेण्टर, साल्टलेक में रविवार 18  दिसंबर को प्रातः 8 बजे से रात्रि 9 बजे तक धूम-धाम से मनाया जायेगा I इस बात की जानकारी मंडल के सस्थापक श्री मुरारीलाल तोदी ने दी. कार्यक्रम के दौरान श्री विजय सोनी सहित सुश्री सोनू-मोनू सुन्दरकाण्ड का पथ वचन करेंगे एवं भजनों पर आधारित नृत्य नाटिकाएं भी प्रस्तुत की जाएगी. इस अवसर पर बीकानेर से प्रवेश शर्मा, हरियाणा से मोना मेहता, संजय-नविन एवं लता सिंह जैसे सुप्रसिद्ध भजन गायक एवं विख्यात भजन मंडलियाँ श्री बालाजी के दरबार में भजनों की अमृत वर्षा करेंगे और उद्घोषक के रूप में श्री महेश कौशिक उपस्थित रहेंगे. श्री तोदी ने आगे बताया की प्रभु के मनभावन श्रृंगार, जीवंत झांकी, छप्पन भोग एवं भंडारा के साथ ही मेंहदीपुर बालाजी से अभिमंत्रित ताबीज़ एवं दुर्लभ सिंदूरी चोला भक्तों के मध्य निःशुल्क वितरण किये जायेंगे. संस्थापक मुरारीलाल जी के अनुसार मंडल के कार्यकर्त्ता सर्वश्री संदीप गर्ग, महेश तोदी, सुनील गुप्ता, सुरेन्द्र चमडिया, पवन अग्रवाल, राजू अग्रवाल, राजेंद्र अग्रवाल, विजय मुधाड़ा, संजय अग्रवाल (मोल्हर) एवं सुशिल बजाज कार्यक्रम को सफल बनाने में मुख्यरूप से सक्रिय हैं.

11 नवंबर 2011

FURSAT KE PAL: चुटकुले जरा हट के

FURSAT KE PAL: चुटकुले जरा हट के: बारिश की एक बूंद – आपको खुशी दे … दो बूंद – हंसी दे … तीन बूंद – तंदुरुस्ती दे … चार बूंद – कामयाबी दे … पांच बूंद – … … बस कर यार वरना सर्...

FURSAT KE PAL: सुखी वैवाहिक जीवन का राज़

FURSAT KE PAL: सुखी वैवाहिक जीवन का राज़: संता ने एक बेहद खूबसूरत और सेक्सी महिला को देखकर क्या सोचा होगा ? ….. … … सोचो ….. ? … सोचो …. ? … … यही कि … काश ! ये मेरी माँ होती तो मैं...

Geeta Jayanti or Mokshda Ekadashi

मोक्षदा एकादशी एवं गीता जयंती का महत्व
भगवान श्रीकृष्ण ने दिया गीता का उपदेश





ब्रह्मपुराण के अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का बहुत बड़ा महत्व है। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन अर्जुन को भगवद् गीता का उपदेश दिया था। इसीलिए यह तिथि गीता जयंती के नाम से भी प्रसिद्ध है। इसके बारे में गया है कि शुद्धा, विद्धा और नियम आदि का निर्णय यथापूर्व करने के अनन्तर मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी को मध्याह्न में जौ और मूँग की रोटी दाल का एक बार भोजन करके द्वादशी को प्रातः स्नानादि करके उपवास रखें।

भगवान का पूजन करें और रात्रि में जागरण करके द्वादशी को एक बार भोजन करके पारण करें। यह एकादशी मोह का क्षय करनेवाली है। इस कारण इसका नाम मोक्षदा रखा गया है। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण मार्गशीर्ष में आने वाली इस मोक्षदा एकादशी के कारण ही कहते हैं मैं महीनों में मार्गशीर्ष का महीना हूँ। इसके पीछे मूल भाव यह है कि मोक्षदा एकादशी के दिन मानवता को नई दिशा देने वाली गीता का उपदेश हुआ था।

भगवद्‍ गीता के पठन-पाठन श्रवण एवं मनन-चिंतन से जीवन में श्रेष्ठता के भाव आते हैं। गीता केवल लाल कपड़े में बाँधकर घर में रखने के लिए नहीं बल्कि उसे पढ़कर संदेशों को आत्मसात करने के लिए है। गीता का चिंतन अज्ञानता के आचरण को हटाकर आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्त करता है। गीता भगवान की श्वास और भक्तों का विश्वास है।

गीता ज्ञान का अद्भुत भंडार है। हम सब हर काम में तुरंत नतीजा चाहते हैं लेकिन भगवान ने कहा है कि धैर्य के बिना अज्ञान, दुख, मोह, क्रोध, काम और लोभ से निवृत्ति नहीं मिलेगी।

मंगलमय जीवन का ग्रंथ है गीता। गीता केवल ग्रंथ नहीं, कलियुग के पापों का क्षय करने का अद्भुत और अनुपम माध्यम है। जिसके जीवन में गीता का ज्ञान नहीं वह पशु से भी बदतर होता है। भक्ति बाल्यकाल से शुरू होना चाहिए। अंतिम समय में तो भगवान का नाम लेना भी कठिन हो जाता है।

दुर्लभ मनुष्य जीवन हमें केवल भोग विलास के लिए नहीं मिला है, इसका कुछ अंश भक्ति और सेवा में भी लगाना चाहिए। गीता भक्तों के प्रति भगवान द्वारा प्रेम में गाया हुआ गीत है। अध्यात्म और धर्म की शुरुआत सत्य, दया और प्रेम के साथ ही संभव है। ये तीनों गुण होने पर ही धर्म फलेगा और फूलेगा।

गीता मंगलमय जीवन का ग्रंथ है। गीता मरना सिखाती है, जीवन को तो धन्य बनाती ही है। गीता केवल धर्म ग्रंथ ही नहीं यह एक अनुपम जीवन ग्रंथ है। जीवन उत्थान के लिए इसका स्वाध्याय हर व्यक्ति को करना चाहिए। गीता एक दिव्य ग्रंथ है। यह हमें पलायन से पुरुषार्थ की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देती है।

10 नवंबर 2011

FURSAT KE PAL: SHIVKHORI : Bholeshakar ne JahanTap ki thi

FURSAT KE PAL: SHIVKHORI : Bholeshakar ne JahanTap ki thi: Baba Bholenath in Shivkhori शिव खोड़ी: महादेव की तपोभूमि Shivkhri Baba Bholenath ke darshan ke liye isi Gufa se jaya jata hai... ...

Loyang Capital of God of China

चीन के देवता की राजधानी है लोयांग


चीन में यह प्रचलित है कि यदि आप चीन के उत्थान और पतन की दास्तान से रूबरू होना चाहते हैं तो एक बार लोयांग शहर का रुख अवश्य कीजिए। चीन के हनान प्रांत के पश्चिमी हिस्से और पीली नदी के दक्षिणी तट पर बसे इस शहर की स्थापना ईसापूर्व 12 वीं सदी में हुई थी और यह चीन की आठ बड़ी प्रचीन राजधानियों में से एक है।

चीनी इतिहास का यह इकलौता ऐसा शहर है जिसे देवता की राजधानी के नाम से अभिहित किया गया है। लोयांग 13 राजवंशों की राजधानी रहा है यानी इस शहर को 1500 साल तक राजधानी होने का गौरव मिला है। लोयांग चीनी सभ्यता के अहम जन्मस्थानों में से एक रहा है। यहीं पर माओवाद और कंफ्यूशियसवाद का जन्म हुआ।

यह शहर चीन के शीर्ष पर्यटनस्थलों में से है जहां के चप्पे-चप्पे पर सांस्कृतिक धरोहरें बिखरी पड़ी हैं। गौरतलब है कि चाइना रेडियो इंटरनेशनल की हिंदी सेवा द्वारा चीन के आकर्षक शहरों को चुनने के लिए लिए चल रही ऑनलाइन प्रतियोगिता में लोयांग भी शामिल है। इस प्रतियोगिता में अपनी पसंद के सबसे आकर्षक चीनी शहरों के लिए दुनिया भर के नेटिजन सीआरआई द्वारा आयोजित इस प्रतियोगिता में ऑनलाइन मतदान में हिस्सा ले रहे हैं।


यहां मौजूद प्राचीन राजधानी के अवशेष, मंदिर, गुफाएं, मकबरे इसकी सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध बनाते हैं। लुंगमन गुफा यहां मौजूद धरोहरों में सबसे खास है। इस गुफा स्थल को पहले 'यी नदी का द्वार' कहा जाता था। बाद में इसे लुगमन या ड्रैगन द्वार कहा जाने लगा।

इस शहर में सिर्फ चाइना भगवान् ही नहीं रहते हैं यहाँ भारतीय भगवन भी दर्शन करने को मिल जाते हैं....


Sri Maha Ganapathi shrine at
Loyang Tua Pek Kong temple


इस मंदिर में यहाँ लोयांग में भारतीय भगवान् भी देखने को मिलते हैं

इन बौद्ध गुफाओं पर कारीगरों ने उस समय काम करना शुरू किया जब उत्तरी वेइ के सम्राट ने दातोंग की जगह लोयांग को अपनी राजधानी बनाया। यहां मौजूद कारीगरी दातोंग की कारीगरी का ही विस्तार है। लुंगमेन में काम सात राजवंशों के कार्यकाल तक चला। यहां 1300 से ज्यादा गुफाएं, 40 छोटे पगोड़ा और करीब 100,000 बौद्ध प्रतिमाएं हैं जिनका ऊंचाई एक इंच से लेकर 57 फुट तक है। इन्हें चीन में बौद्ध संस्कृति की उत्कृष्ट धरोहर माना जाता है।


पईमा मंदिर चीन का प्रथम सरकारी बौद्ध मठ है जिसका निर्माण वहां बौद्ध धर्म की शुरुआत के बाद आधिकारिक तौर पर किया गया। इस शहर में रंग-बिरंगे पीयोनी या चंद्रपुष्प खिलते हैं और इसे पुष्प का साम्राज्य भी कहा जाता है। यह पुष्प शांति और समृद्धि के प्रतीक हैं। हर साल जब 15 अप्रैल से आठ मई तक चंद्रपुष्पों के पुष्पित-पल्लिवत होने का मौसम चरम पर होता है तो शहर में चंद्रपुष्प मेले का आयोजन होता है। विश्वप्रसिद्ध रेशम मार्ग यहीं से होकर गुजरता था।


फ़िलहाल चीन इंडिया के लिए कदम-कदम पर मुसीबतें खड़ी कर रहा है.. और भारत के जमीन हथिया रहा है साथ ही अरुणाचल में दखलंदाज़ी कर रहा है. सिर्फ यही नहीं पाकिस्तान के साथ मिलकर हमारे देश में फिजूल की गतिविधियाँ को बढ़ावा दे रहा है और   भारत के साथ लगे सीमा पर भारत को डराने के लिए अपने सैनिकों और हथियारों का जखीरा जमा कर रहा है...

Loyang Tua Pek Kong Temple

The Loyang Tua Pek Kong Temple, off Loyang Way, was established in the 1980s. The temple owes its existence to a group of friends, who on finding figurines of different religions abandoned on a beach, brought them together and housed them under a unique mixed-religion temple. The Loyang Tua Pek Kong Temple has Buddhist, Hindu and Taoist deities and a Muslim Kramat (shrine) within its premises.

Description
In the 1980s a group of fishing buddies, including Paul Tan and Huang Zhong Ting, stumbled across Buddhist, Hindu and Taoist statues strewn across the beach at the end of the Loyang Industrial Area. They built a small hut made of bricks and zinc sheets to house the figurines. This humble construction served as a makeshift temple. It also included a Kramat to honour a holy Muslim man. It is believed that a sign was received by some people to build the holy kramat here. Soon, scores of people, mainly those working in the Loyang Industrial Area, were visiting the temple. Miraculous powers were attributed to the temple as devotees claimed that their prayers for prosperity and wealth were never denied. Unfortunately however, in 1996, the hut was razed to the ground by a fire. The Taoist statue of Tua Pek Kong, the God of Prosperity, was the only one that survived and escaped from the fire unscathed. New premises to house the deities and the kramat had to be built. Through public donations that poured in, a new temple complex was built over a 1,400 sq m area at the same site. The temple was named after the Prosperity God, Tua Pek Kong the statue which miraculously escaped from the fire.

The temple is still run by public donations. The number of visitors to the temple is around 20,000 per month despite the fact that bus services are limited to weekdays and the last bus stop is a half an hour walk away. The temple still accepts statues of deities and any devotee can adopt or take a figurine of a deity for free after offering a prayer. The temple complex is open 24 hours a day and it has become a tourist attraction in the recent years. One of the temple's claims to fame is the presence of a 2 m tall statue of the Hindu God Ganesha, which is said to be the tallest Ganesha statue in any temple in India or Singapore. Another attraction here is the lighting of strings of non-hazardous firecrackers.

In June 2003 the lease on the land on which the temple is situated expired. The temple authorities therefore procured a new site close to the present temple. A new temple is expected to be constructed at this new site in a few years' time. Until then, the temple is expected to remain at its current location with a lease extension being granted for the land on which it is situated.

09 नवंबर 2011

FURSAT KE PAL: आदमी कभी बूढ़ा नहीं होता!

FURSAT KE PAL: आदमी कभी बूढ़ा नहीं होता!: AADMI OR GHODA KABHI BUDHA NAHI HOTA डोमिनिक स्ट्रॉस कान, सिल्वियो बर्लुस्कोनी, निकोला सर्कोजी और ब्लादीमिर पुतिन... आपने कभी सोचा है ...

FURSAT KE PAL: प्यार में इकरार और इजहार दोनों जरूरी

FURSAT KE PAL: प्यार में इकरार और इजहार दोनों जरूरी: प्यार में उठो, गिरो नहीं उम्र जैसे ही बचपन का चोला छोड़कर जवानी की दहलीज पर कदम रखती है, दुनिया की हर चीज बदलकर खूबसूरत नजर आने लगत...

08 नवंबर 2011

Vastushastra in your Life

दिशाओं में छुपी है सुखी होने का राज



दिशाओं के ज्ञान को ही वास्तु कहते हैं। यह एक ऐसी पद्धति का नाम है, जिसमें दिशाओं को ध्यान में रखकर भवन निर्माण व उसका इंटीरियर डेकोरेशन किया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि वास्तु के अनुसार भवन निर्माण करने पर घर-परिवार में खुशहाली आती है।

वास्तु में दिशाओं का बड़ा महत्व है। अगर आपके घर में गलत दिशा में कोई निर्माण होगा, तो उससे आपके परिवार को किसी न किसी तरह की हानि होगी, ऐसा वास्तु के अनुसार माना जाता है। वास्तु में आठ महत्वपूर्ण दिशाएँ होती हैं, भवन निर्माण करते समय जिन्हें ध्यान में रखना नितांत आवश्यक है। ये दिशाएँ पंचतत्वों की होती हैं।

किस दिशा का क्या है महत्व :-

उत्तर दिशा :- इस दिशा में घर के सबसे ज्यादा खिड़की और दरवाजे होना चाहिए। घर की बालकनी व वॉश बेसिन भी इसी दिशा में होना चाहिए। इस दिशा में यदि वास्तुदोष होने पर धन की हानि व करियर में बाधाएँ आती हैं। इस दिशा की भूमि का ऊँचा होना वास्तु में अच्छा माना जाता है।

दक्षिण दिशा :- इस दिशा की भूमि भी तुलनात्मक रूप से ऊँची होना चाहिए। इस दिशा की भूमि पर भार रखने से गृहस्वामी सुखी, समृद्ध व निरोगी होता है। धन को भी इसी दिशा में रखने पर उसमें बढ़ोतरी होती है। दक्षिण दिशा में किसी भी प्रकार का खुलापन, शौचालय आदि नहीं होना चाहिए।

पूर्व दिशा :- पूर्व दिशा सूर्योदय की दिशा है। इस दिशा से सकारात्मक व ऊर्जावान किरणें हमारे घर में प्रवेश करती हैं। गृहस्वामी की लंबी उम्र व संतान सुख के लिए घर के प्रवेश द्वार व खिड़की का इस दिशा में होना शुभ माना जाता है। बच्चों को भी इसी दिशा की ओर मुख करके पढ़ना चाहिए। इस दिशा में दरवाजे पर मंगलकारी तोरण लगाना शुभ होता है।

पश्चिम दिशा :- इस दिशा की भूमि का तुलनात्मक रूप से ऊँचा होना आपकी सफलता व कीर्ति के लिए शुभ संकेत है। आपका रसोईघर व टॉयलेट इस दिशा में होना चाहिए।

उत्तर-पूर्व दिशा :- ‘ईशान दिशा’ के नाम से जानी जाने वाली यह दिशा ‘जल’ की दिशा होती है। इस दिशा में बोरिंग, स्वीमिंग पूल, पूजास्थल आदि होना चाहिए। घर के मुख्य द्वार का इस दिशा में होना वास्तु की दृष्टि से बेहद शुभ माना जाता है।

उत्तर-पश्चिम दिशा :- इसे ‘वायव्य दिशा’ भी कहते हैं। यदि आपके घर में नौकर है तो उसका कमरा भी इसी दिशा में होना चाहिए। इस दिशा में आपका बेडरूम, गैरेज, गौशाला आदि होना चाहिए।

दक्षिण-पूर्व दिशा :- यह ‘अग्नि’ की दिशा है इसलिए इसे आग्नेय दिशा भी कहते हैं। इस दिशा में गैस, बॉयलर, ट्रांसफॉर्मर आदि होना चाहिए।

दक्षिण-पश्चिम दिशा :- इस दिशा को ‘नैऋत्य दिशा’ भी कहते हैं। इस दिशा में खुलापन अर्थात खिड़की, दरवाजे बिल्कुल ही नहीं होना चाहिए। गृहस्वामी का कमरा इस दिशा में होना चाहिए। कैश काउंटर, मशीनें आदि आप इस दिशा में रख सकते हैं।

पुराने समय में गृहनिर्माण वास्तु के अनुसार ही होता था, जिससे घर में धन-धान्य व खुशहाली आती थी। आजकल हममें से हर किसी की जिंदगी में आपाधापी व तनाव ही तनाव है। जिससे मुक्ति के लिए हम तरह-तरह के टोटके व प्रयोग करते हैं।

वास्तु तनाव व परेशानियों से मुक्ति की एक अच्छी पद्धति हो सकती है। वास्तु की कुछ बातें ध्यान में रखकर आप अपने जिंदगी में परिवर्तन की उम्मीद तो कर सकते हैं किंतु पूर्णत: परिवर्तन तभी होगा, जब आप स्वयं अपने व्यवहार व कार्यशैली में सकारात्मक परिवर्तन लाएँ।

सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती हैं दिशाएं—

आवास या कार्यालय का निर्माण करते समय दिशाओं का सदैव ध्यान रखना चाहिए। सहीं दिशाओं का निर्धारण नहीं होने के कारण हमें नकारात्मक ऊर्जा मिलती रहेगी और कोई भी काम व्यवस्थित रूप से संपन्न नहीं हो सकेगा। किसी भी का निर्माण करने से पूर्व वास्तु शास्त्र की सहायता से हम अधिक ऊर्जावान बन सकते हैं। यह सकारात्मक ऊर्जा कर्म के साथ ही भाग्योदय में भी सहायक होती हैं। जानें दिशाओं के विषय में कुछ तथ्य-

उत्तर दिशा से चुम्बकीय तरंगों का भवन में प्रवेश होता हैं। चुम्बकीय तरंगे मानव शरीर में बहने वाले रक्त संचार एवं स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। अतः स्वास्थ्य की दृष्टि से इस दिशा का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ जाता हैं। स्वास्थ्रू के साथ ही यह धन को भी प्रभावित करती हैं। इस दिशा में निर्माण में कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना आवश्यक हैं मसलन उत्तर दिशा में भूमि तुलनात्मक रूप से नीची होना चाहिए तथा बालकनी का निर्माण भी इसी दिशा में करना चाहिए। बरामदा, पोर्टिको और वाश बेसिन आदि इसी दिशा में होना चाहिए।

उत्तर-पूर्व दिशा में देवताओं का निवास होने के कारण यह दिशा दो प्रमुख ऊजाओं का समागम हैं। उत्तर दिशा और पूर्व दिशा दोनों इसी स्थान पर मिलती हैं। अत इस दिशा में चुम्बकीय तरंगों के साथ-साथ सौर ऊर्जा भी मिलती हैं। इसलिए इसे देवताओं का स्थान अथवा ईशान दिशा कहते हैं। इस दिशा में सबसे अधिक खुला स्थान होना चाहिए। नलकूप एवं स्वीमिंग पुल भी इसी दिशा में निर्मित कराना चाहिए। घर का मुख्य द्वार इसी दिशा में शुभकारी होता हैं।

पूर्व दिशा ऐश्वर्य व ख्याति के साथ सौर ऊर्जा प्रदान करती हैं। अतः भवन निर्माण में इस दिशा में अधिक से अधिक खुला स्थान रखना चाहिए। इस दिशा में भूमि नीची होना चाहिए। दरवाजे और खिडकियां भी पूर्व दिशा में बनाना उपयुक्त रहता हैं। पोर्टिको भी पूर्व दिया में बनाया जा सकता हैं। बरामदा, बालकनी और वाशबेसिन आदि इसी दिशा में रखना चाहिए। बच्चे भी इसी दिशा में मुख करके अध्ययन करें तो अच्छे अंक अर्जित कर सकते हैं।

उत्तर-पश्चिम दिशा में भोजन कक्ष बनाएं यह दिशा वायु का स्थान हैं। अतः भवन निर्माण में गोशाला, बेडरूम और गैरेज इसी दिशा में बनाना हितकर होता है। सेवक कक्ष भी इसी दिशा में बनाना चाहिए।

पश्चिम दिशा में टायलेट बनाएं यह दिशा सौर ऊर्जा की विपरित दिशा हैं अतः इसे अधिक से अधिक बंद रखना चाहिए। ओवर हेड टेंक इसी दिशा में बनाना चाहिए। भोजन कक्ष, दुछत्ती, टाइलेट आदि भी इसी दिशा में होना चाहिए। इस दिशा में भवन और भूमि तुलनात्मक रूप से ऊँची होना चाहिए।

दक्षिण-पश्चिम दिशा में मुखिया का कक्ष सबसे अच्छा वास्तु नियमों में इस दिशा को राक्षस अथवा नैऋत्व दिशा के नाम से संबोधित किया गया हैं। परिवार के मुखिया का कक्ष इसी दिशा में उपयुक्त होता है। परिवार के मुखिया का कक्ष इसी दिशा में होना चाहिए। सीढ़ियों का निर्माण भी इसी दिशा में होना चाहिएै इस दिशा में खुलापन जैसे खिड़की, दरवाजे आदि बिल्कुल न निर्मित करें। किसी भी प्रकार का गड्ढा, शौचालय अथवा नलकूप का इस दिशा मंा वास्तु के अनुसार वर्जित हैं।

दक्षिण-पूर्व दिशा में किचिन, सेप्टिक टेंक बनाना उपयुक्त होता है। यह दिशा अग्नि प्रधान होती हैं अतः इस दिशा में अग्नि से संबंधित कार्य जैसे कि किचिन, ट्रांसफार्मर, जनरेटर ब्वायलर आदि इसी दिशा में होना चाहिए। सेप्टिक टेंक भी इसी दिशा में बनाना ठीक रहता हैं।

दक्षिण दिन यम की दिशा है यहां धन रखना उत्तम होता हैं। यम का आशय मृत्यु से होता है। इसलिए इस दिशा में खुलापन, किसी भी प्रकार के गड्ढे और शैचालय आदि किसी भी स्थिति में निर्मित करें। भवन भी इस दिशा में सबसे ऊंचा होना चाहिए। फैक्ट्री में मशीन इसी दिशा में लगाना चाहिए। ऊंचे पेड़ भी इसी दिशा में लगाने चाहिए। इस दिशा में धन रखने से असीम वृद्धि होती हैं। कोई भी जातक इन दिशाओं के अनुसार कार्यालय, आवास, दुकान फैक्ट्री का निर्माण कर धन-धान्य से परिपूर्ण हो सकता हैं।

दिशाएँ—-

वास्तु विज्ञान∕शास्त्र जिसे भवन निर्माण कला में दिशाओं का विज्ञान भी कहा जा सकता है, इसे समझाने के लिए सर्वप्रथम दिशाओं के विषय में जानना आवश्यक है। हम सभी जानते हैं कि धरातल स्तर (Two dimension) में आठ दिशाएँ होती हैं – पूर्व, ईशान, उत्तर, वायव्य, पश्चिम, नैऋत्य, दक्षिण व आग्नेय।

ऊपर आकाश व नीचे पाताल को सम्मिलित करने पर (Three dimension) 10 दिशाओं में पूरा भूमंडल∕संसार व्याप्त है अथवा कहा जा सकता है कि पूरे विश्व को एक स्थल में केन्द्र मानकर 10 दिशाओं में व्यक्त किया जा सकता है।


विदिशा भूखण्ड व विदिशा में निर्माण—

मुख्य दिशाएँ वास्तु या मकान की मध्य रेखा से 22.5 अंश या ज्यादा घूमी हुई हो तो ऐसे वास्तु को विदिशा में बना मकान या वास्तु कहा जाता है। ऐसे विदिशा मकान में वास्तु के उक्त सभी नियम व प्रभाव पूरी तरह नहीं लागू होते। ऐसे वास्तु ज्यादातर शुभ नहीं होते और वहाँ शुभ फल केवल निम्न कुछ दिशाओं में ही प्राप्त होता है अधिकतर ऐसे दिशाओं में बने मकान आदि धीमी गतिवाले, अशुभफलदायक और कई दशा में अत्यन्त हानिकारक परिणाम दर्शाते हैं।

विदिशा में अच्छे फलदायक मकान या वास्तु बनाने के नियमः

प्रवेश द्वार केवल ईशान दिशा से होने से ही विशिष्ट मंगलकारी होता है। मध्य पूर्व अथवा मध्य उत्तर से भी प्रवेश शुभ होता है।

विदिशा प्लाट में कमरे, मकान या वास्तु केवल ईशान और नैऋत्य दिशा को लम्बाई में रखकर बनाना हितकारी मंगलकारी है।

विदिशा प्लाट के ईशान में नैऋत्य से अधिक खाली जगह व ईशान को हल्का न नीचा रखना चाहिए।

अग्नि व वायव्य दिशा में एकदम बराबर खाली जगह रखना चाहिए।

उक्त 4 नियमों व लक्षणों से युक्त पूर्ण विदिशा (45 अंश घूमा) में बने वास्तु से भी अधिक और त्वरित अति मंगलकारी फलदायक पाये गये हैं परन्तु इनसे विपरीत विदिशा में बने वास्तु अमंगलकारी ही होते हैं। विदिशा के वास्तु में यदि प्रवेश, और खाली जगह नैऋत्य अग्नि व वायव्य से होता है तो ऐसे वास्तु अत्यन्त अशुभ फलदायक पाये गये हैं। विदिशा में नैऋत्य का प्रवेश वंशनाश, धन नाश का द्योतक है तथा आग्नेय से प्रवेश अग्निभय, चोरी लड़ाई-झगड़ा, पति∕पत्नि का नाश, अनैतिकता का जन्मदाता कहा गया है वायव्य का प्रवेश द्वार चोरी, कानूनी झगड़े, जेल, व्यापार-नाश, अधिक व्यय कराने वाला आदि पाया गया है। विदिशा के वास्तु अगर सही नियमानुसार न होने पर कई दशाओं में अपमृत्यु का कारण भी बनते हैं।

दिशा एवं विदिशा के भूखण्ड व भवन—

भवन या भूखण्ड का उत्तर, चुम्बकीय उत्तर से 22.5◦ से कम घूमा होने से ऐसे भवन या भूखण्ड को दिशा में ही माना जाता है जबकि 22.5◦ या उससे अधिक घूमा हुआ हो तो उसे विदिशा या तिर्यक दिशा का भूखण्ड या भवन कहा जाता है। निम्न चित्र से स्पष्ट हो जायेगा।

प्राचीनकाल में दिशा निर्धारण प्रातःकाल व मध्याह्न के पश्चात एक बिन्दू पर एक छड़ी लगाकर सूर्य रश्मियों द्वारा पड़ रही छड़ी की परछाई तथा उत्तरायण व दक्षिणायन काल की गणना के आधार पर किया जाता था।

वर्तमान में चुम्बकीय सुई की सहायता से बने दिशा सूचक यंत्र (Compass) से यह काफी सुगम हो गया है।

अब तो जी.पी.एस. (Global Positioning System) पर आधारित इलेक्ट्रोनिक कम्पास की सहायता से किसी भी वस्तु पर दिशाओं की निकटतम सही जानकारी मिल सकती है।

राशि के अनुसार करें अपने निवास का चयन—

साधारणतः निवास स्थान का चयन करते समय व्यक्ति असमंजस में रहता है कि यह मकान उसके लिए कहीं अशुभ तो नहीं रहेगा। इस दुविधा को दूर करने के लिए निवास स्थान के कस्बे, कालौनी, या शहर के नाम के प्रथम अक्षर से अपनी राशि व नक्षत्र का मिलान कर शुभ स्थान का चयन करना चाहिए।

घर व निवासकर्ता की राषि एक ही होना चाहिए। दोनों राषियां आपस में एक दूसरे से 6‘8 या 3-11 पड़े तो धन संचय में बाधा और वैर विरोध उत्पन्न करती है तथा दोनों राषियों में 2-11 का संबंध होने पर रोगप्रद साबित होती है।

इनके अलावा 1,4,5,7,9,10वह राशियां हो तो वास्तुशास्त्र के अनुसार लाभप्रद मानी गई है। उदाहरणतः आपकी राशि वृष है और जयपुर में आप मकान खरीद रहे है तो यह आपके लिए लाभदायक रहेगा। क्योंकि वृष राशि से गिनने पर जयपुर की मकर राशि 9 वीं पड़ेंगी तथा मकर से गिनने पर वृष 5वीं राशि है।

अतः निवासकर्ता और निवास स्थान की राषियों वृष-मकर में 9-5 का संबंध होने से शुभ तथा लाभप्रद संयोग बनेगा। इसी प्रकार निवास स्थान के नक्षत्र से अपने नक्षत्र तक गिनने से जो संख्या आए उससे भी शुभता का अनुमान लगाया जा सकता है।

निवास स्थान के नक्षत्र से व्यक्ति का नक्षत्र यदि 1,2,3,4,5 पड़े तो धनलाभ के अच्छे योग बनेंगे। 6,7,8 पड़ने पर वहां रहने से धनाभाव बना रहेगा। 9,10,11,12,13 वां नक्षत्र होने पर धन-धान्य, सुख-समृद्धि में वृद्धि करता है।

यदि व्यक्ति का नक्षत्र 14,15,16,17,18,19 वां हो तो जीवनसाथी के प्रति चिंताकारक है। निवासकर्ता का नक्षत्र यदि 20 वां हो तो हानिकारक है। यदि व्यक्ति का नक्षत्र 21, 22, 23, 24, हो तो संपत्ति में बढ़ोतरी होती है।

25 वें नक्षत्र का व्यक्ति भय, कष्ट और अशांत रहता है। 26 वां हो तो लड़ाई-झगड़ा और 27 वां हो तो परिजनों के प्रति शोक को दर्शाता है। राशि और नक्षत्र का संयोग बनने पर ही निवासकर्ता के लिए श्रेष्ठ फल प्रदान करता है।

पूर्व-दक्षिण में बनी सीढ़ियाँ अत्यंत शुभ —

वास्तु के अनुसार मकान में सीढ़ी या सोपान पूर्व या दक्षिण दिशा में होना चाहिए। यह अत्यंत शुभ होता है। अगर सीढ़ियाँ मकान के पार्श्व में दक्षिणी व पश्चिमी भाग की दाईं ओर हो, तो उत्तम हैं। अगर आप मकान में घुमावदार सीढ़ियाँ बनाने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो आपके लिए यह जान लेना आवश्यक है कि सीढ़ियों का घुमाव सदैव पूर्व से दक्षिण, दक्षिण से पश्चिम, पश्चिम से उत्तर और उत्तर से पूर्व की ओर रखें। चढ़ते समय सीढ़ियाँ हमेशा बाएँ से दाईं ओर मुड़नी चाहिए। एक और बात, सीढ़ियों की संख्या हमेशा विषम होनी चाहिए। एक सामान्य फार्मूला है- सीढ़ियों की संख्या को 3 से विभाजित करें तथा शेष 2 रखें- अर्थात्‌ 5, 11, 17, 23, 29 आदि की संख्या में हों। वास्तु शास्त्र में भवन में सीढ़ियाँ वास्तु के अनुसार सही नहीं हो, तो उन्हें तोड़ने की जरूरत नहीं है। बस आपको वास्तु दोष दूर करने के लिए दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक कमरा बनवाना चाहिए। यदि सीढ़ियाँ उत्तर-पूर्व दिशा में बनी हों, तो। तिजोरी (गल्ला) : मकान में गल्ला कहाँ रखना चाहिए। वास्तु शास्त्र के अनुसार मकान में तिजोरी-गल्ला, नकदी, कीमती आभूषण आदि सदैव उत्तर दिशा में रखना शुभ होता है। क्योंकि कुबेर का वास उत्तर दिशा में होता है इसलिए उत्तर दिशा की ओर मुख रखने पर धन वृद्धि होती है।

Mahavir Hanuman Mandir Patna

महावीर हनुमान मंदिर पटना
जहाँ दर्शन मात्र से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं
बन जाते हैं बिगड़े काम, मिल जाता है जग में उत्तम स्थान

Mahavir Mandir is one of the holiest Hindu temples dedicated to Lord Hanuman, located in Patna, Bihar, India. Million of pilgrims visit the temple every year and is the second most visited religious shrine in North India. The Mahavir Mandir Trusts have the second highest budget in North India after the famous Maa Vaishno Devi shrine. The earning of Mahavir Mandir has gone now up to an average of Rs 1 lakh per day. It is situated right in front of Patna Junction, station of the City. By Rajesh Mishra (Bheledi , Chhapra ) 
(मंदिर के अन्दर का फोटो)


://www.youtube.com/watch?feature=player_detailpage&v=WkZoxyuQxqs

बिहार भारत की धर्म प्राण संस्कृति का परिचय देने वाला राज्य है। इसके कण-कण से सदैव भारत की सनातन संस्कृति का मंगलकारी स्वर गुंजायमान होता रहा है। इतिहास साक्षी है, जब-जब भारत के धर्म, संस्कृति और राजनीतिक अधिष्ठान पर तामसिक बादल मंडराए, बिहार के सांस्कृतिक सूर्योदय ने देश को आशा की नई राह दिखाई।


इसी राज्य की राजधानी पटना के रेलवे स्टेशन के सामने कभी एक जीर्ण-शीर्ण मंदिर होता था, रामभक्त महावीर हनुमान का मंदिर। कोई ढाई सौ, तीन सौ साल पुराना तो इसका ज्ञात इतिहास है, वस्तुत: यह कितना प्राचीन है, कोई नहीं जानता। इसे जीर्ण-शीर्ण हालत में देख पटना के कुछ प्रबुद्ध जन के मन में वेदना उठी, वही वेदना जो कभी जामवंत के मन में उठी थी- का चुप साधि रहा बलवाना। उस समय देश के प्रख्यात आई.पी.एस. अधिकारी किशोर कुणाल ने इस मंदिर को पटना के समाज-जागरण का महान केन्द्र बनाने का संकल्प किया। रा.स्व.संघ के पूर्व क्षेत्र संघचालक स्व. कृष्णवल्लभ प्रसाद नारायण सिंह उपाख्य बबुआ जी से सम्पर्क साधा और फिर शुरू हुई एक ऐसी साधना जिसने आज हर धर्म-साधक को आह्लादित कर रखा है।


जी हां, वही प्राचीन जीर्ण-शीर्ण महावीर मंदिर आज विशाल बहुमंजिला भव्य मंदिर बन गया है। इस मंदिर के विकास की गाथा के रूप में मानो नई राह को रोशन करता एक नया सवेरा पटना ने देखा है।

जहां किशोर कुणाल को भी इस मंदिर की साधना ने आचार्य किशोर कुणाल बना दिया, वहीं इस मंदिर ने सामाजिक समरसता का एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया। संभवत: यह ऐसा पहला मन्दिर था जहां के मुख्य पुजारी पद पर तथाकथित पिछड़े वर्ग के एक प्रकाण्ड पंडित को बैठाया गया। 30 अक्तूबर, 1983 को पटना के नागरिकों के सम्मिलित प्रयास से मंदिर का नवनिर्माण प्रारंभ हुआ तब किसी ने न सोचा था कि यह मंदिर आगे चलकर आध्यात्मिक जागरण के साथ सामाजिक विकास के महान केन्द्र के रूप में पहचाना जाने लगेगा। 1985 में नवनिर्मित मंदिर का भव्य उद्घाटन हुआ और शुरू हो गया परिवर्तन का नया अध्याय। मंदिर के कार्य को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए मार्च, 1990 में एक नए न्यास का गठन हुआ और इसी के साथ दुनिया ने देखा कि हिन्दू समाज अपने श्रद्धा केन्द्रों का कैसा उत्कृष्ट और प्रभावी प्रबंधन करता है। न सिर्फ मंदिर में पूजा-अर्चना, चढ़ावे आदि के बारे में नई प्रबंध प्रक्रिया प्रारंभ हुई वरन् चढ़ावे का समुचित उपयोग किस प्रकार सामाजिक विकास के प्रकल्पों में हो, इसकी भी प्रभावी योजना तैयार हुई।
घटना "60 के दशक की है जब भारत की राजनीति के युवा तुर्क कहे जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर अपनी किसी बीमारी के इलाज के लिए दिल्ली आए थे। दिल्ली के चिकित्सकों ने तब उनसे कहा था कि आपका बेहतर इलाज पटना में ही हो सकता था। ऐसी ख्याति थी तब पटना की, लेकिन इस स्थिति में धीरे-धीरे बदल होता गया। बदहाली ऐसी फैली कि लोग अपने पुरुषार्थ और गौरव को ही भुला बैठे। आचार्य किशोर कुणाल ने महावीर मंदिर न्यास को सर्वप्रथम इस स्थिति को बदलने के लिए सक्रिय किया। पटना के प्रमुख चिकित्सकों के साथ मिलकर 2 जनवरी, 1988 में जो महावीर आरोग्य संस्थान का छोटा सा बिरवा किदवईपुरी मुहल्ले में प्रारंभ हुआ था, आज वह राज्य के आधुनिकतम अस्पतालों में एक है। महंगी चिकित्सा कैसे गरीब आदमी को भी न्यूनतम खर्च पर मिल जाए, मंदिर प्रबंधन ने इस लक्ष्य को सदैव अपने सामने रखा। 4 दिसम्बर, 2005 को द्वारकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने 60 बिस्तरों से युक्त नए अस्पताल परिसर का उद्घाटन किया। मंदिर प्रशासन ने चढ़ावे की राशि का सदुपयोग करते हुए फुलवारीशरीफ में आधुनिकतम तकनीकी सुविधाओं से युक्त कैंसर अस्पताल भी प्रारंभ किया। हाल ही में यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर की एक गोष्ठी सम्पन्न हुई जिसका उद्घाटन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने किया। इसी प्रकार मातृत्व-शिशु कल्याण को ध्यान में रखकर 250 बिस्तरों से युक्त अस्पताल के निर्माण की योजना बनी और शुरुआती चरण में 38 बिस्तरों वाले मातृत्व-शिशु वात्सल्य अस्पताल की नींव 1 अप्रैल, 2006 को मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के करकमलों द्वारा रखी गई। मात्र 20 रुपए पंजीकरण शुल्क, 100 रुपए बिस्तर शुल्क और 4 से 5 लाख रुपए खर्च वाले आपरेशन यहां मात्र 15 से 25000 रुपए में ही हो जाते हैं। नि:सन्तान दंपतियों के कष्ट निवारण में भी अस्पताल प्रबंधन सक्रिय हो गया है। महावीर मंदिर प्रबंधन न्यास ने ये सभी कार्य चढ़ावे की राशि का सदुपयोग करते हुए प्रारंभ किए। दीन-हीन, भूखे लोगों को प्रतिदिन भर पेट प्रसाद देने के लिए "दरिद्र नारायण भोज", सन्तों-साधुओं के लिए नि:शुल्क निवास-प्रसाद व चिकत्सा के लिए "साधु सेवा", समाज को स्वस्थ साहित्य पढ़ने का अवसर देने के लिए एक समृद्ध पुस्तकालय, महावीर मंदिर प्रकाशन, ज्योतिष सलाह केन्द्र, दूरदराज के गांवों में शुद्ध पेयजल आपूर्ति के लिए पेयजल अभियान, संस्कृत भाषा के नवोत्थान के लिए पाणिनी केन्द्र, अस्पृश्यता निवारण के लिए विभिन्न त्योहारों पर विराट सर्व सहभागी उत्सव, सामाजिक मिलन के आयोजन, भगवान के भोग के लिए नैवेद्यम और इन सभी कार्यों में सक्रिय कार्मिकों के लिए सरकारी योजनाओं के अनुकूल सुन्दर नीति का निर्धारण और प्रत्यक्ष संचालन आज महावीर मंदिर की ओर से किया जा रहा है।

नित नए आयाम मंदिर से जुड़ रहे हैं। पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार, जल संरक्षण, पर्यावरण शुद्धि और राज्य के अनेक हिस्सों में अनेक मंदिरों को पुनव्र्यवस्थित करने के साथ अनुसूचित जाति के प्रशिक्षित धर्मज्ञ पुजारियों की योजना करने जैसे पवित्र अभियान को मंदिर गति दे रहा है। ऐसा ही एक प्रकल्प सदानीरा गण्डकी के तट पर सन् 2006 में निर्मित किया गया। करीब 37 साल पहले की बात है। हाजीपुर नगर के समीप गण्डकी के तट पर भगवान भोलेनाथ अद्भुत लिंग रूप में प्रकट हुए थे। भक्तों की भीड़ वहां जुटने लगी, जलाभिषेक प्रारंभ हो गया, 30 वर्षों तक भगवान आकाश की छत के नीचे रहे। महावीर न्यास ने इसे भी समाज जागृति के केन्द्र के रूप में विकसित करने की ठानी। और 28 फरवरी, 2006 को भव्य शिव मंदिर कर निर्माण कर क्षेत्र वासियों को सौंप दिया। भगवान की नियमित पूजा, अर्चना का दायित्व अनुसूचित जाति के श्री चन्द्रशेखर दास ने संभाला और धीरे-धीरे समाज के लिए एक श्रेष्ठ उपासना का केन्द्र यहां विकसित हो गया। मुजफ्फरपुर में भी न्यास ने साहू पोखर स्थित राम-जानकी मंदिर का प्रबंधन संभाला और नियमित पूजन-अर्चन के लिए पुजारी की व्यवस्था की। भारत तो भगवान का देश कहा जाता है। किसी मंदिर में रोज दिया न जले, यह अपराध न होने देने का संकल्प महावीर मंदिर न्यास के कार्य से झलकता है।

पटना जंक्शन के बाहर आप निकलेंगे तो इस सामाजिक-आध्यात्मिक जागरण के भव्य प्रतिमान को प्रणाम करना मत भूलिएगा। हनुमान जी साक्षात् अपनी शक्ति का अहसास इस प्रतिष्ठान द्वारा सर्व समाज को करा रहे हैं।

Panchmukhi Hanumanji

शीघ्र और श्रेष्ठ फल प्राप्त करना है तो पूजें
पंचमुखी हनुमानजी




भारत के किसी भी शहर में चलें जाएँ हनुमान जी के सैकड़ों मंदिर मिल जायेंगे और इनके भक्तों की संख्या अनगिनत है. मंगलवार और शनिवार को तो इन मंदिरों प्रातःकाल से अर्धरात्रि तक जमावड़ा लगा रहता है पर इनके भक्त भी बहुत संयम से अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हैं... आपने सुना होगा पटना रेलवे स्टेशन से सटे हनुमान जी को उत्तर भारत में माता वैष्णवी के बाद सबसे ज्यादा लोकप्रिय और साथ ही साथ दान-दक्षिणा के मामले में दूसरा स्थान दिलाया है इनके भक्तों ने.. जहाँ हनुमान जी के इतने ज्यादा भक्त हों वह हनुमान कृपा दृष्टि तो डालेंगे ही...   इस आलेख में मैं आपको हनुमान जी से शीघ्र और श्रेष्ठ फल प्राप्त करने का उत्तम उपाए बता रहा हूँ...राजेश मिश्रा

शास्त्र और विधान से हनुमानजी का पूजन और साधना विभिन्न रुप से किये जा सकते हैं।
हनुमानजी का एकमुखी,पंचमुखीऔर एकादश मुखीस्वरूप के साथ हनुमानजी का बाल हनुमान, भक्त हनुमान, वीर हनुमान, दास हनुमान, योगी हनुमान आदि प्रसिद्ध है। किंतु शास्त्रों में श्री हनुमान के ऐसे चमत्कारिक स्वरूप और चरित्र की भक्ति का महत्व बताया गया है, जिससे भक्त को बेजोड़ शक्तियां प्राप्त होती है। श्री हनुमान का यह रूप है – पंचमुखी हनुमान।

मान्यता के अनुशार पंचमुखीहनुमान का अवतार भक्तों का कल्याण करने के लिए हुवा हैं। हनुमान के पांच मुख क्रमश:पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऊ‌र्ध्व दिशा में प्रतिष्ठित हैं।

पंचमुखी हनुमानजी का अवतार मार्गशीर्ष कृष्णाष्टमी को माना जाता हैं। रुद्र के अवतार हनुमान ऊर्जा के प्रतीक माने जाते हैं। इसकी आराधना से बल, कीर्ति, आरोग्य और निर्भीकता बढती है।


रामायण के अनुसार श्री हनुमान का विराट स्वरूप पांच मुख पांच दिशाओं में हैं। हर रूप एक मुख वाला, त्रिनेत्रधारी यानि तीन आंखों और दो भुजाओं वाला है। यह पांच मुख नरसिंह, गरुड, अश्व, वानर और वराह रूप है। हनुमान के पांच मुख क्रमश:पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऊ‌र्ध्व दिशा में प्रतिष्ठित माने गएं हैं।

पंचमुख हनुमान के पूर्व की ओर का मुख वानर का हैं। जिसकी प्रभा करोडों सूर्यो के तेज समान हैं। पूर्व मुख वाले हनुमान का पूजन करने से समस्त शत्रुओं का नाश हो जाता है।

पश्चिम दिशा वाला मुख गरुड का हैं। जो भक्तिप्रद, संकट, विघ्न-बाधा निवारक माने जाते हैं। गरुड की तरह हनुमानजी भी अजर-अमर माने जाते हैं।

हनुमानजी का उत्तर की ओर मुख शूकर का है। इनकी आराधना करने से अपार धन-सम्पत्ति, ऐश्वर्य, यश, दिर्धायु प्रदान करने वाल व उत्तम स्वास्थ्य देने में समर्थ हैं।

हनुमानजी का दक्षिणमुखी स्वरूप भगवान नृसिंह का है। जो भक्तों के भय, चिंता, परेशानी को दूर करता हैं।
श्री हनुमान का ऊ‌र्ध्वमुख घोडे के समान हैं। हनुमानजी का यह स्वरुप ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर प्रकट हुआ था। मान्यता है कि हयग्रीवदैत्य का संहार करने के लिए वे अवतरित हुए। कष्ट में पडे भक्तों को वे शरण देते हैं। ऐसे पांच मुंह वाले रुद्र कहलाने वाले हनुमान बडे कृपालु और दयालु हैं।

हनुमतमहाकाव्य में पंचमुखीहनुमान के बारे में एक कथा हैं।

एक बार पांच मुंह वाला एक भयानक राक्षस प्रकट हुआ। उसने तपस्या करके ब्रह्माजीसे वरदान पाया कि मेरे रूप जैसा ही कोई व्यक्ति मुझे मार सके। ऐसा वरदान प्राप्त करके वह समग्र लोक में भयंकर उत्पात मचाने लगा। सभी देवताओं ने भगवान से इस कष्ट से छुटकारा मिलने की प्रार्थना की। तब प्रभु की आज्ञा पाकर हनुमानजी ने वानर, नरसिंह, गरुड, अश्व और शूकर का पंचमुख स्वरूप धारण किया। इस लिये एसी मान्यता है कि पंचमुखीहनुमान की पूजा-अर्चना से सभी देवताओं की उपासना के समान फल मिलता है। हनुमान के पांचों मुखों में तीन-तीन सुंदर आंखें आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक तीनों तापों को छुडाने वाली हैं। ये मनुष्य के सभी विकारों को दूर करने वाले माने जाते हैं।



भक्त को शत्रुओं का नाश करने वाले हनुमानजी का हमेशा स्मरण करना चाहिए। विद्वानो के मत से पंचमुखी हनुमानजी की उपासना से जाने-अनजाने किए गए सभी बुरे कर्म एवं चिंतन के दोषों से मुक्ति प्रदान करने वाला हैं। पांच मुख वाले हनुमानजी की प्रतिमा धार्मिक और तंत्र शास्त्रों में भी बहुत ही चमत्कारिक फलदायी मानी गई है।

04 नवंबर 2011

Lord Rama is the repository of knowledge

ज्ञान के भंडार हैं भगवान श्रीराम




यदि हम रामायण को ध्यानपूर्वक पढें तो हमें पता चलेगा कि श्रीराम का जीवन चरित न केवल दिन-प्रतिदिन के कर्तव्यों का उदाहरण प्रस्तुत करता है, वरन जीवन के बडे संघर्षो में किस प्रकार हम विजय पाएं, इसकी भी शिक्षा देने वाला है। यह जरूर है कि परिस्थितियां ठीक-ठीक वही नहीं होंगी। उदाहरण के लिए यह प्रसंग देखें, श्रीराम जी को युवराज बनाने की घोषणा की गई और ठीक अगली सुबह उन्हें चौदह वर्ष के लिए वन गमन का आदेश दे दिया गया, इस प्रसंग पर बहुत विचार करने की आवश्यकता है। अयोध्या का पूरा जन समूह और राजा दशरथ सब के सब उनसे याचना करते रह गए कि वे रुक जाएं। उनके वन न जाने के संबंध में अन्य अनेक तर्क प्रस्तुत किए गए। लेकिन राम उठकर वन के लिए चल दिए, क्योंकि उन्होंने देखा कि वही उनका धर्म है। उनके पिता ने कैकेयी से प्रतिज्ञा की थी और फलस्वरूप वरदान दिए थे, उन वरदानों को सत्य करना था। यह एक बहुत बडा निर्णय था, उन्होंने लेशमात्र भी उद्विग्न हुए बिना, निराश हुए बिना इतना बडा निर्णय लिया।

दूसरी ओर देखें तो भरत की स्थिति और भी कठिन थी। जब उन्हें पता चला कि वे राम के स्थान पर राजा बना दिए गए हैं तब भरत बहुत चिंतित हो उठे कि उन्हें क्या करना उचित है। राम ने स्वयं भरत से कहा कि उन्हें पिता जी की इच्छाओं को पूरा करना चाहिए और कैकेयी के दूसरे वरदान के अनुरूप राजा बनना चाहिए। लेकिन भरत ने निश्चयपूर्वक कहा नहीं! उन्होंने इस प्रकार से कैसे सोच लिया? कानून में शब्द और भाव दोनों का महत्व है। अधिक महत्वपूर्ण क्या है? सीधी बात है कि भाव का मंतव्य का, शब्द का मात्र शाब्दिक अर्थ से अधिक महत्व है। भरत जानते थे कि राज समारोह संबंधी सारे प्रबंध रामचंद्र जी के लिए हुए थे, और उनके पिता राजा दशरथ ने राम को ही युवराज पद देने का निश्चय किया था, लेकिन दुर्भाग्यवश कैकेयी ने सारी बातों पर पानी फेर दिया। इसलिए भरत ने विचार किया, अपने पिता के शब्दों का पालन करना मेरा धर्म है या उनकी इच्छाओं का? यह समझकर कि पिता की इच्छाओं को पूरा करना उनका धर्म है, उन्होंने युवराज बनना स्वीकार नहीं किया।

धर्म क्या है, इसका निश्चय हमें सूक्ष्मता के साथ करना चाहिए। धर्म का निश्चय करना बहुत कठिन है। कहा गया है कि धर्म की गति या धर्म का मर्म रहस्यमय है, छिपा हुआ है। अत: रामायण की महानता इस बात में है कि कठिन परिस्थिति आने पर उसका धैर्यपूर्वक सामना करने और सही निर्णय पर पहुंचने की शिक्षा हमें इस ग्रंथ से मिलती है।

रामायण की कथा का प्रतीकात्मक अर्थ भी है। इस संबंध में अनेक प्रकार के विचार हैं। यहां केवल उनमें से मुख्य-मुख्य ही प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

श्रीराम की वास्तविक पहचान के संबंध में सदाशिव ब्रह्मेन्द्र के एक सुंदर गीत की एक पंक्ति है-वह जो मेरे हृदय में रमण कर रहे हैं, राम हैं। यहां राम का अर्थ है-रमण करना, लीला करना। एक अन्य पंक्ति में कहा गया है-वह जो सब के हृदय में रमण कर रहे हैं, राम हैं।

राम नाम का एक अन्य अर्थ स्वयं रामायण में ही दिया हुआ है-राम वह सच्चिदानंद ब्रह्म हैं, जिनमें समस्त योगी सदैव रमण करते हैं। राम सब को सुख प्रदान करने वाले भी हैं। वह कौन है जो सभी को सुख दे सकता है? हम किसी बच्चे से यह प्रश्न पूछेंगे तो वह कहेगा खिलौने। दूसरा कोई किसी अन्य भोग्य पदार्थ या धन का नाम ले सकता है, लेकिन सचमुच जो सबको सुख देता है वह है आनंद। खिलौने, कोई खेल, घर या बहुत से रुपये-पैसे सुख नहीं है, सुख वह है जो आनंद हम इन वस्तुओं से प्राप्त करते हैं। इसलिए तुलसीदास कहते हैं, वह सुखसागर, जिसकी एक नन्हीं बूंद से समस्त लोक आनंदित जो जाता है, और सुख के लिए समस्त लोक जिस पर आश्रित है, वह रामचंद्र हैं।

चरित्रों का प्रतीकार्थ

राम आनंदस्वरूप हैं, सुख का मूल हैं, सत् चित् आनंद हैं, वे हमारे हृदय में रमणशील हैं। इसलिए जिन राम के चरित्र का हम रामायण में अध्ययन करते हैं, वे वास्तव में हमारा अपना विशुद्ध आत्मस्वरूप है। और सीता कौन हैं, जिनसे राम ने विवाह किया था? वे साक्षात् शांति हैं, विदेहसुता हैं, सहचारिणी हैं, परमशांति हैं, हमारे आनंदस्वरूप की नित्यसंगिनी हैं। अयोध्या हमारा हृदय प्रदेश है जहां शांति और आनंद एक साथ रहते हैं। रामायण की कथा में, रावण और कुंभकर्ण का वध करने के लिए रामचंद्र जी को समुद्र लांघना पडा था। यह समुद्र अविद्या और अविवेक का महासागर है, अपने भीतर स्थित शत्रुओं को नष्ट करने के लिए हमको यह पार करना ही पडेगा। रुचि, अरुचि, इच्छा, क्रोध ये सब अंत:करण स्थित हमारे शत्रु हैं। अपने हृदय से इन वृत्तियों को निकाल देंगे तभी हमें पूर्ण शांति की प्राप्ति हो सकेगी।

राम को ज्ञान का स्वरूप और सीता जी को भक्ति भी कहा जाता है। रावण अविद्या, अविवेक, अहं और अभिमान का अवतार है, जिसका वध केवल राम ही कर सकते हैं, क्योंकि वे विशुद्ध ज्ञानस्वरूप हैं। लक्ष्मण वैराग्य, भरत प्रेम और शत्रुघ्न निष्काम सेवा के अवतार हैं?

और हनुमान जी? उनके बारे में कुछ भी कहना बहुत कठिन है। उनमें समस्त दिव्य गुणों का एक साथ प्रकाट्य हुआ है। भक्ति, समर्पण, सेवा, वैराग्य, शक्ति, विनय, ज्ञान और सभी सद्गुणों के वे साक्षात अवतार हैं।

03 नवंबर 2011

श्री राणी सती दादी जी


जीवन परिचय और  इतिहास

श्री राणी सती का अत्यंत संक्षिप्त में इतिहास इस प्रकार है। उनका मूल नाम नारायणी देवी था, वे श्री गुरूसहायमल जी की पुत्री थी उनका विवाह श्री जाली राम जी के पुत्र तनधन दास जी के साथ हुआ था। श्री जालीराम जी, हिसार के दीवान थे। उस समय वहां पर नवाबी शासन था नवाब और दीवान के बीच बहुत मधुर संबंध बने हुए थे, जो कि एक स्वाभाविक बात थी, परंतु एक अकस्मात घटना के कारण उनमें अनबन हो गई। श्री तनधन दास जी के पास एक विलक्षणा घोड़ी थी जिसकी ख्याति दूर-दूर तक बहुत अधिक थी। हिसार के शहजादे का मन उस घेड़ी को हस्तगत करने का हुआ और वह घोड़ी जालीराम जी ने शहजादे को देने में अपनी असमर्थता प्रकट कर दी। तदुपरांत शहजादे ने निर्णय लिया कि वह घोड़ी चुरा कर ले आयेगा और अपने कब्जे मे कर लेगा। एक रात घोर अंधियारे में जालीराम जी की घुडसाल में घोड़ी चुराने के लिए पहुंच गया। घोड़ी ने एक अजनबी की उपस्थिति भांपकर जोर-जोर से हिनहिनाना शुरू कर दिया। घोड़ी की हिनहिनाने की आवाज रात के सन्नाटे में तनधन दास जी के कानों में पड़ी और वे भाला लेकर घुडसाल की तरफ दौड़े। शहजादे ने तनधन दास जी को अपनी ओर आते देखकर, इस भय से उसकी चोरी का पूरे राज्य को पता चल जायेगा और उसकी भारी बदनामी होगी, उसने अपने आप को घास के ढेर में छिपा लिया, जो कि घोड़ी के पास ही पड़ा था। तनधन दास जी दौड़ते हुए घोड़ी के पास आये और उन्होंने अपना भाला घास के ढेर की ओर फेंक ा। 
उनका भाला घास के ढेर में छिपा नवाब पुत्र को लगा और उसके मुख से चीख निकल गई। चीख सुनकर तनधन दास जी ने रोशनी में पास पड़े घास के ढेर को हटाकर देखा, तो पाया वहां शहजादा ढेर हुआ पड़ा था। तनधन दास जी के पिता श्री जालीराम जी हवेली में जाग चुके थे और वे भी घटना स्थल पर आ गए। उन्होंने सारी स्थिति की गंभीरता को समझते हुए शीघ्र से शीघ्र हिसार छोड़ने का निर्णय लिया। वे सपरिवार रातों रात वहां से झुनझुन चले गए। 

        शहजादे की अचानक मृत्यु हो जाने के कारण हिसार का नवाब बहुत क्रोधित हुआ और उसने यह निर्णय किया कि वह तनधन दासजी और जालीराम जी से अपने बेटे की मृत्यु का बदला लेगा। वह मौके की तलाश में रहने लगा। अन्तत: नवाब को एक मौका हाथ लग ही गया। ऐसा हुआ कि कुछ समय बाद तनधन दास जी गौना कराकर, अपनी धर्मपत्नी श्री नारायणी देवी को अपने साथ महम से झुंझुनू ला रहे थे। इसकी खबर हिसार नवाब को लग चुकी थी। मार्ग में नवाब के बहुत सारे सधे हुए सैनिकों ने तनधन दास जी पर अचानक छिपकर हमला बोल दिया। तनधन दास जी ने उनकी वीरतापूर्वक मुकाबला किया, परंतु उनके साथ कुछ ही सैनिक थे और नवाब के सैनिकों की संख्या बहुत अधिक थी। तनधन दास जी युद्ध में अपूर्वरण कौशल दिखाते हुए धराशायी हुए और वीरगति को प्राप्त हो गए। 

        नारायणी देवी ने जब देखा कि उनके पति को शत्रुओं ने धोखे और षडयंत्र से मृत्यु के करालगाल में ढकेल दिया है, तो वे वीरांगना के रूप में अपने पति की तलवार को हाथ में लेकर, युद्ध करने के लिए मैदान में कूद पड़ी तो रण-चण्डी का विकराल रूप धारण कर लिया। नारायणी देवी ने घोर युद्ध किया और शत्रुओं का न केवल अत्यंत साहस से सामना किया अपितु दृढ़तापूर्वक संहार भी किया जिसके कारण अनेक शत्रु काल-कलवित हुए और शेष वहां से भाग गए। 

        आजीवन निर्मल उज्जवल चरित्र अखंड ब्रम्हचार्य, सत और पतिव्रत धर्म का पालन करने के कारण उनमें ऐसी अदम्य शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ था। उसी आदम्य शक्ति और साहस के कारण ही अकेले होते हुए भी वह उस दिन युद्ध में शत्रुओं को पराजित करने में समर्थ हो सकी थी। लड़ाई में तनधन दास जी का विश्वस्त सेवक राण ही जीवित बचा था और उसके साथ खड़ी तनधन दास जी श्वेत घोड़ी। 
       
        इसके पहले कि नवाब की और सेना वहां पहुंचती, नारायणी देवी ने योगाग्नि द्वार अपने नश्वर शरीर का वहीं युद्ध स्थल पर परित्याग कर दिया। लीला-संवरण से पूर्ण नारायणी देवी ने राणा की स्वामी भक्ति, त्याग और साहस से प्रभावित होकर उसे आशीर्वाद दिया कि इस भौतिक संसार में जब कभी भी मेरा नाम लिया जायेगा तो साथ में उसका भी नाम आता रहेगा। उसे आदेश दिया कि वह उनकी भस्मी को घोड़ी पर रखकर यहां से ल जाये और वहां पर घोड़ी रुके वहीं पर एक मंदिर बनवा दिया जाए। ऐसा मेरे स्वसुर श्री जालीराम जी को भी कह देना। यही नारायणी देवी जिसने अपने धर्म और अस्तित्व की रक्षा के लिए अपना आत्मोत्सर्ग किया था। कालान्तर में श्री राणी सतीजी के नाम से विख्यात हुई। झुंझुनू में श्री राणी सतीजी का मंदिर जहां पर स्थापित है, यह वही स्थान है जहां राणा द्वारा लाई हुई घोड़ी जिस पर भस्म थी, रूकी थी। यह घटना विक्रम सम्वत 1652 की है आज का यह विशाल मंदिर झुंझुनू में अमर वीरांगना श्री राणी सतीजी की महानता और गौरव गाथा का गीत गाता, जिता जागता प्रमाण है। 

        श्रीराणी सतीजी की पूजा-अर्चना उनके वंशजो एवं अनुवाइयों द्वारा कुलदेवी के रूप में की जाती है तथा सामाजिक कार्य जैसे बच्चे का प्रथम मुंडन, विवाह से पहले में पूजा एवं विवाह के बाद गठ जोड़े की जात उनके भक्तों द्वारा उनके मंदिर में जाकर दी जानी अनिवार्य है एवं और भी बहुत से पारिवारिक मांगलिक कार्य यहां पूजा करने और उनकी शीश नवाए बगैर पूरे नहीं होते हैं। दोनों नवरात्रों पर भी उनकी दुर्गा रूप में यहां पूजा होती है एवं काफी संख्या में यात्री उक्त दोनों अवसरों पर भी आते हैं। श्री राणी सती जी को शीश नवाकर महिलाएं अपने सुहाग की रक्षा और अपने पति के दीर्घायु होने की कामना करती हैं। 

        राणी सती जी मंदिर झुंझुनू के साथ पिछले चार सौ वर्ष का इतिहास जुड़ा हुआ है। श्रीराणी सती जी का मंदिर मातृशक्ति की गौरव महिमा के इतिहास का प्रतीक और प्रमाण है। करोड़ों की संख्या में श्री सती जी केभक्तगण केवल नेपाल में ही नहीं अपितु पूरे संसार में फैले हुए हैं। भारत वर्ष में स्थापित मंदिरों के अतिरिक्त विदेशों में भी श्रीराणी सतीजी के मंदिर न्यूयोर्क, बैकाक, हांगकांग, सिंगापुर, बर्मा आदि महानगरो में भी स्थापित और वहां श्री राणी जी की पूजा अर्चना श्रद्धापूर्वक प्रतिदिन विधिवत होती है। 
श्री राणी सतीजी के भक्तों में हिन्दु, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई आदि सभी धर्मों वर्गों के अनुयायी सम्मिलित हैं। इस प्रकार यहमंदिर राष्ट्रीय एकता का सबसे बड़ा संगम स्थल है। प्रति वर्ष भादों की अमावस्या पर एक विशेष पूजनोत्सव झुंझुनू मंदिर में होता है। भोर सवेरे से लाखों की संख्या में सभी धर्मों के अनुयायी कतार बांधकर घंटो दर्शन के लिए खड़े रहते हैं। श्री राणी सती जी मंदिर के इतिहास मे भावना और विश्वास पूर्ण रूप से परिलक्षित होता है।

[ The imposing entrance to the Rani Sati Temple – Jhunjhunu ]

 [ Side view of the main entrance ]

   
[ Beautiful carved, painted and decorated main entrance door ] 
[ One of the Wonderfully decorated and painted windows ]

जय श्री राणी सती दादी जी की
RAJESH MISHRA, KOLKATA 

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