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03 नवंबर 2011

श्री राणी सती दादी जी


जीवन परिचय और  इतिहास

श्री राणी सती का अत्यंत संक्षिप्त में इतिहास इस प्रकार है। उनका मूल नाम नारायणी देवी था, वे श्री गुरूसहायमल जी की पुत्री थी उनका विवाह श्री जाली राम जी के पुत्र तनधन दास जी के साथ हुआ था। श्री जालीराम जी, हिसार के दीवान थे। उस समय वहां पर नवाबी शासन था नवाब और दीवान के बीच बहुत मधुर संबंध बने हुए थे, जो कि एक स्वाभाविक बात थी, परंतु एक अकस्मात घटना के कारण उनमें अनबन हो गई। श्री तनधन दास जी के पास एक विलक्षणा घोड़ी थी जिसकी ख्याति दूर-दूर तक बहुत अधिक थी। हिसार के शहजादे का मन उस घेड़ी को हस्तगत करने का हुआ और वह घोड़ी जालीराम जी ने शहजादे को देने में अपनी असमर्थता प्रकट कर दी। तदुपरांत शहजादे ने निर्णय लिया कि वह घोड़ी चुरा कर ले आयेगा और अपने कब्जे मे कर लेगा। एक रात घोर अंधियारे में जालीराम जी की घुडसाल में घोड़ी चुराने के लिए पहुंच गया। घोड़ी ने एक अजनबी की उपस्थिति भांपकर जोर-जोर से हिनहिनाना शुरू कर दिया। घोड़ी की हिनहिनाने की आवाज रात के सन्नाटे में तनधन दास जी के कानों में पड़ी और वे भाला लेकर घुडसाल की तरफ दौड़े। शहजादे ने तनधन दास जी को अपनी ओर आते देखकर, इस भय से उसकी चोरी का पूरे राज्य को पता चल जायेगा और उसकी भारी बदनामी होगी, उसने अपने आप को घास के ढेर में छिपा लिया, जो कि घोड़ी के पास ही पड़ा था। तनधन दास जी दौड़ते हुए घोड़ी के पास आये और उन्होंने अपना भाला घास के ढेर की ओर फेंक ा। 
उनका भाला घास के ढेर में छिपा नवाब पुत्र को लगा और उसके मुख से चीख निकल गई। चीख सुनकर तनधन दास जी ने रोशनी में पास पड़े घास के ढेर को हटाकर देखा, तो पाया वहां शहजादा ढेर हुआ पड़ा था। तनधन दास जी के पिता श्री जालीराम जी हवेली में जाग चुके थे और वे भी घटना स्थल पर आ गए। उन्होंने सारी स्थिति की गंभीरता को समझते हुए शीघ्र से शीघ्र हिसार छोड़ने का निर्णय लिया। वे सपरिवार रातों रात वहां से झुनझुन चले गए। 

        शहजादे की अचानक मृत्यु हो जाने के कारण हिसार का नवाब बहुत क्रोधित हुआ और उसने यह निर्णय किया कि वह तनधन दासजी और जालीराम जी से अपने बेटे की मृत्यु का बदला लेगा। वह मौके की तलाश में रहने लगा। अन्तत: नवाब को एक मौका हाथ लग ही गया। ऐसा हुआ कि कुछ समय बाद तनधन दास जी गौना कराकर, अपनी धर्मपत्नी श्री नारायणी देवी को अपने साथ महम से झुंझुनू ला रहे थे। इसकी खबर हिसार नवाब को लग चुकी थी। मार्ग में नवाब के बहुत सारे सधे हुए सैनिकों ने तनधन दास जी पर अचानक छिपकर हमला बोल दिया। तनधन दास जी ने उनकी वीरतापूर्वक मुकाबला किया, परंतु उनके साथ कुछ ही सैनिक थे और नवाब के सैनिकों की संख्या बहुत अधिक थी। तनधन दास जी युद्ध में अपूर्वरण कौशल दिखाते हुए धराशायी हुए और वीरगति को प्राप्त हो गए। 

        नारायणी देवी ने जब देखा कि उनके पति को शत्रुओं ने धोखे और षडयंत्र से मृत्यु के करालगाल में ढकेल दिया है, तो वे वीरांगना के रूप में अपने पति की तलवार को हाथ में लेकर, युद्ध करने के लिए मैदान में कूद पड़ी तो रण-चण्डी का विकराल रूप धारण कर लिया। नारायणी देवी ने घोर युद्ध किया और शत्रुओं का न केवल अत्यंत साहस से सामना किया अपितु दृढ़तापूर्वक संहार भी किया जिसके कारण अनेक शत्रु काल-कलवित हुए और शेष वहां से भाग गए। 

        आजीवन निर्मल उज्जवल चरित्र अखंड ब्रम्हचार्य, सत और पतिव्रत धर्म का पालन करने के कारण उनमें ऐसी अदम्य शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ था। उसी आदम्य शक्ति और साहस के कारण ही अकेले होते हुए भी वह उस दिन युद्ध में शत्रुओं को पराजित करने में समर्थ हो सकी थी। लड़ाई में तनधन दास जी का विश्वस्त सेवक राण ही जीवित बचा था और उसके साथ खड़ी तनधन दास जी श्वेत घोड़ी। 
       
        इसके पहले कि नवाब की और सेना वहां पहुंचती, नारायणी देवी ने योगाग्नि द्वार अपने नश्वर शरीर का वहीं युद्ध स्थल पर परित्याग कर दिया। लीला-संवरण से पूर्ण नारायणी देवी ने राणा की स्वामी भक्ति, त्याग और साहस से प्रभावित होकर उसे आशीर्वाद दिया कि इस भौतिक संसार में जब कभी भी मेरा नाम लिया जायेगा तो साथ में उसका भी नाम आता रहेगा। उसे आदेश दिया कि वह उनकी भस्मी को घोड़ी पर रखकर यहां से ल जाये और वहां पर घोड़ी रुके वहीं पर एक मंदिर बनवा दिया जाए। ऐसा मेरे स्वसुर श्री जालीराम जी को भी कह देना। यही नारायणी देवी जिसने अपने धर्म और अस्तित्व की रक्षा के लिए अपना आत्मोत्सर्ग किया था। कालान्तर में श्री राणी सतीजी के नाम से विख्यात हुई। झुंझुनू में श्री राणी सतीजी का मंदिर जहां पर स्थापित है, यह वही स्थान है जहां राणा द्वारा लाई हुई घोड़ी जिस पर भस्म थी, रूकी थी। यह घटना विक्रम सम्वत 1652 की है आज का यह विशाल मंदिर झुंझुनू में अमर वीरांगना श्री राणी सतीजी की महानता और गौरव गाथा का गीत गाता, जिता जागता प्रमाण है। 

        श्रीराणी सतीजी की पूजा-अर्चना उनके वंशजो एवं अनुवाइयों द्वारा कुलदेवी के रूप में की जाती है तथा सामाजिक कार्य जैसे बच्चे का प्रथम मुंडन, विवाह से पहले में पूजा एवं विवाह के बाद गठ जोड़े की जात उनके भक्तों द्वारा उनके मंदिर में जाकर दी जानी अनिवार्य है एवं और भी बहुत से पारिवारिक मांगलिक कार्य यहां पूजा करने और उनकी शीश नवाए बगैर पूरे नहीं होते हैं। दोनों नवरात्रों पर भी उनकी दुर्गा रूप में यहां पूजा होती है एवं काफी संख्या में यात्री उक्त दोनों अवसरों पर भी आते हैं। श्री राणी सती जी को शीश नवाकर महिलाएं अपने सुहाग की रक्षा और अपने पति के दीर्घायु होने की कामना करती हैं। 

        राणी सती जी मंदिर झुंझुनू के साथ पिछले चार सौ वर्ष का इतिहास जुड़ा हुआ है। श्रीराणी सती जी का मंदिर मातृशक्ति की गौरव महिमा के इतिहास का प्रतीक और प्रमाण है। करोड़ों की संख्या में श्री सती जी केभक्तगण केवल नेपाल में ही नहीं अपितु पूरे संसार में फैले हुए हैं। भारत वर्ष में स्थापित मंदिरों के अतिरिक्त विदेशों में भी श्रीराणी सतीजी के मंदिर न्यूयोर्क, बैकाक, हांगकांग, सिंगापुर, बर्मा आदि महानगरो में भी स्थापित और वहां श्री राणी जी की पूजा अर्चना श्रद्धापूर्वक प्रतिदिन विधिवत होती है। 
श्री राणी सतीजी के भक्तों में हिन्दु, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई आदि सभी धर्मों वर्गों के अनुयायी सम्मिलित हैं। इस प्रकार यहमंदिर राष्ट्रीय एकता का सबसे बड़ा संगम स्थल है। प्रति वर्ष भादों की अमावस्या पर एक विशेष पूजनोत्सव झुंझुनू मंदिर में होता है। भोर सवेरे से लाखों की संख्या में सभी धर्मों के अनुयायी कतार बांधकर घंटो दर्शन के लिए खड़े रहते हैं। श्री राणी सती जी मंदिर के इतिहास मे भावना और विश्वास पूर्ण रूप से परिलक्षित होता है।

[ The imposing entrance to the Rani Sati Temple – Jhunjhunu ]

 [ Side view of the main entrance ]

   
[ Beautiful carved, painted and decorated main entrance door ] 
[ One of the Wonderfully decorated and painted windows ]

जय श्री राणी सती दादी जी की
RAJESH MISHRA, KOLKATA 

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