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04 नवंबर 2011

Lord Rama is the repository of knowledge

ज्ञान के भंडार हैं भगवान श्रीराम




यदि हम रामायण को ध्यानपूर्वक पढें तो हमें पता चलेगा कि श्रीराम का जीवन चरित न केवल दिन-प्रतिदिन के कर्तव्यों का उदाहरण प्रस्तुत करता है, वरन जीवन के बडे संघर्षो में किस प्रकार हम विजय पाएं, इसकी भी शिक्षा देने वाला है। यह जरूर है कि परिस्थितियां ठीक-ठीक वही नहीं होंगी। उदाहरण के लिए यह प्रसंग देखें, श्रीराम जी को युवराज बनाने की घोषणा की गई और ठीक अगली सुबह उन्हें चौदह वर्ष के लिए वन गमन का आदेश दे दिया गया, इस प्रसंग पर बहुत विचार करने की आवश्यकता है। अयोध्या का पूरा जन समूह और राजा दशरथ सब के सब उनसे याचना करते रह गए कि वे रुक जाएं। उनके वन न जाने के संबंध में अन्य अनेक तर्क प्रस्तुत किए गए। लेकिन राम उठकर वन के लिए चल दिए, क्योंकि उन्होंने देखा कि वही उनका धर्म है। उनके पिता ने कैकेयी से प्रतिज्ञा की थी और फलस्वरूप वरदान दिए थे, उन वरदानों को सत्य करना था। यह एक बहुत बडा निर्णय था, उन्होंने लेशमात्र भी उद्विग्न हुए बिना, निराश हुए बिना इतना बडा निर्णय लिया।

दूसरी ओर देखें तो भरत की स्थिति और भी कठिन थी। जब उन्हें पता चला कि वे राम के स्थान पर राजा बना दिए गए हैं तब भरत बहुत चिंतित हो उठे कि उन्हें क्या करना उचित है। राम ने स्वयं भरत से कहा कि उन्हें पिता जी की इच्छाओं को पूरा करना चाहिए और कैकेयी के दूसरे वरदान के अनुरूप राजा बनना चाहिए। लेकिन भरत ने निश्चयपूर्वक कहा नहीं! उन्होंने इस प्रकार से कैसे सोच लिया? कानून में शब्द और भाव दोनों का महत्व है। अधिक महत्वपूर्ण क्या है? सीधी बात है कि भाव का मंतव्य का, शब्द का मात्र शाब्दिक अर्थ से अधिक महत्व है। भरत जानते थे कि राज समारोह संबंधी सारे प्रबंध रामचंद्र जी के लिए हुए थे, और उनके पिता राजा दशरथ ने राम को ही युवराज पद देने का निश्चय किया था, लेकिन दुर्भाग्यवश कैकेयी ने सारी बातों पर पानी फेर दिया। इसलिए भरत ने विचार किया, अपने पिता के शब्दों का पालन करना मेरा धर्म है या उनकी इच्छाओं का? यह समझकर कि पिता की इच्छाओं को पूरा करना उनका धर्म है, उन्होंने युवराज बनना स्वीकार नहीं किया।

धर्म क्या है, इसका निश्चय हमें सूक्ष्मता के साथ करना चाहिए। धर्म का निश्चय करना बहुत कठिन है। कहा गया है कि धर्म की गति या धर्म का मर्म रहस्यमय है, छिपा हुआ है। अत: रामायण की महानता इस बात में है कि कठिन परिस्थिति आने पर उसका धैर्यपूर्वक सामना करने और सही निर्णय पर पहुंचने की शिक्षा हमें इस ग्रंथ से मिलती है।

रामायण की कथा का प्रतीकात्मक अर्थ भी है। इस संबंध में अनेक प्रकार के विचार हैं। यहां केवल उनमें से मुख्य-मुख्य ही प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

श्रीराम की वास्तविक पहचान के संबंध में सदाशिव ब्रह्मेन्द्र के एक सुंदर गीत की एक पंक्ति है-वह जो मेरे हृदय में रमण कर रहे हैं, राम हैं। यहां राम का अर्थ है-रमण करना, लीला करना। एक अन्य पंक्ति में कहा गया है-वह जो सब के हृदय में रमण कर रहे हैं, राम हैं।

राम नाम का एक अन्य अर्थ स्वयं रामायण में ही दिया हुआ है-राम वह सच्चिदानंद ब्रह्म हैं, जिनमें समस्त योगी सदैव रमण करते हैं। राम सब को सुख प्रदान करने वाले भी हैं। वह कौन है जो सभी को सुख दे सकता है? हम किसी बच्चे से यह प्रश्न पूछेंगे तो वह कहेगा खिलौने। दूसरा कोई किसी अन्य भोग्य पदार्थ या धन का नाम ले सकता है, लेकिन सचमुच जो सबको सुख देता है वह है आनंद। खिलौने, कोई खेल, घर या बहुत से रुपये-पैसे सुख नहीं है, सुख वह है जो आनंद हम इन वस्तुओं से प्राप्त करते हैं। इसलिए तुलसीदास कहते हैं, वह सुखसागर, जिसकी एक नन्हीं बूंद से समस्त लोक आनंदित जो जाता है, और सुख के लिए समस्त लोक जिस पर आश्रित है, वह रामचंद्र हैं।

चरित्रों का प्रतीकार्थ

राम आनंदस्वरूप हैं, सुख का मूल हैं, सत् चित् आनंद हैं, वे हमारे हृदय में रमणशील हैं। इसलिए जिन राम के चरित्र का हम रामायण में अध्ययन करते हैं, वे वास्तव में हमारा अपना विशुद्ध आत्मस्वरूप है। और सीता कौन हैं, जिनसे राम ने विवाह किया था? वे साक्षात् शांति हैं, विदेहसुता हैं, सहचारिणी हैं, परमशांति हैं, हमारे आनंदस्वरूप की नित्यसंगिनी हैं। अयोध्या हमारा हृदय प्रदेश है जहां शांति और आनंद एक साथ रहते हैं। रामायण की कथा में, रावण और कुंभकर्ण का वध करने के लिए रामचंद्र जी को समुद्र लांघना पडा था। यह समुद्र अविद्या और अविवेक का महासागर है, अपने भीतर स्थित शत्रुओं को नष्ट करने के लिए हमको यह पार करना ही पडेगा। रुचि, अरुचि, इच्छा, क्रोध ये सब अंत:करण स्थित हमारे शत्रु हैं। अपने हृदय से इन वृत्तियों को निकाल देंगे तभी हमें पूर्ण शांति की प्राप्ति हो सकेगी।

राम को ज्ञान का स्वरूप और सीता जी को भक्ति भी कहा जाता है। रावण अविद्या, अविवेक, अहं और अभिमान का अवतार है, जिसका वध केवल राम ही कर सकते हैं, क्योंकि वे विशुद्ध ज्ञानस्वरूप हैं। लक्ष्मण वैराग्य, भरत प्रेम और शत्रुघ्न निष्काम सेवा के अवतार हैं?

और हनुमान जी? उनके बारे में कुछ भी कहना बहुत कठिन है। उनमें समस्त दिव्य गुणों का एक साथ प्रकाट्य हुआ है। भक्ति, समर्पण, सेवा, वैराग्य, शक्ति, विनय, ज्ञान और सभी सद्गुणों के वे साक्षात अवतार हैं।

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