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10 नवंबर 2011

Loyang Capital of God of China

चीन के देवता की राजधानी है लोयांग


चीन में यह प्रचलित है कि यदि आप चीन के उत्थान और पतन की दास्तान से रूबरू होना चाहते हैं तो एक बार लोयांग शहर का रुख अवश्य कीजिए। चीन के हनान प्रांत के पश्चिमी हिस्से और पीली नदी के दक्षिणी तट पर बसे इस शहर की स्थापना ईसापूर्व 12 वीं सदी में हुई थी और यह चीन की आठ बड़ी प्रचीन राजधानियों में से एक है।

चीनी इतिहास का यह इकलौता ऐसा शहर है जिसे देवता की राजधानी के नाम से अभिहित किया गया है। लोयांग 13 राजवंशों की राजधानी रहा है यानी इस शहर को 1500 साल तक राजधानी होने का गौरव मिला है। लोयांग चीनी सभ्यता के अहम जन्मस्थानों में से एक रहा है। यहीं पर माओवाद और कंफ्यूशियसवाद का जन्म हुआ।

यह शहर चीन के शीर्ष पर्यटनस्थलों में से है जहां के चप्पे-चप्पे पर सांस्कृतिक धरोहरें बिखरी पड़ी हैं। गौरतलब है कि चाइना रेडियो इंटरनेशनल की हिंदी सेवा द्वारा चीन के आकर्षक शहरों को चुनने के लिए लिए चल रही ऑनलाइन प्रतियोगिता में लोयांग भी शामिल है। इस प्रतियोगिता में अपनी पसंद के सबसे आकर्षक चीनी शहरों के लिए दुनिया भर के नेटिजन सीआरआई द्वारा आयोजित इस प्रतियोगिता में ऑनलाइन मतदान में हिस्सा ले रहे हैं।


यहां मौजूद प्राचीन राजधानी के अवशेष, मंदिर, गुफाएं, मकबरे इसकी सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध बनाते हैं। लुंगमन गुफा यहां मौजूद धरोहरों में सबसे खास है। इस गुफा स्थल को पहले 'यी नदी का द्वार' कहा जाता था। बाद में इसे लुगमन या ड्रैगन द्वार कहा जाने लगा।

इस शहर में सिर्फ चाइना भगवान् ही नहीं रहते हैं यहाँ भारतीय भगवन भी दर्शन करने को मिल जाते हैं....


Sri Maha Ganapathi shrine at
Loyang Tua Pek Kong temple


इस मंदिर में यहाँ लोयांग में भारतीय भगवान् भी देखने को मिलते हैं

इन बौद्ध गुफाओं पर कारीगरों ने उस समय काम करना शुरू किया जब उत्तरी वेइ के सम्राट ने दातोंग की जगह लोयांग को अपनी राजधानी बनाया। यहां मौजूद कारीगरी दातोंग की कारीगरी का ही विस्तार है। लुंगमेन में काम सात राजवंशों के कार्यकाल तक चला। यहां 1300 से ज्यादा गुफाएं, 40 छोटे पगोड़ा और करीब 100,000 बौद्ध प्रतिमाएं हैं जिनका ऊंचाई एक इंच से लेकर 57 फुट तक है। इन्हें चीन में बौद्ध संस्कृति की उत्कृष्ट धरोहर माना जाता है।


पईमा मंदिर चीन का प्रथम सरकारी बौद्ध मठ है जिसका निर्माण वहां बौद्ध धर्म की शुरुआत के बाद आधिकारिक तौर पर किया गया। इस शहर में रंग-बिरंगे पीयोनी या चंद्रपुष्प खिलते हैं और इसे पुष्प का साम्राज्य भी कहा जाता है। यह पुष्प शांति और समृद्धि के प्रतीक हैं। हर साल जब 15 अप्रैल से आठ मई तक चंद्रपुष्पों के पुष्पित-पल्लिवत होने का मौसम चरम पर होता है तो शहर में चंद्रपुष्प मेले का आयोजन होता है। विश्वप्रसिद्ध रेशम मार्ग यहीं से होकर गुजरता था।


फ़िलहाल चीन इंडिया के लिए कदम-कदम पर मुसीबतें खड़ी कर रहा है.. और भारत के जमीन हथिया रहा है साथ ही अरुणाचल में दखलंदाज़ी कर रहा है. सिर्फ यही नहीं पाकिस्तान के साथ मिलकर हमारे देश में फिजूल की गतिविधियाँ को बढ़ावा दे रहा है और   भारत के साथ लगे सीमा पर भारत को डराने के लिए अपने सैनिकों और हथियारों का जखीरा जमा कर रहा है...

Loyang Tua Pek Kong Temple

The Loyang Tua Pek Kong Temple, off Loyang Way, was established in the 1980s. The temple owes its existence to a group of friends, who on finding figurines of different religions abandoned on a beach, brought them together and housed them under a unique mixed-religion temple. The Loyang Tua Pek Kong Temple has Buddhist, Hindu and Taoist deities and a Muslim Kramat (shrine) within its premises.

Description
In the 1980s a group of fishing buddies, including Paul Tan and Huang Zhong Ting, stumbled across Buddhist, Hindu and Taoist statues strewn across the beach at the end of the Loyang Industrial Area. They built a small hut made of bricks and zinc sheets to house the figurines. This humble construction served as a makeshift temple. It also included a Kramat to honour a holy Muslim man. It is believed that a sign was received by some people to build the holy kramat here. Soon, scores of people, mainly those working in the Loyang Industrial Area, were visiting the temple. Miraculous powers were attributed to the temple as devotees claimed that their prayers for prosperity and wealth were never denied. Unfortunately however, in 1996, the hut was razed to the ground by a fire. The Taoist statue of Tua Pek Kong, the God of Prosperity, was the only one that survived and escaped from the fire unscathed. New premises to house the deities and the kramat had to be built. Through public donations that poured in, a new temple complex was built over a 1,400 sq m area at the same site. The temple was named after the Prosperity God, Tua Pek Kong the statue which miraculously escaped from the fire.

The temple is still run by public donations. The number of visitors to the temple is around 20,000 per month despite the fact that bus services are limited to weekdays and the last bus stop is a half an hour walk away. The temple still accepts statues of deities and any devotee can adopt or take a figurine of a deity for free after offering a prayer. The temple complex is open 24 hours a day and it has become a tourist attraction in the recent years. One of the temple's claims to fame is the presence of a 2 m tall statue of the Hindu God Ganesha, which is said to be the tallest Ganesha statue in any temple in India or Singapore. Another attraction here is the lighting of strings of non-hazardous firecrackers.

In June 2003 the lease on the land on which the temple is situated expired. The temple authorities therefore procured a new site close to the present temple. A new temple is expected to be constructed at this new site in a few years' time. Until then, the temple is expected to remain at its current location with a lease extension being granted for the land on which it is situated.

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