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17 जून 2011

Amarnath Yatra


अमरनाथ यात्रा- शिव धाम | Amarnath Yatra | Amarnath Dham Katha in Hindi । Amarnath दर्शन

बाबा अमरनाथ : राजेश मिश्रा

सृष्टि का आधार ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानी शिव शंकर हैं. ये तीन त्रिदेव ही सृष्टि के आदि, मध्य एवं अंत हैं. ये अजन्मा एवं निरंकार हैं. यह न तो जन्म लेते हैं और न ही इनकी मृत्यु होती है. सृष्टि के आरम्भ काल में यही अपनी बीज शक्ति से सृष्टि को जन्म देते हैं एवं अंत में उसे अपने में समाहित कर लेते हैं. भक्तों की पूजा एवं अर्चना को साकार रूप देने के लिए यह साकार रूप धारण करते हैं. इन्होने अपनी शक्ति को नारी रूप प्रदान किया है जिसे उमा, लक्ष्मी एवं सरस्वती के नाम पूजा जाता है. उमा शिव की पत्नी हैं. लक्ष्मी विष्णु की और ब्रह्मा की संगिनी देवी सरस्वती हैं. मनुष्य को पाप से दूर रहकर धर्म का मार्ग चुनने की प्रेरणा देने हेतु यह समय-समय पर लीला करते रहते हैं.
भगवान विष्णु तो अपनी लीलाओं के कारण लीलाधारी कहे जाते हैं. इन्हीं के समान शिव की लीलाएं भी अद्भुत हैं. इनकी लीला आज भी अमरनाथ धाम में अमर है जो अमरनाथ की पवित्र गुफा में इनके होने का एहसास कराती है. श्रद्धालु भक्तों के लिए यह अत्यंत पूजनीय स्थल हैं जहां जीवन में कम से कम एक बार जाने की इच्छा सभी की रहती है. लेकिन, यहां पहुंचता वही है जिसे बाबा अमरनाथ अपने दरबार में बुलाते हैं. 

अमरनाथ धाम की कथा | Amarnath Dham Katha in Hindi

माता पार्वती शिव के समान ही आदि शक्ति हैं. सृष्टि के आरम्भ से लेकर अंत तक की सभी कथाएं इन्हें ज्ञात है. एक समय की बात है देवी पार्वती के मन में अमर होने की कथा जानने की जिज्ञासा हुई. पार्वती ने भगवान शंकर से अमर होने की कथा सुनाने के लिए कहा. भगवान शंकर पार्वती की बात सुनकर चौंक उठे और इस बात को टालने की कोशिश करने लगे. देवी पार्वती जब हठ करने लगीं तब शिव जी ने उन्हें समझाया कि यह गुप्त रहस्य है जिसे त्रिदेवों के अतिरिक्त कोई नहीं जानता.
यह ऐसी गुप्त कथा है जिसे कभी किसी ने अन्य किसी से नहीं कहा है. इस कथा को जो भी सुन लेगा वह अमर हो जाएगा. देवतागण भी इस कथा को नहीं जानते हैं अत: पुण्य क्षीण होने के बाद उन्हें अपना पद रिक्त कर देना पड़ता है और उन्हें पुन: जन्म लेकर पुण्य संचित करना पड़ता है. ऐसे में तुमसे इस कथा को कहने में मै असमर्थ हूं. जब पार्वती शिव के समझाने के बावजूद नहीं मानी तब शिव जी ने पार्वती से अमर होने की कथा सुनाने का आश्वासन दिया. 
कथा सुनाने के लिए शिव ऐसे स्थान को ढूंढने लगे जहां कोई जीव-जन्तु न हो. इसके लिए उन्हें श्रीनगर स्थित अमरनाथ की गुफा उपयुक्त लगी. पार्वती जी को कथा सुनाने के लिए इस गुफा में लाते समय शिव जी चंदनबाड़ी नामक स्थान पर माथे से चंदन उतारा.  पिस्सू टॉप नामक स्थान पर पिस्सूओं को. अनन्त नाग में नागों को एवं शेषनाग नामक स्थान पर शेषनाग को ठहरने के लिए कहा. इसके बाद शिव और पार्वती अमारनाथ की गुफा में प्रवेश कर गये. 
इस गुफा में शिव माता पार्वती को अमर होने की कथा सुनाने लगे. कथा सुनते-सुनते देवी पार्वती को नींद आ गई और वह सो गईं जिसका शिव जी को पता नहीं चला. शिव अमर होने की कथा सुनाते रहे. इस समय दो सफेद कबूतर शिव की कथा सुन रहे थे और बीच-बीच में गूं-गूं की आवाज निकाल रहे थे. शिव को लग रहा था कि पार्वती कथा सुन रही हैं और बीच-बीच में हुंकार भर रहीं हैं. इस तरह दोनों कबूतरों ने अमर होने की पूरी कथा सुन ली. 
कथा समाप्त होने पर शिव का ध्यान पार्वती की ओर गया जो सो रही थीं. शिव जी ने सोचा कि पार्वती सो रही हैं तब इसे सुन कौन रहा था. शिव की दृष्टि तब कबूतरों के ऊपर गया. शिव कबूतरों पर क्रोधित हुए और उन्हें मारने के लिए तत्पर हुए. इस पर कबूतरों ने शिव जी कहा कि हे प्रभु हमने आपसे अमर होने की कथा सुनी है यदि आप हमें मार देंगे तो अमर होने की यह कथा झूठी हो जाएगी. इस पर शिव जी ने कबूतरों को जीवित छोड़ दिया और उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव पार्वती के प्रतीक चिन्ह के रूप निवास करोगो. माना जाता है कि आज भी इन दोनों कबूतरों का दर्शन भक्तों को यहां प्राप्त होता है. 
राजेश मिश्रा, कोलकाता, प. बंगाल 

अद्भुत है अमरनाथ शिवलिंग | Amazing Amarnath Shivling

अमरनाथ शिवलिंग हिम से निर्मित होता. यह शिवलिंग अन्य शिवलिंगों की भांति सालों भर नहीं रहता है. वर्ष के कुछ महीनों में यहां हिम से स्वयं शिवलिंग का निर्माण होता है. स्वयं हिम से निर्मित शिवलिंग होने के कारण इसे स्वयंभू हिमानी शिवलिंग भी कहा जाता है. आषाढ़ पूर्णिमा से शिवलिंग का निर्माण होने लगता है जो श्रावण पूर्णिमा के दिन पूर्ण आकार में आ जाता है. 
अमरनाथ की गुफा में हिम जल टपकता रहता है. आस-पास जमा हुआ बर्फ भी कच्चा होता है जबकि हिम से बना शिवलिंग ठोस होता है. इस स्थान पर आकर ईश्वर के प्रति आस्था मजबूत हो जाती है. इस तरह शिवलिंग का निर्माण सदियों से होता चला आ रहा है. यह भगवान के भक्तों को यह विश्ववास दिलाता है कि उनकी श्रद्धा सच्ची है. ईश्वर है तभी यह संसार है. 

अमरनाथ यात्रा | Amarnath Yatra

अमरनाथ धाम श्रीनगर से लगभग 135 किलोमीटर दूर है. यह स्थान समुद्र तल से 13, 600 फुट की ऊँचाई पर है. इस स्थान पर ऑक्सीजन की कमी हो जाती है. प्रतिवर्ष अमरनाथ यात्रा के लिए लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं. यात्रा से पूर्व श्रद्धालु भक्तों को पंजीकरण करवाना होता है. पंजीकरण के लिए भक्तों से कुछ शुल्क जमा करना पड़ता है. सरकार एवं कुछ निजी संस्थाओं द्वारा यात्रियों को यात्रा सुविधाएं दी जाती हैं.
यहां जाने के लिए दो रास्ते हैं एक पहलगांव होकर तथा दूसरा बालटाल से. इन स्थानों तक भक्तगण बस से आते हैं इसके बाद का सफर पैदल तय करना होता है. पहलगांव से होकर जाने वाला रास्ता बालटाल से सुगम है अत: सुरक्षा की दृष्टि से तीर्थ यात्री इसी रास्ते से अमरनाथ जाना अधिक पसंद करते हैं. 

अमरनाथ धाम हिन्दु मुस्लिम एकता का प्रतीक | Amarnath Dham : Hindu Muslim Unity Symbol

भगवान अपने भक्तों में किसी प्रकार का अंतर नहीं करता है. इसका प्रमाण है अमरनाथ धाम. हिन्दु जिस अमरनाथ धाम की यात्रा को अपना सौभाग्य मानते हैं उस अमरनाथ धाम के विषय में बताने वाला एक मुस्लिम गड़रिया था. जिसे पशु चराते बाबा हिमानी अमरनाथ का पता उसी प्रकार लगा जिस तरह बैजू को बाबा बैद्यनाथ का पता चला. आज भी मंदिर में चढ़ने वाले चढ़ावे का एक चौथाई भाग इस मुस्लिम गड़रिये परिवार को मिलता है. बाबा इस तरह से जात-पात के भेद को दूर कर मानवता का ज्ञान दे रहे हैं. भक्तों को बाबा का संदेश समझकर जात-पात का भेद मिटाने का प्रयास करना चाहिए.

अमरनाथ धाम का महात्म्य एवं यात्रा का फल | Amarnath Dham Mahatmya and Yatra Benefits

कहते हैं जिस पर भोले बाबा की कृपा होती है वही अमरनाथ धाम पहुंचता है. यहां पहुंचना ही सबसे बड़ा पुण्य है. जो भक्त बाबा हिमानी का दर्शन करता है उसे इस संसार में सर्व सुख की प्राप्ति होती है. व्यक्ति के कई जन्मों के पाप कटित हो जाते हैं और शरीर त्याग करने के पश्चात उत्तम लोक में स्थान प्राप्त होता है. 

चार धाम यात्रा : Char Dham Yatra


CHARDHAM YATRA : YAMUNOTRI, GANGOTRI, KEDARNATH
& BADRINATH : RAJESH MISHRA

यमुनोत्री धाम (Yamunotri Dham) - Char Dham | Gauri Kund | Surya Kund | Saptrishi Kund | Yamunotri Temple

Yamunotri
CHARDHAM : YAMUNOTRI : RAJ
यमुनोत्री चार धामों मे से एक प्रमुख धाम है. यमुनोत्री हिमालय के पश्चिम में ऊँचाई पर स्थित है. यमुनोत्री को सूर्यपुत्री के नाम से भी जाना जाता है. और यमुनोत्री से कुछ किलोमीटर की दूरी पर कालिंदी पर्वत स्थित है. जो अधिक ऊँचाई पर होने के कारण दुर्गम स्थल भी है. यही वह स्थान है जहां से यमुना एक संकरी झील रूप में निकलती है. यह यमुना का उद्गम-स्थल माना जाता है. यहां पर यमुना अपने शुरूवाती रूप मे यानी के शैशव रूप में होती है यहां का जल शुद्ध एवं स्वच्छ तथा सफेद बर्फ की भांती शीतल होता है.

यमुनोत्री मंदिर | Yamunotri Temple

यमुनोत्री मंदिर का निर्माण टिहरी के राजा महाराजा प्रतापशाह ने बनवाया थान मंदिर में काला संगमरमर है. यमुनोत्री मंदिर के कपाट अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर खोले जाते हैं व कार्तिक के महीने में यम द्वितीया के दिन बंद कर दिए जाते हैं, 

सर्दियों के समय यह कपाट बंद हो जाते हैं क्योंकी बर्फ बारी की वजह से यहां पर काम काज ठप हो जाता है. और यात्रा करना मना होता है शीतकाल के छ: महीनों के लिए खरसाली के पंडित मां यमुनोत्री को अपने गांव ले जाते हैं पूरे विधि विधान के साथ मां यमुनोत्री की पूजा अपने गांव में ही करते हैं. इस मंदिर में गंगा जी की भी मूर्ति सुशोभित है तथा गंगा एवं यमुनोत्री जी दोनो की ही पूजा का विधान है.

यमुनोत्री स्वरूप | Yamunotri Shape

लेखक : राजेश मिश्रा
भेल्दी, छपरा, बिहार 
यमुनोत्री मंदिर के प्रांगण में विशाल शिला स्तम्भ खडा़ है जो दिखने मे बहुत ही अदभुत सा प्रतित होता है. इसे दिव्यशिला के नाम से जाना जाता है. यमुनोत्री मंदिर बहुत उँचाई पर स्थित है इसके बावजूद भी यहां पर तीर्थयात्रियों एवं श्रद्धालुओं का अपार समूह देखा जा सकता है. मां यमुना की तीर्थस्थली गढवाल हिमालय के पश्चिमी भाग में यमुना नदी के स्त्रोत पर स्थित है.

यमुनोत्री का वास्तविक रूप में बर्फ की जमी हुई एक झील हिमनद है. यह समुद्र तल से 4421 मीटर की ऊँचाई पर कालिंद नामक पर्वत पर स्थित है. और इस स्थान से आगे जाना संभव नही है क्योकि यहां का मार्ग अत्यधिक दुर्गम है इसी वजह से देवी यमुनोत्री का मंदिर पहाड़ के तल पर स्थित है. संकरी एवं पतली सी धारा युमना जी का जल बहुत ही शीतल, परिशुद्ध एवं पवित्र  होता है और मां यमुना के इस रूप को देखकर भक्तों के हृदय में यमुनोत्री के प्रति अगाध श्रद्धा और भक्ति उमड पड़ती है.

यमुनोत्री पौराणिक संदर्भ | Yamunotri Mthological Reference

यमुनोत्री के बारे मे वेदों, उपनिषदों और विभिन्न पौराणिक आख्यानों में विस्तार से वर्णन किया गया है. देवी के महत्व और उनके प्रताप का उल्लेख प्राप्त होता है. पुराणों में यमुनोत्री के साथ असित ऋषि की कथा जुड़ी हुई है कहा जाता है की वृद्धावस्था के कारण ऋषि कुण्ड में स्नान करने के लिए नहीं जा सके तो उनकी श्रद्धा देखकर यमुना उनकी कुटिया मे ही प्रकट हो गई. इसी स्थान को यमुनोत्री कहा जाता है. कालिन्द पर्वत से निकलने के कारण इसे कालिन्दी भी कहते हैं.

यमनोत्री धाम कथा | Yamunotri Dham Katha in Hindi

एक अन्य कथा के अनुसार सूर्य की पत्नी छाया से यमुना व यमराज पैदा हुए यमुना नदी के रूप मे पृथ्वी मे बहने लगीं और यम को मृत्यु लोक मिला कहा जाता है की जो भी कोई मां यमुना के जल मे स्नान करता है वह आकाल म्रत्यु के भय से मुक्त होता है और मोक्ष को प्राप्त करता है. किदवंति है की यमुना ने अपने भाई से भाईदूज के अवसर पर वरदान मांगा कि इस दिन जो यमुना स्नान करे उसे यमलोक न जाना पड़े इस अत: इस दिन यमुना तट पर यम की पूजा करने का विधान भी है.

सप्तर्षि कुण्ड | Saptrishi Kund

यमुनोत्री में स्थित ग्लेशियर और गर्म पानी के कुण्ड सभी के आकर्षण का केन्द्र है. यमुनोत्री नदी के उद्गम स्थल के पास ही महत्वपूर्ण जल के स्रोत हैं सप्तर्षि कुंड एवं सप्त सरोवर यह प्राकृतिक रुप से जल से परिपूर्ण होते हैं. यमुनोत्री का प्रमुख आकर्षण वहां गर्म जल के कुंड होना भी है. यहां पर आने वाले तीर्थयात्रीयों एवं श्रद्धालूओं के लिए इन गर्म जल के कुण्डों में स्नान करना बहुत महत्व रखता है यहां हनुमान, परशुराम, काली और एकादश रुद्र आदि के मन्दिर है.

सूर्य कुंड | Surya Kund

मंदिर के निकट पहाड़ की चट्टान के भीतर गर्म पानी का कुंड है जिसे सूर्य कुंड के नाम से जाना जाता है. यह एक प्रमुख स्थल है यहां का जल इतना अधिक गरम होता है कि इसमें चावल से भरी पोटली डालने पर वह पक जाते हैं और यह उबले हुए चावल प्रसाद के रुप में तीर्थयत्रीयों में बांटे जाते हैं तथा इस प्रसाद को श्रद्धालुजन अपने साथ ले जाते हैं.

गौरी कुंड | Gauri Kund

गौरी कुंड भी महत्वपूर्ण स्थल है यहां का जल का जल अधिक गर्म नहीं होता अत: इसी जल में तीर्थयात्री स्नान करते हैं यह प्रकृति के एक अदभुत नजारे हैं. सभी यात्री स्नान के बाद सूर्य कुंड के पास स्थित दिव्य-शिला की पूजा-अर्चना करते हैं और उसके बाद यमुना नदी की पूजा की जाती है जिसका विशेष महत्व है. इसके नजदीक ही तप्तकुंड भी है परंपरा अनुसार इसमें स्नान के बाद श्रद्धालु यमुना में डुबकी लगाते हैं.

यमुनोत्री के धार्मिक महत्व के साथ ही मनमोहक प्राकृतिक सौंदर्य के कारण यह प्रकृति की अदभूत भेंट है. यमुनोत्री चढ़ाई  मार्ग वास्तविक रूप में दुर्गम और रोमांचित करनेवाला है. मार्ग में स्थित गगनचुंबी, बर्फीली चोटियां सभी यात्रियों को सम्मोहित कर देती हैं.

इसके आस-पास  देवदार और चीड़ के हरे-भरे घने जंगल ओर चारों तरफ फैला कोहरा एवं  घने जंगलो की हरियाली मन को मोहने वाली है. और पहाड़ों के बीच बहती हुई यमुना नदी की शीतल धारा मन को मोह लेती है यह वातावरण सुख व आध्यात्मिक अनुभूति देने वाला एवं नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण है. भारतीय  संस्कृति में यमुनोत्री को माता का रूप माना गया है यह नदी भारतीय सभ्यता को महत्वपूर्ण आयाम देती है.

गंगोत्री धाम (Gangotri Dham) | Char Dham | Mukhimath Temple | Gaumukh | Bhairon Ghati

CHARDHAM : GANGOTRI : RAJ
गंगोत्री पौराणिक काल से ही एक धार्मिक स्थल के रूप मे प्रसिद्ध रही है. प्राचीन समय से ही अनेक ऋषी-मुनि और साधु लोग इस दुर्गम क्षेत्र के पावन धाम से आकर्षित रहें हैं और तथा दूर-दूर से गंगोत्री में आकर साधना एवं तपस्या द्वारा मो़क्ष पाने की चाह रखते हैं. गंगोत्री गंगा नदी का उद्गगम स्थल माना जाता है इस पावन धाम के कपाट अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर खोले जाते हें और दीपावली के दिन मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं.
गंगोत्री एक धार्मिक स्थल है यहां पहुँचने वाले तीर्थयात्री विभिन्न प्रकार के धार्मिक कर्म कांड संपूर्ण करते हैं यहां मौजूद पंडित एवं पुरोहित तीर्थयात्रियों एवं भक्तजनों के विभिन्न धार्मिक कार्य और कर्मकांडों में सहायता करते हैं. यह तीर्थयात्रियों के परिवारों का इतिहास रखने के अलावा वंश के इतिहास को स्मृ्तियों में रखने की एक प्राचीन रीति भी पूर्ण करते हैं.

गंगोत्री पौराणिक कथा | Gangotri Mythological Katha in Hindi

गंगोत्री हिंदुओं के पावन चार धामों मे से एक है इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व सभी को आलौकिक करता है धार्मिक संदर्भ के अनुसार राजा सगर ने देवलोक पर विजय प्राप्त करने के लिये एक यज्ञ किया यज्ञ का घोडा़ इंद्र ने चुरा लिया राजा सगर के सारे पुत्र घोड़े की खोज में निकल पडे. घोड़ा पाताल लोक में मिला जो एक ऋषि के समीप बँधा था. 
सगर के पुत्रों ने सोचा की ऋषि ने ही घोड़े को पकडा है इस पर उन्होंने ऋषि का अपमान किया तपस्यारत ऋषि ने अपनी आँखें खोली और क्रोध से सगर के साठ हज़ार पुत्रों को जलाकर भस्म कर दिया और वह मृत आत्माएँ भूत बनकर भटकने लगीं क्योंकि उनका अंतिम संस्कार नहीं हो पाया था. 
भगीरथ जो राजा दिलीप के पुत्र थे. उन्होने अपने पूर्वजों का अंतिम संस्कार करने का निश्चय किया तथा गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रण किया जिससे उनके अंतिम संस्कार की रीतिपूर्ण कर राख को गंगाजल में प्रवाहित किया जा सके. और भटकती आत्माओं को मोक्ष प्राप्त हो. 
भगीरथ ने भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या की ताकि गंगा को पृथ्वी पर लाया जा सके. ब्रह्मा कठोर तपस्या देखकर प्रसन्न हुये और गंगा को पृथ्वी पर अवतरित होने को कहा ताकि सगर के पुत्रों की आत्माओं की मुक्ति संभव हो. उस समय गंगा ने कहा कि इतनी ऊँचाई से पृथ्वी पर गिरने से पृ्थ्वी मेरा इतना वेग नहीं सह पाएगी. 
तब भगीरथ ने भगवान शिव से निवेदन किया और भगवान शिव ने अपनी खुली जटाओं में गंगा के वेग को रोक कर एक लट खोल दी जिससे गंगा की पृथ्वी पर अविरल रुप से प्रवाहित हुई और सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ गंगोत्री वह स्थान है जो गंगा का उद्गम स्थल बना.

गंगोत्री प्रमुख धर्म स्थल | Gangotri Famous Religious Sites

मुखीमठ मंदिर | Mukhimath Temple

मुखबा के लोग भी गंगोत्री मंदिर के पुजारी हैं जहां मुखीमठ नामक मंदिर भी है. हर साल दीपावली के समय गंगोत्री मंदिर के कपाट बंद होने पर देवी गंगा को बडी़ धूम धाम के साथ मुखबा गांव में लाया जाता है. और तब तक यहां पर आने वाले छ: महीनों और बसंत आने तक गंगा मां की नियमित रूप से पूजा अर्चना की जाती है.

गौमुख | Gaumukh

गंगोत्री से 19 किलोमीटर दूर और ऊंचाई पर स्थित एक प्रमुख स्थल है गौमुख यह गंगोत्री की शुरुवात(मुहाना) तथा भागीरथी नदी का उद्गम स्थल भी है. यहां पर अनेक भक्तजन आकर इसके ठंडे बर्फिले जल में स्नान करके आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं. आस्था है की यहां पर स्नान करके पापों से मुक्ति ओर मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस गौमुख ग्लेशियर में भगीरथी एक छोटी गुफानुमा द्वार से प्रवाहित होती है गंगोत्री से गौमुख की दूरी पैदल या फिर वहां उपलब्ध सवारी से तय की जाती है.

भैरों घाटी | Bhairon Ghati

गंगोत्री से 9 किलोमीटर की दूरी तय करके भैरों घाटी तक पहुँचा जाता है. यह घाटी जाह्नवी गंगा तथा भागीरथी के संगम पर स्थित है. गंगोत्री मंदिर पर पहुंचने से पहले इस भैरव मंदिर का दर्शन अवश्य करना चाहिये. इस स्थल पर भागीरथी का बहाव भी तेज होता है यह स्थल हिमालय का एक मनोरम दर्शन स्थल है जहां से भृगु पर्वत श्रृंखला तथा चीड़वासा की चोटियों के दर्शन संभव हैं.

गंगोत्री प्रसिद्ध कुंड | Gangotri Famous Kund

गंगोत्री में अनेक तालाब एवं कुंड हैं. जिनमें से प्रमुख नाम ब्रह्मकुंड, विष्णु कुंड है. इन जल कुंड में लोग स्नान  करके अपने को पवित्र करते हैं तथा इनमें  डुबकी लगानने से ही संपूर्ण कर्मकांडो पूर्ण होते हैं यह एक महत्वपूर्ण कार्य है स्नान के उपरांत किया गया दान पाप कर्मों से मुक्ति दिलाता है. 
मान्यता है कि पांडवो ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गये परिजनो की आत्मा कि शांति के इसी स्थान पर आकर यज्ञ का अनुष्ठान किया था. गंगोत्री का पवित्र एवं भव्य मंदिर सफेद ग्रेनाइट के चमकदार ऊंचे पत्थरों से निर्मित है. मंदिर की भव्यता एवं शुचिता देखकर मंत्र मुग्ध हुए बिना नही रह सकते.

गंगोत्री स्थल | Gangotri Site

गंगोत्री में सड़क बनने से पहले यहां घर बसाना प्रायः असंभव था पैदल यात्रा और चढ़ाई दुर्गम थी इस निर्जन स्थान तक पहुंचने में बहुत सी कठिनाईयां आती थी. परंतु अब कुछ सुधार हुए हैं. गंगोत्री की अर्थव्यवस्था मौसम के अनूरूप है अप्रैल से अक्टूबर तक ही तीर्थयात्रा की जा सकती है और जाड़े में बर्फ बारी की वजह से कपाट बंद कर देते हैं और लोग कम ऊंचाई की जगहों पर चले जाते हैं. 
गंगोत्री मे पहले समय में मंदिर नहीं था बस भागीरथी शिला के निकट ही देवी-देताओं की मूर्तियां रखी जाती थी जिनकी पूजा अर्चना का विधान बना हुआ था और जाडे के समय इन मूर्तियों को पास के गांवों के विभिन्न मंदिरों श्याम प्रयाग, गंगा प्रयाग, धराली तथा मुखबा आदि मे ले जाया जाता था.

केदारनाथ धाम - चार धाम यात्रा | Kedarnath Dham - Char Dham Yatra (Kedarnath Jyotirlinga) | Kedarnath Mahadev Katha

CHARDHAM : KEDARNATH : RAJ
बाबा भोले नाथ कृपालु एवं भक्तों पर दया करने वाले हैं. जो भी सच्चे मन से इनका ध्यान करता है उसकी पुकार भोलेनाथ अवश्य सुनते हैं. इन्द्र की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव सोमनाथ ज्योर्तिलिंग के रूप में प्रकट होकर आज भी इन्द्र की भक्ति की कथा सुना रहा है. इसी प्रकार नर-नारायण की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ भारत के उत्तराखंड में हिमालय पहार पर मंदाकिनी नदी के पास केदारनाथ ज्योर्तिलिंग के रूप में प्रकट हुए. बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है. केदारनाथ समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है. केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी हुआ. यह तीर्थ शिव का अत्यंत प्रिय स्थान है. जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है. 

केदारनाथ महादेव की कथा | Kedarnath Mahadev Katha in Hindi

केदारनाथ महादेव के विषय में कई कथाएं हैं. स्कन्द पुराण में लिखा है कि एक बार केदार क्षेत्र के विषय में जब पार्वती जी ने शिव से पूछा तब भगवान शिव ने उन्हें बताया कि केदार क्षेत्र उन्हें अत्यंत प्रिय है. वे यहां सदा अपने गणों के साथ निवास करते हैं. इस क्षेत्र में वे तब से रहते हैं जब उन्होंने सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा का रूप धारण किया था.
स्कन्द पुराण में इस स्थान की महिमा का एक वर्णन यह भी मिलता है कि एक बहेलिया था जिस हिरण का मांस खाना अत्यंत प्रिय था. एक बार यह शिकार की तलाश में केदार क्षेत्र में आया. पूरे दिन भटकने के बाद भी उसे शिकार नहीं मिला. संध्या के समय नारद मुनि इस क्षेत्र में आये तो दूर से बहेलिया उन्हें हिरण समझकर उन पर वाण चलाने के लिए तैयार हुआ. 
जब तक वह वाण चलाता सूर्य पूरी तरह डूब गया. अंधेरा होने पर उसने देखा कि एक सर्प मेंढ़क का निगल रहा है. मृत होने के बाद मेढ़क शिव रूप में परिवर्तित हो गया. इसी प्रकार बहेलिया ने देखा कि एक हिरण को सिंह मार रहा है. मृत हिरण शिव गणों के साथ शिवलोक जा रहा है. इस अद्भुत दृश्य को देखकर बहेलिया हैरान था. इसी समय नारद मुनि ब्राह्मण वेष में बहेलिया के समक्ष उपस्थित हुए. 
बहेलिया ने नारद मुनि से इन अद्भुत दृश्यों के विषय में पूछा. नारद मुनि ने उसे समझाया कि यह अत्यंत पवित्र क्षेत्र है. इस स्थान पर मृत होने पर पशु-पक्षियों को भी मुक्ति मिल जाती है. इसके बाद बहेलिया को अपने पाप कर्मों का स्मरण हो आया कि किस प्रकार उसने पशु-पक्षियों की हत्या की है. बहेलिया ने नारद मुनि से अपनी मुक्ति का उपाय पूछा. नारद मुनि से शिव का ज्ञान प्राप्त करके बहेलिया केदार क्षेत्र में रहकर शिव उपासना में लीन हो गया. मृत्यु पश्चात उसे शिव लोक में स्थान प्राप्त हुआ. 

केदारनाथ ज्योर्तिलिंग की कथा | Kedarnath Jyotirlinga Katha in Hindi

केदारनाथ ज्योर्तिलिंग की कथा के विषय में शिव पुराण में वर्णित है कि नर और नारयण नाम के दो भाईयों ने भगवान शिव की पार्थिव मूर्ति बनाकर उनकी पूजा एवं ध्यान में लगे रहते. इन दोनों भाईयों की भक्तिपूर्ण तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव इनके समक्ष प्रकट हुए. भगवान शिव ने इनसे वरदान मांगने के लिए कहा तो जन कल्याण कि भावना से इन्होंने शिव से वरदान मांगा कि वह इस क्षेत्र में जनकल्याण हेतु सदा वर्तमान रहें. इनकी प्रार्थना पर भगवान शंकर ज्योर्तिलिंग के रूप में केदार क्षेत्र में प्रकट हुए. 

केदारनाथ से जुड़ी पाण्डवों की कथा | Kedarnath Pandavas Katha in Hindi

शिव पुराण में लिखा है कि महाभारत के युद्ध के पश्चात पाण्डवों को इस बात का प्रायश्चित हो रहा था कि उनके हाथों उनके अपने भाई-बंधुओं की हत्या हुई है. वे इस पाप से मुक्ति पाना चाहते थे. इसका समाधान जब इन्होंने वेद व्यास जी से पूछा तो उन्होंने कहा कि बंधुओं की हत्या का पाप तभी मिट सकता है जब शिव इस पाप से मुक्ति प्रदान करेंगे. शिव पाण्डवों से अप्रसन्न थे अत: पाण्डव जब विश्वानाथ के दर्शन के लिए काशी पहुंचे तब वे वहां शंकर प्रत्यक्ष प्रकट नहीं हुए. शिव को ढ़ूढते हुए तब पांचों पाण्डव केदारनाथ पहुंच गये. 
पाण्डवों को आया देखकर शिव ने भैंस का रूप धारण कर लिया और भैस के झुण्ड में शामिल हो गये . शिव की पहचान करने के लिए भीम एक गुफा के मुख के पास पैर फैलाकर खड़ा हो गया. सभी भैस उनके पैर के बीच से होकर निकलने लगे लेकिन भैस बने शिव ने पैर के बीच से जाना स्वीकार नहीं किया इससे पाण्डवों ने शिव को पहचान लिया.
इसके बाद शिव वहां भूमि में विलीन होने लगे तब भैंस बने भगवान शंकर को भीम ने पीठ की तरह से पकड़ लिया. भगवान शंकर पाण्डवों की भक्ति एवं दृढ़ निश्चय को देखकर प्रकट हुए तथा उन्हें पापों से मुक्त कर दिया. इस स्थान पर आज भी द्रौपदी के साथ पांचों पाण्डवों की पूजा होती है. यहां शिव की पूजा भैस के पृष्ठ भाग के रूप में तभी से चली आ रही है. 

केदारनाथ मंदिर | Kedarnath Temple

केदारनाथ मंदिर का निर्माण पाण्डवों ने करवाया था. लेकिन, वह मंदिर नष्ट हो गया है. वर्तमान मंदिर के विषय में मान्यता है कि इसका निर्माण 8 वी सदी में आदि गुरू शंकराचार्य ने करवाया था. यह कत्यूरी शैली में निर्मित है. मंदिर लगभग 6फुट ऊँचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है. मण्डप और गर्भगृह के चारों तरफ प्रदक्षिणा पथ बना हुआ है जहां से भक्त शिव की प्रदक्षिणा करते हैं. 
मंदिर के गर्भ गृह में नुकीली चट्टान की पूजा शिव के रूप में होती है. सामने की तरफ से भक्तगण शिव को जल एवं पुष्प चढ़ाते हैं. दूसरी तरफ से घृत अर्पित करके भक्त शिव से बॉह भरकर मिलते हैं.  मंदिर का पट भक्तों के लिए 7 बजे सुबह खुल जाता है. दोपहर एक बजे से दो बजे तक यहां विशेष पूजा होती है. इसके बाद मंदिर का पट बंद कर दिया जाता है. शाम में 5 बजे पुन: मंदिर का पट खुलता है. 7.30 बजे के आस-पास शिव का श्रृंगार करके उनकी आरती की जाती है. इसके बाद मंदिर का पट सुबह तक के लिए बंद कर दिया जाता है. मंदिर के पास ही कई कुण्ड हैं.

केदारनाथ धाम का महात्म्य | Kedarnath Dham Mahatmya

केदारनाथ का महात्म्य इस बात से सिद्ध होता है कि यहां बहेलिया शिव की पूजा करने से जीवहत्या के पाप से मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त हुआ. पाण्डवों को महाभारत के युद्ध में बंधुओं की हत्या का जो पाप लगा था उनसे मुक्ति उन्हें इसी तीर्थ स्थल पर मिली थी. कहा जाता है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन के बिना बद्रीनाथ का दर्शन करता है उसे बद्रीनाथ की यात्रा का पुण्य फल नहीं मिलता है. केदरनाथ पर चढ़ाया गया जल पीने से मनुष्य के कई-कई जन्मों के पाप समाप्त हो जाते हैं जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है. जो व्यक्ति केदारनाथ यात्रा करता है उनके पूर्वजों को भी मुक्ति मिल जाती है. 

केदारनाथ यात्रा | Kedarnath Yatra

केदारनाथ की यात्रा अप्रैल माह के मध्य से नवम्बर मध्य तक की जा सकती है. नवम्बर मध्य से अप्रैल मध्य तक बाबा केदारनाथ का पट बंद रहता है. प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालु भक्त यहां शिव के दर्शनों के लिए यहां आते हैं. केदारनाथ मार्ग में गौरी कुण्ड है. माना जाता है कि पार्वती जी ने गणेश जी को यहीं जन्म दिया था. यहां जाने के लिए हरिद्वार एवं ऋषिकेश से कई प्रकार के साधन उपलब्ध रहते हैं. गौरी कुण्ड के बाद तीव्र ढ़लान है जहां से तीर्थयात्रियों को पैदल आगे जाना होता है. जो तीर्थयात्री पैदल चलने में असमर्थ होते हैं वह पिट्ठू, पालकी अथवा घोड़े पर चढ़कर बाबा केदारनाथ के दरबार तक पहुंच सकते हैं.
Badrinath in the morning - Badrinath, Uttarakhand
CHARDHAM : BADRINATH : RAJ

बद्रीनाथ धाम | Badrinath Dham ( Badrinath Temple) - Badrinath Dham Katha

भारत के प्रसिद्ध चार धामों में द्वारिका, जगन्नाथपुरी, रामेश्वर व बदरीनाथ आते है. इन चार धामों का वर्णन वेदों व पुराणौं तक में मिलता है. चार धामों के दर्शन का सौभाग्य पूर्व जन्म पुन्यों से ही प्राप्त होता है. इन्हीं चार धामों में से एक प्रसिद्ध धाम बद्रीनाथ धाम है. बद्रीनाथ धाम भगवान श्री विष्णु का धाम है. 
बद्रीनाथ धाम ऎसा धार्मिक स्थल है, जहां नर और नारायण दोनों मिलते है. धर्म शास्त्रों की मान्यता के अनुसार इसे विशालपुरी भी कहा जाता है. और बद्रीनाथ धाम में श्री विष्णु की पूजा होती है. इसीलिए इसे विष्णुधाम भी कहा जाता है. यह धाम हिमालय के सबसे पुराने तीर्थों में से एक है. मंदिर के मुख्य द्वार को सुन्दर चित्रकारी से सजाया गया है. मुख्य द्वार का नाम सिंहद्वार है. बद्रीनाथ मंदिर में चार भुजाओं वली काली पत्थर की बहुत छोटी मूर्तियां है. यहां भगवान श्री विष्णु पद्मासन की मुद्रा में विराजमान है. 
बद्रीनाथ धाम से संबन्धित मान्यता के अनुसार इस धाम की स्थापना सतयुग में हुई थी. यहीं कारण है, कि इस धाम का माहात्मय सभी प्रमुख शास्त्रों में पाया गया है. इस धाम में स्थापित श्री विष्णु की मूर्ति में मस्तक पर हीरा लगा है. मूर्ति को सोने से जडे मुकुट से सजाया गया है. यहां की मुख्य मूर्ति के पास अन्य अनेक मूर्तियां है. जिनमें नारायण, उद्ववजी, कुबेर व नारदजी कि मूर्ति प्रमुख है. मंदिर के निकट ही एक कुंड है, जिसका जल सदैव गरम रहता है. 
बद्रीनाथ धाम भगवान श्री विष्णु का धाम है, इसीलिए इसे वैकुण्ठ की तरह माना जाता है. यह माना जाता है, कि महर्षि वेदव्याज जी ने यहीं पर महाभारत और श्रीमदभागवत महान ग्रन्थों की रचना हुई है. यहां भगवान श्री कृ्ष्ण को केशव के नाम से जाना जाता है. इसके अतिरिक्त इस स्थान पर क्योकि देव ऋषि नारद ने भी तपस्या की थी. देव ऋषि नारद के द्वारा तपस्या करने के कारण यह क्षेत्र शारदा क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध है. 
यहां आकर तपस्या करने वालों में उद्वव भी शामिल है. इन सभी की मूर्तियां यहां मंदिर में रखी गई है. मंदिर के निकट ही अन्य अनेक धार्मिक स्थल है. जिसमें नारद कुण्ड, पंचशिला, वसुधारा, ब्रह्माकपाल, सोमतीर्थ, माता मूर्ति,शेष नेत्र, चरण पादुका, अलकापुरी, पंचतीर्थ व गंगा संगम. 

बद्रीनाथ धाम पौराणिक कथा | Badrianth Dham Katha in Hindi

भगवान श्री विष्णु का विश्राम स्थल क्षीरसागर है. यहां ये शेषनाग पर लेटे रहते है. तथा देवी लक्ष्मी भगवान श्री विष्णु के पैर दबाती है. देवी से सदैव अपनी सेवा कराने की बात ऋषि नारद ने श्री विष्णु से बोल दी. ऋषि नारद की बाद से भगवान विष्णु को दु:ख पहुंचा. और वे क्षीरसागर को छोड कर हिमालय के वनों में चले गयें. वहां वे बैर खाकर तपस्या करते रहे हे.
देवी लक्ष्मी को उन्होने पहले ही नागकन्याओं के पास भेज दिया था. नागकन्याओं के पास से जब देवी लक्ष्मी लौटी तो, वे वहां भगवान श्री विष्णु को न पाकर परेशान हो गई़. कई जगहों पर श्री विष्णु को ढूंढने पर वे हिमालय में ढूंढने पहुंच गई. वहां देवी को भगवान श्री विष्णु बेर के वनों में तपस्या करने नजर आयें. इस पर देवी ने भगवान श्री विष्णु को बेर के  स्वामी के नाम से संम्बोधित किया. तभी से इस धाम का नाम बद्रीनाथ पडा है.    
बद्रीनाथ धाम के कपाट वर्ष में छ: माह बन्द रहते है. सामान्यत: मई माह में ये कपाट दर्शनों के लिये खुल जाते है. कपाट खुलने पर मंदिर की अखंड ज्योति के दर्शनों को विशेष कल्याणकारी कहा गया है.  

श्री लक्ष्मी जी की आरती
Shri Laxmi Ji Ki आरती


MATA LAXMI




ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता |
तुमको निशदिन सेवत, हर विष्णु विधाता || 
ॐ जय 

ब्रह्माणी रूद्राणी कमला, तू हि है जगमाता |
सूर्य चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता || 
ॐ जय 

दुर्गा रूप निरंजन, सुख सम्पति दाता |
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि धन पाता || 
ॐ जय 

तू ही है पाताल बसन्ती, तू ही है शुभ दाता |
कर्म प्रभाव प्रकाशक, भवनिधि से त्राता || 
ॐ जय 

जिस घर थारो वासो, तेहि में गुण आता |
कर न सके सोई कर ले, मन नहिं धड़काता || 
ॐ जय 

तुम बिन यज्ञ न होवे, वस्त्र न कोई पाता |
खान पान को वैभव, सब तुमसे आता || 
ॐ जय 

शुभ गुण सुंदर मुक्त्ता, क्षीर निधि जाता |
रत्त्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नही पाता || 
ॐ जय 

आरती लक्ष्मी जी की, जो कोई नर गाता |
उर आनन्द अति उपजे, पाप उतर जाता || 
ॐ जय 

स्थिर चर जगत बचावे, शुभ कर्म नर लाता |
मिश्रा परिवार मैया की शुभ दृष्टि चाहता || 
ॐ जय 

Shri Khatu Shyam Ji Ki Aarti

श्री खाटू श्याम जी की आरती
Shri Khatu Shyam Ji Ki Aarti
बाबा श्याम, खाटू, राजस्थान 


ॐ जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे |
खाटू धाम विराजत, अनुपम रूप धरे || ॐ

रतन जड़ित सिंहासन, सिर पर चंवर ढुरे |
तन केसरिया बागो, कुण्डल श्रवण पड़े || ॐ

गल पुष्पों की माला, सिर पार मुकुट धरे |
खेवत धूप अग्नि पर दीपक ज्योति जले || ॐ

मोदक खीर चूरमा, सुवरण थाल भरे |
सेवक भोग लगावत, सेवा नित्य करे || ॐ

झांझ कटोरा और घडियावल, शंख मृदंग घुरे |
भक्त आरती गावे, जय - जयकार करे || ॐ

जो ध्यावे फल पावे, सब दुःख से उबरे |
सेवक जन निज मुख से,श्री श्याम-श्याम उचरे||ॐ

श्री श्याम बिहारी जी की आरती, जो कोई नर गावे |
कहत भक्त - जन, मनवांछित फल पावे || ॐ

जय श्री श्याम हरे, बाबा जी श्री श्याम हरे |
निज भक्तों के तुमने, पूरण काज करे || ॐ

SHRI GANGA JI KI AARTI

श्री गंगा जी की आरती 
Shri Ganga Ji Ki Aarti
Ganga Aarti,Haridwar - , Maharashtra

ॐ जय गंगे माता, श्री गंगे माता |
जो नर तुमको ध्यावता, मनवंछित फल पाता |

चन्द्र सी ज्योत तुम्हारी जल निर्मल आता |

शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता |

पुत्र सगर के तारे सब जग को ज्ञाता |

कृपा दृष्टि तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता |

एक ही बार भी जो नर तेरी शरणगति आता |

यम की त्रास मिटा कर, परम गति पाता |

आरती मात तुम्हारी जो जन नित्य गाता |

दास वही जो सहज में मुक्ति को पाता |

ओउम जय गंगे माता |

SHRI SHIV SHANKAR JI KI AARTI


श्री शिवजी की आरतीShivji Ki Arti


Jai Shiva Omkara – Shiv Aarti

शिवजी की आरती
कर्पूरगौरं करुणावतारं, संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् |
सदावसन्तं हृदयारविन्दे, भवं भवानीसहितं नमामि ||
ॐ जय शिव ॐकारा, स्वामी हर शिव ॐकारा |
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्धांगी धारा || – ॐ जय शिव ॐकारा
एकानन चतुरानन पंचानन राजे, स्वामी पंचानन राजे |
हंसासन गरुड़ासन वृष वाहन साजे || – ॐ जय शिव ॐकारा
दो भुज चारु चतुर्भुज दस भुज से सोहे, स्वामी दस भुज से सोहे |
तीनों रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे || – ॐ जय शिव ॐकारा
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी, स्वामि मुण्डमाला धारी |
चंदन मृग मद सोहे भाले शशि धारी || – ॐ जय शिव ॐकारा
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघाम्बर अंगे, स्वामी बाघाम्बर अंगे |
सनकादिक ब्रह्मादिक भूतादिक संगे || – ॐ जय शिव ॐकारा
कर में श्रेष्ठ कमण्डलु चक्र त्रिशूल धरता, स्वामी चक्र त्रिशूल धरता |
जगकर्ता जगहर्ता जग पालन कर्ता || – ॐ जय शिव ॐकारा
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका, स्वामि जानत अविवेका |
प्रणवाक्षर में शोभित यह तीनों एका || – ॐ जय शिव ॐकारा
निर्गुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे, स्वामि जो कोई नर गावे |
कहत शिवानंद स्वामी मन वाँछित फल पावे || – ॐ जय शिव ॐकारा
|| ॐ नमः पार्वती पतये हर हर महादेव  ||


श्री अथ शिवजी की आरती 
(Shri Ath Shivji Ki Aarti)

शीश गंग अर्द्धागड़ पार्वती,
सदा विराजत कैलाशी |

नंदी भृंगी नृत्य करत हैं,
धरत ध्यान सुर सुख रासी ||

शीतल मंद सुगंध पवन बहे,
वहाँ बैठे है शिव अविनासी |
करत गान गंधर्व सप्त स्वर,
राग रागिनी सब गासी ||

यक्षरक्ष भैरव जहं डोलत,
बोलत है बनके वासी |
कोयल शब्द सुनावत सुन्दर,
भंवर करत हैं गुंजासी ||

कल्पद्रुम अरु पारिजात,
तरु लाग रहे हैं लक्षासी |
कामधेनु कोटिक जहं डोलत,
करत फिरत है भिक्षासी ||

सूर्य कांत समपर्वत शोभित,
चंद्रकांत अवनी वासी |
छहों ऋतू नित फलत रहत हैं,
पुष्प चढ़त हैं वर्षासी ||

देव मुनिजन की भीड़ पड़त है,
निगम रहत जो नित गासी |
ब्रह्मा विष्णु जाको ध्यान धरत हैं,
कछु शिव हमको फरमासी ||

ऋद्धि-सिद्धि के दाता शंकर,
सदा अनंदित सुखरासी |
जिनको सुमरिन सेवा करते,
टूट जाय यम की फांसी ||

त्रिशूलधर को ध्यान निरन्तर,
मन लगाय कर जो गासी |
दूर करे विपता शिव तन की
जन्म-जन्म शिवपत पासी ||

कैलाशी काशी के वासी,
अविनासी मेरी सुध लीज्यो |
सेवक जान सदा चरनन को,
आपन जान दरश दीज्यो ||

तुम तो प्रभुजी सदा सयाने,
अवगुण मेरो सब ढकियो |
सब अपराध क्षमाकर शंकर,
किंकर की विनती सुनियो ||

VAISHNON DEVI KI AARTI



 माता वैष्णो रानी की आरती 




MATA VAISHNON DEVI KI AARTI


MATA VAISHNO DEVI DARBAR

जै वैष्णो माता,  मैया जै वैष्णो माता ।
हाथ जोड़ तेरे आगे, आरती मैं गाता ॥
जै वैष्णो माता....
शीश पे छत्र बिराजे, मूरतिया प्यारी ।
गंगा बहती चरनन, ज्योति जगे न्यारी ॥
जै वैष्णो माता…
ब्रह्मा वेद पढ़े नित द्वारे, शंकर ध्यान धरे ।
सेवक चंवर डुलावत, नारद नृत्य करे ॥
जै वैष्णो माता…
सुंदर गुफा तुम्हारी, मन को अति भावे ।
बार-बार देखन को, ऐ मां मन चावे ॥
जै वैष्णो माता…
भवन पे झण्डे झूले, घंटा ध्वनि बाजे ।
ऊंचा पर्वत तेरा, माता प्रिय लागे ॥
जै वैष्णो माता…
पान सुपारी ध्वजा नारियल, भेंट पुष्प मेवा ।
दास खड़े चरणों में, दर्शन दो देवा ॥
जै वैष्णो माता…
जो जन निश्चय करके, द्वार तेरे आवे ।
उसकी इच्छा पूरण, माता हो जावे ॥
जै वैष्णो माता…
इतनी आय निशदिन, जो नर भी गावे ।
कहते सेवक ध्यानू, सुख संपति पावे ॥
जै वैष्णो माता…

राजेश  मिश्रा अपने परिवार के साथ
माता रानी के दरबार में जाने की तैयारी में 

माँ वैष्णो देवी के दरबार (वैष्णो देवी बोर्ड धर्मशाला) 
के पास लेखक राजेश मिश्रा

DIL ka RAJ: माता वैष्णो रानी की आरती

DIL ka RAJ: माता वैष्णो रानी की आरती: "माता वैष्णो रानी की आरती"

Shri Hanuman ji Ki Aarti


 II Shri Hanuman ji Ki Aarti II
श्री हनुमान जी की आरती
संकटमोचन नाम तिहारो : जय श्री हनुमान 
Hanuman ji ki Aarti
 II Shri Hanuman ji Ki Aarti II
Aarti Ke Jai Hanuman Lalaki (3). Dusht dalan Raghunath kalaki
Jaakay bal say giriwar kaapay, Roog doosh jakay nikat na jhankay
Anjani putra maha balli daayee, Santan kay prabhu sada sahaye...

Day beeraa Raghunath pataway, Lanka jaaree seeya soodi laayee
Lanka so koti Samundra Seekhaayee, Jaat pawansut baran layee
Lanka Jaari Asur Sanghaaray, Seeya Ramjee kay kaaj sawaray...

Lakshman moor chet paray Sakaaray, Aani Sajeewan praan ubaaray
Paitee pataal toori jam kaaray, Ahi Ravana kee bujaa ukhaaray
Baayay bujaa asur dhal maaray, Dahinay bujaa sant jam taray...
Sur nar Muni aarati utaaray, Jai jai jai Hanuman ucharaay
Kanchan thaar Kapoor loo chaayee, Aaaarati karat Anjani maayee
Jo Hanuman kee Aaarati gaaway, Basee Baikoontha param pad paaway...
आरती करते राजेश मिश्रा

मेरी ब्लॉग सूची

  • World wide radio-Radio Garden - *प्रिये मित्रों ,* *आज मैं आप लोगो के लिए ऐसी वेबसाईट के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसमे आप ऑनलाइन पुरे विश्व के रेडियों को सुन सकते हैं। नीचे दिए गए ल...
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