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18 जून 2011

गंगा-सरयू व सोन के संगम चिरांद पर आस्था का सैलाब
ganga aarti on chirand
छपरा : मानव के उत्थान व पतन का साक्षी 'चिरांद' बुधवार की संध्या गंगा के प्रति लोगों के हृदय में अपार श्रद्धा का साक्षी बना। ज्येष्ठ पूर्णिमा की धवल चांदनी रात में ज्ञान, वैराग्य व राम की कीर्ति के प्रतीक तीन पवित्र नदियों के संगम पर स्थित इस अति महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल पर गंगा महाआरती के रूप में जो सांस्कृतिक धारा प्रवाहित हुई वह दिव्य आनंद का अनुभूति कराते हुए त्रिपथगा मां गंगा की रक्षा के संकल्प सभा में बदल गयी। इस अवसर पर चिरांद के गौरवशाली अतीत को लौटाने की भी बात हुई। इस संकल्प सभा में प्रमंडल के वरीय प्रशासनिक अधिकारी, देश के विभिन्न तीर्थो से पधारे धर्माचार्य, शिक्षाविद्, कानूनविद् व सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल थे। चिरांद विकास परिषद के तत्वावधान में पिछले तीन वर्षो से यह आयोजन होता रहा है। महाआरती के समय ही बारिश शुरू हो गयी लेकिन गंगा के प्रति आस्था ने लोगों को वहां समेटे रखा।
सारण के जिला मुख्यालय छपरा से महज दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित गंगा-सरयू व सोन के संगम पर आज काशी-हरिद्वार का दर्शन हो रहा था। कतारबद्ध आसन किए धर्माचार्यो के आदेश पर काशी से आए बटुकों ने वैदिक मंत्रों व शिव-गंगा स्त्रोतों की सांगीतिक प्रस्तुतियों के बीच मां गंगे की आरती शुरू की तो घाट पर उमड़ा विशाल जनसैलाब बिल्कुल मौन हो गया। गंगा की ओर से आ रहे पवन के झोंकों की सांय-सांय की आवाज मंत्रों व स्त्रोतों को मानो स्वर दे रही थी।
आरती के बाद सारण के प्रमंडलीय आयुक्त इन्द्रसेन सिंह ने सांस्कृतिक समारोह का उद्घाटन दीप प्रज्वलित कर किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि गंगा व चिरांद जैसे धरोहर की रक्षा व विकास के इस प्रयास में सरकार भी आपके साथ खड़ी है। वहीं समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित सारण के जिलाधिकारी विनय कुमार ने कहा कि जनचेतना जागरण से ही गंगा जैसी नदियों की रक्षा सम्भव है। उन्होंने कहाकि चिरांद को पर्यटन के विश्व मानचित्र पर लाने के प्रयास शुरू हो गए हैं। उन्होंने कहाकि जहां आवश्यकता होगी हम साथ हैं।

NEPAL : PASHUPATINATH YATRA

शुपतिनाथ मन्दिर (नेपाल)


निर्माण तिथि:400 ईसवी
प्रमुख आराध्य : पशुपतिनाथ
स्थापत्य:पगोडा़
स्थिति : काठमांडू, नेपाल
Pashupatinathskc.JPG
PASHUPATINATH:NEPAL:RAJESH MISHRA

पशुपतिनाथ शिवजी का एक नाम है। शिव के बिना पुरुष पशु है। मानव पाश में बँधा तभी मुक्त होता है जब वह शिव को पा लेता है।

पशुपतिनाथ मंदिर, नेपाल की राजधानी काठमांडू के पूर्वी भाग में बागमती नदी के किनारे पर स्थित एक हिंदू मंदिर है। नेपाल के एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनने से पहले यह मंदिर राष्ट्रीय देवता, भगवान पशुपतिनाथ का मुख्य निवास माना जाता था। यह मंदिर यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में सूचीबद्ध है।

पशुपतिनाथ में आस्थावानों (मुख्य रूप से हिंदुओं) को मंदिर परिसर में प्रवेश करने की अनुमति है। गैर हिंदू आगंतुकों बागमती नदी के दूसरे किनारे से इसे बाहर से देखने की अनुमति है।

यह मंदिर नेपाल में शिव का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है।

पशुपतिनाथ मंदिर (नेपाली: मन्दिर पशुपतिनाथको) काठमांडू, नेपाल की राजधानी के पूर्वी हिस्से में बागमती नदी के तट पर स्थित दुनिया के सबसे बड़े भगवान शिव के मंदिर के एक है. मंदिर राष्ट्रीय देवता, भगवान पशुपतिनाथ की सीट के रूप में सेवा की है, जब तक नेपाल secularized था. मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की सूची में सूचीबद्ध है.

पशुपतिनाथ (मुख्य रूप से हिंदुओं) के विश्वासियों के लिए मंदिर परिसर में प्रवेश की अनुमति है. किसी को भी जन्म होता है मंदिर के अधिकारियों ने एक गैर हिंदू नहीं माना नेपाल या भारत में. गैर हिंदू आगंतुकों बागमती नदी के दूसरे बैंक से मंदिर पर एक नजर है की अनुमति है.

यह सबसे भगवान शिव (पशुपति) के मंदिरों में पवित्र माना जाता है.

पशुपतिनाथ मंदिर, काठमांडू [नेपाल]
Pashupatinath Temple, Kathmandu [Nepal]





काठमांडू के पूर्वी हिस्से में बागमती नदी के तट पर स्थित पशुपतिनाथ मंदिर हिंदू धर्म के आठ सबसेपवित्र स्थलों में से एक माना जाता है। नेपाल में यह भगवान शिव का सबसे पवित्र मंदिर माना जाताहै। यह मंदिर दुनिया भर के हिंदू तीर्थयात्रियों के अलावा गैर-हिंदू पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी रहा है।यह मंदिर यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में सूचीबद्ध है।
पशुपतिनाथ मंदिर में गैर हिंदू आगंतुकों को बागमती नदी के दूसरे किनारे से इसे बाहर से देखने कीअनुमति है। नेपाल में भगवान शिव का मंदिर विश्वभर में विख्यात है। इसका असाधारण महत्व भारतके अमरनाथ व केदारनाथ से किसी भी प्रकार कम नहीं। इस अंतर्राष्ट्रीय तीर्थ के दर्शन के लिए भारत केही नहीं, विदेशों के असंख्य यात्री और पर्यटक काठमांडू पहुंचते हैं। इस नगर के चारों ओर पर्वतमालाएं हैंजिनकी घाटियों में यह नगर अपना पर्वतीय सौंदर्य मुक्तहस्त से बिखेरने के लिए थोड़ी-सी भी कंजूसीनहीं करता।

एक समय इस नगर का नाम कांतिपुर था। काठमांडू मेंबागमती व विष्णुमती का संगम है। मंदिर का शिखरस्वर्णवर्णी अपनी छटा बिखेरता रहता है, साथ में डमरू सहितत्रिशूल है। मंदिर एक मीटर ऊंचे चबूतरे पर विराजमान है।मंदिर के चारों ओर पशुपतिनाथ जी के सामने चार दरवाजे हैं।दक्षिणी द्वार पर तांबे की परत पर स्वर्णजल चढ़ाया हुआ है।बाकी तीन पर चांदी की परत है। मंदिर चौकोर है। दोनों छतों केचार कोनों पर उत्कृष्ट कोटि की कारीगरी से सिंह की शक्ल बनाई गई है। मुख्य मंदिर में महिष रूपधारीभगवान शिव का शिरोभाग है जिसका पिछला हिस्सा केदारनाथ में है। इसका प्रसंग स्कंद पुराण में है।

मंदिर का अधिकतर भाग काष्ठ-निर्मित है। गर्भगृह में पंचमुखी शिवलिंग-विग्रह है जो अन्यत्र नहीं है।मंदिर परिसर में अनेक मंदिर हैं जिनमें पूर्व की ओर गणेश जी का मंदिर है। मंदिर के प्रांगण की दक्षिणीदिशा में एक द्वार है जिसके बाहर एक सौ चौरासी शिवलिंगों की कतारें हैं।

पशुपतिनाथ मंदिर के दक्षिण में उन्मत्त भैरव के दर्शन भैरवउपासकों के लिए बहुत कल्याणकारी है। पशुपतिनाथङ्क्षलग-विग्रह में चार दिशाओं में चार मुख और ऊपरी भाग मेंपांचवां मुख है। प्रत्येक मुखाकृति के दाएं हाथ में रुद्राक्ष कीमाला और बाएं हाथ में कमंडल है। हरेक मुख अलग-अलगगुण प्रकट करता है। पहला मुख अघोर मुख है, जो दक्षिण कीओर है। पूर्व मुख को तत्पुरुष कहते हैं। उत्तर मुख अर्धनारीश्वररूप है। पश्चिमी मुखी को सद्योजात कहा जाता है। ऊपरी भागईशान मुख के नाम से पुकारा जाता है। यह निराकार मुख है।यही भगवान पशुपतिनाथ का श्रेष्ठतम मुख है।

1747 से नेपाली राजाओं ने पूजा-अर्चना के लिए भारतीय ब्राह्मणों को आमंत्रित करना शुरू किया।उनकी धारणा थी कि भारतीय ब्राह्माण हिंदू धर्मशास्त्रों और रीतियों में ज्यादा पारंगत होते हैं। इसीपरंपरा को आगे बढ़ाते हुए माल्ला राजवंश के एक राजा ने एक दक्षिण भारतीय ब्राह्मण को पशुपतिनाथ मंदिर का प्रधान पुजारी नियुक्त किया। यही परंपरा आगे भी जारी रही और दक्षिण भारतीय भट्टब्राह्मण ही इस मंदिर के प्रधान पुजारी होते चले आए।

SHIV SHANKAR CHALISA



                     Shree Shiva Chalisa
                        श्री शिव चालीसा
दोहा :
अज अनादि अविगत अलख अकल अकुल अविकार
वंदे शिव पद युग कमल अमल अतीव उदार ॥
आर्ति हरण सुख करण शुभ भक्ति मुक्ति दातार 
करो अनुग्रह दान लखि अपनो बिरद विचार 
पड्यो पतित भवकूप महं सहजनकर आगार ॥
सहज सुहृद पावन पतति सहजहिलेहु बार
पलक पलक आशाभरियो रह्योसु बट निहार
हरो तुरंत स्वभाव वश नेक् न करो अबार ॥


चरणं :
जय शिव शंकर औघर दानि जय गिरि तनय मात् भवानि ॥1॥
सर्वोत्तम योगि योगेश्वर सर्वलोक ईश्वर परमेश्वर ॥2॥
सबवुरप्रेरक सर्वनियंता उपद्रष्ट भर्ता अनुमंता ॥ 3॥
पराशक्ति पति अखिल विश्वपति परब्रह्म परंधाम परमगति ॥ 4॥
सर्वातीत अनन्य सर्वगत निज स्वरूप महमामें स्थितरत ॥ 5॥
अंगभूति भूषित स्मशान चर भुजंग भूषण चंद्रमकुट धर ॥ 6॥
वृषवाहन नंदीगण नायक अखिल विश्वके भाग्य विधायक ॥7॥
व्याघ्र चर्म परिधान मनोहर रीच चर्म ओढे गिरिजावर ॥8॥
कर त्रिशूल ढमरू कर राजत अभय वरद मुदा शुभ साजत ॥9॥
तनु कर्पूर गौर उज्वलतम पिंगल जटा जूट शिरवुत्तम ॥10॥
फाल त्रिपुंड्र मुंड मालाधर गल रुद्राक्ष माल शोभाकर ॥11॥
विधि हरि रुद्र त्रिविध वपुधारि जने सुजन पालन लयकारि ॥12॥
तुम हो नित्य दयाके सागर आशु तोष आनंद वुजागर ॥13॥
अति दयालु भोले भंडारि अगजग सबके मंगलकारि ॥14॥
सती पार्वतीके प्राणेश्वर स्कंद गणेश जनक शिव सुखकर ॥15॥
हर हर एक रूप गुणशीला कर त स्वामि सेवक् की लीला ॥16॥
रहते दोवु पूजक वालीत पूजा पद्धति सभन्नि शिखावत ॥17॥


मारुति बन हरि सेवा कीन्हिं रामेश्वर बन सेवा लीन्हिं ॥18॥
जगहित घोर हालाहल पीकर बनेसदाशिव नीलकंठ वर ॥19॥
अमरासुर शुचिवरद शुभंकर अमर निहंत प्रभु प्रलयंकर ॥20॥
नमश्शिवाय मंत्र पंचाक्षर जपत मिटत सब क्लेश भयंकर ॥21॥
जो नरनारी रटते शिव शिव नित तिन को शिव अति करत परमहित ॥22॥
श्रीकृष्ण तप कोन्हूं भारी ह्वै प्रसन्न वर दियो पुरारि ॥23॥
अर्जुन संगलडे किरात बन दियो पाशुपत अस्त्र मुदित मन ॥24॥
भक्तन के सब कष्ट निवारे निज भक्त सबन्हि उद्धारे ॥25॥
शंख चूड जालंधर मारे दैत्य असंख्य प्राण हर तारे ॥26॥
अंधकको गणपति पद दीन्हों शुक्र शुक्र पथ बाहुर कीन्हों ॥27॥
तेहि संजीवनि विद्या दीन्हिं बाणासुर गणपति गति कीन्हिं ॥28॥
अष्टमूर्ति पंचानन चिन्मय द्वादश ज्योतिर्लिंग ज्योतिर्मय ॥29॥
भुवन चतुर्दश व्यापक रूपा अकथ अचिंत्य असीम अनुपा ॥30॥
काशी मरत जंतु अवलोकी देत मुक्ति पद करत अशोकी ॥31॥
भक्त भगीरथ की रुचि राखी जटा बसी गंगा सुर साखी ॥32॥
रुरु अगस्त्य उपमन्यू ज्ञानी ऋषि दधीच अधिक विज्ञानी ॥33॥
शिव रहस्य शिप ज्ञान प्रचारक शिवहि परमप्रिय लोकोद्धारक ॥34॥
इनके शुभ सुमरनते शंकर देत मुदित ह्वै अति दुर्लभ वर ॥35॥
अति उदार करुणा वरुणालय हरण दैन्य दारिद्य्र दु:ख भय ॥36॥
तुम्हरो भजन परम हितकारी विप्र शूद्र सबही अधिकारी ॥37॥
बालक वृद्ध नारी नर ध्यावहिं ते अलभ्य शिव पदको पावहिं ॥38॥
भेद शून्य तुम सबके स्वामी सहज सुहृद सेवक अनुगामी ॥39॥
जो जन शरण तुम्हारी आवत सकल दुरित तत्काल नशावत ॥40॥

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