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20 जून 2011

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग | Rameshwaram Jyotirlinga


7. रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग | Rameshwaram Jyotirlinga (Rameshwaram Temple)


रामेश्वरम ज्योतिर्लिग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिगों में से एक है. इस ज्योतिर्लिग के विषय में यह मान्यता है, कि इस ज्योतिर्लिग की स्थापना स्वयं हनुमान प्रिय भगवान श्रीराम ने की थी. भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग को भगवान राम का नाम रामेश्वरम दिया गया है.

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग स्थापित करने का संबन्ध उस पौराणिक घटना से बताया जाता है, जिसमें भगवान श्रीराम ने अपनी पत्नी देवी सीता को राक्षसराज रावण की कैद से मुक्त कराने के लिए जिस समय लंका पर चढाई की थी. उस समय चढाई करने से पहले श्रीविजय का आशिर्वाद प्राप्त करने के लिए इस स्थान पर रेत से शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की पूजा की गई थी.

उसी समय से यह ज्योतिर्लिंग सदैव के लिए यहां स्थापित हो गया था. रामेश्वरं स्थान भगवान शिव के प्रमुख धामों मे से एक है. यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडू राज्य के रामनाथपुरं नामक स्थान में स्थित है. भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ साथ यह स्थान हिन्दूओं के चार धामों में से एक भी है.

जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग है, वह स्थान समुद्र के निकट है, तथा यह स्थान बंगाल की खाडी और हिंद महासागर से घिरा हुआ है. यह धार्मिक स्थल के साथ साथ सौन्दर्य स्थल भी है. कहा जाता है, कि भगवान राम ने यहां तक एक बांध बनाया था. जो बाद में तोड दिया गया था. आज भी देखने से रामसेतु का कुछ भाग देखा जा सकता है.

रामेश्वरं ज्योतिर्लिंग की स्थापना कथा | Rameshwaram Jyotirlinga Establishment Katha in Hindi

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के विषय में एक अन्य पौराणिक कथा प्रचलित है. कि जब भगवान श्री राम माता सीता को रावण की कैद से छुडाकर अयोध्या जा रहे थे़ उस समय उन्होने 
मार्ग में गन्धमदान पर्वत पर रुक कर विश्वाम किया था. विश्वाम करने के बाद उन्हें ज्ञात हुआ कि यहां पर ऋषि पुलस्त्य कुल का नाश करने का पाप लगा हुआ है. इस श्राप से बचने के लिए उन्हें इस स्थान पर भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग स्थापित कर पूजन करना चाहिए.  
यह जानने के बाद भगवान श्रीराम ने हनुमान से अनुरोध किया कि वे कैलाश पर्वत पर जाकर शिवलिंग लेकर आयें. 
भगवान राम के आदेश पाकर हनुमान कैलाश पर्वत पर गए, परन्तु उन्हें वहां भगवान शिव के दर्शन नहीं हो पाए. इस पर उन्होने भगवान श्विव का ध्यानपूर्वक जाप किया. जिसके बाद भगवान श्विव ने प्रसन्न होकर उन्हे दर्शन दिए. और हनुमान जी का उद्देश्य पूरा किया. 
इधर हनुमान जी को तप करने और भगवान शिव को 
प्रसन्न करने के कारण देरी हो गई. और उधर भगवान राम और देवी सीता शिवलिंग की स्थापना का शुभ मुहूर्त लिए प्रतिक्षा करते रहें. शुभ मुहूर्त निकल जाने के डर से देवी जानकीने विधिपूर्वक बालू का ही लिंग बनाकर उसकी स्थापना कर दी.  
शिवलिंग की स्थापना होने के कुछ पलों के बाद हनुमान जी शंकर जी से लिंग लेकर पहुंचे तो उन्हें दुख और आश्चर्य दोनों हुआ. हनुमान जी जिद करने लगे की उनके द्वारा लाए गये शिवलिंग को ही स्थापित किया जाएं. इसपर भगवान राम ने कहा की तुम पहले से स्थापित बालू का शिवलिंग पहले हटा दो, इसके बाद तुम्हारे द्वारा लाये गये शिवलिंग को स्थापित कर दिया जायेगा.  
हनुमान जी ने अपने पूरे सामर्थ्य से शिवलिंग को हटाने का प्रयास किया, परन्तु वे असफल रहें. बालू का शिवलिंग अपने स्थान से हिलने के स्थान पर, हनुमान जी ही लहूलुहान हो गए़. हनुमान जी की यह स्थिति देख कर माता सीता रोने लगी. और हनुमान जी को भगवान राम ने समझाया की शिवलिंग को उसके स्थान से हटाने का जो पाप तुमने किया उसी के कारण उन्हें  यह शारीरिक कष्ट झेलना पडा.  
अपनी गलती के लिए हनुमान जी ने भगवान राम से क्षमा मांगी और जिस शिवलिंग को हनुमान जी कैलाश पर्वत से लेकर आये थे. उसे भी समीप ही स्थापित कर दिया गया. इस लिंग का नाम भगवान राम ने हनुमदीश्वर रखा. 
इन दोनो शिवलिंगों की प्रशंसा भगवान श्री राम ने स्वयं अनेक शास्त्रों के माध्यम से की है. 

रामेश्वरम शिवलिंग दर्शन महिमा | Rameshwaram Shivlinga Darshan Importance

जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्वा और विश्वास के साथ रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग और हनुमदीश्वर लिंग का दर्शन करता है, उसे सभी पापों से मुक्ति मिलती है. यहां के दर्शनों का मह्त्व सभी प्रकार के यज्ञ और तप से अधिक कहा गया है. इसके अतिरिक्त यह भी कहा जाता है, कि यहां के दर्शन मात्र से ही व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है. यह स्थान ज्योतिर्लिंग और चार धाम यात्रा दोनों के फल देता है. 

श्री रामेश्वरम 24 कुएं | Shri Rameshwaram 24 Wells


श्री रामेश्वरम में 24 कुएं है, जिन्हें "तीर्थ" कहकर सम्बोधित किया जाता है. इन कुंओं के जल से स्नान करने पर व्यक्ति को विशेष पुन्य की प्राप्ति होती है. यहां का जल मीठा है. इन कुंओं में आकर स्नान करने से व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है. कहा जाता है, कि ये कुंए भगवान राम के बाण चलाने से बने है. इस सम्बन्ध में एक अन्य मान्यता भी प्रसिद्ध है, जिसके अनुसार इन कुंओं मे सभी तीर्थों का जल लाकर छोडा गया है, इसलिए इन कुंओं के जल से स्नान करने पर व्यक्ति को सभी तीर्थों में स्नान करने के समान पुन्य फल प्राप्त होता है.

श्री रामेश्वरम पितरों तर्पण स्थल | Shri Ramehwaram : Pitra Tarpan Site

रामेश्वरम को पित्तरों के तर्पण का स्थल भी कहा गया है. यह स्थान दो ओर से सागरों से घिरा हुआ है. इस स्थान पर आकर श्रद्वालु अपने पित्तरों के लिए कार्य करते है. तथा समुद्र के जल में स्नान करते है. इसके अतिरिक्त यहां पर एक लक्ष्मणतीर्थ नाम से स्थान है, इस स्थान पर श्रद्वालु मुण्डन और श्राद्व कार्य दोनों करते है.  
रामेश्वरम मंदिर के विषय में कहा जाता है कि जिन पत्थरों से यह मंदिर बना है, वे पत्थर श्रीलंका से लाये गए थे, क्योकि यहां आसपास क्या दूर दूर तक कोई पहाड नहीं है.  

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग-Bhimashanker Jyotirlinga


6. भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग | Bhimashanker Jyotirlinga (Bhimashanker Temple) | Moteshwar Jyotirlinga

भीमाशंकर मंदिर काशीपुर् में ज्योतिर्लिंग के रुप में है. इस मंदिर की गणना भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में की जाती है. इस ज्योतिर्लिंग के निकट ही भीमा नामक नदी बहती है. इसके अतिरिक्त यहां बहने वाली एक अन्य नदी कृ्ष्णा नदी है. दो पवित्र नदियों के निकट बहने से इस स्थान की महत्वत्ता ओर भी बढ जाती है. 
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है. धर्म पुराणों में भी इस ज्योतिर्लिंग का वर्णन मिलता है. इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से व्यक्ति के समस्त दु:खों से छुटकारा मिलता है. इस मंदिर के विषय में यह मान्यता है, कि जो भक्त श्रद्वा से इस मंदिर के प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर होते है. तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग स्वत: खुल जाते है.
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पूणे जिले में सहाद्रि नामक पर्वत पर स्थित है. पास में ही बहती भीमा नदी इसके सौन्दर्य को बढाती है. महाशिवरात्री या प्रत्येक माह में आने वाली शिवरात्री में यहां पहुंचने के लिए विशेष बसों का प्रबन्ध किया जाता है. 
इसके अतिरिक्त भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का एक अन्य पौराणिक मान्यता भी है, कि जो व्यक्ति सुबह स्नान और नित्यकर्म क्रियाओं के बाद प्रात: 12 ज्योतिर्लिगों का नाम जाप भी करता है. उसके सभी पापों का नाश होता है. 

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग स्थापना कथा | Bhimashanker Jyotirlinga Establishment Katha in Hindi

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का नाम भीमा शंकर किस कारण से पडा इस पर एक पौराणिक कथा प्रचलित है. कथा महाभारत काल की है. महाभारत का युद्ध पांडवों और कौरवों के मध्य हुआ था.  इस युद्ध ने भारत मे बडे महान वीरों की क्षति हुई थी. दोनों ही पक्षों से अनेक महावीरों और सैनिकों को युद्ध में अपनी जान देनी पडी थी. 
इस युद्ध में शामिल होने वाले दोनों पक्षों को गुरु द्रोणाचार्य से प्रशिक्षण प्राप्त हुआ था. कौरवों और पांडवों ने जिस स्थान पर दोनों को प्रशिक्षण देने का कार्य किया था. वह स्धान है. आज उज्जनक के नाम से जाना जाता है. यहीं पर आज भगवान महादेव का भीमशंकर विशाल ज्योतिर्लिंग है. कुछ लोग इस मंदिर को भीमाशंकर ज्योतिर्लिग भी कहते है. 

भीमशंकर ज्योतिर्लिंग कथा शिवपुराण अनुसार | Bhimashanker Jyotirlinga Katha : According to Shiva Puran

भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का वर्णन शिवपुराण में मिलता है. शिवपुराण में कहा गया है, कि पुराने समय में भीम नाम का एक राक्षस था. वह राक्षस कुंभकर्ण का पुत्र था. परन्तु उसका जन्म ठिक उसके पिता की मृ्त्यु के बाद हुआ था. अपनी पिता की मृ्त्यु भगवान राम के हाथों होने की घटना की उसे जानकारी नहीं थी. समय बीतने के साथ जब उसे अपनी माता से इस घटना की जानकारी हुई तो वह श्री भगवान राम का वध करने के लिए आतुर हो गया.   
अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए उसने अनेक वर्षों तक कठोर तपस्या की. उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे ब्रह्मा जी ने विजयी होने का वरदान दिया. वरदान पाने के बाद राक्षस निरंकुश हो गया. उससे मनुष्यों के साथ साथ देवी देवताओ भी भयभीत रहने लगे.  
धीरे-धीरे सभी जगह उसके आंतक की चर्चा होने लगी. युद्ध में उसने देवताओं को भी परास्त करना प्रारम्भ कर दिया.    
जहां वह जाता मृ्त्यु का तांडव होने लगता.  उसने सभी और पूजा पाठ बन्द करवा दिए. अत्यन्त परेशान होने के बाद सभी देव भगवान शिव की शरण में गए.
भगवान शिव ने सभी को आश्वासन दिलाया की वे इस का उपाय निकालेगें.  भगवान शिव ने राक्षस को नष्ट कर दिया. भगवान शिव से सभी देवों ने आग्रह किया कि वे इसी स्थान पर शिवलिंग रुप में विराजित हो़.  उनकी इस प्रार्थना को भगवान शिव ने स्वीकार किया. और वे भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के रुप में आज भी यहां विराजित है. 

वैद्यनाथ धाम देवघर | Baidyanath Dham


बैद्यनाथ धाम (देवघर) 12 ज्योतिर्लिंग में नहीं आता, बैद्यनाथ (प्रलयम) को 12 ज्योतिर्लिंग (5वां) में गिना जाता है...?
नीचे पढ़ें.... द्वादश ज्योतिर्लिंग जहाँ-जहाँ विराजमान हैं.... इसमें समाहित है... और इसमें वैद्यनाथ परली में बताया गया है.. "परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां  भीमशङ्करम्।...."

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥1॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्। सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥2॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे। हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥3॥
एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रात: पठेन्नर:। सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥4॥


महाराष्ट्र के पास परभनी नामक जंक्शन है, वहां से परली तक एक ब्रांच लाइन गयी है, इस परली स्टेशन से थोड़ी दूर पर परली ग्राम के निकट श्रीवैद्यनाथ नामक ज्योतिर्लिङ्ग है। परंतु शिवपुराण में वैद्यनाथं चिताभूमौ ऐसा पाठ है, इसके अनुसार संथाल परगना (झारखंड) में जसीडीह स्टेशन के पासवाला वैद्यनाथ नामक ज्योतिर्लिङ्ग सिद्ध होता है, क्योंकि यही चिताभूमि है। परंपरा और पौराणिक कथाओं से भी देवघर में ही श्रीवैद्यनाथ ज्योतिर्लिङ्ग का प्रमाण मिलता है।

5. वैद्यनाथ धाम देवघर  | Baidyanath Dham (Baidhyanath Mandir) | Deoghar Dham

बिहार से अलग हुए झारखंड राज्य में भगवान भोलेनाथ के द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक नवम ज्योर्तिलिंग विराजमान है. इस ज्योर्तिर्लिंग को वैद्यनाथ धाम के नाम से जाना जाता है. 

वैद्यनाथ धाम की पौराणिक कथा | Baidyanath Dham Katha

पौराणिक कथाओं के अनुसार यह ज्योर्तिलिंग लंकापति रावण द्वारा यहां लया गया था. इसकी एक बड़ी ही रोचक कथा है. रावण भगवान शंकर का परम भक्त था. शिव पुरण के अनुसार एक बार भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण हिमालय पर्वत पर जाकर शिव लिंग की स्थापना करके कठोर तपस्या करने लगा. कई वर्षों तक तप करने के बाद भी भगवान शंकर प्रसन्न नहीं हुए तब रावण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए अपने सिर की आहुति देने का निश्चय किया. 
विधिवत पूजा करते हुए दशानन रावण एक-एक करके अपने नौ सिरों को काटकर शिव लिंग पर चढ़ाता गया जब दसवां सिर काटने वाला था तब भगवान शिव वहां प्रकट हुए और रावण को वरदान मांगने के लिए कहा. रावण को जब इच्छित वरदान मिल गया तब उसने भगवान शिव से अनुरोध किया कि वह उन्हें अपने साथ लंका ले जाना चाहता है. 
शिव ने रावण से कहा कि वह उसके साथ नहीं जा सकते हैं. वह चाहे तो यह शिवलिंग ले जा सकता है. भगवान शिव ने रावण को वह शिवलिंग ले जाने दिया जिसकी पूजा करते हुए उसने नौ सिरों की भेंट चढ़ाई थी. शिवलिंग को ले जाते समय शिव ने रावण से कहा कि इस ज्योर्तिलिंग को रास्ते में कहीं भी भूमि पर मत रखना अन्यथा यह वहीं पर स्थापित हो जाएगा. 
भगवान विष्णु नहीं चाहते थे कि यह ज्योर्तिलिंग लंका पहुंचे अत: उन्होंने गंगा से रावण के पेट में समाने का अनुरोध किया. रावण के पेट में जैसे ही गंगा पहुंची रावण के अंदर मूत्र करने की इच्छा प्रबल हो उठी. वह सोचने लगा कि शिवलिंग को किसी को सौंपकर लघुशंका करले तभी विष्णु भगवान एक ग्वाले के भेष में वहां प्रकट हुए. रावण ने उस ग्वाले बालक को देखकर उसे शिवलिंग सौंप दिया और ज़मीन पर न रखने की हिदायत दी. 
रावण जब मूत्र करने लगा तब गंगा के प्रभाव से उसकी मूत्र की इच्छा समाप्त नहीं हो रही थी ऐसे में रावण को काफी समय लग गया और वह बालक शिव लिंग को भूमि पर रखकर विलुप्त हो गया. रावण जब लौटकर आया तब लाख प्रयास करने के बावजूद शिवलिंग वहां से टस से मस नहीं हुआ अंत में रावण को खाली हाथ लंका लौटना जाना पड़ा. बाद में सभी देवी-देवताओं ने आकर इस ज्योर्तिलिंग की पूजा की और विधिवत रूप से स्थापित किया. 

वैद्यनाथ धाम मंदिर | Baidyanath Dham Temple

काफी वर्षों के बाद वैजनाथ नामक एक व्यक्ति को पशु चराते हुए इस शिवलिंग के दर्शन हुए. इसी के नाम से यह ज्योर्तिलिंग वैद्यनाथ धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ. मान्यता है कि वैद्यनाथ धाम के मंदिरों का निर्माण देव शिल्पी विश्वकर्मा ने किया है. मंदिर निर्माण के विषय में कथा है कि   मंदिर बनाते समय जब देवी पार्वती के मंदिर का निर्माण विश्वकर्मा कर रहे थे उस समय अचानक दिन निकल आने के कारण विश्वकर्मा को निर्माण कार्य बंद कर देना पड़ा जिससे पार्वती का मंदिर विष्णु एवं शिव के मंदिर से छोटा रह गया. इस मंदिर के प्रांगण में गंगा मैया, भैरव नाथ सहित कई देवी-देवताओं के मंदिर हैं. मंदिर के प्रांगण में एक प्राचीन कुआं भी है.
वैद्यनाथ धाम देवघर यात्रा: वैद्यनाथ धाम में यूं तो सालों भर लोग शिव के नवम ज्योर्तिलिंग के दर्शन के लिए आते हैं. किन्तु सावन एवं अश्विन मास में यहां श्रद्धालुओं की अपार भीड़ पहुंचती है. यहां आने वाले श्रद्धालु भक्तों को बम के नाम से पुकारा जाता है. 

देवघर कांवड़ यात्रा | Deoghar Kanwar Yatra

देवघर में कांवड़ चढ़ाने का बड़ा ही महत्व है. श्रद्धालु भक्त सुल्तानगंज से गंगा का जल लेकर लगभग 106 किलोमीटर की दूरी  पैदल यात्रा करते हुए देवघर बाबाधाम की यात्रा करते हैं. रास्ते में कई धर्मशाला हैं जहां वह विश्राम करते हुए अपनी यात्रा पूरी करते हैं. कांवड़ चढ़ाने वाले इन बामों को सामान्य बम कहा जाता है. यह रास्ते भर बोल बम-बोल बम का नारा लगाते हैं. 

डाक बम | Dak Bam

कुछ लोग सुल्तान गंज से गंगाजल लेकर डाकबम बनकर 24 घंटे में 106 किलोमीटर की दूरी तय कर बाबा धाम पहुंचते हैं और बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करते हैं. 

दंड प्रणाम करने वाले बम

कुछ लोग अपनी मन्नतों को पूरा करने के लिए अपने घर से ही दंड प्रणाम करते हुए देवघर की यात्रा करते हैं. इनकी यात्रा काफी कष्टकारी एवं लम्बी होती है

देवघर का महात्म्य | Deoghar Mahatmya

बाबा भोले नाथ अनाथों के नाथ हैं. यह औढ़र दानी कहे जाते हैं. श्रद्धा पूर्वक जो भी इनके द्वार पहुंचता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती है. कुछ लोग यहां अपनी मनोकामना मांगने आते हैं तो कुछ अपनी मनोकामनापूर्ण होने पर शिव का आभार प्रकट करने यहां आते हैं. बाबा वैद्यनाथ की कृपा से पुत्र की प्राप्ति होती है. जिन कन्याओं की शादी में बाधा आ रही होती है. शिव के इस द्वार पर कांवड़ चढ़ाने से उनकी शादी में आने वाली बाधा टल जाती है और जल्दी उनकी शादी हो जाती है. बाबा गरीबों की झोली भरते हैं. रोगी को रोग से मुक्ति देते हैं. 

देवघर का प्रसाद | Deoghar Prasaad

बाबा वैद्यनाथ के मंदिर के चारों तरफ बाज़ार है जहां चूड़ा, पेड़ा, चीनी का बना ईलांइची दाना, सिंदूर, माला आदि मिलता है. लोग प्रसाद स्वरूप इन चीजों को खरीदकर अपने घर ले जाते हैं. यहां से कुछ किलोमीटर दूर वासुकीनाथ के रास्ते में घोड़मारा नामक स्थान हैं जहां का पेड़ा अति स्वादिष्ट होता है. आप बाबाधाम की यात्रा करते समय अपने परिवार एवं कुटुम्बों के लिए प्रसाद के तौर पर यहां से पेड़ा खरीद सकते हैं.

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग | Omkareshwar Jyotirlinga


4. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग | Omkareshwar Jyotirlinga

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग भोपाल राज्य में स्थित है. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग को भोपाल का सर्वश्रेष्ठ ज्योतिर्लिंग माना गया है. यह ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश में पुणे जिले में स्थित है. इस ज्योतिर्लिंग के बाद से दक्षिण भारत का प्रवेश प्रारम्भ होता है.
जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है. और पहाडी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊँ का आकार बनता है. ऊं शब्द की उत्पति ब्रह्रा के मुख से हुई है. इसका उच्चारण सबसे पहले जगत पिता देव ब्रह्ना जी ने किया था. किसी भी धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ ऊँ नाम के उच्चारण के बिना नहीं किया जाता है.
यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ऊँ का आकार लिए हुए है. इस कारण इसे औंकारेश्वर नाम से जाना जाता है. ओंकारेश्वर मंदिर में 108 शिवलिंग है. तथा यहां 33 करोड देवताओं का निवास होने की मान्यता है. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग में भी 2 ज्योतिर्लिंग है. जिसमें ओंकारेश्वर और दूसरा ममलेश्वर ज्योतिलिंग है. 
भारत के कुल 12 ज्योतिर्लिंगों में से दो ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश में स्थित है. इसमें से एक उज्जैन में महाकाल है, तथा दूसरा ओंकारेश्वर खण्डवा में है. खण्डवा में ज्योतिर्लिंग के दो स्वरुप है. दोनों स्वरुपों के दर्शन से मिलने वाला पुन्य फल समान है. दोनों को धार्मिक महत्व समान है.

ओंकारेश्वर ज्योतिलिंग स्थापना कथा | Omkareshwar Jyotirlinga Establishment Saga in Hindi 

खण्डवा में ज्योतिर्लिंग के दो रुपों की पूजा की जाती है. दो रुपों की पूजा करने से संबन्धित एक पौराणिक कथा प्रचलित है. कथा इस प्रकार है. कि एक बार विन्ध्यपर्वत ने भगवान शिव की कई माहों तक कठिन तपस्या की उनकी इस तपस्या से प्रसन्न होकर शंकर जी ने उन्हें साक्षात दर्शन दिये. और विन्ध्य पर्वत से अपनी इच्छा प्रकट करने के लिए कहा. इस अवसर पर अनेक ऋषि और देव भी उपस्थित थे़. विन्ध्यपर्वत की इच्छा के अनुसार भगवान शिव ने ज्योतिर्लिंग के दो भाग किए. एक का नाम ओंकारेश्वर रखा तथा दूसरा ममलेश्वर रखा.
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग को स्वयं भगवान शिव ने स्थापित किया है. यहां जाने के लिए श्रद्वालुओं को दो कोठरीयों से होकर जाना पडता है. और इन कोठरियों में अत्यधिक अंधेरा रहता है. इन कोठरियों में सदैव जल भरा रहता है. श्रद्वालुओं को इस जल से ही होकर जाना पडता है. 
भगवान शिव के उपासक यहां भगवान शिव का पूजन चने की दाल चढाकर करते है. रात्रि में भगवान शिव का पूजन और रात्रि जागरण करने का अपना एक विशेष महत्व है. शिवरात्रि पर यहां विशेष मेलों का आयोजन किया जाता है. इसके अतिरिक्त कार्तिक मास में पूर्णिमा तिथि मे भी यहां बहुत बडे मेले का आयोजन किया जाता है.
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग में पांच केदारों के दर्शन करने के समान फल प्राप्त होता है. यहां दर्शन करने से केदारनाथ के दर्शन करने के समान फल मिलता है.

ओंकारेश्वर मंदिर महिमा | Glory of Omkareshwar Temple

देवस्थानसमं ह्येतत् मत्प्रसादाद् भविष्यति।
अन्नदानं तप: पूजा तथा प्राणविसर्जनम्।
ये कुर्वन्ति नरास्तेषां शिवलोकनिवासनम्।।[1]

शिव पुराण में ओंकारेश्वार मंदिर की महिमा का गुणगान किया गया है. यह स्थान अलौकिक तीर्थ स्थानों में आता है. इस तीर्थ स्थान के विषय में कहा जाता है. कि इस तीर्थ स्थान में तप और पूजन करने से व्यक्ति की मनोकामना अवश्य पूरी होती है. और व्यक्ति इस लोक के सभी भोगों को भोग कर परलोक में विष्णु लोक को प्राप्त करता है.  

ओंकारेश्वार ज्योतिर्लिंग से संबन्धित एक अन्य कथा | Another Story Related to Omkareshwar Jyotirlinga

भगवान के महान भक्त अम्बरीष और मुचुकुन्द के पिता सूर्यवंशी राजा मान्धाता ने इस स्थान पर कठोर तपस्या करके भगवान शंकर को प्रसन्न किया था. उस महान पुरुष मान्धाता के नाम पर ही इस पर्वत का नाम मान्धाता पर्वत हो गया. 
ओंकारेश्वर लिंग किसी मनुष्य के द्वारा गढ़ा, तराशा या बनाया हुआ नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक शिवलिंग है. इसके चारों ओर हमेशा जल भरा रहता है. प्राय: किसी मन्दिर में लिंग की स्थापना गर्भ गृह के मध्य में की जाती है और उसके ठीक ऊपर शिखर होता है, किन्तु यह ओंकारेश्वर लिंग मन्दिर के गुम्बद के नीचे नहीं है. इसकी एक विशेषता यह भी है कि मन्दिर के ऊपरी शिखर पर भगवान महाकालेश्वर की मूर्ति लगी है. कुछ लोगों की मान्यता है कि यह पर्वत ही ओंकाररूप है.
परिक्रमा के अन्तर्गत बहुत से मन्दिरों के विद्यमान होने के कारण भी यह पर्वत ओंकार के स्वरूप में दिखाई पड़ता है. ओंकारेश्वर के मन्दिर ॐकार में बने चन्द्र का स्थानीय ॐ इसमें बने हुए चन्द्रबिन्दु का जो स्थान है, वही स्थान ओंकारपर्वत पर बने ओंकारेश्वर मन्दिर का है. मालूम पड़ता है इस मन्दिर में शिव जी के पास ही माँ पार्वती की भी मूर्ति स्थापित है. यहाँ पर भगवान परमेश्वर महादेव को चने की दाल चढ़ाने की परम्परा है.

महाकाल मंदिर- Mahakaleshwar Jyotirlinga


3. महाकाल मंदिर- Mahakaleshwar Jyotirlinga

उज्जैन नगरी सदा से ही धर्म और आस्था की नगरी रही है. उज्जैन की मान्यता किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं है. यहां पर स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग पूरे विश्व में एक मात्र ऎसा ज्योतिर्लिंग है. जो दक्षिण की और मुख किये हुए है. यह ज्योतिर्लिंग तांत्रिक कार्यो के लिए विशेष रुप से जाना जाता है. 
इसके अतिरिक्त इस ज्योतिर्लिग की सबसे बडी विशेषता यह है कि यह ज्योतिर्लिंग स्वयंभू है. अर्थात इसकी स्थापना अपने आप हुई है. इस धर्म स्थल में जो भी व्यक्ति पूरी श्रद्वा और विश्वास के साथ आता है. उस व्यक्ति के आने का औचित्य अवश्य पूरा होता है. महाकाल की पूजा विशेष रुप से आयु वृ्द्धि और आयु पर आये हुए संकट को टालने के लिए की जाती है. स्वास्थय संबन्धी किसी भी प्रकार के अशुभ फल को कम करने के लिए भी महाकाल ज्योतिर्लिंग में पूजा-उपासना करना पुन्यकारी रहता है.   
महाकालेश्वर मंदिर के विषय में मान्यता है, कि महाकाल के भक्तो का मृ्त्यु और बीमारी का भय समाप्त हो जाता है. और उन्हें यहां आने से अभय दान मिलता है. महाकाल ज्योतिर्लिंग उज्जैन के राजा है. और वर्षों से उज्जैन कि रक्षा कर रहे है. 

महालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापना कथा |Mahaleshwar Jyotirling Establishment Saga in HIndi 

महालेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना से संबन्धित के प्राचीन कथा प्रसिद्ध है. कथा के अनुसार एक बार अवंतिका नाम के राज्य में राजा वृ्षभसेन नाम के राजा राज्य करते थे. राजा वृ्षभसेन भगवान शिव के अन्यय भक्त थे. अपनी दैनिक दिनचर्या का अधिकतर भाग वे भगवान शिव की भक्ति में लगाते थे. 
एक बार पडौसी राजा ने उनके राज्य पर हमला कर दिया. राजा वृ्षभसेन अपने साहस और पुरुषार्थ से इस युद्ध को जीतने में सफल रहा. इस पर पडौसी राजा ने युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए अन्य किसी मार्ग का उपयोग करना उचित समझा. इसके लिए उसने एक असुर की सहायता ली. उस असुर को अदृश्य होने का वरदान प्राप्त था. 
राक्षस ने अपनी अनोखी विद्या का प्रयोग करते हुए अवंतिका राज्य पर अनेक हमले की. इन हमलों से बचने के लिए राजा वृ्षभसेन ने भगवान शिव की शरण लेनी उपयुक्त समझी. अपने भक्त की पुकार सुनकर भगवान शिव वहां प्रकट हुए और उन्होनें स्वयं ही प्रजा की रक्षा की. इस पर राजा वृ्षभसेन ने भगवान शिव से अंवतिका राज्य में ही रहने का आग्रह किया, जिससे भविष्य में अन्य किसी आक्रमण से बचा जा सके. राजा की प्रार्थना सुनकर भगवान वहां ज्योतिर्लिंग के रुप में प्रकट हुए. और उसी समय से उज्जैन में महाकालेश्वर की पूजा की जाती है.    

महाकालेश्वर मंदिर मान्यता और महत्व | Mahakaleshwar Temple: Belief and Importance

उज्जैन राज्य में महाकाल मंदिर में दर्शन करने वाले भक्त ज्योतिर्लिंग के साथ साथ भगवान कि पूजा में प्रयोग होने वाली भस्म के दर्शन अवश्य करते है, अन्यथा श्रद्वालु को अधूरा पुन्य मिलता है. भस्म के दर्शनों का विशेष महत्व होने के कारण ही यहां आरती के समय विशेष रुप से श्रद्वालुओं का जमघट होता है. 
आरती के दौरान जलती हुई भस्म से ही यहां भगवान महाकालेश्वर का श्रंगार किया जाता है. इस कार्य को दस नागा साधुओं के द्वारा किया जाता है. भस्म आरती में केवल पुरुष भक्त ही भाग ले सकते है. और दर्शन कर सकते है. महिलाओं को इस दौरान दर्शन और पूजन करना वर्जित होता है. 
इसके अतिरिक्त जो भक्त इस मंदिर में सोमवती अमावस्या के दिन यहां आकर पूजा करता है, उसके सभी पापों का नाश होता है. 

कोटि कुण्ड उज्जैन | Koti Kund Ujjain

दक्षिणामुखी महाकालेश्वर मंदिर के निकट ही एक कुण्ड है. इस कुण्ड को कोटि कुण्ड के नाम  से जाना जाता है. इस कुण्ड में कोटि-कोटि तीर्थों का जल है. अर्थात इस कुण्ड में अनेक तीर्थ स्थलों का जल होने की मान्यता है. इसी वजह से इस कुण्ड में स्नान करने से अनेक तीर्थ स्थलों में स्नान करने के समान पुन्यफल प्राप्त होता है. इस कुण्ड की स्थापना भगवान राम के परम भक्त हनुमान के द्वारा की गई थी. 

महाकाल मंत्र | Mahakal Mantra

ऊँ महाकाल महाकाय, महाकाल जगत्पते। 
महाकाल महायोगिन्‌ महाकाल नमोऽस्तुते॥

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग - Mallikarjun Jyotirlinga



2. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग - Mallikarjun Jyotirlinga

12 ज्योतिर्लिंगों की श्रेणी में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग आता है. यह ज्योतिर्लिंग आन्ध्र प्रदेश में कृ्ष्णा नदी के तट पर श्री शैल नाम के पर्वत पर स्थित है. इस मंदिर का महत्व उतरी भारत में भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है. भारत के अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते है. 
कुछ धर्म ग्रन्थ इस धर्म की व्याख्या करते हुए कहते है, कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है. उसके सभी मनोरथ पूरे होते है. एक पौराणिक कथा के अनुसार जहां पर यह ज्योतिर्लिंग है, उस पर्वत पर आकर शिव का पूजन करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुन्य फल प्राप्त होते है. 

श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिग स्थापना कथा | Shri Mallikarjun Jyotirlinga Establishment Katha in Hindi

कथा के अनुसार भगवान शंकर के दोनों पुत्रों में आपस में इस बात पर विवाद उत्पन्न हो गया कि पहले किसका विवाह होगा. जब श्री गणेश और श्री कार्तिकेय जब विवाद में किसी हल पर नहीं पहुंच पायें तो दोनों अपना- अपना मत लेकर भगवान शंकर और माता पार्वती के पास गए.  अपने दोनों पुत्रों को इस प्रकार लडता देख, पहले माता-पिता ने दोनों को समझाने की कोशिश की.   
परन्तु जब वे किसी भी प्रकार से गणेश और कार्तिकेयन को समझाने में सफल नहीं हुए, तो उन्होने दोनों के समान एक शर्त रखी. दोनों से कहा कि आप दोनों में से जो भी पृ्थ्वी का पूरा चक्कर सबसे पहले लगाने में सफल रहेगा. उसी का सबसे पहले विवाह कर दिया जायेगा. 
विवाह की यह शर्त सुनकर दोनों को बहुत प्रसन्नता हुई. कार्तिकेयन का वाहन क्योकि मयूर है, इसलिए वे तो शीघ्र ही अपने वाहन पर सवार होकर इस कार्य को पूरा करने के लिए चल दिए.  परन्तु समस्या श्री गणेश के सामने आईं, उनका वाहन मूषक है., और मूषक मन्द गति जीव है. अपने वाहन की गति का विचार आते ही श्री गणेश समझ गये कि वे इस प्रतियोगिता में इस वाहन से नहीं जीत सकते. 
श्री गणेश है. चतुर बुद्धि, तभी तो उन्हें बुद्धि का देव स्थान प्राप्त है, बस उन्होने क्या किया, उन्होनें प्रतियोगिता जीतने का एक मध्य मार्ग निकाला और, शास्त्रों का अनुशरण करते हुए,   अपने माता-पिता की प्रदक्षिणा करनी प्रारम्भ कर दी. शास्त्रों के अनुसार माता-पिता भी पृ्थ्वी के समान होते है. माता-पिता उनकी बुद्धि की चतुरता को समझ गये़. और उन्होने भी श्री गणेश को कामना पूरी होने का आशिर्वाद दे दिया.   
शर्त के अनुसार श्री गणेश का विवाह सिद्धि और रिद्धि दोनों कन्याओं से कर दिया गया. पृ्थ्वी की प्रदक्षिणा कर जब कार्तिकेयन वापस लौटे तो उन्होने देखा कि श्री गणेश का विवाह तो हो चुका है. और वे शर्त हार गये है. श्री गणेश की बुद्धिमानी से कार्तिकेयन नाराज होकर श्री शैल पर्वत पर चले गये़ श्री शैल पर माता पार्वती पुत्र कार्तिकेयन को समझाने के लिए गई. और भगवान शंकर भी यहां ज्योतिर्लिंग के रुप में अपनी पुत्र से आग्रह करने के लिए पहुंच गयें. उसी समय से श्री शैल पर्वत पर मल्लिकार्जुन ज्योर्तिलिंग की स्थापना हुई, और इस पर्वत पर शिव का पूजन करना पुन्यकारी हो गया.  

श्री मल्लिकार्जुन कथा | Shri Mallikarjun Katha in Hindi

इस पौराणिक कथा के अलावा भी श्री मल्लिकार्जुन ज्योर्तिलिंग के संबन्ध में एक किवदंती भी प्रसिद्ध है. किवदंती के अनुसार एक समय की बात है, श्री शैल पर्वत के निकट एक राजा था. जिसकानाम चन्द्रगुप्त था. उस राजा की एक कन्या थी. वह कन्या अपनी किसी मनोकामना की पूर्ति हेतू महलों को छोडकर श्री शैलपर्वत पर स्थित एक आश्रम में रह रही थी. उस कन्या के पास एक सुन्दर गाय थी. प्रतिरात्री जब कन्या सो जाती थी. तो उसकी गाय का दूध को दुह कर ले जाता था.  
एक रात्रि कन्या सोई नहीं और जागकर चोर को पकडने का प्रयास करने लगी. रात्रि हुई चोर आया, कन्या चोर को पकडने के लिए उसके पीछे भागी परन्तु कुछ दूरी पर जाने पर उसेकेवल वहा शिवलिंग ही मिला. कन्या ने उसी समय उस शिवलिंग पर श्री मल्लिकार्जुन मंदिर का निर्माण कार्य कराया. 
प्रत्येक वर्ष यहां शिवरात्रि के अवसर पर एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है. वही स्थान आज श्री मल्लिका अर्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध है. इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से भक्तों की इच्छा की पूर्ति होती है. और वह व्यक्ति इस लोक में सभी भोग भोगकर, अन्य लोक में भी श्री विष्णु धाम में जाता है.

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग - Mallikarjun Jyotirlinga


2. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग - Mallikarjun Jyotirlinga

12 ज्योतिर्लिंगों की श्रेणी में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग आता है. यह ज्योतिर्लिंग आन्ध्र प्रदेश में कृ्ष्णा नदी के तट पर श्री शैल नाम के पर्वत पर स्थित है. इस मंदिर का महत्व उतरी भारत में भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है. भारत के अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते है. 
कुछ धर्म ग्रन्थ इस धर्म की व्याख्या करते हुए कहते है, कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है. उसके सभी मनोरथ पूरे होते है. एक पौराणिक कथा के अनुसार जहां पर यह ज्योतिर्लिंग है, उस पर्वत पर आकर शिव का पूजन करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुन्य फल प्राप्त होते है. 

श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिग स्थापना कथा | Shri Mallikarjun Jyotirlinga Establishment Katha in Hindi

कथा के अनुसार भगवान शंकर के दोनों पुत्रों में आपस में इस बात पर विवाद उत्पन्न हो गया कि पहले किसका विवाह होगा. जब श्री गणेश और श्री कार्तिकेय जब विवाद में किसी हल पर नहीं पहुंच पायें तो दोनों अपना- अपना मत लेकर भगवान शंकर और माता पार्वती के पास गए.  अपने दोनों पुत्रों को इस प्रकार लडता देख, पहले माता-पिता ने दोनों को समझाने की कोशिश की.   
परन्तु जब वे किसी भी प्रकार से गणेश और कार्तिकेयन को समझाने में सफल नहीं हुए, तो उन्होने दोनों के समान एक शर्त रखी. दोनों से कहा कि आप दोनों में से जो भी पृ्थ्वी का पूरा चक्कर सबसे पहले लगाने में सफल रहेगा. उसी का सबसे पहले विवाह कर दिया जायेगा. 
विवाह की यह शर्त सुनकर दोनों को बहुत प्रसन्नता हुई. कार्तिकेयन का वाहन क्योकि मयूर है, इसलिए वे तो शीघ्र ही अपने वाहन पर सवार होकर इस कार्य को पूरा करने के लिए चल दिए.  परन्तु समस्या श्री गणेश के सामने आईं, उनका वाहन मूषक है., और मूषक मन्द गति जीव है. अपने वाहन की गति का विचार आते ही श्री गणेश समझ गये कि वे इस प्रतियोगिता में इस वाहन से नहीं जीत सकते. 
श्री गणेश है. चतुर बुद्धि, तभी तो उन्हें बुद्धि का देव स्थान प्राप्त है, बस उन्होने क्या किया, उन्होनें प्रतियोगिता जीतने का एक मध्य मार्ग निकाला और, शास्त्रों का अनुशरण करते हुए,   अपने माता-पिता की प्रदक्षिणा करनी प्रारम्भ कर दी. शास्त्रों के अनुसार माता-पिता भी पृ्थ्वी के समान होते है. माता-पिता उनकी बुद्धि की चतुरता को समझ गये़. और उन्होने भी श्री गणेश को कामना पूरी होने का आशिर्वाद दे दिया.   
शर्त के अनुसार श्री गणेश का विवाह सिद्धि और रिद्धि दोनों कन्याओं से कर दिया गया. पृ्थ्वी की प्रदक्षिणा कर जब कार्तिकेयन वापस लौटे तो उन्होने देखा कि श्री गणेश का विवाह तो हो चुका है. और वे शर्त हार गये है. श्री गणेश की बुद्धिमानी से कार्तिकेयन नाराज होकर श्री शैल पर्वत पर चले गये़ श्री शैल पर माता पार्वती पुत्र कार्तिकेयन को समझाने के लिए गई. और भगवान शंकर भी यहां ज्योतिर्लिंग के रुप में अपनी पुत्र से आग्रह करने के लिए पहुंच गयें. उसी समय से श्री शैल पर्वत पर मल्लिकार्जुन ज्योर्तिलिंग की स्थापना हुई, और इस पर्वत पर शिव का पूजन करना पुन्यकारी हो गया.  

श्री मल्लिकार्जुन कथा | Shri Mallikarjun Katha in Hindi

इस पौराणिक कथा के अलावा भी श्री मल्लिकार्जुन ज्योर्तिलिंग के संबन्ध में एक किवदंती भी प्रसिद्ध है. किवदंती के अनुसार एक समय की बात है, श्री शैल पर्वत के निकट एक राजा था. जिसकानाम चन्द्रगुप्त था. उस राजा की एक कन्या थी. वह कन्या अपनी किसी मनोकामना की पूर्ति हेतू महलों को छोडकर श्री शैलपर्वत पर स्थित एक आश्रम में रह रही थी. उस कन्या के पास एक सुन्दर गाय थी. प्रतिरात्री जब कन्या सो जाती थी. तो उसकी गाय का दूध को दुह कर ले जाता था.  
एक रात्रि कन्या सोई नहीं और जागकर चोर को पकडने का प्रयास करने लगी. रात्रि हुई चोर आया, कन्या चोर को पकडने के लिए उसके पीछे भागी परन्तु कुछ दूरी पर जाने पर उसेकेवल वहा शिवलिंग ही मिला. कन्या ने उसी समय उस शिवलिंग पर श्री मल्लिकार्जुन मंदिर का निर्माण कार्य कराया. 
प्रत्येक वर्ष यहां शिवरात्रि के अवसर पर एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है. वही स्थान आज श्री मल्लिका अर्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध है. इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से भक्तों की इच्छा की पूर्ति होती है. और वह व्यक्ति इस लोक में सभी भोग भोगकर, अन्य लोक में भी श्री विष्णु धाम में जाता है.

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग | Somnath Jyotirlinga

1. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग | Somnath Jyotirlinga
ह्न्दिओं के भारत में अनेक धर्मस्थल है. भारत देश धार्मिक आस्था और विश्वास का देश है. यहां शिवलिंग की विशेष रुप से पूजा की जाती है. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु इस पृ्थ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग है. यह मंदिर गुजरात राज्य में है. इस मंदिर कि यह मान्यता है, कि इस मंदिर का निर्माण स्वयं देव चन्द्र ने किया था. विदेशी आक्रमणों के कारण यह 17 बार नष्ट हो चुका है. हर बार यह बनता और बिगडता रहा है. 

12 ज्योतिर्लिंग | 12 Jyotirlinga

संम्पूर्ण भारत में 12 ज्योतिर्लिंग है. पहला ज्योतिर्लिंग सोमनाथ ज्योतिर्लिंग है. यह ज्योतिर्लिंग  सौराष्टृ में कठवाडा नामक स्थान में है. मल्लिकार्जुन श्री शैल ज्योतिर्लिंग, महाकाल ज्योतिर्लिंग, ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग, केदारनाथ ज्योतिर्लिंग, भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग, विश्वनाथ विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग, त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग, वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग, नागेश्वर ज्योतिर्लिंग, रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग, घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग. 
इस प्रकार कुल 12 ज्योतिर्लिंग है.किवदंतियों के अनुसार इस स्थान पर ही भगवान श्री कृ्ष्ण ने अपनी देह का त्याग किया था. इस वजह से यहां आज भी भगवान शिव के साथ साथ भगवान श्री कृ्ष्ण का भी सुन्दर मंदिर है. 

सोमनाथ मंदिर - शिवजी के 137 मंदिर | Somnath Temple - 137 Temples of lord Shiva

सोमनाथ मंदिर में प्राचीन समय में अन्य अनेक देवों के मंदिर भी थे़ इसमें शिवजी के 137 मंदिर थे. भगवान श्री विष्णु के 7, देवी के 27, सूर्यदेव के 16,  श्री गणेश के 5 मंदिर थे़ समय के साथ इन मंदिरों की संख्या कुछ कम हो गई है. सोमनाथ मंदिर से 200 किलोमीटर दूर श्रीकृ्ष्ण की द्वारिका नगरी मानी जाती है. यहां भी भारत के ही नहीं वरण देश विदेश से अनेक भक्त दर्शनों के लिए आते है.

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर कथा | Somnath Jyotirlinga Temple Katha in Hindi

ज्योतिर्लिंग के प्राद्रुभाव की एक पौराणिक कथा प्रचलित है. कथा के अनुसार राजा दक्ष ने अपनी सताईस कन्याओं का विवाह चन्द देव से किया था. सत्ताईस कन्याओं का पति बन कर देव बेहद खुश थे. सभी कन्याएं भी इस विवाह से प्रसन्न थी. इन सभी कन्याओं में चन्द्र देव सबसे अधिक रोहिंणी नामक कन्या पर मोहित थे़. जब यह बात दक्ष को मालूम हुई तो उन्होनें चन्द्र देव को समझाया. लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ. उनके समझाने का प्रभाव यह हुआ कि उनकी आसक्ति रोहिणी के प्रति और अधिक हो गई. 
यह जानने के बाद राजा दक्ष ने देव चन्द्र को शाप दे दिया कि, जाओं आज से तुम क्षयरोग के मरीज हो जाओ. श्रापवश देव चन्द्र् क्षय रोग से पीडित हो गए. उनके सम्मान और प्रभाव में भी कमी हो गई. इस शाप से मुक्त होने के लिए वे भगवान ब्रह्मा की शरण में गए. 
इस शाप से मुक्ति का ब्रह्मा देव ने यह उपाय बताया कि जिस जगह पर आप सोमनाथ मंदिर है, उस स्थान पर आकर चन्द देव को भगवान शिव का तप करने के लिए कहा. भगवान ब्रह्मा जी के कहे अनुसार भगवान शिव की उपासना करने के बाद चन्द्र देव श्राप से मुक्त हो गए.
उसी समय से यह मान्यता है, कि भगवान चन्द इस स्थान पर शिव तपस्या करने के लिए आये थे.  तपस्या पूरी होने के बाद भगवान शिव ने चन्द्र देव से वर मांगने के लिए कहा. इस पर चन्द्र देव ने वर मांगा कि हे भगवान आप मुझे इस श्राप से मुक्त कर दीजिए. और मेरे सारे अपराध क्षमा कर दीजिए. 
इस श्राप को पूरी से समाप्त करना भगवान शिव के लिए भी सम्भव नहीं था. मध्य का मार्ग निकाला गया, कि एक माह में जो पक्ष होते है. एक शुक्ल पक्ष और कृ्ष्ण पक्ष एक पक्ष में उनका यह श्राप नहीं रहेगा. परन्तु इस पक्ष में इस श्राप से ग्रस्त रहेगें. शुक्ल पक्ष और कृ्ष्ण पक्ष में वे एक पक्ष में बढते है, और दूसरे में वो घटते जाते है. चन्द्र देव ने भगवान शिव की यह कृ्पा प्राप्त करने के लिए उन्हें धन्यवाद किया. ओर उनकी स्तुति की.   
उसी समय से इस स्थान पर भगवान शिव की इस स्थान पर उपासना करना का प्रचलन प्रारम्भ हुआ.   तथा भगवान शिव सोमनाथ मंदिर में आकर पूरे विश्व में विख्यात हो गए. देवता भी इस स्थान को नमन करते है. इस स्थान पर चन्द्र देव भी भगवान शिव के साथ स्थित है. 

 सोमनाथ कुण्ड स्थापाना | Somnath Kund Establishment

यहां से संबन्धित एक अन्य कथा के अनुसार यहां पर स्थित सोमनाथ नामक कुंड की स्थापना देवों के द्वारा की गई है. यह माना जाता है, कि इस स्थन पर भगवान शिव और ब्रहा देव आज भी निवास करते है.  वर्तमान में जो भी श्रद्वालु इस कुंड में स्नान करता है. वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है. यहां तक की असाध्य से असाध्य रोग भी इस स्थान पर आकर ठिक हो जाते है.  अगर कोई व्यक्ति क्षय रोग से युक्त है, तो उसे पूरे छ: माह तक इस कुंड् में स्नान करना चाहिए. इससे वह व्यक्ति रोगमुक्त हो जाता है.    

सोमनाथ मंदिर महिमा | Somnath Temple Importance

RAJESH MISHRA, KOLKATA
इसके अतिरिक्त किसी कारण वश अगर कोई व्यक्ति यहां दर्शनों के लिए नहीं आ सकता है. तो उसे केवल यहां की उत्पत्ति की कथा सुन लेनी चाहिए. यह कथा सुनने मात्र से व्यक्ति पुन्य का भागी बनता है. सोमनाथ मंदिर स्थल पर दर्शन करने मात्र से व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूरी होती है.  12 ज्योतिर्लिंगों में इस स्थान को सबसे ऊपर स्थान दिया गया है.  
यहां पर कोई भक्त अगर दो सोमवार भी यहां की पूजा में शामिल जो जाता है, तो उसके सभी मनोकामनाएं पूरी होती है.  सावन मास में भगवान शिव के पूजन का विशेष महत्व है. उस समय में यहां दर्शन करने से विशेष पुन्य की प्राप्ति होती है. यहां आकर शिव भक्ति का अपना ही एक अलग महत्व है. यह श्विव महिमा है, कि शिवरात्रि की रात्रि में यहां एक माला शिव के महामृ्त्युंजय मंत्र का जाप चमत्कारिक फल देता है. 

12-JYOTIRLINGA : 12-ज्योतिर्लिंग


12 JYOTIRLING 
alibaba's Avatarपुराणों के अनुसार शिवजी जहां-जहां खुद प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है। 

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥1॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥2॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥3॥
एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रात: पठेन्नर:।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥4॥


1, सौराष्ट्र में सोमनाथ :- काठियावाड के प्रभाष क्षेत्र में विराजमान हैं। दक्ष के श्राप से चंद्रमा को क्षय रोग से मुक्त करने के लिए यहां प्रगट हुए थे। 

राजेश मिश्रा, রাজেশ মিশ্রা
RAJESH MISHRAKOLKTA, W.BENGAL 

2, श्री शैल :- नारदजी के भ्रमित करने से नाराज, अपने पुत्र कार्तिकेय को, मनाने के लिए, दक्षिण भारत में मल्लिकार्जुन के रूप में प्रगट हुए थे। 

3, महाकालेश्वर :- दूषण नामक दैत्य द्वारा अवन्तीनगर (उज्जैन) पर आक्रमण करने पर काल रूप में भगवान शिव ने सारे दैत्यों का नाश कर जहां से उजागर हुए थे उसी गड्ढे में अपना स्थान बना लिया। 

4, ओंकारेश्वर :- मध्य प्रदेश के मांन्धाता पर्वत पर नर्मदा नदी के उद्गम स्थल पर पर्वतराज विंध्य की कठोर तपस्या से खुश हो, वरदान देने हेतु, यहां प्रगट हुए थे। 

5, केदारेश्वर :- हिमालय के केदार नामक स्थान पर विराजमान हैं। यह स्थान हरिद्वार से 150मील दूर है। विष्णुजी के अवतार नर-नारायण की प्रार्थना पर यहां स्थान ग्रहण किया था। 

6, भीमशंकर :- यह स्थान मुंबाई से 60मील दूर है। यहां कुंभकर्ण के पुत्र भीम का वध करने के लिये अवतरित हुए थे। 

7, विश्वेश्वर :- विश्वेश्वर महादेव काशी में विराजमान हैं। प्रभू ने माँ पार्वती को बताया कि मनुष्यों के कल्याण के लिये उन्होंने इस जगह पर निवास किया है। 

8, त्र्यम्बकेश्वर :- महाराष्ट्र में नासिक रोड स्टेशन से 25किमी की दूरी पर स्थित हैं। गौतम ऋषी और उनकी पत्नी अहिल्या की तपस्या से प्रसन्न हो कर यहां विराजमान हुए थे। 

9, वैद्यनाथेश्वर :- झारखण्ड (पहले बिहार) में वैद्यनाथधाम में विराजमान हैं। रावण को लंका ले जाकर स्थापित करने के लिए शिवजी ने एक शिवलिंग दिया था, जिससे वह अजेय हो जाता। पर विष्णुजी ने उसको अजेय ना होने देने के कारण शिवलिंग को यहां स्थापित करवा लिया था। 

10, नागेश्वर :- द्वारका के समीप दारुकावन मेँ स्थित हैं। यहां शिवजी तथा पार्वतीजी की पूजा नागेश्वर और नागेश्वारी के रूप में होती है। 

11, रामेश्वर :- दक्षिण भारत के समुंद्र तट पर पाम्बन स्थान के निकट स्थित है। लंकाविजय के समय भगवान राम ने इनकी स्थापना की थी। 

12, घुश्मेश्वर :- महाराष्ट्र के मनमाड से 100किमी दूर दौलताबाद स्टेशन से 20किमी की दूरी पर वेरुल गांव में स्थित हैं। घुश्मा नाम की अपनी भक्त की पूजा से प्रसन्न हो कर यहां प्रगट हुए और घुश्मेश्वर कहलाये। 


(विस्तार में अलग से भी दिया हुआ है, नहीं मिले तो फ़ोन करें)
098310 57985
राजेश मिश्रा, कोलकता, व. बंगाल

खीर भवानी मंदिर | Kheer Bhawani Temple


खीर भवानी मंदिर | Kheer Bhawani Temple, Srinagar

kheer bhavani temple
खीर भवानी मंदिर भारत की खूबसूरत वादियों में से एक कश्मीर प्रांत के श्रीनगर शहर में स्थित है. कश्मीर के मनोहर दृश्यों से युक्त यह स्थान एक पावन धाम रूप में भी विख्यात यहाँ आस पास के क्षेत्रों में अनेक मन्दिर स्थापित हैं जिन्हें देखकर सभी लोग भक्ति भाव से भर जाते हैं यहाँ के तमाम क्षेत्रों में अनेक हिंदु मंदिर देखे जा सकते हैं जो सैलानियों एवं भक्तों सभी को अपनी ओर आकर्षित करते हैं इन मंदिरों की शोभा से यहां का वातावरण और भी ज्यादा पावन हो जाता है.                   
कश्मीर के तमाम मंदिरों में से एक है खीर भवानी मंदिर जो देवी के भक्तों का एक पावन धाम है. देश भर से लोग यहाँ माँ के दर्शन करने के लिए आते रहते हैं. मां खीर भवानी मन्दिर यहाँ के महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक रहा है जिसकी प्रसिद्धि कोने-कोने तक फैली हुई है. माँ के मंदिर में आकर भक्त देवी के दर्शनों को पाता है उसका आशीर्वाद ग्रहण करता है. जो भी सैलानी जम्मू कश्मीर में घूमने के लिए आते हैं वह इस मंदिर में आना नहीं भूलते और श्रद्धा भाव के साथ इस दरबार में आकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं.
खीर भवानी मंदिर श्रीनगर के तुल्लामुला में स्थित है. खीर भवानी मंदिर यहाँ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है तथा यह मंदिर माता रंगने देवी को समर्पित है. मंदिर में अनेकों श्रद्धालु लम्बी लम्बी कतारों में खड़े रहकर माँ की एक झलक पाने के लिए बेचैन रहते हैं. नवविवाहित युगल यहाँ माँ का आशीर्वाद प्राप्त करने आते हैं तथा अपनी ज़िदगी के सफल एवं सुखद रूप की कामना करते हैं. बच्चे से लेकर बडे़, बूढे सभी यहाँ पर आते हैं यहाँ के निवासियों के लिए देवी का यह रूप करूणा व प्रेम का प्रतीक है.

खीर भवानी मंदिर कथा | Kheer Bhawani Temple Story In Hindi

खीर भवानी मंदिर का धार्मिक मह्त्व खूब है यहाँ के लोग माँ की खूब सेवा तथा पूजा अराधना करते हैं. माँ के इस मन्दिर से एक कथा भी काफी प्रसिद्ध है जिसे सुन कर मां की कृपा हर किसी पर होती है माँ की कथा को पढकर या सुनकर सभी लोग सुख की प्राप्ति करते हैं. 
यहाँ पर स्थित यह मंदिर पौराणिक महत्व से जुड़ा हुआ है जिसमें एक कथा अनुसार बहुत प्राचीन समय पहले रामायण काल में भगवान श्री राम जी ने अपनी पत्नी सीता जी को रावण के चंगुल से मुक्त कराने के लिए लंका पर चढाई करने का निश्चय किया. 
राम जी ने अपनी सारी सेना के साथ रावण के राज्य लंका पर हमला बोल दिया और युद्ध आरंभ हो गया कहा जाता है की उस समय देवी राघेन्या जी लंका में निवास कर रही थी. और जब युद्ध आरंभ हुआ तो उन्होंने भगवान हनुमान जी से कहा की अब वह यहाँ पर रह नहीं सकती व उनका समय समाप्त हो चुका है
अत: वह उन्हें  अब लंका से बाहर निकाल कर हिमालय के कश्मीर क्षेत्र में ले जाएं जहां रावण के पिता पुलतस्य मुनी निवास करे थे देवी के वचन सुनकर भगवान हनुमान जी ने मां राघेन्याने को उस स्थान पर पहुँचाने का कार्य करते हैं. 
इस पर देवी ने शिला का रूप धारण कर लिया तथा हनुमान जी ने उन्हें अपने हाथों में उठाकर लंका से बाहर निकाल ले गए व हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओ में घूमने लगे तथा उचित स्थान की खोज करने लगे तब उन्होंने इस स्थान को देखा तो उन्होंने यहीं पर देवी को स्थापित कर दिया यहीं पर मां राघेन्यादेवी विश्राम करने लगी.
कालांतर में यह स्थान उपेक्षा का शिकार हो गया था परंतु एक बार एक कश्मीरी पंडित को देवी राघेन्या ने नाग के रूप में दर्शन दिए तथा पंडित को उस स्थान में लेकर गईं जहाँ पर देवी का स्थान था इसके बाद उस स्थान पर एक मंदिर का निर्माण किया गया मंदिर में  देवी की मूर्ति की स्थापित है. बाद में राजा प्रताप सिंह ने 1912 में इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था.

खीर भवानी मंदिर महत्व | Kheer Bhawani Temple Importance

श्रीनगर में स्थित यह देवी मंदिर श्रद्धालुओं का पवित्र देवी धाम है यहाँ पर हर साल मेले का आयोजन किया जाता है देवी खीर भवानी मन्दिर में की उत्सवों का आयोजन किया जाता है जिनमें सभी लोग बहुत उत्साह के साथ भाग लेते हैं सालाना होने वाले उत्सव में हजारों हिंदू श्रद्धालु पहुंचते हैं. 
ज्येष्ठ माह में शुक्लपक्ष की अष्टमी को यहाँ पर मेले का आयोजन भी होता है इस पूजा के समय दूर दूर से भक्त यहाँ पहुँचते है. अपनी मनोकामनाओं के पूर्ण होने की कामना करते हैं इस अवसर पर देवी पर दूध चढ़ाया जाता है. एक उल्लेखनीय बात यह भी है कि  मंदिर के बाहर बड़ी संख्या में मुस्लिम दूधवाले इकट्ठा होते हैं जिनसे भक्त लोग दूध खरीदते हैं. वास्तव में यह उत्सव हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक भी बन गया है.  

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