आपका स्वागत है...

मैं
135 देशों में लोकप्रिय
इस ब्लॉग के माध्यम से हिन्दू धर्म को जन-जन तक पहुचाना चाहता हूँ.. इसमें आपका साथ मिल जाये तो बहुत ख़ुशी होगी.. इस ब्लॉग में पुरे भारत और आस-पास के देशों में हिन्दू धर्म, हिन्दू पर्व त्यौहार, देवी-देवताओं से सम्बंधित धार्मिक पुण्य स्थल व् उनके माहत्म्य, चारोंधाम,
12-ज्योतिर्लिंग, 52-शक्तिपीठ, सप्त नदी, सप्त मुनि, नवरात्र, सावन माह, दुर्गापूजा, दीपावली, होली, एकादशी, रामायण-महाभारत से जुड़े पहलुओं को यहाँ देने का प्रयास कर रहा हूँ.. कुछ त्रुटी रह जाये तो मार्गदर्शन करें...
वर्ष भर (2017) का पर्व-त्यौहार नीचे है…
अपना परामर्श और जानकारी इस नंबर
9831057985 पर दे सकते हैं....

धर्ममार्ग के साथी...

लेबल

आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

22 जून 2011

घृष्णेश्वर मन्दिर | Grishneshwar Jyotirlinga


12. घृष्णेश्वर मन्दिर (Grishneshwar Temple) | Grishneshwar Jyotirlinga


घृष्‍णेश्‍वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है . घृष्णेश्वर मन्दिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है. इसे  घुसृणेश्वर एवं घृष्णेश्वर के नाम से भी जाना जाता है. इस मंदिर का निर्माण अहिल्याबाई होल्कर द्वारा करवाया गया था. शहर के शोर से से दूर स्थित यह मंदिर शांति एवं सादगी से परिपूर्ण है. दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं. भगवान शिव के  द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है. बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएँ इस मंदिर के समीप स्थित हैं. यहीं पर श्री एकनाथ जी गुरु श्री जनार्दन महाराज जी की समाधि भी है.

घृष्णेश्वर मन्दिर पौराणिक कथा | Grishneshwar Temple Katha in Hindi

इस ज्योतिर्लिंग के बारे मे एक कथा प्रचलित है कहते हैं भारत के दक्षिण प्रदेश के देवगिरि पर्वत के निकट सुकर्मा नामक ब्राह्मण और उसकी पत्नी सुदेश निवास करते थे. दोनों ही भगवान शिव के परम भक्त थे. परंतु इनके कोई संतान सन्तान न थी इस कारण यह बहुत दुखी रहते थे जिस कारण उनकी पत्नि उन्हें दूसरी शादी करने का आग्रह करती थी अत: पत्नि के जोर देने सुकर्मा ने अपनी पत्नी की बहन घुश्मा के साथ विवाह कर लिया. 
घुश्मा भी शिव भगवान की अनन्य भक्त थी और भगवान शिव की कृपा से उसे एक पुत्र की प्राप्ति हुई. पुत्र प्राप्ति से घुश्मा का मान बढ़ गया परंतु इस कारण सुदेश को उससे ईष्या होने लगी जब पुत्र बड़ा हो गया तो उसका विवाह कर दिया गया यह सब देखकर सुदेहा के मन मे और अधिक ईर्षा पैदा हो गई. जिसके कारण उसने पुत्र का अनिष्ट करने की ठान ली ओर एक दिन रात्रि में जब सब सो गए तब उसने घुश्मा के पुत्र को चाकू से मारकर उसके शरीर के टुकड़े कर दिए और उन टुकड़ों को सरोवर में डाल दिया जहाँ पर घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव लिंग का विसर्जन किया करती थी. शव को तालाब में फेंककर वह आराम से घर में आकर सो गई.
रोज की भाँति जब सभी लोग अपने कार्यों मे व्यस्त हो गए और नित्यकर्म में लग गये तब सुदेहा भी आनन्दपूर्वक घर के काम-काज में जुट गई. परंतु जब बहू नींद से जागी तो बिस्तर को ख़ून में सना पाया तथा मांस के कुछ टुकड़े दिखाई दिए यह भयानक दृश्य देखकर व्याकुल बहू अपनी सास घुश्मा के पास जाकर रोने लगी और पति के बारे मे पूछने लगी और विलाप करने लगी. सुदेहा भी उसके साथ विलाप मे शामिल हो गई ताकी किसी को भी उस पर संदेह न हो बहू के क्रन्दन को सुनकर घुश्मा जरा भी दुखी नहीं हुई और अपने नित्य पूजन व्रत में लगी रही व सुधर्मा भी अपने नित्य पूजा-कर्म में लगे रहे. दोनों पति-पत्नि भगवान का पूजन भक्ति के साथ बिना किसी विघ्न, चिन्ता के करते रहे. जब पूजा समाप्त हुई तब घुश्मा ने अपने पुत्र की रक्त से भीगी शैय्या को देखा यह विभत्स दृश्य देखकर भी उसे किसी प्रकार का विलाप नहीं हुआ.
उसने कहा की जिसने मुझे पुत्र दिया है वही शिव उसकी रक्षा भी करेंगे वह तो स्वयं कालों के भी काल हैं, सत्पुरूषों के आश्रय हैं और वही हमारे संरक्षक हैं. अत: चिन्ता करने से कुछ न होगा इस प्रकार के विचार कर उसने शिव भगवान को याद किया धैर्य धारण कर शोक से मुक्त हो गईं. और प्रतिदिन की तरह शिव मंत्र ऊँ नम: शिवाय का उच्चारण करती रही तथा पार्थिव लिंगों को लेकर सरोवर के तट पर गई जब उसने पार्थिव लिंगों को तालाब में प्रवाहित किया तो उसका पुत्र सरोवर के किनारे खड़ा हुआ दिखाई पड़ा अपने पुत्र को देखकर घुश्मा प्रसन्नता से भर गई इतने में ही भगवान शिव उसके सामने प्रकट हो गये. 
भगवान शिव घुश्मा की भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा भगवाने ने कहा यदि वो चाहे तो वो उसकी बहन को त्रिशूल से मार डालें. परंतु घुश्मा ने श्रद्धा पूर्वक महेश्वर को प्रणाम करके कहा कि सुदेहा बड़ी बहन है अत: आप उसकी रक्षा करे उसे क्षमा करें. घुश्मा ने निवेदन किया की मैं दुष्कर्म नहीं कर सकती और बुरा करने वाले की भी भलाई करना ही अच्छा माना जाता है. अत: भगवान शिव घुश्मा के भक्तिपूर्ण विचारों को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हो उठे और कहा घुश्मा तुम कोई और वर मांग सकती हो घुश्मा ने कहा हे महादेव मुझे वर देना ही चाहते हैं तो लोगों की रक्षा और कल्याण के लिए आप यहीं सदा निवास करें घुश्मा की प्रार्थना से प्रसन्न महेश्वर 
शिवजी ने उस स्थान पर सदैव वास करने का वरदान दिया तथा तालाब के समीप ज्योतर्लिंग के रूप में वहां पर वास करने लगे और घुश्मेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए उस तालाब का नाम भी तब से शिवालय हो गया. 

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग महत्व | Grishneshwar Jyotirlinga Importance

मान्यता है की शिवालय सरोवर का दर्शन करने से सब प्रकार के अभीष्ट प्राप्त होते हैं. निसंतानों को संतान की प्राप्ति होती है. घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन व पूजन करने से सब प्रकार के सुखों की वृद्धि होती है. जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने भी घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा अराधना की थी.

केदारनाथ धाम | Kedarnath Dham


11.केदारनाथ धाम | Kedarnath Dham - (Kedarnath Jyotirlinga) | Kedarnath Mahadev Katha

KEDARNATH JOTIRLING AND TEMPLE
बाबा भोले नाथ कृपालु एवं भक्तों पर दया करने वाले हैं. जो भी सच्चे मन से इनका ध्यान करता है उसकी पुकार भोलेनाथ अवश्य सुनते हैं. इन्द्र की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव सोमनाथ ज्योर्तिलिंग के रूप में प्रकट होकर आज भी इन्द्र की भक्ति की कथा सुना रहा है. इसी प्रकार नर-नारायण की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ भारत के उत्तराखंड में हिमालय पहार पर मंदाकिनी नदी के पास केदारनाथ ज्योर्तिलिंग के रूप में प्रकट हुए. बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है. केदारनाथ समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है. केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी हुआ. यह तीर्थ शिव का अत्यंत प्रिय स्थान है. जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है. 

केदारनाथ महादेव की कथा | Kedarnath Mahadev Katha in Hindi

केदारनाथ महादेव के विषय में कई कथाएं हैं. स्कन्द पुराण में लिखा है कि एक बार केदार क्षेत्र के विषय में जब पार्वती जी ने शिव से पूछा तब भगवान शिव ने उन्हें बताया कि केदार क्षेत्र उन्हें अत्यंत प्रिय है. वे यहां सदा अपने गणों के साथ निवास करते हैं. इस क्षेत्र में वे तब से रहते हैं जब उन्होंने सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा का रूप धारण किया था.
स्कन्द पुराण में इस स्थान की महिमा का एक वर्णन यह भी मिलता है कि एक बहेलिया था जिस हिरण का मांस खाना अत्यंत प्रिय था. एक बार यह शिकार की तलाश में केदार क्षेत्र में आया. पूरे दिन भटकने के बाद भी उसे शिकार नहीं मिला. संध्या के समय नारद मुनि इस क्षेत्र में आये तो दूर से बहेलिया उन्हें हिरण समझकर उन पर वाण चलाने के लिए तैयार हुआ. 
जब तक वह वाण चलाता सूर्य पूरी तरह डूब गया. अंधेरा होने पर उसने देखा कि एक सर्प मेंढ़क का निगल रहा है. मृत होने के बाद मेढ़क शिव रूप में परिवर्तित हो गया. इसी प्रकार बहेलिया ने देखा कि एक हिरण को सिंह मार रहा है. मृत हिरण शिव गणों के साथ शिवलोक जा रहा है. इस अद्भुत दृश्य को देखकर बहेलिया हैरान था. इसी समय नारद मुनि ब्राह्मण वेष में बहेलिया के समक्ष उपस्थित हुए. 
बहेलिया ने नारद मुनि से इन अद्भुत दृश्यों के विषय में पूछा. नारद मुनि ने उसे समझाया कि यह अत्यंत पवित्र क्षेत्र है. इस स्थान पर मृत होने पर पशु-पक्षियों को भी मुक्ति मिल जाती है. इसके बाद बहेलिया को अपने पाप कर्मों का स्मरण हो आया कि किस प्रकार उसने पशु-पक्षियों की हत्या की है. बहेलिया ने नारद मुनि से अपनी मुक्ति का उपाय पूछा. नारद मुनि से शिव का ज्ञान प्राप्त करके बहेलिया केदार क्षेत्र में रहकर शिव उपासना में लीन हो गया. मृत्यु पश्चात उसे शिव लोक में स्थान प्राप्त हुआ. 

केदारनाथ ज्योर्तिलिंग की कथा | Kedarnath Jyotirlinga Katha in Hindi

केदारनाथ ज्योर्तिलिंग की कथा के विषय में शिव पुराण में वर्णित है कि नर और नारयण नाम के दो भाईयों ने भगवान शिव की पार्थिव मूर्ति बनाकर उनकी पूजा एवं ध्यान में लगे रहते. इन दोनों भाईयों की भक्तिपूर्ण तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव इनके समक्ष प्रकट हुए. भगवान शिव ने इनसे वरदान मांगने के लिए कहा तो जन कल्याण कि भावना से इन्होंने शिव से वरदान मांगा कि वह इस क्षेत्र में जनकल्याण हेतु सदा वर्तमान रहें. इनकी प्रार्थना पर भगवान शंकर ज्योर्तिलिंग के रूप में केदार क्षेत्र में प्रकट हुए. 

केदारनाथ से जुड़ी पाण्डवों की कथा | Kedarnath Pandavas Katha in Hindi

शिव पुराण में लिखा है कि महाभारत के युद्ध के पश्चात पाण्डवों को इस बात का प्रायश्चित हो रहा था कि उनके हाथों उनके अपने भाई-बंधुओं की हत्या हुई है. वे इस पाप से मुक्ति पाना चाहते थे. इसका समाधान जब इन्होंने वेद व्यास जी से पूछा तो उन्होंने कहा कि बंधुओं की हत्या का पाप तभी मिट सकता है जब शिव इस पाप से मुक्ति प्रदान करेंगे. शिव पाण्डवों से अप्रसन्न थे अत: पाण्डव जब विश्वानाथ के दर्शन के लिए काशी पहुंचे तब वे वहां शंकर प्रत्यक्ष प्रकट नहीं हुए. शिव को ढ़ूढते हुए तब पांचों पाण्डव केदारनाथ पहुंच गये. 
पाण्डवों को आया देखकर शिव ने भैंस का रूप धारण कर लिया और भैस के झुण्ड में शामिल हो गये . शिव की पहचान करने के लिए भीम एक गुफा के मुख के पास पैर फैलाकर खड़ा हो गया. सभी भैस उनके पैर के बीच से होकर निकलने लगे लेकिन भैस बने शिव ने पैर के बीच से जाना स्वीकार नहीं किया इससे पाण्डवों ने शिव को पहचान लिया.
इसके बाद शिव वहां भूमि में विलीन होने लगे तब भैंस बने भगवान शंकर को भीम ने पीठ की तरह से पकड़ लिया. भगवान शंकर पाण्डवों की भक्ति एवं दृढ़ निश्चय को देखकर प्रकट हुए तथा उन्हें पापों से मुक्त कर दिया. इस स्थान पर आज भी द्रौपदी के साथ पांचों पाण्डवों की पूजा होती है. यहां शिव की पूजा भैस के पृष्ठ भाग के रूप में तभी से चली आ रही है. 

केदारनाथ मंदिर | Kedarnath Temple

केदारनाथ मंदिर का निर्माण पाण्डवों ने करवाया था. लेकिन, वह मंदिर नष्ट हो गया है. वर्तमान मंदिर के विषय में मान्यता है कि इसका निर्माण 8 वी सदी में आदि गुरू शंकराचार्य ने करवाया था. यह कत्यूरी शैली में निर्मित है. मंदिर लगभग 6फुट ऊँचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है. मण्डप और गर्भगृह के चारों तरफ प्रदक्षिणा पथ बना हुआ है जहां से भक्त शिव की प्रदक्षिणा करते हैं. 
मंदिर के गर्भ गृह में नुकीली चट्टान की पूजा शिव के रूप में होती है. सामने की तरफ से भक्तगण शिव को जल एवं पुष्प चढ़ाते हैं. दूसरी तरफ से घृत अर्पित करके भक्त शिव से बॉह भरकर मिलते हैं.  मंदिर का पट भक्तों के लिए 7 बजे सुबह खुल जाता है. दोपहर एक बजे से दो बजे तक यहां विशेष पूजा होती है. इसके बाद मंदिर का पट बंद कर दिया जाता है. शाम में 5 बजे पुन: मंदिर का पट खुलता है. 7.30 बजे के आस-पास शिव का श्रृंगार करके उनकी आरती की जाती है. इसके बाद मंदिर का पट सुबह तक के लिए बंद कर दिया जाता है. मंदिर के पास ही कई कुण्ड हैं.

केदारनाथ धाम का महात्म्य | Kedarnath Dham Mahatmya

केदारनाथ का महात्म्य इस बात से सिद्ध होता है कि यहां बहेलिया शिव की पूजा करने से जीवहत्या के पाप से मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त हुआ. पाण्डवों को महाभारत के युद्ध में बंधुओं की हत्या का जो पाप लगा था उनसे मुक्ति उन्हें इसी तीर्थ स्थल पर मिली थी. कहा जाता है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन के बिना बद्रीनाथ का दर्शन करता है उसे बद्रीनाथ की यात्रा का पुण्य फल नहीं मिलता है. केदरनाथ पर चढ़ाया गया जल पीने से मनुष्य के कई-कई जन्मों के पाप समाप्त हो जाते हैं जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है. जो व्यक्ति केदारनाथ यात्रा करता है उनके पूर्वजों को भी मुक्ति मिल जाती है. 

केदारनाथ यात्रा | Kedarnath Yatra

केदारनाथ की यात्रा अप्रैल माह के मध्य से नवम्बर मध्य तक की जा सकती है. नवम्बर मध्य से अप्रैल मध्य तक बाबा केदारनाथ का पट बंद रहता है. प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालु भक्त यहां शिव के दर्शनों के लिए यहां आते हैं. केदारनाथ मार्ग में गौरी कुण्ड है. माना जाता है कि पार्वती जी ने गणेश जी को यहीं जन्म दिया था. यहां जाने के लिए हरिद्वार एवं ऋषिकेश से कई प्रकार के साधन उपलब्ध रहते हैं. गौरी कुण्ड के बाद तीव्र ढ़लान है जहां से तीर्थयात्रियों को पैदल आगे जाना होता है. जो तीर्थयात्री पैदल चलने में असमर्थ होते हैं वह पिट्ठू, पालकी अथवा घोड़े पर चढ़कर बाबा केदारनाथ के दरबार तक पहुंच सकते हैं. 

त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग | Trimbakeshwar Jyotirlinga

10 त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग - 12 ज्योतिर्लिंग | Trimbakeshwar Jyotirlinga - 12 Jyotirlinga | Ram Kund | Lakshman Kundd

यह ज्योतिर्लिग गोदावरी नदी के करीब,  महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है. इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकत ब्रह्मागिरि नाम का पर्वत है.  इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरु होती है.  भगवान शिव का एक नाम त्रयम्बकेश्वर भी है. कहा जाता है. कि भगवान शिव से गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर भगवान शिव को यहां ज्योतिर्लिंग के रुप में रहना पडा था. 
भगवान शिव के नाम से ही त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग आज श्रद्वा और विश्वास का स्थल बन चुका है.  गोदावरी नदी और ब्रह्मा गिरि पर्वत की शोभा बढाने वाले भगवान त्रयम्बकेश्वर भगवान शिव की महिमा अद्वभुत है. 

रामकुण्ड /  लक्ष्मणकुंड | Ram Kund / Lakshman Kund

इस मंदिर में एक मुख्य ज्योतिर्लिंग के अलावा तीन छोटे-छोटे लिंग है. यहां के ये तीनों शिवलिंग ब्रह्मा, विष्णु और शिव के प्रतीक माने जात है.  धार्मिक शास्त्रों शिवपुराण में भी त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन है. कहा जाता है, कि ब्रह्रागिरि पर्वत पर जाने के लिए यहां सात सौ सीढियां है.   इन सीढियों से ऊपर जाने के मध्य मार्ग में रामकुण्ड और लक्ष्मणकुण्ड है. ब्रहागिरि पर्वत पर पहुंचने पर गोदावरी नदी के उद्वगम स्थल के दर्शन होते है. 
त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग इसलिए भी अपनी विशेषता रखता है कि यहां मात्र भगवान शिव की ही पूजा नहीं होती है. बल्कि भगवान शिव के साथ साथ देव ब्रह्मा और देव विष्णु की भी लिंग रुप में पूजा की जाती है. अन्य सभी 11 ज्योतिर्लिंगों में भगवान शिव ही विराजित है, और वहां भगवान शिव ही मुख्य देव है, जिनकी पूजा की जाती है. 

कालसर्प शान्ति स्थल -त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग | Kalsarpa Shanti Place : Trimbakeshwar Jyotirlinga 



यह स्थान भगवान शिव के भक्तों के लिए तो विशेष है ही साथ ही यह शनि शान्ति पूजा, त्रिपिंडी विधि पूजन, और कालसर्प शान्ति पूजा के लिए भी जाना जाता है. इन पूजाओं को अलग -अलग भक्त अपनी ज्योतिषिय शान्ति के लिए कराते है.

पेशवा काल में इस मंदिर के रखरखाव पर अत्यधिक व्यय किया गया. माना जाता है कि इस मंदिर का पुननिर्माण 1755 से शुरु होकर 1786 तक हुआ. इस मध्य अवधि में इस मंदिर का व्यय लगभग 16 लाख के करीब था. जो काफी अधिक था.

ब्रह्मागिरि पर्वत | Brahmagiri Mountain

त्रयंम्बकेश्वर मंदिर भव्य रुप से बनाती है. मंदिर के गर्भगृ्ह में केवल शिवलिंग की कुछ भाग ही दिखाई देता है. ध्यान से देखने पर ये एक लिंग होकर तीन लिंग है. इन्हीं तीनों लिंगों को त्रिदेव, ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतिरुप मान कर पूजा जाता है. त्रयंम्बकेश्वर मंदिर के निकट का गांव ब्रहागिरि के नाम से जाना जाता है. क्योकि यह गांव ब्रहागिरि पहाडी की तलहटी में स्थित है. ब्रहागिरि पर्वत भगवान शिव का साक्षात रुप है. 

त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग कथा | Trimbakeshwar Jyotirlinga Katha in Hindi 

त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिग के संबन्ध में एक पौराणिक कथा प्रसिद्ध है. कथा के अनुसार गौतम ऋषि ने यहां पर तप किया था. स्वयं पर लगे गौहत्या के पाप से मुक्त होने के लिए गौतम ऋषि ने यहां कठोर तपस्या की थी. और भगवान शिव से गंगा नदी को धरती पर लाने के लिए वर मांगा था. गंगा नदी के स्थान पर यहां दक्षिण दिशा की गंगा कही जाने वाली नदी गोदावरी का यहां उसी समय उद्वगम हुआ था.   
भगवान शिव के तीन नेत्र है, इसी कारण भगवान शिव का एक नाम त्रयंबक भी है. अर्थात तीन नेत्रों वाला भी है. उज्जैन और औंकारेश्वर की ही तरह त्रयम्केश्वर को ही गांव का राजा माना जाता है. यह माना जाता है, कि देव त्रयंबकेश्वर भगवान शिव प्रत्येक सोमवार के दिन अपने गांव का हाल जानने के लिए नगर भ्रमण के लिए आते है. 

विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग | Vishwanath Jyotirlinga


9. विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग-12 ज्योतिर्लिंग | Vishwanath Jyotirlinga - 12 Jyotirlinga | Vishwanath Temple


विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगो में से एक ज्योतिर्लिंग है. यह ज्योतिर्लिंग उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान में है. काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है. सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है. इस स्थान की मान्यता है, कि यह स्थान सदैव बना रहेगा. अगर कभी इस पृ्थ्वी पर किसी तरह की कोई प्रलय आती भी है, तो इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेगें. और प्रलय के टल जाने पर काशी को इसके स्थान पर रख देगें. 

काशी मोक्ष नगरी | Kashi : City of Salvation

धर्म शास्त्रों के अनुसार सृष्टि का प्रारम्भ भी इसी स्थान को कहा गया है. इस स्थान के विषय में एक पौराणिक कथा  प्रसिद्ध है, कि सृ्ष्टि रचना के लिए भगवान विष्णु की उपासना इसी स्थान पर श्री विष्णु जी ने की थी. इसके अतिरिक्त ऋषि अगस्त्य ने इसी स्थान पर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उपासना की थी. 
इस नगरी से कई मान्यताएं जुडी हुई है. काशी धर्म स्थल के विषय में कहा जाता है, कि इस स्थान पर जो भी व्यक्ति अंतिम सांस लेता है. उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस स्थान की महिमा के विषय में जितना कहा जाए कम है. कहा जाता है. कि यहां मृ्त्यु को प्राप्त करने वाले व्यक्ति को भगवान शंकर मृ्त्युधारक के कान में मोक्ष प्राप्ति का उपदेश देते है. इस मंत्र को सुनने मात्र से पापी से पापी व्यक्ति भी भवसागर को पार कर श्री विष्णु लोक में जाता है. 
अधर्मी और अनाचारी भी यहां मृ्त्यु  होने के बाद संसार के बंधनों से मुक्त हो गए है. प्राचीन धर्म शास्त्र मत्स्य पुराण के अनुसार काशी नगरी जप, ध्यान की नगरी है. यहां आकर व्यक्ति को उसके दु:खों से मुक्ति मिलती है. इसी पवित्र नगरी में विश्वनाथ मंदिर ज्योतिर्लिंग स्थित है.  इस ज्योतिर्लिंग को विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से भी जाना जाता है. 
मणिककर्णिका, दशाश्वमेध, लोलार्क, बिंदूमाधव और केशव | Manikarnika, Dashashwamedh, Lolark, Bindumadhav and Keshav 
श्री विश्वनाथ धाम में ही पांच प्रमुख तीर्थ है. इसमे दशाश्वमेध, लोलार्क, बिंदूमाधव, केशव और मणिकर्णिका है. एक स्थान पर ही पांच धर्म स्थल होने के कारण इस स्थान को परमगति देने वाला स्थान कहा गया है. श्री विश्वनाथ धाम की महत्वता इसके साथ स्थित अन्य पांच तीर्थ स्थल भी बढाते है.  

विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग कथा | Vishwanath Jyotirlinga Katha in Hindi

BABA VISHWANATH
विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के संबन्ध में एक पौराणिक कथा प्रचलित है. बात उस समय की है जब भगवान शंकर पार्वती जी से विवाह करने के बाद कैलाश पर्वत पर ही रहते थें. परन्तु पार्वती जी को यह बात अखरती थी कि, विवाह के बाद भी उन्हें अपने पिता के घर में ही रहना पडे़. इस दिन अपने मन की यह इच्छा देवी पार्वती जी ने भगवान शिव के सम्मुख रख दी. अपनी प्रिया की यह बात सुनकर भगवान शिव कैलाश पर्वत को छोड कर देवी पार्वती के साथ काशी नगरी में आकर रहने लगे. और काशी नगरी में आने के बाद भगवान शिव यहां ज्योतिर्लिंग के रुप में स्थापित हो गए. तभी से काशी नगरी में विश्वनाथ ज्योतिर्लिग ही भगवान श्विव का निवास स्थान बन गया है. 

विश्वनाथ ज्योतिर्लिग महत्व | Vishwanath Jyotirlinga Importance

काशी नगरी की वि़शेषता विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के कारण ही आज अन्य सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक है.  जो जन इस नगरी में आकर भगवान शिव का पूजन और दर्शन करता है. उसे उसके समस्त पापों से मुक्ति मिलती है. भगवान शिव अपने भक्त की सभी पापों को स्वयं वहन करते है. और श्रद्वालु को सुख और कामना पूर्ति का आशिर्वाद देते है. 
भगवान शिव की नगरी कही जाने वाली काशी में स्थित पांच अन्य तीर्थ स्थल भी है. फिर भी भगवान शिव को परम सत्य, सुन्दर और परमात्मा कहा गया है. भगवान शिव  सत्यम शिवम और सुंदरम है. वे ही सत्य है. वे ही ब्रह्मा है, और शिव ही शुभ होकर आत्मा के कारक है. 
इस जीवन में भगवान शिव और देवी पार्वती के अलावा कुछ भी अन्य जानने योग्य नहीं है. शिव ही आदि और शिव ही इस सृ्ष्टि का अंत है. जो भगवान शिव की शरण में नहीं जाता है, वह पाप और दु:ख में डूबता जाता है.  

शिव धाम विश्वनाथ धाम | Shiva Dham : Vishwanath Dham



शिव पुराण में श्विव के रुप का वर्णन इस प्रकार किया गया है. भगवान शिव की लम्बी लम्बी जटाएं है. भगवान शिव के हाथों में धनुष है. भगवान शिव दिगम्बर है. भगवान शिव नागराज का हार धारण किए हुए है. रुद्र की माला धारण किये हुए है. पुराणों में भगवान शिव को शंकर और महेश के नाम से उच्चारित किया गया है.

अपने आधे शरीर पर राख और भभूत लगाये है. तांडव नृ्त्य करते है. और नंदी भगवान शिव का वाहन है. भगवान शिव की मुद्रा ध्यान मुद्रा है.

भगवान शिव को बिल्व पत्र से पूजन करना सबसे अधिक प्रिय है. देव की प्रिया देवी पार्वती है. भगवान शिव के दो पुत्र है. इसमें एक कार्तिकेयन और दूसरे भगवान श्री गणेश है.

बिल्ब पत्र के अतिरिक्त भगवान शिव को जब उनके 108 नामों से पुकारा जाता है, तब भी वे शीघ्र प्रसन्न होते है.

भगवान शिव के अनेक नाम | Name of Lord Shiva

इन 108 नामों में से कुछ नम इस प्रकार है. मेहश, नीलकंठ, महादेव, महाकाल, शंकर, पशुपतिनाथ, गंगाधर, नटराज, त्रिनेत्र, भोलेनाथ, आदिदेव, आदिनाथ, त्रियंबक, त्रिलोकेश, जटाशंकर, जगदीश, प्रलयंकर, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, हर, शिवशंभु, भूतनाथ और रुद्र. 

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग | Nageshwar Jyotirlinga


8. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग- 12 ज्योतिर्लिंग | Nageshwar Jyotirlinga - 12 Jyotirlinga | Nageshwar Temple


NAGESHWAR JYOTIRLINGA
भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग है. यह ज्योतिर्लिंग भारत के गुजरात राज्य के बाहरी क्षेत्र में  द्वारिका स्थान में स्थित है. धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता है. तथा नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है. भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है. द्वारका पुरी से भी नागेश्वर ज्योतिर्लिग की दूरी 17 मील की है. इस ज्योतिर्लिंग की शास्त्रों में अद्वभुत महिमा कही गई है. 
इस ज्योतिर्लिग की महिमा में कहा गया है, कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्वा और विश्वास के साथ यहां दर्शनों के लिए आता है. उसे जीवन के समस्त पापों से मुक्ति मिलती है. 

नागेश्वर ज्योतिर्लिग कथा | Nageshwar Jyotirlinga Katha in Hindi

नागेश्वर ज्योतिर्लिग के संम्बन्ध में एक कथा प्रसिद्ध है. कथा के अनुसार एक धर्म कर्म में विश्वास करने वाला व्यापारी था. भगवान शिव में उसकी अनन्य भक्ति थी. व्यापारिक कार्यो में व्यस्त रहने के बाद भी वह जो समय बचता उसे आराधना, पूजन और ध्यान में लगाता था. 
उसकी इस भक्ति से एक दारुक नाम का राक्षस नाराज हो गया. राक्षस प्रवृ्ति का होने के कारण उसे भगवान शिव जरा भी अच्छे नहीं लगते थे. 
वह राक्षस सदा ही ऎसे अवसर की तलाश में रहता था, कि वह किस तरह व्यापारी की भक्ति में बाधा पहुंचा सकें. एक बार वह व्यापारी नौका से कहीं व्यापारिक कार्य से जा रहा था. उस राक्षस ने यह देख लिया, और उसने अवसर पाकर नौका पर आक्रमण कर दिया. और नौका के यात्रियों को राजधानी में ले जाकर कैद कर लिया. 
कैद में भी व्यापारी नित्यक्रम से भगवान शिव की पूजा में लगा रहता था. 
बंदी गृ्ह में भी व्यापारी के शिव पूजन का समाचार जब उस राक्षस तक पहुंचा तो उसे बहुत बुरा लगा. वह क्रोध भाव में व्यापारी के पास कारागार में पहुंचा. व्यापारी उस समय पूजा और ध्यान में मग्न था. राक्षस ने उसपर उसी मुद्रा में क्रोध करना प्रारम्भ कर दिया. राक्षस के क्रोध का कोई प्रभाव जब व्यापारी पर नहीं हुआ तो राक्षस ने अपने अनुचरों से कहा कि वे व्यापारी को मार डालें. 
यह आदेश भी व्यापारी को विचलित न कर सकें. इस पर भी व्यापारी अपनी और अपने साथियों की मुक्ति के लिए भगवान शिव से प्रार्थना करने लगा. उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उसी कारागार में एक ज्योतिर्लिंग रुप में प्रकट हुए.  और व्यापारी को पाशुपत- अस्त्र स्वयं की रक्षा करने के लिए दिया. इस अस्त्र से राक्षस दारूक तथा उसके अनुचरो का वध कर दिया. उसी समय से भगवान शिव के इस ज्योतिर्लिंग का नाम नागेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुआ.  

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग हैदराबाद और अल्मोडा में | Nageshwar Jyotirlinga in Hyderabad and Almoda

भारत के कुछ अन्य स्थानों में स्थित ज्योतिर्लिंगों को भी नागेश्वर ज्योतिर्लिग का नाम दिया जाता है.  इस संबन्ध में कई मत सामने आते है. हैदराबाद, आन्घ्र प्रदेश का ज्योतिर्लिम्ग भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है. इसके अतिरिक्त उत्तराखंड के अल्मोडा नामक स्थान में भी योगेश या जागेश्वर शिवलिंग है, भक्त जन इसे भी नागेश्वर के नाम से बुलाते है. 
परन्तु शिवपुराण में केवल द्वारका के नागेश्वर ज्योतिर्लिंग को ही एक मात्र नागेश्वर ज्योतिर्लिग माना गया है. एक अन्य धार्मिक शास्त्र के अनुसार भारत के दस ज्योतिर्लिगों में नागेश दारूकावने का नाम आता है. यह स्थान आज जागेश्वर के नाम से जाना जाता है. नागेश्वर का नाम योगेश्वर या जोगेश्वर किस प्रकार बना इसका कारण स्थान परिवर्तन के कारण शब्दों में परिवर्तन से है. 

लोकमान्यताएं | Belief of Folks

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग अल्मोडा के विषय में यह लोकमान्यताएं है, पहाडी इलाकों में एक नाग प्रजाती रहती है. वहां से प्राप्त प्राचीन अवशेषों में नाग मूर्तिया, सांप के कुछ चिन्ह प्राप्त हुए है. नाग पूजा को आज भी यहां विशेष महत्व दिया गया है.  अल्मोडा में जहां यह मंदिर स्थित है, वहां आसपास के क्षेत्रों के नाम प्राचीन काल से ही नागों के नाम पर आधारित है. इन्हीं में से कुछ नाम वेरीनाग, धौलेनाग, कालियनाग आदि है. भूत प्रेतों से मुक्ति के लिए भी नाग पूजा की जाती है.

DIL ka RAJ: ANNA OR BABA RAMDEV FIR KARENGE ANDOLAN

DIL ka RAJ: ANNA OR BABA RAMDEV FIR KARENGE ANDOLAN

DIL ka RAJ: मज़ेदार लतीफे

DIL ka RAJ: मज़ेदार लतीफे

मेरी ब्लॉग सूची

  • World wide radio-Radio Garden - *प्रिये मित्रों ,* *आज मैं आप लोगो के लिए ऐसी वेबसाईट के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसमे आप ऑनलाइन पुरे विश्व के रेडियों को सुन सकते हैं। नीचे दिए गए ल...
    6 माह पहले
  • जीवन का सच - एक बार किसी गांव में एक महात्मा पधारे। उनसे मिलने पूरा गांव उमड़ पड़ा। गांव के हरेक व्यक्ति ने अपनी-अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी। एक व्यक्ति ने महात्मा से...
    6 वर्ष पहले

LATEST:


Windows Live Messenger + Facebook