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02 अगस्त 2011

SANKATMOCHAN HANUMNASHTAK : संकटमोचन हनुमनाष्टक


संकटमोचन हनुमानाष्टक



PANCHMUKHI HANUMANJI 


HANUMAN ASHTAK : BY GULSHAN KUMAR



बाल समय रबि भक्षि लियो तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो।
ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो।

देवन आनि करी बिनती तब छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥१॥

बालि की त्रास कपीस बसै गिरि जात महाप्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महा मुनि साप दियो तब चाहिय कौन बिचार बिचारो।
कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु सो तुम दास के सोक निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥२॥

अंगद के सँग लेन गये सिय खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो।
हेरि थके तट सिंधु सबै तब लाय सिया-सुधि प्रान उबारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥३॥

रावन त्रास दई सिय को सब राक्षसि सों कहि सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु जाय महा रजनीचर मारो।
चाहत सीय असोक सों आगि सु दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥४॥

बान लग्यो उर लछिमन के तब प्रान तजे सुत रावन मारो।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो।
आनि सजीवन हाथ दई तब लछिमन के तुम प्रान उबारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥५॥

रावन जुद्ध अजान कियो तब नाग कि फाँस सबै सिर डारो।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल मोह भयो यह संकट भारो।
आनि खगेस तबै हनुमान जु बंधन काटि सुत्रास निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥६॥

बंधु समेत जबै अहिरावन लै रघुनाथ पताल सिधारो।
देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो।
जाय सहाय भयो तब ही अहिरावन सैन्य समेत सँहारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥७॥

काज कियो बड़ देवन के तुम बीर महाप्रभु देखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसों नहिं जात है टारो।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कुछ संकट होय हमारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥८॥

दोहा

लाल देह लाली लसे अरू धरि लाल लँगूर।
बज्र देह दानव दलन जय जय जय कपि सूर॥

SANKATMOCHAN HANUMNASHTAK : संकटमोचन हनुमनाष्टक


संकटमोचन हनुमानाष्टक

PANCHMUKHI HANUMANJI



बाल समय रबि भक्षि लियो तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो।
ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो।

देवन आनि करी बिनती तब छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥१॥

बालि की त्रास कपीस बसै गिरि जात महाप्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महा मुनि साप दियो तब चाहिय कौन बिचार बिचारो।
कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु सो तुम दास के सोक निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥२॥

अंगद के सँग लेन गये सिय खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो।
हेरि थके तट सिंधु सबै तब लाय सिया-सुधि प्रान उबारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥३॥

रावन त्रास दई सिय को सब राक्षसि सों कहि सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु जाय महा रजनीचर मारो।
चाहत सीय असोक सों आगि सु दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥४॥

बान लग्यो उर लछिमन के तब प्रान तजे सुत रावन मारो।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो।
आनि सजीवन हाथ दई तब लछिमन के तुम प्रान उबारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥५॥

रावन जुद्ध अजान कियो तब नाग कि फाँस सबै सिर डारो।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल मोह भयो यह संकट भारो।
आनि खगेस तबै हनुमान जु बंधन काटि सुत्रास निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥६॥

बंधु समेत जबै अहिरावन लै रघुनाथ पताल सिधारो।
देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो।
जाय सहाय भयो तब ही अहिरावन सैन्य समेत सँहारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥७॥

काज कियो बड़ देवन के तुम बीर महाप्रभु देखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसों नहिं जात है टारो।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कुछ संकट होय हमारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥८॥
दोहा
लाल देह लाली लसे अरू धरि लाल लँगूर।
बज्र देह दानव दलन जय जय जय कपि सूर॥

हनुमान चालीसा : HANUMAN CHALISA


हनुमान चालीसा

HANUMANJI CHARITRA










श्री गुरु चरण सरोज रज निज माने मुकुर सुधारी
बरनाऊ रघुवर विमल जासू जो दायक फल चारी
बुद्धि हीन तनु  जानीके सुमीरौ पवन कुमार
बल बुद्धि विद्या देहु मोहे हरहू कलेस विकार

जई हनुमान ज्ञान गुण सागर
जई कपिस तिंहू लोक उजागर
राम दूत अतुलित बल धामा
अंजनी-पुत्र पवन सूत नामा
महावीर विक्रम बजरंगी
कुमति निवार सुमति के सांगी
कंचन वरण विराज सुबेसा
कानन कुंडल कुंचित केसा
हाथ वज्र और ध्वजा विराजे
कंधे मूंज जनेऊ साजे

शंकर सुवन केसरी नंदन
तेज प्रताप महा जग वंदन
विद्यावान गुणी अति चतुर
राम काज करिबे को आतुर
प्रभु चरित्रा सुनिबे को रसिया
राम लखन सीता मान बसिया
सूक्ष्म रूप धरी सियाही दिखावा
विकट रूप धरी लंका जलावा
भीम रूप धरी असुर संघारे
रामचंद्रा के काज संवारे

लाए संजीवन लखन ज़ियाए
श्री रघुवीर हरषी उर लाए
रघुपति किन्ही बहुत बधाई
तुम मम प्रिय भरत-ही सम भाई
सहस बदन तुम्हारो यश गावे
अस कही श्रीपति कंठ लगावे
सनकादिक ब्रह्मदी मुनीसा
नारद सारद सहित आहीसा
यम कुबेर दिगपाल जहाँ ते
कवि कोविद कही सके कहाँ ते

तुम उपकार सुग्रीवहीं कीन्हा
राम मिलाय राजपद दीन्हा
तुम्हारो मंत्र विभीषण माना
लंकेश्वर भय सब जाग जाना
युग सहस्त्र जोजान पर भानु
लीलयो त्राहि मधुर फल जानू
प्रभु मुद्रिका मेली मुख माही
जलधि लँघी गये अचरज नाही
दूरगाम काज जगत के जेते
सुगम अनुग्रहा तुम्हरे तेते

राम द्वारे तुम रखवारे
होत ना आज्ञा बीनू पैसारे
सब सुख ल़ई तुम्हारी सरना
तुम रक्षक काहु को डरना
आपन तेज संहारो आपै
तीन्हों लोक हांक ते कापे
भूत पिसाच निकट नहीं आवे
महावीर जब नाम सुनवाई
नासे रोग हरे सब पीरा
जपत निरंतर हनुमंत बीरा

संकट से हनुमान छुडावे
मन करम वचन ध्यान जो लावे
सब पर राम तपस्वी राजा
तिनके काज सकल तुम साजा
और मनोरथ जो कोई लावे
सोही अमित जीवन फल पाए
चारों युग परताप तुम्हारा
है प्रसिद्ध जगत उजियारा
साधु संत के तुम रखवारे
असुर निकंदन राम दुलारे

अष्ट सीधी नव निधि के दाता
उस वार दीं जानकी माता
राम रसायन तुम्हारे पासा
सदा रहो रघुपति के दासा
तुम्हारे भजन राम को पावे
जनम जनम के दुख बिसरावे
अंत काल रघुवीर पूर जाई
जहाँ जनम हरी-भक्तिकहाई
और देवता चित ना धरेही
हनुमंत सेही सर्वे सुख करेही

संकट कटे मिटे सब पीरा
जो सुमिरे हनुमत बलबीरा
जय जय जय हनुमान गोसहिं
कृपा करहू गुरुदेव की न्याहीं
जो सत बार पाठ करे कोई
छुटेही बँधी महा सुख होई
जो यह पढ़े हनुमान चालीसा
होये सिद्धि सखी गौरीसा
तुलसीदास सदा हरी चेरा
कीजै नाथ ह्रदय में डेरा

             
पवन तनय संकट हरण  मंगल मूर्ति रूप
राम लखन सीता सहित ह्रदय बसहू सुर भूप

AARTI HANUMAN JI KI


आरती श्री हनुमान जी की

JAI SHRI HAUNAMJI

आरति कीजै हनुमान लला की .
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ..
जाके बल से गिरिवर काँपे
रोग दोष जाके निकट न झाँके
अंजनि पुत्र महा बलदायी
संतन के प्रभु सदा सहायी .
आरति कीजै हनुमान लला की .
दे बीड़ा रघुनाथ पठाये
लंका जाय सिया सुधि लाये .
लंका सौ कोटि समुद्र सी खाई
जात पवनसुत बार न लाई ..
आरति कीजै हनुमान लला की .
लंका जारि असुर संघारे
सिया रामजी के काज संवारे .
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे
आन संजीवन प्राण उबारे ..
आरति कीजै हनुमान लला की .
पैठि पाताल तोड़ि यम कारे
अहिरावन की भुजा उखारे .
बाँये भुजा असुरदल मारे
दाहिने भुजा संत जन तारे ..
आरति कीजै हनुमान लला की .
सुर नर मुनि जन आरति उतारे
जय जय जय हनुमान उचारे .
कंचन थार कपूर लौ छाई
आरती करति अंजना माई ..
आरति कीजै हनुमान लला की .
जो हनुमान जी की आरति गावे
बसि वैकुण्ठ परम पद पावे .
आरति कीजै हनुमान लला की .
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ..
RAJESH MISHRA AND KALAPNA WITH
JAGKALYAN PATRIKA

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