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16 अगस्त 2011

DIL ka RAJ: तिहाड़ में कलमाड़ी के साथ रखे गए हैं अन्ना

DIL ka RAJ: तिहाड़ में कलमाड़ी के साथ रखे गए हैं अन्ना

15 अगस्त से 21 अगस्त: निराहार रखें श्रीकृष्ण जन्माष्टमी


15 अगस्त से 21 अगस्त: निराहार रखें श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 

मंगलवार, 16 अगस्त: कज्जली नामक बड़ी तीज । सातू तीज
बुधवार, 17 अगस्त: संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत । संकट चौथ व्रत । चंद्रोदय रात्रि 8 बजकर 43 मिनट पर। बहुला चतुर्थी व्रत। संक्रांति, सौर सिंह राशि में सूर्य।
गुरूवार, 18 अगस्त: रक्षा पंचमी, उड़ीसा। बीजांकुरा पंचमी।
शुक्रवार, 19 अगस्त: चंदन षष्ठी व्रत। ऊभी षष्ठी व्रत। ललही छट बिहार। पुत्रार्थी व्रत आरंभ।
शनिवार, 20 अगस्त: हल षष्ठी व्रत। माधवदेव तिथि असम।
रविवार, 21 अगस्त : श्री कृष्ण जन्माष्टी व्रत स्मार्त जनों का। कालाष्टमी व्रत। श्री आद्याकाली जयन्ती। शीतला व्रत।

16 अगस्त: कज्जली तीज, सातू तीज, बड़ी तीज 
भाद्रपद कृष्ण पक्ष तृतीया के दिन पूर्वी उत्तर भारत में कजरी या कज्जली तीज का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर सुहागिनें कजरी खेलने अपने मायके जाती हैं। ये महिलाएं नदी-तालाब आदि से मिट्टी लाकर उसका पिंड बनाती हैं और उसमें जौ के दाने बो देती हैं। रोज इसमें पानी डालने से पौधे निकल आते हैं। इन पौधों को कजरी वाले दिन लड़कियां अपने भाई तथा बुजुर्गों के कान पर रखकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इस प्रक्रिया को शजरई खोंसना कहते हैं। इसके एक दिन पूर्व यानी भाद्रपद कृष्ण पक्ष द्वितीया को रतजगा का त्योहार होता है। महिलाएं रात भर कजरी खेलती हैं। इस दिन स्त्रियां बागों में झूले डाल कर झूला झूलती हैं। सावन में स्त्रियां ही नहीं, पुरुष भी मंदिर में जाकर भगवान को झूले में बिठाकर झूला झुलाते हैं। वे झूले में झूलते भगवान को झूम-झूमकर मनभावनी कजरी सुनाते हैं।

17 अगस्त: संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत 
वैसे तो गणेश जी का उद्भव यानी जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ था, लेकिन भाद्रपद मास की कृष्ण चतुर्थी को संकट यानी संकटहरण चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। इस बार यह पवित्र व्रत बुधवार 17 अगस्त को पड़ रहा है। वैसे तो पूरे साल के प्रत्येक पक्ष में गणेश जी के निमित्त चतुर्थी तिथि को व्रत रखते हैं। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी या गणेश चतुर्थी कहते हैं, जबकि कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को श्रीकृष्ण चतुर्थी कहते हैं। चतुर्थी के व्रत के दिन प्रात:काल में स्नान के उपरांत गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति बनाकर पूजा करनी चाहिए । अगर गाय का गोबर मिल जाए तो शुद्ध गोबर से भी गणेश की प्रतीकात्मक मूर्ति बनाई जा सकती है। पूजन के समय दूब के 21 अंकुर लेकर और उनके दो दो अंकुर एकसाथ लेकर गणेश जी के 12 नामों की प्रतिष्ठा करनी चाहिए और उन 12 नामों को 12 लड्डूओं से भोग लगाना चाहिए।

21 अगस्त: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 
भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण की अष्टमी, बुधवार, रोहिणी नक्षत्र एवं वृषराशि के चंद्रमा में हुआ था, अत: इस दिन जन्माष्टमी व्रत रखने का विधान है। इस व्रत को स्मार्त जन पहले दिन तथा वैष्णव अगले दिन रखते हैं। इस व्रत को बाल, युवा, वृद्ध सभी कर सकते हैं। यह व्रत अर्द्धरात्रि में पड़ने वाली अष्टमी तिथि को किया जाता है। सिद्धांत रूप से यह अधिक मान्य है। जिन्होंने विशेष विधि विधान के साथ वैष्णव संप्रदाय की दीक्षा ली हो, वे वैष्णव कहलाते हैं। अन्य सभी लोग स्मार्त हैं। लोक व्यवहार में वैष्णव संप्रदाय के साधु-संत आदि उदयकालीन एकादशी तथा जन्माष्टमी आदि के दिन ही व्रत करते हैं। व्रती व्रत से पहले दिन अल्प भोजन करे तथा प्रात: काल उठकर स्नान एवं दैनिक पूजा पाठादि से निवृत्त होकर संकल्प करे कि मैं भगवान कृष्ण की अपने ऊपर विशेष अनुकंपा हेतु व्रत करूंगा, सर्वअंतर्यामी परमेश्वर मेरे सभी पाप, शाप, तापों का नाश करें । उन्हें ब्रह्माचर्य का पालन भी करना चाहिए। दिन और रात भर निराहार व्रत करें। अगर इसमें कठिनाई हो तो बीच में फलाहार, दूध आदि ले सकते हैं।

21 अगस्त, रविवार: कालाष्टमी व्रत 
हर मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी का व्रत रखा जाता है। इस दिन स्नान आदि के उपरांत काल भैरव मंदिरों की पूजा अर्चना की जाती है। काल भैरव का स्वरूप शिव जी के स्वरूप के ही समान है जो नव दुर्गाओं के अंगरक्षक के रूप में सदा उनके साथ तैनात रहते हैं। प्रत्येक दुर्गा मंदिर में काल भैरव का मंदिर भी बनाया जाता है, जिसकी पूजा अर्चना कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन श्रद्धालु जन करते हैं। इस दिन नवदुर्गाओं की पूजा-अर्चना के साथ साथ काल भैरव को खिचड़ी, चावल, तेल, गुड़ आदि का भोग लगाया जाता है। यह व्रत रोग, दुख और शत्रु पीड़ा निवारण में सहायक होता है। कालाष्टमी व्रत अकालमृत्यु निवारक तो है ही, साथ ही उन भौतिक तापों का हरण करता है जिनके प्रकोप से व्यक्ति अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है।

SHRI KRISHNA JANMASHTMI

श्री कृष्ण जन्माष्टमी
माखनचोर श्रीकृष्ण : SHRIKRISHNA
भगवान श्री कृष्ण के जन्म से लेकर आज तक युगों का अन्तर है। किंतु श्रीकृष्ण के चरित्र और व्यवहार में जीवन को जीने के जो सूत्र छुपे हैं, वह आज भी उतने ही मायने रखते हैं, जितने कृष्ण के युग द्वापर में थे। इसलिए वह भगवान ही नहीं लोकनायक के रुप में भी भक्तों को प्रिय हैं।
श्रीकृष्ण के ब्रज में बीते बचपन से लेकर कुरुक्षेत्र के मैदान तक के जीवन पर व्यावहारिक दृष्टि से विचार करें तो यही पाते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण एक कुशल प्रबंधक और रणनीतिकार थे। आज भी जीवन के हर क्षेत्र में उनकी नीतियों का सही उपयोग सफलता का कारण बन सकता है।
श्रीकृष्ण की सफल रणनीति का सबसे बड़ा सूत्र है - कुशलता और सबलता। सफलता के लिए जरुरी है - किसी भी क्षेत्र या विषय का ज्ञान पाकर दक्ष और कुशल बने। इसके साथ व्यावहारिक सोच रखें। यही योग्यता आपकी सबसे बड़ी ताकत होगी, जो आपको जिंदगी की दौड़ में आगे तक ले जाएगी।
श्रीकृष्ण के जीवन में देखें तो पाते हैं कि वह विष्णु अवतार थे यानि वह सबल और कुशल तो थे ही किंतु बचपन में ही उन्होंने उन्होंने बृज में आए हर संकट को न केवल इस बल के सही उपयोग से टाला बल्कि इन संकटों से उबरने के लिए उन्होंने मानवीय रुप में व्यावहारिक संदेश भी ब्रजवासियों को दिए। चाहे वह कालिया दमन हो, इंद्र का अहं चूर करना हो या कंस द्वारा भेजी गई पूतना और दूसरे दानवों का वध।
श्रीकृष्ण ने न केवल हर विपत्ति से मुक्ति दिलाई बल्कि हर बार ब्रजवासियों को उनकी शक्ति, कुशलता और योग्यता का एहसास कराया और उनके आत्मविश्वास को जगाया। यही एक गुणी, सफल और कुशल प्रबंधक की पहचान है।

ऐसे मनाएं बालकृष्ण का जन्मदिन

भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (इस बार 22 अगस्त) पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाने के लिए कृष्ण भक्त अपनी श्रद्धा और आस्था प्रगट करने के लिए घर और मंदिरों में सजावट, रोशनी के साथ पूजा और आरती करते हैं। जन्मोत्सव का हर्ष और उत्साह खासतौर पर भगवान के जन्म समय अर्द्धरात्रि में देखते ही बनता है। आप भी श्रीकृष्ण के जन्म की इस रात में भक्ति रस में डूब सकते हैं। यहां बताई जा रही है कि किस तरह होना चाहिए, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की सुबह से लेकर रात तक की तैयारी और उत्सव -
बालकृष्ण स्नानोत्सव 
  • सुबह से ही श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और व्रत का संकल्प और पूजा के समय केले के पत्तों से खंभे और आम या अशोक के पत्तों से घर के दरवाजे सजाएं। 
  • रात्रि को बारह बजे गर्भ से जन्म लेने के प्रतीक रुप में ककड़ी फोड़कर भगवान् श्री कृष्ण का जन्म कराएं और जन्मोत्सव मनायें। 
  • अर्द्धरात्रि में बालकृष्ण की मूर्ति या शालग्राम की प्रतिमा का विधि-विधान से पंचामृत स्नान करें। 
  • स्वयं या किसी योग्य ब्राह्मण से बालकृष्ण का षोडशोपचार पूजन करें।
  • पूजा में श्रीकृष्ण को पोशाक और आभुषण पहनाएं। बालकृष्ण को झूले में बैठाएं। 
  • जन्मोत्सव के बाद धूप, दीप, कर्पूर जलाकर कर एक सुर में भगवान की आरती करें और नैवेद्य में मक्खन जरुर चढ़ाएं। 
  • भगवान के भोग में एक रोचक बात यह है कि इसमें भगवान श्री कृष्ण के साथ माता देवकी और यशोदा के लिए भी भोग लगाया जाता है। जिस तरह सामान्यत: प्रसूता को जो पदार्थ खिलाए जाते हैं, जिनमें अजवायन से बनी मिठाई, नारियल, खजूर, अनार, धनिये की पंजेरी, नारियल की मिठाई और तरह-तरह के मेवे के प्रसाद का भोग लगावें।
  • जन्म के बाद भगवान की मूर्ति के सामने बैठकर भजन-कीर्तन कर जन्मोत्सव का आनंद मनाएं। 
  • प्रसाद बांटें। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन प्रसाद और चरणामृत ग्रहण करने से मात्र से ही सभी पापों से छुटकारा मिल जाता है

यह है श्रीकृष्ण की 16 कलाओं का रहस्य
मनमोहन श्रीकृष्ण 
हम अक्सर सुनते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण 16 कलाओं से पूर्ण थे। किंतु इन कलाओं के पीछे क्या तथ्य हैं, यह बहुत कम लोगों को मालूम है। यहां हम आपको बता रहे हैं श्रीकृष्ण की इन्हीं 16 कलाओं का रहस्य-
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास की कृष्णपक्ष अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में रात को 12 बजे वृषभ लग्न में हुआ। अष्टमी के चंद्रमा को पूर्ण बली कहा गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चंद्रमा की 16 कलाएं होती हैं जो प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक दिखाई देती है। रोहिणी चंद्रमा की सबसे प्रिय पत्नी है। इस काल में चंद्रमा उच्च पर होता है। ऐसे ही काल में चंद्रवंशी होने के कारण भगवान श्रीकृष्ण चंद्रवंश के संपूर्ण प्रतिनिधि के रूप में 16 कलाओं से युक्त कहलाएं।

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