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05 सितंबर 2011

SALASAR BALAJI : सालासर धाम



भक्तों के सुख और दुःख के हमेशा भागीदार बनते हैं सालासर बालाजी


सालासर में वर्ष भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। मंगल, शनि और प्रत्येक पूर्णिमा को दर्शनार्थी विशेष रूप से आते हैं। यहां प्रति वर्ष तीन बडे मेले लगते हैं। प्रथम- चैत्र शुक्ल चतुर्दशी (पूर्णिमा) को श्री हनुमान जयन्ती के अवसर पर, द्वितीय- आश्विन शुक्ल चतुर्दशी (पूर्णिमा) को और अंतिम- भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी (पूर्णिमा) को। इन मेलों में लाखों श्रद्धालु आते हैं। इस अवसर पर छोटा-सा सालासर ग्राम महाकुम्भ सा दिखने लगता है। सालासर हनुमान धाम राजस्थान के जयपुर-बीकानेर राजमार्ग पर सीकर से लगभग 57 किमी व सुजानगढ से लगभग 24 किमी दूर स्थित है। मान्यता है कि सालासर बालाजी सभी की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
सालासर हनुमान कथा
सीकर के रुल्याणी ग्राम के निवासी पं. लछीरामजी पाटोदिया के सबसे छोटे पुत्र मोहनदास बचपन से ही संत प्रवृत्ति के थे। सतसंग और पूजन-अर्चन में शुरू से ही उनका मन रमता था। उनके जन्म के समय ही ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि आगे चलकर यह बालक तेजस्वी संत बनेगा और दुनिया में इसका नाम होगा। मोहनदास की बहन कान्ही का विवाह सालासर ग्राम में हुआ था। एकमात्र पुत्र उदय के जन्म के कुछ समय पश्चात् ही वह विधवा हो गई।
मोहनदास जी की धुनी 
मोहनदास जी अपनी बहन और भांजे को सहारा देने की गरज से सालासर आकर उनके साथ रहने लगे। उनकी मेहनत से कान्ही के खेत सोना उगलने लगे। अभाव के बादल छंट गए और उनके घर हर याचक को आश्रय मिलने लगा। भांजा उदय भी बडा हो गया था, उसका विवाह कर दिया गया। एक दिन मामा-भांजे खेत में कृषि कार्य कर रहे थे, तभी मोहनदास के हाथ से किसी ने गंडासा छीनकर दूर फेंक दिया। मोहनदास पुन: गंडासा उठा लाए और कार्य में लग गए, लेकिन पुन: किसी ने गंडासा छीनकर दूर फेंक दिया। ऐसा कई बार हुआ। उदय दूर से सब देख रहा था, वह निकट आया और मामा को कुछ देर आराम करने की सलाह दी, लेकिन मोहनदास जी ने कहा कि कोई उनके हाथ से जबरन गंडासा छीन कर फेंक रहा है। सायं को उदय ने अपनी मां कान्ही से इस बात की चर्चा की। कान्ही ने सोचा कि भाई का विवाह करवा देते हैं, फिर सब ठीक हो जाएगा। यह बात मोहनदास को ज्ञात हुई तो उन्होंने कहा कि जिस लडक़ी से मेरे विवाह की बात चलाओगी, उसकी मृत्यु हो जाएगी। और वास्तव में ऐसा ही हुआ। जिस कन्या से मोहनदास के विवाह की बात चल रही थी, वह अचानक ही मृत्यु को प्राप्त हो गई। इसके बाद कान्ही ने भाई पर विवाह के लिए दबाव नहीं डाला। मोहनदास जी ने ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया और भजन-कीर्तन में समय व्यतीत करने लगे।


एक दिन कान्ही, भाई और पुत्र को भोजन करा रही थी, तभी द्वार पर किसी याचक ने भिक्षा मांगी। कान्ही को जाने में कुछ देर हो गई। वह पहुंची तो उसे एक परछाई मात्र दृष्टिगोचर हुई। पीछे-पीछे मोहनदास जी भी दौडे अाए थे, उन्हें सच्चाई ज्ञात थी कि वह तो स्वयं बालाजी थे। कान्ही को अपने विलम्ब पर बहुत पश्चाताप हुआ। वह मोहनदास जी से बालाजी के दर्शन कराने का आग्रह करने लगी। मोहनदास जी ने उन्हें धैर्य रखने की सलाह दी।
लगभग डेढ-दो माह पश्चात किसी साधु ने पुन: नारायण हरि, नारायण हरि का उच्चारण किया, जिसे सुन कान्ही दौडी-दौडी मोहनदास जी के पास गई। मोहनदास द्वार पर पहुंचे तो क्या देखते हैं कि वह साधु-वेशधारी बालाजी ही थे, जो अब तक वापस हो लिए थे। मोहनदास तेजी से उनके पीछे दौड़े और उनके चरणों में लेट गए तथा विलम्ब के लिए क्षमा याचना करने लगे। तब बालाजी वास्तविक रूप में प्रकट हुए और बोले- मैं जानता हूं मोहनदास, तुम सच्चे मन से सदैव मुझे जपते हो। तुम्हारी निश्चल भक्ति से मैं बहुत प्रसन्न हूं। मैं तुम्हारी हर मनोकामना पूर्ण करूंगा, बोलो।
मोहदनास जी विनयपूर्वक बोले- आप मेरी बहन कान्ही को दर्शन दीजिए। भक्त वत्सल बालाजी ने आग्रह स्वीकार कर लिया और कहा- मैं पवित्र आसन पर विराजूंगा और मिश्री सहित खीर व चूरमे का भोग स्वीकार करूंगा। भक्त शिरोमणि मोहनदास सप्रेम बालाजी को अपने घर ले लाए और बहन-भाई ने आदर सहित अत्यन्त कृतज्ञता से उन्हें मनपसंद भोजन कराया। सुंदर और स्वच्छ शैय्या पर विश्राम के पश्चात् भाई-बहन की निश्छल सेवा भक्ति से प्रसन्न हो बालाजी ने कहा कि कोई भी मेरी छाया को अपने ऊपर करने की चेष्टा नहीं करेगा। श्रद्धा सहित जो भी भेंट की जाएगी, मैं उसे प्रेमपूर्वक ग्रहण करूंगा और अपने भक्त की हर मनोकामना पूर्ण करूंगा एवं इस सालासर स्थान पर सदैव निवास करूंगा। ऐसा कह बालाजी अंतर्ध्यान हो गए और भक्त भाई-बहन कृत कृत्य हो उठे।
इसके बाद से मोहनदास जी एकान्त में एक शमी के वृक्ष के नीचे आसन लगाकर बैठ गए। उन्होंने मौन व्रत धारण कर लिया। लोग उन्हें पागल समझ बावलिया नाम से पुकारने लगे। एक दिन मोहनदास शमी वृक्ष के नीचे बैठे धूनी रमाए तपस्या कर रहे थे कि एकाएक वह वृक्ष फलों से लद गया। एक जाट पुत्र फल तोडने के लिए उसी शमी वृक्ष पर चढा तो घबराहट में कुछ फल मोहनदास जी पर आ गिरे। उन्होंने सोचा वृक्ष से गिरकर कहीं कोई पक्षी घायल न हो गया हो, लेकिन आंखें खोलीं तो जाट पुत्र को वृक्ष पर चढे पाया। जाट पुत्र भय से कांप उठा था। मोहनदास जी ने उसे भय मुक्त किया और नीचे आने को कहा।
नीचे आने पर जाट पुत्र ने बताया कि मां के मना करने पर भी पिता ने उसे शमी फल लाने की आज्ञा दी और कहा कि वह पागल बावलिया तुझे खा थोडे ही जाएगा। तब बाबा मोहनदास जी ने कहा कि अपने पिता से कहना कि इन फलों को खाने वाला व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता। लेकिन जाट ने बाबा की बात को खिल्ली में उडा दिया। कहते हैं कि फल खाते ही जाट की मृत्यु हो गई। तब से लोगों के मन में बाबा मोहनदास के प्रति भक्ति भाव का बीज अंकुरित हुआ, जो आगे की अनेक चमत्कारिक घटनाओं के बाद वृक्ष बनता चला गया।
एक बार भांजे उदय ने देखा कि बाबा के शरीर पर पंजों के बडे-बडे निशान हैं। उसने पूछा तो बाबा टाल गए। बाद में ज्ञात हुआ कि बाबा मोहनदास और बालाजी प्राय: मल्लयुद्ध व अन्य तरह की क्रीडाएं करते थे और बालाजी का साया सदैव बाबा मोहनदास जी के साथ रहता था। इस तरह की घटनाओं से बाबा मोहनदास की कीर्ति दूर पास के ग्रामों में फैलती चली गई। लोग उनके दर्शन को आने लगे।
तत्कालीन सालासर बीकानेर राज्य के अधीन था। उन दिनों ग्रामों का शासन ठाकुरों के हाथ में था। सालासर व उसके निकटवर्ती अनेक ग्रामों की देखरेख का जिम्मा शोभासर के ठाकुर धीरज सिंह के पास था। एक दिन उन्हें खबर मिली कि डाकुओं का एक विशाल जत्था लूटपाट के लिए उस ओर बढा चला आ रहा है। उनके पास इतना भी वक्त नहीं था कि बीकानेर से सैन्य सहायता मंगवा सकते। अंतत: सालासर के ठाकुर सालम सिंह की सलाह पर दोनों, बाबा मोहनदास की शरण में पहुंचे और मदद की गुहार की।
बाबा ने उन्हें आश्वस्त किया और कहा कि बालाजी का नाम लेकर डाकुओं की पताका को उडा देना, क्योंकि विजय पताका ही किसी भी सेना की शक्ति होती है। ठाकुरों ने वैसा ही किया। बालाजी का नाम लिया और डाकुओं की पताका को तलवार से उडा दिया। डाकू सरदार उनके चरणों में आ गिरा। इस तरह मोहनदास जी के प्रति दोनों की श्रद्धा बलवती होती चली गई। बाबा मोहनदास ने उसी पल वहां बालाजी का एक भव्य मंदिर बनवाने का संकल्प किया। सालम सिंह ने भी मंदिर निर्माण में पूर्ण सहयोग देने का निश्चय किया और आसोटा निवासी अपने ससुर चम्पावत को बालाजी की मूर्ति भेजने का संदेश प्रेषित करवाया। यह घटना सन 1754 की है।
इधर, आसोटा ग्राम में एक किसान ब्रह्ममुहूर्त में अपना खेत जोत रहा था। एकाएक हल का फल किसी वस्तु से टकराया। उसने खोदकर देखा तो वहां एक मूर्ति निकली। उसने मूर्ति को निकालकर एक ओर रख दिया और प्रमोदवश उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। वह पुन: अपने काम में जुट गया। एकाएक उसके पेट में तीव्र दर्द उठा और वह वहां गिरकर छटपटाने लगा। उसकी पत्नी दौडी-दौडी अाई। किसान ने दर्द से कराहते हुए प्रस्तर प्रतिमा निकालने और पेट में तीव्र दर्द होने की बात बताई।
कृषक पत्नी बुद्धिमती थी। वह प्रतिमा के निकट पहुंची और आदरपूर्वक अपने आंचल से उसकी मिट्टी साफ की तो वहां राम-लक्ष्मण को कंधे पर लिए वीर हनुमान की दिव्य झांकी के दर्शन हुए। काले पत्थर की उस प्रतिमा को उसने एक पेड क़े निकट स्थापित किया और यथाशक्ति प्रसाद चढाकर, अपराध क्षमा की प्रार्थना की। तभी मानो चमत्कार हुआ, वह किसान स्वस्थ हो उठ खडा हुआ।
इस चमत्कार की खबर आग की तरह सारे गांव में फैल गई। आसोटा के ठाकुर चम्पावत भी दर्शन को आए और उस मूर्ति को अपनी हवेली में ले गए। उसी रात ठाकुर को बालाजी ने स्वप्न में दर्शन दिए और मूर्ति को सालासर पहुंचाने की आज्ञा दी। प्रात: ठाकुर चम्पावत ने अपने कर्मचारियों की सुरक्षा में भजन-मंडली के साथ सजी-धजी बैलगाडी में मूर्ति को सालासर की ओर विदा कर दिया। उसी रात भक्त शिरोमणि मोहनदास जी को भी बालाजी ने दर्शन दिए और कहा कि मैं अपना वचन निभाने के लिए काले पत्थर की मूर्ति के रूप में आ रहा हूं। प्रात: ठाकुर सालम सिंह व अनेक ग्रामवासियों ने बाबा मोहनदास जी के साथ मूर्ति का स्वागत किया और सन 1754 में शुक्ल नवमी को शनिवार के दिन पूर्ण विधि-विधान से हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना की गई।
श्रावण द्वादशी मंगलवार को भक्त शिरोमणि मोहनदास जी भगवत् भजन में इतने लीन हो गए कि उन्होंने घी और सिंदूर से मूर्ति को पूर्णत: श्रृंगारित कर दिया और उन्हें कुछ ज्ञात भी नहीं हुआ। उस समय बालाजी का पूर्व दर्शित रूप जिसमें वह श्रीराम और लक्ष्मण को कंधे पर धारण किए थे, अदृश्य हो गया। उसके स्थान पर दाढी-मूंछें, मस्तक पर तिलक, विकट भौंहें, सुंदर आंखें, पर्वत पर गदा धारण किए अद्भुत रूप के दर्शन होने लगे।
इसके बाद शनै:-शनै: मंदिर का विकास कार्य प्रगति के पथ पर बढता चला गया।


मंदिर का आकर्षण
वर्तमान में मंदिर के द्वार व दीवारें चांदी विनिर्मित मूर्तियों और चित्रों से सुसज्जित हैं। गर्भगृह के मुख्य द्वार पर श्रीराम दरबार की मूर्ति के नीचे पांच मूर्तियां हैं। मध्य में भक्त मोहनदास बैठे हैं, दाएं श्रीराम व हनुमान तथा बाएं बहन कान्ही और पं. सुखरामजी (बहनोई) आशीर्वाद देते दिखाए गए हैं।
कालान्तर में मोहनदास जी ने भांजे उदयराम जी को अपना चोला प्रदान कर उन्हें मंदिर का प्रथम पुजारी नियुक्त किया। आज भी यह परम्परा कायम है। मोहनदास जी के चोले पर विराजमान होकर ही पूजा अर्चना की जाती है। संवत् 1850 की वैशाख शुक्ल त्रयोदशी को ब्रह्ममुहूर्त में बाबा मोहनदास जी समाधिस्थ हो गए और स्वर्गारोही हो गए। उस समय कहते हैं कि जल की फुहार के साथ पुष्प वर्षा होने लगी थी और अनेक लोगों ने बालाजी के प्रत्यक्ष दर्शन किए थे, जो अपने सखा-तुल्य मोहनदास को आशीष दे रहे थे।
आज सालासर भक्तों का एक पुनीत तीर्थ है। यहां आने वाले भक्तों को जब-तब बालाजी के चमत्कार देखने को मिलते हैं। कलिकाल में सालासर बालाजी निश्चित ही एक उद्धारक के रूप में दर्शनार्थियों का कष्ट निवारण कर अपने सखा मोहनदास जी को दिए वचन का निर्वाह कर रहे हैं।


कैसे पहुंचे
यहां के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन सुजानगढ है। यहां पहुंचने के लिए जयपुर व अन्य स्थानों से पर्याप्त परिवहन साधन उपलब्ध हैं। किराए की टैक्सी सेवा भी उपलब्ध है। इस धाम के बारे में यह प्रसिद्ध है कि यहां से कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता।

Salasar Balaji (Rajasthan)

Salasar Balaji is a religious place for the devotees of Lord Hanuman. It is situated in Churu district of Rajasthan. Salasar Dham attracts innumerable Indian worshipers throughout the year. On Chaitra Purnima and Ashvin Purnima large fairs are organized every year where more than 6 to 7 lakhs of people assemble here to pay their homage to the deity. Hanuman Sewa Samiti looks after the management of the Temple and the fairs. There are many Dharamshalas to stay and restaurants to eat. The temple of Sri Hanuman is situated right in the middle of the Salasar town.

Salasar town is a part of district Churu in Rajasthan and it is situated on the Jaipur - Bikaner highway. It is at a distance of 57 kilometers from Sikar, 24 kilometers from Sujangarh and 30 kilometers from Laxmangarh. Salasar town lies under the jurisdiction of the Sujangarh Panchayat Samiti and is well connected with Delhi, Jaipur and Bikaner by regular bus service run by the Rajasthan State Road Transport Committee. Indian Airlines and Jet Air fly to Jaipur, from where Salasar is 3.5 hours drive via a taxi or a bus. Sujangarh, Sikar, Didwana, Jaipur and Ratangarh are the nearest railheads for Salasar Balaji. This city is about 170 kilometers from the city of Pilani that hosts the Birla Institute of Technology and Science. The road from Delhi to Pilani is very good and Balaji is often accessed via that route by people approaching from the direction of Delhi.

On Saturday, Shravan Shukla-Navami -Samvat 1811, a miracle happened. A Ginthala-Jat farmer of village Asota in district Nagaur of Rajasthan was ploughing his field. All of a sudden the plough was hit by some stony thing and a resonating sound was created. He dug up the soil of that place and found an idol covered with sand. His wife reached there with his lunch packet. The farmer showed the idol to his wife. She cleaned up the idol with her sari (dress). The idol was that of Balaji Lord Sri Hanuman. They bowed their heads with devotion and worshipped Lord Balaji. This news of the appearance of Lord Balaji spread in the village Asota immediately.
सालासर बालाजी (लाल कपडे में पुजारी खड़े हैं वहीं
है बालाजी का दरबार) के समुख लगा चढ़ावा
 (नारियल-लड्डू-फूलों) का अम्बार

सालासर बालाजी के दर्शन के बाद मनौती के लिए बांधे गए
नारियल और पताका (ध्वजा) के समक्ष लेखक राजेश  मिश्रा

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