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09 सितंबर 2011

Vijaya Ekadashi Vrat Katha-Vidhi


22. विजया एकादशी व्रत

प्रत्येक चन्द्र मास में दो एकादशी होती है. इस प्रकार एक वर्ष में 24 एकादशी होती है. जिस वर्ष में अधिमास होता है. उस वर्ष में 26 एकादशियां होती है. एकादशी का शाब्दिक अर्थ चन्द मास की ग्यारहवीं तिथि से है. चन्द्र माह के दो भाग होते है. एक कृष्ण पक्ष और दुसरा शुक्ल पक्ष. दोनों पक्षों की ग्यारवीं तिथि एकादशी तिथि कहलाती है.
सभी एकदशियों के अलग-अलग नाम है. माह और पक्ष के अनुसार एकादशी व्रत का नाम रखा गया है. जैसे-फाल्गुण मास के कृष्ण पक्ष की एकाद्शी को विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है. एकादशी व्रत करने से व्यक्ति के शुभ फलों में वृ्द्धि होती है. और पाप कर्मों का नाश होता है.  एकादशी व्रत करने से उपावासक व्रत से संबन्धित मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है. सभी एकादशी अपने नाम के अनुरुप फल देती है. 

विजया एकादशी व्रत विधि | Vijaya Ekadasi Vrat Vidhi 

एकाद्शी व्रत के विषय में यह मान्यता है, कि एकादशी व्रत करने से स्वर्ण दान, भूमि दान, अन्नदान और गौदान से अधिक पुन्य फलों की प्राप्ति होती है. एकादशी व्रत के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है. व्रत पूजन में धूप, दीप, नैवेध, नारियल का प्रयोग किया जाता है.    
विजया एकादशी व्रत में सात धान्य घट स्थापना की जाती है. सात धान्यों में गेंहूं, उड्द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर है. इसके ऊपर श्री विष्णु जी की मूर्ति रखी जाती है. इस व्रत को करने वाले व्यक्ति को पूरे दिन व्रत करने के बाद रात्रि में विष्णु पाठ करते हुए जागरण करना चाहिए. 
व्रत से पहले की रात्रि में सात्विक भोजन करना चाहिए. और रात्रि भोजन के बाद कुछ नहीं लेना चाहिए. एकादशी व्रत 24 घंटों के लिये किया जाता है. व्रत का समापन द्वादशी तिथि के प्रात:काल में अन्न से भरा घडा ब्राह्माण को दिया जाता है. यह व्रत करने से दु:ख-और दारिद्रय दूरे होते है. और अपने नाम के अनुसार विजया एकादशी व्यक्ति को जीवन के कठिन परिस्थितियों में विजय दिलाती है. समग्र कार्यो में विजय दिलाने वाली विजया एकादशी की कथा इस प्रकार है.  

विजया एकादशी व्रत कथा | Vijaya Ekadasi Vrat Katha

कथा के अनुसार विजया एकादशी के दिन भगवान श्री राम लंका पर चढाई करने के लिये समुद्र तट पर पहुंच़े थे. समुद्र तट पर पहुंच कर भगवान श्री राम ने देखा की सामने विशाल समुद्र है. और उनकी पत्नी देवी सीता रावण कैद में है. इस पर भगवान श्री राम ने समुद्र देवता से मार्ग देने की प्रार्थना की. परन्तु समुद्र ने जब श्री राम को लंका जाने का मार्ग नहीं दिया तो भगवान श्री राम ने ऋषि गणों से इसका उपाय पूछा. ऋषियों में भगवान राम को बताया की प्रत्येक शुभ कार्य को शुरु करने से पहले व्रत और अनुष्ठान कार्य किये जाते है. व्रत और अनुष्ठान कार्य करने से कार्यसिद्धि की प्राप्ति होती है. और सभी कार्य सफल होते है. हे भगवान आप भी फाल्गुण मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत विधिपूर्वक किजिए. 
व्रत करने के लिये एक मिट्टी के घडे को सात प्रकार के धान्यों से भरिए. उसके ऊपर पीपल, आम, बडौर गुलर के पत्ते रखिए. इसके अतिरिक्त एक अलग बर्तन में जौ भरकर कलश स्थापित किजिए. जौ से भरे बर्तन में श्री लक्ष्मी नारायण कि तस्वीर स्थापित किजिए और इन सभी का विधिपूर्वक पूजन किजिए. एकादशी तिथि के दिन व्रत कर, रात्रि में जागरण किजिए. प्रात:काल जल सहित कलश सागर को अर्पित किजिए.    
भगवान श्री राम ने ऋषियों के कहे अनुसार व्रत किया, व्रत के प्रभाव से समुद्र आपको रास्ता देगा. और यह व्रत आपको रावण पर विजय भी दिलायेगा.  तभी से इस व्रत को विजय प्राप्ति के लिये किया जाता है.

Amalaki Ekadashi Vrat Katha


23. आमलकी एकादशी व्रत कथा


आमलकी एकादशी व्रत शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है. इस व्रत में आंवले के वृक्ष की पूजा करने का विधि-विधान है. इस व्रत के विषय में कहा जाता है, कि यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली है.


सौ गायों को दान में देने के उपरान्त जो फल प्राप्त होता है. वही फल आमलकी एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है. इस व्रत में आंवले के पेड का पूजन किया जाता है. आंवले के वृ्क्ष के विषय में यह मत है, कि इसकी उत्पति भगवान श्री विष्णु के मुख से हुई है. एकादशी तिथि में विशेष रुप से श्री विष्णु जी की पूजा की जाती है. आंवले के पेड की उत्पति को लेकर एक कथा प्रचलित है.

विष्णु जी के मुख से आंवले की उत्पति कैसे हुई? | Origin of Amla from Mouth of Lord Vishnu

विष्णु पुराण के अनुसार एक बार भगवान विष्णु के थूकने के फलस्वरुप उनके मुख से चन्दमा का जैसा एक बिन्दू प्रकट होकर पृ्थ्वी पर गिरा. उसी बिन्दू से आमलक अर्थात आंवले के महान पेड की उत्पति हुई. यही कारण है कि विष्णु पूजा में इस फल का प्रयोग किया जाता है.


श्रीविष्णु के श्री मुख से प्रकट होने वाले आंवले के वृ्क्ष को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है. इस फल के महत्व के विषय में कहा गया है, कि इस फल के स्मरणमात्र से गऊ दान करने के समान फल प्राप्त होता हे. यह फल भगवान विष्णु जी को अत्यधिक प्रिय है. इस फल को खाने से तीन गुणा शुभ फलों की प्राप्ति होती है.

आमलकी एकादशी व्रत कथा | Amalaki Ekadashi Vrat Katha

एक बार एक नगर था. इस नगर में सभी वर्गों के लोग मिलकर आनन्द पूर्वक रह्ते थें. लोगों का आपस में प्रेम होने के कारण धर्म और आस्था का निवास भी नगर में बना हुआ था. यह नगर चन्द्रवंशी नामक राजा के राज्य के अन्तर्गत आता था. उस राज्य में सभी सुखी थे, उस राज्य में विशेष रुप से श्री विष्णु जी की पूजा होती थी. और एकदशी व्रत करने की प्रथा उस नगर में प्राचीन समय से चली आ रही थी. राजा और प्रजा दोनों मिलकर एकादशी व्रत कुम्भ स्थापना करते थे. कुम्भ स्थापना के बाद धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न आदि से पूजा की जाती थी.


एक बार एकादशी व्रत करने के समय सभी जन मंदिर में जागरण कर रहे थे. रात्रि के समय एक शिकारी आया जो भूखा था, और वह लगभग सभी पापों का भागी था. मंदिर में अधिक लोग होने के कारण शिकारी को भोजन चुराने का अवसर न मिल सका और उस शिकारी को वह रात्रि जागरण करते हुए बितानी पडी. प्रात:काल होने पर सब जन अपने घर चले गए. और शिकारी भी अपने घर चला गया. कुछ समय बीतने के बाद शिकारी कि किसी कारणवश मृ्त्यु हो गई.


उस शिकारी ने अनजाने में ही सही क्योकि आमलकी एकादशी व्रत किया था, इस वजह से उसे पुन्य प्राप्त हुआ, और उसका जन्म एक राजा के यहां हुआ. वह बहुत वीर, धार्मिक, सत्यवादी और विष्णु भक्त था. दान कार्यो में उसकी रुचि थी. एक बार वह शिकार को गया और डाकूओं के चंगुल में फंस गया. डाकू उसे मारने के लिए शस्त्र का प्रहार करने लगे. राजा ने देखा की डाकूओं के प्रहार का उस पर कोई असर नहीं हो रहा है.


और कुछ ऎसा हुआ की डाकूओं के शस्त्र स्वंय डाकूओं पर ही वार करने लगे. उस समय एक शक्ति प्रकट हुई, और उस शक्ति ने सभी डाकूओं को मृ्त्यु लोक पहुंचा दिया. राजा ने पूछा की इस प्रकार मेरी रक्षा करने वाला कौन है.? इसके जवाब में भविष्यवाणी हुई की तेरी रक्षा श्री विष्णु जी कर रहे है. यह कृ्पा आपके आमलकी एकादशी व्रत करने के प्रभावस्वरुप हुई है. इस व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.

Papmochani Ekadashi Vrat Vidhi


24.पापमोचनी एकादशी व्रत

papmochani_ekadasi
पाप मोचनी एकादशी व्रत चैत्र मास के कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी को किया जाता है.  पापमोचनी एकादशी व्रत व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्त कर उसके लिये मोक्ष के मार्ग खोलती है. इस एकादशी को पापो को नष्ट करने वाली, एकादशी के रुप में भी जाना जाता है. वर्ष 2011 में पापमोचनी एकादशी व्रत 30 मार्च के दिन किया जायेगा. इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु जी का पूजन करना चाहिए. अगर कोई व्यक्ति इस पूजा को षोडशोपचार के रुप में करने पर व्रत के शुभ फलों में वृ्द्धि होती है. 

पापमोचनी व्रत विधि | Papmochani Ekadasi Vrat Vidhi

एकादशी व्रत में श्री विष्णु जी का पूजन किया जाता है. पापमोचनी एकादशी व्रत करने के लिये उपवासक को इससे पूर्व की तिथि में सात्विक भोजन करना चाहिए. एकादशी व्रत की अवधि 24 घंटों की होती है. इसलिए इस व्रत को प्रारम्भ करने से पूर्व स्वयं को व्रत के लिये मानसिक रुप से तैयार कर लेना चाहिए. एकाद्शी व्रत में दिन के समय में श्री विष्णु जी का स्मरण करना चाहिए. और रात्रि में भी पूरी रात जाकर श्री विष्णु का पाठ करते हुए जागरण करना चाहिए. 
व्रत के दिन सूर्योदय काल में उठना चाहिए. और स्नान आदि सभी कार्यो से निवृ्त होने के बाद व्रत का संकल्प करना चाहिए. संकल्प लेने के बाद भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए.  पूजा करने के बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने बैठ्कर श्रीमद भागवत कथा का पाठ करना चाहिए. इस तिथि के दिन व्रत करने के बाद जागरण करने से कई गुणा फल प्राप्त होता है.
व्रत की रात्रि में भी निराहर रहकर, जागरण करने से व्रत के पुन्य फलों में वृ्द्धि होती है. व्रत के दिन भोग विलास की कामना का त्याग करना चाहिए. इस अवधि में मन में किसी भी प्रकार के बुरे विचार को लाने से बचना चाहिए.  व्रत करने पर व्रत की कथा का श्रवण अवश्य करना चाहिए.    
एकादशी व्रत का समापन द्वादशी तिथि के दिन प्रात:काल में स्नान करने के बाद, भगवान श्री विष्णु कि पूजा करने के बाद ब्राह्माणों को भोजन व दक्षिणा देकर करना चाहिए. यह सब कार्य करने के बाद ही स्वयं भोजन करना चाहिए.    

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा | Papmochani Ekadashi Vrat Katha 

प्राचीन समय की बात है, चित्ररथ नाम का एक वन था. इस वन में गंधर्व कन्याएं और देवता सभी विहार करते थें. एक बार मेधावी नामक ऋषि इस वन में तपस्या कर रहा था. तभी वहां से एक मंजुघोषा नामक अप्सरा ऋषि को देख कर उनपर मोहित हो गई. मंजूघोषा ने अपने रुप-रंग और नृ्त्य से ऋषि को मोहित करने का प्रयास किया. उस समय में कामदेव भी वहां से गुजर रहे थें, उन्होने भी अप्सरा की इस कार्य में सहयोग किया. जिसके फलस्वरुप अप्सरा ऋषि की तपस्या भंग करने में सफल हो गई.
कुछ वर्षो के बाद जब ऋषि का मोहभंग हुआ, तो ऋषि को स्मरण हुआ कि वे तो शिव तपस्या कर रहे थें. अपनी इस अवस्था का कारण उन्होने अप्सरा को माना. और उन्होने अप्सरा को पिशाचिनी होने का श्राप दे दिया. शाप सुनकर मंजूघोषा ने कांपते हुए इस श्राप से मुक्त होने का उपाय पूछा. तब ऋषि ने उसे पापमोचनी एकादशी व्रत करने को कहा. स्वयं ऋषि भी अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिये इस व्रत को करने लगें. दोनों का व्रत पूरा होने पर, दोनों को ही अपने पापों से मुक्ति मिली.  
तभी से पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की प्रथा चली आ रही है. यह व्रत व्यक्ति के सभी जाने- अनजाने में किये गये पापों से मुक्ति दिलाता है. 

Padmini Ekadashi Vrat Katha


25. पद्मिनी एकादशी व्रत कथा महात्मय

पद्मिनी एकादशी (Padmini Ekadasi)  भगवान को अति प्रिय है । इस व्रत का विधि पूर्वक पालन करने वाला विष्णु लोक को जाता है । इस व्रत के पालन से व्यक्ति सभी प्रकार के यज्ञों, व्रतों एवं तपस्चर्या का फल प्राप्त कर लेता है। इस व्रत की कथा के अनुसार:
श्री कृष्ण कहते हैं त्रेता युग में एक परम पराक्रमी राजा कीतृवीर्य था। इस राजा की कई रानियां थी परतु किसी भी रानी से राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। संतानहीन होने के कारण राजा और उनकी रानियां तमाम सुख सुविधाओं के बावजूद दु:खी रहते थे। संतान प्राप्ति की कामना से तब राजा अपनी रानियो के साथ तपस्या करने चल पड़े। हजारों वर्ष तक तपस्या करते हुए राजा की सिर्फ हडि्यां ही शेष रह गयी परंतु उनकी तपस्या सफल न रही। रानी ने तब देवी अनुसूया से उपाय पूछा। देवी ने उन्हें मल मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने के लिए कहा.
अनुसूया ने रानी को व्रत का विधान भी बताया। रानी ने तब देवी अनुसूया के बताये विधान के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत रखा। व्रत की समाप्ति पर भगवान प्रकट हुए और वरदान मांगने के लिए कहा। रानी ने भगवान से कहा प्रभु आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे बदले मेरे पति को वरदान दीजिए। भगवान ने तब राजा से वरदान मांगने के लिए कहा। राजा ने भगवान से प्रार्थना की कि आप मुझे ऐसा पुत्र प्रदान करें जो सर्वगुण सम्पन्न हो जो तीनों लोकों में आदरणीय हो और आपके अतिरिक्त किसी से पराजित न हो। भगवान तथास्तु कह कर विदा हो गये। कुछ समय पश्चात रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया जो कार्तवीर्य अर्जुन के नाम से जाना गया। कालान्तर में यह बालक अत्यंत पराक्रमी राजा हुआ जिसने रावण को भी बंदी बना लिया था।

पद्मिनी एकादशी व्रत विधान
(Padmini Ekadashi Vrat Vidhi):

भगवान श्री कृष्ण ने एकादशी का जो व्रत विधान बताया है वह इस प्रकार है। एकादशी के दिन स्नानादि से निवृत होकर भगवान विष्णु की विधि पूर्वक पूजन करें। निर्जल व्रत रखकर पुराण का श्रवण अथवा पाठ करें। रात्रि में भी निर्जल व्रत रखें और भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें। रात्रि में प्रति पहर विष्णु और शिव की पूजा करें। प्रत्येक प्रहर में भगवान को अलग अलग भेंट प्रस्तुत करें जैसे प्रथम प्रहर में नारियल, दूसरे प्रहर में बेल, तीसरे प्रहर में सीताफल और चथे प्रहर में नारंगी और सुपारी निवेदित करें।
द्वादशी के दिन प्रात: भगवान की पूजा करें फिर ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करें इसके पश्चात स्वयं भोजन करें। इस प्रकार इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य जीवन सफल होता है, व्यक्ति जीवन का सुख भोगकर श्री हरि के लोक में स्थान प्राप्त करता है।

Parma Ekadashi Vrat vidhi katha


26. परमा हरिवल्लभा एकादशी व्रत विधि एवं कथा



अधिक मास में कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है वह हरिवल्लभा अथवा परमा एकदशी के नाम से जानी जाती है ऐसा श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा है (additional months krishna paksha Parma Ekadashi). भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को इस व्रत की कथा व विधि भी बताई थी. भगवान में श्रद्धा रखने वाले आप भक्तों के लिए यही कथा एवं विधि प्रस्तुत है.

परमा एकादशी कथा (Parma Ekadasi Vrat Katha)

: काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ निवास करता था. ब्राह्मण धर्मात्मा था और उसकी पत्नी पतिव्रता. यह परिवार स्वयं भूखा रह जाता परंतु अतिथियों की सेवा हृदय से करता. धनाभाव के कारण एक दिन ब्रह्मण ने ब्रह्मणी से कहा कि धनोपार्जन के लिए मुझे परदेश जाना चाहिए क्योंकि अर्थाभाव में परिवार चलाना अति कठिन है.
ब्रह्मण की पत्नी ने कहा कि मनुष्य जो कुछ पाता है वह अपने भाग्य से पाता है. हमें पूर्व जन्म के फल के कारण यह ग़रीबी मिली है अत: यहीं रहकर कर्म कीजिए जो प्रभु की इच्छा होगी वही होगा। ब्रह्मण को पत्नी की बात ठीक लगी और वह परदेश नहीं गया. एक दिन संयोग से कण्डिल्य ऋषि उधर से गुजर रहे थे तो उस ब्रह्मण के घर पधारे। ऋषि को देखकर ब्राह्मण और ब्राह्मणी अति प्रसन्न हुए. उन्होंने ऋषिवर की खूब आवभगत की.
ऋषि उनकी सेवा भावना को देखकर काफी खुश हुए और ब्राह्मण एवं ब्राह्मणी द्वारा यह पूछे जाने पर की उनकी गरीबी और दीनता कैसे दूर हो सकती है, उन्होंने कहा मल मास में जो कृष्ण पक्ष की एकादशी (Mal mass Krishna Paksha Ekadashi) होती है वह परमा एकादशी (Parma Ekadasi) के नाम से जानी जाती है, इस एकादशी का व्रत आप दोनों रखें. ऋषि ने कहा यह एकादशी धन वैभव देती है तथा पाप का नाश कर उत्तम गति भी प्रदान करने वाली है. किसी समय में धनाधिपति कुबेर ने इस व्रत का पालन किया था जिससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें धनाध्यक्ष का पद प्रदान किया.
समय आने पर सुमेधा नामक उस ब्राह्मण ने विधि पूर्वक इस एकादशी का व्रत रखा जिससे उनकी गरीबी का अंत हुआ और पृथ्वी पर काफी समय तक सुख भोगकर वे पति पत्नी श्री विष्णु के उत्तम लोक को प्रस्थान कर गये.

परमा एकादशी व्रत विधान (Parma Ekadashi Vrat vidhan)

परमा एकादशी व्रत की विधि बड़ी ही कठिन है. इस व्रत में पांच दिनों तक निराहार रहने का व्रत लिया जाता है. व्रती को एकादशी के दिन स्नान करके भगवान विष्णु के समक्ष बैठकर हाथ में जल एवं फूल लेकर संकल्प करना होता है. संकलप के बाद भगवान की पूजा करनी होती है फिर पांच दिनों तक श्री हरि में मन लगाकर व्रत का पालन करना होता है. पांचवें दिन ब्रह्मण को भोजन करवाकर दान दक्षिणा सहित विदा करने के पश्चात व्रती को स्वयं भोजन करना होता है.

वर्ष भर की एकादशियां, Ekdashi Fasts And Ekadashi Dates, एकादशी व्रत

BHAGWAN VISHNU (VISHVARUP)


हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। यहाँ 26 एकादशियों के नामों के वर्णन के साथ ही उनकी जानकारी भी हैं।


सभी उपवासों में एकाद्शी व्रत श्रेष्ठतम कहा गया है. एकाद्शी व्रत की महिमा कुछ इस प्रकार की है, जैसे सितारों से झिलमिलाती रात में पूर्णिमा के चांद की होती है. इस व्रत को रखते वाले व्यक्ति को अपने चित, इंद्रियों, आहार और व्यवहार पर संयम रखना होता है. एकाद्शी व्रत का उपवास व्यक्ति को अर्थ-काम से ऊपर उठकर मोक्ष और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है.

एकादशी - यथानाम-तथाफल
Ekadashi - Result, so as the Name

प्रत्येक वर्ष में बारह माह होते है. और एक माह में दो एकादशी होती है. अमावस्या से ग्यारहवीं तिथि, एकाद्शी तिथि, शुक्ल पक्ष की एकाद्शी कहलाती है. इसी प्रकार पूर्णिमा से ग्यारहवीं तिथि कृ्ष्ण पक्ष की एकाद्शी कहलाती है. इस प्रकार हर माह में दो एकाद्शी होती है. जिस वर्ष में अधिक मास होता है. उस साल दो एकाद्शी बढने के कारण 26 एकाद्शी एक साल में आती है. यह व्रत प्राचीन समय से यथावत चला आ रहा है. इस व्रत का आधार पौराणिक, वैज्ञानिक और संतुलित जीवन है.



एकाद्शी व्रत के फल
Result of Ekadashi Vrat

एकाद्शी का व्रत जो जन पूर्ण नियम, श्रद्धा व विश्वास के साथ रखता है, उसे पुन्य, धर्म, मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस उपवास के विषय में यह मान्यता है कि इस उपवास के फलस्वरुप मिलने वाले फल अश्वमेघ यज्ञ, कठिन तपस्या, तीर्थों में स्नान-दान आदि से मिलने वाले फलों से भी अधिक होते है. यह उपवास, उपवासक का मन निर्मल करता है, शरीर को स्वस्थ करता है, ह्रदय शुद्ध करता है, तथा सदमार्ग की ओर प्रेरित करता है. तथा उपवास के पुन्यों से उसके पूर्वज मोक्ष प्राप्त करते है.

एकाद्शी व्रत के नियम
Law of Ekadashi Vrat

व्रतों में एकादशी के व्रत को सबसे उच्च स्थान दिया गया है, इसलिये इस व्रत के नियम भी अन्य सभी व्रत- उपवास के नियमों से सबसे अधिक कठोर होते है. इस उपवास में तामसिक वस्तुओं का सेवन करना निषेध माना जाता है. वस्तुओं में मांस, मदिरा, प्याज व मसूर दाल है. दांम्पत्य जीवन में संयम से काम लेना चाहिए.

दातुन में नींबू, जामून या आम की टहनी को प्रयोग करना चाहिए. यहां तक की उपवास के दिन पेड का पत्ता भी नहीं तोडना चाहिए. सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों को भी हानि न हो, इस बात का ध्यान रखना चाहिए. झूठ बोलने और निंदा सुनना भी उपवास के पुन्यों में कमी करता है.
सभी एकादशियों के नाम व तिथियां इस प्रकार है.

एकादशी का नाममासपक्ष 
  1. कामदा एकादशीचैत्रशुक्ल
  2. वरूथिनी एकादशीवैशाखकृष्ण
  3. मोहिनी एकादशीवैशाखशुक्ल
  4. अपरा एकादशीज्येष्ठकृष्ण
  5. निर्जला एकादशीज्येष्ठशुक्ल
  6. योगिनी एकादशीआषाढ़कृष्ण
  7. देवशयनी एकादशीआषाढ़शुक्ल
  8. कामिका एकादशीश्रावणकृष्ण
  9. पवित्रा एकादशी
श्रावणशुक्ल
10. अजा एकादशीभाद्रपदकृष्ण
11. पद्मा एकादशीभाद्रपदशुक्ल
12. इंदिरा एकादशीआश्विनकृष्ण
13. पापांकुशा एकादशीआश्विनशुक्ल
14. रमा एकादशीकार्तिककृष्ण
15. देव प्रबोधिनी एकादशीकार्तिकशुक्ल
16. उत्पन्ना एकादशीमार्गशीर्षकृष्ण
17. मोक्षदा एकादशीमार्गशीर्षशुक्ल
18. सफला एकादशीपौषकृष्ण
19. पुत्रदा एकादशीपौषशुक्ल
20. षटतिला एकादशीमाघकृष्ण
21. जया एकादशीमाघशुक्ल
22. विजया एकादशीफाल्गुनकृष्ण
23. आमलकी एकादशीफाल्गुनशुक्ल
24. पापमोचिनी एकादशीचैत्रकृष्ण
25. पद्मिनी एकादशीअधिकमासशुक्ल
26. परमा एकादशीअधिकमासकृष्ण

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