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10 सितंबर 2011

Saphala Ekadasi Vrat Vidhi-Katha


18. सफला एकादशी



saphala_ekadashi 2011
सफला एकादशी व्रत पौष मास के कृ्ष्ण पक्ष की एकाद्शी के दिन किया जाता है. इस दिन भगवान नारायण की पूजा का विशेष विधि-विधान है. इस व्रत को धारण करने वाले व्यक्ति को व्रत के दिन प्राता: स्नान करके, भगवान कि आरती करनी चाहिए. और भगवान को भोग लगाना चाहिए. ब्राह्मणों तथा गरीबों, को भोजन अथवा दान देना चाहिए. रात्रि में जागरण करते हुए कीर्तन पाठ आदि करना चाहिए. रात्रि में जागरण करते हुए कीर्तन पाठ करना अत्यन्त फलदायी रहता है. इस व्रत को करने से समस्त कार्यो में सफलता मिलती है. यह एकादशी अपने नाम के अनुसार व्यक्ति को सफलता देती है.   

सफला एकादशी व्रत फल | Saphala Ekadashi Vrat Benefits

पौष माह के कृ्ष्ण पक्ष की एकाद्शी का नाम सफला है. इस एकाद्शी के देवता नारायण है. सफला एकादशी के विषय में कहा गया है, कि यह एकाद्शी व्यक्ति को सहस्त्र वर्ष तपस्या करने से जिस पुन्य की प्रप्ति होती है. वह पुन्य भक्ति पूर्वक रात्रि जागरण सहित सफला एकादशी का व्रत करने से मिलता है. 
एकादशी का व्रत करने से जो पुन्य प्राप्त होता है, वह पुन्य कुरुक्षेत्र तीर्थ स्थान में सूर्यग्रहण के समय स्नान करने से भी प्राप्त नहीं होता है. सफला एकादशी से कई पीढियों के पाप दूर होते है. एकादशी व्रत व्यक्ति के ह्रदय को शुद्ध करता है. और जब यह व्रत श्रद्वा और भक्ति के साथ किया जाता है. तो मोक्ष देता है. 

सफला एकादशी व्रत विधि | Safala Ekadasi Vrat Vidhi

सफला एकादशी के व्रत में देव श्री नारायण का पूजन किया जाता है. जिस व्यक्ति को सफला एकाद्शी का व्रत करना हों. जिस व्यक्ति को यह व्रत करना हो, उस व्यक्ति के लिए व्रत के नियम दशमी तिथि से ही प्रारम्भ हो जाते है. उसे व्रत के दिन व्रत के सामान्य नियमों का पालन करना चाहिए. और जहां, तक हो सके व्रत के दिन उसे सात्विक भोजन करना चाहिए. तथा भोजन में उसे नमक का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए. भोजन के लिये तांबे के बर्तन का प्रयोग करना भी उचित नहीं रह्ता है. दशमी तिथि कि रात्रि में एक बार ही भोजन करना चाहिए. 
एकादशी के दिन उपवासक को शीघ्र उठकर, स्नाना आदि कार्यो से निवृ्त होने के बाद व्रत का संकल्पभगवान श्री विष्णु के सामने लेना चाहिए. संकल्प लेने के बाद धूप, दीप, फल आदि से भगवान श्री विष्णु और नारायण देव का पंचामृ्त से पूजन करना चाहिए. 
उपवासक को व्रत के दिन की अवधि में दिन में सोना नहीं चाहिए. और रात्रि में भी उसे विष्णु नाम का पाठ करते हुए जागरण करना चाहिए. द्वादशी तिथि के दिन स्नान करने के बाद ब्राह्माणों को अन्न और धन की दक्षिणा देकर इस व्रत का समापन किया जाता है.    

सफला एकादशी व्रत कथा | Saphala Ekadashi Vrat Katha in Hindi

चम्पावती नगरी में एक महिष्मान नाम का राजा राज्य करता था. उस राजा के चार पुत्र थें. उन पुत्रों में सबसे बडा लुम्पक, नाम का पुत्र महापापी था. वह हमेशा बुरे कार्यो में लगा रहता था. यहां तक की ऎसे कार्यो में अपने पिता क धन व्यर्थ करने से भी पीछे नहीं हटता था.   
वह सदैव देवता, ब्राह्माण, वैष्णव आदि की निन्दा किया करता था. जब उसके पिता को अपने बडे पुत्र के बारे में ऎसे समाचार प्राप्त हुए, तो उसने उसे अपने राज्य से निकाल दिया. जब लुम्पक सबके द्वारा त्याग दिया गया, तब वह सोचने लगा, कि अब मैं क्या करूं.? कहाँ जाऊँ? अन्त में उसने रात्रि को पिता की नगरी में चोरी करने की ठानी.
वह दिन में बाहर रहने लगा और रात को अपने पिता कि नगरी में जाकर चोरी तथा अन्य बुरे कार्य करने लगा. रात्रि में जाकर निवासियों को मारने और कष्ट देने लगा. पहरेदान उसे पकडते और राजा का पुत्र मानकर छोड देते थे. जिस वन में वह रहता था. वह भगवान को बहुत प्रिय था. उस वन में एक बहुत पुराना पीपल का वृक्ष के नीचे, महापापी लुम्पक रहता था. कुछ दिनों के बाद पौष माह के कृ्ष्ण पक्ष की दशमी के दिन वह शीत के कारण मूर्छित हो गया. शीत के कारण उसके हाथ-पैर जकड गयें. उस दिन वह रात्रि उसने बडी कठिनता से बिताई. अगले दिन प्रात: होने पर भी उसकी मूर्छा न गई. दोपहर में गर्मी होने पर उसे होश आया.  
शरीर में कमजोरी होने के कारण वह कुछ खा भी न सकें, आसपास उसे जो फल मिलें, उसने वे पीपल कि जड के पास रख दिये. और कहा कि इन फलों को हे भगवान आप ही खा लिजिए. ऎसा कहकर वह फिर से मूर्छित गया. रात्रि में उसकी मूर्छा खुली. उस महापापी के इस व्रत से तथा रात्रि जागरण से भगवान अत्यन्त प्रसन्न हुए. और उसके समस्त पाप नष्ट हो गये़ 
लुम्पक ने जब अपने सभी पाप नष्ट होने की बात सुनी तो वह बहुत प्रसन्न हुआ. वह शीघ्र सुन्दर वस्त्र धारन कर अपने पिता के पास गया. उसके पिता ने उसे अपना राज्य सौंपकर वन का रास्ता लिया.

Putrada Ekadashi Katha-Vidhi


19. पुत्रदा एकादशी व्रत

Putrada_Ekadashi_Vrat

Putrada Ekadashi Vrat

हिन्दु कैलेण्डर के अनुसार प्रतिवर्ष पुत्रदा एकादशी का व्रत पौष माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है. इस दिन भगवान नारायण की पूजा की जाती है. सुबह स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने के पश्चात श्रीहरि का ध्यान करना चाहिए. सबसे पहले धूप-दीप आदि से भगवान नारायण की अर्चना की जाती है, उसके बाद  फल-फूल, नारियल, पान, सुपारी, लौंग, बेर, आंवला आदि व्यक्ति अपनी सामर्थ्य अनुसार भगवान नारायण को अर्पित करते हैं. पूरे दिन निराहार रहकर संध्या समय में कथा आदि सुनने के पश्चात फलाहार किया जाता है. इस दिन दीप दान करने का महत्व है.

पुत्रदा एकादशी व्रत का महत्व | Importance of Putrada Ekadashi Fast

इस व्रत के नाम के अनुसार ही इसका फल है. जिन व्यक्तियों को संतान होने में बाधाएं आती है अथवा जो व्यक्ति पुत्र प्राप्ति की कामना करते हैं उनके लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत बहुत ही शुभफलदायक होता है. इसलिए संतान प्राप्ति के लिए इस व्रत को व्यक्ति विशेष को अवश्य रखना चाहिए, जिससे उसे मनोवांछित फलों की प्राप्ति हो सके (By observing this fast a person may get his wish of having a child fulfilled).

पुत्रदा एकादशी व्रत की कथा | Putrada Ekadashi Fast Story

प्राचीन काल में भद्रावतीपुरी नगर में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे.  शादी के कई वर्ष बीत जाने पर भी उनको पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई. राजा और उसकी रानी दोनों इस बात को लेकर चिन्ताग्रस्त रहते थे. दोनों सदैव ही शोकाकुल रहने लगे. राजा के पितर भी यह सोचकर चिन्ताग्रस्त थे कि राजा का वंश आगे न चलने पर उन्हें तर्पण कौन करेगा औन उनका पिण्ड दान करेगा. राजा भी इसी चिन्ता से अधिक दु:खी थे कि उनके मरने के बद उन्हें कौन अग्नि देगा. एक दिन इसी चिन्ता से ग्रस्त राजा सुकेतुमान अपने घोडें पर सवार होकर वन की ओर चल दिए. वन में चलते हुए वह अत्यन्त घने वन में चले गए जहाँ तरह-तरह के जानवरों की आवाजें सुनाई दे रही थी.

वन में चलते-चलते राजा को बहुत प्यास लगने लगी. वह पानी की तलाश में वन में और अंदर की ओर चले गए जहाँ उन्हें एक सरोवर दिखाई दिया. राजा ने देखा कि सरोवर के पास ऋषियों के आश्रम भी बने हुए है और बहुत से मुनि वेदपाठ कर रहे हैं. राजा अपने घोडे़ से उतरा उसने सरोवर से पानी  पीया. तभी राजा का दांया नेत्र फड़कने लगा. राजा ने इसे शुभ संकेत समझा. राजा ने सभी मुनियों को बारी-बारी से सादर प्रणाम किया. ऋषियों ने राजा को आशीर्वाद दिया और बोले कि राजन हम आपसे प्रसन्न हैं. तब राजा ने ऋषियों से उनके एकत्रित होने का कारण पूछा. मुनि ने कहा कि वह विश्वेदेव हैं और सरोवर के निकट स्नान के लिए आये हैं. आज से पाँचवें दिन माघ मास का स्नान आरम्भ हो जाएगा और आज पुत्रदा एकादशी है. जो मनुष्य इस दिन व्रत करता है उन्हें पुत्र की प्राप्ति होती है.

राजा सुकेतुमान ने यह सुनते ही कहा हे विश्वेदेवगण यदि आप सभी मुझ पर प्रसन्न हैं तब आप मुझे पुत्र रत्न की प्राप्ति का आशीर्वाद दें. मुनि बोले हे राजन आज पुत्रदा एकादशी का व्रत है.आप आज इस व्रत को रखें और भगवान नारायण की आराधना करें. राजा ने मुनि के कहे अनुसार विधिवत तरीके से पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा. विधिवत तरीके से अनुष्ठान किया. अगले दिन द्वादशी को पारण किया. इसके बाद राजा ने सभी मुनियों को बार-बार झुककर प्रणाम किया और अपने महल में वापिस आ गये. कुछ समय के पश्चात रानी गर्भवती हो गई. नौ महीने बाद रानी ने एक सुकुमार पुत्र को जन्म दिया, जो आगे चलकर शूरवीर तथा प्रजापालक बना.

इस प्रकार जो व्यक्ति इस व्रत को रखते हैं उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है. संतान होने में यदि बाधाएं आती हैं तो इस व्रत के रखने से वह दूर हो जाती हैं. जो मनुष्य इस व्रत के महात्म्य को सुनता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है.

Shatatila Ekadashi Vrat Katha-Vidhi


20. षटतिला एकादशी व्रत

हिन्दु कैलेण्डर के अनुसार प्रतिवर्ष माघ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी का व्रत रखा जाता है. षटतिला एकादशी के दिन तिलों का छ: प्रकार से उपयोग किया जाता है. जैसे - तिल से स्नान करना, तिल का उबटन लगाना, तिल से हवन करना, तिल से तर्पण करना, तिल का भोजन करना और तिलों का दान करना - ये छ: प्रकार के उपयोग हैं. इसलिए इसे षटतिला एकादशी व्रत कहा जाता है.
 Shatila_Ekadasi

षटतिला एकादशी व्रत का महत्व | Importance of Shatatila Ekadashi Vrat

इस दिन जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से षटतिला एकादशी का व्रत रखते हैं, उनके सभी पापों का नाश होता है. इसलिए माघ मास में पूरे माह व्यक्ति को अपनी समस्त इन्द्रियों पर काबू रखना चाहिए. काम, क्रोध, अहंकार, बुराई तथा चुगली का त्याग कर भगवान की शरण में जाना चाहिए. माघ माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी को व्रत रखना चाहिए. इससे मनुष्य के सभी पाप समाप्त हो जाएंगें तथा उसे स्वर्ग की प्राप्ति होगी. 
षटतिला एकादशी व्रत विधि | Shatatila Ekadashi Fast Method

एक बार दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा कि पृथ्वी लोक पर मनुष्य अनेक प्रकार के दुर्व्यसनों मेम फंसा रहता है, अन्य लोगों की चुगलियाँ करता है. ब्राह्मण हत्या, चोरी तथा अन्य बहुत से पाप कर्म करता है फिर भी उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है. दालभ्य ऋषि बोले कि आप मुझे ये बताएं कि ये मनुष्य कौन सा दान अथवा पुण्य कर्म करते हैं जिससे इनके सभी पापों का नाश होता है. तब पुलस्त्य ऋषि ने कहा कि हे ऋषिवर आज मैं आपको वह भेद बताता हूँ जो आज तक किसी को स्वर्ग लोक में भी नहीं पता है. ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा देवताओं के देव इन्द्र को भी इस भेद के बारे में जानकारी नहीं है.


पुलस्त्य ऋषि ने कहा कि माघ मास लगते ही मनुष्य को सुबह स्नान आदि करके शुद्ध रहना चाहिए.अपनी समस्त इन्द्रियों को अपने संयम रखकर भगवान का स्मरण करना चाहिए. व्यक्ति पुष्य नक्षत्र में तिल तथा कपास को गोबर में मिलाकर उसके 108 कण्डे बनाकर रख लें. माघ मास की षटतिला एकादशी को सुबह स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें. व्रत करने का संकल्प करके भगवान विष्णु जी का ध्यान करना चाहिए. यदि व्रत आदि में किसी प्रकार की भूल हो जाए तब भगवान कृष्ण जी से क्षमा याचना करनी चाहिए. रात्रि में गोबर के 108 कंडों से हवन करना चाहिए. रात भर जागरण करके भगवान का भजन करना चाहिए. अगले दिन धूप-दीप और नैवेद्य से भगवान का भजन-पूजन करने के पश्चात खिचडी़ का भोग लगाना चाहिए. यदि किसी व्यक्ति के पास पूजन की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं है तब वह सौ सुपारियों से भगवान का पूजन कर सकता है तथा अर्ध्यदान कर सकता है. अर्ध्य देते समय आप निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए -


कृष्ण कृष्ण कृपालुस्त्वमगतीनां गतिर्भव ।
संसारार्णवमग्नानां प्रसीद पुरुषोत्तम ॥
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन ।
सुब्रह्मण्य नमस्तेSस्तु महापुरुष पूर्वज ॥
गृहाणार्ध्यं मया दत्तं लक्ष्म्या सह जगत्पते ।। 



व्यक्ति इस प्रार्थना को ऎसे भी बोल सकते हैं कि हे प्रभु आप दीनों को शरण देने वाले हैं. संसार के सागर में फंसे हुए लोगों का उद्धार करने वाले हैं. हे पुंडरीकाक्ष ! हे विश्वभावन ! हे सुब्रह्मण्य ! हे पूर्वज ! हे जगत्पते ! आपको नमस्कार है. आप लक्ष्मी जी सहित मेरे दिए अर्ध्य को स्वीकार करें. इसके बाद व्यक्ति को ब्राह्मण की पूजा करनी चाहिए. ब्राह्मण को जल से भरा घडा़, छाता, जूते तथा वस्त्र देने चाहिए. इसके अतिरिक्त यदि किसी व्यक्ति की सामर्थ्य है तब वह काली गाय का दान ब्राह्मण को कर सकता है. जो भी व्यक्ति इस षटतिला एकादशी के व्रत को करता है उसे तिलों से भरा घडा़ भी ब्राह्मण को दान करना चाहिए. जितने तिलों का दान वह करेगा उतने ही ह्जार वर्ष तक वह स्वर्गलोक में रहेगा. 
 
षटतिला एकादशी व्रत कथा | Shatatila Ekadashi Fast Story

एक बार भगवान विष्णु ने नारद जी को एक सत्य घटना से अवगत कराया और नारदजी को एक षटतिला एकादशी के व्रत का महत्व बताया. इस एकादशी को रखने की जो कथा भगवान विष्णु जी ने नारद जी को सुनाई वह इस प्रकार से है -


प्राचीन काल में पृथ्वी लोक में एक ब्राह्मणी रहती थी. वह हमेशा व्रत करती थी लेकिन किसी ब्राह्मण अथवा साधु को कभी दान आदि नहीं देती थी. एक बार उसने एक माह तक लगातार व्रत रखा. इससे उस ब्राह्मणी का शरीर बहुत कमजोर हो गया था. तब भगवान विष्णु ने सोचा कि इस ब्राह्मणी ने व्रत रख कर अपना शरीर शुद्ध कर लिया है अत: इसे विष्णु लोक में स्थान तो मिल जाएगा परन्तु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया,. इससे ब्राह्मणी की तृप्ति होना कठिन है. इसलिए भगवान विष्णु ने सोचा कि वह भिखारी का वेश धारण करके उस ब्राह्मणी के पास जाएंगें और उससे भिक्षा मांगेगे. यदि वह भिक्षा दे देती है तब उसकी तृप्ति अवश्य हो जाएगी और भगवान विष्णु भिखारी के वेश में पृथ्वी लोक पर उस ब्राह्मणी के पास जाते हैं और उससे भिक्षा माँगते हैं. वह ब्राह्मणी विष्णु जी से पूछती है - महाराज किसलिए आए हो? विष्णु जी बोले मुझे भिक्षा चाहिए. यह सुनते ही उस ब्राह्मणी ने मिट्टी का एक ढे़ला विष्णु जी के भिक्षापात्र में डाल दिया. विष्णु जी उस मिट्टी के ढेले को लेकर स्वर्गलोक में लौट आये.


कुछ समय के बाद ब्राह्मणी ने अपना शरीर त्याग दिया और स्वर्ग लोक में आ गई. मिट्टी का ढेला दान करने से उस ब्राह्मणी को स्वर्ग में सुंदर महल तो मिल गया परन्तु उसने कभी अन्न का दान नहीं किया था इसलिए महल में अन्न आदि से बनी कोई सामग्री नहीं थी. वह घबराकर विष्णु जी के पास गई और कहने लगी कि हे भगवन मैंने आपके लिए व्रत आदि रखकर आपकी बहुत पूजा की उसके बावजूद भी मेरे घर में अन्नादि वस्तुओं का अभाव है. ऎसा क्यों है? तब विष्णु जी बोले कि तुम पहले अपने घर जाओ. तुम्हें मिलने और देखने के लिए देवस्त्रियाँ आएँगी, तुम अपना द्वार खोलने से पहले उनसे षटतिला एकादशी की विधि और उसके महात्म्य के बारे में सुनना तब द्वार खोलना. ब्राह्मणी ने वैसे ही किया. द्वार खोलने से पहले षटतिला एकादशी व्रत के महात्म्य के बारे में पूछा. एक देवस्त्री ने ब्राह्मणी की बात सुनकर उसे षटतिला एकादशी व्रत के महात्म्य के बारे में जानकारी दी. उस जानकारी के बाद ब्राह्मणी ने द्वार खोल दिए. देवस्त्रियों ने देखा कि वह ब्राह्मणी न तो गांधर्वी है और ना ही आसुरी है. वह पहले जैसे मनुष्य रुप में ही थी. अब उस ब्राह्मणी को दान ना देने का पता चला. अब उस ब्राह्मणी ने देवस्त्री के कहे अनुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया. इससे उसके समस्त पापों का नाश हो गया. वह सुंदर तथा रुपवति हो गई. अब उसका घर अन्नादि सभी प्रकार की वस्तुओं से भर गया.


इस प्रकार सभी मनुष्यों को लालच का त्याग करना चाहिए. किसी प्रकार का लोभ नहीं करना चाहिए. षटतिला एकादशी के दिन तिल के साथ अन्य अन्नादि का भी दान करना चाहिए. इससे मनुष्य का सौभाग्य बली होगा. कष्ट तथा दरिद्रता दूर होगी. विधिवत तरीके से व्रत रखने से स्वर्ग लोक की प्राप्ति होगी.

Jaya Ekadashi Vrat Vidhi-Katha


21. जया एकादशी व्रत

Jaya Ekadasi
जया एकाद्शी व्रत माघ मास की शुक्ल पक्ष की एकाद्शी को किया जाता है.  इस तिथि को भगवान केशव की पुष्प, जल, अक्षत, रोली तथा सुंगन्धित पदार्थों से पूजन किया  जाता है.  जया एकादशी के दिन व्रत कर श्री कृष्ण की आरती की जाती है. भगवान को भोग लगाये गये प्रसाद को बांटकर स्वयं भी खाया जाता है. 

जया एकादशी व्रत महत्व | Importance of Jaya Ekadashi Vrat 

माघ मास के शुक्लपक्ष की एकाद्शी तिथि के दिन जो एकादशी होती है, उसका नाम जया एकादशी है.  यह एकादशी सभी पापों को हरने वाली और उतम कही गई है. पवित्र होने के कारण यह उपवासक के सभी पापों का नाश करती है. तथा इसका प्रत्येक वर्ष व्रत करने से मनुष्यों को भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है. यहां तक की इस एकादशी को ब्रह्महत्या जैसे पापों से भी मुक्ति मिलती है.    

जया एकादशी व्रत विधि | Jaya Ekadashi Vrat Vidhi

एकादशी व्रत में श्री भगवान विष्णु जी का पूजन किया जाता है. परन्तु जया एकाद्शी में श्री केशव के साथ साथ श्री विष्णु जी का पूजन करना चाहिए. जिस व्यक्ति को यह व्रत करना हो, उसे व्रत से एक दिन पूर्व स्वयं को मानसिक रुप से व्रत के लिये तैयार करना चाहिए. दशमी तिथि की संध्या में भोजन करने के बादएकाद्शी तिथि के प्रात:काल में जया एकादशी व्रत का संकल्प लेना चाहिए. और उसके बाद धूप, दीप, फल से पहले श्री कृ्ष्ण जी की पूजा करनी चाहिए. और इसके बाद में श्री विष्णु जी का भी पंचामृ्त से पूजन करना चाहिए.   
पूरे दिन व्रत करें, और रात्रि में जागरण करने का विधि-विधान होता है. विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करते हुए, पूरी रात्रि जागरण करना शुभ होता है. अगर रात्रि में व्रत करना संभव न हों तो रात्रि में फलाहार किया जा सकता है. द्वादशी के दिन प्रात: स्नान करने के बाद ब्राह्माणों को भोजन कराना चाहिए. और यथा सामर्थय दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए. इससे जीवन के सभी पापों से मुक्ति मिलती है.   

जया एकादशी व्रत कथा | Jaya Ekadshi Vrat Katha in Hindi

एक समय की बात है, इन्द्र की सभा में एक गंधर्व गीत गा रहा था. परन्तु उसका मन अपनी प्रिया को याद कर रहा है. इस कारण से गाते समय उसकी लय बिगड गई. इस पर इन्द्र ने क्रोधित होकर उसे श्राप दे दिया, कि तू जिसकी याद में खोया है. वह राक्षसी हो जाए. 
देव इन्द्र की बात सुनकर गंधर्व ने अपनी गलती के लिये इन्द्र से क्षमा मांगी, और देव से विनिती की कि वे अपना श्राप वापस ले लें. परन्तु देव इन्द्र पर उसकी प्रार्थना का कोई असर न हुआ. उन्होने उस गंधर्व को अपनी सभा से बाहर निकलवा दिया. गंधर्व सभा से लौटकर घर आया तो उसने देखा की उसकी पत्नी वास्तव में राक्षसी हो गई.
अपनी पत्नी को श्राप मुक्त करने के लिए, गंधर्व ने कई यत्न किए. परन्तु उसे सफलता नहीं मिली. अचानक एक दिन उसकी भेंट ऋषि नारद जी से हुई. नारद जी ने उसे श्राप से मुक्ति पाने के लिये माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत और भगवत किर्तन करने की सलाह दी. नारद जी के कहे अनुसार गंधर्व ने एकाद्शी का व्रत किया. व्रत के शुभ प्रभाव से उसकी पत्नी राक्षसी देह से छुट गई.   

व्रत के दिन ध्यान रखने योग्य बातें | Things to Remember for Jaya Ekadashi Fast

एकादशी का व्रत करने वाले को दशमी के दिन से निम्नलिखित विषयों का त्याग करना चाहिए.
1. व्रत के दिन जुआ नहीं खेलना चाहिए.
2. दिन में शयन नहीं करना चाहिए.
3. व्रत कि रात्रि में भी श्री विष्णु पाठ का जाप करते हुए जागरण करना चाहिए.
4. पान नहीं खाना चाहिए.
5. दांतुन नहीं करना चाहिए.
6. दूसरे की निन्दा नहीं करनी चाहिए.
7. दुष्टजनों का साथ नहीं देना चाहिए.
8.  झूठ नहीं बोलना चाहिए.
9. पूर्ण ब्रह्माचार्य का पालन करना चाहिए.
10. दशमी तिथि में रात्रि में दूसरी बार भोजन नहीं करना चाहिए.
11. इसके अतिरिक्त शहद, शाक, करोदों, चना, मसूर की दाल, मांस, जौ का सेवन नहीं करना चाहिए. 

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