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12 सितंबर 2011

Indira Ekadashi Vrat Vidhi


12. इन्दिरा एकादशी

Indira Ekadashi
आश्चिन कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी को इन्दिरा एकादशी कहा जाता है. इस एकादशी के दिन शालीग्राम की पूजा कर व्रत किया जाता है. इस एकादशी के व्रत करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते है. इस व्रत के फलों के विषय में एक मान्यता प्रसिद्ध है, कि इस व्रत को करने से नरक मे गए, पितरों का उद्वार हो जाता है. इस एकादशी की कथा (Indira Ekadashi Story) को सुनने मात्र से यज्ञ करने के समान फल प्राप्त होते है. 

इन्दिरा एकादशी व्रत कथा | Indira Ekadashi Vrat Katha in Hindi

प्राचीन सतयुग में महिष्मति नाम कि नगरी में इन्द्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा राज्य करता है. वह पुत्र, पौत्र, धन धान्य आदि से पूर्ण और सदैव शत्रुओं का नाश करने वाला था. एक समय जबकी राजा अपनी राज सभा में सुख पूर्वक बैठा था. उसी समय महर्षि नारद जी वहां आयें. नारदजी को देखकर राजा आसन से उठे और अर्ध्य आदि से उनकी पूजा करके उन्हें आसन दिया. नारद जी ने कहा की, हे राजन, मै आपकी धर्म परायणता देख कर अति प्रसन्न हुआ.
नारद जी ने राजा को बताया कि एक बार मै, ब्रह्मालोक को छोडकर यमलोक गया था. उस समय यमराज की सभा के मध्य में तुम्हारे पिता को बैठे देखा. तुम्हारे पिता महान ज्ञानी, दानी तथा धर्मात्मा थे, उन्होने एकादशी का व्रत मध्य में छोड दिया था. उसके कारण उन्हें यमलोक में जाना पडा. आपके पिता का एक समाचार लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूँ, तुम्हारे पिता ने कहा है, की मैं मेरे पुत्र का नाम इन्द्रसेन है, जो कि महिष्मति नाम की नगरी में राज्य करता है. 
यदि मेरा पुत्र आश्चिन मास के कृ्ष्ण पक्ष की इन्दिरा एकादशी का व्रत करेगा, तो इस व्रत के फल से मुझे मुक्ति प्राप्त हो जाएगी. इन्दिरा एकाद्शी के फल से मैं इस लोक को छोडकर स्वर्ग लोक में चला, जाऊंगा. जब राजा ने अपने पिता के ऎसे दु:ख भरे वाक्यों को सुनकर उसे बहुत दु:ख हुआ. और राजा नारद जी से इन्दिरा एकादशी का व्रत करने की विधि पूछने लगे.

इन्दिरा एकादशी व्रत विधि | Indira Ekadashi Vrat Vidhi

नारद जी ने बताया की आश्चिन मास की कृ्ष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल में श्रद्वासहित स्नान आदि करना चाहिए. इसके बाद दोपहर में भी स्नान करना चाहिए. स्नान आदि करने के बाद श्रद्वा पूर्वक अपने पितरों का श्राद्व करना चाहिए.  
इसके अगले दिन एकादशी तिथि के दिन इन्दिरा एकादशी का व्रत करना चाहिए. एकादशी के दिन उपवासक को जल्द उठना चाहिए. उठने के बाद नित्यक्रिया कार्यों से मुक्त हो जाना चाहिए. तत्पश्चात उसे स्नान और दांतुन करनी चाहिए. और इसके पश्चात ही श्रद्वा पूर्वक व्रत का संकल्प लेना चाहिए. एकादशी तिथि के व्रत में रात्रि के समय में ही फल ग्रहण किये जा सकते है.
तथा द्वादशी तिथि में भी दान आदि कार्य करने के बाद ही स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए. एकादशी तिति की दोपहर को सालिग रामजी जी मूर्ति को स्थापित किया जाता है,जिसकी स्थापना के लिये किसी ब्राह्माण को बुलाना चाहिए. ब्राह्माण को बुलाक उसे भोजन कराना चाहिए.
और दक्षिणा देनी चाहिए. बनाये गये भोजन में से कुछ हिस्से गौ को भी देने चाही. और भगवान श्री विष्णु की धूप, दीप, नैवेद्ध आदि से पूजा करनी चाहिए. एकादशी रात्रि में सोना नहीं चाहिए. पूरी रात्रि जागकर भगवान विष्णु का पाठ या मंत्र जाप करना चाहिए. अन्यथा भजन, किर्तन भी किया जा सकता है. अगले दिन प्रात: स्नान आदि कार्य करने के बाद ब्राह्माणों को दक्षिणा देने के बाद ही अपने परिवार के साथ मौन होकर भोजन करना चाहिए. 
इन्दिरा एकाद्शी के व्रत को कोई भी व्यक्ति अगर आलस्य रहित करता है, तो उसके पूर्वज अवश्य ही स्वर्ग को जाते है. राजा ने नारद जी से इन्दिरा एकादशी व्रत की विधि सुनने के बाद, एकादशी आने पर इस व्रत को किया, और परिवार सहित इस व्रत को करने से आकाश से फूलों की वर्षा हुई. और राजा के पिता यमलोक से निकल कर स्वर्ग लोग में चले गये. राजा स्वयं भी इस एकादशी के प्रभाव से इस लोक में सुख भोग कर अन्त में स्वर्ग लोक को चला गया.    
इस एकादशी की कथा को सुनने मात्र से ही व्यक्ति के सभी पाप नष्ट होते है.  

Papankusha Ekadashi (Pashankusha) Vrat Vidhi


13. पापांकुशा एकादशी

papankusha_ekadashiपापाकुंशा एकादशी व्रत फल | Papakunsha Ekadashi Vrat Result 
इस एकादशी के दिन मनोवांछित फल कि प्राप्ति के लिये श्री विष्णु भगवान कि पूजा की जाती है. इस एकादशी के पूजने से व्यक्ति को स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है. जो मनुष्य कठिन तपस्याओं के द्वारा फल प्राप्त करते है. वही फल एक एकादशी के दिन क्षीर -सागर में शेषनाग पर शयन करने वाले श्री विष्णु को नमस्कार कर देने से ही मिल जाते है. और मनुष्य को यमलोक के दु:ख नहीं भोगने पडते है. यह व्रत आश्विन शुक्ल एकादशी को किया जाता है.
पापाकुंशा एकादशी के फलों के विषय में कहा गया है, कि हजार अश्वमेघ और सौ सूर्ययज्ञ करने के फल,इस एकादशी के फल के सोलहवें, हिस्से के बराबर भी नहीं होता है. अर्थात इस एकादशी व्रत के समान अन्य कोई व्रत नहीं है. इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को स्वस्थ शरीर और सुन्दर जीवन साथी की प्राप्ति होती है.
इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति इस एकादशी की रात्रि में जागरण करता है, उन्हें, बिना किसी रोक के स्वर्ग मिलता है. यह एकाद्शी उपवासक के मातृपक्ष के दस और पितृपक्ष के दस पितरों को विष्णु लोक लेकर जाती है. इस एकादशी के दिन भूमि, गौ, अन्न, जल, वस्त्र और छत्र आदि का दान करता है, उन्हें यमराज के दर्शन नहीं मिलते है. इसके अलावा जो व्यक्ति तालाब, बगीचा, धर्मशाला, प्याऊ, अन्न क्षेत्र आदि बनवाते है, उन्हें पुन्य फलों की प्राप्ति होती है. धर्म करने वाले को सभी सुख मिलते है.

पापाकुंशा एकादशी व्रत विधि | Method of Padmanabha Ekadashi Fast (Vidhi)

पापाकुंशा एकाद्शी व्रत के विषय में यह कहा जाता है, कि इस व्रत की महिमा अपरम्पार है. इस एकादशी व्रत में श्री विष्णु जी का पूजन करने के लिए वह धूप, दीप, नारियल और पुष्प का प्रयोग किया जाता है.
दशमी तिथि एक के दिन से ही व्रत के सभी नियमों का पालन करना चाहिए. दशमी तिथि के दिन सात धान्य अर्थात गेहूं, उडद, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर की दाल का सेवन नहीं करना चाहिए. क्योकि इन सातों धान्यों की पूजा एकादशी के दिन की जाती है. दशमी तिथि के दिन झूठ नहीं बोलना चाहिए. और किसी का अहित नहीं करना चाहिए. जहां तक हो सके दशमी तिथि और एकादशी तिथि दोनों ही दिनों में कम से कम बोलना शुभ रहता है. इससे पाप कम होने की संभावना रहती है. एकाद्शी तिथि की प्रथम रात्रि में भोजन में नमक और तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए. और पूर्ण ब्रह्राचार्य का पालन करना चाहिए. दशमी तिथि की रात्रि में एक बार भोजन करने के बाद, कुछ नहीं खाना चाहिए.
और एकादशी तिथि के दिन सुबह उठकर स्नान आदि कार्य करने के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए. संकल्प लेने के बाद घट स्थापना की जाती है. और उसके ऊपर श्री विष्णु जी की मूर्ति रखी जाती है. इस व्रत को करने वाले व्यक्ति को रात्रि में विष्णु के सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए. इस व्रत का समापन एकादशी तिथि में नहीं होता है. बल्कि द्वादशी तिथि की प्रात: में ब्राह्माणों को अन्न का दान और दक्षिणा देने के बाद ही यह व्रत समाप्त होता है.

पापांकुशा एकादशी व्रत कथा | Pasankusha Ekadashi Fast Story in Hindi

(Vrat Katha)

विन्ध्यपर्वत पर महा क्रुर और अत्यधिक क्रोधन नामक एक बहेलिया रहता था. उसने बुरे कार्य करने में सारा जीवन बीता दिया. जीवन के अंतिम भाग आने पर यमराज ने उसे अपने दरबार में लाने की आज्ञा दी. दूतोण ने यह बात उसे समय से पूर्व ही बता दी. मृ्त्युभय से डरकर वह अंगिरा ऋषि के आश्रम में गया. और यमलोक में जाना न पडे इसकी विनती करने लगा.
अंगिरा ऋषि ने उसे आश्चिन मास कि शुक्ल पक्ष कि एकादशी के दिन श्री विष्णु जी का पूजन करने की सलाह दी़. इस एकादशी का पूजन और व्रत करने से वह अपने सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को गया.

Rama Ekadashi Vidhi-Vrat


14. रमा एकादशी 

rama_ekadashi
रमा एकादशी व्रत कार्तिक मास के कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी को किया जाता है. वर्ष 2011 में 23 अक्तूबर के दिन रमा एकादशी व्रत किया जायेगा. इस दिन भगवान श्री केशव का संपूर्ण वस्तुओं से पूजन किया जाता है. इस एकादशी के दिन नैवेद्ध तथा आरती कर प्रसाद वितरित करके ब्राह्माणों को खिलाया जाता है. और दक्षिणा भी बांटी जाती है. 

रमा एकादशी व्रत फल | Fruits of Rama Ekadashi Vrat

कार्तिक मास के कृ्ष्णपक्ष की एकादशी का नाम रमा एकादशी है. इस एकादशी को रम्भा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. इसका व्रत करने से समस्त पाप नष्ट होते है.  

रमा एकादशी व्रत कथा | Rama Ekadashi Vrat Katha in Hindi

प्राचीन काल की बात है, एक बार मुचुकुन्द नाम का एक राजा राज्य करता था. उसके मित्रों में इन्द्र, वरूण, कुबेर और विभीषण आदि थे. वह प्रकृ्ति से सत्यवादी था.  तथा वह श्री विष्णु का परम भक्त था. उसका राज्य में कोई पाप नहीं होता है. उसके यहां एक कन्या ने जन्म लिया. बडे होने पर उसने उस कन्या का विवाह राजा चन्द्रसेन के पुत्र साभन के साथ किया. 
एक समय जब चन्द्रभागा अपने ससुराल में थी, तो एक एकादशी पडी. एकादशी का व्रत करने की परम्परा उसने मायके से मिली थी. चन्द्रभागा का पति सोचने लगा कि मैं शारीरिक रुप से अत्यन्त कमजोर हूँ. मैं इस एकादशी के व्रत को नहीं कर पाऊंगा. व्रत न करने की बात जब चन्द्रभागा को पता चली तो वह बहुत परेशान हुई़.
चन्द्रभागा ने कहा कि मेरे यहां एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं कर सकता. अगर आप भोजन करना ही चाहते है, तो किसी ओर स्थान पर चले जाईये़ यदि आप यहां पर रहेगें, तो आपको व्रत अवश्य ही करना पडेगा. अपनी पत्नी की यह बात सुनकर शोभन बोला कि तब तो मैं यही रहूंगा और व्रत अवश्य ही करूंगा. 
यह सोच कर उसने एकादशी का व्रत किया, व्रत में वह भूख प्यास से पीडित होने लगा. सूर्य भगवान भी अस्त हो गए. और जागरण की रात्रि हुई़. वह रात्रि सोभन को दु:ख देने वाली थी. दूसरे दिन प्रात: से पूर्व ही सोभन इस संसार से चल बसा.  
राजा ने उसके मृ्तक शरीर को दहन करा दिया. चन्द्रभागा अपने पति की आज्ञानुसार अपने पिता के घर पर ही रही़. रमा एकादशी के प्रभाव से सोभन को एक उतम नगर प्राप्त हुआ, जो सिंहासन से युक्त था, परन्तु यह राज्य अध्रुव ( अदृश्य)  था. यह एक ऎसा राज्य था. जो अपने आप में अनोखा था.
एक बार उसकी पत्नी के राज्य का एक ब्राह्माण भ्रमण के लिए निकला, उसने मार्ग में सोभन का नगर देखा. और सोभन ने उसे बताया कि उसे रमा एकादशी के प्रभाव से यह नगर प्राप्त हुआ है. सोभन ने ब्राह्माण से कहा की मेरी पत्नी चन्द्र भागा से इस नगर के बारे में और मेरे बारे में कहना. वह सब ठिक कर देगी.
ब्राह्माण ने वहां आकर चन्द्रभागा को सारा वृ्तान्त सुनाया. चन्द्रभागा बचपन से ही एकादशी व्रत करती चली आ रही थी. उसने अपनी सभी एकादशियों के प्रभाव से अपने पति और उसके राज्य को यथार्थ का कर दिया. और अन्त में अपने पति के साथ दिव्यरुप धारण करके तथा दिव्य वस्त्र अंलकारों से युक्त होकर आनन्द पूर्वक अपने पति के साथ रहने लगी. जो जन रमा एकादशी का व्रत करते है. उनके ब्रह्माहत्या आदि के पाप नष्ट होते है.

Prabhodhini Ekadashi - Tulsi Vivah (Kartik Ekadashi Vrat Vidhi) Devothani Ekadashi


15. प्रबोधनी एकादशी

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कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकाद्शी या देव उठावनी एकादशी के नाम से जाना जाता है. कुछ स्थानों में इसे प्रबोधनी एकाद्शी भी कहा जाता है. देवोत्थानी एकाद्शी के संबन्ध में एक मान्यता प्रसिद्ध है. भाद्रपद की एकादशी को ही भगवान श्री विष्णु ने अपना चार मास का विश्राम समाप्त किया था. इस तिथि के बाद ही शादी-विवाह आदि के शुभ कार्य शुरु होते है. वर्ष 2011 में 6 नवम्बर की रहेगी.     

प्रबोधनी एकाद्शी व्रत कथा | Prabodhini Ekadashi Vrat Katha

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रबोधनी एकाद्शी के व्रत का फल एक सहस्त्र अश्वमेघ यज्ञों के बराबर होता है. इस व्रत को करने से व्यक्ति के सात जन्मों के पाप नष्ट होते है. इस व्रत के विषय में कहा जाता है, कि जिस वस्तु को प्राप्त करना कठिन होता है. वह वस्तु इस व्रत को करने से प्राप्त हो जाती है. यह एकादशी महान पाप भी क्षण मात्र में नष्ट करती है. 
अनेक जन्मों के बुरे पाप इस प्रबोधनी एकादशी का व्रत करने से समाप्त हो जाते है. जो मनुष्य अपने स्वभावनुसार इस प्रबोधनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करतें है. उन्हें इस व्रत के शुभ फल प्राप्त होता है. इस व्रत को करने के बाद जो व्यक्ति रात्रि में जागरण भी करता है, उसकी दस पीढियां विष्णु लोक में जाकर वास करती है. और नरक में अनेक दु:खों को भोगते हुए उसके पितृ विष्णु लोक में जाकर सुख भोगते है.
प्रबोधनी एकादशी के विषय में कहा गया है,कि समस्त तीर्थों में जाने था, गौ, स्वर्ण, भूमि आदि के दान का फल और कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रबोधनी एकादशी के रात्रि के जागरण के फल एक बराबर होते है. इस संसार में उसी का जीवन सफल है, जिसने प्रबोधनी एकादशी का व्रत किया है. संसार में जितने तीर्थ स्थान है, वे सभी एकत्र होकर इस एकादशी को करने वाले व्यक्ति के घर में होते है. देवोत्थानी एकादशी करने से व्यक्ति धनवान, योगी, तपस्वी तथा इन्द्रियों को जीतने वाला बनता है. इस व्रत को करने से व्यक्ति भगवान श्री विष्णु का प्रिय बन जाता है.  

प्रबोधिनी एकादशी व्रत विधि | Prabodhini Ekadasi Vrat Vidhi

व्रत करने वाले को दशमी के दिन मांस और प्याज तथा मसूर की दान इत्यादि वस्तुओं का त्याग करना चाहिए. दशमी तिथि की रात्रि को ब्रह्माचार्य का पालन करना चाहिए. प्रात: काल में लकडी की दातुन का प्रयोग नहीं करना चाहिए. निम्बू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा ले और ऊंगळी से कंठ शुद्ध करना चाहिए. वृ्क्ष से पत्ता तोडना भी वर्जित होता है. चबाने के लिये गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करना चाहिए. फिर स्नान कर मंदिर में जाना चाहिए. गीता पाठ करना या गीता पाठ का श्रवण करना चाहिए. प्रभु के सामने यह प्रण करना चाहिए कि, मै, इस व्रत को पूरी श्रद्वा और विश्वास के साथ करूंगा. व्रत के दिन "ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय"   इस द्वादश अक्षर के मंत्र का जाप करना चाहिए. 
एकादशी के दिन झाडू नहीं देनी चाहिए. क्योकि इससे सूक्ष्म जीव मर जाते है. तथा बाल नहीं कटाने चाहिए. अधिक नहीं बोलना चाहिए. अन्न दान में नहीं लेना चाहिए. झूठ आदि से बचके रहना चाहिए. इस दिन भोग लगाने के लिये मूळी, आम, अंगूर, केला और बादाम का प्रयोग किया जा सकता है. द्वादशी के दिन ब्राह्माणों को मिष्ठान दक्षिणा से प्रसन्न कर परिक्रमा लेनी चाहिए.  

Utpanna Ekadashi Vrat Vidhi


16. उत्पन्ना एकाद्शी

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उत्पन्ना एकादशी का व्रत मार्गशीर्ष मास के कृ्ष्ण पक्ष में किया जाता है. इस दिन भगवान श्री कृ्ष्ण की पूजा करने का विधान है. व्रत वाले को दशमी के दिन रात में भोजन नहीं करना चाहिए. एकादशी के दिन ब्रह्रा बेला में भगवान का पुष्प, धूप, दीप, अक्षत से पूजन करके पूजन करना चाहिए. इस व्रत में केवल फलों का ही भोग लगाया जाता है. इस व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. 
  

उत्पन्ना एकादशी व्रत विधि | Utpanna Ekadasi Vrat Vidhi
उत्पन्ना एकादशी का व्रत जो जन करता है, वही सभी सुखों को भोगकर अंत में श्री विष्णु जी की शरण में चला जाता है. इस एकादशी को करने वाले व्यक्ति को सबसे पहले दशमी तिथि की सायं में दातुन नहीं करनी चाहिए. और रात को दो बार भोजन नहीं करना चाहिए. एकादशी की सुबह संकल्प नियम के अनुसार कार्य करना चाहिए. दोपहर को संकल्प पूर्वक स्नान करना चाहिए. स्नान करने से पहले शरीर पर मिट्टी का लेप करना चाहिए. चंदन और लेप लगाते समय निम्न मंत्र का जाप करना चाहिए.
 
अश्व क्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुकान्ते वसुन्धरे
उवृ्तापि बराहेण कृ्ष्णे न सताबाहुना ।
मृ्तिके हरमें पाप तन्मया पूर्वक संचितम 
त्वयाहतेन पापेन गच्छामि परमागतिम ।।

स्नान करने के बाद धूप, दीप, नैवेद्ध से भगवान का पूजन करना चाहिए. रात को दीपदान करना चाहिए. ये सतकर्म भक्ति पूर्वक करने चाहिए. उस रात को नींद का त्याग करना चाहिए. एकादशी को दिन और रात्रि में भजन सत्संग आदि शुभ कर्म करने चाहिए. उस दिन श्रद्वापूर्वक ब्राह्माणों को दक्षिणा देनी चाहिए. और उनसे अपनी गलतियों की क्षमा मांगनी चाहिए. और अगर संभव हों, तो इस मास के दोनों पक्षों की एकादशी के व्रतों को करना चाहिए.

उत्पन्ना एकादशी व्रत फल | Fruits of Utpanna Ekadashi Vrat

इस विधि के अनुसार जो व्यक्ति व्रत करता है, उनको तीर्थ और दर्शन करने से जो पुन्य़ मिलता है. वह एकादशी व्रत के पुन्य के सोलहवें, भाग के बराबर भी नही़ है. इसके अतिरिक्त  व्यतीपात योग, संक्रान्ति में तथा चन्द्र-सूर्य ग्रहण में दान देने से और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो पुन्य मिलता है. वही पुन्य मनुष्य को एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है. दश श्रेष्ठ ब्राह्माणों को भोजन कराने से जो पुन्य मिलता है. वह पुन्य एकादशी के पुन्य के दशवें भाग के बराबर होता है.
  
निर्जल व्रत करने का आधा फल एक बार भोजन करने के बराबर होता है. एकादशी का व्रत करने से ही यज्ञ, दान, तप आदि मिलते है. अन्यथा नही, अत: एकादशी को अवश्य ही करना चाहिए. इस व्रत में शंख से जल नहीं पीना चाहिए. एकादही व्रत का फल हजार यज्ञों से भी अधिक है. 

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा | Utpanna Ekadasi Fast Story in Hindi 

सतयुग में एक महा भयंकर दैत्य हुआ था. उसका नाम मुर था. उस दैत्य ने इन्द्र आदि देवताओं पर विजय प्राप्त कर उन्हें, उनके स्थान से गिरा दिया. तब देवेन्द्र ने महादेव जी से प्रार्थना की " हे शिव-शंकर, हम सब देवता मुर दैत्य के अत्याचारों से दु:खित हो, मृ्त्युलोक में अपना जीवन व्यतीत कर रहे है.
  
आप कृपा कर इस विपति से बाहर आने का उपाय बतलाईये़. शंकरजी बोले इसके लिये आप श्री विष्णु जी की शरण में जाईये.  इन्द्र तथा अन्य देवता महादेवजी के बचनों को सुनकर क्षीर सागर गये. जहां पर भगवान श्री विष्णु शेषशय्या पर शयन कर रहे थे़ भगनान को शयन करते देखकर, देवताओं सहित सभी ने श्री विष्णु जी दैत्य के अत्याचारों से मुक्त होने के लिये विनती की.
 
श्री विष्णु जी ने बोला की यह कौन सा दैत्य है, जिसने देवताओं को भी जीत लिया है. यह सुनके दैत्य के विषय में देवराज इन्द्र बताने लगे, उस दैत्य की ब्रह्मा वंश में उत्पत्ति हुई थी, उसी दैत्य के पुत्र का नाम मुर है. उसकी राजधानी चन्द्रावती है. उस चन्द्रावती नगरी में वह मुर नामक दैत्य निवास करता है. जिसने अपने बल से समस्त विश्व को जीत लिया है. और सभी देवताओं पर उसने राज कर लिया. इस दैत्य ने अपने कुल के इन्द्र, अग्नि, यम, वरूण, चन्द्रमा, सूर्य आदि लोकपाल बनाये है. वह स्वयं सूर्य बनकर सभी को तपा रहा है.  और स्वयं ही मेघ बनकर जल की वर्षा कर रहा है. अत: आप उस दैत्य से हमारी रक्षा करें.
 
इन्द्र देव के ऎसे वचन सुनकर भगवान श्री विष्णु बोले -देवताओं मै तुम्हारे शत्रुओं का शीघ्र ही संकार करूंगा. अब आप सभी चन्द्रावती नगरी को चलिए. इस प्रकार भगवान विष्णु देवताओं के साथ चल रहा था. उस समय दैत्यपति मुर अनेकों दैत्यों के साथ युद्ध भूमि में  गरज रहा था. दैत्य ने देवताओं को देखा तो उसने देवताओं से भी युद्ध प्रारम्भ कर दिया.
 
जब दैत्यों ने भगवान श्री विष्णु जी को युद्ध भूमि में देखा तो उन पर अस्त्रों-शस्त्रों का प्रहार करने लगे. भगवान श्री विष्णु मुर को मारने के लिये जिन-जिन शास्त्रों का प्रयोग करते वे सभी उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगे़ भगवान श्री विष्णु उस दैत्य के साथ सहस्त्र वर्षों तक युद्ध करते रहे़ परन्तु उस दैत्य को न जीत सके. 
अंत में विष्णु जी शान्त होकर विश्राम करने की इच्छा से बद्रियाकाश्रम में एक लम्बी गुफा में वे शयन करने के लिये चले गये. दैत्य भी उस गुफा में चला गया, कि आज मैं श्री विष्णु को मार कर अपने सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लूंगा. उस समय गुफा में एक अत्यन्त सुन्दर कन्या उत्पन्न हुई़ और
दैत्य के सामने आकर युद्ध करने लगी. दोनों में देर तक युद्ध हुआ. उस कन्या ने उसको धक्का मारकर मूर्छित कर दिया. 
और उठने पर उस दैत्य का सिर काट दिया. वह दैत्य सिर कटने पर मृ्त्यु को प्राप्त हुआ. उसी समय श्री विष्णु जी की निद्रा टूटी तो उस दैत्य को किसने मारा वे ऎसा विचार करने लगे. यह दैत्य आपको मारने के लिये तैयार था. तब मैने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इसका वध किया है. भगवान श्री विष्णु ने उस कन्या का नाम एकादशी रखा क्योकि वह एकादशी के दिन श्री विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुई थी.  

Mokshada Ekadashi - Vrat Vidhi (Geeta Jayanthi Ekadasi)


17. मोक्षदा एकादशी

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मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी  कहा जाता है. इसी दिन भगवान श्री कृ्ष्ण ने महाभारत के प्रारम्भ होने से पूर्व अर्जुन को श्रीमद भगवतगीता का उपदेश दिया था. इस दिन श्री कृ्ष्ण व गीता का पूजन करना चाहिए. इसके बाद आरती करके उसका पाठ करना चाहिए. मोक्षदा एकाद्शी को दक्षिण भारत में वैकुण्ठ एकादशी के नाम से भी जाना जता है. 
गीता में भगवान श्री कृ्ष्ण ने कर्मयोग पर विशेष बल दिया है. ब्राह्राण भोजन कराकर दान आदि कार्य करने से विशेष फल प्राप्त होते है. वर्ष 2011 में यह एकादशी 6 दिसम्बर की रहेगी. मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी अनेकों पापों को नष्ट करने वाली है. यह एकादशी मोक्षदा के नाम से प्रसिद्ध है. इस दिन भगवान श्री दामोदर की पूजा, धूप, दीप नैवेद्ध आदि से भक्ति पूर्वक करनी चाहिए.  

मोक्षदा एकाद्शी व्रत विधि | Mokshada Ekadashi Vrat Vidhi

एकादशी व्रत के दिन मुख्य रुप से दस वस्तुओं का सेवन नहीं किया जाता है. जौ, गेहूं, उडद, मूंग, चना, चावल और मसूर की दाल दशमी तिथि के दिन नहीं खानी चाहिए. इसके अतिरिक्त मांस और प्याज आदि वस्तुओं का भी त्याग करना चाहिए. दशमी तिथि के दिन उपवासक को ब्रह्माचार्य करना चाहिए. और अधिक से अधिक मौन रहने का प्रयास करना चाहिए. बोलने से व्यक्ति के द्वारा पाप होने की संभावनाएं बढती है, यहां तक की वृ्क्ष से पत्ता भी नहीं तोडना चाहिए.  
व्रत के दिन मिट्टी के लेप से स्नान करने के बाद ही मंदिर में पूजा करने के लिये जाना चाहिए. मंदिर या घर में श्री विष्णु पाठ करना चाहिए. और भगवान के सामने व्रत का संकल्प लेना चाहिए. दशमी तिथि के दिन विशेष रुप से चावल नहीं खाने चाहिए. परिवार के अन्य सदस्यों को भी इस दिन चावल खाने से बचना चाहिए.
व्रत में भोग लगाने के लिये फलों का प्रयोग करना चाहिए. इस व्रत का समापन द्वादशी तिथि के दिन ब्राह्माणों को दान-दक्षिणा देने के बाद ही होता है. व्रत की रात्रि में जागरण करने से व्रत से मिलने वाले शुभ फलों में वृ्द्धि होती है.         

मोक्षदा एकाद्शी व्रत कथा | Geeta Jayanthi Ekadasi Vrat Katha

मोक्षदा एकादशी व्रत को करने से व्यक्ति के पूर्वज जो नरक में चले गये है, उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है. इसकी कथा इस प्रकार है. प्राचीन गोकुल नगर में वैखानस नाम का एक राजा राज्य करता था. उसके राज्य में चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्माण रहते थे. एक रात्रि को स्वप्न में राजा ने अपने पिता को नर्क मे पडा देखा, अपने पिता को इस प्रकार देख कर उसे बहुत दु:ख हुआ. 
प्रात:काल होते ही वह ब्राह्माणों के सामने अपनी स्वप्न कथा कहने लगा. अपने पिता को इस प्रकार देख कर मुझे सभी ऎश्वर्य व्यर्थ महसूस हो रही है. आप लोग मुझे किसी प्रकार का तप,दान, व्रत आदि बताएं, जिससे मेरे पिता को मुक्ति प्राप्त हों. राजा के ऎसे वचन सुनकर ब्राह्माण बोले, यहां समीप ही एक भूत-भविष्य के ज्ञाता एक "पर्वत" नाम के मुनि है. आप उनके पास जाईए, वे आपको इसके बारे में बतायेगें. 
राजा ऎसा सुनकर मुनि के आश्रम पर गए़ उस आश्रम में अनेकों मुनि शान्त होकर तपस्या कर रहे थे. राजा ने जाकर  ऋषि को प्रणाम करके बताया कि अकस्मात एक विध्न आ गया है. यह सुनकर मुनि ने आंखे बंद कर ली. और कुछ देर बाद मुनि बोले कि आपके पिता ने अपने पिछले जन्म में एक दुष्कर्म किया था. उसी पाप कर्म के फल से तुम्हारा पिता नर्क में गए है.   
यह सुनकर राजा ने अपने पिता के उद्वार की प्रार्थना ऋषि से की. मुनि राजा की विनती पर बोले की मार्गशीर्ष मसके शुक्ल पक्ष में जो एकादशी होती है. उस एकादशि का आप उपवास करें. उस एकादशी के पुन्य के प्रभाव से ही आपके पिता को मुक्ति मिलेगी. मुनि के वचनों को सुनकर उसने अपने कुटुम्ब सहित मोक्षदा एकादशी का उपवास किया. उस उपवास के पुन्य को राजा ने अपने पिता को दे दिया. उस पुन्य के प्रभाव से राजा के पिता को मुक्ति मिल गई. और वे स्वर्ग में जाते हुए अपने पुत्र से बोले, हे पुत्र तुम्हारा कल्याण हों, यह कहकर वे स्वर्ग चले गए. 

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