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13 सितंबर 2011

Ekdashi Fasts And Ekadashi Dates


वर्ष भर की एकादशियां, Ekdashi Fasts And Ekadashi Dates, एकादशी व्रत

BHAGWAN VISHNU (VISHVARUP)

हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। यहाँ 26 एकादशियों के नामों के वर्णन के साथ ही उनकी जानकारी भी हैं।

सभी उपवासों में एकाद्शी व्रत श्रेष्ठतम कहा गया है. एकाद्शी व्रत की महिमा कुछ इस प्रकार की है, जैसे सितारों से झिलमिलाती रात में पूर्णिमा के चांद की होती है. इस व्रत को रखते वाले व्यक्ति को अपने चित, इंद्रियों, आहार और व्यवहार पर संयम रखना होता है. एकाद्शी व्रत का उपवास व्यक्ति को अर्थ-काम से ऊपर उठकर मोक्ष और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है.

एकादशी - यथानाम-तथाफल
EKADASHI - RESULT, SO AS THE NAME

प्रत्येक वर्ष में बारह माह होते है. और एक माह में दो एकादशी होती है. अमावस्या से ग्यारहवीं तिथि, एकाद्शी तिथि, शुक्ल पक्ष की एकाद्शी कहलाती है. इसी प्रकार पूर्णिमा से ग्यारहवीं तिथि कृ्ष्ण पक्ष की एकाद्शी कहलाती है. इस प्रकार हर माह में दो एकाद्शी होती है. जिस वर्ष में अधिक मास होता है. उस साल दो एकाद्शी बढने के कारण 26 एकाद्शी एक साल में आती है. यह व्रत प्राचीन समय से यथावत चला आ रहा है. इस व्रत का आधार पौराणिक, वैज्ञानिक और संतुलित जीवन है.


एकाद्शी व्रत के फल
RESULT OF EKADASHI VRAT

एकाद्शी का व्रत जो जन पूर्ण नियम, श्रद्धा व विश्वास के साथ रखता है, उसे पुन्य, धर्म, मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस उपवास के विषय में यह मान्यता है कि इस उपवास के फलस्वरुप मिलने वाले फल अश्वमेघ यज्ञ, कठिन तपस्या, तीर्थों में स्नान-दान आदि से मिलने वाले फलों से भी अधिक होते है. यह उपवास, उपवासक का मन निर्मल करता है, शरीर को स्वस्थ करता है, ह्रदय शुद्ध करता है, तथा सदमार्ग की ओर प्रेरित करता है. तथा उपवास के पुन्यों से उसके पूर्वज मोक्ष प्राप्त करते है.

एकाद्शी व्रत के नियम
LAW OF EKADASHI VRAT

व्रतों में एकादशी के व्रत को सबसे उच्च स्थान दिया गया है, इसलिये इस व्रत के नियम भी अन्य सभी व्रत- उपवास के नियमों से सबसे अधिक कठोर होते है. इस उपवास में तामसिक वस्तुओं का सेवन करना निषेध माना जाता है. वस्तुओं में मांस, मदिरा, प्याज व मसूर दाल है. दांम्पत्य जीवन में संयम से काम लेना चाहिए.

दातुन में नींबू, जामून या आम की टहनी को प्रयोग करना चाहिए. यहां तक की उपवास के दिन पेड का पत्ता भी नहीं तोडना चाहिए. सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों को भी हानि न हो, इस बात का ध्यान रखना चाहिए. झूठ बोलने और निंदा सुनना भी उपवास के पुन्यों में कमी करता है.

सभी एकादशियों के नाम व तिथियां इस प्रकार है. इन्हें पढने के लिए एकादशी के नाम को क्लिक करें....

एकादशी का नाममासपक्ष 
  1. कामदा एकादशीचैत्रशुक्ल
  2. वरूथिनी एकादशीवैशाखकृष्ण
  3. मोहिनी एकादशीवैशाखशुक्ल
  4. अपरा एकादशीज्येष्ठकृष्ण
  5. निर्जला एकादशीज्येष्ठशुक्ल
  6. योगिनी एकादशीआषाढ़कृष्ण
  7. देवशयनी एकादशीआषाढ़शुक्ल
  8. कामिका एकादशीश्रावणकृष्ण
श्रावणशुक्ल
10. अजा एकादशीभाद्रपदकृष्ण
11. पद्मा एकादशीभाद्रपदशुक्ल
12. इंदिरा एकादशीआश्विनकृष्ण
13. पापांकुशा एकादशीआश्विनशुक्ल
14. रमा एकादशीकार्तिककृष्ण
15. देव प्रबोधिनी एकादशीकार्तिकशुक्ल
16. उत्पन्ना एकादशीमार्गशीर्षकृष्ण
17. मोक्षदा एकादशीमार्गशीर्षशुक्ल
18. सफला एकादशीपौषकृष्ण
19. पुत्रदा एकादशीपौषशुक्ल
20. षटतिला एकादशीमाघकृष्ण
21. जया एकादशीमाघशुक्ल
22. विजया एकादशीफाल्गुनकृष्ण
23. आमलकी एकादशीफाल्गुनशुक्ल
24. पापमोचिनी एकादशीचैत्रकृष्ण
25. पद्मिनी एकादशीअधिकमासशुक्ल
26. परमा एकादशीअधिकमासकृष्ण

Kamada Ekadashi Vrat Katha


1. कामदा एकादशी व्रत


kamada_ekadashi
कामदा एकदशी व्रत चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशीको कामदा एकादशी के नाम से जाना जाता है.  कामदा एकादशी अपने नाम के अनुरुप सभी कामनाओं की पूर्ति करती है. इस व्रत को करने से सभी पापों का नाश होता है. इस एकादशी के फलों के विषय में कहा जाता है, कि यह एकादशी ठिक उसी प्रकार फल देती है, जिस प्रकार अग्नि लकडी को जला देती है. यह भी व्यक्ति के पापों को समाप्त कर देती है. कामदा एकादशी के पुन्य प्रभाव से पाप नष्ट होते है, और संतान की प्राप्ति होती है. इस व्रत को करने से परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति होती है.  

कामदा एकादशी व्रत विधि | Kamada Ekadashi Vrat Vidhi 

चैत्र शुक्ल पक्ष कि एकादशी तिथि में इस व्रत को करने से पहले कि रात्रि अर्थात व्रत के पहले दिन दशमी को जौ, गेहूं और मूंग की दाल आदि का भोजन नहीं करना चाहिए(On the previous night of Kamada Ekadashi, i.e., the 10th date, things like Barley, Wheat and Moong Pulse should not be eaten.) भोजन में नमक का प्रयोग करने से भी बचना चाहिए. और दशमी तिथि में भूमि पर ही शयन करना चाहिए. इस व्रत की अवधि 24 घंटे की होती है. दशमी तिथि के दिन से ही व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए.   
एकादशी व्रत करने के लिये व्यक्ति को प्रात: उठकर, शुद्ध मिट्टी से स्नान करना चाहिए. स्नान करने के लिये तिल और आंवले के लेप का प्रयोग भी किया जा सकता है. मिट्टी और तिल एक लेप से स्नान करने के बाद, भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करनी चाहिए. सबसे पहले धान्य रख कर, धान्यों के ऊपर मिट्टी या तांबें का घडा रखा जाता है. घडे पर लाल वस्त्र बांध कर, धूप, दीप से पूजन करना चाहिए. और भगवान कि पूजा धूप, दीप, पुष्प की जाती है.   

कामदा एकादशी व्रत कथा | Kamada Ekadashi Vrat Katha in Hindi

पुराने समय में पुण्डरीक नामक राजा था, उसकी भोगिनीपुर नाम कि नगरी थी. उसके खजाने सोने चांदी से भरे रह्ते थे. वहां पर अनेक अप्सरा, गंधर्व आदि वास करते थें. उसी जगह ललिता और ललित नाम के स्त्री-पुरुष अत्यन्त वैभवशाली घर में निवास करते थें. उन दोनों का एक-दूसरे से बहुत अधिक प्रेम था. कुछ समय ही दूर रहने से दोनों व्याकुल हो जाते थें.   
एक समय राजा पुंडरिक गंधर्व सहित सभा में शोभायमान थे. उस जगह ललित गंधर्व भी उनके साथ गाना गा रहा था. उसकी प्रियतमा ललिता उस जगह पर नहीं थी. इससे ललित उसको याद करने लगा. ध्यान हटने से उसके गाने की लय टूट गई. यह देख कर राजा को क्रोध आ गया. ओर राजा पुंडरीक ने उसे श्राप दे दिया. मेरे सामने गाते हुए भी तू अपनी स्त्री का स्मरण कर रहा है. जा तू अभी से राक्षस हो जा, अपने कर्म के फल अब तू भोगेगा.
राजा पुण्डरीक के श्राप से वह ललित गंधर्व उसी समय विकराल राक्षस हो गया, उसका मुख भयानक हो गया. उसके नेत्र सूर्य, चन्द्र के समान लाल होने लगें. मुँह से अग्नि निकलने लगी. उसकी नाक पर्वत की कन्दरा के समान विशाल हो गई. और गर्दन पहाड के समान लगने लगी. उसके सिर के बाल पर्वत पर उगने वाले वृ्क्षों के समान दिखाई देने लगे़. उस की भुजायें, दो-दो योजन लम्बी हो गई. इस तरह उसका आठ योजन लम्बा शरीर हो गया. राक्षस हो जाने पर उसकों महान दु:ख मिलने लगा और अपने कर्म का फल वह भोगने लगा.    
अपने प्रियतम का जब ललिता ने यह हाल देख तो वह बहुत दु;खी हुई. अपने पति के उद्वार करने के लिये वह विचार करने लगी. एक दिन वह अपने पति के पीछे घूमते-घूमते विन्धाजल पर्वत पर चली गई. उसने उस जगह पर एक ऋषि का आश्रम देखा. वह शीघ्र ही उस ऋषि के सम्मुख गई. और ऋषि से विनती करने लगी.   
उसे देख कर ऋषि बोले की हे कन्या तुम कौन हो, और यहां किसलिये आई हों, ललिता बोली, हे मुनि, मैं गंधर्व कन्या ललिता हूं, मेरा पति राजा पुण्डरीक के श्राप से एक भयानक राक्षस हो गया है. इस कारण मैं बहुत दु:खी हूं. मेरे पति के उद्वार का कोई उपाय बताईये.  
इस पर ऋषि बोले की हे, गंधर्व कन्या शीघ्र ही चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी आने वाली है. उस एकादशी के व्रत का पालन करने से, तुम्हारे पति को इस श्राप से मुक्ति मिलेगी. मुनि की यह बात सुनकर, ललिता ने आनन्द पूर्वक उसका पालन किया. और द्वादशी के दिन ब्राह्मणों के सामने अपने व्रत का फल अपने पति को दे दिया, और भगवान से प्रार्थना करने लगी.
हे प्रभो, मैनें जो यह व्रत किया है, उसका फल मेरे पति को मिलें, जिससे वह इस श्राप से मुक्त हों. एकादशी का फल प्राप्त होते ही, उसका पति राक्षस योनि से छुट गया. और अपने पुराने रुप में वापस आ गया. इस प्रकार इस वर को करने से व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट हो जाते है.

Varuthini Ekadashi


2. बरूथनी एकादशी

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वैशाख मास के कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी बरुथनी एकादशी के नाम से जानी जाती है. यह व्रत सुख सौभाग्य का प्रतीक है. इस दिन जरुरतमंद को दान देने से करोडों वर्ष तक ध्यान मग्न होकर तपस्या करने तथा कन्यादान के भी फलों से बढकर बरूथनी एकादशी व्रत के फल कहे गये है.   
बरूथनी एकादशी करने वाले व्यक्ति को खासतौर पर उस दिन दातुन का प्रयोग करने, परनिंदा करने, क्रोध करने, और असत्य बोलने से बचना चाहिए. इसके अतिरिक्त इस व्रत में तेल युक्त भोजन भी नहीं किया जाता है. इसकी कथा सुनने से सौ ब्रह्मा हत्याओं का दोष नष्ट होता है. इस प्रकार यह व्रत बहुत ही फलदायक कहा गया है.  

बरूथनी एकादशी व्रत महत्व | Importance of Varuthini Ekadashi Vrat

बरूथनी एकादशी व्रत को करने से दु:खी व्यक्ति को सुख मिलते है. राजा के लिये स्वर्ग के मार्ग खुल जाते है. इस व्रत का फल सूर्य ग्रहण के समय दान करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल इस व्रत को करने से प्राप्त होता है. इस व्रत को करने से मनुष्य लोक और परलोग दोनों में सुख पाता है. और अंत समय में स्वर्ग जाता है. 
शास्त्रों में कहा गया है, कि इस व्रत को करने से व्यक्ति को हाथी के दान और भूमि के दान करने से अधिक शुभ फलों की प्राप्ति होती है. सभी दानों में सबसे उतम तिलों का दान कहा गया है. तिल दान से श्रेष्ठ स्वर्ण दान कहा गया है. और स्वर्ण दान से भी अधिक शुभ इस एकादशी का व्रत करने का उपरान्त जो फल प्राप्त होता है, वह कहा गया है.       

बरूथनी एकादशी व्रत विधि | Varuthini Ekadasi Vrat Vidhi

वैशाख मास के कृ्ष्ण पक्ष की बरूथनी एकादशी का व्रत करने के लिये, उपवासक को दशमी तिथि के दिन से ही एकादशी व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए. व्रत-पालन में दशमी तिथि की रात्रि में ही सात्विक भोजन करना चाहिए. और भोजन में मासं-मूंग दाल और चने, जौ, गेहूं का प्रयोग नहीं करना चाहिए. इसके अतिरिक्त भोजन में नमक का प्रयोग भी नहीं होना चाहिए. 
तथा शयन के लिये भी भूमि का प्रयोग ही करना चाहिए.  भूमि शयन भी अगर श्री विष्णु की प्रतिमा के निकट हों तो और भी अधिक शुभ रहता है. इस व्रत की अवधि 24 घंटों से भी कुछ अधिक हो सकती है. यह व्रत दशमी तिथि की रात्रि के भोजन करने के बाद शुरु हो जाता है, और इस व्रत का समापन द्वादशी तिथि के दिन प्रात:काल में ब्राह्माणों को दान आदि करने के बाद ही समाप्त होता है.      
बरुथनी एकादशी व्रत करने के लिए व्यक्ति को प्रात: उठकर, नित्यक्रम क्रियाओं से मुक्त होने के बाद, स्नान आदि करने के बाद व्रत का संकल्प लेना होता है.   स्नान करने के लिये एकादशी व्रत में जिन वस्तुओं का पूजन किया जाता है, उन वस्तुओं से बने लेप से स्नान करना शुभ होता है.
इसमें आंवले का लेप, मिट्टी आदि और तिल का प्रयोग किया जा सकता है. प्रात: व्रत का संकल्प लेने के बाद  श्री विष्णु जी की पूजा की जाती है. पूजा करने के लिये धान्य का ढेर रखकर उस पर मिट्टी या तांबे का घडा रखा जाता है. घडे पर लाल रंग का वस्त्र बांधकर, उसपर भगवान श्री विष्णु जी की पूजा, धूप, दीप और पुष्प से की जाती है. 

बरूथनी एकादशी व्रत कथा | Varuthini Ekadashi Vrat Katha

प्राचीन समय में नर्मदा तट पर मान्धाता नामक राजा राय सुख भोग रहा था. राजकाज करते हुए भी वह अत्यन्त दानशील और तपस्वी था. एक दिन जब वह तपस्या कर रहा था. उसी समय एक जंगली भालू आकर उसका पैर चबाने लगा. थोडी देर बाद वह राजा को घसीट कर वन में ले गया. तब राजा ने घबडाकर, तपस्या धर्म के अनुकुल क्रोध न करके भगवान श्री विष्णु से प्रार्थना की. भक्त जनों की बाद शीघ्र सुनने वाले श्री विष्णु वहां प्रकट हुए़.
तथा भालू को चक्र से मार डाला. राजा का पैर भालू खा चुका था. इससे राजा बहुत ही शोकाकुल था. विष्णु जी ने उसको दु:खी देखकर कहा कि हे वत्स, मथुरा में जाकर तुम मेरी वाराह अवतार मूर्ति की पूजा बरूथनी एकादशी का व्रत करके करों, इसके प्रभाव से तुम पुन: अंगों वाले हो जाओगें. भालू ने तुम्हारा जो अंग काटा है, वह अंग भी ठिक हो जायेगा. यह तुम्हारा पैर पूर्वजन्म के अपराध के कारण हुआ है. राजा ने इस व्रत को पूरी श्रद्वा से किया और वह फिर से सुन्दर अंगों वाला हो गया.  

व्रत के दिन ध्यान रखने योग्य बातें | Things to remember for Varuthini Vrat

बरूथनी एकादशि का व्रत करने वाले को दशमी के दिन से निम्नलिखित दस वस्तुओं का त्याग करना चाहिए. 
1. कांसे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए.
2. मांस नहीं खाना चाहिए.
3. मसूर की दान नहीं खानी चाहिए.
4. चना नहीं खाना चाहिए.
5. करोदें नहीं खाने चाहिए.
6. शाक नहीं खाना चाहिए.
7. मधु नहीं खाना चाहिए.
8. दूसरे से मांग कर अन्न नहीं खाना चाहिए.
9. दूसरी बार भोजन नहीं करना चाहिए.
10. वैवाहिक जीवन में संयम से काम लेना चाहिए. 

Mohini Ekadasi Vrat


3. मोहिनी एकादशी

mohini_mkdashi
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी मोहिनी एकादशी कहलाती है. इस दिन भगवान पुरुषोतम राम की पूजा करने का विधि-विधान है. व्रत के दिन भगवान की प्रतिमा को स्नानादि से शुद्ध कर श्वेत वस्त्र पहनाये जाते है. वर्ष 2011 में 13 मई के दिन मोहिनी एकादशी का व्रत किया जायेगा. व्रत के दिन उच्चासन पर बैठकर धूप, दीप से आरती उतारते हुए, मीठे फलों से भोग लगाना चाहिए.  

मोहिनी एकादशी व्रत का महत्व | Importance of Mohini Ekadashi Vrat

मोहिनी एकादशी व्रत करने से व्यक्ति के सभी पाप और दु:ख नष्ट होते है.  वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि में जो व्रत होता है. वह मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है. इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य़ मोह जाल से छूट जाता है. अत: इस व्रत को सभी दु:खी मनुष्यों को अवश्य करना चाहिए. मोहिनी एकादशी के व्रत के दिन इस व्रत की कथा अवश्य सुननी चाहिए.  

मोहिनी एकादशी व्रत विधि | Mohini Ekadashi Vrat Vidhi

मोहिनी एकादशी व्रत जिस व्यक्ति को करना हों, उस व्यक्ति को व्रत के एक दिन पूर्व ही अर्थात दशमी तिथिके दिन रात्रि का भोजन कांसे के बर्तन में नहीं करना चाहिए. दशमी तिथि में भी व्रत दिन रखे जाने वाले नियमों का पालन करना चाहिए.  जैसे इस रात्रि में एक बार भोजन करने के पश्चात दूबारा भोजन नहीं करना चाहिए. रात्रि के भोजन में भी प्याज और मांस आदि नहीं खाने चाहिएं. इसके अतिरिक्त जौ, गेहुं और चने आदि का भोजन भी सात्विक भोजन की श्रेणी में नहीं आता है.

एकादशी व्रत की अवधि लम्बी होने के कारण मानसिक रुप से तैयार रहना जरूरी है. इसके अलावा व्रत के एक दिन पूर्व से ही भूमि पर शयन करना प्रारम्भ कर देना चाहिए. तथा दशमी तिथि के दिन भी असत्य बोलने और किसी को दु:ख देने से बचना चाहिए. इस प्रकार व्रत के नियमों का पालन दशमी तिथि की रात्रि से ही करना आवश्यक है.   

व्रत के दिन एकादशी तिथि में उपवासक को प्रात:काल में सूर्योदय से पहले उठना चाहिए. और प्रात:काल में ही नित्यक्रियाएं कर, शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए. स्नान के लिये किसी पवित्र नदी या सरोवर का जल मिलना श्रेष्ठ होता है. अगर यह संभव न हों तो घर में ही जल से स्नान कर लेना चाहिए. स्नान करने के लिये कुशा और तिल एक लेप का प्रयोग करना चाहिए. शास्त्रों के अनुसार यह माना जाता है, कि इन वस्तुओं का प्रयोग करने से व्यक्ति पूजा करने योग्य होता है.    

स्नान करने के बाद साफ -शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए. और भगवान श्री विष्णु जी के साथ-साथ भगवान श्री राम की पूजा की जाती है. व्रत का संकल्प लेने के बाद ही इस व्रत को शुरु किया जाता है. संकल्प लेने के लिये इन दोनों देवों के समक्ष संकल्प लिया जाता है.   

देवों का पूजन करने के लिये कुम्भ स्थापना कर, उसके ऊपर लाल रंग का वस्त्र बांध कर पहले कुम्भ का पूजन किया जाता है, इसके बाद इसके ऊपर भगवान कि तस्वीर या प्रतिमा रखी जाती है. प्रतिमा रखने के बाद भगवान का धूप, दीप और फूलों से पूजन किया जाता है. तत्पश्चात व्रत की कथा सुनी जाती है.     

मोहिनी एकादशी व्रत कथा | Mohini Ekadashi Vrat Katha

सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक नगरी थी. इस नगरी में घृ्त नाम का राजा रहता था. उसके राज्य में एक धनवान वैश्य रहता था. वह बडा धर्मात्मा और विष्णु का भक्त था. उसके पांच पुत्र थे. बडा पुत्र महापापी था, जुआ खेलना, मद्धपान करना और सभी बुरे कार्य करता था. उसके माता-पिता ने उसे कुछ धन देकर घर से निकाल दिया.

माता-पिता से उसे जो मिला था, वह शीघ्र ही समाप्त हो गया. इसके बाद जीवनयापन के लिए उसने चोरी आदि करनी शुरु कर दी. चोरी करते हुए, पकडा गया. दण्ड अवधि बीतने पर उसे नगरी से निकाल दिया गया. एक दिन उसके हाथ शिकार न लगा. भूखा प्यासा वह एक मुनि के आश्रम में गया. और हाथ जोडकर बोला, मैं आपकी शरण में हूँ, मुझे कोई उपाय बतायें, इससे मेरा उद्वार होगा.  

उसकी विनती सुनकर, मुनि ने कहा की तुम वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन व्रत करों. अनन्त जन्मों के पापों से तुम्हे मुक्ति मिलेगी. मुनि के कहे अनुसार उसने मोहिनी एकादशी व्रत किया. ओर पाप मुक्त होकर वह विष्णु लोक चला गया.   

Apara (Achala) Ekadashi


4. अपरा (अचला) एकादशी

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ज्येष्ठ मासके कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी अपरा एकादशी या अचला एकादशी के नाम से जानी जाती है. इस व्रत को करने से ब्रह्माहत्या, परनिन्दा, भूत योनि आदि जैसे बुरे कर्मों से छुटकारा मिलता है. इसके करने से कीर्ति, पुन्य तथा धन में अभिवृ्द्धि होती है.   

अपरा (अचला) एकादशी के फल | Fruits of Apara (Achala) Ekadashi

अपरा एकादशी व्रत करने से व्यक्ति को अपार धन वृ्द्धि देती है. यह एकादशी पुण्यों को देने वाली और पापों को नष्ट करने वाली है. जो मनुष्य़ इस व्रत को करता है. उसकी इस लोक में प्रसिद्ध होती है. अपरा एकादशी के प्रभाव से ब्रह्मा हत्या जैसे पाप नष्ट होते है, झूठी गवाही, असत्य भाषण, झूठा वेद पढना, झूठा शास्त्र बनाना आदि सभी के पाप नष्ट होते है. 
जो फल तीनों पुष्करों में स्नान करने से या कार्तिक मास में स्नान करने से अथवा गंगाजी के तट पर पितरों को पिंड दान करने से मिलता है. वह फल अपरा एकाद्शी का व्रत करने से मिलता है. सिंह राशि के व्यक्तियोम को वृ्हस्पति वार के दिन गोमती में स्नान, करने से कुम्भ में श्री केदारनाथ जी के दर्शन करने से तथा बद्रिकाश्रम में रहने से तथा सूर्य-चन्द्र ग्रहण में कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो फल मिलता है. वही फ अपरा एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है. 
इसके अतिरिक्त जो फल हाथी घोडे के दान, यज्ञ करने , स्वर्ण दान करने से जो फल मिलता है. वह फल अपरा एकादशी का व्रत करने से मिलता है. गौ व भूमि स्वर्ण के दान का फल भी इसके फल के बराबर होता है.  अपरा का व्रत पाप रुपी अन्धकार के लिये सूर्य के समान है. इसलिये जहां तक हो सके प्रत्येक व्यक्ति को इस व्रत को करने का प्रयास करना चाहिए. 

अपरा (अचला) एकाद्शी व्रत विधि | Achala (Apara) Ekadashi Vrat Vidhi

अपरा एकादशी व्रत करने की विधि अन्य एकादशी के व्रतों कि विधि के समान ही होती है. इस व्रत की अवधि 24 घंटों से अधिक होती है. इस व्रत का प्रारम्भ दशमी तिथि से ही किया जाता है. दशमी तिथि से ही भोजन और आचार-विचार में संयम रखना चाहिए. रात्रि में भूमि पर शयन कर, सात्विक विचार मन में लाने चाहिए.  तथा वैवाहिक जीवन में ब्रहाचार्य का पालन करना चाहिए.  
एकादशी तिथि में प्रात: काल में जल्द उठना चाहिए. अन्य क्रियाओं से निवृ्त होकर स्नान आदि कर, व्रत का संकल्प लेना चाहिए. और श्री विष्णु की पूजा करनी चाहिए. पूरे दिन व्रत कर सांय काल में फल आदि से भगवान को भोग लगा कर, श्री विष्णु जी की पूजा धूप, दीप और फूलों से करनी चाहिए. एकादशी व्रत में रात्रि में विष्णु जी का पाठ करते हुए जागरण किया जाता है.  

अचला (अपरा) एकादशी व्रत कथा | Achala (Apara) Ekdashi Vrat Katha in Hindi

एक बार की बात है, महिध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था. जिसके छोटा भाई बज्रध्वज बडा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था. वह अपने बडे भाई से बडा द्वेष रखता था. साथ ही वह स्वभाव से अवसरावादी था. एक रात्रि उसने अपने बडे भाई की हत्या कर दी. और देह को पीपल के पेड के नीचे गाड़ दिया. मृ्त्यु के उपरान्त वह पीपल के वृ्क्ष पर उत्पात करने लगा. अकस्मात एक दिन धौम्य नामक ऋषि उधर से गुजरा. उन्होने तपोबल से पीपल एक पेड से नीचे उतारा. और विधा का उपदेश दिया. और प्रेत्मात्मा से मुक्ति के लिये उसे अपरा एकादशी व्रत करने का मार्ग दिखाया. 

Nirjala Ekdashi Vrat Vidhi


5. निर्जला एकादशी

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ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी के नाम से जानी जाती है. इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. ऋषि वेदव्यास जी के अनुसार इस एकादशी को भीमसेन ने धारण किया था. इसी वजह से इस एकादशी का नाम भीमसेनी एकादशी पडा. शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को करने से व्यक्ति को दीर्घायु तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस एकादशी व्रत को निर्जल रखा जाता है. अर्थात इस व्रत में जल का सेवन नहीं करना चाहिए.    
इस एकादशी को करने से वर्ष की 24 एकादशियों के व्रत के समान फल मिलता है. यह व्रत करने के पश्चात द्वादशी तिथि में ब्रह्मा बेला में उठकर स्नान,दान तथा ब्राह्माण को भोजन कराना चाहिए. इस दिन "ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करके गौदान, वस्त्रदान, छत्र, फल आदि दान करना चाहिए.  

निर्जला एकादशी व्रत फल | Fruits of Nirjala Ekadashi Vrat

निर्जला एकादशी व्रत के दिन अन्न का सेवन नहीं किया जाता है. मिथुन संक्रान्ति के मध्य ज्येष्ठ मास की शुक्लपक्ष की एकादशी को निर्जल व्रत किया जाता है. इस एकादशी व्रत में स्नान और आचमन में जल व्यर्थ नहीं करना चाहिए. आचमन करने के लिये कम से कम जल का प्रयोग करना चाहिए. शास्त्रों के अनुसार आचमन में अधिक जल का प्रयोग व्यक्ति के पापों में वृ्द्धि करता है. इसके अतिरिक्त इस एकादशी के दिन भोजन भी नहीं करना चाहिए. भोजन करने से व्रत के फल नष्ट हो जाते है. 
सूर्योदय से लेकर सूर्योस्त तक मनुष्य़ जलपान न करें, तो उससे 24 एकादशियों के व्रत करने के समान फल प्राप्त होते है. इसके अतिरिक्त द्वादशी के दिन सूर्योदय से पहले ही उठना चाहिए. इसके पश्चात भूखे ब्राह्माण को भोजन कराना चाहीए.  इसके बाद ही भोजन करना चाहिए.    
इस एकादशी का व्रत करना सभी तीर्थों में स्नान करने के समान है. निर्जला एकादशी का व्रत करने से मनुष्य सभी पापोम से मुक्ति पाता है. जो मनुष्य़ निर्जला एकादशी का व्रत करता है. उनको मृ्त्यु के समय मानसिक और शारीरिक कष्ट नही होता है. यह एकादशी पांडव एकादशी के नाम से भी जानी जाती है. इस व्रत को करने के बाद जो व्यक्ति स्नान, तप और दान करता है, उसे करोडों गायों को दान करने के समान फल प्राप्त होता है. 

निर्जला एकादशी व्रत विधि  | Nirjala Ekadashi Vrat (Fast) Vidhi 

निर्जला एकादशी का व्रत करने के लिये दशमी तिथि से ही व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए. इस एकादशी में निर्जल व्रत करना चाहिए. और दिन में "ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का उच्चारण करना चाहिए. इस दिन गौ दान करने का भी विशेष विधि-विधान है. इस दिन व्रत करने के अतिरिक्त स्नान, तप आदि कार्य करना भी शुभ रहता है. 
जो मनुष्य़ इस व्रत को करता है.  इस व्रत में सबसे पहले श्री विष्णु जी की पूजा करनी चाहिए. इस दिन ब्राह्माणों को दक्षिणा, मिष्ठान आदि देना चाहिए. व्रत के दिन इसकी कथा अवश्य सुननी चाहिए. तथा व्रत की रात्रि में जागरण करना चाहिए.  

निर्जला एकादशी व्रत कथा | Nirjala Ekadasi Vrat Katha in Hindi

एक समय की बात है, भीमसेन ने व्यास जी से कहा की हे भगवान, युधिष्ठर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, कुन्ती तथा द्रौपदी सभी एकादशी के दिन व्रत करते थे. मगर मैं, कहता हूँ कि मैं भूख बर्दाश्त नहीं कर सकता. मैं दान देकर वासुदेव भगवान की अर्चना करके प्रसन्न कर सकता हूं. मैं बिना काया कलेश की ही फल चाहता हूं
इस पर वेद व्याद जी बोले, हे भीमसेन, अगर तुम स्वर्गलोक जाना चाहते हो, तो दोनों एकादशियों का व्रत बिना भोजन ग्रहण किये करों. ज्येष्ठ मास की एकादशी का निर्जल व्रत करना विशेष शुभ कहा गया है. इस व्रत में आचमन में जल ग्रहण कर सकते है. अन्नाहार करने से व्रत खंडित हो जाता है. व्यास जी की आज्ञा अनुसार भीमसेन ने यह व्रत किया और वे पाप मुक्त हो गये.  

Yogini Ekadashi Vrat Katha


6. योगिनी एकादशी

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योगिनी एकादशी व्रत आषाढ मास के कृ्ष्ण पक्ष कीएकादशी को किया जाता है(Yogni Ekadashi Vrat is observed on Ekadashi of Krishna Paksha, Ashad Masa).  इस दिन व्रत करके भगवान नारायण की मूर्ति को स्नान कराकर भोग लगाते है. इसके बाद पुष्प, धूप, दीप से आरती उतारनी चाहिए. गरीब ब्राह्माणों को दान देना कल्याणकारी रहता है. इस एकादशी के दिन पीपल के पेड की पूजा करने से सभी पाप नष्ट होते है. और उपवासक को अंत में स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है.

योगिनी एकादशी व्रत फल | Fruits of  Yogini Ekadashi Vrat (Fast)

आषाढ मास के कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी योगिनी एकादशी कहलाती है. इस व्रत को करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते है(This fast frees the person from all his sins). और इस लोक में तथा परलोक में व्यक्ति को मुक्ति प्राप्त होती है. इस एकादशी का महत्व तीनों लोकों में प्रसिद्ध है.योगिनी एकादशी व्रत करने से पहले की रात्रि में ही व्रत एक नियम शुरु हो जाते है. दशमी तिथि की रात्रि में ही व्यक्ति को जौं, गेहूं और मूंग की दाल जैसे तामसिक प्रकृ्ति के भोजन नहीं ग्रहण करने चाहिए.
इसके अतिरिक्त व्रत के दिन क्योकि नमक युक्त भोजन नहीं किया जाता है. इसलिये दशमी तिथि की रात्रि में नमक का सेवन नहीं करना चाहिए. व्रत दशमी तिथि कि रात्रि से शुरु होकर द्वादशी तिथि के प्रात:काल में दान कार्यो के बाद समाप्त होता है.
एकादशी तिथि के दिन प्रात: स्नान आदि कार्यो के बाद, व्रत का संकल्प लिया जाता है. स्नान करने के लिये मिट्टी का प्रयोग करना शुभ रहता है. इसके अतिरिक्त स्नान के लिये तिल के लेप का प्रयोग भी किया जा सकता है. स्नान करने के बाद कुम्भ स्थापना की जाती है, कुम्भ के ऊपर श्री विष्णु जी कि प्रतिमा रख कर पूजा की जाती है. और धूप, दीप से पूजन किया जाता है. व्रत की रात्रि में जागरण करना चाहिए.

योगिनी एकाद्शी व्रत कथा | Yogini Ekadashi Vrat Katha in Hindi

अलकापुरी नाम की नगरी में एक कुबेर नाम का राजा राज्य करता था. वह शिव जी का परम भक्त था. पूजा में वह फूलों का प्रयोग करता था. और उसकी पूजा के लिये हेममाली फूल लाता है. हेममाली की विशालाक्षी नाम की उसकी सुन्दर स्त्री थी. एक दिन वह मानसरोवर से पुष्प आने के बाद पूजा कार्य में न लग कर, अपनी स्त्री के साथ रमण करने लगा. जब राजा कुबेर को उसकी राह देखते -देखते दोपहर हो गई. तो उसने क्रोधपूर्वक अपने सेवकों को आज्ञा दी. 
"तुम जाकर हेममाली का पता लगाओं", कि वह अभी फूल लेकर क्यों नहीं आया है? जब यक्षों ने उसका पता लगा लिया, तो वह कुबेर के पास जाकर कहने लगे, हे राजन, वह माली अभी तक अपनी स्त्री के साथ रमण कर रहा है. यज्ञों की बात सुन्कर कुबेर ने हेममाली को बुलाने की आज्ञा दी. हेममाली राजा कुबेर के सम्मुख जाकर डर से कांपता हुआ उपस्थित हुआ.
तुमने समय पर पुष्प न ला कर, मेरे परम पूजनीय देव भगवान शिव का अपमान किया है. मैं तुझे श्राप देता हूं, कि तू स्त्री का वियोग भोगेगा. और मृ्त्यु लोग में जाकर कोढी हो जायेगा. कुबेर के श्राप से वह उसी क्षण स्वर्ग से पृ्थ्वी लोक पर आ गिरा. और कोढी हो गया. उसकी स्त्री भी उसी समय उससे बिछुड गई. मृ्त्युलोक में आकर उसने महा दु;ख भोगे.
परन्तु शिव जी की भक्ति के प्रभाव से उनकी बुद्धि मलीन न हुइ और पिछले जन्म के कर्मों का स्मरण करते हुए. वह हिमालय पर्वत की तरफ चल दिया. वहां पर चलते -चलते उसे एक ऋषि मिले. ऋषि के आश्रम में पहुंच गया. वे ऋषि बहुत तपशाली थे. उस समय वे दूसरे ब्रह्मा के समान प्रतीत हो रहे थें. हेममाली वहां गया और उनको प्रणाम करके उनके चरणों में गिर पडा.
उसे देख कर ऋषि बोले के तुमने क्या बुरा कार्य किया है, जो तुम्हारी आज यह दशा है. इस पर हेममाली ने अपनी सारी व्यथा ऋषि को सुना दी. यह सब सुनकर ऋषि ने कहा की तुमने मेरे सम्मुख सत्य कहें है, इसलिये मैं तुम्हारे उद्वार में तुम्हारी सहायता करूंगा. तुम आषाढ मास के कृ्ष्ण पक्ष की योगिनी नामक एकादशी का विधि-पूर्वक व्रत करों. तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जायेगें. इस पर हेममाली बहुत प्रसन्न हुआ. और मुनि के वचनों के अनुसार योगिनी एकाद्शी का व्रत किया. इसके प्रभाव से वह फिर से अपने पुराने रुप में वापस आ गया. और अपनी स्त्री के साथ प्रसन्न पूर्वक रहने लगा. 
योगिनी व्रत की कथा श्रवण का फल अट्ठासी सहस्त्र ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर है. इसके व्रत से समस्त पाप दूर होते है.

Devshayani Ekadashi Katha


7. देवशयनी एकादशी

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आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते हैं. पुराणों में ऎसा उल्लेख है, कि इस दिन से भगवान श्री विष्णु चार मास की अवधि तक पाताल लोक में निवास करते है. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से श्री विष्णु उस लोक के लिये गमन करते है. आषाढ मास से कार्तिक मास के मध्य के समय को चातुर्मास कहते है. इन चार माहों में भगवान श्री विष्णु क्षीर सागर की अनंत शय्या पर शयन करते है. इसलिये इन माह अवधियों में कोई भी धार्मिक कार्य नहीं किया जाता है.
इस अवधि में कृ्षि और विवाहादि सभी शुभ कार्यो करने बन्द कर दिये जाते है. इस काल को भगवान श्री विष्णु का निद्राकाल माना जाता है. इन दिनों में तपस्वी एक स्थान पर रहकर ही तप करते है. धार्मिक यात्राओं में भी केवल ब्रज यात्रा की जा सकती है. ब्रज के विषय में यह मान्यता है, कि इन चार मासों में सभी देव एकत्रित होकर तीर्थ ब्रज में निवास करते है. बेवतीपुराण में भी इस एकादशी का वर्णन किया गया है. यह एकादशी उपवासक की सभी कामनाएं पूरी करती है. एक एकादशी को "प्रबोधनी" (Prabodhni Ekadashi) के नाम से भी जाना जाता है.

देवशयनी एकादशी व्रत विधि | Devshayani Ekadashi Vrat Vidhi (Procedure)

देवशयनी एकादशी व्रत को करने के लिये व्यक्ति को इस व्रत की तैयारी दशमी तिथि की रात्रि से ही करनी होती है. दशमी तिथि की रात्रि के भोजन में किसी भी प्रकार का तामसिक प्रवृ्ति का भोजन नहीं होना चाहिए. भोजन में नमक का प्रयोग करने से व्रत के शुभ फलों में कमी होती है. और व्यक्ति को भूमि पर शयन करना चाहिए. और जौ, मांस, गेहूं तथा मूंग की दान का सेवन करने से बचना चाहिए. यह व्रत दशमी तिथि से शुरु होकर द्वादशी तिथि के प्रात:काल तक चलता है. दशमी तिथि और एकाद्शी तिथि दोनों ही तिथियों में सत्य बोलना और दूसरों को दु:ख या अहित होने वाले शब्दों का प्रयोग करने से बचना चाहिए. 
इसके अतिरिक्त शास्त्रों में व्रत के जो सामान्य नियम बताये गए है, उनका सख्ती से पालन करना चाहिए. एकाद्शी तिथि में व्रत करने के लिये सुबह जल्दी उठना चाहिए. नित्यक्रियाओं को करने के बाद, स्नान करना चाहिए. एकादशी तिथि का स्नान अगर किसी तीर्थ स्थान या पवित्र नदी में किया जाता है, तो वह विशेष रुप से शुभ रहता है. किसी कारण वश अगर यह संभव न हो, तो उपवासक इस दिन घर में ही स्नान कर सकता है. स्नान करने के लिये भी मिट्टी, तिल और कुशा का प्रयोग करना चाहिए.
स्नान कार्य करने के बाद भगवान श्री विष्णु जी का पूजन करना चाहिए. पूजन करने के लिए धान्य के ऊपर कुम्भ रख कर, कुम्भ को लाल रंग के वस्त्र से बांधना चाहिए. इसके बाद कुम्भ की पूजा करनी चाहिए. जिसे कुम्भ स्थापना के नाम से जाना जाता है. कुम्भ के ऊपर भगवान की प्रतिमा या तस्वीर रख कर पूजा करनी चाहिए. ये सभी क्रियाएं करने के बाद धूप, दीप और पुष्प से पूजा करनी चाहीए.

देवशयनी एकादशी व्रत कथा | Devshayani Ekadasi Vrat Katha in Hindi

प्रबोधनी एकादशी से संबन्धित एक पौराणिक कथा प्रचलित है. सूर्यवंशी मान्धाता नम का एक राजा था. वह सत्यवादी, महान, प्रतापी और चक्रवती था. वह अपनी प्रजा का पुत्र समान ध्यान रखता है. उसके राज्य में कभी भी अकाल नहीं पडता था.
एक समय राजा के राज्य में अकाल पड गया. और प्रजा अन्न की कमी के कारण अत्यन्त दु:खी रहने लगी. राज्य में यज्ञ होने बन्द हो गयें. एक दिन प्रजा राजा के पास जाकर प्रार्थना करने लगी की हे राजन, समस्त विश्व की सृष्टि का मुख्य कारण वर्षा है. इसी वर्षा के अभाव से राज्य में अकाल पड गया है. और अकाल से प्रजा अन्न की कमी से मर रही है.
यह देख दु;खी होते हुए राजा ने भगवान से प्रार्थना की हे भगवान, मुझे इस अकाल को समाप्त करने का कोई उपाय बताईए. यह प्रार्थना कर मान्धाता मुख्य व्यक्तियोम को साथ लेकर वन की और चल दिया. घूमते-घूमते वे ब्रह्मा के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंच गयें. उस स्थान पर राजा रथ से उतरा और आश्रम में गया. वहां मुनि अभी प्रतिदिन की क्रियाओं से निवृ्त हुए थें.
राजा ने उनके सम्मुख प्रणाम क्या, और मुनि ने उनको आशिर्वाद दिया, फिर राजा से बोला, कि हे महर्षि, मेरे राज्य में तीन वर्ष से वर्षा नहीं हो रही है. चारों और अकाल पडा हुआ है. और प्रजा दु:ख भोग रही है. राजा के पापों के प्रभाव से ही प्रजा को कष्ट मिलता है. ऎसा शास्त्रों में लिखा है, जबकि मैं तो धर्म के सभी नियमों का पालन करता हूँ.

इस पर ऋषि बोले की हे राजन, यदि तुम ऎसा ही चाहते हो, तो आषाढ मास के शुक्ल पक्ष की पद्मा नाम की एकादशी का विधि-पूर्वक व्रत करो. एक व्रत के प्रभाव से तुम्हारे राज्य में वर्षा होगी. और प्रजा सुख प्राप्त करेगी.

मुनि की बात सुनकर राजा अपने नगर में वापस आया और उसने एकादशी का व्रत किया. इस व्रत के प्रभाव से राज्य में वर्षा हुई और मनुष्यों को सुख प्राप्त हुआ. देवशयनी एकाद्शी व्रत को करने से भगवान श्री विष्णु प्रसन्न होते है. अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले व्यक्तियों को इस एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए.

Kamika Ekadashi Vrat Katha


8. कामिका एकादशी

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कामिका एकादशी सावन माह के कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है. वर्ष 2011 में कामिका एकादशी 26 जुलाई के दिन की रहेगी.  इस एकादशी के दिन भगवान श्री कृ्ष्ण की पूजा करने से फल मिलता है. वही फल गांअ, काशी और अन्य तीर्थ स्थानों में स्नान करने से मिलने वाले फल के समान होता है. इस एकादशी का व्रत करने के लिये प्रात: स्नान करके भगवान श्री विष्णु को भोग लगाना चाहिए. आचमन के पश्चात धूप, दीप, चन्दन आदि पदार्थों से आरती उतारनी चाहिए. 

कामिका एकादशी व्रत महत्व | Importance of Kamika Ekadasi Vrat

कामिका एकादशी व्रत के दिन श्री हरि का पूजन करने से व्यक्ति के पितरों के भी पप दूर होते है. उपवास करने वाला व्यक्ति पाप रूपी संसार से उभर कर, मोक्ष की ओर अग्रसर होता है. इस एकादशी के विषय में यह मान्यता है, कि जो मनुष्य़ श्रावण मास में भगवान श्रीधर की पूजा करता है, उसके द्वारा गंधर्वों और नागों की सभी की पूजा हो जाती है. लालमणी मोती, दूर्वा और मूंगे आदि से पूजा होने के बाद भी भगवानश्री विष्णु उतने संतुष्ट नहीं होते, जितने की तुलसी पत्र से पूजा होने के बाद होते है. जो व्यक्ति तुलसी पत्र से श्री केशव का पूजन करता है. उसके जन्म भर का पाप नष्ट होते है.     
श्रावण मास के कृ्ष्ण पक्ष की एकाद्शी का नाम कामिका है. इस एकादशी की कथा सुनने मात्र से ही यज्ञ करने समान फल प्राप्त होते है. कामिका एकादशी के व्रत में शंख, चक्र, गदाधारी श्री विष्णु जी की पूजा होती है. जो मनुष्य इस एकाद्शी को धूप, दीप, नैवेद्ध आदि से भगवान श्री विष्णु जी कि पूजा करता है. उसे गंगा स्नान करने के फल से भी बडा फल मिलता है. 

कामिका एकाद्शी व्रत विधि | Kamika Ekadashi Vrat Vidhi

एकादशी तिथि का व्रत दशमी तिथि से ही प्रारम्भ समझना चाहिए. एकाद्शी व्रत तभी सफल होत है, जब इस व्रत के नियमों का पालन दशमी तिथि से ही किया जाता है. जिस व्यक्ति को दशमी तिथि का व्रत करना हो, उस व्यक्ति को दशमी तिथि में व्यवहार को सात्विक रखना चाहिए. सत्य बोलना और मधुर बोलना चाहिए. ऎसी कोई बात नहीं करनी चाहिए. कि जो किसी को दू:ख पहुंचाये. 
व्रत की अवधि लम्बी होती है. इसलिये उपवासक में दृढ संकल्प का भाव होना चाहिए. एक बार व्रत शुरु करने के बाद मध्य में कदापि नहीं छोडना चाहिए. दशमी तिथि के दिन रात्रि के भोजन में मांस, जौ, शहद जैसी वस्तुओं का प्रयोग नहीं करना चाहिए. और एक बार भोजन करने के बाद रात्रि में दोबारा भोजन नहीं करना चाहिए. दशमी तिथि से ही क्योकि व्रत के नियम लागू होते है, इसलिये भोजन में नमक नहीं होना चाहिए. भोजन करने के बाद व्यक्ति को भूमि पर शयन करना चाहिए. और पूर्ण रुप से ब्रहाचार्य का पालन करना चाहिए.       
व्रत के दिन अर्थात एकादशी तिथि के दिन सुबह जल्दी उठना चाहिए. स्नान से पहले नित्यक्रियाओं से मुक्त होना चाहिए. और स्नान करने के लिये मिट्टी, तिल और कुशा का प्रयोग करना चाहिए. यह स्नान अगर किसी तीर्थ स्थान में किया जाता है, तो सबसे अधिक पुन्य देता है. विशेष परिस्थितियों में घर पर ही स्नान किया जा सकता है.         
स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करने चाहिए. और भगवान श्री विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लेना चाहिए. इसके बाद भगवान का पूजन करना चाहिए. पूजन करने के लिये सर्वप्रथम कुम्भ स्थापना की जाती है. कुम्भ के ऊपर भगवान श्री विष्णु जी की प्रतिमा रखी जाती है, और उसका पूजन धूप, दीप, पुष्प से किया जाता है.      

कामिका एकादशी व्रत कथा | Kamika Ekadashi Vrat Katha in Hindi

प्राचीन काल में किसी गांव में एक ठाकुर जी थे. क्रोधी ठाकुर का एक ब्राह्मण से झगडा हो गया. परिणाम स्वरुप ब्राह्मणों ने भोजन करने से इंकार कर दिया. तब उन्होने एक मुनि से निवेदन किया कि हे भगवान, मेरा पाप कैसे दूर हो सकता है. इस पर मुनि ने उसे कामिका एकाद्शी व्रत करने की प्रेरणा दी. ठाकुर जी ने ठिक वैसा ही किया. रात्रि में भगवान की मूर्ति के पास जब वह  शयन कर रहा था. तभी उसे स्वपन आया. हे ठाकुर तेरा पाप दूर हो गया है.  अब तू ब्राह्माण की तेहरवीं करके ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो गया है. 

Pavitra Akadashi



9. पवित्रा एकादशी


हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पवित्रा/पुत्रदा एकादशी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के निमित्त व्रत किया जाता है।

पवित्रा एकादशी व्रत कानियम पालन दशमी तिथि  की रात्रि से ही शुरु करें व ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन सुबह नित्य कर्मों से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने बैठकर व्रत का संकल्प लें। इस दिन यथा संभव उपवास करें। उपवास में अन्न ग्रहण नहीं करें संभव न हो तो एक समय फलाहारी कर सकते हैं।

इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा विधि विधान से करें। (यदि आप पूजन करने में असमर्थ हों तो पूजन किसी योग्य ब्राह्मण से भी करवा सकते हैं।) भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं। स्नान के बाद उनके चरणामृत को व्रती (व्रत करने वाला) अपने और परिवार के सभी सदस्यों के अंगों पर छिड़के और उस चरणामृत को पीए। इसके बाद भगवान को गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि पूजन सामग्री अर्पित करें।

विष्णु सहस्त्रनाम का जप एवं उनकी कथा सुनें। रात को भगवान विष्णु की मूर्ति के समीप हो सोएं और दूसरे दिन यानी द्वादशी के दिन वेदपाठी ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देकर आशीर्वाद प्राप्त करें। इस प्रकार पवित्रा एकादशी व्रत करने से योग्य पुत्र की प्राप्ति होती है।

Aja (Kamika) Ekadashi Vrat Vidhi


10. अजा एकादशी

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भाद्रपद कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी अजा या कामिका एकादशी के नाम से जानी जाती है. इस दिन की एकादशी के दिनभगवान श्री विष्णु जी की पूजा करनी चाहिए. रात्रि जागरण तथा व्रत करने से व्यक्ति के सभी पाप दूर होते है. इस एकादशी के फल लोक और परलोक दोनों में उतम कहे गये है. अजा एकाद्शी व्रत करने से व्यक्ति को हजार गौदान करने के समान फल प्राप्त होते है. उसके जाने अनजाने में किए गये सभी पाप समाप्त होते है. और जीवन में सुख-समृ्द्धि दोनों की उसे प्राप्ति होती है.     

अजा एकादशी व्रत विधि | Aja Ekadasi Vrat Vidhi

भाद्रपद, कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी तिथि के दिन की एकादशी अजा नाम से पुकारी जाती है. इस एकादशी का व्रत करने के लिये व्यक्ति को दशमी तिथि को व्रत करने वाले व्यक्ति को व्रत संबन्धी कई बातों का ध्यान रखना चाहिए.  इस दिन व्यक्ति को निम्न वस्तुओं का त्याग करना चाहिए. 
1. व्रत की दशमी तिथि के दिन व्यक्ति को मांस कदापि नहीं खाना चाहिए. 
2. दशमी तिथि की रात्रि में मसूर की दाल खाने से बचना चाहिए. इससे व्रत के शुभ फलों में कमी होती है. 
3. चने नहीं खाने चाहिए. .
4. करोदों का भोजन नहीं करना चाहिए. 
5. शाक आदि भोजन करने से भी व्रत के पुन्य फलों में कमी होती है.  
6. इस दिन शहद का सेवन करने एकाद्शी व्रत के फल कम होते है.   
7. व्रत के दिन और व्रत से पहले के दिन की रात्रि में कभी भी मांग कर भोजन नहीं करना चाहिए. 
8. इसके अतिरिक्त इस दिन दूसरी बार भोजन करना सही नहीं होता है. 
9. व्रत के दिन और दशमी तिथि के दिन पूर्ण ब्रह्माचार्य का पालन करना चाहिए. 
10. व्रत की अवधि मे व्यक्ति को जुआ नहीं खेलना चाहिए. 
11. एकाद्शी व्रत हो, या अन्य कोई व्रत व्यक्ति को दिन समयावधि में शयन नहीं करना चाहिए. 
12. दशमी तिथि के दिन पान नहीं खाना चाहिए. 
13. दातुन नहीं करना चाहिए. किसी पेड को काटना नहीं चाहिए.
14. दुसरे की निन्दा करने से बचना चाहिए. 
15. झूठ का त्याग करना चाहिए.    
अजा एकादशी का व्रत करने के लिए उपरोक्त बातों का ध्यान रखने के बाद व्यक्ति को एकाद्शी तिथि के दिन शीघ्र उठना चाहिए. उठने के बाद नित्यक्रिया से मुक्त होने के बाद, सारे घर की सफाई करनी चाहिए. और इसके बाद तिल और मिट्टी के लेप का प्रयोग करते हुए, कुशा से स्नान करना चाहिए. स्नान आदि कार्य करने के बाद, भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करनी चाहिए. 
भगवान श्री विष्णु जी का पूजन करने के लिये एक शुद्ध स्थान पर धान्य रखने चाहिए. धान्यों के ऊपर कुम्भ स्थापित किया जाता है. कुम्भ को लाल रंग के वस्त्र से सजाया जाता है. और स्थापना करने के बाद कुम्भ की पूजा की जाती है. इसके पश्चात कुम्भ के ऊपर श्री विष्णु जी की प्रतिमा या तस्वीर लगाई जाती है. अब इस प्रतिमा के सामने व्रत का संकल्प लिया जाता है. बिना संकल्प के व्रत करने से व्रत के पूर्ण फल नहीं मिलते है. संकल्प लेने के बाद भगवान की पूजा धूप, दीप और पुष्प से की जाती है.      

अजा एकाद्शी व्रत कथा | Aja Ekadashi Vrat Katha in hindi

प्राचीन काल में एक चक्रवती राजा राज्य करता था. उसका नाम हरिशचन्द्र था. वह अत्यन्त वीर प्रतापी था और सत्यवादी था.  उसने अपने एक वजन को पूरा करने के लिये अपनी स्त्री और पुत्र को बेच डाला था. और वह स्वयं भी एक चाण्डाल का सेवक बन गया था. 
उसने उस चाण्डाल के यहां कफन देने का काम किया. परन्तु उसने इस दुष्कर कार्य में भी सत्य का साथ न छोडा. जब इस प्रकार रहते हुए उसको बहुत वर्ष हो गये तो उसे अपने इस नीच कर्म पर बडा  दु:ख हुआ, और वह इससे मुक्त होने का उपाय खोजने लगा. वह उस जगह सदैव इसी चिन्ता में लगा रहता था. 
कि मै, क्या करूँ, एक समय जब कि वह चिन्ता कर रहा था, तो गौतम ऋषि आये, राजा ने इन्हें, देखकर प्रणाम किया और अपनी दु:ख की कथा सुनाने लगे. महर्षि राजा के दु:ख से पूर्ण वाक्यों को सुनकर अत्यन्त दु:खी हुये और राजा से बोले की हे राजन, भादों के कृ्ष्णपक्ष में एक एकाद्शी होती है. एकाद्शी का नाम अजा है. तुम उसी अजा नामक एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो, तथा रात्रि को जागरन करो. इससे तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो जायेगें. गौतम ऋषि राजा से इस प्रअर कहकर चले गये़. 
अजा नाम की एकाद्शी आने पर राजा ने मुनि के कहे अनुसार विधि-पूर्वक व्रत था रात्रि जागरण किया. उसी व्रत के प्रभाव से राजा के समस्त पाप नष्ट हो गए.  उस समय स्वर्ग में नगाडे बजने लगे तथा पुष्पों की वर्षो होने लगी. उसने अपने सामने ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और महादेवजी को खडा पाया.  उसने अपने मृ्तक पुत्र को जीवित करने तथा स्त्री को वस्त्र तथा आभूषणों से युक्त देखा. 
व्रत के प्रभाव से उसको पुन: राज्य मिल गया. अन्त समय में वह अपने परिवार सहित स्वर्ग लोक को गया. यह सब अजा एकाद्शी के व्रत का प्रभाव था. जो मनुष्य इस व्रत को विधि-विधान पूर्वक करते है. तथा रात्रि में जागरण करते है. उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते है. और अन्त में स्वर्ग जाते है. इस एकादशी की कथा के श्रवण मात्र से ही अश्वमेघ यज्ञ के समान फल मिलता है.  

Padma Ekadashi-Vaman Jayanti Vrat Vidhi


11. पद्मा एकादशी-वामन जयन्ती

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भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकाद्शी तिथि पदमा एकादशी के नाम से जानी जाती है. इस व्रत को करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती है. इस तिथि में वामन देव का पूजन अवश्य करना चाहिए. भादों मास की एकादशी वामन एकादशी के नाम से जानी जाती है. इस दिन यज्ञोपवीत से वामन की प्रतिमा स्थापित कर, अर्ध्य दान करने से,फल, फूल चढाने, और उपवास करने से व्यक्ति का कल्याण होता है. 
वर्ष 2011 में, 09 सितम्बर के दिन यह व्रत किया जायेगा. इस एकादशी को एक अन्य मत के अनुसार भादों मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि के दिन यह व्रत किया जाता है. एकादशी तिथि के दिन किया जाने वाला व्रत पदमा एकादशी के नाम से जाना जाता है. जबकि एक अन्य मत यह कहता है, कि एकादशी व्रत होने के कारण इस व्रत को एकाद्शी तिथि में ही किया जाना चाहिए. 08 सितम्बर के दिन पदमा एकाद्शी व्रत और 09 सितम्बर के दिन द्वादशी तिथि रहेगी. इस दिन वामन एकादशी व्रत किया जा सकेगा., इसका व्रत करना विशेष कल्याणकारी रहेगी.   
अर्ध्य देने समय निम्न मंत्र का प्रयोग करना चाहिए.

देवेश्चराय देवाय, देव संभूति कारिणे ।

प्रभवे सर्व देवानां वामनाय नमो नम: ।।

इसकी पूजा करने का एक दूसरा विधान भी है. पूजा के बाद 52 पेडा और 52 दक्षिणा रखकर भोग लगाया जाता है. फिर एक डलिया में एक कटोरी चावल, एक कटोरी शरबत, एक कटोरी चीनी, एक कटोरी दही ब्राह्माण को दान दी जाती है. इसी दिन व्रत का उद्यापन भी करना चाहिए. उध्यापन में ब्राह्माणों को एक छाता, खडाऊँ तथा दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए. इस व्रत को करने से स्वर्ग कि प्राप्ति होती है.  

वामन एकादशी व्रत फल | Fruits of Vaman Ekadashi Vrat

वामन एकाद्शी भादों की शुक्ल पक्ष की एकादशी कहलाती है. इस एकादशी को जयन्ती एकाद्शी भी कहते है. इस एकाद्शी का व्रत करने से समस्त पापों का नाश होता है. इस जयंती एकादशी व्रत को करने से नीच पापियों का उद्वार हो जाता है. अगर कोई व्यक्ति परिवर्तनी एकाद्शी के दिन भगवान श्री विष्णु जी कई की पूजा करता है. उसे मोक्ष कि प्राप्ति होती है. 
इस एकादशी के फलों के विषय में जरा से भी संदेह नहीं है, कि जो व्यक्ति इस एकादशी के दिन वामन रुप की पूजा करता है, वह ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों की पूजा करता है. इस एकादशी का व्रत करने के बाद उसे इस संसार में कुछ भी करना शेष नहीं रहता है. वामन एकाद्शी के दिन के विषय में एक मान्यता है, कि इस दिन भगवान श्री विष्णू जी करवट बदलते है. इसी वजह से इस एकादशी को परिवर्तिनी एकाद्शी भी कहते है. 

वामन एकादशी व्रत कथा | Vamana Ekadashi Vrat Katha in Hindi

त्रेतायुग में बलि नाम का एक दानव था. वह भक्त, दानी, सत्यवादी तथा ब्राह्माणों की सेवा करने वाला था. साथ ही वह सदैव ही यज्ञ और तप आदि किया करता था. वह अपनी भक्ति के प्रभाव से स्वर्ग में इन्द्र के स्थान पर राज्य करने लगा. इन्द्र तथा अन्य देवता इस बात को सहन न कर सके, और भगवान के पास जाकर प्रार्थना करने लगे. अन्त में भगवान श्री विष्णु ने वामन रुप धारण किया. 
और राजा बलि से याजना की, हे राजन, तुम मुझे तीन पग भूमि दे दों. इससे तुम्हें तीन लोक दान का फल प्राप्त होगा. राजा बलि ने इस छोटी सी याचना को स्वीकार कर लिया. और राजा भूमि देने को तैयार हो गया. ऎसे में भगवान श्री विष्णु जी ने अपना आकार बढाया. प्रथम पग में भूमि, दूसरे पग में नभ और तीसरे पग रखने से पहले उन्होने पहूंचा की पैर कहां रखूं. इतना सुनकर राजा बलि ने अपना सिर नीचा कर लिया. और भगवान विष्णु ने तीसरा पैर राजा बलि के सिर पर रख दिया. ऎसे में भक्त दानव पाताल लोक चला गया. 
पाताल लोक में राजा बलि ने विनीत की, तो  भगवान विष्णु जी ने कहा की में तुम्हारे पास सदैव रहूंगा. तभी से भादों के शुक्ल पक्ष की परिवर्तिनी नामक एकादशी के दिन मेरी एक प्रतिमा राजा बलि के पास रहती है. और एक क्षीर सागर में शेषनाग पर शय करती रहती है. इस एकाद्शी के दिन भगवान श्री विष्णु सोते हुए करवट बदलते है. इस दिन त्रिलोकी के नाथ श्री विष्णु भगवान की पूजा की जाती है. इस दिन चावल और दही सहित चांदी का दान करने का विशेष विधि-विधान है.  

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