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16 सितंबर 2011


मानव शरीर का वास्तु के पंच-तत्वों से संबंध

नाड़ी शास्त्र के अनुसार, मानव शरीर में स्थित चक, जिनमें मूलाधार चक, स्वाधिष्ठान चक, मणिपूरक चक, अनाहत चक, विशुद्ध चक, आज्ञा चक एवं सहस्त्रार चक विद्यमान है। इन चकों का संबंध वास्तु विषय के जल तत्व, अग्नि तत्व, वायु तत्व, पृथ्वी तत्व एवं आकाश तत्व से संबंधित है। वास्तु में पृथक दिशा के लिये अलग-अलग तत्व दिये गये हैं जैसे : ईशान के लिये जल तत्व, आग्नेय के लिये अग्नितत्व, वायव्य के लिये वायु तत्व, नैऋत के लिये पृथ्वी तत्व एवं ब्रह्मस्थल के लिये आकाश तत्व का महत्व है।


जल तत्व : वास्तु के अनुसार, भूमिगत पानी के स्त्राsत ईशान में ही होने चाहिये। जिससे सुबह के समय सूर्य से मिलने वाली अल्ट्राव्हायलेट किरणों से जल की शुद्धि होती है एवं यह सूर्य रश्मियां जीवन को स्वास्थपद रखती है।


अग्नि तत्व : सूर्य को सृष्टि का संचालक कहा जाता है, क्योंकि सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा शक्ति का हमारे जीवन में अत्याधिक महत्व है। सूर्य की सकारात्मक ऊर्जा का पभाव भवन की पूर्व, उत्तर, ईशान, पश्चिम-वायव्य एवं दक्षिण-आग्नेय दिशा से पाप्त होता है। अत इन ऊर्जा शक्तियों से शुभ परिणाम पाप्त करने के लिए उपरोक्त दिशाओं को खुला रखना अत्यंत आवश्यक होता है।


इसके विपरीत दक्षिण, पश्चिम-नैऋत, उत्तर-वायव्य एवं पूर्व-आग्नेय को खुला एवं खाली रखने से सूर्य की हानीकारक एवं नकारात्मक ऊर्जा का पवेश होता है, जो स्वास्थ्य एवं समृद्धि के लिये अत्यंत हानीकारक होती है।


वायु तत्व : पाण वायु (आक्सीजन) के बिना सृष्टि का चलना असंभव है। क्योंकि पाण वायु के बिना जीव, निर्जीव हो जायेगा। मकान में वायु के आवागमन हेतु उचित स्थान बनाया जाना चाहिये। क्योंकि स्वच्छ एवं शुद्ध वायु का सेवन जीवन के स्वास्थ्य एवं दीर्घायु हेतु बहुत आवश्यक है। इसके विपरीत पदूषण युक्त एवं दूषित वायु के सेवन से अनेक पकार की बीमारियां पनपने का अंदेशा रहता है। अत रोगमुक्त एवं स्वास्थ्यवर्द्धक जीवन व्यतीत करने के लिये मकान में शुद्ध वायु का पवेश होना अत्यंत ही आवश्यक है।


यद्यपि वायु का आवागमन पत्येक दिशा से होता है, लेकिन स्वास्थ्य की दृष्टि से भवन निर्माण में वायु पवेश का विशेष ध्यान रखना परम आवश्यक है। इसके लिये उत्तर-पश्चिम दिशा, जिसे वायव्य कोण कहा जाता है। इस वायव्य कोण की पश्चिम-वायव्य दिशा, वायु के संचारण हेतु मुख्य रूप से उपयोगी मानी गयी है। इस दिशा से वायु-तत्व की पाप्ति करना, पाणियों के स्वास्थ्य, दीर्घायु एवं भवन के टिकाऊपन के लिये महत्वपूर्ण है।


पृथ्वी तत्व : समस्त संसार आकर्षण और विकर्षण से पभावित होता है। पृथ्वी के उत्तर-दक्षिण दिशा में चुंबकीय ध्रुव विद्यमान रहते हैं। इससे हमें गुरुत्वाकर्षण की शक्ति मिलती है। यह चुंबकीय ऊर्जा शक्ति उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की तरफ चलती है और इस ऊर्जा शक्ति का पभाव सभी जड़-चेतन पर समान रूप से पड़ता है। उत्तरी ध्रुव के पास दक्षिणी ध्रुव आने से विकर्षण पैदा होता है।


मानव शरीर के मस्तिष्क में उत्तरी ध्रुव विद्यमान है, इसलिये वास्तु विषय में दक्षिण में मस्तिष्क एवं उत्तर दिशा की तरफ पांव करके सोने के लिये निर्देश दिया गया है। जिससे हमारे शरीर को चुंबकीय शक्ति एवं नैसर्गिक ऊर्जा शक्ति का लाभ मिलता है। आवास स्थल में उत्तम चुंबकीय किरणों का पभाव बनाये रखने के लिये पूर्व, उत्तर व ईशान दिशा में जगह का खुला एवं ढलान तथा दक्षिण, पश्चिम व नैऋत दिशा को ऊंचा, मजबूत एवं ढका हुआ होना अत्यंत आवश्यक है।


आकाश तत्व : आकाश तत्व एक मूल तत्व माना गया है। अत वास्तु विषय में इसे ब्रह्म स्थल (मध्य स्थान) कहा जाता है। इस तत्व की पूर्ति करने के लिये पुराने जमाने में मकान के मध्य में खुला आंगन रखा जाता था, ताकि अन्य सभी दिशाओं में इस तत्व की आपूर्ति हो सके।


आकाश तत्व से अभिपाय यह है कि गृह निर्माण में खुलापन रहना चाहिये। मकान में कमरों की ऊँचाई और आंगन के आधार पर छत का निर्माण होना चाहिये। अधिक व कम ऊँचाई के कारण आकाश तत्व पभावित होता है। कई मकानों में दूषित वायु (भूत-पेत) का पवेश एवं आवेश देखा गया है। इसका मूल कारण वायु तत्व और आकाश तत्व का सही निर्धारण नहीं होना ही पाया गया है। मानसिक रोगों का पनपना भी आकाश तत्व के दोष का ही नतीजा पाया जाता है।


अत स्पष्ट तौर पर यह कहना मुनासिब होगा कि पाकृतिक ऊर्जा, सूर्य रश्मियां, गुरुत्वाकर्षण बल, भूगर्भीय ऊर्जा, चुंबकीय शक्ति, पाकृतिक ऊर्जा इत्यादि का मानव जीवन के बीच समन्वय एवं संतुलन स्थापित करना ही वास्तु विषय का मुख्य उद्देश्य है। क्योंकि वास्तु के पंच-तत्वों का सीधा पभाव मानव जीवन पर पड़ता है। अंत में यही कहा जा सकता है कि हमारा कर्तव्य है कि हम वास्तु के पंच-तत्वों की उपयोगिता के महत्व को समझें। भवन निर्माण में वास्तु विषय के सिद्धांतों का परिपालन करते हुए निर्धारित दिशाओं से ही इन तत्वों को पाप्त करने का पयास करे। ताकि नवनिर्मित भवन, गृह स्वामी और उसके परिवार के लिये सुख-समृद्धिदायक और उन्नतिशील सिद्ध हो सके।

वास्तु में दिशाओं का महत्त्व


वास्तु के लिए दिशाओं को समझें


वास्तु विज्ञान को समझने और उससे फायदा उठाने के लिए सबसे पहले दिशाओं का ज्ञान होना जरूरी है। जब आप पूर्व दिशा की ओर मुंह करके खडे़ होते हैं तो आपके बाईं ओर उत्तर और दाहिनी ओर दक्षिण होता है। आपकी पीठ के पीछे पश्चिम दिशा होती है।
जहां दोनों दिशाएं मिलती हैं, वह कोण बेहद महत्वपूर्ण होता है क्योंकि वह दोनों दिशाओं से आने वाली शक्तियों और ऊर्जाओं का मिला देता है। उत्तर और पूर्व के बीच वाले कोण को उत्तर-पूर्व या ईशान कहते हैं। पूर्व और दक्षिण के बीच वाले कोण को दक्षिण-पूर्व या आग्नेय कहते हैं दक्षिण और पश्चिम के बीच वाले कोण को दक्षिण-पश्चिम या नैऋत्य कहते हैं। उसी तरह पश्चिम और उत्तर के बीच के कोण को उत्तर-पश्चिम या वायव्य कोण कहा जाता है और मध्य स्थान को ब्रह्रास्थान के रूप में जाना गया है। 

उत्तर
उत्तर दिशा के अधिष्ठित देवता कुबेर हैं जो धन और समृद्धि के द्योतक हैं। ज्योतिष के अनुसार बुद्ध ग्रह उत्तर दिशा के स्वामी हैं। उत्तर दिशा को मातृ स्थान भी कहा गया है। इस दिशा में स्थान खाली रखना या कच्ची भूमि छोड़ना धन और समृद्धि कारक है। 

पूर्व
पूर्व दिशा के देवता इंद्र हैं। आत्मा के कारक और रासृष्टि प्रकाश सूर्य पूर्व दिशा से उदय होते हैं। पूर्व दिशा पितृस्थान का द्योतक है। इस दिशा में कोई रूकावट नहीं होनी चाहिए। पूर्व दिशा में खुला स्थान परिवार के मुखिया की लम्बी उम्र का प्रतीक है। 

पश्चिम
वरूण पश्चिम दिशा के देवता है और ज्योतिष के अनुसार शनिदेव पश्चिम दिशा के स्वामी हैं। यह दिशा प्रसिद्धिभाग्य और ख्याति का प्रतीक है। 

दक्षिण
यम दक्षिण दिशा के अधिष्ठित देव हैं। दक्षिण दिशा में वास्तु के नियमानुसार निर्माण करने से सुख सम्पन्नता और समृद्धि की प्राप्ति होती है। 

ईशान कोण
पूर्व और उत्तर दिशाएं जहां पर मिलती हैं उस स्थान को ईशान कोण की संज्ञा दी गई है। यह दो दिशाओं का सर्वोतम मिलन स्थान है। यह स्थान भगवान शिव और जल का स्थान भी माना गया है। ईशान को सदैव स्वच्छ और शुद्ध रखना चाहिए। इस स्थान पर जलीय स्रोतों जैसे कुंआ बोरिंग वगैरह की व्यवस्था सर्वोतम परिणाम देती है। पूजा स्थान के लिए ईशान कोण को विशेष महत्व दिया जाता है। इस स्थान पर कूड़ा करकट रखना ,स्टोर टॉयलट वगैरह बनाना वर्जित है। 

आग्नेय कोण
दक्षिण और पूर्व के मध्य का कोणीय स्थान आग्नेय कोण के नाम से जाना जाता है। नाम से ही साफ हो जाता है कि यह स्थान अग्नि देवता का प्रमुख स्थान है इसलिए रसोई या अग्नि संबंधी (इलैक्ट्रॉनिक उपकरणों आदि) के रखने के लिए विशेष स्थान है। शुक्र ग्रह इस दिशा के स्वामी हैं। आग्नेय का वास्तुसम्मत होना निवासियों के उत्तम स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। 

नैऋत्य कोण
दक्षिण और पश्चिम दिशा के मध्य के स्थान को नैऋत्य दिशा का नाम दिया गया है। इस दिशा पर निरूति या पूतना का आधिपत्य है। ज्योतिष के अनुसार राहू और केतु इस दिशा के स्वामी हैं। इस क्षेत्र का मुख्य तत्व पृथ्वी है। पृथ्वी तत्व की प्रमुखता के कारण इस स्थान को ऊंचा और भारी रखना चाहिए। इस दिशा में गड्ढेबोरिंगकुंए इत्यादि नहीं होने चाहिए। 

वायव्य कोण
उत्तर और पश्चिम दिशा के मध्य के कोणीय स्थान को वायव्य दिशा का नाम दिया गया है। इस दिशा का मुख्य तत्व वायु है। इस स्थान का प्रभाव पड़ोसियोंमित्रों और संबंधियों से अच्छे या बुरे संबंधों का कारण बनता है। वास्तु के सही उपयोग से इसे सदोपयोगी बनाया जा सकता है।

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