आपका स्वागत है...

मैं
135 देशों में लोकप्रिय
इस ब्लॉग के माध्यम से हिन्दू धर्म को जन-जन तक पहुचाना चाहता हूँ.. इसमें आपका साथ मिल जाये तो बहुत ख़ुशी होगी.. इस ब्लॉग में पुरे भारत और आस-पास के देशों में हिन्दू धर्म, हिन्दू पर्व त्यौहार, देवी-देवताओं से सम्बंधित धार्मिक पुण्य स्थल व् उनके माहत्म्य, चारोंधाम,
12-ज्योतिर्लिंग, 52-शक्तिपीठ, सप्त नदी, सप्त मुनि, नवरात्र, सावन माह, दुर्गापूजा, दीपावली, होली, एकादशी, रामायण-महाभारत से जुड़े पहलुओं को यहाँ देने का प्रयास कर रहा हूँ.. कुछ त्रुटी रह जाये तो मार्गदर्शन करें...
वर्ष भर (2017) का पर्व-त्यौहार (Year's 2016festival) नीचे है…
अपना परामर्श और जानकारी इस नंबर
9831057985 पर दे सकते हैं....

धर्ममार्ग के साथी...

लेबल

आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

24 सितंबर 2011


49. महामाया शक्ति पीठ

Mahamaya Shakti Peeth


माता के 51 शक्ति पीठ सदा से ही श्रद्वालुओं के लिये विशेष पूजा का स्थान रहे है. माता के शक्ति पीठों की संख्या की सही जानकारी उपलब्ध नहीं है. अलग- अलग शास्त्र  शक्ति पीठों कि संख्या के विषय में विभिन्न मत रखते है. पर सामान्यत: 51 शक्ति पीठ माने जाते है. देवी भागवत पुराण के अनुसार माता के शक्ति पीठों की संख्या 108 है. कालिका पुराण में शक्ति पीठ 26 बताये गये है. जबकि शिव चरित्र में इन्हें 51 कहा गया है. इसके अलावा दुर्गा शप्तसती और तंत्रचूडामणि में शक्ति पीठों की संख्या 52 बताई गई है. 

Mahamaya Shakti Peeth- 51 Shakti Peeth

जिसमें कुछ प्रसिद्ध शक्ति पीठ इस प्रकार है.  1. नंदीपूर, यशोर, वक्रेश्वर आदि प्रमुख है.   
शक्ति पीठों की स्थापना से संबन्धित एक प्राचीन पौराणिक कथा प्रसिद्ध है, इसके अनुसार भगवान शिव की प्रिया देवी सती के पिता राजा दक्ष ने अपने घर के समारोह में देवी सती के पति भगवान शिव को बुलाने से इंकार किया तो, अपने पति का अपमान न सहन करते हुए देवी ने हवन की अग्नि में कूद कर प्राण दे दिये; 
इस घटना की जानकारी भगवान शिव को होने पर भगवान शिव माता के मृ्त शरीर को लेकर  ब्रह्माण्ड भ्रमण कर रहे थे तब भगवती सती के शरीर के अंग एशिया के विभिन्न भागों में गिरे, इन्हीं स्थानों को शक्ति पीठ के नाम से जाना जाता है.
भारत के कश्मीर में पहलगाँव के निकट माता का कंठ गिरा था. इसी स्थान को माता के 51 शक्ति पीठों में शामिल किया गया. यहां शक्ति को महामाया और भैरव को त्रिसंध्येश्वर कहा जाता है.   
यह स्थान उतर भारत में कश्मीर राज्य में पड्ता है.  अमरनाथ की इस पवित्र गुफा में जहां भगवान शिव के हिमलिंग का दर्शन होता है वहीं हिमनिर्मित एक पार्वतीपीठ भी बनता है. यहीं पार्वतीपीठ महामाया शक्तिपीठ के रूप में मान्य है. श्रावण पूर्णिमा को अमरनाथ के दर्शन के साथ-साथ यह शक्तिपीठ भी दिखाई देता है.

महामाया शक्ति पीठ के दर्शनों का महत्व | Mahamaya Shakti Peeth Darshan Importance

महामाया शक्तिपीठ में दर्शन-पूजन का अपना एक अलग महत्व है. यहां भगवती सती के अंग तथा अंगभूषण की पूजा होती है. आस्थावान भक्तों में मान्यता है कि जो यहां भक्ति और श्रद्धापूर्वक भगवती महामाया के साथ-साथ अमरनाथ वासी भगवान भोलेनाथ के हिमलिंग रूप की पूजा करता है, वह इस लोक में सारे सुखों का भोगकर शिवलोक में स्थान प्राप्त करता है.

माता शक्ति के दर्शनों का सर्वोतम शुभ समय | Auspicious Time for Mata Shakti Darshan

मां महामाया देवी मंदिर के लिये नवरात्र मुख्य उत्सव हैं. नवरात्र वर्ष में दो बार आते हैं: 9-9 दिन के लिये. नवरात्रों के दौरान विराट उत्सव, विशेष पूजा अर्चना एवं देवी के अभिषेक का आयोजन किया जाता है. श्रद्धालु सभी 9 दिन उपवास रखकर देवी की आराधना करते हैं. हज़ारों की संख्या में श्रद्धालुगण मीलों पैदल चलकर माता के दर्शनों के लिये यहां आते हैं. 
माता को शक्ति का रुप कहा गया है, बिना शक्ति के शिव भी अधूरे है. शिव को प्रसन्न करना हों. माता के किसी भी शक्ति पीठ में दर्शन के लिये जाते हुए श्रद्धालु को पूर्ण ब्रह्राचार्य का पालन करना चाहिए. ऎसा न करने से अशुभ होता है

Sugandha Shakti Peeth


सुगंधा-सुनंदा शक्ति पीठ 
 Sugandha Shakti Peeth 

सनातन धर्म सदा से शक्ति का उपासक रहा है. देवताओं की तुलना में देवियों की उपासना अधिक होती रही है.  देवताओं के नामों के उच्चारण में उनकी शक्ति का ही नाम पहले आता है. साधारण देवों की बात क्या करें, संसार के पालनकर्ता विष्णु और महेश के साथ भी यही बात है. विष्णु अथवा नारायण की पत्नी हैं लक्ष्मी, इसलिए हम लक्ष्मीनारायण उच्चारण करते हैं. 
इसी प्रकार गौरीशंकर या भवानीशंकर संबोधित किया जाता है. विष्णु के अवतार राम और कृष्ण की बात करें, तो हम सीताराम, राधाकृष्ण संबोधित करते हैं. किसी भी देव को शीघ्र प्रसन्न करने के लिये देव से पूर्व जब उसकी पत्नी के नाम का संम्बोधन किया जाता है. तो देव शीघ्र प्रसन्न होते है. यही कारण है कि शक्ति की पीठों की पूजा-उपासना को अधिक महत्व दिया गया है. 
तात्पर्य यह है कि ईश्वर या देवता से उसकी शक्ति का महत्व अधिक है. इसीलिए एक कवि ने राधा को कृष्ण से ऊपर मानते हुए लिखा.

मेरी भवबाधा हरौ, राधानागरि सोय। 

जा तन की झांई पड़े, श्याम हरित दुति होय।। 

अपनी सांसारिक बाधा दूर करने के लिए महाकवि बिहारी राधा से ही प्रार्थना करते हैं, न कि कृष्ण से. उनका मानना है कि राधा के प्रकाश के कारण ही कृष्ण का रंग हरा हो गया, अन्यथा वे काले रहते. और तो और, श्रीराम के परम भक्त गोस्वामी तुलसीदास ने भी सीता का उल्लेख पहले और राम का बाद में किया. उनकी यह पंक्ति सर्वविदित है- 

सियाराममय सब जग जानी। 

करहुं प्रनाम जोरि जुग पानी।। 

माता के शक्ति पीठों के विषय में एक पौराणिक कथा प्रसिद्ध है. जो इस प्रकार है. राजा दक्ष के यज्ञ-कुंड में शिवप्रिया सती ने अपनी आहुति दे दी थी. इसे देखकर शिव ने रौद्र रूप धारण कर लिया. उन्होंने सती को अपने कंधे पर लादकर अंतरिक्ष में चक्कर काटना शुरू कर दिया. सड़ते हुए शव के, देवताओं के अनुरोध पर विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से टुकड़े-टुकड़े कर दिया. जहां-जहां ये टुकड़े गिरे, वहां-वहां एक शक्तिपीठ का निर्माण हो गया. 
ऐसे इक्यावन शक्तिपीठों के अलावा, कुछ ऐसे भी शक्तिपीठ हैं, जो सती के अंगों के कारण नहीं बने. उस स्थान पर श्रद्धालु युगों से देवी की पूजा करते आ रहे हैं, इसलिए वह स्थान ऊर्जा-पूरित हो गया और उसे शक्तिपीठ की संज्ञा मिल गई. ऐसे स्थानों में हिमाचल की चिंत्यपूर्णी, नैनीताल की नैना देवी, प्रसिद्ध तीर्थस्थान वैष्णो देवी, उत्तर प्रदेश की विंध्यवासिनी आदि के नाम लिए जा सकते हैं. इसलिए कई स्थानों पर शक्तिपीठों की संख्या एक सौ आठ बताई जाती है. उन्हीं में से के प्रसिद्ध शक्ति पीठ सुगंधा के नाम से प्रसिद्ध है, जिसे सुनंदा के नाम से भी जाना जाता है.   

सुगंधा- सुनंदा शक्ति पीठ | Sugandha (Sunanda) Shakti Peeth

बांग्लादेश के शिकारपुर में बरिसल से 20 किमी दूर सोंध नदी के किनारे स्थित है माँ सुगंध, जहाँ माता की नासिका गिरी थी. इसकी शक्ति है सुनंदा और भैरव को त्र्यंबक कहते हैं. 

शक्ति पीठों की उपासना का महत्व | Shakti Peeth Upasna Importance

विभिन्न शक्ति पीठों के दर्शन और यहां आकर पूजा-उपासना करने का महत्व नवरात्री समय में बढ जाता है. यहीं कारण है कि जो व्यक्ति शक्ति पीठों के दर्शन के लिये नहीं जा पाते है, उन्हें घर में ही इन दिनों में दुर्गा सप्तशती का पाठ कर लेना चाहिए.   
सामान्य दिनों में भी कई लोग इसका पाठ कर मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं. ब्रह्म देव को पिता स्वरुप माना गया है. सभी देवों में उन्हें अधिक महत्व दिया गया है.  परन्तु शक्ति पूजा को ब्रह्मा से भी श्रेष्ठतर माना गया है. वह सृष्टि के निर्माण, पालन या संहार का कारण नहीं है. यह सब ब्रह्म की शक्ति द्वारा ही संपन्न होता है. इसीलिए शक्ति पीठ सदा भक्तों से भरे रहते है.
इनके दर्शन मात्र से सभी अभीष्ट पूरे होते है. शक्ति के महत्व के कारण ही भारत में अनेक शक्तिपीठ हैं. शक्तिपीठों की संख्या के संबंध में भिन्न-भिन्न मत हैं, लेकिन 'तंत्रचूड़ामणि' ग्रंथ के अनुसार, ऐसे 51 शक्तिपीठ हैं. इनमें कुछ प्रमुख के नाम हैं-ज्वालामुखी, कामाख्या, त्रिपुरसुंदरी, वाराही, काली, अंबिका, भ्रामरी, ललिता आदि। 

Chitabhumi Shakti Peeth Baidyanath Dham



51. जयदुर्गा | Jai Durga | Chitabhumi Shakti Peeth


माता के 51 शक्ति पीठों की अद्वभुत महिमा कही गई है. शिव से पूर्व शक्ति को प्रसन्न करने का विधान माना गया है. एक मत के अनुसार अगर देवी शक्ति प्रसन्न हो गईं तो शिव स्वयं ही प्रसन्न हो जाते है. पूरे एशिया में कितने शक्ति पीठ है, इसके विषय में सही और प्रमाणिक तथ्य माजूद नहीं है. इस संदर्भ में भारत के सभी धार्मिक ग्रन्थ और प्राचीन पुराण अलग - अलग मत रखते है. फिर भी देवी पुराण को सबसे अधिक प्रमाणिक मानते हुए शक्तिपीठों की संख्या 51 कही गई है. 
इन्हीं 51 शक्ति पीठों में से एक शक्ति पीठ वैद्यनाथ-जयदुर्गा शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है. इस स्थान पर माता शक्ति का ह्र्दय गिरा था. इस स्थान पर देवी शक्ति की जय-दुर्गा नाम से पूजा की जाती है. और भगवान शिव को इस स्थान पर वैद्यनाथ के नाम से जाना जाता है.   
शक्ति पीठों की स्थापना किस प्रकार हुई इस संबध में एक पौराणिक कथा सामने आती है. कथा कुछ इस प्रकार है.

शक्तिपीठ स्थापना कथा । Shakti Peeth katha in hindi।

देवी सती का विवाह भगवान शंकर के साथ हुआ है.  देवी सती राजा दक्ष की पुत्री थी. और राजा दक्ष को भगवान शिव पसन्द नहीं थें. राजा दक्ष को अपने स्थान और अपने राजा होने का गर्व था. एक बार उन्होंने ने एक यज्ञ का आयोजन किया, इस यज्ञ में सभी देवी-देवताओं को सआदरसहित बुलाया गया, परन्तु देवी सती और उनके पति भगवान शिव को आमंत्रण नहीं दिया गया. 
अपने पति का यह अपमान देख कर देवी सती से रहा न गया. और उन्होंने प्रायश्चित स्वरुप यज्ञ के अग्निकुंड में कूद कर अपनी जान दे दी. अपनी प्रिया के अग्नि कुंड में कूदने की बात सुनकर, भगवान शिव को बेहद क्रोध आया. वे अपनी पत्नी के शवको लेकर पूरे ब्रह्माण्ड में घूमने लगें. तब अन्य देवों के कहने पर श्री विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 टुकडे कर दिये. शरीर के ये 51 टुकडे एशिया के जिन स्थानों पर गिरे उन स्थानों को शक्ति पीठ का नाम दे दिया गया. पूरे ब्रह्माण्ड में भटकने के बाद भगवान शिव ने कैलाश पर्वत पर जाकर समाधि ले ली. 
इन्हीं 51 शक्ति पीठों में से एक प्रसिद्ध शक्ति पीठ वैद्यनाथ-जयदुर्गा शक्ति पीठ है. यह शक्तिपीठ देवघर, झारखंड  राज्य में स्थित है. 

जयदुर्गा शक्ति पीठ का अन्य नाम चिताभूमि | Chitabhumi : Other name of Jai Durga Shakti Peeth

वैद्यनाथ-जयदुर्गा शक्तिपीठ को ही चिताभूमि के नाम से भी जाना जाता है. कहते है, कि जिस समय भगवान शिव देवी सती का शव कंधे पर लेकर ब्रह्माण्ड में घूम रहे थें, उसी समय इस स्थान पर सती का ह्रदय अंग गलकर गिर पडा था, ऎसे में भगवान शिव ने सती के उस ह्रदय का दाह-संस्कार इस स्थान पर किया था. उसी कारण से इस स्थान का नाम चिता भूमि पडा.     

जयदुर्गा शक्ति पीठ की मान्यता और महत्व | Jaidurga Shakti Peeth Belief and Importance

वैद्यनाथ- जयदुर्गा शक्तिपीठ न केवल एक शक्तिपीठ है, बल्कि यह शुभ स्थान लोगों को कुष्ठ रोगों से मुक्ति मिलती है. इस शक्तिपीठ के विषय में एक मान्यता है कि इस स्थान का जो जन दर्शन करता है, वह सर्वरोग रोगों से मुक्ति प्राप्त करता है. इसके विषय में यहां तक कहा गया है, कि इस शक्तिपीठ के दर्शनमात्र से पापो  से मुक्ति मिलती है. और व्यक्ति के मन से बुरे विचार भी दूर होते है. साथ ही श्रद्वालु में आध्यात्त्मिक गुणों का विकास होने लगता है. यही कारण है कि इसका नाम वैद्धनाथ भी है.     
यहां पर श्रद्वालुओं का जमघट विशेष रुप से नवरात्रों, दुर्गा पूजा और छठ पूजा के पावन अवसर पर देखने में आता है.

Tarapith Temple


शक्तिपीठ तारापीठ | Shakti Peeth Tarapith


Maa Tara (Tarapith), Westbengal, Photo by : Rajesh Mishra

पश्चिम बंगल के प्रमुख पर्यटन स्थलों में एक है सिद्ध तारापीठ. इस स्थान का महत्व असम में स्थित कामख्या और राजगीर में स्थित छिन्नमस्तिका के समान ही है. तंत्र साधना में विश्वास रखने वालों के लिए यह परम पूज्य स्थल है. यहां पर तंत्र साधक श्रद्धा एवं विश्वास के साथ साधना करते हैं. तंत्र साधकों के अलावा भी लोग मुराद मांगने देवी तारा के मंदिर में आते हैं. यह मंदिर महाश्मशान के बीच में है.  

तारापीठ की प्राचीन कथा | Tarapith Katha in Hindi

तारापीठ की कथा इस प्रकार है. दक्ष प्रजापति के यज्ञ की अग्निकुण्ड में कूद कर सती द्वारा आत्म बलिदान करने के बाद शिव विचलित हो उठे और सती के शव को अपने कंधे पर लेकर आकाश मार्ग से चल दिये. उस समय देवताओं के अनुनय पर भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती के शव के खंडित कर दिया. जिन स्थान पर देवी सती के अंग पृथ्वी पर गिरे वह शक्तिपीठ के नाम से विख्यात हुआ. तारापीठ भी उन्हीं में से एक है.  माना जाता है कि इस स्थान पर देवी सती के नेत्र गिरे थे. प्राचीन काल में महर्षि वशिष्ठ ने इस स्थान पर देवी तारा की उपासना करके सिद्धियां प्राप्त की थी. उन्होंने इस स्थान पर एक मंदिर भी बनवाया था जो अब धरती में समा गया है. 

तारापीठ मंदिर | Tarapith Mandir

वर्तमान तारापीठ मंदिर का निर्माण जयव्रत नामक एक व्यापारी ने करवाया था. तारापीठ मंदिर निर्माण की कथा है कि एक बार जयब्रत नामक व्यापारी व्यापार के सिलसिले में तारापीठ के पास के गॉव में पहुंचा वहां रात्रि के अंतिम प्रहर में देवी तारा उसके सपने में आई और व्यापारी से कहा कि महाश्माशान के बीच में एक ब्रह्मशिला है उसे उखाड़कर विधिवत स्थापित करो. व्यापारी ने देवी के आदेश के अनुसार उस स्थान की खुदाई करवाकर ब्रह्मशिला को स्थापित किया. इसी स्थान पर जयब्रत ने देवी तारा का मंदिर बनवाया जिसमें देवी तारा की एक भव्यमूर्ति भी स्थापित करवाई. इस मूर्ति में देवी तारा की गोद में बाल रूप में भगवान शिव हैं जिस मॉ स्तनपान करा रही हैं. 

तारापीठ महाश्मशान | Tarapith Maha Shamshan

तारापीठ मंदिर का प्रांगण महाश्मशान में है फिर भी यहां किसी प्रकार का भय नहीं होता है. इस महाश्मशान की चिता कभी बुझती नहीं है. यह स्थान द्वारका नामक नदी घिरा हुआ है. यह भारतवर्ष की एक मात्र नदी है जो दक्षिण से उत्तर दिशा में यहां प्रवाहित होती है. 19 एवं 20 सदी के मध्य में यहां वामखेपा नामक एक भक्त ने देवी तारा की साधना करके उनसे सिद्धियां हासिल की थी. यह रामकृष्ण परमहंस के समान ही देवी के परम भक्तों में से एक थे.
Tarapith Shamshan

तारापीठ का महात्म्य | Tarapith Mahatmya

तारापीठ में देवी सती के नेत्र गिरे थे अत: इस स्थान को देवी तारा को नयन तारा भी कहा जाता है. तारापीठ का महात्म्य है कि यहां श्रद्धा-भक्ति के साथ देवी का ध्यान करके जो मुराद मांगा जाता है वह पूर्ण होता है. देवी तारा की सेवा आराधना से रोग से मुक्ति मिलती है. इस स्थान पर सकाम और निष्काम दोनों प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती है.


मेरी ब्लॉग सूची

  • World wide radio-Radio Garden - *प्रिये मित्रों ,* *आज मैं आप लोगो के लिए ऐसी वेबसाईट के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसमे आप ऑनलाइन पुरे विश्व के रेडियों को सुन सकते हैं। नीचे दिए गए ल...
    4 माह पहले
  • जीवन का सच - एक बार किसी गांव में एक महात्मा पधारे। उनसे मिलने पूरा गांव उमड़ पड़ा। गांव के हरेक व्यक्ति ने अपनी-अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी। एक व्यक्ति ने महात्मा से...
    6 वर्ष पहले

LATEST:


Windows Live Messenger + Facebook