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11 अक्तूबर 2011

श्री लक्ष्मीजी की आरती






महालक्ष्मी नमस्तुभ्यं, नमस्तुभ्यं सुरेश्र्वरी |
हरिप्रिये नमस्तुभ्यं, नमस्तुभ्यं दयानिधे ॥


ॐ जय लक्ष्मी माता मैया जय लक्ष्मी माता |
तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥ॐ जय लक्ष्मी माता....

उमा रमा ब्रम्हाणी तुम जग की माता |
सूर्य चद्रंमा ध्यावत नारद ऋषि गाता ॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

दुर्गारुप निरंजन सुख संपत्ति दाता |

जो कोई तुमको ध्याता ऋद्धि सिद्धी धन पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

तुम ही पाताल निवासनी तुम ही शुभदाता |
कर्मप्रभाव प्रकाशनी भवनिधि की त्राता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

जिस घर तुम रहती हो ताँहि में हैं सदगुण आता |
सब सभंव हो जाता, मन नहीं घबराता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

तुम बिन यज्ञ ना होता, वस्त्र न कोई पाता |
खान पान का वैभव, सब तुमसे आता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

शुभ गुण मंदिर सुंदर क्षीरनिधि जाता |
रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहीं पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

महालक्ष्मी जी की आरती जो कोई नर गाता |
उँर आंनद समाता पाप उतर जाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

स्थिर चर जगत बचावै कर्म प्रेर ल्याता |
रामप्रताप मैया जी की शुभ दृष्टि पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

ॐ जय लक्ष्मी माता मैया जय लक्ष्मी माता |
तुमको निसदिन सेवत हर विष्णु विधाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....

श्री लक्ष्मी चालीसा



॥ दोहा॥
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्घ करि, परुवहु मेरी आस॥

॥ सोरठा॥
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करुं।
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥

॥ चौपाई ॥
सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही।
ज्ञान बुद्घि विघा दो मोही ॥
तुम समान नहिं को‌ई उपकारी।
सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
जय जय जगत जननि जगदम्बा।
सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥
तुम ही हो सब घट घट वासी।
विनती यही हमारी खासी॥
जगजननी जय सिन्धु कुमारी।
दीनन की तुम हो हितकारी॥
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी।
कृपा करौ जग जननि भवानी॥
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी।
सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी।
जगजननी विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता।
संकट हरो हमारी माता॥
क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो।
चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी।
सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा।
रुप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा।
लीन्हे‌उ अवधपुरी अवतारा॥
तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं।
सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
अपनाया तोहि अन्तर्यामी।
विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी।
कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करै सेवका‌ई।
मन इच्छित वांछित फल पा‌ई॥
तजि छल कपट और चतुरा‌ई।
पूजहिं विविध भांति मनला‌ई॥
और हाल मैं कहौं बुझा‌ई।
जो यह पाठ करै मन ला‌ई॥
ताको को‌ई कष्ट न हो‌ई।
मन इच्छित पावै फल सो‌ई॥
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि।
त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी॥
जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै।
ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥
ताकौ को‌ई न रोग सतावै।
पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥
पुत्रहीन अरु संपति हीना।
अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै।
शंका दिल में कभी न लावै॥
पाठ करावै दिन चालीसा।
ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै।
कमी नहीं काहू की आवै॥
बारह मास करै जो पूजा।
तेहि सम धन्य और नहिं दूजा ॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माही।
उन सम को‌इ जग में कहुं नाहीं॥
बहुविधि क्या मैं करौं बड़ा‌ई।
लेय परीक्षा ध्यान लगा‌ई॥
करि विश्वास करै व्रत नेमा।
होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा॥
जय जय जय लक्ष्मी भवानी।
सब में व्यापित हो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं।
तुम सम को‌उ दयालु कहुं नाहिं॥
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै।
संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥
भूल चूक करि क्षमा हमारी।
दर्शन दजै दशा निहारी॥
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी।
तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्घि है तन में।
सब जानत हो अपने मन में॥
रुप चतुर्भुज करके धारण।
कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
केहि प्रकार मैं करौं बड़ा‌ई।
ज्ञान बुद्घि मोहि नहिं अधिका‌ई॥

॥ दोहा॥
त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास।
जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश ॥
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर।
मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥

दीपावली : पूजन सामग्री

जलभरा कलश (धातु का या मिट्टी का) ऊपर चावल भरी कटोरी उस पर नारियल। कलश में मौली बांध दीजिए तथा स्वास्तिक (सतिया) रोली से बनाइए। दीपक सजाकर रखिए। श्रीयंत्र, कनकधारा, कुबरे यंत्र हो तो थाली में रखिए और ‘‘श्री’’ रोली से लिखकर उस पर चांदी के सिक्के या कुछ आभूषण गहना रख लीजिए। पान (डंठल सहित) 11, सुपारी-11, कपूर, रोली, मौली, सिंदूर, अगरबत्ती, धूपबत्ती, चावल, दूब, दूध, पंचमेवा, कुछ फल, यज्ञोपवीत (जनेऊ) मिष्ठान्न, पुष्पमाला-5, कुछ गुलाब के फूल, इत्र की शीशी, लौंग, इलायची, एक किलो आम की लकड़ी, रूई, माचिस, कुछ खाली पात्र, एक जलभरा पूजन के लिए लोटा। (दूब का गच्छा लोटे में डाल लें) इस पूजा के लोटे में थोड़ा गुलाब जल व गंगाजल डाल लें। तुलसीदल, हल्दी, कमल, गट्टे, घी, एक पाव हवन सामग्री, गरी का गोला, केसर, वेदी या पात्र जिसमें हवन किया जाए।

-- पूजा विधि --

गणेश लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र (गणेश बाईं ओर लक्ष्मी दाईं ओर) चौकी पर स्थापित करें। नीचे लाल या पीला वस्त्र बिछावें जैसा कहा जाए वैसा करते रहें, मंत्र सुनते रहें या बोलें। मन में लक्ष्मी जी का ध्यान ‘‘महालक्ष्मी देव्यै नमः’’ कहते रहें।

दीपावली : रोचक तथ्य

दीपावली अपने आप में बहुत सी घटनाओं और प्रसंगों को समेटे हुए है। दीवाली केवल भगवान श्री राम के अयोध्या आगमन पर दीप जलाकर स्वागत और खुशियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि दीवाली और भी बहुत कुछ है। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ रोचक तथ्यों को-

जब शिव लेटे चरणों में
राक्षसों का संहार करने के बाद जब महाकाली का क्रोध शांत नहीं हुआ तो भगवान शिव उनके चरणों में लेट गए। भगवान भोलेनाथ के स्पर्श मात्र से ही महाकाली का क्रोध शांत हो गया। इसलिए दीवाली के दिन देवी के शांत स्वरूप लक्ष्मी की पूजा की जाती है। दीवाली की ही रात महाकाली की पूजा का भी विधान है।

नरकासुर का वध
दीवाली से एक दिन पहले चतुर्दशी को श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध किए जाने की खुशी में अगले दिन अमावास्या को ब्रजवासियों ने दीए जलाए थे।

तीन पगों में नापे ‌तीनों लोक
भगवान वामन ने राजा बलि की पृथ्वी तथा शरीर को तीन पगों में इसी दिन नाप लिया था। राजा बलि की दानशीलता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राज्य देते हुए कहा कि उनकी याद में पृथ्वीवासी हर साल दीवाली का त्योहार मनाएंगे।

इतिहास और दीवाली

सम्राट विक्रामादित्य का राज्याभिषेक दीवाली के दिन हुआ था। कार्तिक अमावस्या के दिन सिखों के छठे गुरु हरगोविन्दसिंहजी बादशाह जहांगीर की कैद से मुक्त होकर अमृतसर वापस लौटे थे। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का निर्माण भी दीवाली के ही दिन शुरू हुआ था। 2500 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के समर्थकों ने उनके स्वागत में लाखों दीपक जलाकर दीवाली मनाई थी।

जैन धर्म में दीपावाली
जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने भी दीपावली के दिन ही बिहार के पावापुरी में शरीर त्यागा था। महावीर-निर्वाण संवत इसके दूसरे दिन से शुरू होता है। इसलिए अनेक प्रातों में इसे वर्ष के आरंभ की शुरूआत मानते हैं। दीपोत्सव का उल्लेख प्राचीन जैन ग्रंथों में मिलता है। कल्पसूत्र में कहा गया है, ‘महावीर-निर्वाण के साथ जो अन्तर्ज्योति सदा के लिए बुझ गई है, आओ हम उसकी क्षतिपूर्ति के लिए बहिर्ज्योति के प्रतीक दीपक जलाएं।’

आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानंद ने दीवाली के दिन अजमेर के पास अवसान लिया था। स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दीवाली के दिन हुआ था।

मुगलों की दीपावली
मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने 40 गज ऊंचे बांस पर एक बड़ा आकाशदीप दीपावली के दिन लटकाया जाता था। बादशाह जहांगीर भी दीवाली धूमधाम से मनाते थे। बहादुर शाह जफर से लेकर शाह आलम द्वितीय तक के समय में भी दीपोत्सव मनाया जाता था। यहां तक की लाल किले में कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे जिसमें हिन्दू और मुसलमान सौहार्द के साथ भाग लेते थे।

प्राचीन सभ्यता में दीपावाली
500 ईसा वर्ष पूर्व मोहनजोदड़ो सभ्‍यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीवाली मनाई जाती थी।

दीपावली की कथा


एक बार देवराज इन्द्र से भयभीत होकर दैत्यराज बलि कहीं जा छिपा। इन्द्र ने उसे ढूंढने का बहुत प्रयत्न किया तभी उन्होंने देखा कि बलि गधे का रूप धारण कर एक खाली घर में समय व्यतीत कर रहा है। इन्द्र वहां पहुंचे और बलि से उनकी बातचीत होने लगी। बलि ने इन्द्र को तत्वज्ञान का उपदेश देते हुए काल समय की महत्ता समझाई। उनमें बातचीत चल ही रही थी कि उसी समय दैत्यराज बलि के शरीर से अत्यन्त दिव्यरूपी एक स्त्री निकली।

उसे देखकर इन्द्र ने पूछा—हे दैत्यराज! तुम्हारे शरीर से निकलने वाली यह आभायुक्त स्त्री देवी है अथवा आसुरी या मानवी’

दैत्यराज बलि ने उत्तर दिया—‘राजन, यह देवी है न आसुरी और न ही मानवी। यदि तुम इसके संबन्ध में अधिक जानना चाहते हो तो फिर इसी से पूछो।’

इतना सुनकर इन्द्र ने हाथ जोड़कर पूछा—‘देवी, तुम कौन हो और दैत्यराज का परित्याग कर मेरी ओर क्यों बढ़ रही हो?’

तब मुस्कुराती हुई शक्तिरूपा स्त्री बोली—‘हे देवेन्द्र, मुझे न तो दैत्यराज प्रह्लाद के पुत्र विरोचन ही जानते हैं और न उनके पुत्र यह बलि ही।

शास्त्रवेत्ता मुझे दुस्सहा, भूति और लक्ष्मी के नामों से पुकारते हैं, परन्तु तुम तथा अन्य देवगण मुझे भली प्रकार नहीं पहचानते।’

इन्द्र ने प्रश्न किया—‘हे देवी, जब इतने दीर्घकाल तक आपने दैत्यराज में वास किया है तो फिर अब इनमें ऐसा कौन-सा दोष उत्पन्न हो गया, जो आप इनका परित्याग कर रही हैं? आप यह भी बताने की कृपा कीजिए कि आपने मुझमें ऐसा कौन-सा गुण देखा है, जो मेरी ओर अग्रसर हो रही हैं।’

लक्ष्मी जी ने उत्त दिया—‘हे आर्य, मैं जिस स्थान पर निवास कर रही हूं, वहां से मुझे विधाता नहीं हटा सकता क्योंकि मैं सदैव समय के प्रभाव से ही एक को त्याग कर दूसरे के पास जाती हूं। इसलिए तुम बलि का अनादर न कर ते हुए इनका सम्मान करो।’

इन्द्र ने पूछा—‘हे देवी, कृपा कर यह बताइये कि अब आप असुरों के पास क्यों नहीं रहना चाहतीं?’

उपवास एवं तप

लक्ष्मी जी बोलीं— ‘मैं उसी स्थान पर रहती हूं, जहां सत्य, दान, व्रत, तप, पराक्रम तथा धर्म रहते हैं। इस समय असुर इससे परामुख हो गए हैं। पूर्वजन्म में यह सत्यवादी जितेन्द्रिय तथा ब्राह्मणों के हितैषी थे, परंतु अब यह ब्राह्मणों से द्वेष करने लगे हैं। जूठे हाथों से घृत छूते हैं और अभक्ष्य भोजन करते हैं। साथ ही धर्म की मर्यादा तोड़कर विभिन्न प्रकार के मनमाने आचरण करते हैं। पहले ये उपवास एवं तप करते थे, प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व जागते थे और यथासमय सोते थे। परंतु अब यह देर से जागते तथा आधी रात के बाद सोते हैं। पूर्वकाल में यह दिन में शयन नहीं करते थे। दीन-दुखियों, अनाथों, वृद्ध, रोगी तथा शक्ति हीनों को नहीं सताते थे और उनकी अन्न आदि से हर प्रकार की सहायता करते थे। पहले ये गुरुजन के आज्ञाकारी तथा सभी काम समय पर करते थे। उत्तम भोजन बनाकर अकेले नहीं खाते थे, वरन् पहले दूसरों को देकर बाद में स्वयं ग्रहण करते थे। प्राणीमात्र को समान समझते हुए इनमें सौहार्द, उत्साह, निरहंकार, सत्य, क्षमा, दया दान, तप एवं वाणी में सरलता आदि सभी गुण विद्यमान थे। मित्रों से प्रेम-व्यवहार करते थे। परंतु अब इनमें क्रोध की मात्रा बढ़ गई है। आलस्य, निद्रा, अप्रसन्नता, असंतोष, कामुकता तथा विवेकहीनता आदि दुर्गुणों की एकता बढ़ गई है।

कांति क्षीण

अब इनकी सभी बातें नियम-विरुद्ध होने लगी हैं। बड़े-बूढ़ों का सम्मान व आज्ञा-पालन न कर उनका अनादर करते हैं तथा गुरुजन के आने पर आसन छोड़कर नहीं खड़े होते। संतान का विधि से भली प्रकार पालन-पोषण नहीं करते। इन सब कारणों से इनके शरीर व चेहरे की कांति क्षीण हो रही है। परस्त्रीगमन, परस्त्री हरण, जुआ, शराब, चोरी आदि दुर्गुण अधिक आ जाने के कारण इनकी धार्मिक आस्था कम हो गई है। अतः हे देवराज इन्द्र, मैंने निश्चय किया है कि अब मैं इनके घर में वास नहीं करूंगी। इसी कारण मैं दैत्यों का परित्याग कर तुम्हारी ओर आ रही हूं। तुम प्रसन्नतापूर्वक मुझे अंगीकार करो। जहां मेरा वास होगा, वहां आशा, श्रद्धा, धृति, शांन्ति, जय, क्षमा, विजित और संगीत—ये आठ देवियां भी निवास करेंगी। चूंकि तुम देवों में अब धार्मिक भावना बढ़ गई है, इसलिए अब मैं तुम्हारे यहां ही वास करूंगी। कथा का सार यही है कि जो भी व्यक्ति लक्ष्मी को पाना चाहता है, उसे तद्नुकूल ही आचरण करना चाहिए।’

लक्ष्मी-गणेश पूजन क्यों?



यूं तो गणेश जी अपनी पत्नियों देवी रिद्धि और सिद्धि के साथ पूजे जाते हैं लेकिन दीपावली के दिन श्री लक्ष्मी-गणेश जी की पूजा का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन लक्ष्मी-गणेश पूजन करने से विघ्नों का नाश होता है व घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं रहती। लक्ष्मी के साथ गणेश जी का पूजन क्यों? क्योंकि लक्ष्मी धन-धान्य और समृद्धि का प्रतीक है और ये सब बिना विवेक किसी के पास ज्यादा समय तक नहीं रह सकते। समृद्घि के लिए विवेक का होना बहुत जरूरी है और गणेश जी विवेक और बुद्धि के देवता है। बिना विवेक के लक्ष्मी कहीं भी नहीं टिक सकती इसीलिए दीपावली की रात को लक्ष्मी के साथ गणेश जी का भी पूजन किया जाता है। वैसे शास्त्र में यह भी कहा गया है की इस दौरान विष्णुजी शयनकाल में रहते हैं इसलिए लक्ष्मीजी के साथ गणेशजी की पूजा की जाती है..

लक्ष्मी और गणेश
परंपरानुसार दीपावली की रात गणेशजी और लक्ष्मीजी को एक ही वेदी पर बैठाया जाता है, जहां लक्ष्मी दाहिनी ओर तथा गणेश जी बाईं और विराजते हैं। हिंदू मान्यता के अनुसार लक्ष्मीजी और गणेशजी एक दूसरे से भिन्न है। जहां प्रत्येक शुभ कार्य की शुरूआत और विघ्नों का नाश करने वाले देवता गणेशजी शिव और पार्वती के पुत्र हैं वहीं धन की देवी लक्ष्मीजी श्री हरि विष्णु जी की पत्नी हैं। हिंदू मान्यता के अनुसार गणेशजी बहुत सारे कार्य करते हैं। वह विघ्नों को नाश करने वाले हैं। जबकि सोने के पत्तों वाले कमल पर आसीन लक्ष्मीजी धन, संपन्नता, सुंदरता, दया और आकर्षण की देवी हैं। लेकिन जब लक्ष्मी और गणेश की पूजा एक साथ की जाती है दोनों ही भगवान अपने भक्त को वर्ष भर इच्छाओं की पूर्ति का वचन देते हैं। इसलिए लक्ष्मीजी और श्रीगणेश की पूजा साथ-साथ की जाती है।

क्यों होता है दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश पूजन?



(वेद हिंदुओं का प्राचीनतम धार्मिक ग्रंथ है। यह हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति के मूल्यवान भंडार हैं। हमारे ऋषि-मुनियों ने युगों तक चिंतन-मनन कर इस सृष्टि के रहस्यों की जानकारी इस ग्रंथ में संग्रहित की है। बहुत से देशों के विद्वान आज भी इस प्राचीन ग्रंथ का अध्ययन कर रहे हैं।)

गणेश-लक्ष्मी पूजन की कथा


एक बार की बात है, एक राजा ने किसी लकड़हारे पर प्रसन्न होकर उसे चंदन की लकड़ी का पूरा जंगल दे दिया। लेकिन लकड़हारा बुद्धू और गंवार था। वह चंदन की लकड़ी का महत्व नहीं समझता था। धीरे-धीरे उसने पूरा जंगल साफ कर दिया और पुनः अपनी बदहाल अवस्था में पहुंच गया क्योंकि वह सारी लकड़ियां भोजन पकाने में जला चुका था।

राजा ने सोचा यह सच है कि बुद्धि होती है तभी लक्ष्मी अर्थात धन का संचय किया जा सकता है। गणपति बुद्धि के स्वामी हैं, बुद्धि-दाता हैं। यही कारण है कि लक्ष्मी एवं गणपति की एक साथ पूजा का विधान है ताकि धन और बुद्धि एक साथ मिलें।

एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार एक साधु के मन में राजसी सुख भोगने का विचार आया। यह सोचकर उसने लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या शुरू कर दी। लक्ष्मीजी प्रसन्न हुईं और उसे मनोवांछित वरदान दे दिया। वरदान को सफल करने के लिए वह साधु एक राजा के दरबार में पहुंचा और सीधा सिंहासन के पास पहुंचकर झटके से राजा का मुकुट नीचे गिरा दिया।

यह देखकर राजा और सभासदों की भृकुटियां तन गईं। किंतु तभी मुकुट में से एक विषैला सर्प निकला। यह देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और सोचा कि इस साधु ने सर्प से उसकी रक्षा की है। इसलिए उसे अपना मंत्री बना लिया।

एक बार साधु ने सभी को फौरन राजमहल से बाहर जाने को कहा। राजमहल में सभी उनके चमत्कार को नमस्कार करते थे। इसलिए सभी ने राजमहल खाली कर दिया। अगले ही क्षण वह धड़धड़ाता हुआ खडंहर बन गया। सभी ने उसकी प्रंशसा की। अब साधु के कहे अनुसार सभी कार्य होने लगे। यह सब देखकर साधु के मन में अहंकार उत्पन्न हो गया और वह स्वयं के आगे सबको तुच्छ समझने लगा।

एक दिन राजमहल के एक कक्ष में उसने गणेशजी की प्रतिमा देखी। उसने आदेश देकर वह मूर्ति वहां से हटवा दी। एक दिन दरबार लगा था। साधु ने राजा से कहा- “महाराज! आप अपनी धोती तुरंत उतार दें, इसमें सर्प है।” राजा उनका चमत्कार पहले भी देख चुका था, इसलिए उसने धोती उतार दी। लेकिन उसमें सर्प नहीं निकला।

यह देख राजा को बहुत क्रोध आया। उसने साधु को काल कोठरी में डलवा दिया। साधु पुनः तप करने लगा। स्वप्न में लक्ष्मी ने उससे कहा-“मूर्ख! तूने राजमहल से गणेशजी की मूर्ति हटवा दी। वे बुद्धि के देवता हैं। तूने उन्हें रुष्ट कर दिया, इसलिए उन्होंने तेरी बुद्धि हर ली।”

साधु को अपनी गलती का पता चला। तब उसने गणपति को प्रसन्न किया। गणपति के प्रसन्न होते ही राजा कालकोठरी में गया और साधु से क्षमा मांग कर उसे पुनः मंत्री बना दिया। मंत्री बनते ही साधु ने गणपति को पुनः स्थापित किया। साथ ही वहां लक्ष्मी की मूर्ति भी स्थापित की।

इस प्रकार कहा गया है कि धन के लिए बुद्धि का होना आवश्यक है। दोनों साथ होंगी तभी मनुष्य सुख एवं समृद्धि में रह सकता है। यही कारण है कि दिवाली पर लक्ष्मी एवं गणेश के रूप में धन एवं बुद्धि की पूजा होती है।

(साभारः वेदों की कथाएं, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

मेरी ब्लॉग सूची

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