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18 अक्तूबर 2011

JAI SHRI SHAYAM OR BARBARIK


बर्बरीक जो बाबा श्याम बने



ये महान पाण्डव भीम के पुत्र घटोत्कच और नाग कन्या अहिलवती के पुत्र थे। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान यौद्धा थे। उन्होंने युद्ध कला अपनी माँ से सीखी। भगवान शिव की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अभेद्य बाण प्राप्त किये और तीन बाणधारी का प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। अग्नि देव ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जो कि उन्हें तीनो लोकों में विजयी बनाने में समर्थ था। महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य अपरिहार्य हो गया था, यह समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुये तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा जाग्रत हुई। जब वे अपनी माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुँचे तब माँ को हारे हुये पक्ष का साथ देने का वचन दिया। वे अपने नीले घोडे, जिसका रंग नीला था, पर तीन बाण और धनुष के साथ कुरूक्षेत्र की रणभूमि की ओर अग्रसर हुये।

सर्वव्यापी कृष्ण ने ब्राह्मण वेश धारण कर बर्बरीक से परिचित होने के लिये उसे रोका और यह जानकर उनकी हँसी भी उडायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आया है। ऐसा सुनने पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को ध्वस्त करने के लिये पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापिस तरकस में ही आयेगा। यदि तीनों बाणों को प्रयोग में लिया गया तो तीनों लोकों में हाहाकार मच जायेगा। इस पर कृष्ण ने उन्हें चुनौती दी की इस पीपल के पेड़ के सभी पत्रों को छेद कर दिखलाओ, जिसके नीचे दोनो खड़े थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तूणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया। तीर ने क्षण भर में पेड़ के सभी पत्तों को भेद दिया और कृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होनें अपने पैर के नीचे छुपा लिया था, बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिये नही तो ये आपके पैर को चोट पहुँचा देगा। कृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर से सम्मिलित होगा तो बर्बरीक ने अपनी माँ को दिये वचन दोहराये कि वह युद्ध में उस ओर से भाग लेगा जो कि निर्बल हो और हार की ओर अग्रसर हो। कृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की ही निश्चित है, और इस पर अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम उनके पक्ष में ही होगा।
ब्राह्मण ने बालक से दान की अभिलाषा व्यक्त की, इस पर वीर बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया कि अगर वो उनकी अभिलाषा पूर्ण करने में समर्थ होगा तो अवश्य करेगा। कृष्ण ने उनसे शीश का दान माँगा। बालक बर्बरीक क्षण भर के लिये चकरा गया, परन्तु उसने अपने वचन की दृढ़ता जतायी। बालक बर्बरीक ने ब्राह्मण से अपने वास्तविक रूप से अवगत कराने की प्रार्थना की और कृष्ण के बारे में सुन कर बालक ने उनके विराट रूप के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त की, कृष्ण ने उन्हें अपना विराट रूप दिखाया। उन्होनें बर्बरीक को समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पहले युद्धभूमि की पूजा के लिये एक वीर्यवीर क्षत्रिय के शीश के दान की आवश्यकता होती है, उन्होनें बर्बरीक को युद्ध में सबसे वीर की उपाधि से अलंकृत किया, अतैव उनका शीश दान में माँगा। बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वह अंत तक युद्ध देखना चाहता है, श्री कृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। फाल्गुन माह की द्वादशी को उन्होनें अपने शीश का दान दिया। भगवान ने उस शीश को अमृत से सींच कर सबसे ऊँची जगह पर रख दिया, ताकि वह महाभारत युद्ध देख सके। उनका सिर युद्धभूमि के समीप ही एक पहाडी पर सुशोभित किया गया, जहां से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे। युद्ध की समाप्ति पर पांडवों में ही आपसी तनाव हुआ कि युद्ध में विजय का श्रेय किस को जाता है, इस पर कृष्ण ने उन्हें सुझाव दिया कि बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है अतैव उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है। सभी इस बात से सहमत हो गये। बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि कृष्ण ही युद्ध मे विजय प्राप्त कराने में सबसे महान पात्र हैं, उनकी शिक्षा, उनकी उपस्थिति, उनकी युद्धनीति ही निर्णायक थी। उन्हें युद्धभूमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जो कि शत्रु सेना को काट रहा था, महाकाली दुर्गा कृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थीं। कृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफ़ी प्रसन्न हुये और वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे, क्योंकि कलियुग में हारे हुये का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ है। खाटूनगर तुम्हारा धाम बनेगा। उनका शीश खाटू में दफ़नाया गया। एक बार एक गाय उस स्थान पर आकर अपने स्तनों से दुग्ध की धारा स्वतः ही बहा रही थी, बाद में खुदायी के बाद वह शीश प्रकट हुआ, जिसे कुछ दिनों के लिये एक ब्राह्मण को सुपुर्द कर दिया गया। एक बार खाटू के राजा को स्वप्न में मन्दिर निर्माण के लिये और वह शीश मन्दिर में सुशोभित करने के लिये प्रेरित किया गया। तदन्तर उस स्थान पर मन्दिर का निर्माण किया गया और कार्तिक माह की एकादशी को शीश मन्दिर में सुशोभित किया गया, जिसे बाबा श्याम के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। खाटू श्याम जी का मुख्य मंदिर राजस्थान के सीकर ज़िले के गांव खाटू में बना हुआ है।

प्रेम से बोलो : खाटू नरेश  की जय!
जोर से बोलो : तीन बाणधारी की जय!!
सभी बोलो : लिले के असवार की जय!!!
प्यारे बोलो : शीश के दानी की जय!!!!
हरदम बोलो : जय श्री श्याम!!!!!!

KHATUSHYAMJI, RAJASTHAN

खाटूश्यामजी मंदिर में
अब टोकन से होंगे दर्शन!



करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केन्द्र विश्व प्रसिद्ध खाटू स्थित श्याम प्रभु के मंदिर में दक्षिण भारत के मंदिरों की तर्ज पर कूपन से दर्शन सुविधा शुरू करने पर विचार चल रहा है। अगर यह व्यवस्था शुरू हो गई तो यह राज्य का पहला मंदिर होगा।

इस व्यवस्था के तहत श्रद्धालु को तय राशि का कूपन दिया जाएगा। कूपन प्रतिदिन से लेकर मासिक, सालाना अवधि के होंगे। इसके राशि अभी तय नहीं हुई है। लेकिन सूत्रों से पता चला है कि न्यूनतम कूपन 1100 रुपए का होगा। श्री श्याम मंदिर कमेटी के नए अध्यक्ष शम्भू सिंह इस नई व्यवस्था को लागू करने पर जोर दे रहे हैं। हालांकि अभी कमेटी के सभी सदस्यों की इश पर सहमति नहीं बनी है। पारिवारिक विवाद के चलतेे अभी इस व्यवस्था पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। उल्लेखनीय है कि गत खाटू मेले की तैयारियों को लेकर संपन्न हुई बैठक में भी कूपन सिस्टम लागू करने का मुद्दा उठा था। लेकिन मेला नजदीक होने से कूपन व्यवस्था लागू नहीं हो पाई।

हालांकि बैठक में इस व्यवस्था के विरोध में भी स्वर उठे। गौरतलब है कि शम्भू सिंह, राजेन्द्र सिंह की जगह अध्यक्ष बने है। राजेन्द्र सिंह का हाल ही में निधन हो गया था। शम्भू सिंह राजेन्द्र सिंह के छोटे भाई है। शम्भू सिंह ने कार्यभार संभालते ही कुछ नए नियम लागू करने की शुरुआत कर दी है। सवामणी के लिए नए काउंटर बनाए जा रहे है। प्रतिदिन कितनी सवामणी हो रही है। सवामणी कराने वाले का नाम सहित विभिन्न जानकारी सबको मिलेगी।

शम्भू सिंह कुछ पारिवारिक विवादों को निपटाने में भी रूचि ले रहे हैं। गौरतलब है कि खाटू नरेश के दरबार में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु दर्शन पहुंचते हैं। एकादशी-द्वादशी को तो अन्य राज्यों के श्रद्धालु भी आते हैं। इनमें ज्यादातर प्रवासी राजस्थानी होते हैं।

ये मंदिर कमेटी को सालाना मोटा चंदा देते हैं। मंदिर कमेटी इनके दर्शनों के लिए वीआईपी व्यवस्था रखती है। इन्हें मंदिर कमेटी कार्यालय के गेट से प्रवेश कराकर दर्शन कराया जाता है। लेकिन कई बार इसमें गड़बड़ी हो जाती है। कमेटी सदस्य से सम्पर्क नहीं होने से अन्य राज्यों से आए श्रद्धालुओं को काफी इंतजार करना पड़ता है। स्वयंसेवक इन्हें वीआईपी गेट से जाने से रोक देते हैं। इसलिए कमेटी ने इस व्यवस्था को नियमित ही करने का मानस बना लिया है हालांकि इसके विरोध से भी इंकार नहीं किया जा रहा

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