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08 नवंबर 2011

Vastushastra in your Life

दिशाओं में छुपी है सुखी होने का राज



दिशाओं के ज्ञान को ही वास्तु कहते हैं। यह एक ऐसी पद्धति का नाम है, जिसमें दिशाओं को ध्यान में रखकर भवन निर्माण व उसका इंटीरियर डेकोरेशन किया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि वास्तु के अनुसार भवन निर्माण करने पर घर-परिवार में खुशहाली आती है।

वास्तु में दिशाओं का बड़ा महत्व है। अगर आपके घर में गलत दिशा में कोई निर्माण होगा, तो उससे आपके परिवार को किसी न किसी तरह की हानि होगी, ऐसा वास्तु के अनुसार माना जाता है। वास्तु में आठ महत्वपूर्ण दिशाएँ होती हैं, भवन निर्माण करते समय जिन्हें ध्यान में रखना नितांत आवश्यक है। ये दिशाएँ पंचतत्वों की होती हैं।

किस दिशा का क्या है महत्व :-

उत्तर दिशा :- इस दिशा में घर के सबसे ज्यादा खिड़की और दरवाजे होना चाहिए। घर की बालकनी व वॉश बेसिन भी इसी दिशा में होना चाहिए। इस दिशा में यदि वास्तुदोष होने पर धन की हानि व करियर में बाधाएँ आती हैं। इस दिशा की भूमि का ऊँचा होना वास्तु में अच्छा माना जाता है।

दक्षिण दिशा :- इस दिशा की भूमि भी तुलनात्मक रूप से ऊँची होना चाहिए। इस दिशा की भूमि पर भार रखने से गृहस्वामी सुखी, समृद्ध व निरोगी होता है। धन को भी इसी दिशा में रखने पर उसमें बढ़ोतरी होती है। दक्षिण दिशा में किसी भी प्रकार का खुलापन, शौचालय आदि नहीं होना चाहिए।

पूर्व दिशा :- पूर्व दिशा सूर्योदय की दिशा है। इस दिशा से सकारात्मक व ऊर्जावान किरणें हमारे घर में प्रवेश करती हैं। गृहस्वामी की लंबी उम्र व संतान सुख के लिए घर के प्रवेश द्वार व खिड़की का इस दिशा में होना शुभ माना जाता है। बच्चों को भी इसी दिशा की ओर मुख करके पढ़ना चाहिए। इस दिशा में दरवाजे पर मंगलकारी तोरण लगाना शुभ होता है।

पश्चिम दिशा :- इस दिशा की भूमि का तुलनात्मक रूप से ऊँचा होना आपकी सफलता व कीर्ति के लिए शुभ संकेत है। आपका रसोईघर व टॉयलेट इस दिशा में होना चाहिए।

उत्तर-पूर्व दिशा :- ‘ईशान दिशा’ के नाम से जानी जाने वाली यह दिशा ‘जल’ की दिशा होती है। इस दिशा में बोरिंग, स्वीमिंग पूल, पूजास्थल आदि होना चाहिए। घर के मुख्य द्वार का इस दिशा में होना वास्तु की दृष्टि से बेहद शुभ माना जाता है।

उत्तर-पश्चिम दिशा :- इसे ‘वायव्य दिशा’ भी कहते हैं। यदि आपके घर में नौकर है तो उसका कमरा भी इसी दिशा में होना चाहिए। इस दिशा में आपका बेडरूम, गैरेज, गौशाला आदि होना चाहिए।

दक्षिण-पूर्व दिशा :- यह ‘अग्नि’ की दिशा है इसलिए इसे आग्नेय दिशा भी कहते हैं। इस दिशा में गैस, बॉयलर, ट्रांसफॉर्मर आदि होना चाहिए।

दक्षिण-पश्चिम दिशा :- इस दिशा को ‘नैऋत्य दिशा’ भी कहते हैं। इस दिशा में खुलापन अर्थात खिड़की, दरवाजे बिल्कुल ही नहीं होना चाहिए। गृहस्वामी का कमरा इस दिशा में होना चाहिए। कैश काउंटर, मशीनें आदि आप इस दिशा में रख सकते हैं।

पुराने समय में गृहनिर्माण वास्तु के अनुसार ही होता था, जिससे घर में धन-धान्य व खुशहाली आती थी। आजकल हममें से हर किसी की जिंदगी में आपाधापी व तनाव ही तनाव है। जिससे मुक्ति के लिए हम तरह-तरह के टोटके व प्रयोग करते हैं।

वास्तु तनाव व परेशानियों से मुक्ति की एक अच्छी पद्धति हो सकती है। वास्तु की कुछ बातें ध्यान में रखकर आप अपने जिंदगी में परिवर्तन की उम्मीद तो कर सकते हैं किंतु पूर्णत: परिवर्तन तभी होगा, जब आप स्वयं अपने व्यवहार व कार्यशैली में सकारात्मक परिवर्तन लाएँ।

सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती हैं दिशाएं—

आवास या कार्यालय का निर्माण करते समय दिशाओं का सदैव ध्यान रखना चाहिए। सहीं दिशाओं का निर्धारण नहीं होने के कारण हमें नकारात्मक ऊर्जा मिलती रहेगी और कोई भी काम व्यवस्थित रूप से संपन्न नहीं हो सकेगा। किसी भी का निर्माण करने से पूर्व वास्तु शास्त्र की सहायता से हम अधिक ऊर्जावान बन सकते हैं। यह सकारात्मक ऊर्जा कर्म के साथ ही भाग्योदय में भी सहायक होती हैं। जानें दिशाओं के विषय में कुछ तथ्य-

उत्तर दिशा से चुम्बकीय तरंगों का भवन में प्रवेश होता हैं। चुम्बकीय तरंगे मानव शरीर में बहने वाले रक्त संचार एवं स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। अतः स्वास्थ्य की दृष्टि से इस दिशा का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ जाता हैं। स्वास्थ्रू के साथ ही यह धन को भी प्रभावित करती हैं। इस दिशा में निर्माण में कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना आवश्यक हैं मसलन उत्तर दिशा में भूमि तुलनात्मक रूप से नीची होना चाहिए तथा बालकनी का निर्माण भी इसी दिशा में करना चाहिए। बरामदा, पोर्टिको और वाश बेसिन आदि इसी दिशा में होना चाहिए।

उत्तर-पूर्व दिशा में देवताओं का निवास होने के कारण यह दिशा दो प्रमुख ऊजाओं का समागम हैं। उत्तर दिशा और पूर्व दिशा दोनों इसी स्थान पर मिलती हैं। अत इस दिशा में चुम्बकीय तरंगों के साथ-साथ सौर ऊर्जा भी मिलती हैं। इसलिए इसे देवताओं का स्थान अथवा ईशान दिशा कहते हैं। इस दिशा में सबसे अधिक खुला स्थान होना चाहिए। नलकूप एवं स्वीमिंग पुल भी इसी दिशा में निर्मित कराना चाहिए। घर का मुख्य द्वार इसी दिशा में शुभकारी होता हैं।

पूर्व दिशा ऐश्वर्य व ख्याति के साथ सौर ऊर्जा प्रदान करती हैं। अतः भवन निर्माण में इस दिशा में अधिक से अधिक खुला स्थान रखना चाहिए। इस दिशा में भूमि नीची होना चाहिए। दरवाजे और खिडकियां भी पूर्व दिशा में बनाना उपयुक्त रहता हैं। पोर्टिको भी पूर्व दिया में बनाया जा सकता हैं। बरामदा, बालकनी और वाशबेसिन आदि इसी दिशा में रखना चाहिए। बच्चे भी इसी दिशा में मुख करके अध्ययन करें तो अच्छे अंक अर्जित कर सकते हैं।

उत्तर-पश्चिम दिशा में भोजन कक्ष बनाएं यह दिशा वायु का स्थान हैं। अतः भवन निर्माण में गोशाला, बेडरूम और गैरेज इसी दिशा में बनाना हितकर होता है। सेवक कक्ष भी इसी दिशा में बनाना चाहिए।

पश्चिम दिशा में टायलेट बनाएं यह दिशा सौर ऊर्जा की विपरित दिशा हैं अतः इसे अधिक से अधिक बंद रखना चाहिए। ओवर हेड टेंक इसी दिशा में बनाना चाहिए। भोजन कक्ष, दुछत्ती, टाइलेट आदि भी इसी दिशा में होना चाहिए। इस दिशा में भवन और भूमि तुलनात्मक रूप से ऊँची होना चाहिए।

दक्षिण-पश्चिम दिशा में मुखिया का कक्ष सबसे अच्छा वास्तु नियमों में इस दिशा को राक्षस अथवा नैऋत्व दिशा के नाम से संबोधित किया गया हैं। परिवार के मुखिया का कक्ष इसी दिशा में उपयुक्त होता है। परिवार के मुखिया का कक्ष इसी दिशा में होना चाहिए। सीढ़ियों का निर्माण भी इसी दिशा में होना चाहिएै इस दिशा में खुलापन जैसे खिड़की, दरवाजे आदि बिल्कुल न निर्मित करें। किसी भी प्रकार का गड्ढा, शौचालय अथवा नलकूप का इस दिशा मंा वास्तु के अनुसार वर्जित हैं।

दक्षिण-पूर्व दिशा में किचिन, सेप्टिक टेंक बनाना उपयुक्त होता है। यह दिशा अग्नि प्रधान होती हैं अतः इस दिशा में अग्नि से संबंधित कार्य जैसे कि किचिन, ट्रांसफार्मर, जनरेटर ब्वायलर आदि इसी दिशा में होना चाहिए। सेप्टिक टेंक भी इसी दिशा में बनाना ठीक रहता हैं।

दक्षिण दिन यम की दिशा है यहां धन रखना उत्तम होता हैं। यम का आशय मृत्यु से होता है। इसलिए इस दिशा में खुलापन, किसी भी प्रकार के गड्ढे और शैचालय आदि किसी भी स्थिति में निर्मित करें। भवन भी इस दिशा में सबसे ऊंचा होना चाहिए। फैक्ट्री में मशीन इसी दिशा में लगाना चाहिए। ऊंचे पेड़ भी इसी दिशा में लगाने चाहिए। इस दिशा में धन रखने से असीम वृद्धि होती हैं। कोई भी जातक इन दिशाओं के अनुसार कार्यालय, आवास, दुकान फैक्ट्री का निर्माण कर धन-धान्य से परिपूर्ण हो सकता हैं।

दिशाएँ—-

वास्तु विज्ञान∕शास्त्र जिसे भवन निर्माण कला में दिशाओं का विज्ञान भी कहा जा सकता है, इसे समझाने के लिए सर्वप्रथम दिशाओं के विषय में जानना आवश्यक है। हम सभी जानते हैं कि धरातल स्तर (Two dimension) में आठ दिशाएँ होती हैं – पूर्व, ईशान, उत्तर, वायव्य, पश्चिम, नैऋत्य, दक्षिण व आग्नेय।

ऊपर आकाश व नीचे पाताल को सम्मिलित करने पर (Three dimension) 10 दिशाओं में पूरा भूमंडल∕संसार व्याप्त है अथवा कहा जा सकता है कि पूरे विश्व को एक स्थल में केन्द्र मानकर 10 दिशाओं में व्यक्त किया जा सकता है।


विदिशा भूखण्ड व विदिशा में निर्माण—

मुख्य दिशाएँ वास्तु या मकान की मध्य रेखा से 22.5 अंश या ज्यादा घूमी हुई हो तो ऐसे वास्तु को विदिशा में बना मकान या वास्तु कहा जाता है। ऐसे विदिशा मकान में वास्तु के उक्त सभी नियम व प्रभाव पूरी तरह नहीं लागू होते। ऐसे वास्तु ज्यादातर शुभ नहीं होते और वहाँ शुभ फल केवल निम्न कुछ दिशाओं में ही प्राप्त होता है अधिकतर ऐसे दिशाओं में बने मकान आदि धीमी गतिवाले, अशुभफलदायक और कई दशा में अत्यन्त हानिकारक परिणाम दर्शाते हैं।

विदिशा में अच्छे फलदायक मकान या वास्तु बनाने के नियमः

प्रवेश द्वार केवल ईशान दिशा से होने से ही विशिष्ट मंगलकारी होता है। मध्य पूर्व अथवा मध्य उत्तर से भी प्रवेश शुभ होता है।

विदिशा प्लाट में कमरे, मकान या वास्तु केवल ईशान और नैऋत्य दिशा को लम्बाई में रखकर बनाना हितकारी मंगलकारी है।

विदिशा प्लाट के ईशान में नैऋत्य से अधिक खाली जगह व ईशान को हल्का न नीचा रखना चाहिए।

अग्नि व वायव्य दिशा में एकदम बराबर खाली जगह रखना चाहिए।

उक्त 4 नियमों व लक्षणों से युक्त पूर्ण विदिशा (45 अंश घूमा) में बने वास्तु से भी अधिक और त्वरित अति मंगलकारी फलदायक पाये गये हैं परन्तु इनसे विपरीत विदिशा में बने वास्तु अमंगलकारी ही होते हैं। विदिशा के वास्तु में यदि प्रवेश, और खाली जगह नैऋत्य अग्नि व वायव्य से होता है तो ऐसे वास्तु अत्यन्त अशुभ फलदायक पाये गये हैं। विदिशा में नैऋत्य का प्रवेश वंशनाश, धन नाश का द्योतक है तथा आग्नेय से प्रवेश अग्निभय, चोरी लड़ाई-झगड़ा, पति∕पत्नि का नाश, अनैतिकता का जन्मदाता कहा गया है वायव्य का प्रवेश द्वार चोरी, कानूनी झगड़े, जेल, व्यापार-नाश, अधिक व्यय कराने वाला आदि पाया गया है। विदिशा के वास्तु अगर सही नियमानुसार न होने पर कई दशाओं में अपमृत्यु का कारण भी बनते हैं।

दिशा एवं विदिशा के भूखण्ड व भवन—

भवन या भूखण्ड का उत्तर, चुम्बकीय उत्तर से 22.5◦ से कम घूमा होने से ऐसे भवन या भूखण्ड को दिशा में ही माना जाता है जबकि 22.5◦ या उससे अधिक घूमा हुआ हो तो उसे विदिशा या तिर्यक दिशा का भूखण्ड या भवन कहा जाता है। निम्न चित्र से स्पष्ट हो जायेगा।

प्राचीनकाल में दिशा निर्धारण प्रातःकाल व मध्याह्न के पश्चात एक बिन्दू पर एक छड़ी लगाकर सूर्य रश्मियों द्वारा पड़ रही छड़ी की परछाई तथा उत्तरायण व दक्षिणायन काल की गणना के आधार पर किया जाता था।

वर्तमान में चुम्बकीय सुई की सहायता से बने दिशा सूचक यंत्र (Compass) से यह काफी सुगम हो गया है।

अब तो जी.पी.एस. (Global Positioning System) पर आधारित इलेक्ट्रोनिक कम्पास की सहायता से किसी भी वस्तु पर दिशाओं की निकटतम सही जानकारी मिल सकती है।

राशि के अनुसार करें अपने निवास का चयन—

साधारणतः निवास स्थान का चयन करते समय व्यक्ति असमंजस में रहता है कि यह मकान उसके लिए कहीं अशुभ तो नहीं रहेगा। इस दुविधा को दूर करने के लिए निवास स्थान के कस्बे, कालौनी, या शहर के नाम के प्रथम अक्षर से अपनी राशि व नक्षत्र का मिलान कर शुभ स्थान का चयन करना चाहिए।

घर व निवासकर्ता की राषि एक ही होना चाहिए। दोनों राषियां आपस में एक दूसरे से 6‘8 या 3-11 पड़े तो धन संचय में बाधा और वैर विरोध उत्पन्न करती है तथा दोनों राषियों में 2-11 का संबंध होने पर रोगप्रद साबित होती है।

इनके अलावा 1,4,5,7,9,10वह राशियां हो तो वास्तुशास्त्र के अनुसार लाभप्रद मानी गई है। उदाहरणतः आपकी राशि वृष है और जयपुर में आप मकान खरीद रहे है तो यह आपके लिए लाभदायक रहेगा। क्योंकि वृष राशि से गिनने पर जयपुर की मकर राशि 9 वीं पड़ेंगी तथा मकर से गिनने पर वृष 5वीं राशि है।

अतः निवासकर्ता और निवास स्थान की राषियों वृष-मकर में 9-5 का संबंध होने से शुभ तथा लाभप्रद संयोग बनेगा। इसी प्रकार निवास स्थान के नक्षत्र से अपने नक्षत्र तक गिनने से जो संख्या आए उससे भी शुभता का अनुमान लगाया जा सकता है।

निवास स्थान के नक्षत्र से व्यक्ति का नक्षत्र यदि 1,2,3,4,5 पड़े तो धनलाभ के अच्छे योग बनेंगे। 6,7,8 पड़ने पर वहां रहने से धनाभाव बना रहेगा। 9,10,11,12,13 वां नक्षत्र होने पर धन-धान्य, सुख-समृद्धि में वृद्धि करता है।

यदि व्यक्ति का नक्षत्र 14,15,16,17,18,19 वां हो तो जीवनसाथी के प्रति चिंताकारक है। निवासकर्ता का नक्षत्र यदि 20 वां हो तो हानिकारक है। यदि व्यक्ति का नक्षत्र 21, 22, 23, 24, हो तो संपत्ति में बढ़ोतरी होती है।

25 वें नक्षत्र का व्यक्ति भय, कष्ट और अशांत रहता है। 26 वां हो तो लड़ाई-झगड़ा और 27 वां हो तो परिजनों के प्रति शोक को दर्शाता है। राशि और नक्षत्र का संयोग बनने पर ही निवासकर्ता के लिए श्रेष्ठ फल प्रदान करता है।

पूर्व-दक्षिण में बनी सीढ़ियाँ अत्यंत शुभ —

वास्तु के अनुसार मकान में सीढ़ी या सोपान पूर्व या दक्षिण दिशा में होना चाहिए। यह अत्यंत शुभ होता है। अगर सीढ़ियाँ मकान के पार्श्व में दक्षिणी व पश्चिमी भाग की दाईं ओर हो, तो उत्तम हैं। अगर आप मकान में घुमावदार सीढ़ियाँ बनाने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो आपके लिए यह जान लेना आवश्यक है कि सीढ़ियों का घुमाव सदैव पूर्व से दक्षिण, दक्षिण से पश्चिम, पश्चिम से उत्तर और उत्तर से पूर्व की ओर रखें। चढ़ते समय सीढ़ियाँ हमेशा बाएँ से दाईं ओर मुड़नी चाहिए। एक और बात, सीढ़ियों की संख्या हमेशा विषम होनी चाहिए। एक सामान्य फार्मूला है- सीढ़ियों की संख्या को 3 से विभाजित करें तथा शेष 2 रखें- अर्थात्‌ 5, 11, 17, 23, 29 आदि की संख्या में हों। वास्तु शास्त्र में भवन में सीढ़ियाँ वास्तु के अनुसार सही नहीं हो, तो उन्हें तोड़ने की जरूरत नहीं है। बस आपको वास्तु दोष दूर करने के लिए दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक कमरा बनवाना चाहिए। यदि सीढ़ियाँ उत्तर-पूर्व दिशा में बनी हों, तो। तिजोरी (गल्ला) : मकान में गल्ला कहाँ रखना चाहिए। वास्तु शास्त्र के अनुसार मकान में तिजोरी-गल्ला, नकदी, कीमती आभूषण आदि सदैव उत्तर दिशा में रखना शुभ होता है। क्योंकि कुबेर का वास उत्तर दिशा में होता है इसलिए उत्तर दिशा की ओर मुख रखने पर धन वृद्धि होती है।

Mahavir Hanuman Mandir Patna

महावीर हनुमान मंदिर पटना
जहाँ दर्शन मात्र से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं
बन जाते हैं बिगड़े काम, मिल जाता है जग में उत्तम स्थान

Mahavir Mandir is one of the holiest Hindu temples dedicated to Lord Hanuman, located in Patna, Bihar, India. Million of pilgrims visit the temple every year and is the second most visited religious shrine in North India. The Mahavir Mandir Trusts have the second highest budget in North India after the famous Maa Vaishno Devi shrine. The earning of Mahavir Mandir has gone now up to an average of Rs 1 lakh per day. It is situated right in front of Patna Junction, station of the City. By Rajesh Mishra (Bheledi , Chhapra ) 
(मंदिर के अन्दर का फोटो)


://www.youtube.com/watch?feature=player_detailpage&v=WkZoxyuQxqs

बिहार भारत की धर्म प्राण संस्कृति का परिचय देने वाला राज्य है। इसके कण-कण से सदैव भारत की सनातन संस्कृति का मंगलकारी स्वर गुंजायमान होता रहा है। इतिहास साक्षी है, जब-जब भारत के धर्म, संस्कृति और राजनीतिक अधिष्ठान पर तामसिक बादल मंडराए, बिहार के सांस्कृतिक सूर्योदय ने देश को आशा की नई राह दिखाई।


इसी राज्य की राजधानी पटना के रेलवे स्टेशन के सामने कभी एक जीर्ण-शीर्ण मंदिर होता था, रामभक्त महावीर हनुमान का मंदिर। कोई ढाई सौ, तीन सौ साल पुराना तो इसका ज्ञात इतिहास है, वस्तुत: यह कितना प्राचीन है, कोई नहीं जानता। इसे जीर्ण-शीर्ण हालत में देख पटना के कुछ प्रबुद्ध जन के मन में वेदना उठी, वही वेदना जो कभी जामवंत के मन में उठी थी- का चुप साधि रहा बलवाना। उस समय देश के प्रख्यात आई.पी.एस. अधिकारी किशोर कुणाल ने इस मंदिर को पटना के समाज-जागरण का महान केन्द्र बनाने का संकल्प किया। रा.स्व.संघ के पूर्व क्षेत्र संघचालक स्व. कृष्णवल्लभ प्रसाद नारायण सिंह उपाख्य बबुआ जी से सम्पर्क साधा और फिर शुरू हुई एक ऐसी साधना जिसने आज हर धर्म-साधक को आह्लादित कर रखा है।


जी हां, वही प्राचीन जीर्ण-शीर्ण महावीर मंदिर आज विशाल बहुमंजिला भव्य मंदिर बन गया है। इस मंदिर के विकास की गाथा के रूप में मानो नई राह को रोशन करता एक नया सवेरा पटना ने देखा है।

जहां किशोर कुणाल को भी इस मंदिर की साधना ने आचार्य किशोर कुणाल बना दिया, वहीं इस मंदिर ने सामाजिक समरसता का एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया। संभवत: यह ऐसा पहला मन्दिर था जहां के मुख्य पुजारी पद पर तथाकथित पिछड़े वर्ग के एक प्रकाण्ड पंडित को बैठाया गया। 30 अक्तूबर, 1983 को पटना के नागरिकों के सम्मिलित प्रयास से मंदिर का नवनिर्माण प्रारंभ हुआ तब किसी ने न सोचा था कि यह मंदिर आगे चलकर आध्यात्मिक जागरण के साथ सामाजिक विकास के महान केन्द्र के रूप में पहचाना जाने लगेगा। 1985 में नवनिर्मित मंदिर का भव्य उद्घाटन हुआ और शुरू हो गया परिवर्तन का नया अध्याय। मंदिर के कार्य को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए मार्च, 1990 में एक नए न्यास का गठन हुआ और इसी के साथ दुनिया ने देखा कि हिन्दू समाज अपने श्रद्धा केन्द्रों का कैसा उत्कृष्ट और प्रभावी प्रबंधन करता है। न सिर्फ मंदिर में पूजा-अर्चना, चढ़ावे आदि के बारे में नई प्रबंध प्रक्रिया प्रारंभ हुई वरन् चढ़ावे का समुचित उपयोग किस प्रकार सामाजिक विकास के प्रकल्पों में हो, इसकी भी प्रभावी योजना तैयार हुई।
घटना "60 के दशक की है जब भारत की राजनीति के युवा तुर्क कहे जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर अपनी किसी बीमारी के इलाज के लिए दिल्ली आए थे। दिल्ली के चिकित्सकों ने तब उनसे कहा था कि आपका बेहतर इलाज पटना में ही हो सकता था। ऐसी ख्याति थी तब पटना की, लेकिन इस स्थिति में धीरे-धीरे बदल होता गया। बदहाली ऐसी फैली कि लोग अपने पुरुषार्थ और गौरव को ही भुला बैठे। आचार्य किशोर कुणाल ने महावीर मंदिर न्यास को सर्वप्रथम इस स्थिति को बदलने के लिए सक्रिय किया। पटना के प्रमुख चिकित्सकों के साथ मिलकर 2 जनवरी, 1988 में जो महावीर आरोग्य संस्थान का छोटा सा बिरवा किदवईपुरी मुहल्ले में प्रारंभ हुआ था, आज वह राज्य के आधुनिकतम अस्पतालों में एक है। महंगी चिकित्सा कैसे गरीब आदमी को भी न्यूनतम खर्च पर मिल जाए, मंदिर प्रबंधन ने इस लक्ष्य को सदैव अपने सामने रखा। 4 दिसम्बर, 2005 को द्वारकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने 60 बिस्तरों से युक्त नए अस्पताल परिसर का उद्घाटन किया। मंदिर प्रशासन ने चढ़ावे की राशि का सदुपयोग करते हुए फुलवारीशरीफ में आधुनिकतम तकनीकी सुविधाओं से युक्त कैंसर अस्पताल भी प्रारंभ किया। हाल ही में यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर की एक गोष्ठी सम्पन्न हुई जिसका उद्घाटन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने किया। इसी प्रकार मातृत्व-शिशु कल्याण को ध्यान में रखकर 250 बिस्तरों से युक्त अस्पताल के निर्माण की योजना बनी और शुरुआती चरण में 38 बिस्तरों वाले मातृत्व-शिशु वात्सल्य अस्पताल की नींव 1 अप्रैल, 2006 को मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के करकमलों द्वारा रखी गई। मात्र 20 रुपए पंजीकरण शुल्क, 100 रुपए बिस्तर शुल्क और 4 से 5 लाख रुपए खर्च वाले आपरेशन यहां मात्र 15 से 25000 रुपए में ही हो जाते हैं। नि:सन्तान दंपतियों के कष्ट निवारण में भी अस्पताल प्रबंधन सक्रिय हो गया है। महावीर मंदिर प्रबंधन न्यास ने ये सभी कार्य चढ़ावे की राशि का सदुपयोग करते हुए प्रारंभ किए। दीन-हीन, भूखे लोगों को प्रतिदिन भर पेट प्रसाद देने के लिए "दरिद्र नारायण भोज", सन्तों-साधुओं के लिए नि:शुल्क निवास-प्रसाद व चिकत्सा के लिए "साधु सेवा", समाज को स्वस्थ साहित्य पढ़ने का अवसर देने के लिए एक समृद्ध पुस्तकालय, महावीर मंदिर प्रकाशन, ज्योतिष सलाह केन्द्र, दूरदराज के गांवों में शुद्ध पेयजल आपूर्ति के लिए पेयजल अभियान, संस्कृत भाषा के नवोत्थान के लिए पाणिनी केन्द्र, अस्पृश्यता निवारण के लिए विभिन्न त्योहारों पर विराट सर्व सहभागी उत्सव, सामाजिक मिलन के आयोजन, भगवान के भोग के लिए नैवेद्यम और इन सभी कार्यों में सक्रिय कार्मिकों के लिए सरकारी योजनाओं के अनुकूल सुन्दर नीति का निर्धारण और प्रत्यक्ष संचालन आज महावीर मंदिर की ओर से किया जा रहा है।

नित नए आयाम मंदिर से जुड़ रहे हैं। पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार, जल संरक्षण, पर्यावरण शुद्धि और राज्य के अनेक हिस्सों में अनेक मंदिरों को पुनव्र्यवस्थित करने के साथ अनुसूचित जाति के प्रशिक्षित धर्मज्ञ पुजारियों की योजना करने जैसे पवित्र अभियान को मंदिर गति दे रहा है। ऐसा ही एक प्रकल्प सदानीरा गण्डकी के तट पर सन् 2006 में निर्मित किया गया। करीब 37 साल पहले की बात है। हाजीपुर नगर के समीप गण्डकी के तट पर भगवान भोलेनाथ अद्भुत लिंग रूप में प्रकट हुए थे। भक्तों की भीड़ वहां जुटने लगी, जलाभिषेक प्रारंभ हो गया, 30 वर्षों तक भगवान आकाश की छत के नीचे रहे। महावीर न्यास ने इसे भी समाज जागृति के केन्द्र के रूप में विकसित करने की ठानी। और 28 फरवरी, 2006 को भव्य शिव मंदिर कर निर्माण कर क्षेत्र वासियों को सौंप दिया। भगवान की नियमित पूजा, अर्चना का दायित्व अनुसूचित जाति के श्री चन्द्रशेखर दास ने संभाला और धीरे-धीरे समाज के लिए एक श्रेष्ठ उपासना का केन्द्र यहां विकसित हो गया। मुजफ्फरपुर में भी न्यास ने साहू पोखर स्थित राम-जानकी मंदिर का प्रबंधन संभाला और नियमित पूजन-अर्चन के लिए पुजारी की व्यवस्था की। भारत तो भगवान का देश कहा जाता है। किसी मंदिर में रोज दिया न जले, यह अपराध न होने देने का संकल्प महावीर मंदिर न्यास के कार्य से झलकता है।

पटना जंक्शन के बाहर आप निकलेंगे तो इस सामाजिक-आध्यात्मिक जागरण के भव्य प्रतिमान को प्रणाम करना मत भूलिएगा। हनुमान जी साक्षात् अपनी शक्ति का अहसास इस प्रतिष्ठान द्वारा सर्व समाज को करा रहे हैं।

Panchmukhi Hanumanji

शीघ्र और श्रेष्ठ फल प्राप्त करना है तो पूजें
पंचमुखी हनुमानजी




भारत के किसी भी शहर में चलें जाएँ हनुमान जी के सैकड़ों मंदिर मिल जायेंगे और इनके भक्तों की संख्या अनगिनत है. मंगलवार और शनिवार को तो इन मंदिरों प्रातःकाल से अर्धरात्रि तक जमावड़ा लगा रहता है पर इनके भक्त भी बहुत संयम से अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हैं... आपने सुना होगा पटना रेलवे स्टेशन से सटे हनुमान जी को उत्तर भारत में माता वैष्णवी के बाद सबसे ज्यादा लोकप्रिय और साथ ही साथ दान-दक्षिणा के मामले में दूसरा स्थान दिलाया है इनके भक्तों ने.. जहाँ हनुमान जी के इतने ज्यादा भक्त हों वह हनुमान कृपा दृष्टि तो डालेंगे ही...   इस आलेख में मैं आपको हनुमान जी से शीघ्र और श्रेष्ठ फल प्राप्त करने का उत्तम उपाए बता रहा हूँ...राजेश मिश्रा

शास्त्र और विधान से हनुमानजी का पूजन और साधना विभिन्न रुप से किये जा सकते हैं।
हनुमानजी का एकमुखी,पंचमुखीऔर एकादश मुखीस्वरूप के साथ हनुमानजी का बाल हनुमान, भक्त हनुमान, वीर हनुमान, दास हनुमान, योगी हनुमान आदि प्रसिद्ध है। किंतु शास्त्रों में श्री हनुमान के ऐसे चमत्कारिक स्वरूप और चरित्र की भक्ति का महत्व बताया गया है, जिससे भक्त को बेजोड़ शक्तियां प्राप्त होती है। श्री हनुमान का यह रूप है – पंचमुखी हनुमान।

मान्यता के अनुशार पंचमुखीहनुमान का अवतार भक्तों का कल्याण करने के लिए हुवा हैं। हनुमान के पांच मुख क्रमश:पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऊ‌र्ध्व दिशा में प्रतिष्ठित हैं।

पंचमुखी हनुमानजी का अवतार मार्गशीर्ष कृष्णाष्टमी को माना जाता हैं। रुद्र के अवतार हनुमान ऊर्जा के प्रतीक माने जाते हैं। इसकी आराधना से बल, कीर्ति, आरोग्य और निर्भीकता बढती है।


रामायण के अनुसार श्री हनुमान का विराट स्वरूप पांच मुख पांच दिशाओं में हैं। हर रूप एक मुख वाला, त्रिनेत्रधारी यानि तीन आंखों और दो भुजाओं वाला है। यह पांच मुख नरसिंह, गरुड, अश्व, वानर और वराह रूप है। हनुमान के पांच मुख क्रमश:पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऊ‌र्ध्व दिशा में प्रतिष्ठित माने गएं हैं।

पंचमुख हनुमान के पूर्व की ओर का मुख वानर का हैं। जिसकी प्रभा करोडों सूर्यो के तेज समान हैं। पूर्व मुख वाले हनुमान का पूजन करने से समस्त शत्रुओं का नाश हो जाता है।

पश्चिम दिशा वाला मुख गरुड का हैं। जो भक्तिप्रद, संकट, विघ्न-बाधा निवारक माने जाते हैं। गरुड की तरह हनुमानजी भी अजर-अमर माने जाते हैं।

हनुमानजी का उत्तर की ओर मुख शूकर का है। इनकी आराधना करने से अपार धन-सम्पत्ति, ऐश्वर्य, यश, दिर्धायु प्रदान करने वाल व उत्तम स्वास्थ्य देने में समर्थ हैं।

हनुमानजी का दक्षिणमुखी स्वरूप भगवान नृसिंह का है। जो भक्तों के भय, चिंता, परेशानी को दूर करता हैं।
श्री हनुमान का ऊ‌र्ध्वमुख घोडे के समान हैं। हनुमानजी का यह स्वरुप ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर प्रकट हुआ था। मान्यता है कि हयग्रीवदैत्य का संहार करने के लिए वे अवतरित हुए। कष्ट में पडे भक्तों को वे शरण देते हैं। ऐसे पांच मुंह वाले रुद्र कहलाने वाले हनुमान बडे कृपालु और दयालु हैं।

हनुमतमहाकाव्य में पंचमुखीहनुमान के बारे में एक कथा हैं।

एक बार पांच मुंह वाला एक भयानक राक्षस प्रकट हुआ। उसने तपस्या करके ब्रह्माजीसे वरदान पाया कि मेरे रूप जैसा ही कोई व्यक्ति मुझे मार सके। ऐसा वरदान प्राप्त करके वह समग्र लोक में भयंकर उत्पात मचाने लगा। सभी देवताओं ने भगवान से इस कष्ट से छुटकारा मिलने की प्रार्थना की। तब प्रभु की आज्ञा पाकर हनुमानजी ने वानर, नरसिंह, गरुड, अश्व और शूकर का पंचमुख स्वरूप धारण किया। इस लिये एसी मान्यता है कि पंचमुखीहनुमान की पूजा-अर्चना से सभी देवताओं की उपासना के समान फल मिलता है। हनुमान के पांचों मुखों में तीन-तीन सुंदर आंखें आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक तीनों तापों को छुडाने वाली हैं। ये मनुष्य के सभी विकारों को दूर करने वाले माने जाते हैं।



भक्त को शत्रुओं का नाश करने वाले हनुमानजी का हमेशा स्मरण करना चाहिए। विद्वानो के मत से पंचमुखी हनुमानजी की उपासना से जाने-अनजाने किए गए सभी बुरे कर्म एवं चिंतन के दोषों से मुक्ति प्रदान करने वाला हैं। पांच मुख वाले हनुमानजी की प्रतिमा धार्मिक और तंत्र शास्त्रों में भी बहुत ही चमत्कारिक फलदायी मानी गई है।

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