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31 दिसंबर 2012

Happy New Year (11 April 2013)

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत् 2070 वीरवार तदानुसार 11 अप्रैल 2013 आपके लिए मंगलमय हो…
हम भारतीय नव वर्ष का प्रारम्भ हिन्दू, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से मानते  हैं क्योंकि ?
• इस तिथि से ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण प्रारम्भ किया।
• मर्यादापुर्षोत्तम भगवान श्री रामचन्द्र जी का इस दिन राज्याभिषेक हुआ।
• इस दिन नवरात्रों का महान पर्व आरम्भ होता है।
• देव भगवान झूले लाल जी का जन्म दिवस ।
• महाराजा विक्रमादित्य द्वारा विक्रमी संवत का शुभारम्भ ।
• राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार जी का जन्म दिवस।
• महर्षि दयानन्द जी द्वारा आर्य समाज का स्थापना दिवस।
• संसार के अधिकतर देशों के बजट की भी इन्हीं दिनों(पखवाड़े में) शुरूआत होती
इसके अतिरिक्त ये वो वक्त है जब हमारे शरीर में नए खून का ज्वार उठता है व हमारे आसपास की प्रकृति भी नए कपड़े डालकर नव वर्ष शुरू होने का संकेत दुनिया के जागरूक लोगों तक पहुंचाती है…
दूसरी तरफ बहुत से बौद्धिक गुलाम लोग ग्रेगेर्रियन कलैंडर के अनुसार 1 जनवरी को,  एक वयक्ति इसामशीह  के मरनोउपरांत खुशियां मनाकर उसे नववर्ष का नाम देकर दुनिया को भ्रमित करने की पुरजोर कोशिश करते हुए मानवता का मखौल उड़ाते हैं अब ये आपके अपनी इच्छा है कि
आप अपनी आने वाली पिढ़ीयों को कैसा बनाना चाहते हैं
ऐसा
(अंग्रेजी नव वर्ष पहली जनवरी मनाने वाला)
या फिर ऐसा
(भारतीय नव वर्ष वर्षप्रतिपदा मनाने वाला)
ऐ वतन तेरी कसम ,कुर्बान हो जांएगे हम ।
                                          तेरी खातिर मौत से भी , जा टकरांएगे हम ।
संस्कार एक दिन में न बनता है न बिगड़ता है यह एक सतत प्रक्रिया है आप अपने आपको कौन सी प्रक्रिया के हवाले करते हैं वही आपका संस्कार निर्माण करेगा।
जागो भारतीयो जागो पहचाने अपने अन्दर वह रहे भारतीय खून को और इस खून से जुड़ी महान सच्चाईयों को… जिनमें से नव वर्ष,

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

से प्रारम्भ होता है…. भी एक सच्चाई है
आप सबको हिन्दू नबवर्ष के शुभ अवसर पर एक वार फिर हार्दिक शुभकामनायें
(हाँ, एक बात का ध्यान जरुर रखें, इस दिन जानवर और वहशी लोग रस्ते पर ज्यादा दिखाई देते हैं उनसे अपने परिवार को सुरक्षित जरुर रखें- राजेश मिश्र)

19 दिसंबर 2012

The Rani Sati Dadi Temple, Jhunjhunu


There are in all 13 sati temples in the complex with 12 smaller one’s and 1 main temple dedicated to Rani Sati Dadi. Built in pure white marble with a red fluttering flag at the top, the building forms are interesting and the entire edifice looks stunning.

[ Entrance to the Temple ]


[ Spires of the 13 sati Temples ]

A huge statue of Lord Shiva in the middle of the complex surrounded by the lush green gardens, adds to the beauty of the place.


[ Magnificient Rani Sati Temple spire ]
Inside the temple, the interiors, adorned with exquisite murals and fascinating richglass mosaics depicting the entire history of the place, are eye-catching. I grabbed a seat in the middle of the room, trying to soak in every detail…
Just like Khatu, the history of this temple too takes you back to the times of theMahabharata.
When Abhimanyu (the son of the great Pandava, Arjun) lost his life while fighting the battle of Mahabharata, his wife and soon-to-be-mother, Uttara had wished to commit sati and end her life too. Citing the fact that it would not be appropriate to kill the innocent yet-to-be-born child, Lord Krishna stopped her from doing so. Since she was adamant, He gave her the boon that her desire to become sati shall be fulfilled in the next birth.

Many years later, Uttara was reborn as Narayani bai and Abhimanyu as Tandhan Das. A beautiful horse possessed by Tandhan Das was being eyed by the son of king of Hissar from quite some time. But Tandhan Das refused to part with his precious horse by handing it over to the king’s son. On deciding to obtain forcefully then, the king’s son confronted him. He killed the king’s son in the battle that ensued. This enraged the king and he decided to take revenge soon. Sometime later, Tandhan Das was married to Narayani bai. After marriage, while returning to their village, they were suddenly attacked by the army of Hissar. Tandhan Das fought the battle bravely before he was stabbed in the back and lost his life. The young bride, Narayani bai displayed exemplary courage and bravery by fighting the army singlehandedly and killed the king.

She then asked Ranaji (the caretaker of the horse) to make immediate arrangements for her to be set ablaze along with her husband’s cremation.
Very pleased with Ranaji who played a vital role in fulfilling her wish to be sati with her husband, she blessed him that his name will be taken and worshiped before her name and since then she is known as Rani Sati.

Soon after, her influence of 'sat' (truth and loyalty) involuntarily set up the pyre ablaze. A storm rose from the ashes telling Ranaji to take them on the horse and to build a temple wherever the horse stops. The horse stopped in Jhunjhunu where the temple stands today…
Craning my neck up, I saw a fresco on the ceiling - Narayani bai with her husband in lap, enveloped in flames, Ranaji with the horse in the background. So beautiful, looked like it had been created yesterday. Equally mesmerizing was the main sanctum area.

[ Rani Sati Dadi ]
Unlike most of the temples in India, the fact that this temple does not enshrine a statue or image of any Gods or Goddesses makes it all the more unique. A trident with two eyes, nose ring, a red bindi and a red chunri is worshipped in the form of power and forcewhich is the supreme might as per the Hindu religion. A fine portrait of the Rani Sati Dadiis positioned in the sanctum (Pradhan Mand) with the imposing Shikhar.


[ The Rani Sati Dadi Temple, Jhunjhunu ]

In front of the sanctum, there is a marble platform where devotees pray by drawing theSathiya (Swastik) and offer roli, chawal, mehendi, flowers, coconut, etc to the Goddess. Women also offer Suhaag pitaris (saree, bangles, bindi, kajal, etc) and pray for the long life of their husbands and the well being of their entire family.

[ Back view of the Temple ]
As I had even stayed here, I got the fortune of attending the evening aarti. It was a wonderful experience. After the prayer, prasad of bundis was distributed to all.

Whether you belong to this place or not, it really doesn’t matter, It’s spectacular and interesting and hence definitely worth visiting. I am sure the beauty here will linger on your mind for a long time.
Rajesh Mishra (Jagkalyan News Editor)

13 दिसंबर 2012

2013 की व्रत-त्यौहार, एकादशियां, अमावस्या एवं पूर्णिमा


मुख्य पर्व व एकादशियॉं-2013



08 जनवरी मंगलवार सफला एकादशी
22 जनवरी मंगलवार पुत्रदा एकादशी
06 फरवरी बुधवार षटतिला एकादशी
21 फरवरी गुरूवार जया एकादशी
08 मार्च शुक्रवार विजया एकादशी
23 मार्च शनिवार रंगभरी एकादशी
28 मार्च गुरूवार होली
06 अप्रैल शनिवार पापमोचनी एकादशी
19 अप्रैल शुक्रवार रामनवमी
22 अप्रैल सोमवार कामदा एकादशी
05 मई रविवार वरुथनी एकादशी
21 मइ मंगलवार मोहिनी एकादशी
04 जून मंगलवार अचला एकादशी
20 जून गुरूवार निर्जला एकादशी
03 जुलाई बुधवार योगिनी एकादशी
19 जुलाई शुक्रवार हरिशयनी एकादशी
22 जुलाई बुधवार गुरूपूर्णिमा
02 अगस्त शुक्रवार कानिका एकादशी
17 अगस्त शनिवार पुत्रदा एकादशी
21 अगस्त बुधवार रक्षाबंधन
28 अगस्त बुधवार कृष्ण जन्माष्टमी
01 सितम्बर रविवार अजा एकादशी
15 सितम्बर रविवार पद्मा एकादशी
30 सितम्बर सोमवार इन्दिरा एकादशी
05 अक्टूबर शनिवार कलश स्थापना
15 अक्टूबर मंगलवार पापांकुशा एकादशी
30 अक्टूबर बुधवार रम्भा एकादशी
03 नवम्बर रविवार दीपावली
13 नवम्बर बुधवार प्रबोधिनी एकादशी
29 नवम्बर शुक्रवार उत्पन्ना एकादशी
13 दिसम्बर शुक्रवार मोक्षदा एकादशी
28 दिसम्बर शनिवार सफला एकादशी

पूर्णिमा-2013

27 जनवरी रविवार पौष पूर्णिमा
25 फरवरी सोमवार मघा पूर्णिमा
27 मार्च बुधवार फाल्गुन पूर्णिमा
25 अप्रैल गुरूवार चैत्र पूर्णिमा
25 मई शनिवार वैशाख पूर्णिमा
23 जून रविवार ज्येष्ठ पूर्णिमा
22 जुलाई सोमवार आषाढ़ पूर्णिमा
21 अगस्त बुधवार श्रावण पूर्णिमा
19 सितम्बर गुरूवार भाद्रपद पूर्णिमा
18 अक्टूबर शुक्रवार आश्विन पूर्णिमा
17 नवम्बर रविवार कार्तिक पूर्णिमा
17 दिसम्बर मंगलवार मार्गशीर्ष पूर्णिमा

अमावस्या-2013

11 जनवरी शुक्रवार पौष अमावस्या
10 फरवरी रविवार मघा  अमावस्या
11 मार्च सोमवार फाल्गुन अमावस्या
10 अप्रैल बुधवार चैत्र अमावस्या
09 मई गुरूवार बैशाख अमावस्या
08 जून शनिवार ज्येष्ठ अमावस्या
08 जुलाई सोमवार आषाढ़ अमावस्या
06 अगस्त मंगलवार श्रावण अमावस्या
05 सितम्बर गुरूवार भाद्रपद अमावस्या
04 अक्टूबर शुक्रवार आश्विन अमावस्या
03 नवम्बर रविवार कार्तिक अमावस्या
02 दिसम्बर सोमवार मार्गशीर्ष अमावस्या

Rajesh Mishra



Kumbh Mela


The Kumbh Mela, believed to be the largest religious gathering on earth, is held every 12 years on the banks of the Triveni Sangam - the confluence of the holy rivers Ganga, Yamuna and Saraswati. Here, the pale yellow water of the Ganges merges with the brilliant blue-green of the Yamuna.
The Mela alternates between Nasik, Allahabad, Ujjain and Haridwar every three years. The one celebrated at the Holy Sangam in Allahabad is the largest and holiest of them. The Mela is attended by millions of devotees, including Sadhus. A holy dip in the sacred waters is believed to cleanse the soul. The Sangam comes alive during Kumbh and Ardh Kumbh with an enormous temporary township springing up on the vacant land on the Allahabad side of the river.


The Mela has its roots in the pastimes of the demigods and demons fighting for a pot of nectar (Amrit Kumbh): the nectar of immortality. Lord Vishnu, disguising himself as an enchantress (Mohini), seized the nectar from the demons. While fleeing from the evil ones, Lord Vishnu passed the nectar on to his winged mount, Garuda. The demons finally caught up with Garuda and in the ensuing struggle, a few drops of the precious nectar fell on Allahabad, Nasik, Haridwar and Ujjain. Since then, the Kumbh Mela has been held in all these places, alternatively, every 12 years.


Allahabad is built on a very ancient site formerly known as Prayag. Cover 2,261 square kilometers, it is located at the junction of the holy rivers Ganga and the Yamuna. The city acquired its present name from one of the largest religious gatherings in the world, held every 12 years at the confluence of the holy rivers. This historically famous city was a centre of the Indian Independence movement and the home of the Nehru family. Today Allahabad is a rapidly growing commercial and administrative city in Uttar Pradesh, with a population of 49 million.
Ardh Kumbh Mela and Magh Mela
The Ardh or 'half Kumbh' Mela, is held every six years on the banks of Sangam. Second only to the Kumbh in sanctity, the Ardh Kumbh also attracts devotes in the millions, from all over the world. Magh Mela is an annual event held at the Sangam.
The Kumbh Festival begins on the full moon night (Purnima) of the month of Paush. While the Kumbh Festival is held at Haridwar, Ujjain and Nasik every four years, the Kumbh at Prayag has a special significance. The Kumbh Festival is marked by the fact that it is held at the banks of holy rivers every 12 years. In Prayag, however, it is held on the banks of the rivers Ganga-Yamuna, with the underground Saraswati joining in. In Haridwar it's held at Ganga and in Nasik at the Godavari. A great fair is held on these occasions on the banks of these rivers with a huge congregation of devoted pilgrims. The Prayag Kumbh is also considered to be the most significant because it marks the direction of wisdom or light. This is the place where the sun, symbolizing wisdom, rises.
Prajapati Brahma is said to have created the Universe after conducting the Ashwamedh Yagna at the Dashashwamedh Ghat here. The Dashashwamedh Ghat and the Brahmeshwar Temple still exist here as symbols of that holy yagna, and that is another reason for the special significance of the Prayag Kumbh. In fact Prayag and Kumbh are synonymous to each other.


The Meaning of Kumbh
The literal meaning of Kumbh is a pitcher, but its elemental meaning is something else. Even as a symbol of pitcher, Kumbh is synonymous with holy activities as in daily life a pitcher (or kalash) is an integral part of all sacred activities in Hindu culture, and this pitcher is a symbol of Kumbh.
Holy scriptures say that in a pitcher, its mouth (opening) symbolizes the presence of Vishnu, its neck that of Rudra, the base of Brahama, all goddesses in the center and the entire oceans in the interior, thus encompassing all the four Vedas. This itself establishes the significance of the Kumbh as symbolized by the pitcher.


Different Forms of Kumbh
We shall not dwell upon the literary meaning of the word Kumbh, but we would like to mention the synonyms and origins. The Kumbh is a pitcher. Kumbh is the human body, it is the abdomen, and the sea, earth, sun and Vishnu are synonyms of Kumbh. The pitcher, sea, river, ponds and the well are symbols of Kumbh as the water from these places is covered from all sides. The sky has the cover of the wind, the sun covers the entire universe with its light, and the human body is covered with cells and tissues. That is why it is Kumbh. Desire, that is longing, is also Kumbh. Vishnu is also Kumbh as He pervades the entire creation, and the creation pervades in Him.
Kumbh is the confluence of all our cultures. It is the symbol of spiritual awakening. It is the eternal flow of humanity. It is the surge of rivers, forests and the ancient wisdom of the sages. It is the flow of life itself. It is the symbol of the confluence of nature and humanity. Kumbh is the source of all energy. Kumbh makes humankind realize this world and the other, sins and blessings, wisdom and ignorance, darkness and light. Holy rivers are the symbols of the lyrical flow of humanity. Rivers are indicators of the flow of water of life in the human body itself. In the human body that is an embodiment of home, nothing is possible without the five elements. The elements - fire, wind, water, earth and sky - symbolize the human body.
The Himalaya is the abode of the soul of the gods. The Holy Ganga embarks upon its journey from there, encompassing the forests, the mountain sages and the culture of the villages. The Yamuna is a co-traveler as it puts an end to all sins, and it is known variously as Tripathga, Shivpuri and other names. This is the Ganga that liberated the children of the Suryavanshi king Sagar. Its holy water is considered nectar itself.
Astrological View
It is explained in the Churning pastime that the stars are directly related to the Kumbh festival. Jayant took 12 days to carry the nectar kalash to the heavens. One day of gods was equal to one year of the human. It is that sequence of stars which result in the 12th year Kumbh being held at festival places.
It is clear that the Kumbh festival and Ganga are specially related. Ganga does flow in Prayag, but Godavari of Nasik is also called Ganga. It is known by the name of Gomti Ganga. Shipra is recognized as the north branch Ganga of Kashi. From that place, Shipra becomes the east branch, where it was once assembled with Ganga. Gangeshwar is worshipped there by Ganga. This fact is explained in Brahm Purana and Skandha Purana.
Astrological calculation of the Kumbh takes place in several ways:

    Upon the event of entrance of Jupiter in Aquarius and entrance of the Sun in Aries, Kumbh Festival is held at Haridwar.

    Upon the event of entrance of Jupiter in Aries circle and entrance of the Sun and Moon in Capricorn, Kumbh Festival is held at Prayag on the lunar conjunction day.

    In another series of calculation, in the event of entrance of the Sun in Capricorn and entrance of Jupiter in Taurus, Kumbh Festival is held at Prayag.

    In the event of entrance of Jupiter in Leo, Kumbh Festival is held at Nasik on the bank of river Godavari. In the event of the entry of Jupiter in Leo and entry of Sun in Aries, Kumbh Festival is held at Ujjain.

    Astrological options, as that of Prayag, are also available for Nasik and Ujjain.

    When Jupiter, Sun and Moon enters Cancer on lunar conjunction (Amavasya - last day of the dark half of a month) then also Kumbh Festival is held on the bank of river Godavari.

    When Jupiter enters in Libra and the Sun and Moon remain together on Kartik Amavasya (8th month of Hindu year), then also Moksha Dayak (free from all bonds), Kumbh Festival is held at Ujjain.
Kumbh Festival starts from Haridwar in the interval of every 3 years. It is said that after Haridwar Kumbh Festival it is celebrated at Prayag, Nasik and Ujjain. Kumbh festival at Prayag is celebrated after 3 years of Kumbh Festival at Haridwar and there is a difference of 3 years between the Kumbh Festivals at Prayag and Nasik, but the Kumbh Festival at Nasik and Ujjain is celebrated in the same year. Sometimes Kumbh Festival at Nasik is celebrated before Ujjain.
Kumbh Festivals of all the four places are related with astrological calculations and main dates of Holy Bath. There have been differences of opinions among different scholars regarding ‘Kumbh Cycle’. Some scholars opine a 12 year period for the Kumbh Festival. According to a second opinion, till the time of an auspicious moment is derived by astrological calculations the auspicious moment for Kumbh Festival cannot be held. If the equation of planets does not match the opinion of Sastra, then Kumbh Festival can be held in 11th and 13th year. This situation arises due to the posterior effect of Jupiter and time taken to revolve round the sun. A cycle of 11.78 years is taken by Jupiter to revolve round the Sun, resulting in loss of 50 days in 12 solar year cycle. This period becomes approximately 1 year between 6th and 7th Kumbh Festivals.
In continuation of astrological calculations, Jupiter takes a period of 84 years to shift from one astrological circle to another circle. As such, out of 7 Kumbh Festivals every Kumbh Festival is celebrated in 12th year and 7th Kumbh Festival is celebrated in 11th year. This happens minimum once in every century. There is an important role of Jupiter in deciding Kumbh Festival. In view of the distribution of period out of 27 paths of the planets in solar system, 12 zodiac signs and 9 planets Aquaris is the 11th zodiac sign. Aquaris is an aquatic zodiac sign, master is Saturn, Saturn is airy element. Water and air, this is the climate/atmosphere. Superiority of Sun, Earth and fire element is already there. Kumbh Festival of Haridwar is the indication of this Zodiac sign. There is a difference of auspicious moments of planets and zodiac signs in the Kumbh Festivals at Prayag, Nasik, Ujjain, but along with the Sun and Moon superiority have also been provided to Jupiter i.e. element of life and Sun.
Kumbh (a festival occurring every 12 years) Festival is held only when the presence and conjunction of Sun, Moon and Jupiter is there in the same zodiac signs at the time of immortal deterioration point. Kumbh Festivals cannot be celebrated in the absence of these auspicious moments. There are total 12 Kumbh Festivals in 12 days of gods and 12 years of humans. On earth among human beings and 8 Kumbh Festivals in egregious among gods are held. In continuation of astrological calculation Sun, Moon and month meets every year but a gap of 12 years exists to meet Jupiter only. Present period of Sun is 365/15/31. Present period (middle part of zodiac sign) of Jupiter has been given as 365/1/36. The difference between periods is 4/13/55. Therefore, after 12 years this difference in period is 12x4/13/55=50/47. This difference in (12x7) 84 years comes to 355 days, 29 hours, approx. one year and after a particular point of time Jupiter completes the cycle in 11 years instead of 12 years.


Kumbh Festival or Mini India
In early days, the shape of the Kumbh festival was small, but now from 12th century onward the festival has developed into the largest festival. It is seen spread all over the area from the Parade ground to under Triveni Dam; from Daraganj to the border of Nagvasuki; from Jhunsi (Pratishthanpuri) and in Arail (Alarkpuri). The shape of the festival depends on the direction of Ganga, wherever it takes turns, whatever space is left by it, that makes it obvious what area is to be covered by the festival.
The festival of Kumbh or Ardh Kumbh is not a festival of market or fair, instead it is the festival of knowledge, asceticism and devotion. Religious atmosphere is seen everywhere in this festival. Whichever camp you visit, in between smoke of Yagya (religious sacrifice), voice of Vedic mantras is heard, elucidation, dances based on sastric epics, prayers, preaching of saints and sages, a different society is seen. Traditional procession of Akharas, shining swords of naga, sages in Shahi Snan (royal bath) between elephants, horses, musical instruments, horse race attracts lakhs of devotees to visit Kumbh. At the last Ardh Mela, Srila Prabhupada murti was processed by two of Krsna's bulls.


It is a festival of leaders of different religions of society. Seeing the growing population in the festival, small markets have taken the shape of a large market, Government and Administration has also involved itself for the convenience of the festival. This festival is the festival of honor and dignity of Prayag. It is the festival of utmost devotion of lakhs of sacred performers. Food is provided in many areas by donators for providing food to the poor, helpless and saints. Ganga is the mother of all in this festival. All are her sons.
Such a huge size of public persons does not assemble at one place continually for a month in any other part of the world. The land of Prayag, the decider of sins and holy acts, has the honor to conduct this festival.
This festival too is celebrated in a town made of tents, not that of houses of bricks and stone. It is held on the cold sand of Sangam. It is held under open sky covered with fog. It is a tough test of human devotion. People come to this festival with the spirit of earning pious credits. Sinners end automatically. This is the festival of self-thinking. This is a festival of this world and the other world, where provision of all the donations including cow-donation, gold-donation, secret donation, donation/offering is there.
This is the festival of wishes. People from every religion and caste are present in the festival in one or another form, saints and sacred performers from every caste are present. A small place takes the shape of a mini-India. Different types of language, tradition-culture, dress, food, way of living can be seen at various places, and the most important specialty is that crores of people reach here without any invitation.

महाकुम्भ मेला 2013


महाकुम्भ मेला 2013 की महत्वपूर्ण तिथियॉं 


27 (रविवार) जनवरी - पौष   पूर्णिमा
6 फरवरी (बुधवार) एकादशी स्नान
10 फरवरी (रविवार) मौनी अमावस्या स्नान (मुख्य स्नान दिवस)
15 फरवरी (शुक्रवार) बसंत पंचमी स्नान
17 फरवरी (रविवार) रथ सप्तमी स्नान
18 फरवरी (सोमवार) भीष्म अष्टमी स्नान
25 फरवरी (सोमवार) माघी पूर्णिमा स्नान
maha kumbh mela
MAHAKUMBHA

इलाहाबाद की ख्याति दुनिया भर में एक महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थस्थल की है। यहां संगम में स्नान के लिए हर साल माघ मेला, हर 3 साल पर कुंभ मेला, हर 6 साल पर अर्धकुंभ मेला और हर 12 साल पर पूर्णकुंभ मेला लगता है और हर 144 साल पर महाकुंभ मेला लगता है जिसमें दुनिया भर से करोड़ों लोग पहुंचते हैं।
तीर्थराज के नाम से मशहूर प्रयाग महाकुंभ शुरू होने जा रहा है, विश्व के सबसे बड़े धार्मिक मेले में इस बार 10 करोड़ श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है, तैयारियां जोरों पर हैं, पूरे शहर को एक नई शक्ल दी जा रही है।
कुंभ की तैयारियों के लिए इलाहाबाद का पूरा प्रशासन एकजुट होकर काम कर रहा है। करीब 50 वर्ग किलोमीटर इलाके में फैले मेला क्षेत्र को श्रद्धालुओं के रहने लायक बनाने का काम अभी से होने लगा है। सिर्फ मेले की तैयारी पर करीब 300 करोड़ रुपये का खर्च होने का अनुमान है। इसके अलावा शहर में नई सड़कें, नालियां और चौराहों को बनाने का काम भी चल रहा है। ये सब मिलाकर 1,000-1,200 करोड़ रुपये का खर्च होने का अनुमान है। ये सारी तैयारियां इस तरीके से हो रही हैं कि कुंभ स्नान के लिए आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं को कोई दिक्कत ना हो।
इस बार कुंभ मेला के तैयारी के खर्च में जेएनएनयूआरएम और नेशनल गंगा रिवर मिशन अथॉरिटी का खर्च भी शामिल है। कुंभ मेला इलाहाबाद में आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र है और इस दौरान यहां की आबादी विश्व में एक शहर की सबसे ज्यादा आबादी होती है। कुंभ मेले की तैयारी और इलाहाबाद में इस दौरान आए लोगों के लिए समुचित इंतजाम, अपने आप में एक रिकॉर्ड से कम नहीं है। और यही कुंभ इलाहाबाद के हजारों लोगों के लिए रोजगार का जरिया भी है।
इलाहाबाद के लिए पर्यटन से आय का बड़ा स्त्रोत भी है। जाहिर तौर पर इस मेले में वो क्षमता है, जो इलाहाबाद को सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल भी बनाता है।
 महाकुम्भ पर्व इलाहाबाद में मनाया जाता है। इस प्रकार भारत वर्ष में महाकुम्भ मेला संसार का सबसे बड़ा मेला होता है।
अनगिनत लोग इतने बड़े जनसमूह के रूप में अपना समय एवं धन व्यय करके कुम्भ पर्व पर अमृत प्राप्त करने की अभिलाषा से आते हैं। प्रत्येक प्राणी चर या अचर, सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति आदि ग्रहों एवं भीमकाय नक्षत्रों, जो सूर्य से भी कई-कई लाख गुना बड़े हैं से पृथ्वी पर आ रही प्राण ऊर्जा से जीवित रहता है। इस प्राण ऊर्जा की प्रकृति, तीव्रता, सघनता एवं विभव आदि पर्यावरण के अनुसार परिवर्तित होती रहती है तथा ब्रह्माण्डीय पर्यावरण सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति आदि ग्रहों एवं तारा समूहों से उत्सर्जित ऊर्जा से बनता है तथा यह पर्यावरण विभिन्न ग्रहों एवं नक्षत्रों की स्थिति परिवर्तन के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। ब्रह्माण्डीय पर्यावरण के परिवर्तन के कारण ही पृथ्वी पर प्रत्येक वर्ष मौसम में परिवर्तन होता रहता है जिसके फलस्वरूप किसी वर्ष फसल बहुत अच्छी हाती है, फल बहुत मीठे आते हैं तथा सामान्य जन का स्वास्थ्य अच्छा रहता है तथा किसी वर्ष फसल में कीड़ा लग जाता है, फलों में स्वाद नहीं होता या महामारी आदि होती है।
प्राण ऊर्जा आकाश से पृथ्वी की ओर छोटे-छोटे लाखों चमकीले कणों के रूप में हर समय आती रहती है जिसे प्रत्येक व्यक्ति द्वारा दो मिनट आकाश की ओर ध्यान से देखने पर आभास कर सकता है। इसकी तीव्रता एवं सघनता आकाश में बादल होने पर कम तथा आकाश स्वच्छ होने पर अधिक दिखाई देती है। यह प्राण ऊर्जा जल में घुलनशील होने के कारण हिलते हुए और बहते हुए जल में अधिक मात्राा में शीघ्र घुल जाती है। ब्रह्माण्ड को ऊर्जा का समुद्र कहते हैं और ग्रहादि के परिभ्रमण से इस समुद्र का मन्थन होता है। ग्रहों एवं नक्षत्रों के योग से जो अमृतमयी ब्रह्माण्डीय बनता है उसको अमृतमयी कुम्भ की संज्ञा दी गई है। स्पष्ट है कि कुम्भ महापर्व अमृतयमी ब्रह्माण्डीय पर्यावरण अर्थात् अमृतमयी प्राण ऊर्जा का एक उदाहरण है जो ग्रह और नक्षत्र के योग से बनता है।गुरु ग्रह बारह वर्ष बाद कुम्भ राशि पर आता है। गुरु कुम्भ राशि में और सूर्य मेष राशि में आने पर हरिद्वार में पूर्ण कुम्भ पर्व होता है।मेष राशि में गुरु व मकर में सूर्य होने पर प्रयाग में पूर्ण कुम्भ पर्व होता है।सिंह राशि में गुरु, मेष में सूर्य व तुला में चन्द्र होने पर उज्जैन में पूर्ण कुम्भ पर्व होता है।कर्क राशि में गुरु, कर्क राशि में सूर्य, चन्द्र के योग होने पर नासिक में पूर्ण कुम्भ होता है।

उक्त ग्रह योग समस्त स्थानों पर एक समान होते हैं। लेकिन हमारे प्राचीन ऋषियों ने पर्यावरण का अध्ययन करके सामान्य जन को इसका लाभ पहुंचाने की दृष्टि से चार ऐसे स्थान का चयन किया आध्यात्मिक दृष्टि से पवित्र और प्राकृतिक रूप से वहां शुद्ध जल नदी सदृश उपलब्ध रहता है। इस जल में स्नान करना अमृतमयी बताया गया है। वस्तुतः प्राचीन काल में वर्तमान काल की तरह शुद्ध जल प्राप्त करने की सुविधाएं प्राप्त नहीं थी। शुद्ध जल से स्नान के लिए पूर्णतः नदियों पर ही आश्रित रहना पड़ता था। आजकल तो शुद्ध जल घर पर ही उपलब्ध हो जाता है। अतः शुद्ध जल को खुले एवं बड़े पात्रों में रात्रि में खुले आकाश में कुम्भ काल में रख दिया जाए तो उस जल में भी लगभग वहीं गुण आ जाते हैं जो इन स्थानों में उन कालों में आते थे।
 ऐसे व्यक्ति जो कुम्भ पर्व काल में हरिद्वार आदि स्थानों पर नहीं जा पाते वे कुम्भ पर्वकाल के अमृतमयी पर्यावरण का अत्यधिक लाभ घर रहकर ही उठा सकते हैं। लेकिन अधिक लाभ जोकि स्थान विशेष की विशिष्ट ऊर्जा के कारण उक्त स्थान पर जाने पर ही प्राप्त होता है।

महाकुंभ 2013 : श्रद्धालुओं व मीडियाकर्मियों के जोरदार स्वागत की तैयार


महाकुंभ : 14 जनवरी 2013 से 10 मार्च 2013 तक




जनवरी में आयोजित होने जा रहे महाकुंभ को देखते हुए कई परियोजनाओं को ठंडे बस्ते में डाल देने वाली उत्तर प्रदेश सरकार इस धार्मिक महा समागम को कवर करने के लिए जुटने वाले देश-विदेश के हजारों मीडियाकर्मियों के लिए बेहतरीन व्यवस्था करने जा रही है।
प्रयाग तीर्थ के नाम से मशहूर इलाहाबाद में 12 साल बाद 14 जनवरी 2013 से शुरू होने वाला महाकुंभ 10 मार्च तक चलेगा। इसमें करीब चार करोड़ लोगों के पहुंचने का अनुमान है। जहां महाकुंभ का आयोजन 12 साल पर होता है, वहीं कुंभ मेला हर चार साल बाद बारी-बारी से इलाहाबाद, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में आयोजित होता है।
सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों के मुताबिक इस मौके पर एक अनुमान के मुताबिक करीब चार हजार भारतीय और तीन हजार विदेशी पत्रकार इलाहाबाद पहुंचेंगे। राज्य सरकार ने विदेशी मीडियाकर्मियों के लिए 100 और भारतीय के लिए 150 स्विस कॉटेज टेंट लगाने की मंजूरी दी है। महाकुंभ के मीडिया प्रभारी अशोक कुमार शर्मा ने बताया कि इस माह के अंत तक सभी तैयारियां पूरी कर ली जाएंगी।
सुविधा के एवज में विदेशी पत्रकरों से शुल्क वसूली पर फैसला लिया जाना है, जबकि राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकर इन टेंटों में बिलकुल मुफ्त रह सकेंगे। पत्रकारों को परंपरागत भारतीय व्यंजन व अन्य व्यंजन परोसे जाएंगे। भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडियाकर्मियों के लिए अलग-अलग कैफेटेरिया होगा जहां भुगतान कर 24 घंटे खाने-पीने की सुविधा मिलेगी।
संगम के किनारे बनने वाले मीडिया सेंटर में 600 पत्रकारों के ठहरने की व्यवस्था होगी। एक प्रेस कान्फ्रेंस हॉल होगा जहां मेले में आने वाले वीआईपी और गणमान्य मीडियाकर्मियों से बातचीत कर सकेंगे। खबर भेजने के लिए ब्राड बैंड कनेक्शन, इंटरनेट लैस 50 कंप्यूटर, 10 प्रिंटर, 10 स्कैनर के अलावा टेलीफोन लाइनें और फैक्स की व्यवस्था होगी। रिकार्डिग के लिए एक साउंड प्रूफ स्टूडियो और प्रसारण के लिए अपलिंकिंग की सुविधा उपलब्ध होगी। टीवी चैनलों के पत्रकारों के लिए अत्याधुनिक संपादन मशीनें और एफटीपी सर्वर भी होगा। दुनिया के सामने कुंभ मेला के दृश्यों को सामने लाने के लिए चौबीसों घंटे प्रसारण के लिए कैमरे लगाए जाएंगे और 25 ओबी वैन की पार्किं ग की व्यवस्था होगी। इसके अलावा छायांकन के लिहाज से महत्वपूर्ण समझे जाने वाले 10 स्थलों पर वाच टावर बनाया जाएगा जहां इलेक्ट्रानिक मीडियाकर्मी और छायाकार जा सकेंगे।

महाकुम्भ मेले में पुख्ता रहेंगे सुरक्षा के इंतजाम


MAHAKUMBH YATRA

अगले साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में आयोजित होने वाले महाकुम्भ मेले में सुरक्षा के कड़े प्रबंध होंगे। उत्तर प्रदेश सरकार ने केंद्र सरकार के साथ उत्तराखंड सरकार से भी सुरक्षा बल की मुहैया कराने का अनुरोध किया है। महाकुम्भ में भारत सहित दुनियाभार से करोड़ों श्रद्धालुओं के पहुंचने की सम्भावना है। राज्य के अपर पुलिस महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) जगमोहन यादव ने कहा कि सुरक्षा इंतजामों को बेहतर करने के उद्देश्य से जल्द उत्तर प्रदेश पुलिस जल्द उत्तराखंड पुलिस के अधिकारियों के साथ उच्चस्तरीय बैठक करेगी।
अधिकारियों के मुताबिक उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से केंद्र सरकार से 50 कंपनी सुरक्षा बल और उत्तराखंड सरकार से 10 कंपनी प्रांतीय सशस्त्र बल (पीएसी) मुहैया कराने का अनुरोध किया गया है।
मेला क्षेत्र में पीएसी और केंद्रीय सुरक्षा बलों के अलावा एक वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, 12 अपर पुलिस अधीक्षक, 50 पुलिस उपाधीक्षक, 550 निरीक्षक, 450 उप निरीक्षक और 5800 हेड कांस्टेबल तैनात किए जाएंगे।
इसके अलावा मेले में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे और बम निरोधक दस्तों और खोजी कुत्तों की भी सेवाएं ली जाएंगी। उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद में साल 2000 में पिछला महाकुम्भ आयोजित हुआ था।

27 नवंबर 2012

कार्तिक पूर्णिमा का माहत्म्य सर्वोपरि है

Hariharnath Mandir, Sonpur, Chhapra, Bihar
कार्तिक पूर्णिमा बड़ी ही पवित्र तिथि है। इस तिथि को ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अंगिरा और आदित्य आदि ने महापुनीत पर्व प्रमाणित किया है। अतः इसमें स्नान, दान, होम, यज्ञ, उपासना आदि करने का अनन्त फल मिलता है। इस दिन गंगा-स्नान तथा सायंकाल दीपदान का विशेष महत्त्व है। इसी पूर्णिमा के दिन सायंकाल भगवान का मत्स्यावतार हुआ था। इस कारण इस दिन किए गए दान, जप आदि का दस यज्ञों के समान फल मिलता है।

वैदिक काल में कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक दैत्य का वध किया था, इसलिए इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु का मत्स्यावतार भी हुआ था। इस दिन ब्रह्मा जी का ब्रह्मसरोवर पुष्कर में अवतरण भी हुआ था। अतः कार्तिक पूर्णिमा के दिन पुष्कर स्नान, गढ़गंगा, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार और रेणुकातीर्थ में स्नान दान का विषेश महत्व माना जाता है। इस दिन अगर भरणी-सा कृतिका नक्षत्र पड़े, तो स्नान का विशेष फल मिलता है। इस दिन कृतिका नक्षत्र हो तो यह महाकार्तिकी होती है, भरणी हो तो विशेष स्नान पर्व का फल देती है और यदि रोहिणी हो तो इसका फल और भी बढ़ जाता है। 

बिहार की राजधानी पटना से लगभग 25 किमी तथा वैशाली जिले के मुख्यालय हाजीपुर से 3 किलोमीटर दूर छपरा, जिले के सोनपुर में गंडक और गंगा के संगम तट पर लगने वाले इस मेले ने देश में पशु मेलों को एक अलग पहचान दी है। इस महीने यह मेला कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान के बाद शुरू होता है। एक समय इस पशु मेले में मध्य एशिया से कारोबारी आया करते थे। अब भी यह विश्व का सबसे बडा पशु मेला माना जाता है। मेलों से जुडे तमाम आयोजन तो यहां होते ही हैं। यहां हाथियों व घोडों की खरीद हमेशा से सुर्खियों में रहती है। पहले यह मेला हाजीपुर में होता था। सिर्फ हरिहर नाथ की पूजा सोनपुर में होती थी लेकिन बाद में मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश से मेला भी सोनपुर में ही लगने लगा।
इस बार 28 नवम्बर को कृतिका नक्षत्र है। जो व्यक्ति पूरे कार्तिक मास स्नान करते हैं उनका नियम कार्तिक पूर्णिमा को पूरा होता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रायरू श्री सत्यनारायण व्रत की कथा सुनी जाती है। सायंकाल देव-मंदिरों, चैराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधों के पास दीपक जलाए जाते हैं और गंगाजी को भी दीपदान किया जाता है। कार्तिकी में यह तिथि देव दीपावली-महोत्सव के रूप में मनाई जाती है। चान्द्रायणव्रत की समाप्ति भी आज के दिन होती है। कार्तिक पूर्णिमा से आरम्भ करके प्रत्येक पूर्णिमा को व्रत और जागरण करने से सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा नदी आदि पवित्र नदियों के समीप स्नान के लिए सहस्त्रों नर-नारी एकत्र होते हैं, जो बड़े भारी मेले का रूप बन जाता है। इस दिन गुरु नानक देव की जयन्ती भी मनाई जाती है।

महत्त्व

आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु चार मास के लिए योगनिद्रा में लीन होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी को उठते हैं और पूर्णिमा से कार्यरत हो जाते हैं। इसीलिए दीपावली को लक्ष्मीजी की पूजा बिना विष्णु, श्रीगणेश के साथ की जाती है। लक्ष्मी की अंशरूपा तुलसी का विवाह विष्णु स्वरूप शालिग्राम से होता है। इसी खुशी में देवता स्वर्गलोक में दिवाली मनाते हैं इसीलिए इसे देव दिवाली कहा जाता है।

सफलता का मंत्र

ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदम...पूर्णात, पूर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय.....पूर्णमेवावशिष्यते

विधि

गंध, अक्षत, पुष्प, नारियल, पान, सुपारी, कलावा, तुलसी, आंवला, पीपल के पत्तों से गंगाजल से रूजन करें। पूजा गृह, नदियों, सरोवरों, मन्दिरों में दीपदान करें। घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में मिट्टी का दीपक अवश्य जलाएं। इससे हमेशा संतति सही रास्ते पर चलेगी। धन की कभी भी कमी नहीं होगी। सुख, समृद्धि में बढ़ोतरी होगी। जीवन में ऊब, उकताहट, एकरसता दूर करने का अचूक उपाय। व्रत से ऐक्सिडेंट-अकाल मृत्यु कभी नहीं होंगे। बच्चे बात मानने लगेंगे। परिवार में किसी को पानी में डूबने या दुर्घटनाग्रस्त होने का खतरा नहीं होगा। बुरे वक्त में लिया कर्ज उतर जाएगा। आकस्मिक नेत्र रोग से बचाव होगा। नव���न मकान, वाहन आदि खरीदने के योग बनेंगे।

जीवन में सफलता के लिए क्या करें?

सर्व प्रथम लगातार परिश्रम, प्रार्थना, प्रतीक्षा करें।
सदैव प्रसन्न रहें। सबके प्रति विनम्रता बनाए रखें।
हर संकट में धैर्य रखें।
नियमित रूप से मन्दिर जाएं।
रोज सायंकाल के समय तुलसी के सामने दीपक जलाएं।
मधुर वाणी के साथ-साथ मितभाषी बनें।
घर परिवार और बाहर सबका सम्मान करें।
हो सके तो पूर्णिमा एकादशी तिथि में व्रत करें। सात्विक आहार करें।
सपरिवार संध्या आरती करें। जितना हो सके दान करें।

व्यवसाय की सफलता के लिए क्या न करें?

व्यापार स्थल पर दिन में न सोयें। गद्दी में बैठकर किसी की निंदा न करें।
विशेष परिस्थिति जब तक न हो, उधार न ही दें और न ही लें।
उधार की रकम न मिलने पर किसी का अपमान न करें।
लेद-देन के दौरान क्रोध बिल्कुल न करें। कामकाजी व्यक्ति/नौकर पर काम न छोड़ें।
लाभ कमाने के लिए खराब सामान बेचने का प्रयास न करें।
पुराने अनुभव पर आधारित काम न छोड़ें।

17 नवंबर 2012

जब हनुमान जी ने किया था समुद्र लंघन


जामवंत के वचन सुनकर श्री हनुमान जी परम प्रसन्न हुए और उन्होंने मानो समस्त ब्रह्मांड को कम्पायमान करते हुए सिंहनाद किया। वह वानरों को संबोधित कर कहने लगे ‘‘वानरो! मैं समुद्र को लांघ कर लंका को भस्म कर डालूंगा और रावण को उसके कुल सहित मार कर जानकी जी को ले आऊंगा। यदि कहो तो रावण के गले में रस्सी डालकर और लंका को त्रिकूट-पर्वत सहित उखाड़कर भगवान श्री राम के चरणों में डाल दूं।’’

हनुमान जी के इस प्रकार के वचन सुनकर जाम्बवान ने कहा, ‘‘ हे वीरों में श्रेष्ठ पवन पुत्र हनुमान! तुम्हारा शुभ हो, तुम केवल शुभ लक्षणा जानकी जी को जीती- जागती देखकर ही वापस लौट आओ। हे राम भक्त! तुम्हारा कल्याण हो।’’ बड़े-बूढ़े वानर शिरोमणियों के मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर हनुमान जी ने अपनी पूंछ को बारम्बार घुमाया और भगवान श्री राम के बल का स्मरण किया। हनुमान जी का रूप उस समय बड़ा ही उत्तम दिखाई पड़ रहा था। इसके बाद वह वानरों के बीच से उठ कर खड़े हो गए।

उनके सम्पूर्ण शरीर में रोमांच हो आया। उस अवस्था में हनुमान जी ने बड़े-बूढ़े वानरों को प्रणाम करके इस प्रकार कहा, ‘‘आकाश में विचरने वाले वायु देव का मैं पुत्र हूं। उनकी शक्ति की कोई सीमा नहीं है। उनका औरस पुत्र होने के कारण मेरे अंदर भी उन्हीं की शक्ति है। अपनी भुजाओं के वेग से मैं समुद्र को विक्षुब्ध कर सकता हूं। मुझे निश्चय जान पड़ता है कि मैं विदेह कुमारी जानकी जी का दर्शन करूंगा। अत: अब तुम लोग आनंदपूर्वक सारी चिंता छोड़कर खुशियां मनाओ। पवन पुत्र हनुमान जी की बातें सुनकर वानर सेनापति जाम्बवान को बड़ी प्रसन्नता हुई और वानरों का शोक जाता रहा।

उन्होंने कहा, ‘‘हनुमान! ये सभी श्रेष्ठ वानर तुम्हारे कल्याण की कामना करते हैं। तुमने अपने बंधुओं का सारा शोक नष्ट कर दिया। ऋषियों के प्रसाद, वृद्ध वानरों की अनुमति तथा भगवान श्री राम की कृपा से तुम इस महासागर को सहज ही पार कर जाओ। जब तक तुम लौट कर यहां आओगे, तब तक हम तुम्हारी प्रतीक्षा में एक पैर से खड़े रहेंगे, क्योंकि हम सभी वानरों के प्राण इस समय तुम्हारे ही अधीन हैं।’’ इसके बाद छलांग लगाने के लिए श्री हनुमान जी महेंद्र पर्वत के शिखर पर पहुंच गए।

उन्होंने मन ही मन छलांग लगाने की योजना बनाते हुए चित्त को एकाग्र कर श्री राम-स्मरण किया। उन्होंने मस्तक और ग्रीवा को ऊंचा किया और बड़े ही वेग से शरीर को सिकोड़ कर महेंद्र पर्वत के शिखर से छलांग लगा दी। कपिवर हनुमान जी के चरणों से दब कर वह पर्वत कांप उठा और दो घड़ी तक लगातार डगमगाता रहा। आकाश मार्ग से हनुमान जी ने वानरों से कहा, ‘‘वानरो! यदि मैं जनक नंदिनी सीता जी को नहीं देखूंगा तो इसी वेग से स्वर्ग में चला जाऊंगा। यदि मुझे स्वर्ग में भी मां सीता के दर्शन नहीं हुए तो राक्षस राज रावण को ही बांध लाऊंगा।’’

ऐसा कह कर हनुमान जी विघ्न बाधाओं का कोई विचार किए बिना बड़े ही वेग से दक्षिण दिशा में आगे बढ़े। हनुमान जी के वेग से टूट कर ऊपर उठे वृक्ष उनके पीछे एक मुहूर्त तक ऐसे चले जैसे राजा के पीछे उसके सैनिक चलते हैं।

महावीर हनुमान सुरसा के मुंह में

सुरसा के मुंह में

हनुमान जी को आकाश में बिना विश्राम लिए लगातार उड़ते देख कर समुद्र ने सोचा कि यह प्रभु श्री राम जी का कार्य पूरा करने के लिए जा रहे हैं। किसी प्रकार थोड़ी देर के लिए विश्राम दिलाकर इनकी थकान दूर करनी चाहिए। अत: समुद्र ने अपने जल के भीतर रहने वाले मैनाक पर्वत से कहा, ‘‘मैनाक! तुम थोड़ी देर के लिए ऊपर उठ कर अपनी चोटी पर हनुमान को बिठा कर उनकी थकान दूर करो।’’

समुद्र का आदेश पाकर मैनाक प्रसन्न होकर हनुमान जी को विश्राम देने के लिए तुरन्त उनके पास आ पहुंचा। उसने उनसे अपनी सुंदर चोटी पर विश्राम के लिए निवेदन किया। उसकी बातें सुनकर हनुमान जी ने कहा, ‘‘मैनाक! तुम्हारा कहना ठीक है लेकिन भगवान श्री रामचंद्र जी का कार्य पूरा किए बिना मेरे लिए विश्राम करने का कोई प्रश्र ही नहीं उठता।’’ ऐसा कह कर उन्होंने मैनाक को हाथ से छूकर प्रणाम किया और आगे चल दिए।

हनुमान जी को लंका की ओर प्रस्थान करते देख कर देवताओं ने सोचा कि यह रावण जैसे बलवान राक्षस की नगरी में जा रहे हैं। अत: इनके बल-बुद्धि की विशेष परीक्षा कर लेना इस समय अत्यंत आवश्यक है। यह सोचकर उन्होंने नागों की माता सुरसा से कहा, ‘‘देवी सुरसा! तुम हनुमान के बल-बुद्धि की परीक्षा लो।’’ देवताओं की बात सुनकर सुरसा तुरन्त एक राक्षसी का रूप धारण कर हनुमान जी के सामने जा पहुंची।

उसने उनका मार्ग रोकते हुए कहा, ‘‘वानरवीर! देवताओं ने आज मुझे तुमको अपना आहार बनाने के लिए भेजा है।’’ उसकी बातें सुनकर हनुमान जी ने कहा, ‘‘माता! इस समय मैं प्रभु श्री रामचंद्र जी के कार्य से जा रहा हूं। उनका कार्य पूरा करके मुझे लौट आने दो। उसके बाद मैं स्वयं ही आकर तुम्हारे मुंह में प्रविष्ट हो जाऊंगा। इस समय तुम मुझे मत रोको, यह तुमसे मेरी प्रार्थना है।’’इस प्रकार हनुमान जी ने सुरसा से बहुत प्रार्थना की लेकिन वह किसी प्रकार भी उन्हें जाने न दे रही थी।

अंत में हनुमान जी ने क्रुद्ध होकर कहा, ‘‘अच्छा तो लो तुम मुझे अपना आहार बनाओ।’’ उनके ऐसा कहते ही सुरसा अपना मुंह सोलह योजन तक फैलाकर उनकी ओर बढ़ी। हनुमान जी ने तुरन्त अपना आकार उससे दोगुना अर्थात 32 योजन तक बढ़ा लिया। इस प्रकार जैसे-जैसे वह अपने मुख का आकार बढ़ाती गई हनुमान जी अपने शरीर का आकार उसका दोगुना करते गए। अंत में उसने अपना मुंह फैलाकर 100 योजन तक चौड़ा कर लिया।

तब हनुमान जी तुरन्त अत्यंत छोटा रूप धारण करके उसके उस 100 योजन चौड़े मुंह में घुस कर तुरंत बाहर निकल आए। उन्होंने आकाश में खड़े होकर सुरसा से कहा, ‘‘माता! देवताओं ने तुम्हें जिस कार्य के लिए भेजा था वह पूरा हो गया है। अब मैं भगवान श्री रामचंद्र जी के कार्य के लिए अपनी यात्रा पुन: आगे बढ़ाता हूं।’’

सुरसा ने तब उनके सामने अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर कहा, ‘‘महावीर हनुमान! देवताओं ने मुझे तुम्हारे बल और बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए ही यहां भेजा था। तुम्हारे बल-बुद्धि की समानता करने वाला तीनों लोकों में कोई नहीं है। तुम शीघ्र ही भगवान श्रीरामचंद्र जी के सारे कार्य पूर्ण करोगे। इसमें कोई संदेह नहीं है। ऐसा मेरा आशीर्वाद है।’’

03 नवंबर 2012

क्या है छठ पूजा की महिमा, क्यों देते हैं सूर्य को अर्घ

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छठ पूजा व्रत 2015 के महत्त्वपूर्ण दिवस-

नहा खा – 15, नवम्बर 2015 

खरना / लोहंडा - 16 , नवम्बर 2015

सांझा अर्ग - 17नवम्बर 2015

सुबह अर्ग - 18 , नवम्बर 2015
पारण - 18, नवम्बर 2015







उत्सव का स्वरूप

छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।

नहाय खाय

पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफाइ कर उसे पवित्र बना लिया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है।

लोहंडा और खरना

दूसरे दिन कार्तीक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे ‘खरना’ कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

संध्या अर्घ्य

तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है।
शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रति के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नीयत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले का दृश्य बन जाता है।

उषा अर्घ्य

चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है। ब्रती वहीं पुनः इक्ट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। अंत में व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं।

क्या है छठ पूजा की महिमा, क्यों देते हैं सूर्य को अर्घ

इस पर्व के बारे में पुराणों में भी उल्लेख मिलता है। मैथिल वर्षकृत्य विधि में भी 'प्रतिशर षष्ठी' की महिमा के बारे में बताया गया है। बताया जाता है कि सूर्य पुत्र अंगराज कर्ण जल में खड़े होकर सूर्य की उपासना करते थे। पूजा के बाद कर्ण किसी भी याचक को इस व्रत को सभी हिंदू अत्यंत भक्ति भाव व श्रद्धा से मनाते हैं। सूर्याअर्घ के बाद व्रतियों से प्रसाद मांगकर खाने का प्रावधान है। प्रसाद में ऋतुफल के अतिरिक्त गेहूं के आंटे और गुड़ से शुद्ध घी में बने ठेकुआ व चावल के आंटे से गुड़ से बने भूसवा का होना अनिवार्य है। षष्ठी के दिन समीप की नदी या जलाशयों के तट पर अस्ताचलगामी और दूसरे दिन उदीयमान सूर्य को अर्घ समर्पित कर पर्व की समाप्ति होती है।

पंचमी को दिनभर खरना का व्रत रखने वाली व्रती शाम के समय गुड़ से बनी खीर, रोटी और फल का सेवन करते हैं। इसके बाद व्रती 36 घंटे का निर्जला व्रत करते हैं। व्रत समाप्त होने के बाद व्रती अन्न और जल ग्रहण करते हैं।

मान्यता है कि पंचमी के सायंकाल (खरना पूजन) से ही घर में भगवती षष्ठी का आगमन हो जाता है। इस प्रकार भगवान सूर्य के इस पावन व्रत में शक्ति व ब्रह्मा दोनों की उपासना का फल एक साथ प्राप्त होता है।

02 नवंबर 2012

करवा चौथ व्रत: परंपरा और स्वरूप



कार्तिक माह की कृष्ण चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी के दिन किया जाने वाला करकचतुर्थी यानी करवा चौथ का व्रत स्त्रियां अपने अखंड सौभाग्य की कामना और अपने पति की दीर्घायु के लिए रखती हैं। इस व्रत में शिव-पार्वती, गणेश और चन्द्रमा का पूजन किया जाता है। इस शुभ दिवस के उपलक्ष्य पर सुहागन स्त्रियां पति की लंबी आयु की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। पति-पत्नी के आत्मिक रिश्ते और अटूट बंधन का प्रतीक यह करवा चौथ या करक चतुर्थी व्रत संबंधों में नई ताजगी एवं मिठास लाता है। करवा चौथ में सरगी का काफी महत्व है। सरगी सास की तरफ से अपनी बहू को दी जाने वाली आशीर्वाद रूपी अमूल्य भेंट होती है।

परंपरा के तौर पर यह व्रत पर्व वैसे तो पूरे भारत में मनाया जाता है, परन्तु उत्तर-मध्य भारत में यह बहुत अधिक उत्साह व शौक से विवाहित स्त्रियों द्वारा मनाया जाता है। हालांकि भारत में ही कई ऐसे क्षेत्र भी हैं, जहां इसे बिल्कुल नहीं मनाया जाता है, जैसे कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड में गढ़वाल, अल्मोड़ा आदि अंचलों समेत समूचा दक्षिण भारत इस व्रत से अनभिज्ञ और उदासीन है। हां, यह जरुर है कि इन क्षेत्रों में जेष्ठ में पड़ने वाले तीन दिन के वट सावित्री व्रत  की अनिवार्यता जरूर है, जिसमें सुहागन स्त्री के व्रत का वही उद्देश्य होता है, जो  करवा चौथ के व्रत का। भारतीय दर्शन की पौराणिक परंपरा के अनुसार यह पर्व उन स्त्री जातकों के लिए भी बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, जिनके वैवाहिक संबंध ठीक नहीं चल रहे हैं या जिनके जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक न रहता हो। यदि ऐसी स्त्रियां इस पर्व पर विधि-विधान से उपवास करके पूजा-अर्चना व कामना करती हैं तो पति-पत्नी के संबंधों में निश्चित रूप से मधुरता बढ़ेगी, आपसी सामंजस्य बढ़ेगा तथा उनके वैवाहिक जीवन से कष्ट दूर हो जाएंगे और खुशहाली आएगी। इस व्रत यह एक गहन पौराणिक मान्यता है।

इस व्रत की शुरुआत प्रातःकाल सूर्योदय से पहले ही हो जाती है, जब सरगी के रूप में सास अपनी बहू को विभिन्न खाद्य पदार्थ एवं वस्त्र इत्यादि देती हैं। यह सरगी, सौभाग्य और समृद्धि का रूप होती है। सरगी के रूप में खाने की वस्तुओं को जैसे फल, मिठाई आदि को व्रती महिलाएं व्रत वाले दिन सूर्योदय से पूर्व प्रातः काल में तारों की छांव में ग्रहण कर लेती हैं। तत्पश्चात व्रत आरंभ होता है। इस दिन स्त्रियां साज-श्रृंगार करती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं और पूजा के समय नए वस्त्र पहनती हैं।

दोपहर में सभी सुहागन स्त्रियां एक जगह एकत्रित होती हैं, शगुन के गीत आदि गाती हैं। इसके बाद शाम को कथा सुनने के बाद अपनी सासू मां के पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं और उन्हें करवा समेत अनेक उपहार भेंट करती हैं। रात के वक्त चांद निकलने के बाद अनेक पकवानों से करवा चौथ की पूजा की जाती है तथा चांद को अर्घ्य देकर उसकी पूजा करते हैं। चंद्र दर्शन के बाद छलनी से आर-पार पति का चेहरा देखकर पति के हाथों से पत्नी जल पीती है और अपने व्रत को पूर्ण करती है।

करक चतुर्दशी के संदर्भ में एक कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार करवा नाम की एक स्त्री थी। वह बहुत पतिव्रता थी। वह अपने पति के साथ तुंगभद्रा नदी के पास एक गांव में रहती थी। एक बार करवा का पति नदी के किनारे कपड़े धो रहा होता है। तभी अचानक वहां एक मगरमच्छ आता है। वह उसके पति का पांव अपने मुंह में दबा लेता है और उसे न��ी में खींचकर ले जाने लगता है। तब उसका पति जोर-जोर से अपनी पत्नी को करवा-करवा कहके मदद के लिए पुकारने लगता है। पति की आवाज सुन कर करवा भागी-भागी वहां पहुंचती है। इसी दौरान वह अपने पति को फंसा देख मगरमच्छ को कच्चे धागे से बांध देती है। फिर वह यमराज से अपने पति के जीवन की रक्षा करने को कहती है। करवा की करुण व्यथा देख कर यमराज उससे कहते हैं कि वह मगर को मृत्यु नहीं दे सकते क्योंकि उसकी आयु शेष है, परंतु करवा के पति-धर्म को देख यमराज मगरमच्छ को यमपुरी भेज देते हैं। करवा के पति को दीर्घायु प्राप्त होती है और यमराज करवा से प्रसन्न हो उसे वरदान देते हैं कि जो भी स्त्री कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को व्रत का पालन करेगी, वह सौभाग्यवती होगी। तब से  करवा चौथ व्रत को मनाने की परंपरा चली आ रही है।

धर्म ग्रंथों में महाभारत से संबंधित एक और पौराणिक कथा का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार पांडवपुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले जाते हैं व दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आन पड़ते हैं। यह सब देख द्रौपदी चिंता में पड़ जाती हैं। वह भगवान श्रीकृष्ण से इन सभी समस्याओं से मुक्त होने का उपाय पूछती हैं।

महाभारत काल में पांडवों के दुख के दिनों में श्रीकृष्ण द्रौपदी से कहते हैं कि यदि वह कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करक चतुर्थी अर्थात करवा चौथ का व्रत रखें तो उन्हें इन सभी संकटों से मुक्ति मिल सकती है। भगवान कृष्ण के कथनानुसार द्रौपदी विधि-विधान समेत करवा चौथ का व्रत रखती हैं, जिससे उनके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

व्रत मात्र रस्म अदायगी
आज के समय में हर छोटे-बड़े शहर से लेकर महानगरों में  करवा चौथ व्रत का आधुनिक स्वरूप बिल्कुल बदल गया है। इस व्रत पर भी बाजार कल्चर हावी हो गया है। सरगी के रूप में किस्म किस्म के महंगे रेडिमेड फूड और गिफ्ट पैक चल पड़े हैं, जो कि सास अपनी बहू को देती हैं। सुहागन की साज-सज्जा अब पार्लर आधारित हो गई है और पहनावा डिजाइनर ड्रेसों, साड़ियों, लहंगों और आधुनिक चाइनीज़ करवों तक जा पहुंचा है। यहां तक कि चांद देखने के बाद पति दर्शन की छलनी भी अब चांदी की हो गई है। रही बात मेकअप की तो उसके लिए अमीरी और दिखावे की होड़ ने सभी परंपरागत स्वरूपों पर पानी फेर दिया है। ऐसे में लगता है कि यह त्योहार मध्यवर्गीय सम्पन्नता का आडंम्बर मात्र रह गया है। लेकिन इसके विपरीत देहातों में आज भी इसका परंपरागत वजूद कायम है और वहां पर लगता है कि वास्तव में यह व्रत सुहागनों द्वारा की जाने वाली एक उपयुक्त साधना है, जिसे अधिकांश महिलाएं आज भी श्रद्धापूर्वक निभा रही हैं।

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