आपका स्वागत है...

मैं
135 देशों में लोकप्रिय
इस ब्लॉग के माध्यम से हिन्दू धर्म को जन-जन तक पहुचाना चाहता हूँ.. इसमें आपका साथ मिल जाये तो बहुत ख़ुशी होगी.. इस ब्लॉग में पुरे भारत और आस-पास के देशों में हिन्दू धर्म, हिन्दू पर्व त्यौहार, देवी-देवताओं से सम्बंधित धार्मिक पुण्य स्थल व् उनके माहत्म्य, चारोंधाम,
12-ज्योतिर्लिंग, 52-शक्तिपीठ, सप्त नदी, सप्त मुनि, नवरात्र, सावन माह, दुर्गापूजा, दीपावली, होली, एकादशी, रामायण-महाभारत से जुड़े पहलुओं को यहाँ देने का प्रयास कर रहा हूँ.. कुछ त्रुटी रह जाये तो मार्गदर्शन करें...
वर्ष भर (2017) का पर्व-त्यौहार (Year's 2016festival) नीचे है…
अपना परामर्श और जानकारी इस नंबर
9831057985 पर दे सकते हैं....

धर्ममार्ग के साथी...

लेबल

आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

26 जनवरी 2012

FURSAT KE PAL: History: Indian Freedom Struggle (1857-1947)

FURSAT KE PAL: History: Indian Freedom Struggle (1857-1947): इतिहास : भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम (1857-1947)

VANDE MATRAM : JAI HIND
पुराने समय में जब पूरी दुनिया के लोग भारत आने के लिए उत्‍सु...

24 जनवरी 2012

Basant Panchmi / बसंत पंचमी पर्व

करीब से जानते हैं क्या है 
बसंत पंचमी व सरस्वती पूजन



आप सभी बसंत पंचमी पर्व के बाते में जानते हें ..इस वर्ष यह पर्व माघ मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन 28 जनवरी, 2012 को मनाया जायेगा…इस दिन अबूझ मुहूर्त होने के कारण अनेक युवक-युवतियां विवाह बंधन में भी बंधते हें…बसंत पंचमी को अबुझ सावा होता है। यानी इस दिन विवाह के लिए पंडितों से मुहूर्त निकलवाने की जरूरत नहीं पड़ती। ऐसे में इस दिन वह लोग भी विवाह करते हैं जिनकी शादी में ग्रहों की चाल की वजह से कुछ अड़चनें होती हैं। यही कारण है कि इस मुहूर्त की जबर्दस्त डिमांड भी रहती है।
हिन्दु कैलेण्डर के अनुसार प्रत्येक वर्ष माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को वसंत पंचमी के रुप में मनाया जाता है. भारत में छ: ऋतुओं को मुख्य रुप से मनाया जाता है. पतझड़ ऋतु के बाद वसंत ऋतु का आगमन होता है. हर तरफ रंग-बिरंगें फूल खिले दिखाई देते हैं. खेतों में पीली सरसों लहलहाती बहुत ही मदमस्त लगती है. वसंत पंचमी का दिन बहुत ही शुभ माना जाता है. वसंत पंचमी से पांच दिन पहले से वसंत ऋतु का आरम्भ माना जाता है. चारों ओर हरियाली और खुशहाली का वातावरण छाया रहता है. इस दिन को विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है. इसलिए विद्यार्थियों के लिए विद्या आरम्भ का मुहूर्त बहुत ही श्रेष्ठ मुहूर्त होता है. जिन व्यक्तियों को गृह प्रवेश के लिए कोई मुहूर्त ना मिल रहा हो वह इस दिन गृह प्रवेश कर सकते हैं. कोई व्यक्ति अपने नए व्यवसाय को आरम्भ करने के लिए शुभ मुहूर्त को तलाश रहा हो तब वह वसंत पंचमी के दिन अपना नया व्यवसाय आरम्भ कर सकता है. अन्य कोई भी कार्य जिनके लिए किसी को कोई उपयुक्त मुहूर्त ना मिल रहा हो तब वह वसंत पंचमी के दिन वह कार्य कर सकता है.
पतझड़ में पेड़ों से पुराने पत्तों का गिरना और इसके बाद नए पत्तों का आना बसंत के आगमन का सूचक है। इस प्रकार बसंत का मौसम जीवन में सकारात्मक भाव, ऊर्जा, आशा और विश्वास जगाता है। यह भाव बनाए रखने के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि ज्ञान और विद्या की देवी की पूजा के साथ बसंत ऋतु का स्वागत किया जाता है । माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी बसंत पंचमी के रूप में मनाई जाती है। यह बसंत ऋतु के आगमन का प्रथम दिन माना जाता है। यह दिन सरस्वती की जयंती के रूप में मनाया जाता है। इसे श्री पंचमी भी कहते हैं। इस दिन ज्ञान की प्राप्ति के लिए देवी सरस्वती की पूजा की परंपरा है। इस दिन माता सरस्वती, भगवान कृष्ण और कामदेव व रति की पूजा की परंपरा है ।बसंत को ऋतुओं का राजा अर्थात सर्वश्रेष्ठ ऋतु माना गया है। इस समय पंच-तत्त्व अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रुप में प्रकट होते हैं। पंच-तत्त्व- जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि सभी अपना मोहक रूप दिखाते हैं। आकाश स्वच्छ है, वायु सुहावनी है, अग्नि (सूर्य) रुचिकर है तो जल! पीयूष के समान सुखदाता! और धरती! उसका तो कहना ही क्या वह तो मानों साकार सौंदर्य का दर्शन कराने वाली प्रतीत होती है! ठंड से ठिठुरे विहंग अब उड़ने का बहाना ढूंढते हैं तो किसान लहलहाती जौ की बालियों और सरसों के फूलों को देखकर नहीं अघाता! धनी जहाँ प्रकृति के नव-सौंदर्य को देखने की लालसा प्रकट करने लगते हैं तो निर्धन शिशिर की प्रताड़ना से मुक्त होने के सुख की अनुभूति करने लगते हैं।
बसंत ऋतु का आगमन बसंत पंचमी पर्व से होता है। शांत, ठंडी, मंद वायु, कटु शीत का स्थान ले लेती है तथा सब को नवप्राण व उत्साह से स्पर्श करती है। पत्रपटल तथा पुष्प खिल उठते हैं। स्त्रियाँ पीले- वस्त्र पहन, बसंत पंचमी के इस दिन के सौन्दर्य को और भी अधिक बढ़ा देती हैं। लोकप्रिय खेल पतंगबाजी, बसंत पंचमी से ही जुड़ा है। यह विद्यार्थियों का भी दिन है, इस दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की पूजा आराधना भी की जाती है।

बसंत का अर्थ—
बसंत ऋतु तथा पंचमी का अर्थ है- शुक्लपक्ष का पाँचवां दिन अंग्रेज़ी कलेंडर के अनुसार यह पर्व जनवरी-फ़रवरी तथा हिंदू तिथि के अनुसार माघ के महीने में मनाया जाता है।

बसंत पंचमी का पौराणिक महत्त्व—-
संपूर्ण संस्कृति की देवी के रूप में दूध के समान श्वेत रंग वाली सरस्वती (Saraswati Devi) के रूप को अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण में वाग्देवी को चार भुजायुक्त व आभूषणों से सुसज्जित दर्शाया गया है। स्कंद पुराण में सरस्वती (Saraswati Devi) जटाजुटयुक्त, अर्धचन्द्र मस्तक पर धारण किए, कमलासन पर सुशोभित, नील ग्रीवा वाली एवं तीन नेत्रों वाली कही गई हैं। रूप मंडन में वाग्देवी का शांत, सौभ्य व शास्त्रोक्त वर्णन मिलता है।

बसंत पंचमी (Basant Panchami) के पर्व को मनाने का एक कारण बसंत पंचमी (Basant Panchami) के दिन सरस्वती जयंती का होना भी बताया जाता है। कहते हैं कि देवी सरस्वती (Saraswati Devi) बसंत पंचमी के दिन ब्रह्मा के मानस से अवतीर्ण हुई थीं। बसंत के फूल, चंद्रमा व हिम तुषार जैसा उनका रंग था।

बसंत पंचमी (Basant Panchami) के दिन जगह-जगह माँ शारदा की पूजा-अर्चना की जाती है। माँ सरस्वती (Saraswati Devi) की कृपा से प्राप्त ज्ञान व कला के समावेश से मनुष्य जीवन में सुख व सौभाग्य प्राप्त होता है। माघ शुक्ल पंचमी को सबसे पहले श्रीकृष्ण (shri krishna) ने देवी सरस्वती (Saraswati Devi) का पूजन किया था, तब से सरस्वती पूजन (Saraswati Pujan) का प्रचलन बसंत पंचमी (Basant Panchami) के दिन से मनाने की परंपरा चली आ रही है।

सरस्वती (Saraswati Devi) ने अपने चातुर्य से देवों को राक्षसराज कुंभकर्ण से कैसे बचाया, इसकी एक मनोरम कथा वाल्मिकी रामायण के उत्तरकांड में आती है। कहते हैं देवी वर प्राप्त करने के लिए कुंभकर्ण ने दस हजार वर्षों तक गोवर्ण में घोर तपस्या की। जब ब्रह्मा वर देने को तैयार हुए तो देवों ने कहा कि यह राक्षस पहले से ही है, वर पाने के बाद तो और भी उन्मत्त हो जाएगा तब ब्रह्मा ने सरस्वती (Saraswati Devi) का स्मरण किया।

सरस्वती (Saraswati Devi) राक्षस की जीभ पर सवार हुईं। सरस्वती (Saraswati Devi) के प्रभाव से कुंभकर्ण ने ब्रह्मा से कहा- ‘स्वप्न वर्षाव्यनेकानि। देव देव ममाप्सिनम।’ यानी मैं कई वर्षों तक सोता रहूँ, यही मेरी इच्छा है। इस तरह देवों को बचाने के लिए सरस्वती और भी पूज्य हो गईं। मध्यप्रदेश के मैहर में आल्हा का बनवाया हुआ सरस्वती (Saraswati Devi) का प्राचीन मंदिर है। वहाँ के लोगों का विश्वास है कि आल्हा आज भी बसंत पंचमी (Basant Panchami) के दिन यहाँ माँ की पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।
विष्णुधर्मोत्तर पुराण में वाग्देवी को चार भुजा युक्त व आभूषणों से सुसज्जित दर्शाया गया है। स्कंद पुराण में सरस्वती जटा-जुटयुक्त, अर्धचन्द्र मस्तक पर धारण किए, कमलासन पर सुशोभित, नील ग्रीवा वाली एवं तीन नेत्रों वाली कही गई हैं। रूप मंडन में वाग्देवी का शांत, सौभ्य व शास्त्रोक्त वर्णन मिलता है। संपूर्ण संस्कृति की देवी के रूप में दूध के समान श्वेत रंग वाली सरस्वती के रूप को अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। बसंत पर्व का आरंभ बसंत पंचमी से होता है। इसी दिन श्री अर्थात विद्या की अधिष्ठात्री देवी महासरस्वती का जन्मदिन मनाया जाता है। सरस्वती ने अपने चातुर्य से देवों को राक्षसराज कुंभकर्ण से कैसे बचाया, इसकी एक मनोरम कथावाल्मिकी रामायण के उत्तरकांड में आती है। कहते हैं देवी वर प्राप्त करने के लिए कुंभकर्ण ने दस हज़ार वर्षों तक गोवर्ण में घोर तपस्या की। जब ब्रह्मा वर देने को तैयार हुए तो देवों ने कहा कि यह राक्षस पहले से ही है, वर पाने के बाद तो और भी उन्मत्त हो जाएगा तब ब्रह्मा ने सरस्वती का स्मरण किया। सरस्वती राक्षस की जीभ पर सवार हुईं। सरस्वती के प्रभाव से कुंभकर्ण ने ब्रह्मा से कहा- स्वप्न वर्षाव्यनेकानि। देव देव ममाप्सिनम। यानी मैं कई वर्षों तक सोता रहूँ, यही मेरी इच्छा है।
क्यों होता हें बसंत पंचमी के दिन सरस्वती जयंती/ पूजन ???

ब्राह्मण-ग्रंथों के अनुसार वाग्देवी सरस्वती ब्रह्मस्वरूपा, कामधेनु तथा समस्त देवों की प्रतिनिधि हैं। ये ही विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी हैं। अमित तेजस्वनी व अनंत गुणशालिनी देवी सरस्वती की पूजा-आराधना के लिए माघमास की पंचमी तिथि निर्धारित की गयी है। बसंत पंचमी को इनका आविर्भाव दिवस माना जाता है। अतः वागीश्वरी जयंती व श्रीपंचमी नाम से भी यह तिथि प्रसिद्ध है। ऋग्वेद के (10/125 सूक्त) में सरस्वती देवी के असीम प्रभाव व महिमा का वर्णन है। माँ सरस्वती विद्या व ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं। कहते हैं। जिनकी जिव्हा पर सरस्वती देवी का वास होता है, वे अत्यंत ही विद्वान व कुशाग्र बुद्धि होते हैं। बहुत लोग अपना ईष्ट माँ सरस्वती को मानकर उनकी पूजा-आराधना करते हैं।
इस दिन विद्या की देवी सरस्वती के जन्म हुआ था । धार्मिक मान्यता है कि बसंत पंचमी के दिन ही ब्रह्मा के मानस से सरस्वती पैदा हुई थी। माता सरस्वती को बुद्धि, ज्ञान, संगीत और कला की देवी माना जाता है। पुरातन काल में भी ऋषि-मुनियों के आश्रम एवं गुरुकुल में बालकों को विद्या प्राप्ति के लिए प्रवेश कराया जाता था। सरस्वती पूजा विधान माघ चतुर्थी के दिन सरस्वती पूजा की शुरुआत शुद्ध आचरण, वाणी संयम जैसे नियमों के पालन से होती है । वसंत पंचमी के दिन सुबह स्नान कर घट-स्थापना कर संकल्प लेने के बाद सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है । आम के पत्ते, सफेद और पीले फूल देवी को चढ़ाए जाते हैं । इसके बाद प्रसाद के रूप में खीर, दूध, दही, मक्खन, सफेद तिल के लड्डू, सफेद चंदन, वस्त्र, घी, नारियल, शक्कर व मौसमी फल चढ़ाएं । वैदिक मंत्र, सरस्वची कवच, स्तुति आदि से देवी की प्रार्थना करें। इस दिन किताबों और कलम की पूजा की जाती है । ऐसी मान्यता है कि इनमें सरस्वती का वास होता है । इस दिन बालकों को अक्षर ज्ञान एवं विद्यारंभ भी कराया जाता है । बसंत पंचमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण एवं भगवान विष्णु पूजा की भी परंपरा है । स्वयं श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि बसंत ऋतु के रूप में भगवान कृष्ण प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होते हैं। अत: ब्रज में बसंत के दिन से ही होली का उत्सव शुरू हो जाता है और राधा-गोविंद का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन दाम्पत्य जीवन में सुख की कामना से कामदेव और उनकी पत्नी रति की पूजा की जाती है। कथा एक दिन ब्रह्मदेव अपनी सृष्टि को देखने के लिए भूमि पर घूमने लगे। उन्होंने यहां पर सभी जीव-जन्तु को यहां मौन, उदास और निष्क्रीय देखा। यह दशा देखकर ब्रह्माजी बहुत चिंतित हुए और वे सोचने लगे कि क्या उपाय किया जाएं? कि सभी प्राणी एवं वनस्पति आनंद और प्रसन्न होकर झुमने लगे। मन में ऐसा विचार कर उन्होंने कमल पुष्पों पर जल छिड़का उनमें से देवी सरस्वती प्रकट हुई। जो सफेद वस्त्र धारण किए हुए, गले में कमलों की माला सहित अपने हाथों में वीणा, पुस्तक धारण किए हुए थी। भगवान ब्रह्मा ने देवी से कहा, तुम सभी प्राणियों के कंठ में निवास कर इनको वाणी प्रदान करो। सभी को चैतन्य एवं प्रसन्न करना तुम्हारा काम होगा और विश्व में भगवती सरस्वती के नाम से विख्यात होगी। चुंकि तुम इस लोक का कल्याण करोगी, इसलिए विद्वत समाज तुम्हारा आदर कर पूजा करेगा। बसंत पंचमी को सरस्वती मां की पूजा की जाती है। सरस्वती ज्ञान और विद्या की देवी है। सरस्वती की आराधना से विद्या आती है, विद्या से विनम्रता, विनम्रता से पात्रता, पात्रता से धन और धन से सुख मिलता है। कृष्ण ने गीता में स्वयं को ऋतुओं में बसंत कहा है। जिसका अर्थ है बसंत की तरह उल्लास से भरना । बसंत में वामदेव और शनि की पूजा की भी परंपरा है। सनातन धर्म में काम को पुरुषार्थ कहा गया है। कामदेव की पूजा कर इसी पुरुषार्थ की प्राप्ति की जाती है। पंचमी बसंत ऋतु के आगमन का प्रथम दिन होता है। बसंत ऋतु फूलों का मौसम है, फूलों की तरह मुस्कुराहट फैलाएं। बसंत श्रृंगार की ऋतु है। जो व्यक्ति को व्यवस्थित रखने और सजे-धजे रहने की सीख देती है। बसंत का रंग बासंती होता है। जो त्याग का, विजय का रंग है, अपने विकारों का त्याग करें एवं कमजोरियों पर विजय पाएं। उल्लास से भरे हुए रहें। वसंत में सूर्य उत्तरायण होता है। जो संदेश देता है कि सूर्य की भांति हम भी प्रखर और गंभीर बनें। प्राकृतिक दृष्टि से बसंत को ऋतुओं का राजा कहा गया है। क्योंकि बसंत एकमात्र ऐसी ऋतु है जिसमें उर्वरा शक्ति यानि उत्पादन क्षमता अन्य ऋतु की अपेक्षा बढ़ जाती है। वृक्षों में नए पत्ते आते हैं, फसल पकती है और सृजन की क्षमता बढ़ जाती है। मौसम न ज्यादा ठंडा न ही ज्यादा गरम होता है, जो कार्यक्षमता बढ़ाता है। बसंत पंचमी के साथ ही ठंड का मौसम विदा होता है। इसके बाद गर्मी शुरू होती है। इसलिए कहा गया है बसंत में गरमी करने वाली चीजों को नहीं खाना चाहिए। पंचमी को आम की मंजरी (फूल या बौर) का सेवन करना चाहिए तथा इसे हाथों में मलना चाहिए। मान्यता है ऐसा करने से अतिसार, प्रमेह एवं रक्त रोग नहीं होते हैं।जिन पर सरस्वती की कृपा होती है, वे ज्ञानी और विद्या के धनी होते हैं। बसंत पंचमी का दिन सरस्वती जी की साधना को ही अर्पित है। शास्त्रों में भगवती सरस्वती की आराधना व्यक्तिगत रूप में करने का विधान है, किंतु आजकल सार्वजनिक पूजा-पाण्डालों में देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापित कर पूजा करने का विधान चल निकला है। यह ज्ञान का त्योहार है, फलतः इस दिन प्रायः शिक्षण संस्थानों व विद्यालयों में अवकाश होता है। विद्यार्थी पूजा स्थान को सजाने-संवारने का प्रबन्ध करते हैं। महोत्सव के कुछ सप्ताह पूर्व ही, विद्यालय विभिन्न प्रकार के वार्षिक समारोह मनाना प्रारंभ कर देते हैं। संगीत, वाद- विवाद, खेल- कूद प्रतियोगिताएँ एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। बसंत पंचमी के दिन ही विजेयताओं को पुरस्कार बांटे जाते हैं। माता-पिता तथा समुदाय के अन्य लोग भी बच्चों को उत्साहित करने इन समारोहों में आते हैं। समारोह का आरम्भ और समापन सरस्वती वन्दना से होता है। प्रार्थना के भाव हैं-
ओ माँ सरस्वती ! मेरे मस्तिष्क से अंधेरे (अज्ञान) को हटा दो तथा मुझे शाश्वत ज्ञान का आशीर्वाद दो!
परीक्षा के समय में हर छात्र चाहता है कि वह परीक्षा में उत्तीर्ण हो बल्कि उसकी दिली ख्वाहिश होती है कि वह अच्दे नंबरों से परीक्षा उत्तीर्ण करें । कई छात्रों की समस्या होती है कि कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें पाठ याद नहीं रह पाता, वे जवाब भूल जाते हैं । छात्रों को अच्छी सफलता के लिए खूब पढ़-लिखकर ज्ञान व विद्या की देवी सरस्वती की आराधना करनी चाहिए ।

बसंतोत्सव और पीला रंग—

यह रंग हिन्दुओं का शुभ रंग है। बसंत पंचमी पर न केवल पीले रंग के वस्त्र पहने जाते हैं, अपितु खाद्य पदार्थों में भी पीले चावल पीले लड्डू व केसर युक्त खीर का उपयोग किया जाता है, जिसे बच्चे तथा बड़े-बूढ़े सभी पसंद करते है। अतः इस दिन सब कुछ पीला दिखाई देता है और प्रकृति खेतों को पीले-सुनहरे रंग से सजा देती है, तो दूसरी ओर घर-घर में लोग के परिधान भी पीले दृष्टिगोचर होते हैं। नवयुवक-युवती एक -दूसरे के माथे पर चंदन या हल्दी का तिलक लगाकर पूजा समारोह आरम्भ करते हैं। तब सभी लोग अपने दाएं हाथ की तीसरी उंगली में हल्दी, चंदन व रोली के मिश्रण को माँ सरस्वती के चरणों एवं मस्तक पर लगाते हैं, और जलार्पण करते हैं। धान व फलों को मूर्तियों पर बरसाया जाता है। गृहलक्ष्मी फिर को बेर, संगरी, लड्डू इत्यादि बांटती है। प्रायः बसंत पंचमी के दिन पूजा समारोह विधिवत नहीं होते हैं, क्योंकि लोग प्रायः घर से बाहर के कार्यों में व्यस्त रहते हैं। हाँ, मंदिर जाना व सगे-संबंधियों से भेंट कर आशीर्वाद लेना तो इस दिन आवश्यक ही है।
बच्चे व किशोर बसंत पंचमी का बड़ी उत्सुकता से इंतजार करते हैं। आखिर, उन्हें पतंग जो उड़ानी है। वे सभी घर की छतों या खुले स्थानों पर एकत्रित होते हैं, और तब शुरू होती है, पतंगबाजी की जंग। कोशिश होती है, प्रतिस्पर्धी की डोर को काटने की। जब पतंग कटती है, तो उसे पकड़ने की होड़ मचती है। इस भागम-भाग में सारा माहौल उत्साहित हो उठता है।

ज्योतिष में बसंत पंचमी—
सूर्य के कुंभ राशि में प्रवेश के साथ ही रति-काम महोत्सव आरंभ हो जाता है। यह वही अवधि है, जिसमें पेड़-पौधे तक अपनी पुरानी पत्तियों को त्यागकर नई कोपलों से आच्छादित दिखाई देते हैं। समूचा वातावरण पुष्पों की सुगंध और भौंरों की गूंज से भरा होता है। मधुमक्खियों की टोली पराग से शहद लेती दिखाई देती है, इसलिए इस माह को मधुमास भी कहा जाता है। प्रकृति काममय हो जाती है। बसंत के इस मौसम पर ग्रहों में सर्वाधिक विद्वान ‘शुक्र’ का प्रभाव रहता है। शुक्र भी काम और सौंदर्य के कारक हैं, इसलिए रति-काम महोत्सव की यह अवधि कामो-द्दीपक होती है। अधिकतर महिलाएं इन्हीं दिनों गर्भधारण करती हैं। जन्मकुण्डली का पंचम भाव-विद्या का नैसर्गिक भाव है। इसी भाव की ग्रह-स्थितियों पर व्यक्ति का अध्ययन निर्भर करता है। यह भाव दूषित या पापाक्रांत हो, तो व्यक्ति की शिक्षा अधूरी रह जाती है। इस भाव से प्रभावित लोग मां सरस्वती के प्राकटच्य पर्व माघ शुक्ल पंचमी (बसंत पंचमी) पर उनकी पूजा-अर्चना कर इच्छित क़ामयाबी हासिल कर सकते हैं। इसके लिए माता का ध्यान कर पढ़ाई करें, उसके बाद गणेश नमन और फिर मन्त्र जाप करें। इसके अलावा संक्षिप्त विधि का सहारा भी लिया जा सकता है। हर राशि के छात्र अपनी राशि के शुभ पुष्पों से मां महासरस्वती की साधना कर सकते हैं। मेष और वृश्चिक राशि के छात्र लाल पुष्प विशेषत: गुड़हल, लाल कनेर, लाल गैंदे आदि से आराधना करके लाभ उठाएं। वृष और तुला राशि वाले श्वेत पुष्पों तथा मिथुन और कन्या राशि वाले छात्र कमल पुष्पों से आराधना कर सकते हैं। कर्क राशि वाले श्वेत कमल या अन्य श्वेत पुष्प से, जबकि सिंह राशि के लोग जवाकुसुम (लाल गुड़हल) से आराधना करके लाभ पा सकते हैं। धनु और मीन के लोग पीले पुष्प तथा मकर और कुंभ राशि के लोग नीले पुष्पों से मां सरस्वती की आराधना कर सकते हैं।
अगर आप मंदिर जा रहे हैं, तो पहले ॐ गं गणपतये नम: मन्त्र का जाप करें। उसके बाद माता सरस्वती के इस मन्त्र ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महासरस्वती देव्यै नम: का जाप करके आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। इस मन्त्र के जाप से जन्मकुण्डली के लग्न (प्रथम भाव), पंचम (विद्या) और नवम (भाग्य) भाव के दोष भी समाप्त हो जाते हैं। इन तीनों भावों (त्रिकोण) पर श्री महाकाली, श्री महासरस्वती और श्री महालक्ष्मी का अधिपत्य माना जाता है। मां सरस्वती की कृपा से ही विद्या, बुद्धि, वाणी और ज्ञान की प्राप्ति होती है। देवी कृपा से ही कवि कालिदास ने यश और ख्याति अर्जित की थी। वाल्मीकि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, शौनक और व्यास जैसे महान ऋषि देवी-साधना से ही कृतार्थ हुए थे।

बसंतोत्सव पर प्रसाद और भोजन—
बसंत पंचमी के दिन वाग्देवी सरस्वती जी को पीला भोग लगाया जाता है और घरों में भोजन भी पीला ही बनाया जाता है। इस दिन विशेषकर मीठा चावल बनाया जाता है। जिसमें बादाम, किसमिस, काजू आदि डालकर खीर आदि विशेष व्यंजन बनाये जाते हैं। इसे दोपहर में परोसा जाता है। घर के सदस्यों व आगंतुकों में पीली बर्फी बांटी जाती है। केसरयुक्त खीर सभी को प्रिय लगती है। गायन आदि के विशेष कार्यक्रमों से इस त्यौहार का आनन्द और व्यापक हो जाता है।

Saravati Puja / विद्या की देवी सरस्वती की पूजा

बसंत पंचमी का महत्व


कड़कड़ाती ठंड के अंतिम पड़ाव के रूप में बसंत ऋतु का आगमन प्रकृति को बासंती रंग से सराबोर कर जाता है। अंगारों की तरह दिखते पलाश के फूल, आम के पेड़ों पर आए बौर, हरियाली से ढँकी धरती और गुलाबी ठंड के इस ऋतु हिंदू धर्म के लिए बहुत महत्व है। माघ के महीने की पंचमी को वसंत पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। मौसम का सुहाना होना इस मौके को और रूमानी बना देता है। परंपरागत त्योहार होने के कारण कई प्राचीन मान्यताएँ भी समाज में हैं।

इस दिन बच्चों को पहला अक्षर लिखना सिखाया जाता है, पितृ तर्पण किया जाता है, कामदेव की पूजा की जाती है और सबसे महत्वपूर्ण विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। पहनावा भी परंपरागत होता है। पुरुष कुर्ता-पाजामा में और स्त्रियाँ पीले या वासंती रंग की साड़ी पहनती हैं। गायन और वादन सहित अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं जो सरस्वती माँ को अर्पित किए जाते हैं।

बसंत पंचमी को श्री पंचमी तथा ज्ञान पंचमी भी कहते हैं। अमेरिका में रहने वाले बंगाली समुदाय के लोग इस त्योहार को धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन वे सरस्वती पूजा का विशेष और वृहद आयोजन करते हैं जिसमें वहाँ का भारतीय समुदाय शामिल होता है।

श्रीकृष्ण ने की प्रथम पूजा : विद्या की अभिलाषा रखने वाले व्यक्ति के लिए ये दिन बहुत महत्वपूर्ण होता है। सबसे पहले माँ सरस्वती की पूजा के बाद ही विद्यारंभ करते हैं। ऐसा करने पर माँ प्रसन्न होती है और बुद्घि तथा विवेकशील बनने का आशीर्वाद देती है। विद्यार्थी के लिए माँ सरस्वती का स्थान सबसे पहले होता है।

इस दिन देवी सरस्वती की पूजा करने के पीछे भी पौराणिक कथा है। इनकी सबसे पहले पूजा श्रीकृष्ण और ब्रह्माजी ने ही की है। देवी सरस्वती ने जब श्रीकृष्ण को देखा तो उनके रूप पर मोहित हो गईं और पति के रूप में पाने की इच्छा करने लगीं। भगवान कृष्ण को इस बात का पता चलने पर उन्होंने कहा कि वे तो राधा के प्रति समर्पित हैं। परंतु सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने वरदान दिया कि प्रत्येक विद्या की इच्छा रखनेवाला माघ मास की शुक्ल पंचमी को तुम्हारा पूजन करेगा।

यह वरदान देने के बाद स्वयं श्रीकृष्ण ने पहले देवी की पूजा की। सृष्टि निर्माण के लिए मूल प्रकृति के पाँच रूपों में से सरस्वती एक है, जो वाणी, बुद्घि, विद्या और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी है। वसंत पंचमी का अवसर इस देवी को पूजने के लिए पूरे वर्ष में सबसे उपयुक्त है क्योंकि इस काल में धरती जो रूप धारण करती है, वह सुंदरतम होता है।

ब्रह्माजी की रचना सरस्वती : सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्माजी ने जब धरती को मूक और नीरस देखा तो अपने कमंडल से जल लेकर छिटका दिया। इससे सारी धरा हरियाली से आच्छादित हो गई पर साथ ही देवी सरस्वती का उद्भव हुआ जिसे ब्रह्माजी ने आदेश दिया कि वीणा व पुस्तक से इस सृष्टि को आलोकित करें। तभी से देवी सरस्वती के वीणा से झंकृत संगीत में प्रकृति विहंगम नृत्य करने लगती है। देवी के ज्ञान का प्रकाश पूरी धरा को प्रकाशमान करता है। जिस तरह सारे देवों और ईश्वरों में जो स्थान श्रीकृष्ण का है वही स्थान ऋतुओं में वसंत का है। यह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने स्वीकार किया है।

कामदेव की 'मार' : बसंत कामदेव का मित्र है, इसलिए कामदेव का धनुष फूलों का बना हुआ है। इस धनुष की कमान स्वरविहीन होती है। यानी जब कामदेव जब कमान से तीर छोड़ते हैं तो उसकी आवाज नहीं होती है। कामदेव का एक नाम 'अनंग' है यानी बिना शरीर के यह प्राणियों में बसते हैं। एक नाम 'मार' है यानी यह इतने मारक हैं कि इनके बाणों का कोई कवच नहीं है। वसंत ऋतु को प्रेम की ही ऋतु माना जाता रहा है। इसमें फूलों के बाणों से आहत हृदय प्रेम से सराबोर हो जाता है।

गुनगुनी धूप, स्नेहिल हवा, मौसम का नशा प्रेम की अगन को और भड़काता है। तापमान न अधिक ठंडा, न अधिक गर्म। सुहाना समय चारों ओर सुंदर दृश्य, सुगंधित पुष्प, मंद-मंद मलय पवन, फलों के वृक्षों पर बौर की सुगंध, जल से भरे सरोवर, आम के वृक्षों पर कोयल की कूक ये सब प्रीत में उत्साह भर देते हैं। यह ऋतु कामदेव की ऋतु है। यौवन इसमें अँगड़ाई लेता है। दरअसल वसंत ऋतु एक भाव है जो प्रेम में समाहित हो जाता है।

दिल में चुभता प्रेमबाण : जब कोई किसी से प्रेम करने लगता है तो सारी दुनिया में हृदय के चित्र में बाण चुभाने का प्रतीक उपयोग में लाया जाता है। 'मार' का बाण यदि आपके हृदय में चुभ जाए तो आपके हृदय में पीड़ा होगी। लेकिन वह पीड़ा ऐसी होगी कि उसे आप छोड़ना नहीं चाहोगे, वह पीड़ा आनंद जैसी होगी। काम का बाण जब हृदय में चुभता है तो कुछ-कुछ होता रहता है।

इसलिए तो बसंत का 'मार' से संबंध है, क्योंकि काम बाण का अनुकूल समय वसंत ऋतु होता है। प्रेम के साथ ही बसंत का आगमन हो जाता है। जो प्रेम में है वह दीवाना हो ही जाता है। प्रेम का गणित मस्तिष्क की पकड़ से बाहर रहता है। इसलिए प्रेम का प्रतीक हृदय के चित्र में बाण चुभा बताना है।

बसंत पंचमी एक नजर में

  • यह दिन वसंत ऋतु के आरंभ का दिन होता है।
  • देवी सरस्वती और ग्रंथों का पूजन किया जाता है।
  • नव बालक-बालिका इस दिन से विद्या का आरंभ करते हैं।
  • संगीतकार अपने वाद्ययंत्रों का पूजन करते हैं।
  • स्कूलों और गुरुकुलों में सरस्वती और वेद पूजन किया जाता है।
  • हिन्दू मान्यता के अनुसार वसंत पंचमी को अबूझ मुहूर्त माना जाता है। इस दिन बिना मुहूर्त जाने शुभ और मांगलिक कार्य किए जाते हैं।

21 जनवरी 2012

FURSAT KE PAL: AI MERE VATAN KE LOGON JARA ANKH MEN BHAR LO PANI

FURSAT KE PAL: AI MERE VATAN KE LOGON JARA ANKH MEN BHAR LO PANI: ऐ मेरे वतन के लोगों ऐ मेरे वतन के लोगों, तुम खूब लगा लो नारा ये शुभ दिन है हम सब का, लहरा लो तिरंगा प्यारा पर मत भूलो सीमा पर, वीरों ने ह...

14 जनवरी 2012

Shahi Makar Sankranti Photos

शाही मकर संक्रांति मनाने का अंदाज़
 
मकर संक्रांति का महत्व क्यों?


Rajesh Mishra (The wake, News Editor) Visit Gangasagar


'तमसो मा ज्योतिर्गमय'
हे सूर्य! हमें भी अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो...

हिंदू धर्म ने माह को दो भागों में बाँटा है- कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। इसी तरह वर्ष को भी दो भागों में बाँट रखा है। पहला उत्तरायण और दूसरा दक्षिणायन। उक्त दो अयन को मिलाकर एक वर्ष होता है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करने की दिशा बदलते हुए थोड़ा उत्तर की ओर ढलता जाता है, इसलिए इस काल को उत्तरायण कहते हैं।

सूर्य पर आधारित हिंदू धर्म में मकर संक्रांति का बहुत महत्व माना गया है। वेद और पुराणों में भी इस दिन का विशेष उल्लेख मिलता है। होली, दीपावली, दुर्गोत्सव, शिवरात्रि और अन्य कई त्योहार जहाँ विशेष कथा पर आधारित हैं, वहीं मकर संक्रांति खगोलीय घटना है, जिससे जड़ और चेतन की दशा और दिशा तय होती है। मकर संक्रांति का महत्व हिंदू धर्मावलंबियों के लिए वैसा ही है जैसे वृक्षों में पीपल, हाथियों में ऐरावत और पहाड़ों में हिमालय।

सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है। इस राशि परिवर्तन के समय को ही मकर संक्रांति कहते हैं। यही एकमात्र पर्व है जिसे समूचे भारत में मनाया जाता है, चाहे इसका नाम प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग हो और इसे मनाने के तरीके भी भिन्न हों, किंतु यह बहुत ही महत्व का पर्व है।

इसी दिन से हमारी धरती एक नए वर्ष में और सूर्य एक नई गति में प्रवेश करता है। वैसे वैज्ञानिक कहते हैं कि 21 मार्च को धरती सूर्य का एक चक्कर पूर्ण कर लेती है तो इस मान ने नववर्ष तभी मनाया जाना चाहिए। इसी 21 मार्च के आसपास ही विक्रम संवत का नववर्ष शुरू होता है और गुड़ी पड़वा मनाया जाता है, किंतु 14 जनवरी ऐसा दिन है, जबकि धरती पर अच्छे दिन की शुरुआत होती है। ऐसा इसलिए कि सूर्य दक्षिण के बजाय अब उत्तर को गमन करने लग जाता है। जब तक सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर गमन करता है तब तक उसकी किरणों का असर खराब माना गया है, लेकिन जब वह पूर्व से उत्तर की ओर गमन करते लगता है तब उसकी किरणें सेहत और शांति को बढ़ाती हैं।

मकर संक्रांति के दिन ही पवित्र गंगा नदी का धरती पर अवतरण हुआ था। महाभारत में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था, कारण कि उत्तरायण में देह छोड़ने वाली आत्माएँ या तो कुछ काल के लिए देवलोक में चली जाती हैं या पुनर्जन्म के चक्र से उन्हें छुटकारा मिल जाता है। दक्षिणायन में देह छोड़ने पर बहुत काल तक आत्मा को अंधकार का सामना करना पड़ सकता है। सब कुछ प्रकृति के नियम के तहत है, इसलिए सभी कुछ प्रकृति से बद्ध है। पौधा प्रकाश में अच्छे से खिलता है, अंधकार में सिकुड़ भी सकता है। इसीलिए मृत्यु हो तो प्रकाश में हो ताकि साफ-साफ दिखाई दे कि हमारी गति और स्थिति क्या है। क्या हम इसमें सुधार कर सकते हैं? क्या हमारे लिए उपयुक्त चयन का मौका है?

स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायण का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि उत्तरायण के छह मास के शुभ काल में, जब सूर्य देव उत्तरायण होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त हैं। इसके विपरीत सूर्य के दक्षिणायण होने पर पृथ्वी अंधकारमय होती है और इस अंधकार में शरीर त्याग करने पर पुनः जन्म लेना पड़ता है। (श्लोक-24-25)






मकर संक्रांति / MAKAR SANKRANTI

धर्म और प्रेम का पर्व मकर संक्रांति


भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति आपसी मनमुटाव को तिलांजलि देकर प्रेम बढ़ाने हेतु मनाई जाती है। इस दिन की आने वाली धार्मिक कृतियों के कारण जीवों में प्रेमभाव बढ़ने में और नकारात्मक दृष्टिकोण से सकारात्मक दृष्टिकोण की ओर जाने में सहायता मिलती है। इस निमित्त पाठकों के लिए ग्रंथों से प्राप्त मकर संक्रांति की जानकारी दे रहे हैं।

कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति तक के काल को दक्षिणायन कहते हैं। सूर्य के दक्षिणायन आरंभ होने को ही ब्रह्मांड की सूर्य नाड़ी कार्यरत होना कहते हैं। ब्रह्मांड की सूर्य नाड़ी कार्यरत होने से सूर्य के दक्षिणायन में ब्रह्मांड में विद्यमान रज-तमात्मक तरंगों की मात्रा अधिक होती है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य का उत्तरायन आरंभ होता है। सूर्य के उत्तरायन आरंभ होने को ही ब्रह्मांड की चंद्र नाड़ी कार्यरत होना कहते हैं। ब्रह्मांड की चंद्र नाड़ी कार्यरत हो जाने से सूर्य के उत्तरायन में ब्रह्मांड में विद्यमान रज-सत्तवात्मक तरंगों की मात्रा अधिक होती है।

इस कारण यह काल साधना करने वालों के लिए पोषक होता है। ब्रह्मांड की चंद्र नाड़ी कार्यरत होने से इस काल में वातावरण भी सदा की तुलना में अधिक शीतल होता है। इस काल में तिल भक्षण अधिक लाभदायक होता है। तिल के तेल में सत्व-रिंगें ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है। इसके अतिरिक्त तिल भक्षण से शरीर की चंद्र नाड़ी कार्यरत होती है।

इससे जीव वातावरण से तुरंत समन्वय साध सकता है, क्योंकि इस समय ब्रह्मांड की भी चंद्र नाड़ी ही कार्यरत होती है। जीव के शरीर का वातावरण व ब्रह्मांड का वातावरण एक हो जाने से साधना करते समय जीव के सामने किसी भी प्रकार की अड़चन नहीं आती।

साधना की दृष्टि से महत्व 



मकर संक्रांति के दिन सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक वातावरण में अधिक मात्रा में चैतन्य होता है। साधना करने वाले जीव को इसका सर्वाधिक लाभ होता है। इस चैतन्य के कारण जीव में विद्यमान तेज तत्व के बढ़ने में सहायता मिलती है।

इस दिन रज-तम की अपेक्षा सात्विकता बढ़ाने एवं उसका लाभ उठाने का प्रत्येक जीव प्रयास करे। मकर संक्रांति का दिन साधना के लिए अनुकूल है। इसलिए इस काल में अधिक से अधिक साधना कर ईश्वर एवं गुरु से चैतन्य प्राप्त करने का प्रयास करें। 

संक्रांति पर ब्रह्म मुहूर्त में करें स्नान


मकर संक्रांति के अवसर पर ब्रह्म मुहूर्त में ही स्नान करना अच्छा माना जाता है। कुछ लोग गंगा जी जाकर स्नान करते हैं तो जो नहीं जा पाते वे घरों में ही पानी में गंगा जल मिलाकर स्नान कर मकर संक्रांति का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं। इस दिन खिचड़ी का दान किया जाएगा।

पूर्व उत्तरप्रदेश में इसे खिचड़ी संक्रांति भी कहते हैं। कहा जाता है कि जाड़े के दिनों में जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तो माघ का महीना प्रारंभ हो जाता है। इस महीने उड़द की खिचड़ी एवं रेवड़ी-मूंगफली खाने से शरीर में ऊर्जा बढ़ती है। इस प्रकार यह पर्व प्रकृति परिवर्तन के साथ शरीर का संतुलन बनाए रखने की ओर भी इशारा करता है।

उत्तराखंड के लोग इसे घुघुतिया त्योहार भी कहते हैं जिसमें आटे को गुड़ या शहद में तैयार कर शकरपारे बनाए जाते हैं तथा सुबह स्नान करने के बाद 'काले कौआ काले पूस की रोटी माघ में खाले' के नारे लगाते हुए छोटे-छोटे बच्चे घुघुत को कौआ को बुलाकर खिलाएंगे।

भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं समस्त प्रकृतियां, ऋतु एवं महीने सब मुझसे ही पैदा होते हैं। इसलिए भारतीय उपासना पद्धति में प्रत्येक ऋतु, मास, पक्ष, सप्ताह एवं दिन-रात परामात्मा के स्वरूप ही माने गए हैं। इसीलिए हमारी उपासना सनातन उपासना कहलाती है।

हर दिन किसी न किसी देवता की उपासना से जुड़ा होने से नित उत्सव का आनंद लोगों को मिलता ही रहता है। साथ ही किसी विशेष पर्व पर होने वाले धार्मिक उत्सव में तो सारा जनमानस एक-साथ आनंद में झूमने लगता है।

इसी कड़ी में है लोहड़ी और मकर संक्रांति का पर्व जो हमें धार्मिक अनुष्ठान करते हुए प्रकृति से जुड़े रहने का संदेश देता है। इसकी धूम गांव, नगर, शहर हर जगह दिखाई देती है।

ज्योतिषियों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन तिल का उपयोग 6 प्रकार से करना चाहिए। तिल का तेल जल में डालकर स्नान, तिल के तेल की शरीर पर मालिश करके स्नान, तिल का उपयोग हवन सामग्री में, तिलयुक्त जल का सेवन, तिल व गुडयुक्त मिठाई व भोजन का सेवन, तिल का दान करने से शारीरिक, धार्मिक व अन्य लाभ तथा पुण्य प्राप्त होते हैं।

इसके अतिरिक्त पूजन में चंदन से अष्ठदल का कमल बनाकर उसमें सूर्यदेव का चित्र स्थापित करें। शाम को तिलयुक्त भोजन से अपना व्रत खोलें।

मकर संक्रांति का संदेश!


हमारे देश में अधिकांश त्योहार महज रूढ़ियों और परंपराओं से जुड़े न होकर उनके पीछे ज्ञान, विज्ञान, कुदरत स्वास्थ्य और आयुर्वेद जैसे तमाम मुद्दे जुड़े हैं। मसलन 'मकर संक्रांति' को ही लें - पौष मास में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ मनाया जाता है।

यूं तो सूर्य साल भर में 12 राशियों से होकर गुजरता है। लेकिन इसमें भी 'कर्क' और 'मकर' राशि में इसके प्रवेश का विशेष महत्व है। क्योंकि मकर में प्रवेश के साथ सूर्य 'उत्तरायण' हो जाता है। जिसके साथ बढ़ती गति के चलते दिन बड़ा तो रात छोटी हो जाती है। जबकि कर्क में सूर्य के 'दक्षिणायन' होने से रात बड़ी और दिन छोटा हो जाता है।

पुराणों के मुताबिक 'उत्तरायण' का विशेष महत्व है और इस दौरान आई मृत्यु में 'मोक्ष' की प्राप्ति होती है। यही वजह रही कि महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह ने शरशय्या पर सूर्य के उत्तरायण होने तक इंतजार किया था।

'मकर संक्रांति' यानी प्रकाश पर अंधकार के विजय का पर्व। मानवीय जीवन जो प्रकाश और अंधकार से घिरा है। अंधकार से प्रकाश को जाने के इस संक्रमण का दौर अज्ञान के अंधेरे में घिरे मानवी मन को ज्ञान के प्रकाश से निखार देता है।

आप जरा इसके व्यावहारिक नजरिए पर गौर करें - ग्रामीण कहावत के मुताबिक 'धन के पंद्रह, मकर पच्चीस चिल्ला जाड़े दिन चालीस।' जाड़ा पूरे चालीस दिन का होता है। जिसमें से सूर्य के धनु राशि में रहते पंद्रह दिन ठंड अपने पूरे शबाब पर होती है।

सूर्य के उत्तरायण होते ही दिन बड़ा होने के साथ कुदरत भी राहत महसूस करती है। वहीं तिळ-गुड आपस में मेलजोल बढ़ाने के साथ आपसी बैर-भाव भूल कर प्यार और सुलह का निर्माण करने का संदेश देता है क्योंकि मीठा बोलने से दिल खुश और सोच सकारात्मक होती है।

मकर संक्रांति के दिन महासंयोगों का मुहूर्त

महामुहूर्त के साथ 15 को मनेगी मकर संक्रांति





मकर संक्रांति अश्व पर सवार होकर 15 जनवरी को सुबह 6.22 बजे दक्षिण दिशा की ओर जाएगी। 28 वर्ष बाद मकर संक्रांति के दिन महासंयोगों का मुहूर्त बन रहा है। ऐसा ही महामुहूर्त का संयोग सन 1984 को मकर संक्रांति के दिन बना था। अब 100 वर्ष बाद ही ऐसा मुहूर्त अगली सदी में बनेगा।

ज्योतिषियों के अनुसार कन्या राशि पर चंद्रमा होने से भद्रा पाताल लोक में निवास करेगा। पृथ्वी पर भद्रा के नहीं होने से मकर संक्रांति पर भद्रा का रोड़ा नहीं होगा।

उत्तरायण सूर्य कराएंगे शुभ कार्य : ज्योतिषाचार्य धर्मेन्द्र शास्त्री ने बताया कि सूर्यदेव के मकर राशि में प्रवेश करते ही सूर्य उत्तरायण होने के साथ ही देवताओं के दिन भी शुरू हो जाएंगे। सूर्य सिद्घांत के अनुसार कर्क से धनु के सूर्य तक 6 माह देवताओं की रात्रि होती है और मकर से मिथुन के सूर्य तक 6 माह देवताओं के दिन होते हैं।

इसके साथ ही सूर्य देव इस समय पृथ्वी के निकट होते हैं। इसलिए देवताओं के दिन की शुरुआत का पहला दिन मकर संक्रांति सभी शुभ कार्यों के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

सुबह से शाम तक रहेगा पुण्यकाल : मकर संक्रांति का पुण्यकाल 15 जनवरी को सूर्योदय से सूर्यास्त तक रहेगा। पुण्यकाल में तीर्थ स्थान में स्नान, दान, जाप, हवन, तुलादान, गौदान, स्वर्ण दान आदि का विशेष महत्व है।

इस दिन सूर्यदेव अपनी राशि बदलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। मकर संक्रांति पर तिल का लेप लगाकर स्नान करने के अलावा दान-पुण्य करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

महामुहूर्त की शुरुआत : विवाह, गृह प्रवेश, व्यापार का शुभारंभ, पदभार ग्रहण, वाहन क्रय, विधारंभ सहित अन्य कार्य महामुहूर्त में प्रारंभ करने पर फलदायी होते हैं।

क्या होगा मकर संक्रांति का राशिफल पर प्रभाव
मेष- ईष्ट सिद्धि
वृषभ - धर्म लाभ
मिथुन - कष्ट
कर्क - सम्मान
सिंह - भय
कन्या - यश
तुला- कलह
वृश्चिक - लाभ
धनु - संतोष
मकर - धन लाभ
कुंभ - हानि
मीन - लाभ।

मेरी ब्लॉग सूची

  • World wide radio-Radio Garden - *प्रिये मित्रों ,* *आज मैं आप लोगो के लिए ऐसी वेबसाईट के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसमे आप ऑनलाइन पुरे विश्व के रेडियों को सुन सकते हैं। नीचे दिए गए ल...
    4 माह पहले
  • जीवन का सच - एक बार किसी गांव में एक महात्मा पधारे। उनसे मिलने पूरा गांव उमड़ पड़ा। गांव के हरेक व्यक्ति ने अपनी-अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी। एक व्यक्ति ने महात्मा से...
    6 वर्ष पहले

LATEST:


Windows Live Messenger + Facebook