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14 जनवरी 2012

मकर संक्रांति / MAKAR SANKRANTI

धर्म और प्रेम का पर्व मकर संक्रांति


भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति आपसी मनमुटाव को तिलांजलि देकर प्रेम बढ़ाने हेतु मनाई जाती है। इस दिन की आने वाली धार्मिक कृतियों के कारण जीवों में प्रेमभाव बढ़ने में और नकारात्मक दृष्टिकोण से सकारात्मक दृष्टिकोण की ओर जाने में सहायता मिलती है। इस निमित्त पाठकों के लिए ग्रंथों से प्राप्त मकर संक्रांति की जानकारी दे रहे हैं।

कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति तक के काल को दक्षिणायन कहते हैं। सूर्य के दक्षिणायन आरंभ होने को ही ब्रह्मांड की सूर्य नाड़ी कार्यरत होना कहते हैं। ब्रह्मांड की सूर्य नाड़ी कार्यरत होने से सूर्य के दक्षिणायन में ब्रह्मांड में विद्यमान रज-तमात्मक तरंगों की मात्रा अधिक होती है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य का उत्तरायन आरंभ होता है। सूर्य के उत्तरायन आरंभ होने को ही ब्रह्मांड की चंद्र नाड़ी कार्यरत होना कहते हैं। ब्रह्मांड की चंद्र नाड़ी कार्यरत हो जाने से सूर्य के उत्तरायन में ब्रह्मांड में विद्यमान रज-सत्तवात्मक तरंगों की मात्रा अधिक होती है।

इस कारण यह काल साधना करने वालों के लिए पोषक होता है। ब्रह्मांड की चंद्र नाड़ी कार्यरत होने से इस काल में वातावरण भी सदा की तुलना में अधिक शीतल होता है। इस काल में तिल भक्षण अधिक लाभदायक होता है। तिल के तेल में सत्व-रिंगें ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है। इसके अतिरिक्त तिल भक्षण से शरीर की चंद्र नाड़ी कार्यरत होती है।

इससे जीव वातावरण से तुरंत समन्वय साध सकता है, क्योंकि इस समय ब्रह्मांड की भी चंद्र नाड़ी ही कार्यरत होती है। जीव के शरीर का वातावरण व ब्रह्मांड का वातावरण एक हो जाने से साधना करते समय जीव के सामने किसी भी प्रकार की अड़चन नहीं आती।

साधना की दृष्टि से महत्व 



मकर संक्रांति के दिन सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक वातावरण में अधिक मात्रा में चैतन्य होता है। साधना करने वाले जीव को इसका सर्वाधिक लाभ होता है। इस चैतन्य के कारण जीव में विद्यमान तेज तत्व के बढ़ने में सहायता मिलती है।

इस दिन रज-तम की अपेक्षा सात्विकता बढ़ाने एवं उसका लाभ उठाने का प्रत्येक जीव प्रयास करे। मकर संक्रांति का दिन साधना के लिए अनुकूल है। इसलिए इस काल में अधिक से अधिक साधना कर ईश्वर एवं गुरु से चैतन्य प्राप्त करने का प्रयास करें। 

संक्रांति पर ब्रह्म मुहूर्त में करें स्नान


मकर संक्रांति के अवसर पर ब्रह्म मुहूर्त में ही स्नान करना अच्छा माना जाता है। कुछ लोग गंगा जी जाकर स्नान करते हैं तो जो नहीं जा पाते वे घरों में ही पानी में गंगा जल मिलाकर स्नान कर मकर संक्रांति का पुण्य प्राप्त कर लेते हैं। इस दिन खिचड़ी का दान किया जाएगा।

पूर्व उत्तरप्रदेश में इसे खिचड़ी संक्रांति भी कहते हैं। कहा जाता है कि जाड़े के दिनों में जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तो माघ का महीना प्रारंभ हो जाता है। इस महीने उड़द की खिचड़ी एवं रेवड़ी-मूंगफली खाने से शरीर में ऊर्जा बढ़ती है। इस प्रकार यह पर्व प्रकृति परिवर्तन के साथ शरीर का संतुलन बनाए रखने की ओर भी इशारा करता है।

उत्तराखंड के लोग इसे घुघुतिया त्योहार भी कहते हैं जिसमें आटे को गुड़ या शहद में तैयार कर शकरपारे बनाए जाते हैं तथा सुबह स्नान करने के बाद 'काले कौआ काले पूस की रोटी माघ में खाले' के नारे लगाते हुए छोटे-छोटे बच्चे घुघुत को कौआ को बुलाकर खिलाएंगे।

भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं समस्त प्रकृतियां, ऋतु एवं महीने सब मुझसे ही पैदा होते हैं। इसलिए भारतीय उपासना पद्धति में प्रत्येक ऋतु, मास, पक्ष, सप्ताह एवं दिन-रात परामात्मा के स्वरूप ही माने गए हैं। इसीलिए हमारी उपासना सनातन उपासना कहलाती है।

हर दिन किसी न किसी देवता की उपासना से जुड़ा होने से नित उत्सव का आनंद लोगों को मिलता ही रहता है। साथ ही किसी विशेष पर्व पर होने वाले धार्मिक उत्सव में तो सारा जनमानस एक-साथ आनंद में झूमने लगता है।

इसी कड़ी में है लोहड़ी और मकर संक्रांति का पर्व जो हमें धार्मिक अनुष्ठान करते हुए प्रकृति से जुड़े रहने का संदेश देता है। इसकी धूम गांव, नगर, शहर हर जगह दिखाई देती है।

ज्योतिषियों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन तिल का उपयोग 6 प्रकार से करना चाहिए। तिल का तेल जल में डालकर स्नान, तिल के तेल की शरीर पर मालिश करके स्नान, तिल का उपयोग हवन सामग्री में, तिलयुक्त जल का सेवन, तिल व गुडयुक्त मिठाई व भोजन का सेवन, तिल का दान करने से शारीरिक, धार्मिक व अन्य लाभ तथा पुण्य प्राप्त होते हैं।

इसके अतिरिक्त पूजन में चंदन से अष्ठदल का कमल बनाकर उसमें सूर्यदेव का चित्र स्थापित करें। शाम को तिलयुक्त भोजन से अपना व्रत खोलें।

मकर संक्रांति का संदेश!


हमारे देश में अधिकांश त्योहार महज रूढ़ियों और परंपराओं से जुड़े न होकर उनके पीछे ज्ञान, विज्ञान, कुदरत स्वास्थ्य और आयुर्वेद जैसे तमाम मुद्दे जुड़े हैं। मसलन 'मकर संक्रांति' को ही लें - पौष मास में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ मनाया जाता है।

यूं तो सूर्य साल भर में 12 राशियों से होकर गुजरता है। लेकिन इसमें भी 'कर्क' और 'मकर' राशि में इसके प्रवेश का विशेष महत्व है। क्योंकि मकर में प्रवेश के साथ सूर्य 'उत्तरायण' हो जाता है। जिसके साथ बढ़ती गति के चलते दिन बड़ा तो रात छोटी हो जाती है। जबकि कर्क में सूर्य के 'दक्षिणायन' होने से रात बड़ी और दिन छोटा हो जाता है।

पुराणों के मुताबिक 'उत्तरायण' का विशेष महत्व है और इस दौरान आई मृत्यु में 'मोक्ष' की प्राप्ति होती है। यही वजह रही कि महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह ने शरशय्या पर सूर्य के उत्तरायण होने तक इंतजार किया था।

'मकर संक्रांति' यानी प्रकाश पर अंधकार के विजय का पर्व। मानवीय जीवन जो प्रकाश और अंधकार से घिरा है। अंधकार से प्रकाश को जाने के इस संक्रमण का दौर अज्ञान के अंधेरे में घिरे मानवी मन को ज्ञान के प्रकाश से निखार देता है।

आप जरा इसके व्यावहारिक नजरिए पर गौर करें - ग्रामीण कहावत के मुताबिक 'धन के पंद्रह, मकर पच्चीस चिल्ला जाड़े दिन चालीस।' जाड़ा पूरे चालीस दिन का होता है। जिसमें से सूर्य के धनु राशि में रहते पंद्रह दिन ठंड अपने पूरे शबाब पर होती है।

सूर्य के उत्तरायण होते ही दिन बड़ा होने के साथ कुदरत भी राहत महसूस करती है। वहीं तिळ-गुड आपस में मेलजोल बढ़ाने के साथ आपसी बैर-भाव भूल कर प्यार और सुलह का निर्माण करने का संदेश देता है क्योंकि मीठा बोलने से दिल खुश और सोच सकारात्मक होती है।

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