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25 फ़रवरी 2012

Sri Mayapur Gaura Purnima Festival 2012


The schedule for the 2012 Mayapura Gaura Purnima festival has been announced:
10 Feb GBC meetings start
12 Feb Srila Bhaktisiddhanta Sarasvati Thakura’s Appearance
21 Feb GBC meetings conclude
22 Feb Devotees arrival
23 Feb Festival Inauguration & HH Tamal Krishna Gosvami’s Disappearance
23-25 Feb Pancha-tattva Abhisheka of the Holy Name, Cultural programs & Seminars
24 Feb Russian Day, Book Distribution Awards
25 Feb Sri Navadvipa Mandala Parikrama Adhivasa, Congregational Preaching Night
26 Feb Sri Navadvipa Mandala Parikrama begins
3 Mar Sri Navadvipa Mandala Parikrama returns to Mayapur, Elephant Procession
3-8 Mar Festivities and Cultural programs
4 Mar Sri Sri Radha-Madhava Boat Festival
5 Mar Santipur Festival on the Disappearance Day of Srila Madhavendra Puri
6 Mar Ganga Puja
7 Mar Lord Jagannatha Rathayatra
8 Mar GAURA PURNIMA Festival (Lord Sri Caitanya Mahaprabhu’s Appearance Day)
9 Mar Jagannath Mishra’s Feast
10 Mar Devotees depart
For more information please visit:http://Mayapur.com/node/1581


Read more:http://news.iskcon.com/node/3949#ixzz1nMk4LTad


Mayapur Gaura Purnima Festival Updated Schedule

The 2012 Gaura Purnima Festival in Mayapur will be a little different than the previous ones. The first four days the focus will be on re-learning how to chant from the heart. The Kirtan Mela will be held with some of the world’s best kirtaniyas headed by Sacinandana Swami and Madhava Das. (More details on this particular aspect of the festival athttp://kirtanmela.org/)
Another new aspect is that on top of having free prasad for festival participants, there will also be free camping facilities (toilets, showers, lights, security and lockers for valuables) and almost free dormitory accommodations also with lockers.
For those who cannot be physically there, can follow all the festival events on the Mayapur TV. (http://mayapur.tv/)
The updated schedule for Gaura Purnima Festival is:
10 Feb GBC meetings start
12 Feb Srila Bhaktisiddhanta Sarasvati Thakura’s Appearance
21 Feb GBC Meetings conclude - Kirtan Mela adivas 7pm
22 FebFestival Inauguration & Beginning of Kirtan Mela
22-25 FebKirtan Mela 10am to 10 pm
3-8 Mar Festivities and Cultural Programs
4 Mar Ekadasi, Sri Radha-Madhava Boat Festival, Immersion of ashes of departed souls
5 Mar Santipur Festival
6 Mar Ganga Puja
7 Mar Ratha Yatra
8 Mar Gaura Purnima Festival
9 Mar Jagannath Mishra’s Feast
10 Mar Devotees depart


Read more:http://news.iskcon.com/node/4127/2012-01-12/mayapur_gaura_purnima_festival_updated_schedule#ixzz1nMlvVDmV

18 फ़रवरी 2012

MAHASHIVRATRI VRAT-KATHA

महाशिवरात्रि की व्रत-कथा

Lord Siva : Om Namah Shivay- by-Rajesh Mishra

एक बार पार्वती ने भगवान शिवशंकर से पूछा, ऐसा कौन सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्यु लोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?
उत्तर में शिवजी ने पार्वती को शिवरात्रि के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना। शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई। कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, हे पारधी ! मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।
शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे मत मार।
शिकारी हँसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।
मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्व करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दु:ख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा। मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अत: जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।
उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा। थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।
देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।

KALYANKARI MAHASHIVRATRI

परम कल्याणकारी महाशिवरात्रि
पूजन विधि के साथ कल्याणकरी उपाय भी 
जय भोलेशंकर

महाशिवरात्रि हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 10 मार्च, रविवार को है । माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान् शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया। तीनों भुवनों की अपार सुंदरी तथा शीलवती गौरां को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका रूप बड़ा अजीब है। शरीर पर मसानों की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल को वाहन के रूप में स्वीकार करने वाले शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं और श्री-संपत्ति प्रदान करते हैं।
पूजा विधानइस दिन शिवभक्त, शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर बेल-पत्र आदि चढ़ाते, पूजन करते, उपवास करते तथा रात्रि को जागरण करते हैं। शिवलिंग पर बेल-पत्र चढ़ाना, उपवास तथा रात्रि जागरण करना एक विशेष कर्म की ओर इशारा करता है। इस दिन शिव की शादी हुई थी इसलिए रात्रि में शिवजी की बारात निकाली जाती है। वास्तव में शिवरात्रि का परम पर्व स्वयं परमपिता परमात्मा के सृष्टि पर अवतरित होने की स्मृति दिलाता है। यहां रात्रि शब्द अज्ञान अन्धकार से होने वाले नैतिक पतन का द्योतक है। परमात्मा ही ज्ञानसागर है जो मानव मात्र को सत्यज्ञान द्वारा अन्धकार से प्रकाश की ओर अथवा असत्य से सत्य की ओर ले जाते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री-पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध सभी इस व्रत को कर सकते हैं। इस व्रत के विधान में सवेरे स्नानादि से निवृत्त होकर उपवास रखा जाता है।

विधि
इस दिन मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर, ऊपर से बेलपत्र, आक धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर ‘शिवलिंग’ पर चढ़ाया जाता है। अगर पास में शिवालय न हो, तो शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिवलिंग बनाकर उसे पूजने का विधान है।
रात्रि को जागरण करके शिवपुराण का पाठ सुनना हरेक व्रती का धर्म माना गया है।
अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेलपत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।
महाशिवरात्रि भगवान शंकर का सबसे पवित्र दिन है। यह अपनी आत्मा को पुनीत करने का महाव्रत है। इसके करने से सब पापों का नाश हो जाता है। हिंसक प्रवृत्ति बदल जाती है। निरीह जीवों के प्रति दया भाव उपज जाता है। ईशान संहिता में इसकी महत्ता का उल्लेख इस प्रकार किया गया है-
॥शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापं प्रणाशनम्।
आचाण्डाल-मनुष्याणां भुक्ति मुक्ति प्रदायकं॥

विशेष

चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं। अत: ज्योतिष शास्त्रों में इसे परम शुभफलदायी कहा गया है। वैसे तो शिवरात्रि हर महीने में आती है। परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि कहा गया है।ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य देव भी इस समय तक उत्तरायण में आ चुके होते हैं तथा ऋतु परिवर्तन का यह समय अत्यन्त शुभ कहा गया हैं। शिव का अर्थ है कल्याण। शिव सबका कल्याण करने वाले हैं। अत: महाशिवरात्रि पर सरल उपाय करने से ही इच्छित सुख की प्राप्ति होती है।
ज्योतिषीय गणित के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चंद्रमा अपनी क्षीणस्थ अवस्था में पहुंच जाते हैं। जिस कारण बलहीन चंद्रमा सृष्टि को ऊर्जा देने में असमर्थ हो जाते हैं। चंद्रमा का सीधा संबंध मन से कहा गया है। मन कमजोर होने पर भौतिक संताप प्राणी को घेर लेते हैं तथा विषाद की स्थिति उत्पन्न होती है। इससे कष्टों का सामना करना पड़ता है।
चंद्रमा शिव के मस्तक पर सुशोभित है। अत: चंद्रदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव का आश्रय लिया जाता है। महाशिवरात्रि शिव की प्रिय तिथि है। अत: प्राय: ज्योतिषी शिवरात्रि को शिव आराधना कर कष्टों से मुक्ति पाने का सुझाव देते हैं। शिव आदि-अनादि है। सृष्टि के विनाश व पुन:स्थापन के बीच की कड़ी है। प्रलय यानी कष्ट, पुन:स्थापन यानी सुख। अत: ज्योतिष में शिव को सुखों का आधार मान कर महाशिवरात्रि पर अनेक प्रकार के अनुष्ठान करने की महत्ता कही गई है।
कल्याण हेतु विविध अनुष्ठान
कारोबार वृद्धि के लिए
महाशिवरात्रि के सिद्ध मुहर्त में पारद शिवलिंग को प्राण प्रतिष्ठित करवाकर स्थापित करने से व्यवसाय में वृद्धि व नौकरी में तरक्की मिलती है।

बाधा नाश के लिए
शिवरात्रि के प्रदोष काल में स्फटिक शिवलिंग को शुद्ध गंगा जल, दूध, दही, घी, शहद व शक्कर से स्नान करवाकर धूप-दीप जलाकर निम्न मंत्र का जाप करने से समस्त बाधाओं का शमन होता है।
॥ॐ तुत्पुरूषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रूद्र: प्रचोदयात्॥
बीमारी से छुटकारे के लिए
शिव मंदिर में लिंग पूजन कर दस हज़ार मंत्रों का जाप करने से प्राण रक्षा होती है। महामृत्युंजय मंत्र का जाप रुद्राक्ष की माला पर करें।

शत्रु नाश के लिए
शिवरात्रि को रूद्राष्टक का पाठ यथासंभव करने से शत्रुओं से मुक्ति मिलती है। मुक़दमे में जीत व समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।

मोक्ष के लिए
शिवरात्रि को एक मुखी रूद्राक्ष को गंगाजल से स्नान करवाकर धूप-दीप दिखा कर तख्ते पर स्वच्छ कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। शिव रूप रूद्राक्ष के सामने बैठ कर सवा लाख मंत्र जप का संकल्प लेकर जाप आरंभ करें। जप शिवरात्रि के बाद भी जारी रखें। ॐ नम: शिवाय।
रुद्राभिशेक से लाभ् यदि वर्शा चाह्ते है तो जल से रुद्राभिशेक करे व्यधि नाश के लिये कुशा से करे यदि पशुओ कि कामना चाह्ते है तो दहि से रुद्रभिशेक करे श्रि: कि कामना चाह्ते है तो गन्ना के रस से रुद्राभिषेक करें

15 फ़रवरी 2012

Shyam Baba ki Nishan Puja or Arpan Vidhi

श्याम बाबा की निशान पूजा और अर्पण विधि

KHATU SHAYAMJI KI AMAR KAHANI


अखण्ड ज्योति अपार माया
श्याम देव की परबल छाया
In Hinduism, Khatushyamji is a name and manifestation of Barbarika, son of Bhim. This manifestation is especially popular in the Indian state of Rajasthan. The original Sanskrit name Barbarīka is often replaced in Rajasthan by the Hindi version, Barbarīk, often written as Barbareek.
Barbarika had obtained a boon from Shri Krishna to the effect that he would be known by Krishna's own name (Shyam) in the Kaliyuga era (presently ongoing) and worshipped. Shree Krishna had declared that Barbarika's devotees would be blessed just by pronouncing his name from the bottom of their hearts. Their wishes would be granted and troubles removed if they worship Shyamji (Barbarika) with a true piety.

The Story Of Khatu Shyamji
The legend begins with the Mahābhārata. Barbarika alias Khatushyamji alias Shyam Baba was a son of Bhima, Second of the Pandava brothers.Shyamji's mother name was Ahilawati. Even in his childhood, Barbarika was very brave warrior. He learnt the art of warfare from his mother. God Shiva, pleased with him, gave him the three infallible arrows (Teen Baan). Hence, Barbarika came to be known by the appellation Teen Baandhaari, the "Bearer of Three Arrows". Later, Agni (the god of Fire) gave him the bow that would make him victorious in the three worlds.
When Barbarika learnt that battle between the Pandavas and the Kauravas had become inevitable, he wanted to witness what was to be the Mahābhārata War. He promised his mother that if he felt the urge to participate in the battle, he would join the side which would be losing. He rode to the field on his Blue Horse equipped with his three arrows and bow.
Krishna disguised as a Brahmin and stopped Barbarika to examine his strength. He baited Barbarika by mocking him for going to the great battle with only three arrows. On this, Barbarika replied that a single arrow was enough to destroy all his opponents in the war, and it would then return to his quiver. He stated that, the first arrow is used to mark all the things that he wants to destroy. On releasing the third arrow, it would destroy all the things that are marked and will then return to his quiver. If he uses the second arrow, then the second arrow will mark all the things that he wants to save. On using the third arrow, it will destroy all the things that are not marked.
Krishna then challenges him to tie all the leaves of the peepal tree under which he was standing with these arrows. Barbarika accepts the challenge and starts meditating to release his arrow by closing his eyes. Then, Krishna without the knowledge of Barbarika, plucks one of the leaf of the tree and puts it under his foot. When Barbarik releases his first arrow, it marks all the leaves of the tree and finally starts revolving around the leg of Krishna. For this Krishna asks Barbarika, as why was the arrow revolving around his foot? For this, Barbareek replies that there must be a leaf under his foot and the arrow was targeting his foot to mark the leaf that is hidden under him. Barbarika advises Krishna to lift his leg, since, otherwise the arrow will mark the leaf by pricking Krishna's leg. Thus, Krishna lifts his foot and to his surprise, finds that the first arrow also marks the leaf that was hidden under his foot. Of course, the third arrow does collect all the leaves (including the one under Krishna's foot) and ties them together. By this Krishna concludes that the arrows are so infallible, that even if Barbarika is not aware of his targets, the arrows are so powerful that they can still navigate and trace all his intended targets. The moral of this incident is that, in a real battle field, if Krishna wants to isolate some one to avoid them from being Barbarika's victim, then Krishna will not be successful as the arrows can still trace the target and destroy them. Thus Krishna gets a deeper insight about Barbarika's phenomenal power.
Krishna then asks the boy whom he would favour in the war. Barbarika reveals that he intends to fight for the side whichever is weak. As Pandavas have only seven Akshouni army, when compared to Kauravas eleven, he considers that Pandavas are weak and hence wants to support them so that Pandavas will become victrious. But Krishna asks him, did he seriously give a thought before giving a word to his mother (to support the weak side). Barbarika guesses that his support to the weaker side will make them victrious. Then, Krishna reveals the actual consequence of his word to his mother
Krishna tells that whichever side he supports will only make the other side weak due to his power. Hence, he is forced to change the side that has become weaker due to his word to his mother. Thus, in an actual war, he will keep oscillating between the two sides, there by destroying the entire army of both sides and eventually only he remains. Subsequently, none of the side is victorious as he will be the only lone survivor. Hence, Krishna avoids his participation from the war by seeking his head in Charity.
The guised Krishna then sought charity from Babarika. Barbarika promised him anything he wished. Krishna asked him to give his head in charity. Barbarika was shocked. Perceiving that all was not as it appeared, he requested the Brahmin to disclose his real identity. Krishna showed Barbarika a vision of His Divine Form and Barbarika was thus graced. Krishna then explained to him that before a battle, the head of the bravest Kshatriya needs to be sacrificed, in order to worship/sanctify the battlefield. Krishna said that he considered Barbarika to be the bravest among Kshatriyas, and was hence asking for his head in charity. In fulfilment of his promise, and in compliance with the Krishna's command, Barbarika gave his head to him in charity. This happened on the 12th day of the Shukla Paksha (bright half) of the month of Phalguna.

Before decapitating himself, Barbarika told Krishna of his great desire to view the forthcoming battle, and requested him to facilitate it. Krishna agreed, and placed the head atop a hill overlooking the battlefield. From the hill, the head of Barbarika watched the whole battle.
At the end of the battle, the victorious Pandava brothers argued amongst themselves as to who was responsible for the victory. Krishna suggested that Barbarika's head, which had watched the whole battle, should be allowed to judge. Barbarika's head suggested that it was Krishna alone who was responsible for the victory: his advice, his presence, his gameplan had been crucial. Barbarika's head said that he had seen the Sudarshana Chakra revolving around the battlefield, hacking the Kaurava army to pieces; and Draupadi, assuming the fearful form of Mahakali Durga, drinking bowl after bowl of blood without allowing even one drop of blood to fall on the earth.

Other names of Khatu Shyamji
Barbarika
: Khatushyamji's childhood name was Barbarika. His mother and relatives used to call him by this name before the name Khatushyamji was given by Shri Krishna.
Sheesh Ke Daani: Literally: "Donor of Head"; As per the legend related above.
Haare Ka Sahara: Literally: "Support of the defeated"; Upon his mother's advise, Barbarika resolved to support whoever has less power and is losing. Hence he is known by this name.
Teen Baan Dhaari: Literally: "Bearer of three arrows"; Reference is to the three infallible arrows that he received as boon from God Shiva. These arrows were sufficient to destroy the whole world. The title written below these three arrows is Maam Sevyam Parajitah.
Lakha-datari: Literally: "The Munificent Giver"; One who never hesitates to give his devotees whatever they need and ask for.
Leela ke Aswaar: Literally: "Rider of Leela"; Being the name of his blue-coloured horse. Many call it Neela Ghoda or "blue horse."
Khatu Naresh: Literally: "The King of Khatu"; One who rules Khatu and the whole universe.
TempleAfter the Mahābhārata battle, Barbarika's head was buried in the village of Khatu in present-day Rajasthan. The location was obscured until well after the Kaliyuga period began. Then, on one occasion, milk started flowing spontaneously out of a cow's udder when she neared the burial spot. Amazed at this incident, the local villagers dug the place up and the buried head was revealed. The head was handed over to a Brahmin who worshipped it for many days, awaiting divine revelations as to what was to be done next. Roopsingh Chauhan, king of Khatu, then had a dream where he was inspired to build a temple and install the head therein. Subsequently, a temple was built and the idol was installed on the 11th day of the Shukla Paksha (bright half) of the month of Kartik.
There is another, only slightly different version of this legend. Roopsingh Chauhan was the ruler of Khatu. His wife, Narmada Kanwar, once had a dream in which the deity instructed her to take his image out of the earth. The indicated place (now known as Shyam Kund) when then dug up. Sure enough, it yielded the idol, which was duly enshrined in the temple.
The original temple was built in 1027 AD by Roopsingh Chauhan and his wife Narmada Kanwar. In 1720 AD, a nobleman known as Diwan Abhaisingh renovated the old temple, at the behest of the then ruler of Marwar. The temple took its present shape at this time and the idol was enshrined in the sanctum sanctorum. The idol is made of rare stone. Khatushyam is the family deity of a large number of families.
The temple is architecturally rich. Lime mortar, marble and tiles have been used in constructing the structure. The shutters of the sanctum sanctorum are beautifully covered with silver sheet. Outside is the prayer hall, named Jagmohan. The hall is large in size (measuring 12.3 m x 4.7 m) and its walls are elaborately painted, depicting mythological scenes. The entrance gate and exit gate are made of marble; their brackets are also of marble and feature ornamental floral designs.
There is an open space in front of the entrance gate of the temple. The Shyam Bagicha is a garden near the temple from where flowers are picked to be offered to the deity. The Samadhi of Aloo Singh, a great devotee, is located within the garden.
The Gopinath temple lies to the south-east of the main temple. The Gaurishankar temple also lies nearby. There is an interesting tale associated with the Gaurishankar temple. It is said that some soldiers of the Mughal emperor Aurangzeb wanted to destroy this temple. They attacked the Shiva lingam enshrined within this temple with their spears. Immediately, fountains of blood appeared from the Shiva Lingam. The soldiers ran away, terrified. One can still see the mark of the spear on the Lingam.

Observances and festivalsBarbarika is worshipped as Shyam Baba, being Krishna himself. Therefore, the flavour of the festivities reflects the playful and vibrant nature of Krishna. The festivals of Krishna Janmaashtami, Jhool Jhulani Ekadashi, Holi and Vasant Panchami are celebrated with gusto in the temple. The Phalguna Mela detailed below is the principal annual festival.
Hundreds of devotees visit the temple everyday. Newly married couples come to pay homage and newly born babies are brought to the temple for their mundan (the first hair-shaving) ceremony.

An elaborate Aarti is performed at the temple five times a day. These are:

Mangala Aarti: performed in the early morning, when temple is open.
Shringaar Aarti: performed at the time of make-up of Baba Shyam. The idol is grandly ornamented for this Aarti.
Bhog Aarti: performed at noon when bhog (Prasadam) is served to the Lord.
Sandhya Aarti: performed in the evening, at sunset.
Sayana Aarti: performed in the night, when temple is closed.
Two special hymns, the Shri Shyam Aarti and the Shri Shyam Vinati, are chanted on all these occasions. The Shri Shyam mantra is another litany of the Lord's names that is chanted by devotees.
The aarti reads as follows:
ॐ जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे,
खाटू धाम विराजत, अनुपम रूप धरे,  ॐ जय श्री श्याम हरे,
रतन जरित सिंघासन, सर पर चवर धूरे, 
तन केशरिया बागो, कुंडल श्रवण परे, ॐ जय श्री श्याम हरे,
गल पुष्पों की माला, सर पर मुकुट धरे,
खेवत धुप अग्नि पर, दीपक ज्योति जले, ॐ जय श्री श्याम हरे,
मोदक खीर चूरमा, सुवरण थाल भरे,
सेवक भोग लगावत, सेवा नित्य करे, ॐ जय श्री श्याम हरे,
झांज कटोरा और घरियावल, शंक मृदंग धुरे,
भक्त आरती गावे, जय जय कार करे, ॐ जय श्री श्याम हरे,
जो ध्यावे फल पावे, सुब दुःख से उबरे, 
सेवक जन निज मुख से, श्री श्याम श्याम उचरे, ॐ जय श्री श्याम हरे,
श्री श्याम बहरी जी की आरती, जोप कोई नर गावे,
कहत आलू सिंह स्वामी, मनवांछित फल पावे, ॐ जय श्री श्याम हरे,
ॐ जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे,
निज भक्तो के तुमने, पूरण काज किये, ॐ जय श्री श्याम हरे!!
Other particular observances include:
Shukla Ekadashi & Dwadashi: The 11th & 12th days of the bright half of every month in the Hindu calendar is of special significance to the temple. This is because Barbarika was born on the 11th day of the bright half of the month of Kartika, and he donated his head ("Sheesh") to Krishna on the 12th day of the bright half of the month of Phalguna. Darshan on these two days is therefore considered auspicious and devotees come in their thousands every month. The temple remains open throughout the night that falls between these days. Night-long Bhajan sessions are organised since devotees traditionally pass the night in singing the praises of the Lord. Devotees organise Bhajan programmes and invite Bhajan singers to sing devotional songs.
Bathing in the Shyam Kund: This is the holy pond near the temple from which the idol was retrieved. It is believed that a dip in this pond cures a person from ailments and brings good health. Filled with devotional fervor, people take ritual dips in the Shyam Kund. They believe that this will relieve them of diseases and contagion. Bathing during the annual Phalguna Mela festival is deemed specially salutary.

Rajesh Mishra, Gorakh Pd. Gupta and Narendra Pd. Gupta In Falgun Mela with Nishan..


Nishan Yatra: It is believed that your wishes are granted if you offer a Nishan at the temple. A Nishan is a triangular flag of a particular size, made of cloth, which is hoisted on a bamboo stick. It is carried in one's hands while covering the route from the town of Ringas to Khatu (17 km) on (bare) foot. Nishans are offered in millions during the Phalguna Mela.

Phalguna Mela: The most important festival associated with the temple is the Phalguna Mela which occurs just 3-4 days before from the festival of Holi. Barbarika's head appeared on Phalguna Shuddha Ekadashi, the 11th day of the bright half of the Hindu month of Phalguna. Therefore, the fair is held from the 9th to the 12th of that month.
An estimated one million devotees visit the temple during these four days from all corners of the country. There is virtually no vacant space in the town during this period. There is celebration and festivity in the moods of the devotees who wait for hours in long serpentine queues for a moment's glance of the deity. The whole town, along with the temple, is illuminated. Singers across all over the country come here to perform Bhajans on this holy occasion. Special arrangements are made for feeding the devotees in almost all the Dharamshalas and rest-houses. Special trains & buses also ply during the mela. The government of Rajasthan takes care of the law and order during the fair.
Administration and amenitiesThe Public Trust that has charge of the temple is registered under registration No. 3/86. A 7-member committee oversees the management of the temple. A number of Dharmashalas (charity lodges) are available for their comfortable stay. The temple timings are as follows:
In winter (Ashvin bahula 1st to Chaitra shuddha 15th): 5.30 am - 1.00 pm and 4.00 pm - 9.00 pm.
In summer (Vaishakha bahula 1st to Bhadrapada shuddha 15th): 4.30 am - 12.30 pm and 4.00 pm - 10.00 pm.
The temple is open 24 hours a day on every Shukla Paksha Ekadasi, ie., on the 11th day of the bright half of every month in the Hindu calendar. The temple is also open throughout the 4-day Phalgun Mela.

14 फ़रवरी 2012

Gangaur festival and their importance in public life

आम जीवन में गणगौर पर्व का महत्व
 
राजस्थान मे बहुत से त्योहार मनाये जाते है लेकिन चैत्र मास त्योहारो का आखरी मास माना जाता है । नवरात्रों के तीसरे दिन यानी की चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तीज को गणगौर माता याने की माँ पार्वती की पूजा की जाती है | पार्वती के अवतार के रूप में गणगौर माता व भगवान शंकर के अवतार के रूप में ईशर जी की पूजा की जाती है।प्राचीन समय में पार्वती ने शंकर भगवान को पती ( वर) रूप में पाने के लिए व्रत और तपस्या की | शंकर भगवान तपस्या से प्रसन्न हो गए और वरदान माँगने के लिए कहा | पार्वती ने उन्हें वर रूप में पाने की इच्छा जाहिर की | पार्वती की मनोकामना पूरी हुई और उनसे शादी हो गयी । बस उसी दिन से कुंवारी लड़कियां मन इच्छित वर पाने के लिए ईशर और गणगौर की पूजा करती है | सुहागिन स्त्री पती की लम्बी आयु के लिए पूजा करती है |गणगौर की पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि से आरम्भ की जाती है | | सोलह दिन तक सुबह जल्दी उठ कर बाड़ी बगीचे में जाती है दूब व फूल लेकर आती है | दूब लेकर घर आती है उस दूब से दूध के छींटे मिट्टी की बनी हुई गणगौर माता को देती है | थाली में दही पानी सुपारी और चांदी का छल्ला आदी सामग्री से गणगौर माता की पूजा की जाती है |
आठ वे दिन ईशर जी पत्नी (गणगौर ) के साथ अपनी ससुराल पधारते है | उस दिन सभी लड़कियां कुम्हार के यहाँ जाती है और वहा से मिट्टी की झाँवली ( बरतन) और गणगौर की मूर्ति बनाने के लिए मिट्टी लेकर आती है | उस मिट्टी से ईशर जी ,गणगौर माता, मालन,आदि की छोटी छोटी मूर्तिया बनाती है | जहा पूजा की जाती उस स्थान को गणगौर का पीहर व जहा विसर्जित की जाती है वह स्थान ससुराल माना जाता है |
गणगौर माता की पूरे राजस्थान में पूजा की जाती है | आज यानी की चैत्र मास की तीज सुदी को गणगौर माता को चूरमे का भोग लगाया जाता है | दोपहर बाद गणगौर माता को ससुराल विदा किया जाता है | यानी की विसर्जित किया जाता है | विसर्जन का स्थान गाँव का कुआ ,जोहड़ तालाब होता है | कुछ स्त्री जो शादी शुदा होती है वो अगर इस व्रत की पालना करने से निवर्ती होना चाहती है वो इसका अजूणा करती है (उधापन करती है ) जिसमें सोलह सुहागन स्त्री को समस्त सोलह श्रृंगार की वस्तुएं देकर भोजन करवाती है |
गणगौर माता की पूरे राजस्थान में जगह जगह सवारी निकाली जाती है जिस मे ईशर दास जीव गणगौर माता की आदम कद मूर्तीया होती है | उदयपुर की धींगा गणगौर, बीकानेर की चांद मल डढ्डा की गणगौर ,प्रसिद्ध है |
राजस्थानी में कहावत भी है तीज तींवारा बावड़ी ले डूबी गणगौर | अर्थ है की सावन की तीज से त्योहारों का आगमन शुरू हो जाता है और गणगौर के विसर्जन के साथ ही त्योहारों पर चार महीने का विराम आ जाता है |

04 फ़रवरी 2012

KHATUSHAYAMJI FALGUN MELA

खाटू श्यामजी मेला 2012 की तैयारियाँ 


राजस्थान के सीकर जिले में आगामी 28 फरवरी से शुरू होने वाले खाटू श्यामजी के वार्षिक फाल्गुनी मेले में दर्शनार्थियों की सुख सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाएगा। 

यह निर्णय सीकर जिले के खाटू श्यामजी में जिला कलेक्टर धर्मेंद्र, भटनागर की अध्यक्षता में बुधवार को सम्पन्न बैठक में लिया गया। उन्होंने बताया कि मेले में पार्किंग व्यवस्था इस बार भी नि:शुल्क रहेगी तथा सीसीटीवी कैमरे भी लगाये जाएंगे। उन्होंने रींगस को इस मेले के मुख्य सिंह द्वार के रूप में रेखांकित करते हुए वहां भी मेले जैसी समानान्तर व्यवस्थाएं करने के निर्देश दिए।

उन्होंने बताया कि मेले के लिए एक कोर समूह बनाया गया है और दातारामगढ के एसडीएम मेला मजिस्ट्रेट होंगे। पुलिस सुपरिंटेंडेंट गौरव श्रीवास्तव ने बताया कि मेले में पुलिस अधिकारियों व जवानों की सेवाएं तीन पारियों में ली जाएगी ताकि वे अधिक मुस्तैद होकर ड्यूटी दे सकें।

उन्होंने मेले में वॉच टावर कायम करने, रींगस व मंढा मोड पर बडे स्क्रीन लगाकर मेले का लाइव टेलिकास्ट करने, पूरी मेलावधि में वन वे ट्रैपिक व्यवस्था लागू रखने, रींगस-खाटू मार्ग पर झांकियां लेकर आने वालों के लिए नई लेन बनाने, मंढा मोड व रींगस मोड पर एक-एक अग्निशमन व एम्बूलेंस वाहन तैनात रहेंगे।

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