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31 मार्च 2012

गंगा दशहरा- गंगा का धरती पर अवतरण

गंगा दशहरा के अवसर पर्व पर मां गंगा में डुबकी लगाने से सभी पाप धुल जाते हैं और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। वैसे तो गंगा स्नान का अपना अलग ही महत्व है, लेकिन इस दिन स्नान करने से मनुष्य सभी दुःखों से मुक्ति पा जाता है। ज्येष्ठ मास में शुक्ल पक्ष की दशमी यानी 11 जून को गंगा दशहरा मनाया जाएगा। इस पर्व के लिए गंगा मंदिरों सहित अन्य मंदिरों पर भी विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी। इस दिन स्वर्ग से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। गंगा दशहरा के दिन गंगा नदी में स्नान करने से दस पापों का हरण होकर अंत में मुक्ति मिलती है। गंगा दशहरा के दिन दान पुण्य का विशेष महत्व है। इस दिन दान में सत्तू, मटका और हाथ का पंखा दान करने से दोगुना फल प्राप्त होता है। ज्योतिषियों के अनुसार गंगाजी को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने के लिए अंशुमान के पुत्र दिलीप व दिलीप के पुत्र भागीरथ ने बड़ी तपस्या की। उसकी इस तपस्या से प्रसन्न होकर माता गंगा ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि मैं तुम्हें वर देनी आई हूं। राजा भागीरथ ने बड़ी नम्रता से कहा कि आप मृत्युलोक में चलिए। गंगा ने कहा कि जिस समय मैं पृथ्वीतल पर गिरूं, उस समय मेरे वेग को कोई रोकने वाला होना चाहिए। ऐसा न होने पर पृथ्वी को फोड़कर रसातल में चली जाऊंगी। भागीरथ ने अपनी तपस्या से रुद्रदेव को प्रसन्न किया तथा समस्त प्राणियों की आत्मा रुद्रदेव ने गंगाजी के वेग को अपनी जटाओं में धारण किया। शास्त्रों में उल्लेख है कि जीवनदायिनी गंगा में स्नान, पुण्यसलिला नर्मदा के दर्शन और मोक्षदायिनी शिप्रा के स्मरणमात्र से मोक्ष मिल जाता है। शिप्रा तट पर विशेष तिथियों के साथ हर दिन ही श्रद्घालुओं का तांता लगा रहता है। गंगा दशहरा उत्सव का उजास शिप्रा नदी के तट पर भ‍ी फैला है। श्रद्धालु शिप्रा की आरती में शामिल होने के साथ-साथ गर्मी के चलते घाटों पर भी बैठकर शीतलता और सुकून पा रहे हैं गंगा आज प्रदूषण के अत्यंत भयानक दौर से गुजर रही है। पर्यावरण की सुरक्षा से उदासीन भोगवादी प्रवृत्ति ने ग्लोबल वार्मिग अर्थात पृथ्वी का तापमान बढा कर इस महानदी के अस्तित्व पर भीषण संकट खडा कर दिया है। गंगावतरण की तरह उनका लुप्त होना भी ऐतिहासिक घटना होगी, जो भारत वर्ष का मानचित्र ही नहीं बल्कि उसकी युगों पुरानी सभ्यता को भी बदल सकती है। पुराणों में यह कथा प्रसिद्ध है कि भगवती लक्ष्मी देवी सरस्वती और गंगाजी परस्पर शापवश नदी बनकर भारत वर्ष में पधारी। ब्रह्मवैवर्त्तपुराण के प्रकृति खण्ड में इस कथानक का विस्तार से वर्णन है। जब इन देवियों ने भगवान नारायण से यह पूछा कि उन्हें कब तक पृथ्वी पर रहना होगा तब श्रीहरि ने उनको यह आश्वासन दिया – ”कलौ पच्चसहस्रे च गते वर्षे च मोक्षणम। युष्मांक सरितां भूयो मदगृहे चा५५मविष्यथ।“ यानि कलियुग के पांच हजार वर्ष व्यतीत हो जाने पर तुम नदीरुपिणी देवियों का उद्धार हो जाएगा। तदन्तर तुम लोग मेरे पास वापस लौट जाओगी। ब्रह्मवैवर्त्तपुराण इस श्लोक में भगवान विष्णु, गंगा, सरस्वती एवं लक्ष्मीजी को कलियुग में मात्र पांच हजार वर्ष तक ही पृथ्वी पर नदी के स्वरुप में रहने का निर्देष देते हैं। ब्रह्मवैवर्त्तपुराण में प्रकृति खण्ड के सातवें अध्याय के दसवें श्लोक से भी उपयुक्त तथ्य सामने आता है- कलौ पच्जसहस्रं च वर्ष स्वित्वा च भारते। जम्मुस्ताश्च सरिप्रदूपं विहाय श्रीहरेः पद्प। भारत में कलियुग के पांच सहस्र वर्ष व्यतीत होने पर वे सभी (गंगा आदि) आपना नदी रुप त्याग कर श्रीहरि के धाम में चली जाएगी। ब्रह्मवैवर्त्तपुराण प्रकृति खण्ड के दसवें अध्याय में वर्णित भगवती गंगा एवं पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण का संवाद ध्यान देने योग्य है। गंगाजी कहती हैं- हे भगवान, सरस्वती के शाप, आपकी इच्छा और महाराज भगीरथ के तप के कारण मैं अभी तक भारत वर्ष जा रही हूं किन्तु हे प्रभो! वहां पापी लोग अपने पाप का बोझ मुझ पर लाद देगें। यह स्थिति कैसे खत्म होगी? मुझे भारत वर्ष में कितने वर्षो तक रहना पडेगा। इस पर परमेष्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अद्यप्रभूति देवेशि कलेः पज्चसहस्रकं, वर्ष स्थितिस्ये भारस्या भुवि शापेन भारते।। ”देवेशि! कलियुग के पांच हजार वर्ष तक तुम्हें सरस्वती के शाप से भारत वर्ष में रहना होगा।“ श्रीमद्देवी भागतवत के नवम स्कन्ध में भी यही सारी बातें शब्दतशः कही गयी हैं। इसमें सम्पूर्ण कथानक एवं श्लोक ब्रह्मवैवर्त्तपुराण के समान ही हैं। धर्मग्रन्थों में वर्णित कथाओं में आए तथ्यों का सुक्ष्मतापूर्वक अध्ययन करने पर यह निर्ष्षक निकलता है कि भागीरथी गंगा की पृथ्वी पर कलियुग के 5000 वर्ष तक विराजमान रहने का विधान ही भगवान द्वारा निर्दिष्ट किया गया था। अन्तर्यामी प्रभु ने अपनी दिव्य दृश्टि से यह देख लिया था कि कलियुग में पांच हजार वर्ष बीत जाने के उपरांत मनुष्य दुर्बुद्विवश गंगाजी की पवित्रता एवं शुद्धता को भंग करके इसे प्रदूषित करने में कोई कसर नहीं छोडेगे। तब इस देवनदी को धरती पर प्रदूषण की गंभीर स्थिति से गुजरना पडेगा। आज यह सत्य सामने आ चुका है। भारतीय काल गणना के अनुसार वर्तमान विक्रम संवत 2069 तक कलियुग के 5113 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। धरा पर गंगाजी के रहने की भगवान द्वारा निर्दिश्ट अवधि पांच हजार वर्श से 113 वर्ष ज्यादा बीत गये हैं। इस प्रकार गंगाजी की धरती पर रहने की अवधि तो पूरी हो चुकी है। गंगा ती को ईमानदारी के साथ मानवकृत प्रदूशण से मुक्त करने के लिए न जुटे तो भगवती गंगा हम सबको छोडकर निष्चय ही अपने धाम वापस चली जाएगी। हिमालय (उत्तराखण्ड) में गंगाजी के जल का मुख्य स्रोत ग्लेशियर जिस तेजी से पिघल रहा है उससे भविष्य में गंगाजी के सूख जाने का संकट पैदा हो सकता है। गंगोत्री से गोमुख निरंतर आगे खिसक रहा है। प्रकृति की चेतावनी को नजरअंदाज किया गया और गंगा को प्रदूषण से मुक्त कराने का अभियान चलाने के साथ पहाडों पर हो रही अंधाधुंध खुदाई तथा वनों की कटाई को नहीं रोका गया तो भावी पीढयां गंगाजी के दर्षन से वंचित हो जाएगी। हमारे सुख और समृद्धि के स्रोत वन हिमालय पहाड की देन हैं। इस पहाड की ऊॅची चोटियां सदैव बर्फ से ढकी रहती हैं। फिर बीच-बीच में गंगोत्री हिमनद ग्लेषियर बर्फ के लम्बे चौडे मैदान हैं। सतत बर्फ के नीचे ढके रहने वाले क्षेत्र साल में छह माह बर्फ से ढके रहते हैं। बसंत ऋतु आते ही बर्फ पिघलने लगती है और इसके नीचे मखमली घास यानि बुग्याल उग आती हैं। पहाडी ढालों के जंगल नदियों की मॉ हैं। मिट्टी बनाने के कारखाने हैं। हिमालय इतना विशाल और महान हैं कि वह केवल उसकी गोद में बसने वाले पर्वतीय लोगों का पिता की पालन पोषण ही नहीं करता बल्कि इससे निकलने वाली नदियां समुद्र में मिलती हैं। 2500 किमी० लम्बी और कई किमी० चौडी यह पर्वतवाला अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, चीन, भूटान, वर्मा और बंगलादेश के जीवन को प्रभावित करता है। यह इस्लाम, बौद्ध, हिन्दू और अन्य संस्कृति का संगम है। हजरत बल, अमरनाथ, गंगोत्री, बदरीनाथ, केदारनाथ, रुमटेक बौद्ध मठ जैसे धर्मो के पवित्र तीर्थ हिमालय में है। हिमालय और खासतौर से इसके अन्तर्गत उत्तराखण्ड का पवित्र क्षेत्र तपोभूमि के नाम से विख्यात है। अनादिकाल से यहां पर कई तपस्वियों ने तप किया। मानव जाति कल्याण के लिए चिंतन किया और महान ग्रंथों की रचना की। व्यास देव ने बदरी वन में १८ पुराणों की रचना की। भगीरथ जी की तपोभूमि गंगोत्री थी। हिमालय की बेटी गंगा जो सब नदियों की प्रतीक है। करोडों लोग अपनी मॉ मानते हैं। गंगा मैय्या ने मॉ की तरह पालन पोषण किया। गंगा जल के पान और स्नान से कई रोगों से मुक्ति होती हैं। गंगा और हिमालय केवल पर्वतवासियों और भारतवासियों की ही नहीं सारी मानव जाति की अनमोल विरासत हैं। परन्तु आज अनमोल विरासत पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। हिमालय खल्वाट हो गया है। इससे निकलने वाली नदी-नालों में पानी या तो बहुत कम दिखाई देता है या कभी तबाही मचाने वाली बाढे आती हैं। हिमालय अब कुद्ध पिता की तरह कठोर दण्ड देने वाला दिखाई दे रहा है परन्तु यह शुरुआत हमारी ओर से पहले शुरु हुई। वनों की व्यापारिक कटाई, इसके बाद चीड जैसे पेडों को पनपाया गया, मिट्टी और पानी का संरक्षण करने, चारा और खाना देने वाले वन लुप्त हो गये। पानी के स्रोत सूखने लगे। तीखे ढालों पर खेती होने से उपजाऊ मिट्टी बहकर चली गयी। हिमालय का प्राकृतिक सौन्दर्य लौटाने के प्रयास नहीं हुए। वन, हिमालय, गंगा का महत्व नजरअंदाज हो रहा है। प्राकृतिक विरासत की ओर ध्यान न दिये जाने का खामियाजा सम्पूर्ण मानव जाति को भुगतना पडे तो आश्चर्य नहीं।

मां झड़ाना माता

देवी के इस मंदिर में आज भी होता है आग का चमत्कार
भगवान अपने होने का प्रमाण हमेशा देते रहते हैं, और हमारे भारतवर्ष में तो ईश्वर के चमत्कार हर चार कदम पर देखे जा सकते हैं। ऐसे कई स्थान हैं जो हमें यह अहसास कराते रहते हैं कि दुनिया में भगवान नाम की कोई शक्ति है जो हमेशा हम पर अपनी कृपा दृष्टी बरसा रही है। राजस्थान के उदयपुर जिले में भी एक ऐसा ही स्थान है जहां शक्ति स्वरूप मां झड़ाना माता के रूप में विद्यमान है जो कि राजपूत और भील समुदाय के साथ-साथ सम्पूर्ण मेवाड़ की अधिष्ठात्री देवी है। लोगों की मान्यता है कि देवी के इस दरबार में आकर लकवा के रोगी पूर्ण रूप से ठीक हो जाते हैं। साथ ही यह भी मान्यता है कि देवी हर महीने दो या तीन बार स्वयं अग्नि से स्नान करती है, स्वत: जाग्रत हुई इस अग्नि में मां की चुनरी, धागे सभी जलकर भष्म हो जाते हैं। लकवा के रोगियों के अलावा यहाँ निसंतान दंपत्ति भी संतान की कामना लिए आते हैं और अपनी झोली भर जाने पर माता के इस मंदिर में झूला चढ़ाते हैं, माता के इस मंदिर में त्रिशूल चढ़ाने की परंपरा भी काफी पुरानी है, साथ ही यहां लकवा से मुक्ति पाए भक्त चांदी और लकड़ी के अंग भी मां के दरवार में भेंट करते हैं। इस स्थान पर मां का दरवार एक खुले चौक में ही स्थित है कहा जाता है कि मां के स्नान के लिए प्रक्कत होने वाली अग्नि के कारण यहां कोई मंदिर नहीं बनाया जा सका है।मां के इस स्थान का इतिहास कितना पुराना है इसके बारे में कोई नहीं जानता, हां लोग इतना ज़रूर कहते हैं कि इस स्थान पर पहले संत महात्मा तपस्या किया करते थे धीरे-धीरे यहां गांव वालों का आना हुआ और यह स्थान आस्था का केंद्र बनता गया। मां झड़ाना का यह स्थान उदयपुर शहर से 60 किमी. दूर कुराबड- बम्बोरा मार्ग पर अरावली पर्वत माला के बेच स्थित है,यह स्थान मेवाड़ के प्रमुख शक्ति पीठों में से एक है।

29 मार्च 2012


24 AVATRS OF SRI VISHNUJI





24 AVATRS OF SRI VISHNUJI:


1). ADI PURUSH AVATAR (Incarnation as the Pre-eminent man) : Lord Vishnu took his first incarnation as the pre-eminent man, with a desire to commence creation. This first incarnation of Lord Vishnu was full of all the sixteen Kalas (Supernatural powers).


Lord Brahma manifested from the navel of Lord Vishnu in his (Lord Vishnu) state of Yoganidra (deep meditation). The creation as well as the expansion of the creation commenced from the organs of Lord Brahma. The first incarnation of Lord Vishnu is all-powerful, which can be seen only by the yogins and sages who have attained divine knowledge. This incarnation is also the indestructible seed from which all the other incarnations manifest themselves. During the time of final annihilation of the world, every creation merges into him.


2). THE ETERNAL YOUTHS : Sanatkumar was the 'Manasputra' (born by a wish) of Lord Brahma. Throughout his life, he maintained celibacy; and engaged himself in the performance of tremendous penance. He was the one from whom the Brahmins got the inspiration regarding the values and importance of penance and Celibacy.


3). VARAHA AVATAR (The incarnation as a Boar) :Lord Vishnu took his third incarnation as a boar. In this incarnation Lord Vishnu rescued the earth which had submerged in the ocean, and brought it out from the ocean. The whole creation started only after that. A demon by the name of Hiranyaksha had abducted the earth and carried it to the 'Rasatala' (the second lowest of the world). The earth is considered to be as a 'Woman' and since it is a crime to abduct a woman therefore Lord Vishnu in his incarnation of a boar killed the demon Hiranyaksha and liberated the earth from his clutches.


4). NARADA AVATAR (The incarnation as Sage Narada) :Lord Vishnu took his fourth incarnation as Narada. Narada by becoming a 'Devarishi' among all the sages, achieved liberation from all of his Karma's (action). Narada was the one who gave discourses to the Vaishnavas (followers of Lord Vishnu) on 'Pancharatra Tantra'.


Lord Vishnu in his incarnation as Narada, showed that, the devotion is the best mean of getting liberated from all the bondages of 'Karma's'. He also said that a devotee of Lord Vishnu is the supreme among the devotees in the same way as Devarishi Narada among the Sages.


5).  NARA-NARAYANA AVATAR (Incarnation as Nara-Narayana) :Lord Vishnu took his fifth incarnation as sage Nara-Narayan by taking a birth from the womb of a woman named 'Kala'. He performed a tremendous penance by going to Badri and Kedar. He showed the importance Penance (Labour), and also that nothing can be achieved in this world without it.



6). KAPILA AVATAR(Incarnation as Sage Kapila) : Lord Vishnu's Sixth incarnation was as sage Kapila. The objective of this incarnation was to compile all the divine knowledge that had been destroyed. He was the profounder of Sankhya Shastra (rationalism) which helped the Brahmins, who had forgotten their duties to rectify their mistakes. He also gave discourse to his own mother.




7). DATTATRAYA AVATAR (Incarnation as Dattatraya) : Lord Vishnu's Seventh incarnation was as Dattatraya. He was born to Ansuya and his father was Sage Atri. He was the one who had given Spiritual Knowledge to King Alarka and Prahlada. He had twenty four teachers. He believed that in the world, a man can learn from each and every thing, so he accepted twenty-four objects like water, bird, air, an unmarried girl, and even a prostitute etc.




8). YAGYA AVATAR (Incarnation as Yagya): Lord Vishnu in his eighth incarnation as Yagya was born to Prajapati and Akuti. He had rescued a 'Devagana' (celestial and supernatural being) named Yama and also the Manvantar named as 'Swayambhuva'. The main thrust of his teaching was based on the values of helpfulness and protecting each other during the time of crisis.




9). RISHABH AVATAR (Incarnation as Rishabh Dev) : Lord Vishnu in his ninth incarnation as Rishabh Dev was born to king Nabhi and Marudevi. His mother Marudevi was the daughter of Indra. He attained that state of Paramhansa (an ascetic of highest order who has controlled his anger) which is an uphill task. He was given the title of 'Jin' which means a ' a knower'. His followers are known as Jains.




10). PRITHU AVATAR (Incarnation as Prithu) :Lord Vishnu in his tenth incarnation as 'Prithu' came into existence after the body of King 'Vena'. Lord Vishnu took this incarnation as per the wishes of the sages. The earth had concealed all the vegetation's within her and as a result the whole land had become barren. To protect the humanity, Lord Vishnu took incarnation as Prithu by milking the cow (earth). This is considered that as a very supreme incarnation, because the earth has remained full of vegetation's after that.




11). MATSYA AVATAR (Incarnation as a Fish) : All the oceans had unified into a single ocean in the 'Manvantara' of 'Chakshusha'. Lord Vishnu in his 11th incarnation as a Matsya (Fish) rescued the earth from 'Maya' the demon. He gave discourses to Satyavrat along with the seven sages, while they were sitting on the boat. He also showed them his illusionary powers. This was his eleventh incarnation.




12). KACHCHAP AVATAR (Incarnation as a Tortoise) : Lord Vishnu in his twelfth incarnation as a tortoise, held the mountain 'Mandarachala' on his back, during the time when the deities and the demons where churning the ocean. He stopped the mountain from going to the netherworld. This was Lord Vishnu's twelfth incarnation.




13). DHANVANTARI (Incarnation as Dhanvantari) : Lord Vishnu took his thirteenth incarnation as Dhanvantari. He manifested from the ocean holding a vessel filled with ambrosia. He was the profounder of medicinal science.





14). MOHINI AVATAR (Incarnation as a most Enchanting woman) : Lord Vishnu in his fourteenth incarnation as a most enchanting woman enchanted the demons by his beautiful appearance of a woman, and took away the pot filled up with ambrosia from them and gave it to the deities. The deities were thus protected from the demons.




15). NARSIMHA AVATAR (Incarnation in the form of half-man and half-lion) : Lord Vishnu took his fifteenth incarnation as Nrisimha, having upper portion of his body in the form of lion and the lower portion resembling of a man. In this incarnation he protected Prahlada from his father Hiranyakashipu the demon. He killed Hiranyakashipu by tearing his body apart by his nails. Lord Vishnu had to attain this form because Lord Brahma had blessed Hiranyakashipu, that a Human being could not kill him.




16). HAYAGREEVA AVATAR (Incarnation as Hayagreeva) : Once Lord Brahma becoming tired of his creative activities, wanted to rest. The night of the Brahma was approaching. Because of his tiredness Lord Brahma yawned. All the four Vedas came out from his opened mouth. A demon who used to live near him in disguise, abducted the Vedas. Lord Vishnu took his sixteenth incarnation as Hayagreeva to protect the Vedas. In this incarnation his face resembled that of a horse and the rest of his body resembled that of Sri Narayan with all of his four hands. He killed the demon and protected the Vedas.




17). VAMAN AVATAR (Incarnation as a Dwarf) : Lord Vishnu took his seventeenth incarnation as a Dwarf, when Bali the king of the demons had captured the entire three worlds. Indra and all the other deities were wandering all around after losing the heaven.


To help the deities regain control over the heaven. Lord Vishnu disguised as a dwarf went to Bali when he was busy performing a 'Yagya' and demanded earth measured by his three steps. When 'Bali' agreed, he transformed his form from a small dwarf to a giant. Consequently he covered all the three world with his two steps. Ultimately he regained heaven for the deities.




18). PARSHURAM AVATAR (Incarnation as Parshurama) : When the Kshatriya kings became ruthless and started exploiting their subjects. Lord Vishnu took his eighteenth incarnation as Parshurama' and annihilated the Kshatriyas kings for seventeen times and consequently donated the earth to the Brahmins.




19). VYAS AVATAR (Incarnation as Sage Vyasa) : Lord Vishnu took his nineteenth incarnation as Sage Vyasa by taking birth from the womb of 'Satyavati'. His father was sage Parashar. He made the division of Veda, and made extension of its branches. He also wrote eighteen Mahapuranas and the Mahabharata.




20). RAM AVATAR (Incarnation as Lord Rama) : Lord Rama is considered to be the twentieth incarnation of Lord Vishnu. In this incarnation he constructed a bridge over the ocean with the help of the Vanars (monkeys) and after crossing over to Lankas killed many demons like Ravana, Kumbhakarna. He accomplished many astonishing feats and saved the deities. He taught the value of morality.




21). BALARAM AVATAR (Incarnation as Balrama) : Balrama is considered to be the twenty-first incarnation of Lord Vishnu. In this incarnation he killed Pralambasura the demon and he killed many more demons.




22). KRISHNA AVATAR (Incarnation as Krishna) : Lord Krishna born in Mathura was the twenty-second incarnation of Lord Vishnu. He fought against the exploitation right from his childhood and killed many demons like Kalayavan, Kansa, Jarasandh etc. He gave a divine knowledge to Arjun during the battle of Kurukshetra.




23). BUDDHA AVATAR (Incarnation as Buddha) : The twenty-third incarnation of Lord Vishnu was as Lord Buddha. In the Kaliyuga the demons were completely subjugated by the deities. Shukracharya the teacher of the demons instigated the demons to perform Yagya so that they could regain power and authority. Fearing this the deities prayed to Lord Vishnu for help. Lord Vishnu took incarnation as Buddha and dissuaded the demons from performing Yagya as it involves violence the demons stopped performing Yagyas.




24). KALKI AVATAR (Incarnation as Kalki) : At the end of Kaliyuga, when the sins would be 80, all pervading that the kings would themselves becomes thieves then Lord Vishnu would take his twenty-fourth incarnation as Kalki by taking birth in the village of 'Shambhal'. He would take birth in a Brahmin family of Vishnuyash. By killing and destroying the sinners, he would re-establish the superiority of Virtuosity and religiousness.

19 मार्च 2012

Vastushastra

वास्तुशास्त्र आखिर करता क्या है?

वस्तुओं में फेरबदल कर वास्तु दोष समाप्त करें—
वास्तु शास्त्र इसके रचयिता विश्वकर्माजी की मानव को अभूतपूर्व देन है। ज्योतिष विज्ञान के अंतर्गत वास्तु का एक महत्वपूर्ण स्थान है। किसी भी भवन का निर्माण करते समय उसे वास्तुनुकूल बनाना आवश्यक है क्योंकि घर में सुख, शांति एवं समृद्धि इसी पर आधारित है। वास्तु दोष होने पर भवन में कई प्रकार की परेशानियाँ, अस्वस्थता, अकारण दुःख, हानि, चिंता एवं भय आदि बना रहता है।

आधुनिक युग में फ्लैट संस्कृति चारों ओर विकसित हो चुकी है। इन फ्लैटों में अगर वास्तु दोष हों तो भी तोड़-फोड़कर अनुकूल बनाना संभव नहीं हो पाता है। कई जगह धनाभाव या अर्थाभाव के कारण भी व्यक्ति वास्तु दोष का निवारण नहीं कर पाता है। लेकिन ऐसे में निराश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि ऐसे में हम घर के सामान या वस्तुओं में फेर-बदलकर वास्तु दोष को एक सीमा तक समाप्त कर सकते हैं।
वास्तु शास्त्र इसके रचयिता विश्वकर्माजी की मानव को अभूतपूर्व देन है। ज्योतिष विज्ञान के अंतर्गत वास्तु का एक महत्वपूर्ण स्थान है। किसी भी भवन का निर्माण करते समय उसे वास्तुनुकूल बनाना आवश्यक है क्योंकि घर में सुख, शांति एवं समृद्धि इसी पर आधारित है।

उदाहरण के तौर पर आग्नेय कोण (पूर्व-दक्षिण का कोना) में रसोईघर होना चाहिए किन्तु ऐसा न होने पर अग्नि की पुष्टि नहीं हो पाती है। इसके निवारण के लिए हम घर की इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं को जैसे फ्रीज, टी.वी. इत्यादि को इस कोने में रखकर इसे पुष्ट बना सकते हैं। इसी प्रकार घर की पूर्व एवं उत्तर दिशा को खाली रखा जाना चाहिए।

अगर ऐसा संभव न हो तो पूर्व या उत्तर दिशा में रखी वस्तुओं के वजन से लगभग डेढ़ गुना वजन नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) या दक्षिण दिशा में रखा जाना चाहिए क्योंकि नैऋत्य कोण भारी एवं ईशान कोण (पूर्व-उत्तर) हलका होना चाहिए। इसी प्रकार घर की घड़ियों को हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा में लगाया जाना जाना चाहिए इससे अच्छे समय के आगमन के व्यवधान समाप्त होते हैं। ईशान कोण पवित्र एवं स्वच्छ रखा जाना चाहिए एवं एक घड़ा जल भरकर इस कोने में रखना चाहिए, इसके सत्परिणाम मिलते हैं।

सभी महत्वपूर्ण कागजों को पूर्व या उत्तर दिशा में रखा जाना चाहिए ऐसा न करने से इनसे संबंधित घटनाएँ अहितकारी रहती हैं। इस प्रकार घर के शयन कक्ष, पूजा-स्थल, तिजोरी, बाथरूम, बैठक-स्थल, भोजन-कक्ष, मुख्य द्वार एवं खिड़की आदि में परिवर्तन कर वास्तु दोष ठीक कर जीवन में सफलता प्राप्त की जा सकती है।
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अविवाहित किस दिशा में सोएँ–जिससे शीघ्र विवाह हो—

आज चीनी ज्योतिष का प्रचलन बढ़ता ही चला जा रहा है। चीन ज्योतिष भारतीय ज्योतिष का मिला-जुला ही रूप है। फर्क इतना है कि हमारी विद्या प्राचीन मनीषियों तक ही सीमित रही और काफी काल तक विलुप्त ही रही लेकिन अब ज्योतिष के प्रति रुझान अधिक बढ़ने लगा है। इस क्षेत्र में काफी अनुसंधान व निरंतर प्रयोग चल रहे हैं। यहाँ पर कुछ अनुभूत जानकारियाँ हमारे पाठकों को दी जा रही हैं, ताकि हमारे पाठक अधिक से अधिक इसका लाभ लें।

अविवाहित युवक हो या युवती जिसका विवाह नहीं हो रहा है और अनेक बाधाएँ आ रही हैं, उन्हें घर के नैऋत्य कोण अर्थात दक्षिण-पश्चिम दिशा वाले कोण में सोना चाहिए, इससे शीघ्र विवाह योग बनेंगे। यदि किसी परिवार में अलग से कमरा न हो तो वह नैऋत्य कोण वाली जगह में सोएँ और लाभ पाएँ।
चीन ज्योतिष भारतीय ज्योतिष का मिला-जुला ही रूप है। फर्क इतना है कि हमारी विद्या प्राचीन मनीषियों तक ही सीमित रही और काफी काल तक विलुप्त ही रही लेकिन अब ज्योतिष के प्रति रुझान अधिक बढ़ने लगा है।

कुँवारे लड़के या लड़कियों के शयन कक्ष में हरे पौधे या फूलों का गुलदस्ता नहीं रखें। फेंगशुई में इसे लकड़ी तत्व को माना है एवं लकड़ी तत्व येंग ऊर्जा को बढ़ाता है, अतः येंग ऊर्जा अधिक होगी तो विवाह में बाधा पैदा करेगी। शयन कक्ष में गहरे व लाल रंग के पुष्प कदापि न हों क्योंकि ये शुभ नहीं माने जाते। सफेद रंग के परदे या सोने के बिस्तर पर सफेद रंग की चादर शुभ रहेगी। टी.वी., टेलीफोन या कम्प्यूटर भी न शयन कक्ष में रखें, न ही किताबों को रखें क्योंकि इनके होने से सोने में बाधा रहेगी और नींद नहीं आएगी।

अविवाहित युवक या युवती को कभी भी दरवाजे के सामने सिर या पाँव नहीं रखना चाहिए। नैऋत्य कोण में क्रिस्टल का झाड़ रखें तो उत्तम रहेगा। नैऋत्य कोण वाले कमरे में प्रेमी युगल के चित्र लगाएँ, मोर-मोरनी या लव बर्ड्स के चित्र भी लगा सकते हैं।

शयन कक्ष में हल्के गुलाबी परदे लगा सकते हैं। इस प्रकार यदि अविवाहितों के लिए उपाय किए जाएँ तो विवाह से बाधा दूर होगी एवं उत्तम रिश्ते आने की संभावनाएँ अधिक बढ़ जाएगी।
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वास्तु से मिलेगा मानसिक संतोष—

इस दुनिया को आखिर कोई तो है, जो चलाता है। कुछ-कुछ तो हम जानते हैं, बहुत कुछ ऐसा भी है, जिसे हम बिलकुल नहीं जानते। जो थोड़ा-बहुत हम जानते हैं, उसी में से एक है वास्तु। इस संबंध में शास्त्र और यांत्रिकी दो भिन्न पहलू हैं। यहाँ जिक्र हो रहा है केवल शास्त्र का।

कोई माने या न माने, यह शास्त्र पूरी तरह प्रामाणिक और वैज्ञानिक है, वरना क्या वजह है कि मध्य युग के बाद से सुप्त पड़े इस विषय को इक्कीसवीं सदी में नई चेतना मिली? इस समय जब कम्प्यूटर, क्लोन, अंतरिक्ष के रहस्य जान लेने की बात हो रही है, यह प्राचीन भारतीय शास्त्र अपनी अहमियत दर्ज करा रहा है।
किसी पुराने टूटे-फूटे से मकान में रहनेवाला महलों का मालिक कैसे बन जाता है? वही व्यक्ति महलनुमा मकान में रहकर दिवालिया क्यों हो जाता है? एक ही बाजार में छोटीसी दुकान पर दिनभर भीड़ रहती है और ठीक सामने स्थित भव्य शोरूम में मक्खियाँ उड़ती रहती हैं, क्यो?

इंदौर का राजबाड़ा बार-बार क्यों जल जाता है? इंदौर का ही दक्षिणी हिस्सा सपना-संगीता रोड नया व्यापारिक क्षेत्र कैसे बन गया? दक्षिण मुंबई में देश-विदेश की तमाम नामी-गिरामी कंपनियों के कार्यालय क्यों हैं? देश के प्राचीन मंदिरों, महलों का शिल्प वास्तु से प्रेरित/प्रभावित क्यों हैं?

किसी पुराने टूटे-फूटे से मकान में रहने वाला महलों का मालिक कैसे बन जाता है? वही व्यक्ति महलनुमा मकान में रहकर भी दिवालिया क्यों हो जाता है? एक ही बाजार में किसी छोटी-सी दुकान पर दिनभर भीड़ उमड़ी रहती है और ठीक सामने स्थित भव्य शोरूम में मक्खियाँ उड़ती रहती हैं, क्यों?

ये कोई अनबूझ पहेली नहीं है। इन तमाम सवालों के जवाब हैं। मेरी स्पष्ट मान्यता है कि यह काफी हद तक वास्तु अनुरूप निर्माण का परिणाम है। यह भी सही है कि हर व्यक्ति के जीवन में उतार-चढ़ाव, सुख-दुःख आते हैं। चूँकि यह भाग्य का खेल है। यदि ब्रह्माण्ड है, नक्षत्र है, ग्रह हैं तो ग्रह योग भी हैं और इसीलिए वास्तु शास्त्र भी है।

आपने गौर किया होगा कि किसी मकान में गृह स्वामी की, तो किसी में गृह स्वामिनी की अकाल मृत्यु हो जाती है। किसी घर में अकसर कोई न कोई बीमार रहता है। किसी मकान में वंश आगे नहीं बढ़ता। कहीं पति-पत्नी में तकरार बहुत होती है, तो कहीं औलाद अवज्ञाकारी होती है। ये सब क्या है? वही वास्तु-दोष। हाल ही में आपने पढ़ा होगा कि ग्वालियर के सिंधिया राजघराने में कोई भी पुरुष 60 वर्ष का नहीं हो पाता।

यह कोई अभिशाप या सिंधिया घराने में पैदा होने वाले पुरुषों की शरीर रचना में किसी कमी की वजह से नहीं है। निश्चित रूप से ग्वालियर राजमहल में ऐसा कोई वास्तुदोष होगा, जो पुरुष सदस्यों की लंबी उम्र में बाधक है। यह मेरा निजी अभिमत नहीं है। शास्त्रों में इसकी स्पष्ट व्याख्या की गई है। वेदों में इसका सविस्तार वर्णन है। संवत्‌ 1480 में उदयपुर के महाराजा कुंभकर्ण के कार्यकाल में श्रीमंडन सूत्रधार ने भी वास्तुशास्त्र पर एक ग्रंथ लिखा था। उसी आधार पर 1891 में एक पुस्तक भी प्रकाशित हुई ‘राजवल्लभ’।

वास्तुशास्त्र आखिर करता क्या है? यह बताता है कि कहाँ, क्या होना चाहिए? मसलन, एक आँख की जगह कान लगा हो या एक आँख गर्दन पर हो अथवा नाक आपके घुटने पर हो, ऐसा संभव है क्या? यदि ऐसा हो जाए तो मानव शरीर कितना विकृत लगेगा।
वास्तुशास्त्र पर उपलब्ध ग्रंथों में इसे काफी प्रामाणिक माना गया है। इसमें बताया गया है कि पृथ्वी के चुंबकीय प्रवाहों, दिशाओं, सूर्य की किरणों, वायु प्रवाह एवं गुरुत्वाकर्षण के नियमों का समन्वय ही वास्तुशास्त्र है। राजवल्लभ के अलावा मयशिल्पम्‌, शिल्प रत्नाकार, समरांगण सूत्रधार आदि कई दुर्लभ ग्रंथ हैं, जो पुरातन वास्तुशास्त्र पर अच्छे से प्रकाश डालते हैं। अथर्ववेद, यजुर्वेद, भविष्य पुराण, मत्स्य पुराण, वायु पुराण, पद्म पुराण, विष्णु धर्मोत्तर पुराण, गर्ग संहिता, नारद संहिता, सारंगधर संहिता, वृहत्त संहिता में वास्तुशास्त्र पर प्रकाश डाला गया है।

वास्तुशास्त्र आखिर करता क्या है? यह बताता है कि कहाँ, क्या होना चाहिए? मसलन, एक आँख की जगह कान लगा हो या एक आँख गर्दन पर हो अथवा नाक आपके घुटने पर हो, ऐसा संभव है क्या? यदि ऐसा हो जाए तो मानव शरीर कितना विकृत लगेगा। वास्तु यही बताता है कि मकान में रसोई घर (दक्षिण-पूर्व कोने में), पूजाघर (उत्तर-पूर्व कोने में), शयनकक्ष (दक्षिण-पश्चिम कोने में), मेहमान कक्ष या बच्चों का कक्ष (उत्तर-पश्चिम कोने में) कहाँ होना चाहिए।

बैठक भी उत्तर-पूर्व में ठीक होती है। सोते वक्त सिर दक्षिण या पूर्व में होना चाहिए। उसकी वजह है। पूर्व में सूर्य होता है, जो स्थिर है। दिनभर थकान के बाद जब विश्राम करते हैं, तो सूर्य से ऊर्जा सीधे हमारे मस्तिष्क को मिल जाती है, जो हमें अगले दिन के लिए ऊर्जावान बना देती है। या फिर दक्षिण में इसलिए कि दक्षिण में चुंबकीय प्रवाह होता है, जो हमारे शरीर के रक्त को पूरे शरीर से मस्तिष्क की ओर खींचता है, जो हमें स्वस्थ, प्रसन्न, ऊर्जावान रखता है। जो अपना सिर उत्तर या पश्चिम में करके सोते हैं, वे अक्सर बीमार, बोझिल या उनींदे ही नजर आएँगे।

वास्तु का सबसे अच्छा पालन नए निर्माण में हो सकता है। इसका यह मतलब नहीं है कि मौजूदा बनावट से छेड़छाड़ करना टेढ़ी खीर है। यदि आप स्वस्थ, प्रसन्नचित्त और सुख-समृद्धि चाहते हैं, तो घर की या दफ्तर, दुकान की कुछ व्यवस्थाएँ बदलने को तत्पर रहना चाहिए। लेकिन एक बात जरूर जान लें। वास्तु कोई लॉटरी का टिकट नहीं है, जो आपको मालामाल कर दे। वैसे लॉटरी भी हर टिकट पर तो खुलती नहीं, वास्तु अनुरूप संरचना कर लेने से आपको हर काम में तृप्ति, मानसिक संतोष मिलेगा। क्या यह कम मूल्यवान है? जब आप प्रसन्नचित्त और स्वस्थ मन शरीर से कोई काम करेंगे तो अपेक्षित सफलता स्वाभाविक है। यही वास्तु का सुखद फल है।

दरअसल, सारी गड़बड़ी तब होती है, जब हम आज सुबह बोकर शाम में फल पा लेने की ख्वाहिश कर बैठते हैं, जबकि जो पौधा बोता है, छाया और फल उसे नहीं, अगली पीढ़ी को मिलता है। वास्तु भी प्रकृति के इस नियम से अछूता नहीं। वास्तु अनुरूप निर्माण कर लेने या बदलाव कर लेने से सुखद परिवर्तन अवश्यंभावी है।

07 मार्च 2012

Rangon ka Tyohar Hai Holi


जानिए होली के महत्वपूर्ण


प्रतीकों की अपनी एक अलग दुनिया होती है। और हो भी क्यों नहीं, ये बड़े मजेदार होते हैं। किसी भी संदर्भ को प्रदर्शित करने के लिए उपयोग में लाए जाने वाले बिंदु-रूप, छोटे-रूप या लघु-रूप चिह्न को प्रतीक कहते हैं। प्रतीकों से किसी भी संदर्भ को विस्तृत रूप में देखा जा सकता है। आज की तेज-रफ्तार जिंदगी में प्रतीकों का बहुतायत उपयोग होने लगा है।

जैसे पटाखों की बात निकलते ही हमें दीपावली की याद आ जाती है तो हमने पटाखे को दीपावली का प्रतीक मान लिया। इसी प्रकार हर्षोल्लास के पर्व होली के भी कई प्रतीक हैं जिनसे हमें इस त्योहार के होने के अहसास में बढ़ोतरी होती है।

रंग :
होली मुख्यतः रंगों का ही त्योहार है। लाल, गुलाबी, हरा, नीला, पीला आदि कई रंगों की चमक का नाम है होली। या यूं कहिए होली और रंग एक-दूसरे के पूरक हैं। होली का त्योहार हो और रंगों की बात न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। होली का सबसे पहला प्रतीक रंग ही है। रंगों के बिना होली अधूरी है। एक-दूसरे को रंग लगाने की होड़ तथा विभिन्न रंगों से पुते चेहरे अनायास ही होली का उल्लास दुगुना कर देते हैं।

गुलाल :
होली के दूसरे प्रतीक का नाम है गुलाल। इस दिन सभी को गुलाल लगाकर खुशी का इजहार किया जाता है। इसके अंतर्गत जहां बड़े-बुजुर्गों को गुलाल का टीका लगाकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है, वहीं छोटों तथा बराबरी वालों के पूरे चेहरे पर गुलाल मसलकर हंसी-ठिठोली की जाती है।

भांग व ठंडाई :
होली त्योहार है मस्ती का, उमंग का, उल्लास का। इसका एक प्रतीक भांग व ठंडाई को भी माना गया है क्योंकि हंसी-ठिठोली और मौज-मस्ती करने के लिए आदमी का बेझिझक स्वभाव होना जरूरी है और भांग व ठंडाई के सेवन से आदमी की झिझक मिट जाती है और वह बेझिझक हो अपने को उन्मुक्त वातावरण में ढाल लेता है फिर उसके बाद होती है मस्ती और सिर्फ मस्ती।

प्रह्लाद व होलिका :

पौराणिक कथाओं को देखें तो होली का मुख्य प्रतीक भक्त प्रह्लाद और निर्दयी होलिका ही है। जब भक्त प्रह्लाद अपने क्रूर और निर्दयी पिता हिरण्यकश्यप को भगवान न मानकर प्रभु विष्णु की भक्ति करने लगा तो पिता ने प्रह्लाद को मारने के लिए अपनी बहन होलिका को, जिसे न जलने का वरदान प्राप्त था, आज्ञा दी कि वह प्रह्लाद को लेकर जलती लकड़ियों के ढेर पर बैठ जाए। होलिका ने ऐसा ही किया। मगर ईश्वर चमत्कार ने होलिका को तो जला दिया मगर प्रह्लाद को बचा लिया। तभी से होलिका दहन प्रचलन में है।

पिचकारी और गुब्बारे :
होली पर जब रंगों की बात चलती है तो पहला प्रश्न उठता है उन्हें लगाया कैसे जाए। हम हरएक को तो पकड़-पकड़कर रंग लगा नहीं सकते। ऐसी स्थिति में होली के एक और प्रतीक पिचकारी और गुब्बारों का जन्म हुआ। इनसे हम दूर खड़े व्यक्ति को भी रंगों से सराबोर कर लेते हैं। पानी में रंग घोलो, पिचकारी या गुब्बारों में भरो और दे मारो अपने मनचाहे निशाने पर।

हुड़दंग या गेर :
रंगों के त्योहार का नाम होली है और होली पर हुड़दंग होता ही है क्योंकि उमंग और उल्लास हुड़दंग से ही आता है। कोई चीख रहा है, कोई गा रहा है, कोई किसी को रंग लगाने के लिए उसके पीछे दौड़ रहा है, किसी को कोई जबर्दस्ती रंग के हौज में डुबो रहा है, कोई गप्पे लगा रहा है तो कोई भाँग के नशे में उल्टी-सीधी हरकतें कर औरों का मनोरंजन कर रहा है। ये सब हुड़दंग में ही तो आते हैं।

सोचो! भला ये सब न हो तो होली का मजा आ पाएगा क्या? शायद नहीं। यही हुड़दंग जब सामूहिक रूप धारण करता है तो वह गेर बन जाती है। फिर इसमें रंगों के इस खेल का दायरा बढ़ जाता है। लगभग प्रत्येक गांव, कस्बे, शहर में एक गेर जरूर निकलती है। गेर में सारे गम और दुश्मनी भूलकर लोग गले मिल जाते हैं और खुशियां मनाते हैं।

गुजिया :
होली सिर्फ रंग, मस्ती और हुड़दंग का ही नाम नहीं है, विभिन्न प्रकार की मिठाइयां खाने-खिलाने का नाम भी है। इसमें सबसे पसंदीदा मिठाई को होली का प्रतीक मान लिया गया है और वह है गुजिया। यह कई प्रकार से बनाई जाती है जैसे- मावे की, खोबरे की, गुड़-तिल्ली की आदि। इस दिन गुजिया बनाकर खाने-खिलाने का रिवाज है। इसीलिए इसे भी होली-प्रतीकों में शुमार कर लिया गया है।

टेसू के फूल :

बसंत आते ही मौसम अंगड़ाई लेता है। ठंड गुलाबी होते-होते बिदाई की तैयारी में रहती है। आम बौराने लगते हैं। चारों ओर फूल ही फूल खिले रहते हैं और इन फूलों में अधिकता रहती है टेसू के फूलों की। इन फूलों को पलाश, किंशुक या खाखरे भी कहते हैं। पुराने जमाने में टेसू के फूलों का ही रंग बनाकर होली पर इसका प्रयोग किया जाता था।

जब आदमी तिथि भूल जाए, उसे कैलेंडर उपलब्ध न हो तो वह सिर्फ टेसू के फूल देखकर कह सकता है कि अब होली का त्योहार आ गया।

होलिकोत्सव....


एकता और सद्भावना का पर्व होली!
प्रेम और भाईचारे से मनाएं होली



होलाष्टक से धुलैंडी तक होली उत्सव का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। वस्तुतः यह पर्व सामाजिक एकता का सबसे बड़ा पर्व है जिसमें स्वामी-सेवक, छोटे-बड़े सभी प्रकार के भेदभाव समाप्त हो जाते हैं। साथ ही सारा समाज होली के रंग में रंग जाता है। होली में दिखनेवाली हंसी ठिठोली आपसी संवाद में निहित हैं।

बसंत पचंमी के आते ही प्रकृति में एक नवीन परिवर्तन आने लगता है। दिन छोटे होते हैं। जाड़ा कम होने लगता है। उधर पतझड़ शुरू हो जाता है। आम्रमंजरियों पर भ्रमरावलियां मंडराने लगती हैं। प्रकृति में एक नई मादकता का अनुभव होने लगता है। इस प्रकार होली पर्व के आते ही एक नवीन रौनक, नवीन उत्साह एवं उमंग की लहर दिखाई देने लगती है।

होली जहां एक ओर सामाजिक एवं धार्मिक त्योहार है वहीं यह रंगों का त्योहार भी है। वृद्ध, नर-नारी सभी इसे बड़े उत्साह से मनाते हैं। यह एक देशव्यापी त्योहार भी है। इसमें जाति भेद को कोई स्थान नहीं है। इस अवसर पर लकड़ियों तथा कंड़ों आदि का ढेर लगाकर होलिका पूजन किया जाता है फिर उसमें आग लगाई जाती है।

पूजन के समय मंत्र का उच्चारण किया जाता है -

असृक्पाभयसंत्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः
अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव।

इस पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञ पर्व भी कहा जाता है। खेत से नवीन अन्न को यज्ञ में हवन कर प्रदान करने की परंपरा भी है। उस अन्न को होला कहते हैं। इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। होलिकोत्सव मनाने के संबंध में अनेक मत प्रचलित हैं। यहां कुछ प्रमुख मतों का उल्लेख किया गया है : -

ऐसी मान्यता है कि इस पर्व का संबंध काम दहन से है। भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्रि से कामदेव को भस्म कर दिया था। तभी से इस त्योहार का प्रचलन हुआ।

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा पर्यंत आठ दिन होलाष्टक मनाया जाता है। भारत के कई प्रदेशों में होलाष्टक शुरू होने पर पेड़ की शाखा को जमीन में गाड़ दिया जाता है। सभी लोग इसके नीचे होलिकोत्सव मनाते हैं।

यह त्योहार हिरण्यकशिपु की बहन की स्मृति में भी मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि हिरण्यकशिपु की बहन होलिका वरदान के प्रभाव से नित्य प्रति अग्नि स्नान करती और जलती नहीं थी। हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन से प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि स्नान करने को कहा। उसने समझा था कि ऐसा करने से प्रह्लाद जल जाएगा तथा होलिका बच निकलेगी। हिरण्यकशिपु की बहन ने ऐसा ही किया। होलिका तो जल गई पर प्रह्लाद जीवित बच गए। तभी से इस त्योहार के मनाने की प्रथा चल पड़ी।

इस दिन आम्रमंजरी तथा चंदन को मिलाकर खाने का बड़ा माहात्म्य है। कहते हैं जो लोग फाल्गुन पूर्णिमा के दिन एकाग्र चित्त से हिंडोले में झूलते हुए श्री गोविंद पुरुषोत्तम के दर्शन करते हैं, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक में वास करते हैं।

भविष्यपुराण में कहा गया है कि एक बार नारदजी ने महाराज युधिष्ठिर से कहा- राजन्‌! फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन सब लोगों को अभयदान देना चाहिए जिससे संपूर्ण प्रजा उल्लासपूर्वक हंसे। बालक गांव के बाहर से लकड़ी कंडे लाकर ढेर लगाएं। होलिका का पूर्ण सामग्री सहित विधिवत्‌ पूजन करें। होलिका दहन करें। ऐसा करने से सारे अनिष्ट दूर हो जाते हैं।

होली एक आनंदोल्लास का पर्व है। इसमें जहां एक ओर उत्साह उमंग की लहरें हैं, तो वहीं दूसरी ओर कुछ बुराइयां भी आ गई हैं। कुछ लोग इस अवसर पर गुलाल के स्थान पर कीचड़, गोबर, मिट्टी आदि भी फेंकते हैं। ऐसा करने से मित्रता के स्थान पर शत्रुता का जन्म होता है। अश्लील एवं गंदे हंसी मजाक के हृदय को चोट पहुंचाते हैं। अतः इन सबका त्याग करना चाहिए।

होली मित्रता एवं एकता का पर्व है। इस दिन द्वेष भाव भूलकर सबसे प्रेम और भाईचारे से मिलना चाहिए। एकता, सद्भावना का परिचय देना चाहिए। यही इस पर्व का मूल उद्देश्य एवं संदेश है।

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