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07 मार्च 2012

होलिकोत्सव....


एकता और सद्भावना का पर्व होली!
प्रेम और भाईचारे से मनाएं होली



होलाष्टक से धुलैंडी तक होली उत्सव का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। वस्तुतः यह पर्व सामाजिक एकता का सबसे बड़ा पर्व है जिसमें स्वामी-सेवक, छोटे-बड़े सभी प्रकार के भेदभाव समाप्त हो जाते हैं। साथ ही सारा समाज होली के रंग में रंग जाता है। होली में दिखनेवाली हंसी ठिठोली आपसी संवाद में निहित हैं।

बसंत पचंमी के आते ही प्रकृति में एक नवीन परिवर्तन आने लगता है। दिन छोटे होते हैं। जाड़ा कम होने लगता है। उधर पतझड़ शुरू हो जाता है। आम्रमंजरियों पर भ्रमरावलियां मंडराने लगती हैं। प्रकृति में एक नई मादकता का अनुभव होने लगता है। इस प्रकार होली पर्व के आते ही एक नवीन रौनक, नवीन उत्साह एवं उमंग की लहर दिखाई देने लगती है।

होली जहां एक ओर सामाजिक एवं धार्मिक त्योहार है वहीं यह रंगों का त्योहार भी है। वृद्ध, नर-नारी सभी इसे बड़े उत्साह से मनाते हैं। यह एक देशव्यापी त्योहार भी है। इसमें जाति भेद को कोई स्थान नहीं है। इस अवसर पर लकड़ियों तथा कंड़ों आदि का ढेर लगाकर होलिका पूजन किया जाता है फिर उसमें आग लगाई जाती है।

पूजन के समय मंत्र का उच्चारण किया जाता है -

असृक्पाभयसंत्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः
अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव।

इस पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञ पर्व भी कहा जाता है। खेत से नवीन अन्न को यज्ञ में हवन कर प्रदान करने की परंपरा भी है। उस अन्न को होला कहते हैं। इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। होलिकोत्सव मनाने के संबंध में अनेक मत प्रचलित हैं। यहां कुछ प्रमुख मतों का उल्लेख किया गया है : -

ऐसी मान्यता है कि इस पर्व का संबंध काम दहन से है। भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्रि से कामदेव को भस्म कर दिया था। तभी से इस त्योहार का प्रचलन हुआ।

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा पर्यंत आठ दिन होलाष्टक मनाया जाता है। भारत के कई प्रदेशों में होलाष्टक शुरू होने पर पेड़ की शाखा को जमीन में गाड़ दिया जाता है। सभी लोग इसके नीचे होलिकोत्सव मनाते हैं।

यह त्योहार हिरण्यकशिपु की बहन की स्मृति में भी मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि हिरण्यकशिपु की बहन होलिका वरदान के प्रभाव से नित्य प्रति अग्नि स्नान करती और जलती नहीं थी। हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन से प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि स्नान करने को कहा। उसने समझा था कि ऐसा करने से प्रह्लाद जल जाएगा तथा होलिका बच निकलेगी। हिरण्यकशिपु की बहन ने ऐसा ही किया। होलिका तो जल गई पर प्रह्लाद जीवित बच गए। तभी से इस त्योहार के मनाने की प्रथा चल पड़ी।

इस दिन आम्रमंजरी तथा चंदन को मिलाकर खाने का बड़ा माहात्म्य है। कहते हैं जो लोग फाल्गुन पूर्णिमा के दिन एकाग्र चित्त से हिंडोले में झूलते हुए श्री गोविंद पुरुषोत्तम के दर्शन करते हैं, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक में वास करते हैं।

भविष्यपुराण में कहा गया है कि एक बार नारदजी ने महाराज युधिष्ठिर से कहा- राजन्‌! फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन सब लोगों को अभयदान देना चाहिए जिससे संपूर्ण प्रजा उल्लासपूर्वक हंसे। बालक गांव के बाहर से लकड़ी कंडे लाकर ढेर लगाएं। होलिका का पूर्ण सामग्री सहित विधिवत्‌ पूजन करें। होलिका दहन करें। ऐसा करने से सारे अनिष्ट दूर हो जाते हैं।

होली एक आनंदोल्लास का पर्व है। इसमें जहां एक ओर उत्साह उमंग की लहरें हैं, तो वहीं दूसरी ओर कुछ बुराइयां भी आ गई हैं। कुछ लोग इस अवसर पर गुलाल के स्थान पर कीचड़, गोबर, मिट्टी आदि भी फेंकते हैं। ऐसा करने से मित्रता के स्थान पर शत्रुता का जन्म होता है। अश्लील एवं गंदे हंसी मजाक के हृदय को चोट पहुंचाते हैं। अतः इन सबका त्याग करना चाहिए।

होली मित्रता एवं एकता का पर्व है। इस दिन द्वेष भाव भूलकर सबसे प्रेम और भाईचारे से मिलना चाहिए। एकता, सद्भावना का परिचय देना चाहिए। यही इस पर्व का मूल उद्देश्य एवं संदेश है।

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