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18 अप्रैल 2012

शक्तिपीठ






 

कहाँ-कहाँ स्थित है 51 शक्तिपीठ


दक्ष यज्ञ के विध्वंस के बाद विष्णु के चक्र से सती का अङ्गप्रत्यङ्ग जहाँ-जहाँ गिरा था, वे सब स्थान देवीपीठ के नाम से विख्यात हुए। इन सब स्थानों की पवित्रता के सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा है- सत्युग में एक समय दक्षप्रजापति ने शिवजी से अपमानित हो बृहस्पति नामक एक यज्ञ का आरम्भ किया। प्रजापति दक्ष ने उस यज्ञ में शिवजी और अपनी कन्या सती को छोड़कर सभी देवी-देवताओं को निमन्त्रण दिया। सती ने निमन्त्रण नहीं पाने पर भी यज्ञ देखना चाहा और शिवजी के निकट अपना अभिप्राय प्रकट किया। शिवजी पहले तो राजी न हुए, पर सती के विशेष आग्रह पर उन्हें जाने की अनुमति दे दी। सती अनुचरों के साथ यज्ञस्थल पर पहुँची तो दक्ष ने किसी प्रकार उनका आदर न किया। इतना ही नहीं, वे क्रोध से अधीर हो शिवजी की निन्दा करने लगे। सती को पिता के मुख से पति की इस प्रकार निन्दा सुनना असह्य हुआ। सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर का त्याग कर दिया। शिवजी ने अपने दूत वीरभद्र को अनुचरों के साथ यज्ञस्थल पर भेजा। वीरभद्र ने सब देवताओं को परास्त कर दक्ष को मार डाला और यज्ञ विध्वंस कर दिया। शिवजी सती की मृत देह को कन्धे पर रख चारों ओर नाचते हुए घूमने लगे। यह देखकर भगवान् विष्णु ने अपने चक्र से सती का अङ्ग-प्रत्यङ्ग काट डाला। अङ्ग-प्रत्यङ्ग इक्यावन खण्डों में विभक्त हो जिस-जिस स्थान पर गिरे थे, वहाँ एक-एक भैरव और एक-एक शक्ति नाना प्रकार की मूर्ति धारण कर अवस्थान करती हैं, उन्हीं सब स्थानों का नाम महापीठ पड़ा है। किस-किस स्थान पर कौन-कौन अङ्ग गिरा था तथा कौन-कौन भैरव और शक्ति वहां रहती हैं, तन्त्रचूड़ामणि में इस विषय में जो कुछ लिखा है, उसकी तालिका नीचे दी गयी है।

स्थान अङ्ग तथा अङ्ग भूषण शक्ति-भैरव

1. हिङ्गुला- ब्रह्मरन्ध्र -कोट्टषीशा- भीमलोचन

2. शर्करार- तीन चक्ष- महिषमर्दिनी-क्रोधीश

3. सुगन्धा- नासिका- सुनन्दा- व्यम्बक

4. काश्मीर- कण्ठदेश- महामाया- त्रिसन्ध्येश्वर

5. ज्वालामुखी- महाजिह्वा- सिद्धिदा- उन्मत्त भैरव

6. जलन्धर- स्तन- त्रिपुरमालिनी- भीषण

7. वैद्यनाथ- हृदय- जयदुर्गा- वैद्यनाथ

8. नेपाल- जानु- महामाया- कपाली

9. मानस- दक्षिणहस्त- दाक्षायणी- अमर

10. उत्कल में विरजाक्षेत्र- नाभिदेश- विमला- जगन्नाथ

11. गण्डकी- गण्डस्थल- गण्डकी- चक्रपाणि

12. बहुला- वाम बाहु- बहुलादेवी- भीकू

13. उज्जयिनी- कूर्पर- मङ्गलचण्डिका- कपिलाम्बर

14. त्रिपुरा- दक्षिणपाद- त्रिपुरसुन्दरी- त्रिपुरेश

15. चहल- दक्षिणबाहु- भवानी- चन्द्रशेखर

16. त्रिस्त्रोता- वामपाद- भ्रामरी- भैरवेश्वर

17. कामगिरि- योनिदेश- कामाख्या- उमानन्द

18. प्रयाग- हस्ताङ्गुलि-ललिता- भव

19. जयन्ती- वाम जङ्घा- जयन्ती- क्रमदीश्वर

20. युगाद्या- दक्षिणाङ्गुष्ठ- भूतधात्री- क्षीरखण्डक

21. कालीपीठ- दक्षिणपादाङ्गुलि- कालिका- नकुलीश

22. किरीट- किरीट- विमला- संव‌र्त्त

23. वाराणसी- कर्णकुण्डल- विशालाक्षी मणिकर्णी- कालभैरव

24. कन्याश्रम- पृष्ठ- सर्वाणी- निमिष

25. कुरुक्षेत्र- गुल्फ- सावित्री- स्थाणु

26. मणिबन्ध- दो मणिबन्ध- गायत्री- सर्वानन्द

27. श्रीशैल- ग्रीवा- महालक्ष्मी- शम्बरानन्द

28. काशी- अस्थि- देवगर्भा- रुरु

29. कालमाधव- नितम्ब- काली- असिताङ्ग

30. शोणदेश- नितम्बक- नर्मदा- भद्रसेन

31. रामगिरि- अन्य स्तन- शिवानी- चण्डभैरव

32. वृन्दावन- केशपाश- उमा- भूतेश

33. शुचि- ऊ‌र्ध्वदन्त- नारायणी- संहार

34. सागर- अघोदन्त- बाराही- महारुद्र

35. करतोयातट- तल्प- अर्पणा- वामनभैरव

36. श्रीपर्वत- दक्षिण गुल्फ- श्रीसुन्दरी- सुन्दरानन्दभैरव

37. विभाष- वाम गुल्फ- कपालिनी- सर्वानन्द

38. प्रभास- उदर- चन्द्रभागा- वक्रतुण्ड

39. भैरवपर्वत- ऊ‌र्ध्व ओष्ठ- अवन्ती- लम्बकर्ण

40. जनस्थल- दोनों चिबुक- भ्रामरी- विकृताक्ष

41. सर्वशैल- वाम गण्ड- राकिनी- वत्सनाभ

42. गोदावरीतीर- गण्ड- विश्वेशी- दण्डपाणि

43. रत्‍‌नावली- दक्षिण स्कन्ध- कुमारी- शिव

44. मिथिला- वाभ स्कन्ध- उमा- महोदर

45. नलहाटी- नला- कालिकादेवी- योगेश

46. कर्णाट- कर्ण- जयदुर्गा- अभीरु

47. वक्रेश्वर- मन:- महिषमर्दिनी- वक्रनाथ

48. यशोर- पाणिपद्म- यशोरेश्वरी- चण्ड

49. अट्टहास- ओष्ठ- फुल्लरा- विश्वेश

50. नन्दिपुर- कण्टहार- नन्दिनी- नन्दिकेश्वर

51. लङ्का- नूपुर- इन्द्राक्षी- राक्षसेश्वर

विराट पादाङ्गुलि अम्बिका अमृत
मगध दक्षिणजङ्घा सर्वानन्दकरी व्योमकेश

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