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आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

17 अप्रैल 2012

ISKCON : MAYAPUR DHAM

इस्कॉन : मायापुर धाम

ISKCON TEMPLE  (SWAMI ABHAY CHARAN DE / SWAMI PRABHUPADA SAMADHI)

ISKCON RADHA MADHAB TEMPLE  (MAYAPUR

 

SHRI CHAITANYA MAHAPRBHU  (ISKCON TEMPLE MAYAPUR

 नवद्वीप, मायापुर, कृष्णनगर, इस्कान मन्दिर और शांतिपुर नदिया के प्रमुख पर्यटक स्थल

मैंने भी अब तक यहाँ की 10-12 बार यात्रायें की है. जगह ही ऐसी ही की एक बार आने के बाद बार-बार आने को दिल करता है.. यहाँ भक्तों के दिलों में खास जगह बन जाता है। यहां भगवन कृष्ण और उनकी प्रेमिका राधा की अराधना की जाती है। यहाँ न कोई जात न कोई धर्म । सभी लोग सिर्फ एक ही मन्नत लेकर आते हैं भगवान श्री कृष्ण के दर्शन। भक्त दरबार में हाजिरी देकर भगवान् कृष्ण को नींद से उठाते हैं। नींद से उठाकर भगवान् कृष्ण के कपड़ों के साथ गहने तक बदले जाते हैं। सुबह आरती के बाद भगवान को भोग लगाया जाता है। मायापुर धाम कोलकाता से 164 किमी दूर है। मायापुर धाम करीब 1000 एकड़ ज़मीन पर फैला है। ठीक वैदिक समाज के अनुसार मायापुर की पवित्र धाम में गुरुकुल बनाया गया है। और छात्रों के जीवन को कई हिस्सों में बाँट दिया जाता है। सबसे मज़े की बात यह है की इस धाम में खाने पीने की कोई भी चीज़ बाहर से नहीं आती है। बल्कि सब कुछ यहीं पर उगाया जाता है। दाल,चावल, गेंहू . सब कुछ जो खाने में इस्तेमाल किया जाता है सभी की पैदावार सेवक अपने हाथों से करते हैं। इस्कोन का यह ख़ूबसूरत मंदिर इस्कॉन इंटरनेशनल का मुख्यालय है। और इसी के मद्देनज़र इस मंदिर की सुरक्षा के भी ज़बरदस्त इंतज़ाम किये हुए हैं। प्रति दिन यहाँ 200 से 300 मजदूर बहार से आते हैं काम करने के लिए और शाम होते ही चले जाते हैं...जनसंपर्क अधिकारी श्री गौरांग दास जी महाराज द्वारा प्राप्त जानकारी और अपना अनुभव यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ... 

पश्चिम बंगाल के नदिया जिला में गंगा नदी के किनारे, उसके जलांगी नदी से संगम के बिंदु पर बसा हुआ एक छोटा सा शहर है। यह नवद्वीप के निकट है। यह कोलकाता से 130 कि.मी. उत्तर में स्थित है। यह हिन्दू धर्मके गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के लिए अति पावन स्थल है। यहां उनके प्रवर्तक श्री चैतन्य महाप्रभु का जन्म हुआ था। इन्हें श्री कृष्ण एवं श्री राधा का अवतार माना जाता है। यहां लाखों श्रद्धालु तीर्थयात्री प्रत्येक वर्ष दशनों हेतु आते हैं। यहां इस्कॉन समाज का बनवाया एक मंदिर भी है। इसे इस्कॉन मंदिर, मायापुर कहते हैं।

मायापुर अपने शानदार मन्दिरों के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है। इन मन्दिरों में भगवान श्री कृष्ण को समर्पित इस्कान मन्दिर प्रमुख है। मन्दिरों के अलावा पर्यटक यहां पर सारस्वत अद्वैत मठ और चैतन्य गौडिया मठ की यात्रा भी कर सकते हैं। होली के दिनों मे मायापुर की छटा देखने लायक होती है क्योंकि उस समय यहां पर भव्य रथयात्रा आयोजित की जाती है। यह रथयात्रा आपसी सौहार्द और भाईचारे का प्रतीक मानी जाती है।

नदिया भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल का एक प्रशासकीय जिला है। इसका मुख्यालय कृष्णानगर में है। नदिया में पर्यटक अनेक पर्यटक स्थलों की सैर कर सकते हैं। नवद्वीप, मायापुर, कृष्णनगर, इस्कान मन्दिर और शांतिपुर नदिया के प्रमुख पर्यटक स्थल हैं, जिनके लिए यह पूरे विश्व में लोकप्रिय है। पर्यटक स्थलों से अलग नदिया श्री चैतन्य महाप्रभु के जन्म स्थान के रूप में भी जाना जाता है। महाप्रभु का जन्म स्थान होने के कारण यहां पर पर्यटकों के साथ-साथ श्रद्धालु भी बड़ी संख्या में आते हैं। नदिया के प्लासी में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के सेनापति लार्ड क्लाइव के बीच भयंकर युद्ध लड़ा गया था। इस कारण यह स्‍थान ऐतिहासिक रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण है। भारत के इतिहास में इस युद्ध का बहुत महत्व हैं क्योंकि इस युद्ध के बाद भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थितियां पूरी तरह से बदल गई थी।
लेखक राजेश मिश्रा लोटस भवन के समक्ष   (RAJESH MISHRA )
क्‍या देखें - 
इस्कान मन्दिर - मायापुर अपने शानदार मन्दिरों के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है। इन मन्दिरों में भगवान श्री कृष्ण को समर्पित इस्कान मन्दिर प्रमुख है। मन्दिरों के अलावा पर्यटक यहां पर सारस्वत अद्वैत मठ और चैतन्य गौडिया मठ की यात्रा भी कर सकते हैं। होली के दिनों मे मायापुर की छटा देखने लायक होती है क्योंकि उस समय यहां पर भव्य रथयात्रा आयोजित की जाती है। यह रथयात्रा आपसी सौहार्द और भाईचारे का प्रतीक मानी जाती है। यहाँ राधा माधव मंदिर के अलावा स्वामी प्रभुपदा का समाधी मंदिर, भगवान् नरसिम्हा का मंदिर, चैतन्य महाप्रभु का मंदिर एवं जन्मस्थली, गौशाला, परिसर से बाहर निकलने पर पास ही गंगा नदी का नज़ारा देखने को मिलेगा. हाँ सुबह 4 .00  बजे की आरती का आनंद लेना न भूलें. यहाँ आनेवाले लोगों को खाने के रूप में प्रसाद मिलता है जिसका कूपन पाले कटा लेनी पड़ती है। परिसर से पता कर लें यहाँ दो तरह का खाना यानि प्रसाद का व्यवस्था है..। परिसर के अन्दर चाय, नशीले पदार्थ, मांसाहारी आदि पर पूर्ण रूप से पाबन्दी है..। पूरा दिन  परिदर्शन करके निकल जाएँ तो ठीक यह अन्यथा रुकने की इच्छा हो तो पहले से घर बुक करा सकते है... परिसर के अन्दर घर भाडा लेना ठीक रहता है अन्यथा सुबह आरती का आनंद नहीं मिलता.. एक बात और आरती के पश्चात  भजनों पर थिरकने का आनद से हमें जरुर अवगत कराएँ... 
यहाँ के प्रमुख त्यौहार..
गौरपूर्णिमा (चैतन्य महाप्रभु जन्मोत्सव, रासलीला उत्सव, नाटक मंचन, भगवद प्रवचन कई भाषाओँ में), नवद्वीप मंडल परिक्रमा, बसंत पंचमी, चन्दन उत्सव, गोपाष्टमी, रथमेला, गोवर्धन पूजा, रासपूर्णिमा, कृष्ण जन्मास्टमी, दीपदान उत्सव, नरसिम्हा चतुर्दशी, रामनवमी के अलावा....

Festivals

Srila Prabhupada wanted several Vaishnava festivals to be celebrated at Sri Mayapur Chandrodaya Mandir, this being ISKCON’s world headquarters and the most sacred birthplace of the Supreme Personality of Godhead, Lord Sri Krishna Chaitanya Mahaprabhu. Here is a list of some of the more prominent festivals celebrated throughout the year.
Gaura Purnima festival, 
Sri Rama Navami, 
Candana Yatra & Akshaya Tritiya, 
Sri Nrisimha Caturdasi,
Pandava Nirjala Ekadasi
Panihati Chida-dahi utsava
Sri Jagannatha Snana Yatra
Gundicha Marjana
Sri Jagannatha Ratha Yatra
Sri Sri Radha Madhava Jhulana Yatra
Sri Balarama Purnima
Sri Krishna Janmastami
Srila Prabhupada’s Vyasa Puja
Sri Radhashtami
Sri Vamana Dvadasi
Srila Bhaktivinoda Thakura’s appearance
Sri Ramacandra Vijayotsava
Kartika / Damodara month
Dipavali
Govardhana Puja
Gopastami and Go-Puja
Srila Gaurakisora’s disappearance
Bhisma Pancaka
Odana Sasti
Gita Jayanti (advent of Bhagavad Gita)
Srila Bhaktisiddhanta Sarasvati Thakura’s disappearance
Ganga Sagara Mela
Vasanta Panchami
Sri Advaita Acharya’s appearance
Sri Varaha Dvadasi
Sri Nityananda Trayodasi


आसपास  के पर्यटन स्थल..


नवद्वीप- श्री चैतन्य महाप्रभु की मातृभूति नवद्वीप भगीरथी नदी के पश्चिमी किनारे पर स्थित है। पर्यटक कृष्णनगर से आसानी से नवद्वीप तक पहुंच सकते हैं, क्योंकि यह कृष्ण्नगर से मात्र 20 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। पहले नवद्वीप पर सेन वंश का शासन था। उन्होंने यहां पर अनेक मन्दिरों का निर्माण कराया था। इन मन्दिरों में द्ववादास सहिब मन्दिर प्रमुख हैं। इस खूबसूरत मन्दिर का निर्माण 1835 ई. में किया गया था। मन्दिर की दीवारों को फूलों के चित्रों से सजाया गया है जो इसकी सुन्दरता को कई गुणा बढ़ा देते हैं। इस मन्दिर में चैतन्य महाप्रभु के सुन्दर चित्रों और प्रतिमाओं के दर्शन भी किए जा सकते हैं।
शांतिपुर- शांतिपुर में पर्यटक तोपखाना मस्जिद के खूबसूरत दृश्य देख सकते हैं। इसका निर्माण फौजदार गाजी मोहम्मद यार खान ने मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में 1703-1704 ई. में कराया था। इस मस्जिद में एक बड़ा गुम्बद और आठ मिनारें हैं जो पर्यटकों को बहुत पसंद आते हैं। पर्यटक इन मिनारों और गुम्बद की तस्वीरें अपने कैमरों में कैद करके ले जाते हैं। नदिया का शांतिपुर 9वीं शताब्दी से संस्कृत, साहित्य और वैदिक शिक्षा का बड़ा केन्द्र भी रहा है। उस समय यहां पर अनेक मन्दिरों का निर्माण किया गया था। इन सभी मन्दिरों का निर्माण विभिन्न शैलियों में बड़ी खूबसूरती के साथ किया गया था। शांतिपुर के मन्दिरों में श्याम चन्द मन्दिर, जलेश्वर और अद्वैत प्रभु मन्दिर प्रमुख हैं। अपने शानदार मन्दिर-मस्जिदों के साथ-साथ यह अपनी बुनाई कला के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां पर भारत की बेहतरीन साड़ियों में से तांत साड़ी तैयार की जाती है।
प्लासी - नदिया में पर्यटक प्लासी की सैर कर सकते हैं। प्लासी में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच भयंकर युद्ध लड़ा गया था। इस युद्ध में अंग्रेजों की विजय हुई थी। युद्ध के बाद लार्ड कर्जन ने यहां पर अंग्रेजों की जीत का स्मारक भी बनवाया था। इस स्मारक को पर्यटक आज भी यहां पर देख सकते हैं।
शिवनिवास - शिवनिवास कृष्णगंज में स्थित है। पहले यहां पर राजा कृष्ण चन्द्र राय का शासन था। उन्होंने यहां पर 1754 ई. में भगवान शिव को समर्पित राज राजेश्‍वर मन्दिर का निर्माण कराया था। कहा जाता है कि इस मन्दिर में जो शिवलिंग हैं वह पूरे एशिया में सबसे बड़ा है। राज राजेश्‍वर मन्दिर के पास 1762 ई. में संयुक्त रूप से दो मन्दिरों का निर्माण किया गया था। इन दोनों मन्दिरों के नाम रागनीश्वर मन्दिर और राम-सीता मन्दिर हैं। स्थानीय निवासी इनको बूरो-सहिब के नाम से पुकारते हैं। इन मन्दिरों में पर्यटक गोथिक निर्माण कला की छाप देख सकते हैं।
कैसे पहुंचें 
वायु मार्ग - दिल्ली, मम्बई समेत देश के प्रमुख भागों से कोलकाता के लिए नियमित वायुसेवा है। कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस हवाई अड्डा से पर्यटक बसों व टैक्सियों द्वारा आसानी से नदिया तक पहुंच सकते हैं।
रेल मार्ग - नदिया पहुंचने के लिए रेल मार्ग काफी अच्छा विकल्प है। पर्यटकों की सुविधा के लिए यहां पर रेलवे स्टेशन का निर्माण भी किया गया है।
सड़क मार्ग - कोलकाता से नदिया तक सड़कमार्ग की दूरी मात्र 100 कि.मी. है। बसों और टैक्सियों द्वारा पर्यटक कोलकाता से नदिया तक आसानी से पहुंच सकते हैं।

चैतन्य महाप्रभु




चैतन्य महाप्रभु (19 फरवरी, 1486-1534) वैष्णव धर्म के भक्ति योग के परम प्रचारक एवं भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। इन्होंने वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखी, भजन गायकी की एक नयी शैली को जन्म दिया तथा राजनैतिक अस्थिरता के दिनों में हिंदू-मुस्लिम एकता की सद्भावना को बल दिया, जाति-पांत, ऊंच-नीच की भावना को दूर करने की शिक्षा दी तथा विलुप्त वृंदावन को फिर से बसाया और अपने जीवन का अंतिम भाग वहीं व्यतीत किया। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए महामंत्र नाम संकीर्तन का अत्यंत व्यापक व सकारात्मक प्रभाव आज पश्चिमी जगत तक में है। यह भी कहा जाता है कि यदि गौरांग ना होते तो वृंदावन आज तक एक मिथक ही होता। वैष्णव लोग तो इन्हें श्रीकृष्ण का राधा रानी के संयोग का अवतार मानते हैं। गौरांग के ऊपर बहुत से ग्रंथ लिखे गए हैं, जिनमें से प्रमुख है श्री कृष्णदास कविराज गोस्वामी विरचित चैतन्य चरितामृत। इसके अलावा श्री वृंदावन दास ठाकुर रचित चैतन्य भागवत तथा लोचनदास ठाकुर का चैतन्य मंगल भी हैं।
जन्म तथा प्रारंभिक जीवन
चैतन्य चरितामृत के अनुसार चैतन्य महाप्रभु का जन्म सन 1486 की फाल्गुन शुक्ला पूर्णिमा को पश्चिम बंगाल के नवद्वीप (नादिया) नामक गांव में हुआ, जिसे अब मायापुर कहा जाता है। इनका जन्म संध्याकाल में सिंह लग्न में चंद्र ग्रहण के समय हुआ था। उस समय बहुत से लोग शुद्धि की कामना से हरिनाम जपते हुए गंगा स्नान को जा रहे थे। तब विद्वान ब्राह्मणों ने उनकी जन्मकुण्डली के ग्रहों और उस समय उपस्थित शगुन का फलादेश करते हुए यह भविष्यवाणी की, कि यह बालक जीवन पर्यन्त हरिनाम का प्रचार करेगा। यद्यपि बाल्यावस्था में इनका नाम विश्वंभर था, परंतु सभी इन्हें निमाई कहकर पुकारते थे क्योंकि कहते हैं कि ये नीम के पेड़ के नीचे मिले थे। गौरवर्ण का होने के कारण लोग इन्हें गौरांग, गौर हरि, गौर सुंदर आदि भी कहते थे।
इनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र व मां का नाम शचि देवी था। निमाई बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा संपन्न थे। साथ ही, अत्यंत सरल, सुंदर व भावुक भी थे। इनके द्वारा की गई लीलाओं को देखकर हर कोई हतप्रभ हो जाता था। बहुत कम आयु में ही निमाई न्याय व व्याकरण में पारंगत हो गए थे। इन्होंने कुछ समय तक नादिया में स्कूल स्थापित करके अध्यापन कार्य भी किया। निमाई बाल्यावस्था से ही भगवद्चिंतन में लीन रहकर राम व कृष्ण का स्तुति गान करने लगे थे। 15-16 वर्ष की अवस्था में इनका विवाह लक्ष्मीप्रिया के साथ हुआ। सन 1505 में सर्प दंश से पत्नी की मृत्यु हो गई। वंश चलाने की विवशता के कारण इनका दूसरा विवाह नवद्वीप के राजपंडित सनातन की पुत्री विष्णुप्रिया के साथ हुआ। जब ये किशोरावस्था में थे, तभी इनके पिता का निधन हो गया।
धार्मिक दीक्षा
सन 1509 में जब ये अपने पिता का श्राद्ध करने गया गए, तब वहां इनकी भेंट ईश्वरपुरी नामक संत से हुई। उन्होंने निमाई से कृष्ण-कृष्ण रटने को कहा। तभी से इनका सारा जीवन बदल गया और ये हर समय भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन रहने लगे। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति इनकी अनन्य निष्ठा व विश्वास के कारण इनके असंख्य अनुयायी हो गए। सर्वप्रथम नित्यानंद प्रभु व अद्वैताचार्य महाराज इनके शिष्य बने। इन दोनों ने निमाई के भक्ति आंदोलन को तीव्र गति प्रदान की। इन्होंने अपने इन दोनों शिष्यों के सहयोग से ढोलक, मृदंग, झाँझ,मंजीरे आदि वाद्य यंत्र बजाकर व उच्च स्वर में नाच-गाकर हरि नाम संकीर्तन करना प्रारंभ किया।

हरे-कृष्ण, हरे-कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण, हरे-हरे।
हरे-राम, हरे-राम, राम-राम, हरे-हरे॥

गौरांग की मायापुर में एक मंदिर में स्थित प्रतिमा

यह अठारह शब्दीय (32 अक्षरीय) कीर्तन महामंत्र निमाई की ही देन है। इसे तारकब्रह्ममहामंत्र कहा गया, व कलियुग में जीवात्माओं के उद्धार हेतु प्रचारित किया गया था। जब ये कीर्तन करते थे, तो लगता था मानो ईश्वर का आह्वान कर रहे हैं। सन 1510 में संत प्रवर श्री पाद केशव भारती से संन्यास की दीक्षा लेने के बाद निमाई का नाम कृष्ण चैतन्य देव हो गया। मात्र 24 वर्ष की आयु में ही इन्होंने गृहस्थ आश्रम का त्याग कर सन्यास ग्रहण किया। बाद में ये चैतन्य महाप्रभु के नाम से प्रख्यात हुए। सन्यास लेने के बाद जब गौरांग पहली बार जगन्नाथ मंदिर पहुंचे, तब भगवान की मूर्ति देखकर ये इतने भाव-विभोर हो गए, कि उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे, व मूर्छित हो गए। संयोग से तब वहां उपस्थित प्रकाण्ड पण्डित सार्वभौम भट्टाचार्यमहाप्रभु की प्रेम-भक्ति से प्रभावित होकर उन्हें अपने घर ले गए। घर पर शास्त्र-चर्चा आरंभ हुई, जिसमें सार्वभौम अपने पाण्डित्य का प्रदर्शन करने लगे, तब श्रीगौरांग ने भक्ति का महत्त्व ज्ञान से कहीं ऊपर सिद्ध किया व उन्हें अपने षड्भुजरूपका दर्शन कराया। सार्वभौम तभी से गौरांग महाप्रभु के शिष्य हो गए और वह अन्त समय तक उनके साथ रहे। पंडित सार्वभौम भट्टाचार्य ने गौरांक की शत-श्लोकी स्तुति रची जिसे आज चैतन्य शतक नाम से जाना जाता है। उड़ीसा के सूर्यवंशी सम्राट, गजपति महाराज प्रताप रुद्रदेव ने इन्हें श्रीकृष्ण का अवतार माना, और इनका अनन्य भक्त बन गया।
चैतन्य महाप्रभु संन्यास लेने के बाद नीलांचल चले गए। इसके बाद दक्षिण भारत के श्रीरंग क्षेत्र व सेतु बंध आदि स्थानों पर भी रहे। इन्होंने देश के कोने-कोने में जाकर हरिनाम की महत्ता का प्रचार किया। सन 1514 में विजयादशमी के दिन वृंदावन के लिए प्रस्थान किया। ये वन के रास्ते ही वृंदावन को चले। कहते हैं कि इनके हरिनाम उच्चारण से उन्मत्त हो कर जंगल के जानवर भी इनके साथ नाचने लगते थे। बड़े बड़े जंगली जानवर जैसे शेर, बाघ और हाथी आदि भी इनके आगे नतमस्तक हो प्रेमभाव से नृत्य करते चलते थे। कार्तिक पूर्णिमा को ये वृंदावन पहुंचे। वृंदावन में आज भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन गौरांग का आगमनोत्सव मनाया जाता है। यहां इन्होंने इमली तला और अक्रूर घाट पर निवास किया। वृंदावन में रहकर इन्होंने प्राचीन श्रीधाम वृंदावन की महत्ता प्रतिपादित कर लोगों की सुप्त भक्ति भावना को जागृत किया। यहां से फिर ये प्रयाग चले गए। इन्होंने काशी, हरिद्वार, शृंगेरी (कर्नाटक), कामकोटि पीठ (तमिलनाडु), द्वारिका, मथुरा आदि स्थानों पर रहकर भगवद्नाम संकीर्तन का प्रचार-प्रसार किया। चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष जगन्नाथ पुरी में रहकर बिताएं। यहीं पर सन 1533 में 47 वर्ष की अल्पायु में रथयात्रा के दिन उन्होंने श्रीकृष्ण के परम धाम को प्रस्थान किया।

कोई भी दिक्कत होने पर हमें याद करें.... राजेश मिश्रा (मो. 9831057985 )

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