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आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

31 मई 2012

महापुण्यकारी पर्व है गंगा दशहरा

मोक्षदायिनी गंगा


पुराणों के अनुसार गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। इस दिन स्वर्ग से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था, इसलिए यह महापुण्यकारी पर्व माना जाता है। गंगा दशहरा के दिन सभी गंगा मंदिरों में भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। वहीं इस दिन मोक्षदायिनी गंगा का पूजन-अर्चना भी किया जाता है। 

क्या हैं दान-पुण्य का महत्व :-

गंगा दशहरा के दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है। इस दिन लोग पूजा-अर्चना करने के साथ ही दान-पुण्य करते हैं। कई लोग तो स्नान करने के लिए हरिद्वार जैसे पवित्र नदी में स्नान करने जाते हैं। इस दिन दान में सत्तू, मटका और हाथ का पंखा दान करने से दुगुना फल प्राप्त होता है।

गंगा दशहरा के दिन किसी भी नदी में स्नान करके दान और तर्पण करने से मनुष्य जाने-अनजाने में किए गए कम से कम दस पापों से मुक्त होता है। इन दस पापों के हरण होने से ही इस तिथि का नाम गंगा दशहरा पड़ा है।

क्यों और कैसे करें गंगा दशहरा व्रत :

* गंगा दशहरा का व्रत भगवान विष्णु को खुश करने के लिए किया जाता है।

* इस दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है।

* इस दिन लोग व्रत करके पानी भी (जल का त्याग करके) छोड़कर इस व्रत को करते हैं।

* ग्यारस (एकादशी) की कथा सुनते हैं और अगले दिन लोग दान-पुण्य करते हैं।

* इस दिन जल का घट दान करके फिर जल पीकर अपना व्रत पूर्ण करते हैं।

* इस दिन दान में केला, नारियल, अनार, सुपारी, खरबूजा, आम, जल भरी सुराई, हाथ का पंखा आदि चीजें भक्त दान करते हैं।

गंगा दशहरा व्रतकथा

एक बार महाराज सगर ने बव्यापक यज्ञ किया। उस यज्ञ की रक्षा का भार उनके पौत्र अंशुमान ने संभाला। इंद्र ने सगर के यज्ञीय अश्व का अपहरण कर लिया। यह यज्ञ के लिए विघ्न था। परिणामतः अंशुमान ने सगर की साठ हजार प्रजा लेकर अश्व को खोजना शुरू कर दिया। सारा भूमंडल खोज लिया पर अश्व नहीं मिला।

फिर अश्व को पाताल लोक में खोजने के लिए पृथ्वी को खोदा गया। खुदाई पर उन्होंने देखा कि साक्षात्‌ भगवान 'महर्षि कपिल' के रूप में तपस्या कर रहे हैं। उन्हीं के पास महाराज सगर का अश्व घास चर रहा है। प्रजा उन्हें देखकर 'चोर-चोर' चिल्लाने लगी।

महर्षि कपिल की समाधि टूट गई। ज्यों ही महर्षि ने अपने आग्नेय नेत्र खोले, त्यों ही सारी प्रजा भस्म हो गई। इन मृत लोगों के उद्धार के लिए ही महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ ने कठोर तप किया था।

भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उनसे वर माँगने को कहा तो भगीरथ ने 'गंगा' की माँग की। इस पर ब्रह्मा ने कहा- 'राजन! तुम गंगा का पृथ्वी पर अवतरण तो चाहते हो? परंतु क्या तुमने पृथ्वी से पूछा है कि वह गंगा के भार तथा वेग को संभाल पाएगी? मेरा विचार है कि गंगा के वेग को संभालने की शक्ति केवल भगवान शंकर में है। इसलिए उचित यह होगा कि गंगा का भार एवं वेग संभालने के लिए भगवान शिव का अनुग्रह प्राप्त कर लिया जाए।'

महाराज भगीरथ ने वैसे ही किया। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने गंगा की धारा को अपने कमंडल से छो। तब भगवान शिव ने गंगा की धारा को अपनी जटाओं में समेटकर जटाएँ बाँध लीं। इसका परिणाम यह हुआ कि गंगा को जटाओं से बाहर निकलने का पथ नहीं मिल सका।

अब महाराज भगीरथ को और भी अधिक चिंता हुई। उन्होंने एक बार फिर भगवान शिव की आराधना में घोर तप शुरू किया। तब कहीं भगवान शिव ने गंगा की धारा को मुक्त करने का वरदान दिया। इस प्रकार शिवजी की जटाओं से छूटकर गंगाजी हिमालय की घाटियों में कल-कल निनाद करके मैदान की ओर मुड़ी।

इस प्रकार भगीरथ पृथ्वी पर गंगा का वरण करके बभाग्यशाली हुए। उन्होंने जनमानस को अपने पुण्य से उपकृत कर दिया। युगों-युगों तक बहने वाली गंगा की धारा महाराज भगीरथ की कष्टमयी साधना की गाथा कहती है। गंगा प्राणीमात्र को जीवनदान ही नहीं देती, मुक्ति भी देती है। इसी कारण भारत तथा विदेशों तक में गंगा की महिमा गाई जाती है।

Rajesh Mishra, Sujit Kumar and Subhranshu Ganga Pujan



30 मई 2012

गुरू पूर्णिमा / GURU PURNIMA

गुरुब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:। 
गुरु: साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

वेद व्यास 

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरू पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरंभ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरुचरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे।

शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता   है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

भारत भर में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था। आज भी इसका महत्व कम नहीं हुआ है। पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में, संगीत और कला के विद्यार्थियों में आज भी यह दिन गुरू को सम्मानित करने का होता है। मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेले लगते हैं।

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर हर धर्मावलंबी अपने गुरु के प्रति श्रद्धा और आस्था प्रगट करता है। जीवन में सफलता के लिए हर व्यक्ति गुरु के रुप में श्रेष्ठ मार्गदर्शक, सलाहकार, समर्थक और गुणी व्यक्ति के संग की चाहत रखता है। इसलिए वह गुरु के रुप में किसी संत, अध्यात्मिक व्यक्तित्व या किसी कार्य विशेष में दक्ष और गुणी व्यक्ति को चुनना चाहता है।

किंतु इस धारणा के विपरीत पुराणों में आए प्रसंग यह संदेश देते है कि अगर मन में लगन हो, इच्छा शक्ति हो, कुछ जानने, सीखने का दृढ संकल्प हो तो कोई भी व्यक्ति गुरु को कहीं भी पा सकता है। क्योंकि गुरु की महिमा ही ऐसी है कि ईश्वर की तरह गुरु हर जगह मौजूद है। सिर्फ चाहत और दृष्टि चाहिए गुरु को पाने और देखने की।

जगद्गुरु दत्तात्रेय ऐसे ही शिष्य के रुप में भी प्रसिद्ध हैं। जिनके अनेक गुरु हुए। जबकि उन्होनें किसी से गुरु दीक्षा नहीं पाई थी। आखिर यह कैसे संभव हुआ। बात वही थी-ज्ञान पाने की ललक।

गुरु दत्तात्रेय ने समस्त जगत में मौजूद हर वनस्पति, प्राणियों, ग्रह-नक्षत्रों को अपना गुरु माना। जिनकी प्रकृति और गुणों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। इनकी संख्या २४ थी। इनमें प्रमुख रुप से पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, सूर्य, चंद्र, कबूतर, मधुमक्खी, हाथी, अजगर, पतंगा, हिरण, मछली, गरुड़, मकड़ी, बालक, वैश्या, कन्या, बाण प्रमुख थे। जिनसे उन्होंने कोई गुरु मंत्र और शिक्षा नहीं ली। मात्र इनकी गति, प्रकृति, गुणों को देखकर अपनी दृष्टि और विचार से शिक्षा पाई और आत्म ज्ञान पा लिया। इससे ही श्री दत्तात्रेय जगद्गुरु बन गए।

गुरु दत्तात्रेय ने जगत को बताया कि मात्र देहधारी कोई मनुष्य या देवता ही गुरु नहीं होता। बल्कि पूरे जगत की हर रचना में गुरु मौजूद है। यहां तक कि स्वयं के अंदर भी। जिनको देखना और जानना बहुत जरुरी है।

09 मई 2012

रथयात्रा – मोक्ष की ओर प्रयाण

रथयात्रा का दृश्य : राजेश मिश्रा


थयात्रा का शाब्दिक अर्थ है- रथ में बैठकर घूमने निकलना। समग्र भारत में यह उत्सव खूब उत्साह और उमंग से मनाया जाता है। भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण अथवा जगन्नाथ और श्रीराम की प्रतिमा को रथ में रखा जाता है। इस रथ को बहुत ही भक्तिभावपूर्वक श्रद्धालु खींचते हैं, और उसे लक्ष्मीजी, राधिकाजी अथवा सीताजी के मंदिर ले जाया जाता है। अंत में वह जगन्नाथ पुरी के गुंडिया मंदिर में ले जाया जाता है। जहाँ भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभाद्रा की काष्ठ की प्रतिमाएँ बनाई जाती हैं।

रथयात्रा असाढ़ सुद द्वितीया के दिन शुरू होती है और आठ दिनों तक चलती है। यह भारत के चार बड़े धामों में से एक है। इस जगन्नाथपुरी में यह उत्सव सबसे अधिक धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलराम और बहन सुभाद्रा के साथ तीन अलग-अलग रथों पर पुरी के मार्गों पर नगरयात्रा करने निकलते हैं। इस अवसर पर पूरे विश्व से एकत्र हुए हजारों यात्रियों द्वारा इस रथ को खींचा जाता है।

पुरी के इस उत्सव की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसे सभी जातियों के लोग रथ खींचने का अधिकार रखते हैं। पूजा और अन्य धार्मिक विधियाँ संपन्न होने के बाद सबेरे यह रथ धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। पुरी के राजा गजपति सोने के झाड़ू से मार्ग साफ करते हैं। रथ को विविध रंगों के कपड़ों से सजाया जाता है और उनके अलग-अलग नाम रखे जाते हैं। भगवान जगन्नाथ के रथ का ‘नंदिघोष’, बलराम के रथ का ‘तालध्वज’ तथा सुभाद्राजी के रथ का ‘दर्पदलन’ नाम रखा जाता है। नंदिघोष का रंग लाल और पीला, तालध्वज का रंग लाल और हरा तथा दर्पदलन का रंग लाल और नीला रखा जाता है। पुरी में देवी सुभाद्रा की पूजा होने पर भी उन्हें हिंदू पुराणों में देवी नहीं कहा गया है। मात्र महाभारत में सुभाद्रा भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की प्रिय बहन होने का उल्लेख किया गया है।
जगन्नाथ_बलभद्र_सुभद्रा

पुरी की ये तीनों प्रतिमाएँ भारत के सभी देवी – देवताओं की तरह नहीं होतीं। वे आदिवासी मुखाकृति के साथ अधिक साम्यता रखती हैं। पुरी का मुख्य मंदिर बारहवीं सदी में राजा अनंतवर्मन के शासनकाल के दौरान बनाया गया है। उसके बाद जगन्नाथजी के 120 मंदिर बनाए गए हैं। रथयात्रा शुरू होने से पहले सभी रथों को उचित ढंग से आयोजित किया जाता है। सर्व प्रथम बड़े भाई बलराम का 44 फुट ऊँचा रथ, उसके बाद देवी सुभाद्रा का 43 फुट ऊँचा रथ और अंत में 45 फुट ऊँचा श्री जगन्नाथजी का रथ सुबह से नगरयात्रा पर निकलकर पूरे दिन शहर के मार्गों पर घूमता रहता है और गडिया मंदिर की तरफ धीमी गति से आगे बढ़ता रहता है। और शाम को मंदिर में रथ का आगमन होता है।

ये तीनों आठ दिनों तक आराम करते हैं और नौवें दिन सुबह पूजा विधि करने के बाद वे वापस मंदिर में आते हैं। रथयात्रा के पहले दिन सभी रथों को मुख मार्ग की तरफ उचित क्रम में संयोजित किया जाता है। रथ वापस लौटने की यात्रा को उड़िया भाषा में ‘बहुदा यात्रा’ कहा जाता है, जो सुबह शुरू होकर जगन्नाथ मंदिर के सामने पूरी होती है। श्रीकृष्ण, बलराम और सुभाद्रा तीनों को उनके रथ में स्थापित किया जाता है और एकादशी तक उनकी पूजा की जाती है। उसके बाद पुनः उन्हें अपने-अपने स्थान पर मंदिर में बिराजमान किया जाता है।

पुरी के जगन्नाथ मंदिर की एक विशेषता यह है कि मंदिर के बाहर स्थित रसोई में 25000 भक्त प्रसाद ग्रहण करते हैं। भगवान को नित्य पकाए हुए भोजन का भोग लगाया जाता है। परंतु रथयात्रा के दिन एक लाख चौदह हजार लोग रसोई कार्यक्रम में तथा अन्य व्यवस्था में लगे होते हैं। जबकि 6000 पुजारी पूजाविधि में कार्यरत होते हैं। उड़ीसा में दस दिनों तक चलनेवाले एक राष्ट्रीय उत्सव में भाग लेने के लिए दुनिया के कोने-कोने से लोग उत्साहपूर्वक उमड़ पड़ते हैं। एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि रसोई में ब्राह्मण एक ही थाली में अन्य जाति के लोगों के साथ भोजन करते हैं, यहाँ जात-पाँत का कोई भेदभाव नहीं रखा जाता। श्रीक्षेत्र पुरी में कोई जातिवाद नहीं है। सभी भगवान जगन्नाथ की संतानें हैं और उनकी नजर में सभी एक समान हैं।

प्रतिवर्ष तीनों रथ लकड़ी से बनाए जाते हैं, जिसमें लोहे का बिलकुल उपयोग नहीं किया जाता। बसंत पंचमी के दिन लकड़ी एकत्र की जाती है और तीज के दिन रथ बनाना शुरू होता है। रथ यात्रा के थोड़े दिन पहले ही उसका निर्माण कार्य पूरा होता है।

जगन्नाथ मंदिर कला और शिल्प स्थापत्य का अद्वितीय नमूना है। 214 फुट ऊँचा यह मंदिर भुनेश्वर के शिव मंदिर या लिंगराज मंदिर जैसा लगता है।

यहाँ एक बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि प्रतिवर्ष नया रथ बनता है, परंतु भगवान की प्रतिमाएँ वही रहती हैं। परंतु 8 से 19 वर्ष में असाढ़ अधिक मास आने पर तीनों मूर्तियाँ नई बनाई जाती हैं। इस प्रसंग को ‘नवकलेवर’ अर्थात् ‘नया शरीर’ कहा जाता है। तब पुरानी प्रतिमाओं को मंदिर के अंदर स्थित कोयली वैकुंठ नामक स्थान में जमीन में गाड़ दी जाती है।

इस वर्ष रथयात्रा 21 जून 2012 को शुरू होगी और 29 जून 2012 को संपन्न होगी। इस समयावधि को शुभ कार्यों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

Vat Savitri Vrat


वट सावित्री व्रत एवं पर्यावरण


वट सावित्री व्रत केवल एक व्रत ही नहीं है बल्कि यह भारतीय संस्कृति परंपरा का वह अहम हिस्सा है जो हमें पर्यावरण से जोड़े रखती है। यह व्रत हमें सन्देश देती है कि अगर पेड़-पौधे नहीं रहे तो पृथ्वी पर जीवन नहीं बचेगा और जब जीवन ही नहीं बचेगा तो फिर हम कैसे सौभाग्यवती बनेंगे । पेड़ पौधे ही हैं जो प्रकृति से जहरीले कार्बन डॉइ ऑक्साइड को सोख कर जीवनदायी ऑक्सीजन हमें देते हैं । इस व्रत का भी यही उद्देश्य है कि व्रत के बहाने ही सही, वृक्षों को बचाएं ताकि आने वाली पीढ़ी को एक बेहतर व स्‍वच्‍छ जीवन दे सकें । 

व्रत की कहानी

प्राचीन काल की बात है। मद्र देश में अश्वपति नाम के राजा हुआ करते थे। वह बड़े ही सत्यवादी और धर्मात्मा थे। उन्हें जीवन में सभी प्रकार का सुख हासिल था बस एक ही बात का दु:ख था कि उनको कोई सन्तान नहीं थी। इस बात को लेकर वह काफी चिन्तित भी रहा करते थे। किसी ने उन्हें सन्तान प्राप्ति के व्रत के बारे में बताया तो उन्होंने 18 वर्षों तक सावित्री देवी की कठोर तपस्या की। सावित्री देवी इस तप से प्रसन्न होकर प्रकट हुईं और राजा को कन्या प्राप्ति का वर दिया। जिससे राजा की पत्नी ने एक सुन्दर सी कन्या को जन्म दिया जिसका सावित्री नाम रखा गया। वह कन्या अत्यन्त ही सुन्दर थी। जब सावित्री बड़ी हो गई तो उसके लिए योग्य वर की खोज की जाने लगी। सावित्री ने सत्यवान नामक युवा को चुना । जन्‍म कुंडली के हिसाब से सत्‍यवान की आयु मात्रा एक वर्ष शेष बची थी। परन्तुसावित्री ने न केवल सत्‍यवान से शादी कि बल्कि अपने पतिव्रता दम पर यमराज से सदा सुहागन रहने का आशीर्वाद लेकर सत्यवान के प्राण वापस लिए। इस दिन वट वृक्ष की पूजा इसलिए होती है कि सत्यवान ने अपने प्राण इसी वृक्ष के नीचे त्यागे थे और जब प्राण वापस मिले तो इसी वृक्ष के नीचे वह थे। इसलिए इस दिन वट वृक्ष पूजन की अपनी अलग महत्ता है।

गीता में भी दी गई है पेड़ो की महत्ता


भारतीय संस्कृति में शुरू से ही वृक्षों की महत्ता बताई गई है अगर हम खुली हवा में खुलकर श्वास ले पाते हैं तो इसमें भी वृक्षों की अहम भूमिका है तभी तो प्राचीन काल में ऋषि-मुनि तपस्या और चिन्तन-मनन के लिए वनों में ही बास करते थे। देखा जाए तो मनुष्य का जीवन और उसका ज्ञान-विज्ञान वनों में ही विकसित हुआ है। भारतीय संस्कृति और धर्म-कर्म के सन्दर्भ में गौर करने वाली बात यह है कि वैदिक काल में भी भारतीय मनीषी प्रकृति के उपासक थे। वे वनस्पतियों को अपने धर्मिक अनुष्ठानों में विशेष महत्व देते थे। वनस्पति व वृक्षों में रुद्र के विस्तृत स्वरूप को देखते हुए वैदिक ऋषि कहते थे `नमो वृक्षेभ्यों हरिकेशेभ्यो नम:।´ गीता में भी श्रीकृष्ण वृक्षों की महिमा बताते हैं।

वट वृक्ष में है त्रिदेव का वास



अब बात करते हैं वट वृक्ष की, जिसके मूल में भगवान ब्रह्मा, मध्य में भगवान विष्णु और अग्रभाग मे शिव वास करते है। देवी सावित्रीभी वट वृक्ष में ही प्रतिष्ठित रहती हैं। यह भी मान्यता है कि बड़ का पेड़ हमारे सब गुप्त भेदों को जानता है। इसी अक्षय वट पर प्रलय के अन्तिम चरण में भगवान श्रीकृष्ण ने बालरूप में मार्कण्डेय ऋषि को प्रथम दर्शन दिए थे। प्रयागराज में गंगा के तट पर वेणीमाध्व के निकट अक्षय वट प्रतिष्ठित है। भक्त शिरोमणि तुलसीदास ने संगल स्थित अक्षय वट को तीर्थराज का छत्रा कहा है। 

कृतज्ञता ज्ञापित करने का माध्‍यम

पांच वटों से युक्त स्थान को पंचवटी कहा गया है। धर्मिक मान्यता के अनुसार कुम जमुनि के परामर्श से भगवान श्रीराम ने सीता एवं लक्ष्मण के साथ वनवास काल में यहां निवास किया था। अगर इसी चीज को वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो हानिकारक गैसों को नष्ट कर वातावरण को शुद्ध करने में वट वृक्ष का विशेष महत्व है। जैसे वट वृक्ष दीर्घ काल तक अक्षय बना रहता है, उसी प्रकार दीर्घ आयु, अक्षय सौभाग्य तथा निरन्तर अभ्युदय की प्राप्ति के लिए वट वृक्ष की आराधना की जाती है। वास्तव में वट सावित्री का व्रत और पूजन वृक्ष देव और प्रकृति को हमारी कृतज्ञता ज्ञापित करने का माध्यम है।

घर-परिवार में सुख-समृद्धि लाने वाले वृक्ष

आवासीय परिसर के समीप बिल्व, अनार, नागकेसर, कटहल और नारियल के वृक्ष हमेशा शुभफलकारी होते हैं। इसी प्रकार जंभीरी, आम, केला, निर्गुडी, जौ, अशोक, सिरसा और चमेली आदि सुगंधित वृक्ष घर समीप शुभ होते हैं। जिन भवनों के पश्चिम में कमल के फूलों सहित जल हो, उतर में खाई हो, पूर्व में फलवाले वृक्ष हो और दक्षिण में दूध वाले वृक्ष हों। जिस मन्दिर के मध्य में बिल्वपत्रा, आम, अनार के वृक्ष हों, वहां दोष नहीं रहता है। 
जम्बीर, पुष्प के वृक्ष पलाश, अनार, चमेली, शतपत्रा, केसर, नारियल, पुष्प् और कनेर से परिपूर्ण घर सुख और ऐश्वर्य प्रदान करता है। ऐसी मान्यता भी है कि जिस घर में हरी-भरी मनीप्लांट की बेल होती है, वहां पैसे की कमी नहीं रहती है।

08 मई 2012

Trichur Pooram Festival

 त्रिचूर पूरम के मेले की भव्यता


Trichur Pooram Festival

अपनी गरिमा, भव्यता और शानो शौकत के लिए त्रिचूर का मेला न केवल केरल में बल्कि समूचे दक्षिण भारत में प्रसिद्ध है। केरल में कहा जाता है कि जिसने त्रिचूर पूरम नहीं देखा उसने कुछ नहीं देखा। त्रिचूर पूरम का अर्थ है त्रिचूर महोत्सव।
Trichur Pooram Festival

Trichur Pooram Festival

इस मेले की तैयारियां महीनों पहले शुरू हो जाती हैं। मेले से जुड़े लोग हाथियों के प्रशिक्षण, छातों की मरम्मत, आभूषणों की सफाई और आतिशबाजी के निर्माण में इस कदर व्यस्त हो जाते हैं कि किसी को खाने-पीने और सोने की सुध नहीं रहती। मेले के दिनों में अपेक्षाकृत सूनसान, शांत और गतिहीन त्रिचूर नगर भीड़भाड़, कोलाहल और आनंद-उल्लास से जीवंत हो उठता है। 

त्रिचूर नगर का नाम इस नगर के आराध्य देव भगवान शिव के नाम पर है। त्रिचूर के पास एक हजार फुट ऊंचे पर्वत शिखर पर भगवान शिव का विशाल मंदिर है। भगवान शिव के इस मंदिर को श्री शिव पेरूर कहा जाता था। कालांतर में जनता की टकसाल में श्री शिव पेरूर तिरू शिव पेरूर और फिर त्रिसूर और अंततः अंग्रेजी भाषा के प्रभाव में त्रिचूर हो गया। 

पूरम का शाब्दिक अर्थ होता है उत्सव। यह उत्सव कैसे शुरू हुआ यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। इसके जन्म का इतिहास पौराणिक किवदंतियों और मिथकों से दबा पड़ा है। अधिकांश लोगों का मत है कि यह उत्सव पहले अराट्टपूड़ा पूरम के रूप में शुरू हुआ। एक वर्ष भारी वर्षा के कारण शोभा यात्रा त्रिचूर से अराट्टपूरड़ा नहीं जा सकी। अतः महोत्सव का आयोजन त्रिचूर में ही किया गया और तब से यह वहीं किया जा रहा है। 

त्रिचूर पूरम के अवसर पर नगर के विभिन्न मंदिरों से देवी-देवताओं की चित्ताकर्षक शोभा यात्राएं निकाली जाती हैं। आकर्षक साज-सज्जा में देवताओं की सवारी लिए विभिन्न रंगों से सजे हाथियों के समूह नयनाभिराम दृश्य प्रस्तुत करते हैं। प्रत्येक हाथी में कोलम अथवा प्रतीक चिन्ह होता है। उस पर हाथी के स्वामी और मंदिर का चित्र बना होता है। प्रमुख पुजारी के पीछे दो अन्य लोग बैठे होते हैं। उनके हाथों में परम्परागत आलवट्टम और वेंजामरम होते हैं। ये हाथी नगर के बीच में होकर धीरे-धीरे पारमेक्वावु मंदिर या तिरुवम्बाड़ी मंदिर की ओर बढ़ते हैं। त्रिचूर का मेला इन दो मंदिरों के हाथियों के बीच प्रतियोगिता के लिए भी प्रसिद्ध है। 

सूर्योदय के साथ त्रिचूर का समस्त नगर जीवंत हो उठता है। विभिन्न मंदिरों में पूरम से जुड़े विभिन्न विधि-विधान, अनुष्ठान और पूजा-अर्चना की जाती है। फिर मंदिर से नयनाभिराम वस्त्रों, आभूषणों और रंगों से सजे हाथी मंद-मंद गति से निकलते हैं और वड़क्कुनाथम मंदिर की ओर बढ़ते हैं। 

दोपहर को मड़तले वरवे का आयोजन किया जाता है। तिरुवम्बाड़ी मंदिर से तीन हाथी मंदिर मडम जाते हैं जहां पूरम में इस्तेमाल के लिए शुद्ध सोने के वस्त्राभूषण रखे जाते हैं। वड्क्कुनाथन मंदिर के मार्ग पर हाथी प्रत्येक घर के दरवाजे पर रुकते हैं। प्रत्येक घर की मालकिन हाथी के सामने एक परा लगभग 10 किलोग्राम धान और दीवट रखती है। हाथी कुछ धान लेकर परिवार की सुख-समृद्धि का आर्शीवाद देता है। इसे ‘परा एडुक्कल कहते हैं। वड़क्कुनाथन मंदिर के मैदान में एकत्र होने से पहले सभी हाथी इलंजी वृक्ष पर जाकर देवी को फूल चढ़ाते हैं। यही इलंजी तारा मेलम है जो नगाड़ों के नाद से वातावरण को धीर-गंभीर बना देता है। 

आतिश बाज़ी  का नज़ारा 

आतिशबाजी का मनमोहक नज़ारा
सांयकाल पांच बजे वडक्कुनाथन को अपने श्रद्धासुमन अर्पित करने के बाद हाथी मंदिर के दक्षिणी दरवाजे से बाहर निकलते हैं। इसे इरक्कम कहते हैं। इसके बाद आंखों को चौंधियां देने वाले चमकते-दमकते वस्त्राभूषणों से सज्जित और विभिन्न रंगों से चित्रित तीस हाथी मैदान में एक दूसरे के सामने, प्रत्येक ओर 15-15 खड़े होकर अपना स्थान ग्रहण कर लेते हैं। सूर्य की किरणों से हाथियों पर सजी जरी की झूल झिलमिलाने लगती है।

रात के अंतिम प्रहर में लगभग तीन बजे आतिशबाजी शुरू होती है। इसकी तैयारी काफी समय और श्रम लगाकर की जाती है। आतिशबाजी लगभग तीन घंटे चलती है। इस दौरान आकाश प्रकाशमान हो उठता है। आतिशबाजी की समाप्ति के साथ ढोल वादक पांडि मेडम की ध्वनि निकालते हैं जो महावतों और हाथियों के लिए अपने-अपने मंदिरों को जाने का संकेत होता है। इसी के साथ इस भव्य और मनमोहक समारोह की समाप्ति हो जाती है।


Thrissur Pooram Festival, Kerala

थ्रिसुर पूरम की धूम  मची है केरल  में

Thrissur Pooram Festival, Kerala
थ्रिसुर। केरल में थ्रिसुर पूरम की हर वर्ष  की भांति इस  वर्ष  भी धूम धाम से मनाई जा रही है । महोत्सव में  सजे-धजे हाथी शहर भर में अपनी कौशल दीखा रहे हैं। इस दौरान आतिशबाजी का नज़ारा सबको मोहित कर रहा है। 
मलयालम कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक वर्ष मेडम के महीने में (मध्य अप्रैल से मध्य मई) पूरम मनाया जाता है। थ्रिसुर के तत्कालीन महाराज सक्थन थम्पूरम ने 18वीं सदी में इस उत्सव का प्रारम्भ किया था। पारम्परिक रीति रिवाजों के अनुसार पूरम के दिन मंगलवार को करीब 50 सुसज्जिात हाथी रंगबिरंगी छतरियों 'कुडमत्तम' के साथ थ्रिसुर शहर के मध्य से गुजरते है।

करीब 36 घंटे तक चलने वाले इस उत्सव मेंअगले दिन तड़के आतिशबाजी होती है जिसे देखने के लिए राज्य भर से लोग आते है। इस उत्सव में तिरुवम्बादी के वदाकुन्नाथन मंदिर एवं कृष्णा मंदिर और परामेक्कावु का देवी मंदिर भाग लेते है।

Thrissur Pooram Festival, Kerala

Thrissur Pooram Festival, Kerala

Thrissur Pooram Festival, Kerala
उत्सव के आयोजक ने कहा, ''इस वर्ष हम ध्वनि प्रदूषण घटाने के लिए रिमोट संचालित पटाखों का इस्तेमाल करेगे। हमारा ध्यान पटाखों के रंगारंग प्रदर्शन पर है।'' थ्रिसुर पूरम अपने धर्मनिरपेक्ष चरित्र के लिए भी प्रसिद्ध है। इस उत्सव में सभी धर्मो के लोग उत्साह से भाग लेते है।

04 मई 2012

Vastu Shastra Tips


वर्तमान समय में सुविधा जुटाना आसान है। परंतु शांति इतनी सहजता से नहीं प्राप्त होती। हमारे घर में सभी सुख-सुविधा का सामान है, परंतु शांति पाने के लिए हम तरस जाते हैं। वास्तु शास्त्र द्वारा घर में कुछ मामूली बदलाव कर आप घर एवं बाहर शांति का अनुभव कर सकते हैं।

- घर में कोई रोगी हो तो एक कटोरी में केसर घोलकर उसके कमरे में रखे दें। वह जल्दी स्वस्थ हो जाएगा।
- घर में ऐसी व्यवस्था करें कि वातावरण सुगंधित रहे। सुगंधित वातावरण से मन प्रसन्न रहता है।
- घर में जाले न लगने दें, इससे मानसिक तनाव कम होता है।
- दिन में एक बार चांदी के ग्लास का पानी पिये। इससे क्रोध पर नियंत्रण होता है।
- अपने घर में चटकीले रंग नहीं कराये।
- किचन का पत्थर काला नहीं रखें।
- कंटीले पौधे घर में नहीं लगाएं।
- भोजन रसोईघर में बैठकर ही करें।
- शयन कक्ष में मदिरापान नहीं करें। अन्यथा रोगी होने तथा डरावने सपनों का भय होता है।
इन छोटे-छोटे उपायों से आप शांति का अनुभव करेंगे।

कौन सी वस्तु कहां रखें:
- सोते समय सिर दक्षिण में पैर उत्तर दिशा में रखें। या सिर पश्चिम में पैर पूर्व दिशा में रखना चाहिए।
- अलमारी या तिजोरी को कभी भी दक्षिणमुखी नहीं रखें।
- पूजा घर ईशान कोण में रखें।
- रसोई घर मेन स्वीच, इलेक्ट्रीक बोर्ड, टीवी इन सब को आग्नेय कोण में रखें।
- रसोई के स्टेंड का पत्थर काला नहीं रखें। दक्षिणमुखी होकर रसोई नहीं पकाए।
- शौचालय सदा नैर्ऋत्य कोण में रखने का प्रयास करें।
- फर्श या दिवारों का रंग पूर्ण सफेद नहीं रखें।
- फर्श काला नहीं रखें।
- मुख्य द्वार की दांयी और शाम को रोजाना एक दीपक लगाएं।

घर का बाहरी रंग कैसा हो-
- घर के आगे की दिवारों के रंग से भी वास्तु दोष दूर किया जा सकता है।
यदि आपका घर
- पूर्वमुखी हो तो फ्रंट में लाल, मेहरून रंग करें।
- पश्चिममुखी हो तो लाल, नारंगी, सिंदूरी रंग करें।
- उत्तरामुखी हो तो पीला, नारंगी करें।
- दक्षिणमुखी हो तो गहरा नीला रंग करें।
- किचन में लाल रंग।बेडरूम में हल्का नीला, आसमानी।
- ड्राइंग रूम में क्रीम कलर।
- पूजा घर में नारंगी रंग।
- शौचालय में गहरा नीला।
- फर्श पूर्ण सफेद न हो क्रीम रंग का होना चाहिए।

कमरो का निर्माण कैसा हो?
कमरों का निर्माण में नाप महत्वपूर्ण होते हैं। उनमें आमने-सामने की दिवारें बिल्कुल एक नाप की हो, उनमें विषमता न हो। कमरों का निर्माण भी सम ही करें। 20-10, 16-10, 10-10, 20-16 आदि विषमता में ना करें जैसे 19-16, 18-11 आदि।

बेडरूम में शयन की क्या स्थिति
बेडरूम में सोने की व्यवस्था कुछ इस तरह हो कि सिर दक्षिण मे एवं पांव उत्तर में हो।यदि यह संभव न हो तो सिराहना पश्चिम में और पैर पूर्व दिशा में हो तो बेहतर होता है। रोशनी व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि आंखों पर जोर न पड़े। बेड रूम के दरवाजे के पास पलंग स्थापित न करें। इससे कार्य में विफलता पैदा होती है। कम-कम से समान बेड रूम के भीतर रखे।

वास्तु शास्त्र और साज-सज्जा
घर की साज सज्जा बाहरी हो या अंदर की वह हमारी बुद्धि मन और शरीर को जरूर प्रभावित करती है। घर में यदि वस्तुएं वास्तु अनुसार सुसज्जित न हो तो वास्तु और ग्रह रश्मियों की विषमता के कारण घर में क्लेश, अशांति का जन्म होता है। घर के बाहर की साज-सज्जा बाहरी लोगों को एवं आंतरिक शृंगार हमारे अंत: करण को सौंदर्य प्रदान करता है। जिससे सुख-शांति, सौम्यता प्राप्त होती है।

भवन निर्माण के समय ध्यान रखें। भवन के अंदर के कमरों का ढलान उत्तर दिशा की तरफ न हो। ऐसा हो जाने से भवन स्वामी हमेशा ऋणी रहता है। ईशान कोण की तरफ नाली न रखें। इससे खर्च बढ़ता है।
शौचालय: शौचालय का निर्माण पूर्वोत्तर ईशान कोण में न करें। इससे सदा दरिद्रता बनी रहती है। शौचालय का निर्माण वायव्य दिशा में हो तो बेहतर होता है।

कमरों में ज्यादा छिद्रों का ना होना आपको स्वस्थ और शांतिपूर्वक रखेगा


कौन से रंग का हो स्टडी रूम?
रंग का भी अध्ययन कक्ष में बड़ा प्रभाव पड़ता है। आइए जानते हैं कौन-कौन से रंग आपके अध्ययन को बेहतर बनाते हैं। तथा कौन से रंग का स्टडी रूम में त्याग करना चाहिए।अध्ययन कक्ष में हल्का पीला रंग, हल्का लाल रंग, हल्का हरा रंग आपकी बुद्धि को ऊर्जा प्रदान करता है। तथा पढ़ी हुयी बाते याद रहती है। पढ़ते समय आलस्य नही आता, स्फुर्ती बनी रहती है। हरा और लाल रंग सर्वथा अध्ययन के लिए उपयोगी है। लाल रंग से मन भटकता नहीं हैं, तथा हरा रंग हमें सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है।नीले, काले, जामुनी जैसे रंगो का स्टडी रूम में त्याग करना चाहिए, यह रंग नकारात्मक उर्जा के कारक है। ऐसे कमरो में बैठकर कि गयी पढ़ाई निरर्थक हो जाती है।

सोनपुर मेला/ Sonepur Mela

विश्व का सबसे बड़ा पशु मेला


बिहार के छपरा जिले के सोनपुर में कार्तिक माह में एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है। सोनपुर में प्रसिद्ध ऐतिहासिक हरिहरनाथ जी का मन्दिर है। सोनपुर मेला बिहार के सोनपुर में हर साल कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर-दिसंबर) में लगता हैं। यह एशिया का सबसे बङा पशु मेला हैं। हमारे गाँव भेल्दी और पुरे छपरा जिले के लोग  इस मेले को हरिहरक्षेत्र मेला के नाम से पुकारते है। साथ ही इसे स्थानीय भाषा में ‘छत्तर मेला’ के नाम से पुकारते हैं।

भगवान् विष्णु मगरमच्छ से गज को बचाते हुए।. 
सोनपुर मेले का ज्यादा फोटो देखने के लिए निचे जाएँ...

बिहार की राजधानी पटना से लगभग 25 किमी तथा वैशाली जिले के मुख्यालय हाजीपुर से 3 किलोमीटर दूर सोनपुर में गंडक के तट पर लगने वाले इस मेले ने देश में पशु मेलों को एक अलग पहचान दी है। इस महीने यह मेला कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान के बाद शुरू होता है। एक समय इस पशु मेले में मध्य एशिया से कारोबारी आया करते थे। अब भी यह विश्व का सबसे बडा पशु मेला माना जाता है। मेलों से जुडे तमाम आयोजन तो यहां होते ही हैं। यहां हाथियों व घोडों की खरीद हमेशा से सुर्खियों में रहती है। पहले यह मेला हाजीपुर में होता था। सिर्फ हरिहर नाथ की पूजा सोनपुर में होती थी लेकिन बाद में मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश से मेला भी सोनपुर में ही लगने लगा।

हिंदू धर्म में कार्तिक महीने का पौराणिक रूप से विशेष महत्व है। यह कई मायनों में दूसरे महीनों से भिन्न है। इस पूरे महीने में विभिन्न धार्मिक आयोजन होते हैं। इसी महीने की कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर बिहार के वैशाली जिले के हाजीपुर में गंगा और गंडक नदियों के संगम तट पर विशाल मेला लगता है। इस पावन अवसर पर गंडक नदी के दूसरे तट पर विश्व प्रसिद्ध सोनपुर मेला लगता है। इस मेले में दूर-दूर से श्रद्धालु मेला देखने और पावन संगम में डुबकी लगाने आते हैं।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार सोनपुर की इस धरती ने कभी शक्ति पर भक्ति की विजय का संदेश दिया था। हम जब हाजीपुर रेलवे जंक्शन पर उतरते हैं तो स्टेशन के बाहर हमें ग्राह (मगरमच्छ) से गज (हाथी) को बचाते हुए भगवान विष्णु की प्रतिमायें दिखायी देती हैं। ऐसी मान्यता है कि एक बार विष्णु भक्त गज जब गंडक नदी में अपनी प्यास बुझाने गया, तो ग्राह ने उसका पैर अपने जबड़ों में भींच लिया और गज को पानी के अंदर खींचने लगा। इस संकट की घड़ी में गज ने अपने आराध्य विष्णुजी का स्मरण किया। गज की गुहार पर भगवान विष्णुजी आये और उन्होंने ग्राह को मारकर गज के प्राणों की रक्षा की। शक्ति पर भक्ति की इसी विजय के कारण इस स्थान विशेष का नाम `कौनहारा’ पड़ा। आज भी लाखों श्रद्धालु कार्तिक पूर्णिमा के दिन कौनहारा घाट पर गंडक नदी में स्नान करते हैं और ईश्वर की कृपा की कामना करते हैं। यह सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हो चूका है। यहाँ से कुछ ही दुरी पर स्थित मंदिर में भगवान विष्णु और शिव की एक साथ प्रतिमाएं स्थापित हैं। इसमें दोनों की पूजा एक साथ होती है। विष्णु (हरि) और शंकर (हर) के एकसाथ होने के कारण इस क्षेत्र को `हरिहर क्षेत्र’ भी कहा जाता है। विश्व में सोनपुर मेले के नाम से विख्यात यह मेला क्षेत्र में `छत्तर मेला’ के नाम से मशहूर है। सोनपुर मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है। इस मेले में उन्नत नस्लों की गाय-भैंस, हाथी-घोड़े, ऊंट और दूसरे जानवरों तथा पशु-पक्षियों का क्रय-विक्रय होता है। गंगा और गंडक के मिलाप स्थल पर लगनेवाले इस मेले का इतिहास राजा चंद्रगुप्त मौर्य के जमाने से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि चंद्रगुप्त मौर्य अपनी सेना के लिए हाथी और घोड़ों की खरीददारी इसी मेले से करते थे। हालांकि आज भी इस मेले में हाथी और घोड़े काफी संख्या में खरीदी-बिक्री के लिए लाये जाते हैं, लेकिन वन्य जीवों की खरीददारी पर क़ानूनी प्रतिबंध के कारण रफ्ता-रफ्ता इस मेले का आकर्षण कम होता जा रहा है। कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होकर एक माह तक चलनेवाले इस मेले में केंद्र और राज्य सरकार के विभिन्न विभागों की ओर से लगायी जानेवाली तरह-तरह की प्रदर्शनियां लोगों के आकर्षण का केंद्र होती हैं।

यहां लगे थियेटर के तंबुओं में शाम को लोकगीतों और फिल्मी गीतों पर जब बालाओं के कदम थिरकते हैं तो मेले में दिनभर घूमने से होनेवाली थकान काफूर हो जाती है। इस मेले में पशु-पशुओं के अलावा विभिन्न प्रदेशों की कला-संस्कृति से संबद्ध वस्तुओं की खरीदी-बिक्री भी की जाती है, साथ ही राज्य के विभिन्न विभागों की लोक संस्कृतियों की मनोहारी झांकियां भी पूरे महीनेभर प्रदर्शित की जाती हैं। भारी संख्या में विदेशी पर्यटक भी इस मेले का आनंद उठाते हैं। यह मेला धार्मिक एकता और सद्भाव की अनूठी मिसाल भी पेश करता है। मेले में बिना किसी भेदभाव के सभी जाति-धर्मों के लोग शरीक होते हैं। यही नहीं, मेले के दौरान प्रसिद्ध हरिहरनाथ मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचने में आम हिंदू भक्तों को भले ही मशक्कत करनी पड़े, लेकिन पेंटर शमीम मोहम्मद तथा उनके शार्गिदों के लिए यह सुलभ है। शमीम अहमद का परिवार 50 वर्षों से मंदिर के गर्भगृह में प्रतिस्थापित शिव-विष्णु की मूर्तियांे के रंग रोगन में लगा है। शमीम अहमद के हाथों साल में दो बार भादों और कार्तिक महीने में हरिहरनाथ मंदिर की मूर्तियों का रंगरोगन के बाद ही इनकी पूर्जा अर्चना शुरू की जाती है।


यहीं पर हाजीपुर और सोनपुर को जोड़नेवाला ऐतिहासिक दर्शनीय पुल है जिसे अंगरेजों ने 1817 में बनवाया था। इससे लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर विश्व का सबसे लंबा पुल `महात्मा गांधी सेतु’ है जो राजधानी पटना और हाजीपुर को जोड़ता है। इसकी लंबाई लगभग 12 किलोमीटर है। रात के समय सोनपुर मेले से इस पुल पर जलते बिजली के बल्बों की रोशनी में पुल ऐसा लगता है मानो गंगाजी के गले में मोतियों का हार चमक रहा हो। यह क्षेत्र मीठे केले की बेती के लिए मशहूर है। यहां के केले में जो स्वाद है वह अनयत्र कहीं नहीं मिलता। यह मौसम केले के लिए उपयुक्त माना जाता है। इस महीने में केले का स्वाद और मिठास बढ़ जाती है। इसलिए मेला देखेने आये लोग यहां के केले का स्वाद लेना नहीं भूलते।


























RAJESH MISHRA


राजेश मिश्रा द्वारा, भेल्दी, छपरा, बिहार

03 मई 2012

Kamakhya Peeth

कामाख्या पीठ




हिन्दू धर्म के पुराणों के अनुसार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषणगिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आया। ये अत्यंत पावन तीर्थ कहलाये। ये तीर्थ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर फैले हुए हैं। देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है। कामाख्या, 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ है। 
प्रस्तुत आलेख से कई फोटो  पाठकों, मातारानी के भक्तों, श्रद्धालुओं और आम जन के अनुरोध पर कई फोटो हटा दिए गए हैं। मुझे आशा है मेरे द्वारा दिए गए आलेख से आप सभी को मातारानी के बारे में सटीक जानकारी मिलेगी।  - राजेश मिश्रा। 


कामाख्या पीठ भारत का प्रसिद्ध शक्तिपीठ है, जो असम प्रदेश में है। कामाख्या देवी का मन्दिर पहाड़ी पर है, अनुमानत: एक मील ऊँची इस पहाड़ी को नील पर्वत भी कहते हैं। इस प्रदेश का प्रचलित नाम कामरूप है। प्राचीन काल से सतयुगीन तीर्थ कामाख्या वर्तमान में तंत्र-सिद्धि का सर्वोच्च स्थल है। पूर्वोत्तर के मुख्य द्वार कहे जाने वाले असम की नयी राजधानी दिसपुर से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नीलांचल पर्वतमालाओं पर स्थित माँ भगवती कामाख्या का सिद्ध शक्तिपीठ सती के इक्यावन शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है। यहाँ भगवती की महामुद्रा (योनि-कुंड) स्थित है। लोग माता के इस पिंडी को स्पर्श करते हैं, वे अमरत्व को प्राप्त करके ब्रह्मलोक में निवास कर मोक्ष-लाभ करते हैं। यहाँ भैरव उमानंद के रूप में प्रतिष्ठित हैं। तांत्रिकों की साधना के लिए विख्यात कामाख्या देवी के मंदिर में मनाया जाने वाला पर्व अम्बूवाची को कामरूप का कुम्भ माना जाता है। इस पर्व में माँ भगवती के रजस्वला होने के पहले गर्भगृह स्थित महामुद्रा पर श्वेत वस्त्र चढ़ाए जाते हैं, जो बाद में रक्तवर्ण हो जाते हैं। कामरूप देवी का यह रक्त-वस्त्र भक्तों में प्रसाद-स्वरूप बांट दिया जाता है।

इतिहासकहा जाता है कि माँ कामाख्या के इस भव्य मंदिर का निर्माण कोच वंश के राजा चिलाराय ने 1565 में करवाया था, लेकिन आक्रमणकारियों द्वारा इस मंदिर को क्षतिग्रस्त करने के बाद 1665 में कूच बिहार के राजा नर नारायण ने दोबारा इसका निर्माण करवाया है।

प्रधान पीठ कामाख्या शक्तिपीठ, गुवाहाटी तन्त्रों में लिखा है कि करतोया नदी से लेकर ब्रह्मपुत्र नदी तक त्रिकोणाकार कामरूप प्रदेश माना गया है। किन्तु अब वह रूपरेखा नहीं है। इस प्रदेश में सौभारपीठ, श्रीपीठ, रत्नपीठ, विष्णुपीठ, रुद्रपीठ तथा ब्रह्मपीठ आदि कई सिद्धपीठ हैं। इनमें कामाख्या पीठ सबसे प्रधान है। देवी का मन्दिर कूच बिहार के राजा विश्वसिंह और शिवसिंह का बनवाया हुआ है। इसके पहले के मन्दिर को बंगाली आक्रामक काला पहाड़ ने तोड़ डाला था। सन 1564 ई. तक प्राचीन मन्दिर का नाम 'आनन्दाख्या' था, जो वर्तमान मन्दिर से कुछ दूरी पर है। पास में छोटा-सा सरोवर है।

माहात्म्य वर्णनदेवीभागवत में कामाख्या देवी के महात्म्य का वर्णन है। इसका दर्शन, भजन, पाठ-पूजा करने से सर्व विघ्नों की शान्ति होती है। पहाड़ी से उतरने पर गुवाहाटी के सामने ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य में उमानन्द नामक छोटे चट्टानी टापू में शिव मन्दिर है। आनन्दमूर्ति को भैरव (कामाख्या रक्षक) कहते हैं। कामाख्या पीठ के सम्बन्ध में कालिकापुराण में निम्नांकित वर्णन पाया जाता है-शिव ने कहा, प्राणियों की सृष्टि के पश्चात् बहुत समय व्यतीत होने पर मैंने दक्षतनया सती को भार्यारूप में ग्रहण किया, जो स्त्रियों में श्रेष्ठ थी। वह मेरी अत्यन्त प्रेयसी भार्या हुई। अपने पिता द्वारा यज्ञ के अवसर पर मेरा अपमान देखकर उसने प्राण त्याग दिए। मैं मोह से व्याकुल हो उठा और सती के मृत शरीर को कन्धे पर उठाए समस्त चराचर जगत में भ्रमण करता रहा। इधर-उधर घूमते हुए इस श्रेष्ठ पीठ (तीर्थस्थल) को प्राप्त हुआ। पर्याय से जिन-जिन स्थानों पर सती के अंगों का पतन हुआ, योगनिद्रा (मेरी शक्ति=सती) के प्रभाव से वे पुण्यतम स्थल बन गए। इस कुब्जिकापीठ (कामाख्या) में सती के योनिमण्डल का पतन हुआ। यहाँ महामाया देवी विलीन हुई। मुझ पर्वत रूपी शिव में देवी के विलीन होने से इस पर्वत का नाम नीलवर्ण हुआ। यह महातुंग (ऊँचा) पर्वत पाताल के तल में प्रवेश कर गया।

शक्ति की पूजाइस तीर्थस्थल के मन्दिर में शक्ति की पूजा योनिरूप में होती है। यहाँ कोई देवीमूर्ति नहीं है। योनि के आकार का शिलाखण्ड है, जिसके ऊपर लाल रंग कीगेरू के घोल की धारा गिराई जाती है और वह रक्तवर्ण के वस्त्र से ढका रहता है। इस पीठ के सम्मुख पशुबलि भी होती है। ऐसी मान्यता है कि 'अंबुवासी मेले' के दौरान माँ कामाख्या रजस्वला होती हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सौर आषाढ़ माह के मृगशिरा नक्षत्र के तृतीय चरण बीत जाने पर चतुर्थ चरण में आद्रा पाद के मध्य में पृथ्वी ऋतुवती होती है। यह मान्यता है कि भगवान विष्णु के चक्र से खंड-खंड हुई सती की योनि नीलाचल पहाड़ पर गिरी थी। इक्यावन शक्तिपीठों में कामाख्या महापीठ को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसलिए कामाख्या मंदिर में माँ की योनि की पूजा होती है। यही वजह है कि कामाख्या मंदिर के गर्भगृह के फोटो लेने पर पाबंदी है इसलिए तीन दिनों तक मंदिर में प्रवेश करने की मनाही होती है। चौथे दिन मंदिर का पट खुलता है और विशेष पूजा के बाद भक्तों को दर्शन का मौका मिलता है।

Fair's list of India

भारत के मेलों की सूची

सौजन्य : मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया 

(विस्तार से पढने के लिए क्लीक करें)
संकलन : राजेश मिश्रा, कोलकाता, पश्चिम बंगाल  

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