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04 मई 2012

सोनपुर मेला/ Sonepur Mela

विश्व का सबसे बड़ा पशु मेला


बिहार के छपरा जिले के सोनपुर में कार्तिक माह में एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है। सोनपुर में प्रसिद्ध ऐतिहासिक हरिहरनाथ जी का मन्दिर है। सोनपुर मेला बिहार के सोनपुर में हर साल कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर-दिसंबर) में लगता हैं। यह एशिया का सबसे बङा पशु मेला हैं। हमारे गाँव भेल्दी और पुरे छपरा जिले के लोग  इस मेले को हरिहरक्षेत्र मेला के नाम से पुकारते है। साथ ही इसे स्थानीय भाषा में ‘छत्तर मेला’ के नाम से पुकारते हैं।

भगवान् विष्णु मगरमच्छ से गज को बचाते हुए।. 
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बिहार की राजधानी पटना से लगभग 25 किमी तथा वैशाली जिले के मुख्यालय हाजीपुर से 3 किलोमीटर दूर सोनपुर में गंडक के तट पर लगने वाले इस मेले ने देश में पशु मेलों को एक अलग पहचान दी है। इस महीने यह मेला कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान के बाद शुरू होता है। एक समय इस पशु मेले में मध्य एशिया से कारोबारी आया करते थे। अब भी यह विश्व का सबसे बडा पशु मेला माना जाता है। मेलों से जुडे तमाम आयोजन तो यहां होते ही हैं। यहां हाथियों व घोडों की खरीद हमेशा से सुर्खियों में रहती है। पहले यह मेला हाजीपुर में होता था। सिर्फ हरिहर नाथ की पूजा सोनपुर में होती थी लेकिन बाद में मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश से मेला भी सोनपुर में ही लगने लगा।

हिंदू धर्म में कार्तिक महीने का पौराणिक रूप से विशेष महत्व है। यह कई मायनों में दूसरे महीनों से भिन्न है। इस पूरे महीने में विभिन्न धार्मिक आयोजन होते हैं। इसी महीने की कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर बिहार के वैशाली जिले के हाजीपुर में गंगा और गंडक नदियों के संगम तट पर विशाल मेला लगता है। इस पावन अवसर पर गंडक नदी के दूसरे तट पर विश्व प्रसिद्ध सोनपुर मेला लगता है। इस मेले में दूर-दूर से श्रद्धालु मेला देखने और पावन संगम में डुबकी लगाने आते हैं।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार सोनपुर की इस धरती ने कभी शक्ति पर भक्ति की विजय का संदेश दिया था। हम जब हाजीपुर रेलवे जंक्शन पर उतरते हैं तो स्टेशन के बाहर हमें ग्राह (मगरमच्छ) से गज (हाथी) को बचाते हुए भगवान विष्णु की प्रतिमायें दिखायी देती हैं। ऐसी मान्यता है कि एक बार विष्णु भक्त गज जब गंडक नदी में अपनी प्यास बुझाने गया, तो ग्राह ने उसका पैर अपने जबड़ों में भींच लिया और गज को पानी के अंदर खींचने लगा। इस संकट की घड़ी में गज ने अपने आराध्य विष्णुजी का स्मरण किया। गज की गुहार पर भगवान विष्णुजी आये और उन्होंने ग्राह को मारकर गज के प्राणों की रक्षा की। शक्ति पर भक्ति की इसी विजय के कारण इस स्थान विशेष का नाम `कौनहारा’ पड़ा। आज भी लाखों श्रद्धालु कार्तिक पूर्णिमा के दिन कौनहारा घाट पर गंडक नदी में स्नान करते हैं और ईश्वर की कृपा की कामना करते हैं। यह सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हो चूका है। यहाँ से कुछ ही दुरी पर स्थित मंदिर में भगवान विष्णु और शिव की एक साथ प्रतिमाएं स्थापित हैं। इसमें दोनों की पूजा एक साथ होती है। विष्णु (हरि) और शंकर (हर) के एकसाथ होने के कारण इस क्षेत्र को `हरिहर क्षेत्र’ भी कहा जाता है। विश्व में सोनपुर मेले के नाम से विख्यात यह मेला क्षेत्र में `छत्तर मेला’ के नाम से मशहूर है। सोनपुर मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है। इस मेले में उन्नत नस्लों की गाय-भैंस, हाथी-घोड़े, ऊंट और दूसरे जानवरों तथा पशु-पक्षियों का क्रय-विक्रय होता है। गंगा और गंडक के मिलाप स्थल पर लगनेवाले इस मेले का इतिहास राजा चंद्रगुप्त मौर्य के जमाने से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि चंद्रगुप्त मौर्य अपनी सेना के लिए हाथी और घोड़ों की खरीददारी इसी मेले से करते थे। हालांकि आज भी इस मेले में हाथी और घोड़े काफी संख्या में खरीदी-बिक्री के लिए लाये जाते हैं, लेकिन वन्य जीवों की खरीददारी पर क़ानूनी प्रतिबंध के कारण रफ्ता-रफ्ता इस मेले का आकर्षण कम होता जा रहा है। कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होकर एक माह तक चलनेवाले इस मेले में केंद्र और राज्य सरकार के विभिन्न विभागों की ओर से लगायी जानेवाली तरह-तरह की प्रदर्शनियां लोगों के आकर्षण का केंद्र होती हैं।

यहां लगे थियेटर के तंबुओं में शाम को लोकगीतों और फिल्मी गीतों पर जब बालाओं के कदम थिरकते हैं तो मेले में दिनभर घूमने से होनेवाली थकान काफूर हो जाती है। इस मेले में पशु-पशुओं के अलावा विभिन्न प्रदेशों की कला-संस्कृति से संबद्ध वस्तुओं की खरीदी-बिक्री भी की जाती है, साथ ही राज्य के विभिन्न विभागों की लोक संस्कृतियों की मनोहारी झांकियां भी पूरे महीनेभर प्रदर्शित की जाती हैं। भारी संख्या में विदेशी पर्यटक भी इस मेले का आनंद उठाते हैं। यह मेला धार्मिक एकता और सद्भाव की अनूठी मिसाल भी पेश करता है। मेले में बिना किसी भेदभाव के सभी जाति-धर्मों के लोग शरीक होते हैं। यही नहीं, मेले के दौरान प्रसिद्ध हरिहरनाथ मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचने में आम हिंदू भक्तों को भले ही मशक्कत करनी पड़े, लेकिन पेंटर शमीम मोहम्मद तथा उनके शार्गिदों के लिए यह सुलभ है। शमीम अहमद का परिवार 50 वर्षों से मंदिर के गर्भगृह में प्रतिस्थापित शिव-विष्णु की मूर्तियांे के रंग रोगन में लगा है। शमीम अहमद के हाथों साल में दो बार भादों और कार्तिक महीने में हरिहरनाथ मंदिर की मूर्तियों का रंगरोगन के बाद ही इनकी पूर्जा अर्चना शुरू की जाती है।


यहीं पर हाजीपुर और सोनपुर को जोड़नेवाला ऐतिहासिक दर्शनीय पुल है जिसे अंगरेजों ने 1817 में बनवाया था। इससे लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर विश्व का सबसे लंबा पुल `महात्मा गांधी सेतु’ है जो राजधानी पटना और हाजीपुर को जोड़ता है। इसकी लंबाई लगभग 12 किलोमीटर है। रात के समय सोनपुर मेले से इस पुल पर जलते बिजली के बल्बों की रोशनी में पुल ऐसा लगता है मानो गंगाजी के गले में मोतियों का हार चमक रहा हो। यह क्षेत्र मीठे केले की बेती के लिए मशहूर है। यहां के केले में जो स्वाद है वह अनयत्र कहीं नहीं मिलता। यह मौसम केले के लिए उपयुक्त माना जाता है। इस महीने में केले का स्वाद और मिठास बढ़ जाती है। इसलिए मेला देखेने आये लोग यहां के केले का स्वाद लेना नहीं भूलते।


























RAJESH MISHRA


राजेश मिश्रा द्वारा, भेल्दी, छपरा, बिहार

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