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09 मई 2012

Vat Savitri Vrat


वट सावित्री व्रत एवं पर्यावरण


वट सावित्री व्रत केवल एक व्रत ही नहीं है बल्कि यह भारतीय संस्कृति परंपरा का वह अहम हिस्सा है जो हमें पर्यावरण से जोड़े रखती है। यह व्रत हमें सन्देश देती है कि अगर पेड़-पौधे नहीं रहे तो पृथ्वी पर जीवन नहीं बचेगा और जब जीवन ही नहीं बचेगा तो फिर हम कैसे सौभाग्यवती बनेंगे । पेड़ पौधे ही हैं जो प्रकृति से जहरीले कार्बन डॉइ ऑक्साइड को सोख कर जीवनदायी ऑक्सीजन हमें देते हैं । इस व्रत का भी यही उद्देश्य है कि व्रत के बहाने ही सही, वृक्षों को बचाएं ताकि आने वाली पीढ़ी को एक बेहतर व स्‍वच्‍छ जीवन दे सकें । 

व्रत की कहानी

प्राचीन काल की बात है। मद्र देश में अश्वपति नाम के राजा हुआ करते थे। वह बड़े ही सत्यवादी और धर्मात्मा थे। उन्हें जीवन में सभी प्रकार का सुख हासिल था बस एक ही बात का दु:ख था कि उनको कोई सन्तान नहीं थी। इस बात को लेकर वह काफी चिन्तित भी रहा करते थे। किसी ने उन्हें सन्तान प्राप्ति के व्रत के बारे में बताया तो उन्होंने 18 वर्षों तक सावित्री देवी की कठोर तपस्या की। सावित्री देवी इस तप से प्रसन्न होकर प्रकट हुईं और राजा को कन्या प्राप्ति का वर दिया। जिससे राजा की पत्नी ने एक सुन्दर सी कन्या को जन्म दिया जिसका सावित्री नाम रखा गया। वह कन्या अत्यन्त ही सुन्दर थी। जब सावित्री बड़ी हो गई तो उसके लिए योग्य वर की खोज की जाने लगी। सावित्री ने सत्यवान नामक युवा को चुना । जन्‍म कुंडली के हिसाब से सत्‍यवान की आयु मात्रा एक वर्ष शेष बची थी। परन्तुसावित्री ने न केवल सत्‍यवान से शादी कि बल्कि अपने पतिव्रता दम पर यमराज से सदा सुहागन रहने का आशीर्वाद लेकर सत्यवान के प्राण वापस लिए। इस दिन वट वृक्ष की पूजा इसलिए होती है कि सत्यवान ने अपने प्राण इसी वृक्ष के नीचे त्यागे थे और जब प्राण वापस मिले तो इसी वृक्ष के नीचे वह थे। इसलिए इस दिन वट वृक्ष पूजन की अपनी अलग महत्ता है।

गीता में भी दी गई है पेड़ो की महत्ता


भारतीय संस्कृति में शुरू से ही वृक्षों की महत्ता बताई गई है अगर हम खुली हवा में खुलकर श्वास ले पाते हैं तो इसमें भी वृक्षों की अहम भूमिका है तभी तो प्राचीन काल में ऋषि-मुनि तपस्या और चिन्तन-मनन के लिए वनों में ही बास करते थे। देखा जाए तो मनुष्य का जीवन और उसका ज्ञान-विज्ञान वनों में ही विकसित हुआ है। भारतीय संस्कृति और धर्म-कर्म के सन्दर्भ में गौर करने वाली बात यह है कि वैदिक काल में भी भारतीय मनीषी प्रकृति के उपासक थे। वे वनस्पतियों को अपने धर्मिक अनुष्ठानों में विशेष महत्व देते थे। वनस्पति व वृक्षों में रुद्र के विस्तृत स्वरूप को देखते हुए वैदिक ऋषि कहते थे `नमो वृक्षेभ्यों हरिकेशेभ्यो नम:।´ गीता में भी श्रीकृष्ण वृक्षों की महिमा बताते हैं।

वट वृक्ष में है त्रिदेव का वास



अब बात करते हैं वट वृक्ष की, जिसके मूल में भगवान ब्रह्मा, मध्य में भगवान विष्णु और अग्रभाग मे शिव वास करते है। देवी सावित्रीभी वट वृक्ष में ही प्रतिष्ठित रहती हैं। यह भी मान्यता है कि बड़ का पेड़ हमारे सब गुप्त भेदों को जानता है। इसी अक्षय वट पर प्रलय के अन्तिम चरण में भगवान श्रीकृष्ण ने बालरूप में मार्कण्डेय ऋषि को प्रथम दर्शन दिए थे। प्रयागराज में गंगा के तट पर वेणीमाध्व के निकट अक्षय वट प्रतिष्ठित है। भक्त शिरोमणि तुलसीदास ने संगल स्थित अक्षय वट को तीर्थराज का छत्रा कहा है। 

कृतज्ञता ज्ञापित करने का माध्‍यम

पांच वटों से युक्त स्थान को पंचवटी कहा गया है। धर्मिक मान्यता के अनुसार कुम जमुनि के परामर्श से भगवान श्रीराम ने सीता एवं लक्ष्मण के साथ वनवास काल में यहां निवास किया था। अगर इसी चीज को वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो हानिकारक गैसों को नष्ट कर वातावरण को शुद्ध करने में वट वृक्ष का विशेष महत्व है। जैसे वट वृक्ष दीर्घ काल तक अक्षय बना रहता है, उसी प्रकार दीर्घ आयु, अक्षय सौभाग्य तथा निरन्तर अभ्युदय की प्राप्ति के लिए वट वृक्ष की आराधना की जाती है। वास्तव में वट सावित्री का व्रत और पूजन वृक्ष देव और प्रकृति को हमारी कृतज्ञता ज्ञापित करने का माध्यम है।

घर-परिवार में सुख-समृद्धि लाने वाले वृक्ष

आवासीय परिसर के समीप बिल्व, अनार, नागकेसर, कटहल और नारियल के वृक्ष हमेशा शुभफलकारी होते हैं। इसी प्रकार जंभीरी, आम, केला, निर्गुडी, जौ, अशोक, सिरसा और चमेली आदि सुगंधित वृक्ष घर समीप शुभ होते हैं। जिन भवनों के पश्चिम में कमल के फूलों सहित जल हो, उतर में खाई हो, पूर्व में फलवाले वृक्ष हो और दक्षिण में दूध वाले वृक्ष हों। जिस मन्दिर के मध्य में बिल्वपत्रा, आम, अनार के वृक्ष हों, वहां दोष नहीं रहता है। 
जम्बीर, पुष्प के वृक्ष पलाश, अनार, चमेली, शतपत्रा, केसर, नारियल, पुष्प् और कनेर से परिपूर्ण घर सुख और ऐश्वर्य प्रदान करता है। ऐसी मान्यता भी है कि जिस घर में हरी-भरी मनीप्लांट की बेल होती है, वहां पैसे की कमी नहीं रहती है।

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