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30 जुलाई 2012

ISKCON MAYAPUR UPCOMING EVENTS : Jhulana Yatra 29 Jul 2012 | Lord Balarama’s Appearance 2 Aug 2012 - 16:00 | Krishna Janmastami 10 Aug 2012 - 09:00

Jhulana Yatra

29 Jul 2012 - 16:45

Jhulana-yatra is a festival to celebrate Radha Krishna’s pastime of swinging on a golden swing everyday until Balarama-purnima.
At Mayapur, Radha Madhava is decorated nicely and seated on a swing . All devotees wait patiently in a queue to swing Their Lordships. The swing (jhulana) beautified with splendid flower decorations, colorful beads, etc. A special flower rope is used to pull the swing. An arotik is performed after Sri Sri Radha Madhava are seated on the swing, and devotees bring a variety of bhoga to please Their Lordships. Kirtana and bhajans go on for almost two hours, and many visitors join in to pull Their Lordship’s swing.
In this regard Sri Hari-bhakti-vilasa states,
To please Sri Hari, devotees hold numerous festivals on every occasion and continuously perform sankirtana. According to their ability, the devotees serve the Lord during the summer by placing Him on the boat, taking Him out on a procession, applying sandalwood on His body, fanning Him with chamara, decorating Him with jeweled necklaces, offering Him palatable foodstuffs, and bringing Him out to swing Him in the pleasant moonlight.

Lord Balarama’s Appearance

2 Aug 2012 - 16:00

Srimad Bhagavatam Narration of Lord Balarama’s Appearance
Lord Balarama is the adi-guru, the original spiritual master. In Chaitanya Lila, Lord Balarama appears as Lord Nityananda, the bestower of mercy to even the most fallen conditioned soul. Therefore His appearance as the son of Rohini and Vasudeva is celebrated by devotees with great jubilation.
On the eve of Balarama-purnima, an adhivasa ceremony is performed in the evening to invoke auspiciousness.
On the day of Balarama-purnima, devotees fast till noon. Murtis of Krishna-Balarama are decorated nicely and kept on the altar platform. At around 11 a.m., an abhisheka is performed and bhoga of varieties of sweets, savories, chutneys, rice, sabjis, cakes and pastries are offered. Flowers are offered at Their lotus feet and a maha-arati is performed. , and a grand feast is served at 2 p.m.
In the evening, devotees commemorate Lord Balarama’s breaking a honey pot. A huge pot containing honey and some maha-prasada are placed in pots and tied up on a post. Some devotees are blindfolded, and they try to break that pot using a stick. The pot moves up and down. It’s fun time for devotees watching and participating. Even though everyone is eager for a taste of the honey, hardly anyone can hit the pot. When the pot is broken, devotees relish the honey and the maha-prasada. Such an event gives us a glimpse of the bliss that the gopas might have enjoyed in the company of the Lord while breaking the pots in Vraja.
Balarama-purnima also marks the end of Jhulana-yatra and the first month of chaturmasya.

Krishna Janmastami

10 Aug 2012 - 09:00

Though unborn and eternal, the Supreme Lord, of His free will and causeless mercy, incarnates to deliver the pious and annihilate the miscreants. Lord Krishna appeared as the son of Vasudeva and Devaki, but had His childhood pastimes at Gokula, Vrindavan.
Janmashtami is celebrated very gorgeously in Mayapur. The Bhagavatam classes focus on the transcendental tattva, janma and karma of Krishna, the Supreme Personality of Godhead, during the week ending with Janmashtami. On the eve of Janmashtami, an adhivasa ceremony is performed in the evening to invoke auspiciousness and help devotees prepare themselves for the next day’s festival.
On Janmashtami day, the mood of a great festival sets in at Mayapur. There is a virtual flood of thousands of visitors and guests that traffic control to keep people always on the move is organized. A variety of cultural programs entertain the guests. The altar is beautifully decorated with colorful flowers. A new outfit is offered Sri Sri Radha Madhava. They are marvelously dressed with a variety of flowers, jewels and ornaments. Devotees wait eagerly to take darshan of Them. The Srimad-Bhagavatam class is given by two or three devotees, separately in English and Bengali.
Devotees bring water from Ganga to bathe Radha Madhava during their abhisheka ceremony. Following Srila Rupa Goswami’s directions, special “samskaras” for Krishna such as nama-karana (“name giving”), vidyabhyasa (“inaugurating His education”), upanayana (“initiation”), etc. are performed with our devotees performing the samskaras.
A grand abhisheka is performed at midnight for the small Radha Madhava Deities while bhoga offering of more than 400 items are offered to Their Lordships with devotion. A maha-arati is performed and Radha Madhava give darshana in another new outfit. The devotees honor anukalpa-prasada (ekadasi prasada) after midnight.

25 जुलाई 2012

जन्माष्टमी । Janmashtami 2012

Janmashtami 2012 | Krishna Janmashtami | Janmashtami Festival
9 अगस्त 2012 को स्मार्तों का व्रत है और 10 अगस्त 2012 को वैष्णव संप्रदाय के लोगों द्वारा मनाया जाएगा

भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का यह उत्सव हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है. जन्माष्टमी भारत में हीं नहीं बल्कि विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा पूर्ण आस्था एवं श्रद्ध के साथ मनाया जाता है. भगवान विष्णु के अवतार रूप में श्रीकृष्ण जी का अवतरण भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी व श्रीवसुदेव के पुत्ररूप में हुआ था. स्मार्त और वैष्णव संप्रदाय के लोग भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव अलग-अलग ढंग से मनाते हैं. श्रीमद्भागवत को प्रमाण मानकर स्मार्त संप्रदाय के मानने वाले चंद्रोदय व्यापनी अष्टमी अर्थात रोहिणी नक्षत्र में जन्माष्टमी मनाते हैं व इसी प्रकार वैष्णव मानने वाले उदयकाल व्यापनी अष्टमी एवं उदयकाल रोहिणी नक्षत्र को जन्माष्टमी का पर्व मनाते हैं. इस वर्ष जन्माष्टमी का त्यौहार 9 अगस्त 2012 को स्मार्तों का व्रत है और 10 अगस्त 2012 को वैष्णव संप्रदाय के लोगों द्वारा मनाया जाएगा. 

मथुरा में जन्माष्टमी | Janmashtami in Mathura

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर कृष्ण की जन्म स्थली मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है. जन्माष्टमी के शुभ अवसर समय भगवा कृष्ण के दर्शनों के लिएए दूर दूर से श्रद्धालु मथुरा पहुंचते हैं. श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर मथुरा कृष्णमय हो जाता है.  मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है श्रीकृष्ण की जन्मस्थली रोशनी से सजी होती है मथुरा के सभी मंदिरों को रंग-बिरंगी लाइटों व फूलों से सजाया जाता है. मथुरा में जन्माष्टमी पर आयोजित होने वाले श्रीकृष्ण जन्मोत्सव को देखने के लिए देश से ही नहीं बल्कि विदेशों से लाखों की संख्या में कृष्ण भक्त पंहुचते हैं  भगवान के श्रीविग्रहपर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढाकर ब्रजवासीउसका परस्पर लेपन और छिडकाव करते हैं. इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती है और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है और रासलीला का आयोजन किया जाता है. 

जन्माष्टमी पूजा विधि | Janmashtami Pooja Procedure

श्री कृष्ण जी की पूजा आराधना का यह पावन पर्व सभी को कृष्ण भक्ति से परिपूर्ण कर देता है. इस दिन व्रत-उपवास करने का विधान है. यह व्रत सनातन-धर्मावलंबियों के लिए अनिवार्य माना जाता है. इस दिन उपवास रखें जाते हैं तथा कृष्ण भक्ति के गीतों का श्रवण किया जाता है. घर के पूजागृह तथा मंदिरों में श्रीकृष्ण-लीला की झांकियां सजाई जाती हैं. भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति अथवा शालिग्राम का दूध, दही, शहद, यमुना जल आदि से अभिषेक किया जाता है तथा भगवान श्री कृष्ण जी का षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है. भगवान का श्रृंगार करके उन्हें झूला झुलाया जाता है. श्रद्धालु भक्त मध्यरात्रि तक पूर्ण उपवास रखते हैं. जन्माष्टमी की रात्रि में जागरण, कीर्तन किए जाते हैं व अर्धरात्रि के समय शंख तथा घंटों के नाद से श्रीकृष्ण-जन्मोत्सव को संपन्न किया जाता है.

छप्पन भोग | Chhappan Bhog 

जन्माष्टमी के दिन कई स्वादिष्ट व्यंजन भी बनाए जाते हैं. इस दिन दूध और दूध से बने व्यंजनों का सेवन किया जाता है. भगवान कृष्ण को दूध और मक्खन अति प्रिय था. अत: जन्माष्टमी के दिन खीर और पेडे़, माखन, मिस्री जैसे मीठे व्यंजन बनाए और खाए जाते हैं. जन्माष्टमी का व्रत, मध्य रात्रि को श्रीकृष्ण भगवान के जन्म के पश्चात भगवान के प्रसाद को ग्रहण करने के साथ ही पूर्ण होता है. 

मोहरात्रि | Mohratri

श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि भी कहा गया है. इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से मुक्ति प्राप्त होती है. जन्माष्टमी का व्रत करने से  पुण्य की प्राप्ति होती है. 
श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव सम्पूर्ण विश्व को आनंद-मंगल का संदेश देता है. 

दही-हांडी समारोह | Dahi - Handi Function

जन्‍माष्‍टमी के अवसर पर मन्दिरों व घरों को सुन्‍दर ढंग से सजाया जाता है. इस त्‍यौहार को कृष्‍णाष्‍टमी अथवा गोकुलाष्‍टमी के नाम से भी जाना जाता है. इस त्‍यौहार के दौरान भजन किर्तन गाए जाते हैं व नृत्‍य एवं रास लीलाओं का आयोजन किया जाता है. इसके साथ ही साथ दही-हांडी जैसे आयोजन भी होते हैं. जिसमें एक मिट्टी के घडे़ में दही, मक्खन इत्यादि रख दिए जाते हैं तथा इस मटकी को काफी ऊँचाई पर लटका दिया जाता है जिसे फोडाना होता है. इसे दही हांडी आयोजन कहते हैं और जो भी इस मटकी को तोड़कर उसमें रखी सामग्री को प्राप्त कर लेता है. उसे ईनाम दिया जाता है. महाराष्‍ट्र में जन्‍माष्‍टमी के दौरान मटकी फोड़ने का आयोजन होता है. महाराष्ट्र में चारों ओर इस तरह के अनेक आयोजन एवं प्रतियोगिताओं का देखा जा सकता है.

जन्माष्टमी महत्व | Importance Of Janmashtami

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥7॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥8॥ 
गीता की इस अवधारण द्वारा भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि जब जब धर्म का नाश होता है तब तब मैं स्वयं इस पृथ्वी पर अवतार लेता हूँ और अधर्म का नाश करके धर्म कि स्थापना करता हूँ. अत: जब असुर एवं राक्षसी प्रवृतियों द्वारा पाप का आतंक व्याप्त होता है तब-तब भगवान विष्णु किसी न किसी रूप में अवतरित होकर इन पापों का शमन करते हैं. भगवान विष्णु इन समस्त अवतारों में से एक महत्वपूर्ण अवतार श्रीकृष्ण का रहा. भगवान स्वयं जिस दिन पृथ्व��� पर अवतरित हुए थे उस पवित्र तिथि को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं.

23 जुलाई 2012

शिवाभिषेक से होती है कामनाओं की पूर्ति

    108 Shivling par Jalabhishek
श्रावण माह को भगवान शिव की भक्ति का महीना कहा जाता है। हिन्दू धर्म के तीन देवों में भगवान शिव को संहारक देव के रूप में माना जाता है। भगवान भोलेनाथ अपने नाम के अनुरूप भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते हैं। श्रावण माह भगवान शिव के अभिषेक का बड़ा महत्व है। भगवान शिव ही ऐसे देवता हैं जो मात्र जल चढ़ाने से प्रसन्न हो जाते हैं। शिवपुराण के अनुसार अलग-अलग कामनाओं की सिद्धि के लिए भगवान शिव का अनेक द्रव्यों से अभिषेक किया जाता है।

यजुर्वेदीय ऋचाओं के साथ भगवान का अभिषेक करने से भगवान आशुतोष शीघ्र प्रसन्न होते हैं। अभिषेक से मनुष्य की अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष की कामना की सिद्धि होती है। शिवपुराण में सनकादि ऋषियों के पूछने पर स्वयं भगवान शिव ने अभिषेक का महत्व बताते हुए कहा है कि सभी प्रकार की आसक्तियों से रहित होकर जो मेरा अभिषेक करता है वह सभी कामनाओं को प्राप्त करता है। शास्त्रों में कामना की प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार के द्रव्यों से अभिषेक का वर्णन है।

  • जल की धारा भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है, अतः शुद्ध जल से भगवान शिव का अभिषेक करने पर भरपूर जलवृष्टि होती है। जल से अभिषेक करने से तेज ज्वर से भी शांत हो जाता है।
  • लक्ष्मी प्राप्ति के लिए गन्ने के रस से भगवान का अभिषेक करना चाहिए।
  • गाय के दूध से अभिषेक करने पर निःसंतानों को संतान प्राप्त होती है।
  • शक्कर मिश्रित दूध से अभिषेक करने पर बुद्धि की जड़ता समाप्त हो जाती है और बुद्धि श्रेष्ठ होती है।
  • शहद से अभिषेक करने पर पापों का नाश हो जाता है। तपेदिक रोग से छुटकारा मिलता है।
  • घी से अभिषेक करने पर जीवन में आरोग्यता आती है और वंशवृद्धि होती है।
  • सरसों के तेल के भगवान का अभिषेक करने पर शत्रुओं का नाश होता है।
  • मोक्ष की कामना के लिए तीर्थों के जल द्वारा अभिषेक किया जाता है।
इन रसों द्वारा शुद्ध चित्त के साथ विधानुसार भगवान शिव का अभिषेक करने पर भगवान भक्त की सभी कामनाओं की पूर्ति करते हैं। श्रावण माह में भगवान शिव का अभिषेक विशेष फलदायी होता है।

21 जुलाई 2012

"राम के गुण गाओ, उसी के हो जाओ"

परमात्मा के चरणों में ही जीवन है, उसी की छाया में विश्व फल-फूल रहा है। यही परमात्मा यानी राम की कथा के श्रवण सेकोटि-कोटि पापों का क्षय हो जाता है। जिसने भी रामकथा की सरिता में गोते लगाए, समझो उसने अपने उद्धारक सेतु कानिर्माण कर लिया।
मानव जीवन में सात वस्तुएं मनुष्य को प्रभावित करती हैं जिनमें संशय, मोह, भ्रम, भय, अज्ञान, दुर्भाग्य और मानसिक रोगहैं।
राम कथा की मार्मिकता को जितना समझो, उतना कम है।
जीवन की सच्चाई इसमें समाहित है। इसी सच्चाई को दर्शाती है रामकथा। यह भौतिक संसार हमें कहां ले जा रहा है, इसकाज्ञान कराती है रामकथा। मोह का त्याग करना ही मोक्ष है, इसका संपूर्ण परिचय देती है रामकथा।
राम से बड़ा राम का नाम है। मिसाल के तौर पर, लंका में चढ़ाई से पहले समुद्र पर जो पुल बना, वह राम के नाम से ही संभव होपाया। पत्थरों पर राम का नाम अंकित नहीं होता, राम के भक्त नल और नील उन पत्थरों को स्पर्श नहीं करते तो विशाल समुद्रपर बांध नहीं बनाया जा सकता था। इसके अलावा राम के परम भक्त हनुमान ने भी अपने हर साहसिक कार्य से पहले राम कानाम लिया और अपने उन कार्यों को सकुशल पूर्ण किया।
राम का नाम आज भी प्रासंगिक है। हनुमान का नाम लेने मात्र से भी उनके नाम की वंदना होती है। कलियुग में राम का नामऔर अनन्यभक्त हनुमान का स्मरण, मानव जीवन का उद्धार करने वाला है। यही मानव जीवन का आधार है। अगर यहमानकर जीवन को जीया जाए तो मानो आप सब भौतिक वस्तुओं से उबर गए।
इसी राम नाम ने विश्व का निर्माण किया है। जिस भगवान ने मुझको बनाया है, उसी परमपिता परमात्मा ने बाकी लोगों को भीबनाया है। जब सभी का निर्माता वही ईश्वर है, जब सभी उसी ईश्वर की आराधना करते हैं तो फिर मैं कौन होता हूं ईश्वरीय कृतिमें विभेद करने वाला। जब मेरे ठाकुर के लिए सब समान हैं तो मेरे लिए भी सब समान हैं।
राम तो सभी के लिए समान भाव रखते हैं। सभी उनकी संतान हैं। वे तो सभी का भला चाहते हैं। फिर मनुष्य उन्हें कैसे भूलसकता है? राम नाम की जीवन में सार्थकता को समझाने केलिए किसी चीज को जटिल नहीं कर देना चाहिए। यह तोसीधी-सादे, मधुर वचनों में भक्तों के सामने व्याख्यायित होना चाहिए, बल्कि जो जटिल है उसे सरल बनाकर प्रस्तुत करना, रामनाम को हर मनुष्य तक पहुँचाना मेरा प्रयास है। वैसे मैं जन-जन तक राम की महत्ता को पहुंचाना चाहता हूं। इसको जटिल करदेने से क्या लाभ? फिर राम का नाम तो सभी लोगों के लिए समान है, तो क्यों न इसको सुनने का पुण्य सभी को समान रूप सेवितरित किया जाए।
इसलिए बहुत से लोग कथा सुनने आते हैं। उनमें हर आदमी तो बहुत विद्वान होता नहीं कि उनसे गूढ़ बातें की जाएं। जो भी आतेहैं, वह गूढ़ बातों को समझने आते हैं, तो मैं हल्की-फुल्की बातों के जरिए आध्यात्म की गूढ़ बातें हर इंसान को समझाने कीकोशिश करता हूं।
वास्तव में जीवन का लक्ष्य ही राम नाम का स्मरण मानकर चलें। मान लें कि राम का स्मरण करके जहां वह ले चलें, वहांचलते जाएं। वैसे भी मनुष्य व्यर्थ ही मन को अशांत कर लेता है और तुच्छ चीजों में फंसकर जीवन को नष्ट कर रहा है। वहजिस आनंद और शांति की प्राप्त चाहता है, उसको केवल राम के नाम में लीन रहकर ही प्राप्त कर सकता है। एक बार जरा इसीको अपना लक्ष्य मानकर चलें। अपनी मंजिल तक आप खुद-ब-खुद ही प्राप्त कर लेंगे। अपने राम के पीछे हो लें, इससे ज्यादासुखद मार्ग कोई है ही नहीं।
वह कब तुम्हारी उंगली पकड़कर तुम्हें मोक्ष दिला देगा, इसका आभास भी तुम्हें होने न पाएगा। जीवन का सत्य तो यही है किउसके बताए पथ पर बढ़ते रहो और सोचो कि जहां तक कदम साथ दे वहां तक चलते ही जाना है। फिर पता चलेगा कि वहपरमपिता तुम्हें कभी हिम्मत हारने ही नहीं देगा।

चिता भस्म क्यों रमाते हैं शिव?

भगवान शिव अपने शरीर पर चिता की भस्म क्यों लगाते हैं। यह प्रश्न सभी के मन में होगा। शिव को प्रसन्न करने के लिए गाए गए श्री शिवमहिम्न स्तोत्र में भी उन्हें चिता की भस्म लेपने वाले कहा गया है। भस्म शरीर पर आवरण का काम करती है। इसके दार्शनिक अर्थ भी हैं और वैज्ञानिक महत्व भी है। शैव संप्रदाय के सन्यासियों में भस्म का विशेष महत्व है। श्चिताभस्मालेप: सृगपि नृकरोटिपरिकर: आदिशंकराचार्य ने शिवपञ्चाक्षर स्तोत्र में कहा है।
भस्मागराकाय महेश्वराय। पुराणों के अनुसार ब्रह्मा सृष्टिकर्ता, विष्णु पालनकर्ता तथा शिव संहारकर्ता हैं। मृत्यु जो शाश्वत सत्य है। उसके ही स्वामी शिव हैं इसलिए कहते भी है सत्यं शिवं सुंदरम्। अर्थात् सत्य शिव के समान सुंदर है। संसार में सत्य केवल मृत्यु ही है और उसके ईश्वर भगवान शिव हैं।
शिव का शरीर पर भस्म लपेटने का दार्शनिक अर्थ यही है कि यह शरीर जिस पर हम गर्व करते हैं, जिसकी सुरक्षा का इतना इंतजाम करते हैं। इस भस्म के समान हो जाएगा। शरीर क्षणभंगुर है और आत्मा अनंत। शरीर की गति प्राण रहने तक ही है। इसके बाद यह श्री हीन, कांतिहीन हो जाता है। कई सन्यासी तथा नागा साधु पूरे शरीर पर भस्म लगाते हैं।
यह भस्म उनके शरीर की कीटाणुओं से तो रक्षा करता ही है तथा सब रोम कुपों को ढंककर ठंड और गर्मी से भी राहत दिलाती है। रोम कूपों के ढंक जाने से शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती इससे शीत का अहसास नहीं होता और गर्मी में शरीर की नमी बाहर नहीं होती। इससे गर्मी से रक्षा होती है। परजीवी (मच्छर, खटमल आदि) जीव भी भस्म रमे शरीर से दूर रहते हैं।

वृन्दावन की रासलीला


भगवान् श्रीकृष्ण की लीलाओं की मनोहारी प्रस्तुति अपने देश की प्राचीन एवं गौरवशाली परंपरा रही है, जिसकी प्रमुख रंग-स्थली वृन्दावन है। श्रावण के महीने में तो यहाँ रासलीला की निराली ही धूम रहती है। पुरानों में कहा गया है कि माया के आवरण से रहित जीव का ब्रहम के साथ विलास ही रास है। इसमें लौकिक काम नहीं है।

अतः यह साधारण स्त्री- पुरुष का नहीं, अपितु जीव और इश्वर का मिलन है।
रासलीला के मंचन की शुरुआत महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की प्रेरणा से आज से लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व भक्तिकाल में हुई थी। भक्तिकाल में जब मुसलमानों का शासन था तब महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने चौरासी कोस में स्थित समूचे ब्रज मंडल का भ्रमण कर उन-उन स्थानों को खोजा था, जहाँ-जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण ने लीला की थी। श्रीमद्भागवत के प्रसंगों के आधार पर बरसाना के निकट करहला गाँव में रासलीला के दौरान भगवान् श्रीकृष्ण के स्वरूप को मोर पंखों का जो मुकुट धारण कराया था, वह आज भी करहला में सुरक्षित रखा हुआ है।

श्री नारायण भट्ट को रास मंडलों का संस्थापक माना जाता है। नारायण भट्ट जी ने संवत 1604 में बरसाना के भ्रमेशवर गिरी में से राधारानी का प्राकटय किया था। भट्ट जी नए कुल 28 रास मंडलों की स्थापना की थी। उसी समय वृन्दावन में श्रीहित हरिवंश जी, स्वामी श्री हरिदास जी एवं श्री हरिराम व्यास ने भी पांच रास्मंदलों की स्थापना की। नारायण भट्ट ने बरसाना में बूढी लीलाओं के मंचन की भी शुरुआत की। यह लीलाएं आज भी संत समाज के सहयोग से चिकसोंली के फत्ते स्वामी के वंशज बालकों के द्वारा बाबा चतुर्भुज दास पुजारी के निर्देशन में की जाती हैं। इस समय यह उत्तर प्रदेश की अत्यंत समृद्ध लोक नाट्यकला है। नृत्य, संगीत, नाटक और कविता इसके प्रमुख अंग है। समस्त नौ रस इसमें निहित है। 

रासलीला के प्रसंगों को दिन ब दिन विकसित करने में संतों, कवियों और भक्तों आदि का विशेष योगदान रहा है। जयदेव, सूरदास, चतुर्भुज दास, स्वामी हरिदास, कुम्हन दास, नंदास, हरिराम व्यास एवं परमानंद आदि ने रासलीला को मजबूत धरातल प्रदान किया।

इस समय ब्रज में दो प्रकार की रास मंडलियाँ प्रमुख हैं - बायें मुकुटवाली जो कि निम्बार्की मंडली कहलाती है एवं दायें मुकुटवाली, जो कि वल्लभकुली मंडली कहलाती हैं। रासलीला के दो मुख्य भाग है 'रास' और 'लीला'। रास वह हैं जिसमें मंगलाचरण, आरती, गायन, वादन व नृत्य आदि होता है, जिसे 'नृत्य रास' या नृत्य रास' कहा जाता है। लीला में भगवान् श्रीकृष्ण की सुमधुर रसमयी, चंचल व गंभीर निकुंज लीलाओं एवं पौराणिक कथाओं की लीलाओं व भक्त चरित्रों आदि का अभिनयात्मक प्रदर्शक गात्मक और पात्मक शैली में होता है।

रासलीला में 'राधा' व 'कृष्ण' के स्वरूपों को साक्षात् भगवान् मानकर पूजा जाता है। दर्शक उनकी आरती उतारते हैं। 
रासलीला की एक प्रमुख लीला महारास। इसके जनक स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण थे। उन्होंने इस लीला को शरद पूर्णिमा की रात्री में वृन्दावन के यमुना तट स्थित वंशीवट पर सोलह हजार एक सुन आठ गोपिकाओं के साथ किया था। सर्वप्रथम उन्होनें अपनी लोक विमोहिनी बंसी बजा कर यमुना के किनारे गोपिकाओं को एकत्रित किया, फिर योग माया के बल पर प्रत्येक गोपी के साथ एक- एक कृष्ण प्रकट किये। तत्पश्चात महारास लीला की। इस लीला में गोपियाँ अनंत थयें, लेकिन उनमएं से प्रत्येक को यह अनुभव हो रहा था कि श्रीकृष्ण के वाल उन्हीं के साथ हैं। भगवान् शिव भी गोपी का रूप धारण कर इस अद्वित्य लीलो को देखने के लिए आये थे। तभी से भगवान् शिव को गोपेश्वर महादेव भी कहा जाता है। अन्य देवता भी इस लीलो को देखने के लिए अपने विमानों में बैठकर आकाश पर छाए रहे थे। यह लीला आज भी प्राय: शरद पूर्णिमा पर ही की जाती है। चूंकि इस लीला मएं अनेक श्रीक्रिश्नों की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए इसमें अनेक रासमं डालियों के ठाकुर ( भगवान् श्रीकृष्ण के स्वरुप) भाग लेते हैं। यह लीला रात्री गए प्रारंभ होकर प्रातः लगभग दो-तीन बजे तक चलती है।

महारास लीला के अतिरिक्त ' अष्ट्याम लीला' भी रासलीला की एक महत्वपूर्ण लीला मानी जाती है। तीन घंटे का एक 'याम' होने से दिन और रात के चौबीस घंटों में कुल आठ याम होते हैं, उन्हें ही अष्ट्याम कहा गया है। इन आठों यामों में ठाकुर जी (भगवान् श्रीकृष्ण) ने ब्रज में राधारानी के साथ निकुंज बिहारी के रूप में एवं नन्द बाबा के यहाँ बलराम जी के साथ जो-जो लीलाएं की थीं, उनका अभिनयात्मक प्रदर्शन किया जाता है।

महाशिवरात्रिः छोटे-छोटे उपाय सुख-समृद्धि लाएं

महाशिवरात्रि के दिन किए जाने वाले उपाय महत्वपूर्ण व शीघ्र फलदायी होते हैं। इस दिन भोलेनाथ प्रसन्न हो वरदान अवश्य देते हैं। इसके महत्व को समझते हुए भोलेनाथ की कृपा से समस्याओं से निजात हासिल की जा सकती है।
कोई भी प्रयोग महाशिवरात्रि के दिन, किसी भी समय कर सकते हैं। मुंह उत्तर/पूर्व की ओर करके पूजा स्थान पर बैठें। ऊन का आसन होना चाहिए। लकड़ी की चौकी पर लाल सूती वस्त्र बिछाना चाहिए। दूसरी चौकी पर शिव परिवार का चित्र/ शिव यंत्र व थाली में चंदन से बड़ा Ú बनाकर अवश्य रखें। Ú के मध्य में यंत्र या प्रतिमा रखें। पुष्प, माला, मौली, बेलपत्र, धतूरा अवश्य रखें। चंदन केसर मिश्रित जल से यंत्र/प्रतिमा का अभिषेक कर स्वच्छ जल से धोकर स्वच्छ कपड़े से पोंछ कर स्थापित करना चाहिए।
भाग्यवृद्धि के लिए

* किसी गहरे पात्र में पारद शिवलिंग स्थापित करें। पात्र को सफेद वस्त्र पर स्थापित करें। ॐ ह्रिं नम: शिवाय ह्रिं मंत्र का ठीक आधे घंटे तक जाप करते हुए जलधारा पारद शिवलिंग पर अर्पित करें। अर्पित जल को बाद में किसी पवित्र वृक्ष की जड़ में डाल दें। शिवलिंग पूजा स्थान में स्थापित करें और नित्य नियम से मंत्र का जाप करें।
* यदि ग्यारह सफेद एवं सुगंधित पुष्प लेकर चौराहे के मध्य प्रात: काल सूर्योदय से पूर्व रख दिए जाएं, तो ऐसे व्यक्ति को अचानक धन लाभ की प्राप्ति की संभावना बनती है। यदि यह उपाय करते वक्त या उपाय करने के लिए घर से निकलने समय कोई सुहागिन स्त्री दिखाई दे, तो निश्चय ही धन-समृद्धि में वृद्धि होती है। चौराहे के मध्य में गुलाब के इत्र की शीशी खोलकर इत्र डालकर वहीं छोड़ आएं, तो ऐसे भी समृद्धि बढ़ती जाती है। जो महाशिवरात्रि पर न कर पाएं, वह शुक्ल पक्ष के दूसरे शुक्रवार को यह उपाय कर समृद्ध बन सकता है।
* एक बांसुरी को लाल साटन में लपेटकर व पूजनकर तिजोरी में स्थापित किया जाए, तो व्यवसाय में बढ़ोतरी होती है।
नजर से बचने के लिए

जिस व्यक्ति को नजर लगी हो या बार-बार नजर लग जाती हो तो उस व्यक्ति के ऊपर से मीठी रोटी उसारकर ढाक के पत्ते पर रखकर चौराहे के मध्य में प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व रखना चाहिए। मीठी रोटी को रखने के बाद उसके चारों ओर सुगंधित फूल की माला रख देनी चाहिए। यह याद रखें कि जिस व्यक्ति को जल्दी-जल्दी नजर लगती हो उन्हें चौराहे के ठीक मध्य भाग से नहीं गुजरना चाहिए।

ग्रह दोष निवारण के लिए

पहले जान लें कि किस ग्रह के कारण बाधाएं जीवन में आ रही हैं। उस ग्रह से संबंधित अनाज लेकर ढाक के पत्ते पर रखकर चौराहे के मध्य में रखना चाहिए तथा उसके चारों ओर सुगंधित पुष्पमाला चढ़ानी चाहिए। विभिन्न ग्रहों से संबंधित अनाज इस प्रकार हैं। महाशिवरात्रि पर सूर्योदय से पूर्व ग्रह से संबंधित अनाज रख कर आएं। ध्यान रखें कि अनाज की मात्रा 250 ग्राम से कम न हो। जिस चौराहे पर वर्षा ऋतु में जल का भराव हो जाता हो, उस चौराहे पर उपाय नहीं करने चाहिए। वहां अभीष्ट फल की प्राप्ति नहीं होती।

पुत्र प्राप्ति के लिए

पश्चिम दिशा में मुंह करके पीले आसन पर बैठें। जहां तक हो सके पीले वस्त्र पहनें। लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछा कर एक ताम्रपत्र में ‘संतान गोपाल यंत्र’ तीन कौड़ियां, एक लग्न मंडप सुपारी स्थापित करें, केसर का तिलक लगाएं। पीले फूल चढ़ाएं व भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप का ध्यान करें व स्फटिक माला से प्रतिदिन 5 माला जप निम्न मंत्र का करें।
देवकी सुत गोविंद वासुदेव जगत्पये
देहि में तनयं कृष्णत्वा महं शरणागते।
अब सब सामग्री की पोटली में बांधकर पूजा स्थान में रख दें। रोज श्रद्धा से दर्शन करें। जब आपकी मनोकामना पूर्ण हो जाए, तब पोटली को जल में प्रवाहित कर दें। भगवान शिव कू कृपा से सुंदर, दीर्घायु, ऐश्वर्यवान पुत्र की प्राप्ति होगी। इस शुभ अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए।
कॅरियर और रुद्राक्ष

जीवन में सफलता के लिए नवग्रह रुद्राक्ष माला सवरेतम है। किसी कारणवश जो इस अवसर पर रुद्राक्ष न पहन सकें, तो वे श्रावण माह में अवश्य धारण कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं। रुद्राक्ष बिल्कुल शुद्ध होना चाहिए।

* राजनेताओं को पूर्ण सफलता के लिए तेरह मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।
* न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोग एक व तेरह मुखी रुद्राक्ष दोनों ओर चांदी के मोती डलवा कर पहनें ।
* वकील चार व तेरह मुखी रुद्राक्ष धारण कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
* बैंक मैनेजर ग्यारह व तेरह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* सीए आठ व बारह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* पुलिस अधिकारी नौ व तेरह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* डॉक्टर, वैद्य नौ व ग्यारह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* सर्जन दस, बारह व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* चिकित्सा जगत के लोग ३ व चार मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* मैकेनिकल इंजीनियर दस व ग्यारह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* सिविल इंजीनियर आठ व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* इलेक्ट्रिकल इंजीनियर सात व ग्यारह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* कंप्यूटर सॉफ्टवेयर इंजीनियर चौदह व गौरी शंकर रुद्राक्ष पहनें।
* कंप्यूटर हार्डवेयर इंजीनियर नौ व बारह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* पायलट, वायुसेना अधिकारी दस व ग्यारह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* अध्यापक छह व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* ठेकेदार ग्यारह, तेरह व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* प्रॉपर्टी डीलर एक, दस व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* दुकानदार दस, तेरह व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* उद्योगपति बारह व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
* होटल मालिक एक, तेरह व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।
विद्यार्थियों व बच्चों की शिक्षा के लिए ‘गणोश रुद्राक्ष’ धारण करवाएं। बच्चा स्वयं अच्छी शिक्षा में नाम कमाएगा। इसे शुभ मुहूर्त में धारण करें।

सतीत्व से इंद्र फिर बने स्वर्ग के राजा

स्वामी इंद्र की पत्नि का नाम शचि है। वह पुलोमा ऋषि की पुत्री हैं। अत: पौलोमी तथा पुलोमजा के नाम से भी जानी जाती हैं। शचि वास्तव में दानव कुल की पुत्री हैं, परंतु अत्यधिक धार्मिक एवं भगवत भक्त थीं।

भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए बचपन से ही उन्होंने कठिन तपस्या की। परिणाम स्वरूप भगवान शंकर ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए। उन्ही की कृपा से वह देवराज इंद्र की पत्नी बनीं।

यद्यपि इंद्र स्वर्ग के भोग-विलासों में लिप्त रहते थे, परंतु देवी शचि ने कभी ऐसे ऐश्वर्य की इच्छा नहीं की। वह पति के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित थीं। उनके पतिव्रत धर्म के प्रभाव से वह ऋषिका के पद पर पहुंच गईं। प्राचीन काल में जब स्वयंवर होते थे, तो सबसे पहले देवी शचि का ही आह्वान किया जाता था।

उनकी पूजा-अर्चना करके ही स्वयंवर की रस्म प्रारंभ होती थी। ऐसा माना जाता था कि देवी शचि की आराधना करने से स्वयंवर में किसी प्रकार की बाधा नहीं आती। एक बार देवराज इंद्र से बड़ी भूल हो गई। उन्होंने भगवान के भक्त वृतासुर का वध कर डाला। चारों ओर उनकी निंदा होने लगी।

वृतासुर असुर तो था, परंतु धर्म परायण था। सुमार्ग पर चलने वाला था। देवराज की निंदा बढ़ने लगी। इस डर से वह चुप-चाप स्वर्ग छोड़कर भाग खड़े हुए तथा हिमालय पर्वत स्थित मानसरोवर में जाकर छिप गए। स्वर्ग में कोई शासक न रहा, तो पृथ्वी पर अत्याचार व अनाचार बढ़ने लगे।

नदियां सूख गईं। फसलें नष्ट हो गईं। चारों ओर हाहाकार मच गया। तब देवताओं ने विचार करके एक धर्मात्मा व तपस्वी व्यक्ति नहुष को पृथ्वी से बुलाकर देवराज इंद्र की गद्दी पर बिठा दिया। नहुष सौ अश्वमेघ यज्ञ कर चुके थे। अत: वह इंद्र पद के अधिकारी भी थे।

कुछ समय तक महाराज नहुष ने तीनों लोकों का शासन बड़े व्यवस्थित ढंग से किया। सर्वत्र उनके क्रिया-कलापों की प्रशंसा होने लगी। परंतु धीरे-धीरे स्वर्ग की विलासिता, एक से एक सुंदर अप्सराओं, भिन्न-भिन्न प्रकार के सुख-साधनों तथा सवरेपरि सत्ता के मद ने उनके मस्तिष्क को दूषित करना प्रारंभ कर दिया।

नहुष को मालूम हुआ कि देवी शचि स्वर्ग की सभी स्त्रियों में से अधिक सुंदर है। उनका मन शचि को पाने के लिए बेचैन हो उठा। जब शचि को इस बात का पता चला, तो वह चुपचाप स्वर्ग छोड़कर देवताओं के गुरु बृहस्पति के आश्रम चली गईं तथा देवगुरु को सारा वृतांत कह सुनाया।

देवगुरु बृहस्पति ने उन्हें सहायता का आश्वासन देकर आश्रम में छिपा लिया।शीघ्र ही नहुष को शचि के बृहस्पति के आवास पर छिपे होने का समाचार मिल गया। वह क्रोध में अंधा हो गया। उसने बृहस्पति को मारकर शचि को अपने अधिकार में लेने का निर्णय कर लिया। तब समस्त देवताओं ने उसे समझाया कि उन्हें ऐसा करना शोभा नहीं देता। इससे चारों ओर उनका अपयश होगा। पुण्य के प्रताप से जो इंद्रपद प्राप्त हुआ है, वह इस कार्य से उसे खो सकते हैं।

देवताओं ने उसे आश्वासन दिया कि वे स्वयं शचि को मना कर लाएंगे। और वे ले भी आए। नहुष ने अपना प्रस्ताव शचि के सामने रखा। शचि ने इसके लिए कुछ समय मांगा। इतने में शचि ने देवताओं के साथ मिलकर देवराज को ढूंढ़ लिया। बृहस्पति ने देवराज को अश्वमेघ यज्ञ द्वारा देवी भगवती की आराधना करके वरदान पाने की सलाह की।

यज्ञ समाप्त होने पर देवराज वृतासुर की हत्या के पाप से मुक्त हो गए तथा भगवती ने उन्हें पुन: इंद्र पद प्राप्ति का वरदान दे दिया। देवराज ने शचि को वापस स्वर्ग जाकर साहस से अपने धर्म का पालन करने का आदेश दिया। शचि को देख नहुष प्रसन्न हो गया।

शचि बोलीं- ‘महाराज, मैं चाहती हूं कि आप जब मेरे पास आएं, तो कुछ नवीन ढंग से आएं। आपके रथ में परम्परागत ढंग से घोड़े इत्यादि न हों।’ नहुष ने प्रसन्न होकर शचि की शर्त स्वीकार कर ली। निश्चित दिन नहुष ने एक अत्यंत सुंदर रथ तैयार करवाया। तथा उसमें ऋषियों तथा महर्षियों को जोत दिया। वे नहुष के रथ को खींचकर शचि के महल की ओर ले जाने लगे, परंतु नहुष तो शचि से मिलने के लिए अत्यंत उतावला हो रहे थे।

उसने रथ को शीघ्रता से खींचने का आदेश दिया। बेचारे वृद्ध ऋषि जैसे-तैसे रथ को और तेज ले जाने लगे नहुष को फिर भी संतोष नहीं हुआ। उसने कोड़ों से ऋषियों को पीटना शुरू कर दिया। इससे अगस्त्य ऋषि को अत्यंत क्रोध आ गया। उन्होंने नहुष को श्राप दे दिया- ‘दुष्ट, तू अजगर बनकर पृथ्वी पर गिर जा और लंबे समय तक अपने दुष्कर्मो का फल भोग।’

महर्षि अगस्त्य के श्राप देते ही नहुष अपने पापों के कारण अजगर की योनी में पृथ्वी पर गिर पड़ा। नहुष के हटते ही देवराज इंद्र पुन: प्रकट हो गए तथा शचि के साथ स्वर्ग के सिंहासन पर बैठकर आनन्दपूर्वक रहने लगे। इस प्रकार देवी शचि ने साहस व चतुराई से अपने पतिव्रता धर्म की रक्षा करते हुए इंद्र को पुन: स्वर्ग का अधिपति बनवा दिया।

उज्जैन के चौरासी महादेव

श्रावण मास में शिव पूजा का अपना अलग महत्व है। महाकाल की नगरी उज्जैन की बात हो, तो यह महत्व दोगुना हो जाता है। यहाँ स्थित 84 महादेवों की अर्चना श्रावण माह में विशेष रूप से की जाती है। इनके महात्म्य को पुराणों में विस्तृत रूप से समझाया गया है। अलग-अलग नाम से स्थापित इन 84 महादेवों की आराधना का प्रभाव भी भिन्न-भिन्न है। 

(1) अगस्तेश्वर महादेव

अगस्तेश्वर महादेव मंदिर हरसिद्धि मंदिर के पीछे स्थित संतोषी माता मंदिर परिसर में है। पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख के अनुसार जब दैत्यों ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली, तब निराश होकर देवता पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे।

वन में भटकते हुए एक दिन उन्होंने सूर्य के समान तेजस्वी अगस्तेश्वर तपस्वी को देखा। देवताओं के हाल को देखकर अगस्त्य ऋषि क्रोधित हुए। फलस्वरूप ज्वाला उत्पन्न हुई और स्वर्ग से दानव जलकर गिरने लगे। भयभीत होकर ऋषि आदि पाताल लोक चले गए। इससे अगस्त्य ऋषि दुःखी हुए। वे ब्रह्माजी के पास गए और कहने लगे कि मैंने ब्रह्म हत्या की है, अतः ऐसा उपाय बताओ, जिससे मेरा उद्धार हो।

ब्रह्मा ने कहा कि महाकाल वन के उत्तर में वट यक्षिणी के पास उत्तम लिंग है। उनकी आराधना से तुम पाप से मुक्त हो जाओगे। ब्रह्माजी के कथन पर अगस्त्य ऋषि ने तपस्या की और भगवान महाकाल प्रसन्न हुए। भगवान ने उन्हें वर दिया कि जिस देवता का लिंग पूजन तुमने किया है, वे तुम्हारे नाम से तीनों लोकों में प्रसिद्ध होंगे।

जो मनुष्य भावभक्ति से अगस्तेश्वर का दर्शन करेगा, वह पापों से मुक्त होकर सभी मनोकामनाओं को प्राप्त करेगा। तभी से श्रावण मास में विशेष रूप से अगस्तेश्वर महादेव की आराधना श्रद्धालुजन करते हैं।

(2) लिंग गुहेश्वर महादेव मंदिर

रामघाट पर पिशाच मुक्तेश्वर के पास सुरंग के भीतर स्थित है। इनके दर्शन मात्र से ही उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है। ऐसा कहा जाता है कि ऋषि मंकणक वेद-वेदांग में पारंगत थे। सिद्धि की कामना में हमेशा तपश्चर्या में लीन रहते थे।

एक दिन पर्वत पुत्र विद्ध के हाथ से कुशाग्र नामक शाकरस उत्पन्न हुआ। ऋषि मंकणक को अभिमान हुआ कि यह उनकी सिद्धि का फल है। वे गर्व करके नृत्य करने लगे। इससे सारे जगत में त्रास फैल गया। पर्वत चलने लगे, वर्षा होने लगी, नदियाँ उल्टी बहने लगीं तथा ग्रहों की गति उलट गई। देवता भयभीत हो महादेव के पास गए।

महादेव ऋषि के पास पहुँचे और नृत्य से मना किया। ऋषि ने अभिमान के साथ शाकरस की घटना का जिक्र किया। इस पर महादेव ने अँगुष्ठ से ताड़ना कर अँगुली के अग्रभाग से भस्म निकाली और कहा कि देखो मुझे इस सिद्धि पर अभिमान नहीं है और मैं नाच भी नहीं रहा हूँ। इससे लज्जित होकर ऋषि ने क्षमा माँगी और तप का वरदान माँगा।

महादेव ने आशीर्वाद देकर कहा कि महाकाल वन जाओ, वहाँ सप्तकुल में उत्पन्न लिंग मिलेगा। इसके दर्शन मात्र से तुम्हारा तप बढ़ जाएगा। ऋषि को लिंग गुहा के पास मिला। लिंग दर्शन के बाद ऋषि तेजस्वी हो गए और दुर्लभ सिद्धियों को प्राप्त कर लिया। बाद में लिंग गुहेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ऐसा कहा जाता है कि इनके दर्शन मात्र से इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार होता है।

(3) ढूँढ़ेश्वर महादेव

शिप्रा तट स्थित रामघाट के समीप धर्मशाला के ऊपरी भाग पर स्थित है। रुद्र देवता ने इन्हें स्वर्ग दिलाने वाला, सर्वपाप हरण करने वाला बताया है। पुराणों के अनुसार कैलाश पर्वत पर ढूँढ़ नामक गणनायक था। वह कामी और दुराचारी था।

एक दिन वह इंद्र के दरबार में जा पहुँचा और रंभा की फूलों से पिटाई कर दी। यह देखकर इंद्र ने शाप दिया, जिससे वह मृत्युलोक में मूर्छित होकर गिर गया। होश में आने पर उसे अपने कृत्य पर क्षोभ हुआ और वह महेन्द्र पर्वत पर तप करने लगा।

जब उसे सिद्धि प्राप्त नहीं हुई तो उसने धर्मकर्म त्याग दिया। तभी भविष्यवाणी हुई कि महाकाल वन जाओ, वहाँ कार्यसिद्धि होगी। वह वन में पहुँचा और सम्प्रतिकारक के शुभ लिंग के दर्शन किए।

तप-आराधना से प्रसन्न होकर लिंग ने वरदान दिया। तब ढूँढ़ ने कहा कि मेरे नाम से आपको जाना जाए। तभी से ढूँढ़ेश्वर महादेव के नाम से वह लिंग प्रसिद्ध हुआ। इनके महात्म्य से व्यक्ति महादेव लोक को प्राप्त होता है।

(4) डमरूकेश्वर महादेव

वैवस्वत कल्प में रू रू नाम का महाअसुर था। उसका पुत्र महाबाहु बलिष्ठ वज्र था। महाकाय तीक्ष्ण दंत वाले इस असुर ने देवताओं के अधिकार तथा संपत्ति छीन ली और स्वर्ग से निकाल दिया।

पृथ्वी पर वेद पठन-यज्ञ आदि बंद हो गए और हाहाकार मच गया। तब सभी देवता-ऋषि आदि एकत्रित हुए और असुर के वध का विचार किया। विचार करते ही तेज पुंज के साथ एक सुंदर स्त्री प्रकट हुई। उसने बारंबार अट्टाहास किया, जिससे बड़ी संख्या में देवियाँ उत्पन्ना हुईं। उन सभी ने मिलकर वज्रासुर से युद्ध किया।

दैत्य युद्ध स्थल से भागने लगे तो वज्रासुर ने माया प्रकट की। माया से कन्याएँ मोह को प्राप्त हो गईं। तब देवी कन्याओं को लेकर महाकाल वन में गईं, लेकिन वज्रासुर भी उनके पीछे-पीछे वन में पहुँच गया। यह समाचार नारद मुनि ने शिवजी को दिया।

शिवजी ने उत्तम भैरव का रूप धारण किया और वज्रासुर पर डमरू से प्रहार शुरू कर दिया। डमरू के शब्द से उत्तम लिंग उत्पन्न हुआ, जिससे निकली ज्वाला में वज्रासुर भस्म हो गया। उसकी सेना का भी नाश हो गया। तब देवताओं ने उत्तम लिंग का नाम डमरूकेश्वर रखा। इनके दर्शन से सभी दुःख दूर हो जाते हैं। श्री डमरूकेश्वर महादेव का मंदिर राम सीढ़ी के ऊपर स्थित है।

(5) अनादिकल्पेश्वर महादेव

अनादि समय में कथा के पहले एक उत्तम लिंग पृथ्वी पर प्रकट हुआ। उस समय अग्नि, सूर्य, पृथ्वी, दिशा, आकाश, वायु, जल, चन्द्र, ग्रह, देवता, असुर, गंधर्व, पिशाच आदि नहीं थे।

इस लिंग से जगत्स्थावर जंगम उत्पन्न हुए। इसी लिंग से देव, पितृ, ऋषि आदि के वंश उत्पन्न हुए। इस लिंग को अनादि सृष्टा माना जाने लगा। ब्रह्मा तथा शिवजी में इस बात पर विवाद हो गया कि सृष्टि का निर्माता कौन है। दोनों स्वयं को मानने लगे। तभी आकाशवाणी हुई कि महाकाल वन में कल्पेश्वर लिंग है, यदि उसका आदि या अंत देख लोगे तो जान जाओगे कि वही सृष्टिकर्ता है।

ब्रह्मा तथा शिव उसके आदि तथा अंत को नहीं खोज पाए। तब उन्होंने कहा कि पृथ्वी पर अनादिकल्पेश्वर नाम से यह लिंग प्रसिद्ध होगा। इसके दर्शन मात्र से ही सारे पाप नष्ट हो जाएँगे। यह लिंग महाकालेश्वर मंदिर परिसर में स्थित है।

(6) स्वर्णजालेश्वर महादेव

जब महादेव को उमा के साथ कैलाश पर्वत पर क्रीड़ा करते सौ बरस बीत गए तो देवताओं ने अग्नि नारायण को उनके पास भेजा। महादेव ने अग्नि के मुँह में वीर्य डाल दिया। इससे अग्नि जलने लगा और वीर्य को गंगाजी में डाल दिया। फिर भी मुख में वीर्य के शेष रहने पर अग्नि जलने लगा।

इस वीर्य शेष से अग्नि को पुत्र हुआ। इस तेजस्वी पुत्र का नाम सुवर्ण पुत्र था। इसे प्राप्त करने के लिए देवताओं तथा असुरों में युद्ध शुरू हो गया। दोनों ओर से अनेक मर गए। इस पर ब्रह्मघातक सुवर्ण को शिवजी ने बुलाया और श्राप दिया कि उसका शरीर बल के सहित विकारमय हो जाए तथा धातु रूप बन जाए।

पुत्र मोह में अग्नि ने महादेव से कहा कि ये आपका ही पुत्र है, इसकी रक्षा आप ही करो। लोभवश महादेव ने उसे अभयदान दे दिया और वरदान माँगने को कहा। उसे यह भी कहा कि तुम महाकाल वन में जाकर कर्कोटकेश्वर के दक्षिण भाग में स्थित लिंग के दर्शन करो। दर्शन मात्र से तुम कृतकृत्य हो जाओगे।

सुवर्ण के द्वारा उस लिंग के दर्शन-पूजन से प्रसन्ना हो महादेव ने वरदान दिया कि तुम्हारी अक्षयकीर्ति होगी तथा तुम स्वर्णजालेश्वर के नाम से प्रसिद्धि पाओगे। जो भी तुम्हारी अर्चना करेगा वह पुत्र-पौत्र का सुख प्राप्त करेगा। ये महादेव राम सीढ़ी पर स्थित है।

(7) त्रिविष्टपेश्वर महादेव

वाराह कल्प में पुण्यात्मा देव ऋषि नारद स्वर्गलोक गए। वहाँ इंद्रदेव ने नारदजी से महाकाल वन का माहात्म्य पूछा। नारदजी ने कहा कि महाकाल वन में महादेव, गणों के साथ निवास करते हैं। वहाँ साठ करोड़ हजार तथा साठ करोड़शत लिंग निवास करते हैं। साथ ही नवकरोड़ शक्तियाँ भी निवास करती हैं।

यह सुनकर सभा में बैठे सभी देवता तथा इंद्र महाकाल वन पहुँचे। उनके पहुँचने पर आकाशवाणी हुई कि आप सभी देवता मिलकर एक लिंग की स्थापना कर्कोटक से पूरब में और महामाया के दक्षिण में करें। यह सुनकर देवताओं तथा इंद्र ने एक लिंग की स्थापना की। इंद्र ने लिंग को स्वयं का नाम 'त्रिविष्टपेश्वर' दिया।

महाकाल मंदिर में स्थित ओंकारेश्वर मंदिर के पीछे स्थित त्रिविष्टपेश्वर महादेव की पूजा-अर्चना अष्टमी, चतुर्दशी तथा संक्रांति को करने से विशेष फल प्राप्त होता है।

(8) कपालेश्वर महादेव

वैवस्वत कल्प में, त्रेतायुग में, महाकाल वन में पितामह यज्ञ कर रहे थे। वहाँ ब्राह्मण समाज बैठा था। महादेव कापालिक वेश में वहाँ पहुँच गए। यह देखकर ब्राह्मणों ने क्रोधित हो उन्हें हवन स्थल से चले जाने को कहा। कापालिक वेश धारण किए महादेव ने ब्राह्मणों से अनुरोध किया कि मैंने ब्रह्म हत्या का पाप नाश करने के लिए बारह वर्ष का व्रत धारण किया है। अतः मुझे पापों का नाश करने हेतु अपने साथ बिठाएँ। ब्राह्मणों द्वारा इंकार करने पर उन्होंने कहा कि ठहरो, मैं भोजन करके आता हूँ।

तब ब्राह्मणों ने उन्हें मारना शुरू कर दिया। इससे उनके हाथ में रखा कपाल गिरकर टूट गया। इतने पर कपाल पुनः प्रकट हो गया। ब्राह्मणों ने क्रोधित होकर कपाल को ठोकर मार दी। जिस स्थान पर कपाल गिरा वहाँ करोड़ों कपाल प्रकट हो गए। ब्राह्मण समझ गए कि यह कार्य महादेव का ही है।

उन्होंने शतरुद्री मंत्रों से हवन किया। तब प्रसन्ना होकर महादेव ने कहा कि जिस जगह कपाल को फेंका है, वहाँ अनादिलिंग महादेव का लिंग है। यह समयाभाव से ढँक गया है। इसके दर्शन से ब्रह्म हत्या का पाप नाश होगा। इस पर भी जब दोष दूर नहीं हुआ तब आकाशवाणी हुई कि महाकाल वन जाओ। वहाँ महान लिंग गजरूप में मिलेगा। वे आकाशवाणी सुनकर अवंतिका आए।

लिंग दर्शन करते समय हाथ में स्थित ब्रह्म मस्तक पृथ्वी पर गिर गया। तब महादेव ने इसका नाम कपालेश्वर रखा। बिलोटीपुरा स्थित राजपूत धर्मशाला में स्थित कपालेश्वर महादेव के दर्शन करने मात्र से कठिन मनोरथ पूरे होते हैं।

(9) स्वर्गद्वारेश्वर महादेव

नलिया बाखल स्थित स्वर्गद्वारेश्वर महादेव के पूजन-अर्चन से स्वर्ग की प्राप्ति होती है तथा मोक्ष मिलता है। पुराणों में अंकित जानकारी अनुसार अश्विनी तथा उमा की बहनें, कैलाश पर्वत पर उमा से मिलने आईं तथा यज्ञ में बुलाने पर पिता के यहाँ यज्ञ में गईं।

वहाँ उन्हें पता चला कि उनके पति को आमंत्रित नहीं किया गया है। तब उमा ने अपमानित हो प्राण त्याग दिए। जब उमा पृथ्वी पर अचेतन दिखीं तो सैकड़ों गण क्रोधित होकर वहाँ पहुँचे और युद्ध शुरू कर दिया। इस बीच वीरभद्र गण ने इंद्र को त्रिशूल मार दिया। ऐरावत हाथी को मुष्ठी से प्रहार कर ताड़ित किया।

यह देख विष्णुजी को क्रोध आया और सुदर्शन चक्र फेंका। उसने गणों का नाश किया। गण घबराकर महादेव के पास गए। महादेव ने गणों को स्वर्ग के द्वार पर भेज दिया। देवताओं को स्वर्ग की प्राप्ति नहीं हुई तो वे ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने महादेव की आराधना करने को कहा।

इंद्र देवताओं सहित महाकाल वन में कपालेश्वर के पूर्व में स्थित द्वारेश्वर गए। पूजन कर स्वर्गद्वारेश्वर के दर्शन मात्र से स्वर्ग के द्वार खुल गए। तबसे स्वर्गद्वारेश्वर महादेव प्रसिद्ध हुए।

(10) कर्कोटेश्वर महादेव

हरसिद्धि मंदिर परिसर स्थित कर्कोटेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से विष बाधा दूर हो जाती है। ऐसा कहा जाता है कि माता उमा ने सर्पों को श्राप दिया कि मेरा वचन पूरा नहीं करने से तुम जन्मेजय के यज्ञ में अग्नि में जल जाओगे। श्राप सुनकर सर्प भयभीत होकर भागने लगे।

नागेन्द्र एलापत्रक नामक सर्प ब्रह्माजी के पास गया और सारा वृत्तांत सुनाया। ब्रह्मा ने उन्हें महाकाल वन जाने को कहा। उन्होंने कहा कि वहाँ जाकर महामाया के समीप महादेव की आराधना करो। यह सुनकर कर्कोटक नाम का सर्प स्वेच्छा से महामाया के सामने बैठकर महादेव की अर्चना करने लगा।

महादेव ने प्रसन्ना होकर वरदान दिया कि जो सर्प विष उगलने वाला क्रूर होगा उसका नाश होगा किंतु धर्माचरण करने वाले साँपों का नाश नहीं होगा। तभी से वह शिवलिंग कर्कोटेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हो गया। इनके दर्शन से कभी भी सर्प पीड़ा नहीं होती है।

(11) सिद्धेश्वर महादेव

सिद्धनाथ स्थित सिद्धेश्वर महादेव सिद्धि देने वाले हैं। इनकी सिद्धि करने पर अपुत्र को पुत्र, विद्यार्थी को विद्या प्राप्त होती है। ऐसा कहा जाता है कि देवदारू वन में ब्राह्मण एकत्रित हुए और स्पर्धा के साथ तपश्चर्या करने लगे। तरह-तरह के व्रत व आसन करने के बाद भी सैकड़ों वर्षों तक उन्हें सिद्धि प्राप्त नहीं हुई।

तब वे तपश्चर्या की निंदा कर नास्तिकता का विचार करने लगे। तभी आकाशवाणी हुई कि ईर्ष्या तथा स्पर्धा से किए तप से सिद्धि प्राप्त नहीं होती है। तुम सभी महाकाल वन जाओ और सिद्धि देने वाले महादेव की आराधना करो।

यह सुनकर वे महाकाल वन गए और सर्वसिद्धि देने वाले शिवलिंग के दर्शन किए। उनका मनोरथ पूरा हुआ। उसी दिन से वह लिंग सिद्धेश्वर महादेव के नाम से ख्यात हुआ।

(12) लोकपालेश्वर महादेव

हरसिद्धि दरवाजा स्थित लोकपालेश्वर महादेव के दर्शन प्रत्येक अष्टमी को करने पर शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। साधक विमान में बैठकर इंद्रलोक जाते हैं तथा सुख को प्राप्त कर ब्रह्मलोक में गमन करते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि हिरण्यकश्यप के समय हजारों दैत्यगण उत्पन्ना हुए। उन्होंने संपूर्ण पृथ्वी पर स्थित आश्रमों को नष्ट कर दिया। यज्ञ-अग्निकुंडों को मांस-मदिरा-रक्त से भर दिया। देवता भयभीत होकर विष्णु भगवान के पास गए। भगवान विष्णु उपाय सोचते तब तक दैत्यगणों ने इंद्र, वरूण, धर्मराज, अरुण, कुबेर आदि को जीत लिया। देवताओं की व्याकुलता देखकर भगवान विष्णु ने उन्हें महाकाल वन जाकर महादेव की आराधना करने को कहा।

जब देवतागण महाकाल वन जा रहे थे तो रास्ते में दैत्यों ने उन्हें रोक लिया। वे पुनः भगवान विष्णु के पास गए तब उन्होंने कहा कि शिवभक्त बनकर शरीर पर भभूत लगाकर जाओ। ऐसा करने पर जब वे महाकाल वन पहुँचे तो महान लिंग, तेज से युक्त देखा। इससे निकलने वाली ज्वाला से सभी दैत्य जल गए।

इसका माहात्म्य जानकर देवताओं (लोकपाल) ने उनका नाम लोकपालेश्वर महादेव रखा।

(13) मनकामनेश्वर महादेव

गंधर्ववती घाट स्थित श्री मनकामनेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से सौभाग्य प्राप्त होता है। ऐसा कहा जाता है कि एक समय ब्रह्माजी प्रजा की कामना से ध्यान कर रहे थे। उसी समय एक सुंदर पुत्र उत्पन्ना हुआ। ब्रह्माजी के पूछने पर उसने कहा कि कामना की आपकी इच्छा से, आपके ही अंश से उत्पन्ना हुआ हूँ। मुझे आज्ञा दो, मैं क्या करूँ?

ब्रह्माजी ने कहा कि तुम सृष्टि की रचना करो। यह सुनकर कंदर्प नामक वह पुत्र वहाँ से चला गया, लेकिन छिप गया। यह देखकर ब्रह्माजी क्रोधित हुए और नेत्राग्नि से नाश का श्राप दिया। कंदर्प के क्षमा माँगने पर उन्होंने कहा कि तुम्हें जीवित रहने हेतु 12 स्थान देता हूँ, जो कि स्त्री शरीर पर होंगे। इतना कहकर ब्रह्माजी ने कंदर्प को पुष्य का धनुष्य तथा पाँच नाव देकर बिदा किया।

कंदर्प ने इन शस्त्रों का उपयोग कर सभी को वशीभूत कर लिया। जब उसने तपस्यारत महादेव को वशीभूत करने का विचार किया तब महादेव ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। इससे कंदर्प (कामदेव) भस्म हो गया। उसकी स्त्री रति के विलाप करने पर आकाशवाणी हुई कि रुदन मत कर, तेरा पति बिना शरीर का (अनंग) रहेगा। यदि वह महाकाल वन जाकर महादेव की पूजा करेगा तो तेरा मनोरथ पूर्ण होगा।

कामदेव (अनंग) ने महाकाल वन में शिवलिंग के दर्शन किए और आराधना की। इस पर प्रसन्ना होकर महादेव ने वर दिया कि आज से मेरा नाम, तुम्हारे नाम से कंदर्पेश्वर महादेव नाम से प्रसिद्ध होगा। चैत्र शुक्ल की त्रयोदशी को जो व्यक्ति दर्शन करेगा, वह देवलोक को प्राप्त होगा।

(14) कुटुम्बेश्वर महादेव

सिंहपुरी क्षेत्र स्थित कुटुम्बेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से गोत्र वृद्धि होती है। ऐसा कहा जाता है कि जब देवों तथा दैत्यों ने क्षीरसागर का मंथन किया तब उसमें से ऐसा विष निकला, जिसने चारों ओर त्राहि मचा दी।

देवताओं ने महादेव से स्तुति की कि वे इससे उनकी रक्षा करें। महादेव ने मोर बनकर उस विष को पी लिया, किंतु वे भी इसे सहन नहीं कर पाए। तब महादेव ने शिप्रा नदी को वह विष दे दिया। शिप्रा ने इसे महाकाल वन स्थित कामेश्वर लिंग पर डाल दिया। वह लिंग विषयुक्त हो गया। इसके दर्शन मात्र से ब्राह्मण आदि मरने लगे।

महादेव को मालूम होने पर उन्होंने ब्राह्मणों को जीवित किया तथा वरदान दिया कि आज से जो भी इस लिंग के दर्शन करेगा वह आरोग्य को प्राप्त होगा तथा कुटुम्ब में वृद्धि करेगा। तब से यह लिंग कुटुम्बेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।

(15) इन्द्रद्युम्नेश्वर महादेव

पटनी बाजार क्षेत्र में, मोदी की गली स्थित इन्द्रद्युम्नेश्वर महादेव के दर्शन से यश तथा कीर्ति प्राप्त होती है। ऐसा कहा जाता है कि महिपति के राजा इन्द्रद्युम्नेश्वर थे। उन्होंने पृथ्वी की रक्षा पुत्रवत की।

धार्मिक प्रवृत्ति के ये राजा स्वर्ग को प्राप्त हुए। पुण्य का हिस्सा पूर्ण होने पर वे पृथ्वी पर गिर पड़े। इससे उन्हें शोक-संताप हुआ। उन्होंने विचार किया कि बुरे काम करने पर ही स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरना पड़ता है, अतः पाप कर्म त्यागकर कीर्ति बढ़ाना चाहिए।

वे स्वर्ग प्राप्ति की आकांक्षा में हिमालय पर्वत पर गए और मार्कण्डेय मुनि के दर्शन कर तपश्चर्या का फल पूछा। मुनि ने उन्हें महाकाल की आराधना करने को कहा। इन्द्रद्युम्न की तप आराधना से प्रसन्ना होकर उन्हें वरदान मिला कि यह लिंग उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध होकर 'इन्द्रद्युम्नेश्वर महादेव' कहलाएगा।

(16) ईशानेश्वर महादेव

पटनी बाजार क्षेत्र में मोदी की गली के बड़े दरवाजे में स्थित श्री ईशानेश्वर महादेव की आराधना से कीर्ति, लक्ष्मी तथा सिद्धि प्राप्त होती है।

ऐसा कहा जाता है कि मंडासुर के पुत्र तुहुण्ड ने देवताओं पर बहुत जुल्म किए। उसने ऋषि, यक्ष, गंधर्व एवं किन्नारों को भी अपने अधिकार में कर लिया। इंद्र को जीतकर ऐरावत हाथी को अपने मकान के दरवाजे पर बाँध लिया। देवताओं के अधिकारों का हरण कर उन्हें स्वर्ग जाने से रोक दिया।

उनकी ऐसी स्थिति देखकर मुनि नारद ने कहा कि 'महाकाल वन जाओ। वहाँ इंद्रद्युम्नेश्वर महादेव के पास पूर्व दिशा में स्थित लिंग का पूजन-आराधना करो। ईशान कल्प में इसी लिंग की कृपा से राजा ईशान ने अपना खोया राज्य प्राप्त किया था।'

यह वचन सुनकर देवतागण, महाकाल वन गए। वहाँ उन्होंने लिंग की आराधना की। लिंग से अचानक धुआँ निकलने लगा। फिर ज्वाला निकली, उस ज्वाला ने तुहुण्ड को परिवार सहित जलाकर भस्म कर दिया। देवताओं ने लिंग का नाम ईशानेश्वर महादेव रखा।

(17) अप्सरेश्वर महादेव

मोदी की गली में ही कुएँ के पास स्थित अप्सरेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से ही अभिष्ट वस्तु की प्राप्ति होती है। इनको स्पर्श करने से राज्य-सुख तथा मोक्ष मिलता है।

एक बार नंदन वन में इंद्रदेव विराजित थे। अप्सरा रंभा नृत्य कर उनका मनोरंजन कर रही थी। अचानक कोई विचार आने पर रंभा की लय बिगड़ गई। इस पर इंद्र क्रोधित हुए और श्राप दिया कि वह कांतिहीन होकर मृत्युलोक में गमन करे।

रंभा पृथ्वी पर गिर पड़ी और रूदन करने लगी। उसकी सखी अप्सराएँ भी वहाँ आ गईं तभी वहाँ से मुनि नारद गुजरे। उन्होंने रंभा की जबानी सारा वृत्तांत सुना तो बोले- 'रंभा तुम महाकाल वन जाओ। वहाँ मनोरथपूर्ण करने वाला लिंग मिलेगा। उसके पूजन, आराधना से तुम्हें स्वर्ग मिलेगा। उर्वशी अप्सरा को भी इनके पूजन से पुरुरवा राजा पति के रूप में मिले थे।'

ऐसा कहने पर रंभा ने लिंग की आराधना की। इस पर महादेव प्रसन्ना हुए और रंभा को आशीर्वाद दिया कि वह इंद्र की वल्लभप्रिया बनेगी तथा यह लिंग अप्सरेश्वर महादेव के नाम से जाना जाएगा।

(18) कलकलेश्वर महादेव

श्री कलकलेश्वर महादेव के दर्शन से कलह नहीं होता है। एक बार महादेव ने उमा को महाकाली नाम से पुकारा। इस बात को लेकर महादेव-उमा में कलह बढ़ गया। कलह के कारण तीनों लोक कम्पित होने लगे। यह देख देव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व आदि भय को प्राप्त हुए।

इस भीषण हो-हल्ले में पृथ्वी के गर्भ से एक लिंग निकला। उस लिंग से शुभ एवं सुख वचन की वाणी निकली। लिंग ने त्रिलोक को शांति के वचन कहे। इस पर देवताओं ने उस लिंग का नाम कलकलेश्वर महादेव रखा।

इसका पूजन-अर्चन करने वाले मनुष्य को दुःख, व्याधि तथा अकाल मौत से मुक्ति मिलती है। ये महादेव मोदी की गली में कुएँ के सामने स्थित हैं।

(19) नागचंद्रेश्वर महादेव

पटनी बाजार स्थित नागचंद्रेश्वर महादेव के दर्शन से निर्माल्य लंघन से उत्पन्ना पाप का नाश होता है। ऐसा कहा जाता है कि देवर्षि नारद एक बार इंद्र की सभा में कथा सुना रहे थे। इंद्र ने मुनि से पूछा कि हे देव, आप त्रिलोक के ज्ञाता हैं। मुझे पृथ्वी पर ऐसा स्थान बताओ, जो मुक्ति देने वाला हो।

यह सुनकर मुनि ने कहा कि उत्तम प्रयागराज तीर्थ से दस गुना ज्यादा महिमा वाले महाकाल वन में जाओ। वहाँ महादेव के दर्शन मात्र से ही सुख, स्वर्ग की प्राप्ति होती है। वर्णन सुनकर सभी देवता विमान में बैठकर महाकाल वन आए। उन्होंने आकाश से देखा कि चारों ओर साठ करोड़ से भी शत गुणित लिंग शोभा दे रहे हैं। उन्हें विमान उतारने की जगह दिखाई नहीं दे रही थी।

इस पर निर्माल्य उल्लंघन दोष जानकर वे महाकाल वन नहीं उतरे, तभी देवताओं ने एक तेजस्वी नागचंद्रगण को विमान में बैठकर स्वर्ग की ओर जाते देखा। पूछने पर उसने महाकाल वन में महादेव के उत्तम पूजन कार्य को बताया। देवताओं के कहने पर कि वन में घूमने पर तुमने निर्माल्य लंघन भी किया होगा, तब उसके दोष का उपाय बताओ।

नागचंद्रगण ने ईशानेश्वर के पास ईशान कोण में स्थित लिंग का महात्म्य बताया। इस पर देवता महाकाल वन गए और निर्माल्य लंघन दोष का निवारण उन लिंग के दर्शन कर किया। यह बात चूँकि नागचंद्रगण ने बताई थी, इसीलिए देवताओं ने इस लिंग का नाम नागचंद्रेश्वर महादेव रखा।

(20) प्रतिहारेश्वर महादेव

पटनी बाजार स्थित नागचंद्रेश्वर महादेव के पास प्रतिहारेश्वर महादेव का मंदिर है। इनके दर्शन मात्र से व्यक्ति धनवान बन जाता है। एक बार महादेव उमा से विवाह के बाद सैकड़ों वर्षों तक रनिवास में रहे।

देवताओं को चिंता हुई कि यदि महादेव को पुत्र हुआ तो वह तेजस्वी बालक त्रिलोक का विनाश कर देगा। ऐसे में गुरु महा तेजस्वी ने उपाय बताया कि आप सभी महादेव के पास जाकर गुहार करो। जब सभी मंदिराचल पर्वत पहुँचे तो द्वार पर नंदी मिले। इस पर इंद्र ने अग्नि से कहा कि हंस बनकर नंदी की नजर चुराकर जाओ और महादेव से मिलो।

हंस बने अग्नि ने महादेव के कान में कहा कि देवतागण द्वार पर खड़े इंतजार कर रहे हैं। इस पर महादेव द्वार पर आए तथा देवताओं की बात सुनी। उन्होंने देवताओं को पुत्र न होने देने का वचन दिया। लापरवाही के स्वरूप उन्होंने नंदी को दंड दिया। नंदी पृथ्वी पर गिरकर विलाप करने लगा।

नंदी का विलाप सुनकर देवताओं ने नंदी से महाकाल वन जाकर शिवपूजा का महात्म्य बताया। नंदी ने वैसा ही किया। उसने लिंग पूजन कर वरदान प्राप्त किया। लिंग से ध्वनि आई कि तुमने महाभक्ति से पूजन किया है अतः तुम्हें वरदान है कि तुम्हारे नाम प्रतिहार (नंदीगण) से यह लिंग जाना जाएगा। तब से उसे प्रतिहारेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्धि मिली।

(21) दुर्धरेश्वर महादेव

छोटी रपट के पास स्थित गंधर्ववती घाट पर दुर्धरेश्वर महादेव मंदिर है। इनके दर्शन से मनुष्य पापमुक्त हो वांछित फल पाता है। एक बार नेपाल का राजा दुर्धष वन में शिकार को गया। थकने पर एक सरोवर से जलपान कर वहीं सो गया।

वह सरोवर सिद्ध देवकन्याओं का स्नानागार था। तीन स्त्रियों का पति दुर्धष देवकन्याओं के आने पर मोहित हो गया। कल्प मुनि की कन्या राजा पर मोहित होकर बोली कि आप मेरे पिताश्री से मुझे माँग लो। राजा के निवेदन पर मुनि ने कन्यादान कर दिया। इस पर राजा अपना राजपाट तथा स्त्रियों को भूलकर मुनि कन्या के साथ घर जमाई बनकर रहने लगा।

एक दिन राक्षस ने मुनि कन्या का अपहरण कर लिया। राजा ने पत्नी वियोग से दुःखी हो मुनि से उपाय जाना। मुनि ने कहा कि महाकाल वन जाकर शिप्रा तट स्थित ब्रह्मेश्वर से पश्चिम में जाओ। वहाँ स्थित लिंग की तपस्या करने पर तुम्हारा मनोरथपूर्ण होगा।

राजा ने ऐसा ही किया, तब लिंग से आकाशवाणी हुई कि मैंने राक्षस का नाश कर मुनि कन्या को छुड़ा लिया है। तुम सुखपूर्वक इसके साथ रहो। इस लिंग का पूजन कर दुर्धष ने मनोरथ प्राप्त किया, तभी से इसका नाम दुर्धरेश्वर महादेव पड़ा।

11 जुलाई 2012

10 जुलाई 2012

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अचूक असरकारी सरल वास्तु टिप्स 

  • घर में तुलसी का पौधा अवश्य लगाएं। इससे परिवार में प्रेम बढ़ता है। तुलसी के पत्तों के नियमित सेवन से कई रोगों से मुक्ति मिलती है। 
  • ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) को हमेशा साफ-सुथरा रखें ताकि सूर्य की जीवनदायिनी किरणें घर में प्रवेश कर सकें।
  • भोजन बनाते समय गृहिणी का हमेशा मुख पूर्व की ओर होना चाहिए। इससे भोजन सुपाच्य और स्वादिष्ट बनता है। साथ ही पूर्व की ओर मुख करके भोजन करने से व्यक्ति की पाचन शक्ति में वृद्धि होती है।
  • जो बच्चे में पढ़ने में कमजोर हैं, उन्हें पूर्व की ओर मुख करके अध्ययन करना चाहिए। इससे उन्हें लाभ होगा।
  • जिन कन्याओं के विवाह में विलम्ब हो रहा है, उन्हें वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) के कमरे में रहना चाहिए। इससे उनका विवाह अच्छे और समृद्ध परिवार में होगा।
  • रात को सोते वक्त व्यक्ति का सिर हमेशा दक्षिण दिशा में होना चाहिए। कभी भी उत्तर दिशा की ओर सिर करके नहीं सोना चाहिए। इससे अनिद्रा रोग होने की संभावना होती है साथ ही व्यक्ति की पाचन शक्ति पर विपरीत असर पड़ता है।
  • घर में कभी-कभी नमक के पानी से पोंछा लगाना चाहिए। इससे नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है।
  • घर से निकलते समय माता-पिता को विधिवत (झुककर) प्रणाम करना चाहिए। इससे बृहस्पति और बुध ठीक होते हैं। इससे व्यक्ति के जटिल से जटिल काम बन जाते हैं।
  • घर का प्रवेश द्वार एकदम स्वच्छ होना चाहिए। प्रवेश द्वार जितना स्वच्छ होगा घर में लक्ष्मी आने की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है।
  • प्रवेश द्वार के आगे स्वस्तिक, ॐ, शुभ-लाभ जैसे मांगलिक चिह्नों को उपयोग अवश्य करें।
  • प्रवेश द्वार पर कभी ‍भी बिना सोचे-समझे गणेशजी न लगाएं। दक्षिण या उत्तरमुखी घर के द्वार पर ही गणेशजी लगाएं।
  • विवाह पत्रिका कभी भूलकर भी न फाड़े क्योंकि इससे व्यक्ति को गुरु और मंगल का दोष लग जाता है।
  • घर में देवी-देवताओं की ज्यादा तस्वीरें न रखें और शयन कक्ष में तो बिलकुल भी नहीं।
  • शयन कक्ष में टेलीविजन कदापि न रखें क्योंकि इससे शारीरिक क्षमताओं पर विपरीत असर पड़ता है।
  • दफ्तर में काम करते समय उत्तर-पूर्व की ओर मुख करके बैठें तो शुभ रहेगा, जबकि बॉस (कार्यालय प्रमुख) का केबिन नैऋत्य कोण में होना चाहिए। 
  • घर के भीतर शंख अवश्य रखें। इससे बजाने से 500 मीटर के दायरे में रोगाणु नष्ट होते हैं।
  • पक्षियों को दाना खिलाने और गाय को रोटी और चारा खिलाने से गृह दोष का निवारण होता है।

रामायण जी का महात्मय

"सिया राम जय राम जय जय राम"

>एक नियम है, मनुष्य संकल्प करता है परन्तु जब तक वह इन संकल्पों को कार्य का रूप न दे, क्रिया तब तक संकल्प सफलता की ओर अग्रसर नहीं होते। यदी कोई मनुष्य क्रिया का रूप देकर संकल्प करता है परन्तु उस पर प्रभु क़ी कृपा न हो तो भी संकल्प कीसफलता प्राप्त नहीं कर सकता। शुभ संकल्प, क्रिया और परमात्मा की कृपा, इन तीन वस्तुओं के मिलाप से भगवद कार्य की शुरुआत होती है, इन तीन वस्तुओं के संकल्प के पश्चात इश्वर कार्य का आरम्भ होता है।

वैसे तो राम क़ी कथा प्रत्येक व्यक्ति जानता है। एक सम्राट चक्रवर्ती अयोध्या के महाराज दशरथ थे जिनके चार पुत्र थे। जनकपुर में श्री राम जी का विवाह हुआ। तत्पश्चात राम को राजगद्दी मिली लेकिन उससे पहले राम को वनवास मिला। राम वियोग में दशरथ जी की मृत्यु हो गयी। राम, लक्ष्मण और सीता जी वन में गए। भारत जी चित्रकूट गए और उनकी पादुका ले आये। राम चित्रकूट में पंचवटी गए। सीता जी का उपहरण हुआ। सीता को खोजने के लिये राम ने वानर सेना भेजी। हनुमान सीता जी को खोज लाये। राम ने समुद्र के ऊपर बाँध बांधा। रामेश्वर भगवन क़ी करके लंका पर चढाई की। रावणादि रक्षसों का विनाश हुआ और पुष्पक विमान में बैठकर राम अयोध्या आये। राम जी का राज्याभिषेक हुआ, राम राज्य की स्थापना हुए और राम कथा पूरी हुए। इतनी-सी कथा गोस्वामी जी नए मानस में लिखी है। आधे मिनट में कही जाने वाली कथा के लिये इतना अधिक समय इतनी संपत्ति का खर्च, इतने सारे व्यापार-धन्दोइन को छोड़कर इसके पीछे इतना समय देते हैं। उस पर से मालूम होता है क़ी आधी मिनट में कही जाने वाली कथा रामायण नहीं है। पहले तो यह भ्रांति हट जानी चाहिए, अधिकतर तो ऐसा मन जाता था क़ी रामायण में क्या सुनना? जिन लोगों को रामचरितमानस का अनुभव नहीं है, वे लोग यह कहते हैं क़ी रामायण में क्या है? राम-रावन युद्ध है, इसमें क्या सुनना? परन्तु रामायण केवल कथा नहीं है। इतिहास नहीं है। और न ही एक सम्राट पुत्र का चरित्र है। रामायण सबसे प्रथम परात्पर ब्रह्म है। उनका एक दिव्या लीलामृत है। और साथ-साथ हम सबके जीवन में जो कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं, उसका उत्तर रामायण है। प्रमाण सहित कह सकते हैं कि जीवन की ऐसी कोई समस्या नहीं है, भूतकाल में नहीं थी और भविष्य में नहीं होती जिनका उत्तर रामायण में न हो। कोई कहे क़ी रामायण की कथा गाते हैं इसलिये रामायण की प्रशंसा करते हैं। परन्तु प्रमाण देकर कह सकते हैं कि हम सबके जीवन में कोई प्रश्न आये तो उसका उत्तर रामायण में है। निष्ठा, प्रेम और सत्संग होंगे तो रामायण आपके प्रश्नों का उत्तर देगी।

रेलवे स्टेशन पर एक बुजुर्ग ट्रेन के इंतज़ार में रामचरितमानस का पाठ कर रहे थे। रामायण के प्रेमी थे। उन्होंने सोचा कि ट्रेन आने में तीस मिनट हैं तो चलो रामचरितमानस का पाठ ही कर लूं। तभी एक नवदम्पत्ति जो पढ़े-लिखे थे उस बुजुर्ग की टीका करने लगे। इन लोगों ने सालों से रामायण को पकड़ा हैं छोड़ते ही नहीं हैं। स्टेशन पर भी पढने बैठ गए, युवक ने बुजुर्ग से मजाक में कहा, "अब संसार में बड़ी-बड़ी गीता लिखी जाती है बड़े-बड़े उपन्यास लिखे जाते हैं और आपने अभी तक एक ही रामायण बरसों से पकड़ी हुई हैं। छोड़ते ही नहीं हैं, इसमें ऐसा क्या है? जिसको आप पढ़ रहे हैं।" प्रारम्भ में बुजुर्ग ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। उसने आग्रह किया, "जवाब दो। क्यों आप रामायण लेकर बैठे हैं? इस में क्या है?" बुजुर्ग ने कहा, "इसमें क्या है यह तो मैं भी मालूम नहीं कर सका तुझे सबूत नहीं दे सकता। परन्तु तू तो पढ़ा लिखा व्यक्ति है, तू तो बता कि इसमें क्या नहीं है? मैं तो चिन्तक नहीं हूँ। अभ्यास भी नहीं है, इसलिये नहीं बता सकता क़ी इसमें क्या है? तू तो पंडित है तो तू ही बता सकता है इसमें क्या नहीं है?" युवक ने कहा, "यह तो आपकी बौद्धिक दलीलें हैं। क्या इसमें सब कुछ लिखा है?" बुजुर्ग ने कहा, "भाई मेरा तो विश्वास है क़ी इसमें सभी कुछ है इनकी बातचीत के दौरान ट्रेन आ गयी। भीड़ अधिक थी ट्रेन चली गयी। थोड़ी देर बाद ट्रेन ने स्पीड पकड़ी। बुजुर्ग ने सीट मिलने के पश्चात रामचरितमानस का पाठ करना शुरू किया गाडी थोड़ी ही दूर गयी होगी क़ी उस युवक ने आवाज लगाई क़ी गाडी रोको। अन्य लोग पूछने लगे क़ी क्या हुआ? उसने कहा, "गाडी जल्दी रोगों। "ऐसा कह कर उसने जंजीर खींच दी। ट्रेन में बैठे लोग पूछने लगे क़ी गाडी क्यों रोग दी? आपको मालूम है क़ी यहाँ सूचना है क़ी बिना किसी कारणवश गाडी रुकवाने पर दंड, सजा मिल सकती है। आपने गाडी क्यों रोक दी? उसने कहा, "जल्दी में में गाडी में चढ़ गया और मेरी पत्नी रह गयी इसलिये मैंने गाडी रुकवाई है।" उस बुजुर्ग ने सुन कर उसका हाथ पकड़ा और पुछा, क़ी "भाई बुरा न माना तो कहूं। स्टेशन पर तू मेरी टीका कर रहा था क़ी रामायण में ऐसा क्या लिखा है कि पढ़ते ही रहते हो। अब तुझे कहता हूँ क़ी यदी तुने एक बार रामायण को पढ़ा होता तो तुने जो भूल आज की है वह न करता। क्यों? तू बैठ गया और तेरी पत्नी स्टेशन पर ही रह गयी। इसका भी उत्तर रामायण में है। कहीं पर लिखा है क़ी केवट नाम के भील ने राम के चारण छुए और फिर नौका में बिठाया। तब सीता जे पहले बैठी और फिर राम जी बैठे। रामायण में कहा है क़ी कोई भी वहां में बैठना हो तो पहले पत्नी को बैठाना चाहिए बाद में पुरुष को बैठना चाहिए। तूने रामायण पढ़ी होती तो यह भूल न करता।

कम से कम व्यवहार के ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका उत्तर रामायण न दे। इसलिये यह खाली कथा कहने की, कहानी की, इतिहास की खबर है। परन्तु उसके एक-एक पत्र, एक-एक प्रसंग और एक-एक चौपाई के पीछे हम सबके जीवन में आने वाली घटनाओं पर तुलसीदास जे ने प्रतिबिम्ब डाला है। उसके दर्शन करने के लिये हम दस दिन इकट्ठे होते हैं, नहीं तो किसी को भी समय नहीं है। यह कथा हमारी है। बेशक घटना त्रेतायुग में घटी हो। उस समय कपडे अलग प्रकार के पहनते होंगे। भाषा अलग होगी, रीति-रिवाज आदि में फर्क होगा, बरसों बीत गए। इसलिये परिवर्तन तो बहुत ही आया होगा। परन्तु अन्दर क़ी ओर जीवन क़ी जो घटनाएं हैं वह आज भी हम सब पर लागू होती है। ऊपर के आवरण बदल गए हैं। अंदर से सब वैसे का वैसा ही है, और उससे भी रामायण आसान अर्थ में कहूं तो सबका जीवन दर्शन है। राम कथा द्वारा दस दिन तक हमें अपने जीवन का निरंतर विचार करना है क़ी रामायण के किसी पत्र में मुझे अपना स्वरुप मालुम होगा कि रामायण का यह पत्र हमको स्पर्श करता है। और रामायण का कोई पात्र जब हम बनते हैं तब इतना विचार करना है कि रामायण के किसी पात्र में मुझे अपना स्वरुप दिखाई पड़ता है? कहीं पर हम केवट होंते, कहीं पर भील होंगे, कहीं पर तो हमको ऐसा मालूम होगा कि रामायण का यह पत्र हमको स्पर्श करता हैं। और रामायण का कोई पात्र जब हम बनते हैं तब इतना विचार करना है क़ी रामायण के पात्रों को कठिनाइयां आई तब उन्होंने कैसा बर्ताव किया? और मैं कैसे बर्ताव कर रहा हूँ। इसका हे चिंतन करना चाहिए। इसलिये हमारे जीवन क़ी कथा के अर्थ में हम आज क़ी रामायण की शुरुआत करते हैं। रामचरितमानस में लिखा है कि रामकथा को समझना हो तो जीवन में तीन वस्तुओं की जरुरत पड़ती है। अगर तीन वस्तुएं हमारे जीवन में इकट्ठी न हों तब रामचरितमानस समझ में नहीं आएगा। पहले श्रद्धा, फिर सत्संग और बाद में परमात्मा पर प्रेम होना चाहिए। श्रद्धा, सत्संग और ईष्ट प्रेम ये तीनों वस्तुएं जो मिलें तो रामायण समझ में आती है। ऐसा रामायण में लिखा है। जो तीन वस्तुएं न हों तो किसी भी संजोग में रामायण समझ में नहीं आ सकेगी।

श्रद्धा सम बल रहित, नहीं संतान कर नाथ।
तीन कह मानस अगम अति, जिन्हीं न प्रिय रघुनाथ॥

इन दोहों में ऐसा कहा है कि जिन्हें राम प्रेम नहीं है। राम के प्रति भाव नहीं, सत्संग में प्रीति नहीं और श्रद्धा नहीं उन्हें रामचरितमानस समझ में नहीं आता।

तो हम श्रद्धा, सत्संग और राम प्रेम का निर्माण करके रामायण का पान करें। मैं हमेशा कहता हूं कि हम किसी भी मन्दिर में दर्शन करने जाते हैं, तब बूट बहार उतारते हैं, दो बूट-एक बुद्धि का और दूसरा अहंकार का। हमने बुद्धि और अहंदर के बूट पहने होंगे तो रामायण समझ में नहीं आएगी। बहार जाकर हम भले ही अहंकार को धारण करते हैं परन्तु इस दरबार में आने के बाद वक्ता या श्रोता को बुद्धि और अहंकार के बूट बाहर ही रखने चाहिए। वक्ता यदि बुद्धि का प्रयोग करके आएगा तो रामायण में कठिनाइयाँ उत्पन्न होंगी। रामायण में मना किया गया है। मन,वचन और कर्म से मनुष्य चतुरता को छोड़कर आये और मेरा या तुम्हारा अहंकार बाहर रह जाए तभी राम दरबार में प्रवेश करना चाहिए। रामचरितमानस को, भगवान् राम के जीवन को समझने के लिये और साथ-साथ अपना जीवन दर्शन करने के लिये हमें यह दो बूट बाहर रखने पड़ेंगे, तो रामायण तुलसीदास जी को जो सुख दे गई, स्वांत सुखाय रघुनात गाथा। वैसे हमको भी स्वांत सुख दे सकेगा।

आप यहाँ बिलकुल खाली होकर आओ। बस हमें भगवद्चरित्र सुनना है। मैं यहाँ आऊं तब सभी वस्तुएं छोड़कर आऊं, ऋतु आती है तब कोयल आती है तब कोयल अपने आप ही बोलने लगती है। उसने पहले से तैयारी नहीं की होती है। कोयल ने एक महीने पहले रियाज नहीं किया है क़ी अब बसंत ऋतु आने वाली है। अब मैं अपनी आवाज ठीक कर लूं मुझे कुहू-कुहू करनी पड़ेगी। मेघ क़ी गर्जना से मोर भी कोई तैयारी नहीं करते हैं क़ी अब मुझे बोलना है, बसंत मेघ आये तो अपने आप ही आवाज निकलने लगती है। स्वांत सुख प्राप्त करने के लिये रामायण में तुलसी जी ने लिखा है स्वांत सुख के लिये वैसे ही बुलाना भी चाहिए और स्वांत सुख के लिये सुनवाना भी चाहिए दूसरा कोई हेतु नहीं है।

इस अर्थ में हम रामायण के शुरुआत कर रहे हैं। राम कथा हमार जीवन दर्शन है। तुलसीदास जी ने रामायण को रामचरितमानस नाम दिया, रामायण नाम नहीं दिया, रामायण बहुत प्रचलित है। इसलिए हम बोलते हैं, परन्तु इस ग्रन्थ का नाम रामचरितमानस रखा है, एक सरोवर क़ी उपमा रामायण को दी है। आप जानते हो क़ी मानसरोवर नाम का एक सरोवर हिमालय में है और दूसरा सरोवर तुलसीदास जी ने स्थापित किया है। जिसका नाम मानस सरोवर है, परन्तु दोनों में फर्क है।

प्रथम अंतर यदि समय, संपत्ति और शारीरिक तंदरुस्ती हो तो प्रथम मान सरोवर पर पहुंचा जा सकता है। अन्यथा नहीं। तुलसीदास जी ने चलता-फिरता मान सरोवर उत्पन्न किया जो हमारे घर में आता है। ऐसा यह मानस सरोवर है।

द्वितीय अंतर हिमालय वाले मानसरोवर में खाली पानी पड़ा है। जबकि तुलसीदास जी के मानस सरोवर में एक सिद्ध संत क़ी वाणी है। हिमालय के मान सरोवर में नहाने के पश्चात हमारे शरीर का मैल दूर होता है। जबकि मानस सरोवर शरीर के मैल के साथ मन का मैल, कलियुग का मैल और अन्य मैल दूर करता है। मानस में लिखा है-
रघुवंश भूषन चरित यह नर कहही सुनही गावही।
कलिमल मनोमल धोई बीनू श्रम राम धाम सीधा वही॥
>गोस्वामी जी कहते हैं रघुवंश के इस दिव्य चरित्र को जो गायेगा या सुनेगा तो वह कलियुग के मैल और मन के मैल से मुक्त होकर रामधाम की तरफ गति करेगा।

>तृतीय अंतर हिमालय के मान सरोवर के किनारे मोती के दाने चुगने के लिये हंस आते हैं ऐसी लोकोक्ति है। यह कितने लोगों ने देखा होगा किसी को पता नहीं है। परन्तु इस मानस सरोवर में हंस के स्थान पर परम हंस इकट्ठे होते हैं। उन हंसो को कितनों ने देखा होगा यह पता नहीं। न ही देखा है। रामायण के आस-पास परम हंस इकट्ठे होते हैं। यह तो निर्विवाद है, मानस में लिखा है जीवन मुक्त ब्रहम पर चरित सुनही तजी ध्यान। चौबीस घंटे समाधि में रहने वाले महात्मा भगवान् राम क़ी कथा सुनने के लिये ध्यान छोड़कर आते हैं। इसलिये मानस सरोवर के किनारे परम हंस इकट्ठे होते हैं। 

हिमालय के मान सरोवर में पाँव फिसले पर आदमी डूब जाता है। परन्तु इस मानस सरोवर में जो डूबता है, उसका बेडा पार हो जाता है। 

तुलसीदास जी कहते हैं क़ी कठिनाइयाँ तो हैं, हमारे यहाँ ऐसा नियम है ही। वो तो अब बदल गया होगा, बाकी जहाँ तालाब हो उसके आस-पास जंगल बहुत हो। बीच में तालाब हो, उस जंगल को पार करके तालाब की तरफ जाना पड़ता है। तो रामायण तालाब है। रामायण का सरोवर यहाँ आया है इसमें भी कठिनाइयाँ को पार करके आना पड़ेगा, और ये कठिनाइयाँ जंगल तो नहीं है अपितु घर के काम, सांसारिक कठिनाइयाँ अनेक प्रक्रतियां ये सब बीच में आने वाले जंगल हैं। इसमें से हमको जाना है, वहां तक पहुंचना है। समय निकलना पडेगा, फिर स्नान के लिये जा सकेंगे। शायद कोई पहुँच जाए तो भी कई बार ऐसा बनता है क़ी सरोवर के किनारे गया हुआ आदमी सर्दी से पीड़ित होता है। स्नान कर नहीं सकता। वहां चला तो जाए परन्तु खाली लौट आये। ऐसा तुलसीदास जी ने लिखा है। कई आदमी सरोवर तक पहुँच जाते हैं, पर जीवन में जड़ता होगी। जड़ता क़ी सर्दी आदमी को लागू हो गयी हो तो वह शायद सरोवर के किनारे जाएगा परन्तु स्नान नहीं कर सकता।
मेरे कहने का अर्थ काफी कठिनाइयओं के बाद सरोवर के पास पहुँचता है और फिर उसमें से हमें कुछ न कुछ सरोवर करना है, तो इस चलते-फिरते मान सरोवर के चार घाट हैं। जिस तरह के चार घाट हैं उसी तरह रामचरितमानस के भी चार घाट हैं। एक घाट पर भगवान् शिव जी पार्वती को कथा कहते हैं। दूसरे घाट पर याज्ञवल्क्य महाराज भारद्वाज जी को कथा कहते हैं। तीसरे घाट पर काकभुशंडि महाराज गरुड़ जी को कथा कहते हैं। अंतिम चौथे घाट पर स्वामी तुलसीदास जी अपने मन की कथा कहते हैं। रामचरितमानस में भगवान् शंकर जितना बोले हैं उनके वे सब सूत्र अलग रखने में आये, छोटी-सी पुस्तिका तैयार करने में आये तो बेदांत के शिखर की पुस्तक तैयार होती है। कारण यह है कि शंकर जी ज्ञान के घाट पर बैठकर कथा कहते हैं इसलिये उसमें से अति तत्त्व ज्ञान और वेदान्त दिखलाई पड़ता है। जबकि याज्ञवल्क्य महाराज कर्म के घाट पर बैठकर कथा कहते हैं, इसलिये उसमें से कर्म के सिद्धांत बहते हैं। काकभुशंडि महाराज भक्ति की भूमिका पर बोलते हैं, इसलिये उसमें भक्ति भाव और प्रेम भरा हुआ है। और तुलसीदास जी केवल शरणागति के घाट पर बैठकर कथा कहते हैं। यह चार किनारे हैं। ज्ञान, कर्म, भक्ति और शरणागति। जिनको ज्ञान में रस हो उन्हें इतना आनंद रामायण दे सकती है। जिनके कर्म में रस हो उन्हें भी रामायण आनंद दे सकती सकती है। जिनके भक्ति में रस हो उसे भी रामायण आनंद दे सकती है। तुलसीदास जी कहते हैं कि कलियुग में इन तीनों में उत्तम केवल शरणागति है। इसलिये जिनकी शरणागति में निष्ठा हो उसे भी रामायण उतना ही आनंद देगी। इस प्रकार का यह सरोवर है। चार घाट वाले रामचरितमानस का आध्यात्मिक दृष्टी से जब-जब प्रसंग आएगा तब-तब उनका चिंतन किया जाएगा। परन्तु व्यवहारिक दृष्टी से भी संसार में पिता को किस प्रकार रहना और पुत्र को किस तरह रहना चाहिए इसका स्पष्ट उदहारण रामायण में है। आज समाज में पिता-पुत्र के सम्बन्ध बिगड़ते हैं। हमारे समाज में युवक लोग माता-पिता की बात को अस्वीकार करते हैं या फिर माता-पिता के विचार युवकों को पसंद नहीं हैं। युवकों का बर्ताव माता-पिता को पसंद नहीं हैं। ऐसे जीवन में एक बार रामायण जरूर पढनी चाहिए। भाई-भाई के सम्बन्ध कैसे हों, भाइयों के बीच कैसा भाव और प्रेम होना चाहिए। ये भी रामायण में स्पष्ट लिखा है। और इन सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है क़ी दाम्पत्य जीवन कैसा होना चाहिए जो आज के युग के लिये जरूरी है। इसका सुन्दर दृष्टांत रामायण ने दिया है। आज ज्यादा से जादा चिंतित स्थिति दाम्पत्य जीवन की है। कितने आदमियों का दाम्पत्य जीवन सुखी है? पति-पत्नी बहार से जितने सुखी हैं, क्या अंदर से भी उतने ही सुखी हैं। पुराण में कहा गया है क़ी जब कलियुग का समय पूरा होगा तब कल्कि का अवतार होगा। दसवां अवतार। परन्तु कई लोग कहते हैं क़ी कलियुग पूरा हो गया है। अभी तक को अवतार क्यों नहीं हुआ है। तब हम एक ही बात कह सकते हैं क़ी भगवान् अवतार लेने के लिये कब से आकास में आये हैं। अवतार लेने के लिये बिलकुल तैयार हैं, पर उन्हें जन्म लेने के लिये योग्य माता-पिता दिखाए नहीं देते। इसलिये वह वहीं पर स्थित हैं। उन्हें अब योग्य माता-पिता दिखाई देंगे, दशरथ-कौशल्या, वासुदेव, देवकी जैसे दम्पत्तियों का दर्शन होगा तब परमात्मा का विचार करना चाहिए। हमारा दाम्पत्य इश्वर को निमंत्रण दे सके वैसा है। राम राजभवन में रहे या चित्रकूट की चोटी सी झोपडी में रहे उनके दाम्पत्य जीवन के लिये आप पूरा चरित्र पढ़िए। कितना अद्भुत है। रामचरितमानस में महत्त्व की बात यह है क़ी दाम्पत्य जीवन कैसा होना चाहिए? पति-पत्नी को कैसे जीना चाहिए? 

रामचरितमानस में लिखा है क़ी सर्वप्रथम रामायण शिवजी ने बनाई। सर्वप्रथम शंकर जी ने अपने मन में रामायण तैयार की। हमारे धर्मग्रंथों में ऐसा वर्णन है क़ी इसमें सौ करोड़ मंत्र थे। सत करोड़ रामायण बोली। देवों, मनुष्यों और राक्षसों को समाचार मिले क़ी भगवान् शिवजी ने सौ करोड़ मन्त्रों वाली रामायण तैयार की है, तो वे कैलाश पर एकत्रित हुए। शंकर जी की स्तुति की। भगवान् आप तो अखंड आनंद ब्रहम हैं। आपकी सौ करोड़ मन्त्रों की रामायण है तो हम सबमें विभाजित कर दो। भगवान् शिवजी को दया आ गई और उन्होंने तैंतीस करोड़ मंत्र देवताओं को तैंतीस करोड़ मनुष्यों को और तैंतीस करोड़ दानवों को दे दिए। शिवजी के पास एक करोड़ मंत्र रह गए। देवताओं ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि आप तो ब्रहम हैं। एक करोड़ मंत्र रखने की क्या जरूरत है? शंकर जी ने उन तीनों को तैंतीस लाख तैंतीस लाख मंत्र दे दिए। शिवजी के पास एक लाख मंत्र रह गए। मानवों ने फिर प्रार्थना की। शिवजी ने तैंतीस-तैंतीस हज़ार तीनों में विभाजित कर दिए। शिवजी के पास एक हज़ार मंत्र रह गए उनके एखने पर उन्होंने फिर तैंतीस सौ-तैंतीस सौ मंत्र तीनों वर्गों में बांट दिये। शिवजी के पास सौ मंत्र रह गए। देवताओं ने कहा कि महाराज सौ मन्त्रों क़ी क्या जरुरत है? हममें बाँट दीजिये। तब उन्होंने तैंतीस-तैंतीस मन्त्रों का विभाजन तीनों में कर दिया। अब एक मंत्र शिवकी के पास रहा। तीनों ने कहा क़ी इस मंत्र को भी हममे बाँट दीजिये। शिवकी ने कहा सब मंत्र अलग-अलग थी इसलिये उनका विभाजन हो सका अब एक मंत्र का तीनों में विभाजन कैसे हो? उन्होंने कहा क़ी यह जैसे भी हो इसको हम सबमें बाँट दो। संस्कृत को अनुष्टुप छ्न्द था। सब जानते हैं कि अनुष्टुप ३२ अक्षरों का होता है। उन्होंने दस-दस अक्षर उन तीनों में बाँट दिए। शिवजी के पास अब दो अक्षर रहे उन्होंने कहा क़ी यह दो अक्षर भी बाँट दो। शिवजी ने कहा कि सारी रामायण आपको मुबारक हो लेकिन मैं ये दो नहीं दूंगा। उन्होंने कहा क़ी 'रा' और 'म' ये दो अक्षर हैं जो सम्पूर्ण रामायण का निचोड़ है। सम्पूर्ण रामायण का अर्थ शब्द राम है। तुलसी दास जी कहते हैं क़ी शिवजी ने वे दो शब्द अपने हृदय में रख लिये हैं। रामायण का अर्थ ही यह है कि रामायण पूरी होने के बाद मनुष्य रामपरायण बनता है कि राम हमारे जीवन में बसे। 

सर्वप्रथम शिवजी ने इस तरह रामायण तैयार किया। इस तरह बाँट भी दिया। फिर पुस्तक के आकार में आदि कवि वाल्मीकि ने संस्कृत में रामायण लिखी जिसे दुनिया ने स्वीकारा है। यह हमारा आदिकाव्य माना जाता है। फिर अनेक महात्माओं ने रामायण पर लिखा है। आज से चार सौ साल पहले तुलसीदास ने अस्सी साल की उम्र में रामायण लिखा। तुलसीदास संस्कृत के महान विद्वान् थे फिर भी उन्हें लगा क़ी समय ऐसा आयेगा क़ी लोग संस्कृत बराबर नहीं समझ सकेंगे, और मुझे रामायण सामान्य आदमी तक पहुंचानी है। संस्कृत में तो केवल विद्वान् लोग ही समझ सकेंगे। यदी राम राज महल छोड़कर भीलों के छोटे-से-छोटे घर में गए हों तो रामयण भी पंडित का घर छोड़कर छोटे-से-छोटे घर में पहुंचनी चाहिए। अतः संस्कृत छोड़कर उन्होंने ग्राम्य भाषा में रामायण लिखने का संकल्प किया। एक ऐसा मत तुलसी जी के जीवन चरित्र में आता है क़ी शुरुआत में उन्होंने संस्कृत में लिखने का निर्णय लिया। रोज संस्कृत में लिखते और रात को आराम करके सुबह उठते तो देखते हैं क़ी पिछला लिखा हुआ सब गायब है। थोड़े दिनों तक तो ऐसा ही चलता रहा। तुलसीदास जी नाराज हो गए क़ी मेरा सार परिश्रम निष्फल हो रहा है। तब भगवान् शंकर ने कहा क़ी गोस्वामी जी आप संस्कृत को छोड़कर हिंदी भासा में ग्रन्थ लिखे। चौपईयाँ भी लिखीं। काव्य शास्त्र में चौपाईयों की रचना एकदम सामान्य कहलाती है। चौपाएयाँ बनाना कवी के लिये आसान काम है। परन्तु तुलसीदास जी के चौपाई लिखने के बाण उनकी चौपाई दुनिया की महारानी बन गयी। यह इसका प्रमाण है क़ी संत के हाथ में जो वास्तु आये तब उनको कितना गौरव मिलता है। सात कांडों में यह कथा लिखी गयी है। बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किधाकाण्ड, सुंदरकाण्ड, लंकाकाण्ड और उत्तरकाण्ड।
रामनवमी के दिन तुलसी दास जी ने लिखना प्रारंभ किया और यह ग्रन्थ कब समाप्त हुआ इसकी तिथि तुलसीदास जी ने नहीं बताई है। एक मत कि पूरा ग्रन्थ लिख जाने के बाद तुलसी ने ने निर्णय किया कि इस ग्रन्थ को शिवजी को अर्पण कर दूं और तब काशी में भगवान् विश्वनाथ के चरणों में अर्पण करने का उन्होंने निश्चय किया। विद्वान् ने विरोध किया कि इस हिंदी भाषा में लिखे गए ग्रन्थ को हम स्वीकार नहीं करेंगे। संस्कृत में हो तो हम इसे शास्त्र की तरह प्रधानता देंगे। यह तो एकदम ग्रामीण भाषा में लिखा गया है। लोक कथा जैसा ही लगता है। आपने कितनी सीधी भाषा में इसे लिखा है। इसे हम स्वीकार नहीं करेंगे। वाद-विवाद चर्चा आदि होने के पश्चात यह निर्णय लिया गया कि भगवान् विश्वनाथ के चरणों में सबसे नीचे तुलसी जी का रामचरितमानस रखा जाए उसके ऊपर पुराण और उसके ऊपर उपनिषद उसके ऊपर संहिता और इन सब के ऊपर चारों वेद रखने में आये और दरवाजे बंद कर दिए जाएँ। यदि दूसरे दिन सब ग्रंथों के ऊपर रामचरितमानस हो तो हम इसे स्वीकृति देंगे। पंडितों का एस तरह का आग्रह तुलसीदास जी के लिये सबसे बड़ी परीक्षा थी। उन्होंने यह सब स्वीकार कर लिया। रामचरितमानस सबसे नीचे और उसके ऊपर भारतीय संस्कृति के सभी ग्रन्थ रखे गए सारी रात तुलसी जे ने सजल नेत्रों से राम भजन किया। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब दुसरे दिन विद्वान् लोग मन्दिर गए तो सबसे ऊपर रामचरितमानस था और उसके प्रथम पृष्ठ पर भगवान् शिवजी ने सही की थी। सत्यं शिवम् सुन्दरं। इतने शब्द रामचरितमानस को भगवान् शिव ने दिए। विद्वान् दंग रह गए इस दृश्य को देख करके तुलसी जी के चरणों में गिर पड़े। इस तरह तुलसी दास जी के ग्रन्थ को भगवान् शिव ने स्वीकृति दे दी। इस ग्रन्थ का विस्तार हुआ प्रचार हुआ। इतना बड़ा प्रमाण मिल जाने पर भी कुछ ईर्ष्यालु लोगों ने इसको नहीं माना। ईर्ष्या वाले पंडितों ने निर्णय किया कि तुलसी जी के पास एक ही प्रति हस्तलिखित है। अतः इसे चोरी करके जला दिया जाए। जिससे इसका प्रचार बंद हो जाए। परन्तु जब-जब चोर तुलसी जी क़ी कुतिया में रामचरितमानस चुराने गए तब-तब वे भाग गए। पंडितों ने चोरों से पूछा कि तुलसी जे के पास कोई शास्त्र नहीं है, आँखें बंद करके राम भजन करते हैं, और सो जाने के बाद भी आप रामचरितमानस क्यों नहीं चुरा सके। तब चोरों ने कहा कि हम जब-जब गए तब-तब एक कपिल महाकाल वानर उनके द्वार पर बैठा चौकसी कर रहा है, और यह चौकसी हनुमान महाराज करते थे। इस तरह तुलसी जी का रामचरितमानस चुराया नहीं जा सका और उन्हें उनकी शरण में जाना पडा। इस तरह रामायण का प्रचार और भी तीव्र गति से होने लगा। तुलसी जी के शिष्य गोपाल नन्द से किसी ने पूछा कि आप तुलसी जी के साथ रह रहे हैं तो इस रामायण में को अभूतपूर्व घटना घटी? तब गोपाल नन्द जी ने अपने महात्म्य में लिखा है कि एक घटना घटी है। उस समय काशी का राजा और द्रविड़ का राजा दोनों सेना सहित एक जगह इकट्ठे हुए। दोनों देश के राजा विहार के लिये निकले। दोनों की रानियाँ साथ थीं, जो गर्भवती थीं। जब वे दोनों अलग होते हैं तब ये कहते हैं कि यदि मेरे घर पुत्र हुआ आपकी पुत्री हुए या मेरे पुत्री हुई या आपके पुत्र हुआ तो हम दोनों समधी बन जायेंगे। हम आज से ही उनकी सगाई कर देते हैं। यदि दोनों के पुत्र और पुत्री हुए तो बात अलग है । इस तरह संकल्प कर के दोनों अलग हुए। समयोपरान दोनों के लडकियां हुए। उस समय ऐसा था कि लड़कियों का पैदा होना अशुभ मान जाता था। लडकी पैदा हो तो उसे दूध पीते करते थे। उसे मार डालते थे। अभी भी पुत्र उत्पन्न होता है तो थाली बजाते हैं। पुत्री के उत्पन्न होते ही सब सूना-सूना सा लगता है। द्रविड़ देश के रजा के यहाँ लडकी हुए। परन्तु उसकी रानी को हुआ क़ी लोग मुझे अपशकुन वाली मानेंगे कि लडकी का जन्म हुआ। अतः उसने यह बात जाहिर नहीं की। उसने दासी को भी सावधान कर दिया। उससे कहा कि मेरे पुत्र हुआ है। द्रविड़ राजा ने काशी नरेश को खबर भिजवाई। काशी नरेश के यहाँ लडकी हुई थी। यह सुन कर द्रविड़ रजा नरेश बहुत खुश हुआ। उसने अपने लड़के को देखने की इच्छा प्रकट की। पर राने ने कहा कि ज्योतिषी ने कहा कि पुत्र की शादी से पहले यदि पिता ने मुंह देखा तो मर जाएगा। इस तरह वर्षो बीत गए। शादी क़ी तैयारियां होनी शुरू हो गयी। यहाँ से बरात लेकर काशी नरेश के यहाँ राजकुमार को जाना था। वैसे वह थी तो राजकन्या। राजकुमार तो था नहीं। राजकुमार जैसी पोशाक पहन कर मुंह न दिखाई दे, इस प्रकार चेहरा ढक के अपनी लडकी राजकुमार है ऐसा मानकर रानी उसे ब्याहने ले गयी। लग्नमंडप में राजकुमार बनी राजकन्या बैठी थी कन्यादान के समय चार फेरे लेने की तैयारी थी। अठारह साल तक उसे छिपा कर रखा। ईश्वर की प्रेरणा से उसे अपनी भूल समझ में आए। यदि दोनी की शादी हो गयी तो इनका दाम्पत्य जीवन किस काम का? यह संसार में न घटने वाले घटना कहलाई जायेगी। राजा को एक अरफ ले जाकर राने ने क्षमा माँगी और कहा कि मुझे लोग अपशगुन वाली न समझें इसलिये मैंने पुत्र उत्पन्नं की घोषणा कर दी। अथारण साल तक आपसे छिपा कर रखा। रजा बोले, "अरे! देवी तुमने मुहे पहले यह बात क्यों नहीं बताए? हम राजपुरुष हैं हम लोगों को कैसे मुंह दिखाएंगे? काशी नरेश को क्या कहेंगे?" काशी नरेश समझ गया कि कुछ गड़बड़ी है? द्रविड़ ने नरेश से मिले और पूछा कि क्या बात है। उन्होंने सारे स्थिति बताई और कहा कि मेरी रानी ने यह कपट किया है। अब क्या करुं? मुझे पता भी नहीं था। काशी के राजा भी कठिनाए में पड़ गए। उन्होंने सोचा कि लोगों को पता चल जाएगो तो वे सोचेंगे कि रजा भी ऐसा करते हैं? दोनों ने निर्णय लिया कि हम छोड़ दें? समाज में मुंह नहीं दिखा सकेंगे फिर बाद में जो हो सो देखा जाएगा। शादी रूक गयी। किसी को पता नहीं कि क्या कठिनाइयाँ आईं? दोनों नरेश आत्महत्या करने बहार निकलते हैं। उस समय तुलसीदास जी हाथ में रामचरितमानस लेकर उनके पास से निकलते हैं। उस समय तुलसीदास जी भारत में प्रसिद्ध थे।दोनों राजाओं की नजर उन पर पडी और उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। तुलसी जी ने पूछा, "सम्राटों, क्यों अकेले? न सेना, न संरक्षक, न घोडा-रथ? पैदल क्यों जा रहे हो? क्या है? उन्होंने कहा, "प्रभु हमारे जीवन में एक कठिनाई आई है।" "क्या?" तुलसी जी ने कहा। द्रविड़ नरेश ने कहा, "मेरे यहाँ पुत्री उत्पन्न हुई मेरी रानी ने कपट करके कहा कि पुत्र हुआ है। आज इस कन्या का कन्या के साथ विवाह हो रहा है। मंडप में रानी ने मुझे सब कुछ बताया। पहले मुझे मालूम नहीं था लेकिन अब यह झूठ कब तक छिपा रहेगा? और समाज को क्य मुंह दिखलायेंगे? इसलिये हम दोनों आत्महत्या करने जा रहे हैं।" तुलसी जी हंस पड़े। एक तो भूल कर चुके और दूसरी भूल करने जा रहे हो। जरा यह तो सोचो कि कितने पुण्यों के बाद भगवान् मनुष्य देह देता है। तुलसी जी ने अपनी चौपाई कही।

बड़े भाग मनुष्य तनु पावा। सुर दुर्गन सदग्रंथ निगाबा ॥
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। पाई न जेही परलोक सवारा ॥कई पुण्यों के एकठे होने के पश्चात मानव देह मिलता है और आज आप आत्महत्या करना चाहते हो। उन्होंने कहा कि "संसार से हम क्या मुंह छिपाएंगे।" तुलसी जी ने कहा, "भूल की है तो संसार को कह दो मैंने भूल की। यह कौन-सी बड़ी बात है? एक भूल कह दो तो दूसरी करने से बच जाओगे।" तुलसी जी ने कहा, "भाई मेरे पास कोई चमत्कार नहीं है। मेरे पास तो केवल रामनाम की महिमा है, पर एक काम करो। द्रविड़ देश के राजा की पुत्री को बड के नीचे बिठाओ। मैं उससे नौ दिनों तक रामायण कहूं और राजा की पुत्री उसे सुने। पूर्णहुती के बाद शायद प्रभु कोई कृपा कारें। एक बार अपनी लडकी को श्रोता बनाओ।" दोनों राजा वापस गए। शादी को बंद कर दिया। मूहर्त ठीक नहीं है ऐसा कहकर उन्होंने बात टाल दी। एक गाँव के बाहर बड के पेड़ के नीचे तुलसी दास जी बैठ गए। द्रविड़ देश दे राजा की लडकी मुख्य श्रोता के रूप में सामने बैठी नौ दिन रामचरितमानस का तुलसी जी ने अखण्ड पारायण किया। रामकथा कही। एकाग्रचित होकर उस कन्या ने तुलसी जे की कथा सुनी नवें दिन जब कथा पूरी हुए तो ठाकुर जी का जल लेकर रामायण की चौपाई द्वारा उस कन्या को आशीर्वाद देते हुए पानी का छींटा दिया। पानी की बूंदे उस कन्या पर पड़ते ही उसके शरीर में परिवतन हुआ और पुरुषत्व का निर्माण हुआ। संत क्या नहीं कर सकते? कन्या में से वह पुरुष बनी और काशी देश के राजा की लडकी के साथ उसका विवाह हुआ। तुलसी जी उनको आशीर्वाद देते हुए चले गए। जब हम यह घटना कहते हैं तो लोग पूछते हैं कि कथा तो वही है। हम कहते हैं कि हाँ। वे पूछते हैं कि आज हो सकता है? रामायण तो वही है जो तुलसी जी के पास है। हमने कहा, "जरूर हो सकता है। 105 प्रतिशत। पर शर्त यह है कि कहने वाला तुलसी दास जैसा होना चाहिए, और सुनने वाला द्रविड़ नरेश की राजकन्या जैसा होना चाहिए। यदि ये दो वस्तुएं इकट्ठी न हों तो घटना न होगी। इन दोनों के मिलाप से घटना घटेगी। एक बार मनुष्य रामायण सुने तो मानव में सचमुच ही नरत्व का निर्माण होगा। आज का मनुष्य नर होते हुए भी रोता है सिर दीवार से मारता है। रामायण सुनने के बाद उसकी हिम्मत पैदा हो जायेगी। उसमें सचमुच पुरुष्ट पैदा हो जाएगा। खुमारी का निर्माण होगा। निर्मस्यता दूर होगी और दिव्यता पैदा होगी। ऐसा इस कथा में शक्ति है।" 

'बोलो श्रीरामचंद्र जी की जय-

सत सृष्टी तांडव रचयिता, नटराज राज नमो नमः ।
आघ गुरु शंकर पिता, नटराज राज नमो नमः ।
शिरज्ञान गंगा चन्द्रमा, ब्रहम ज्योति ललाट मां ।
इष्ट नाग माला, कंठ मां, नटराज राज नमो नमः ।
ॐ श्री राम जय राम जय जय राम ।
ॐ श्री राम जय राम जय जय राम ।

॥ इति श्री रामचरितमानस महात्म्य समाप्त ॥

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