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06 जुलाई 2012

भगवान् शिव के नीलकंठ बनने की कहानी

पुराण : (वेद और पुराण हिंदू धर्म की अमूल्य निधि हैं। जन्म से मृत्यु तक के हमारे संस्कार इन्हीं वेदों और पुराणों की परंपरा पर आधारित हैं। पुराणों की संख्या अठारह कही गई है। इनमें विभिन्न व्यक्तियों, वस्तुओं, जीवों आदि को आधार बनाकर शिक्षा और ज्ञान का महत्व बताया गया है। इनमें कथा-कहानियों के जरिए सही और गलत में अंतर बताया गया है। पुराण ज्ञान और शिक्षा के साथ मनोरंजन का भी भरपूर खजाना है। यही कारण है कि लोग इसे आज भी पढ़ना पसंद करते हैं।)

भोलेबाबा कैसे बने नीलकंठ? 


एक बार की बात है- शिवजी के दर्शनों के लिए दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ कैलाश जा रहे थे। मार्ग में उन्हें देवराज इन्द्र मिले। इन्द्र ने दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्यों को विनम्रतापूर्वक प्रणाम किया। तब दुर्वासा ने इन्द्र को आशीर्वाद देकर भगवान विष्णु का पारिजात पुष्प प्रदान किया। इन्द्रासन के गर्व में चूर इन्द्र ने उस पुष्प को अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया। उस पुष्प का स्पर्श होते ही ऐरावत सहसा भगवान विष्णु के समान तेजस्वी हो गया। उसने इन्द्र का परित्याग कर दिया और दिव्य पुष्प को कुचलते हुए वन की ओर चला गया। 
इन्द्र द्वारा भगवान विष्णु के दिव्य पुष्प का तिरस्कार होते देखकर दुर्वास ऋषि के क्रोध की सीमा न रही। उन्होंने देवराज इन्द्र को वैभव (लक्ष्मी) से हीन हो जाने का शाप दे दिया। दुर्वासा मुनि के शाप के फलस्वरूप लक्ष्मी उसी क्षण स्वर्गलोक को छोड़कर अदृश्य हो गईं। लक्ष्मी के चले जाने से इन्द्र आदि देवता निर्बल और धनहीन हो गए। उनका वैभव लुप्त हो गया। इन्द्र को बलहीन जानकर दैत्यों ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और देवगण को पराजित करके स्वर्ग के राज्य पर अपना परचम फहरा दिया। 

तब इन्द्र देवगुरु बृहस्पृति और अन्य देवताओं के साथ ब्रह्माजी की सभा में उपस्थित हुए। तब ब्रह्माजी बोले- ‘देवेंद्र! भगवान विष्णु के भोगरूपी फूल का अपमान करने के कारण रुष्ट होकर भगवती लक्ष्मी तुम्हारे पास से चली गई हैं। उन्हें पुनः प्रसन्न करने के लिए तुम भगवान नारायण की कृपा-दृष्टि प्राप्त करो। उनके आशीर्वाद से तुम्हें खोया वैभव पुनः मिल जाएगा।’ 

इस प्रकार ब्रह्माजी ने इन्द्र को आश्वस्त किया और उन्हें लेकर भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे। वहाँ परब्रह्म भगवान विष्णु भगवती लक्ष्मी के साथ विराजमान थे। देवगण भगवान् विष्णु की स्तुति करते हुए बोले- ‘भगवन! आपके चरणों में हमारा बारम्बार प्रणाम। भगवन! हम सब जिस उद्देश्य से आपकी शरण में आए हैं, कृपा करके आप उसे पूरा कीजिए। दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण माता लक्ष्मी हमसे रुठ गई हैं और दैत्यों ने हमें पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया है। अब हम आपकी शरण में है, हमारी रक्षा कीजिए। ’

भगवान विष्णु त्रिकालदर्शी थे। वे पल भर में ही देवताओं के मन की बात जान गए। तब वे देवगण से अपने वैभव लौटाने के लिए, दानवों से दोस्ती कर उनके साथ मिलकर समुद्र मंथन करने को बोले। उन्होंने समुद्र की गहराइयों में छिपे अमृत के कलश और मणि रत्नों के बारे में बताया कि उसे पाने से वे सभी फिर से वैभवशाली हो जाएंगे। 

भगवान विष्णु के कहे अनुसार इन्द्र सहित सभी देवता दैत्यराज बलि के पास संधि का प्रस्ताव लेकर गए और उन्हें अमृत के बारे में बताकर समुद्र मंथन के लिए तैयार कर लिया। 

समुद्र मंथन के लिए समुद्र में मंदराचल को स्थापित कर वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया। तत्पश्चात दोनों पक्ष अमृत-प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन करने लगे। अमृत पाने की इच्छा से सभी बड़े जोश और वेग से मंथन कर रहे थे। सहसा तभी समुद्र में से कालकूट नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि से दसों दिशाएँ जलने लगीं। समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया। देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि, मुनि, मनुष्य, गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गरमी से जलने लगे।

देवताओं की प्रार्थना पर, भगवान शिव विषपान के लिए तैयार हो गए। उन्होंने भयंकर विष को हथेलियों में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए। भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं। उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ (गले) में ही रोक कर उसका प्रभाव समाप्त कर दिया। विष के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे संसार में नीलंकठ के नाम से प्रसिद्ध हुए। 

जिस समय भगवान शिव विषपान कर रहे थे, उस समय विष की कुछ बूँदें नीचे गिर गईं। जिन्हें बिच्छू, साँप आदि जीवों और कुछ वनस्पतियों ने ग्रहण कर लिया। इसी विष के कारण वे विषैले हो गए। विष का प्रभाव समाप्त होने पर सभी देवगण भगवान शिव की जय-जयकार करने लगे।

हलाहल के बाद समुद्र से कामधेनू (गाय) प्रकट हुईं। वह यज्ञ-हवन आदि सामग्री उत्पन्न करने वाली थी, अतः उसे ऋषि-मुनियों ने ग्रहण किया। उसके बाद उच्चैःश्रवा नामक सात मुखों वाला एक अश्व निकला। वह चंद्रमा के समान श्वेत वर्ण का था। उसकी सुंदरता से प्रभावित होकर उसे दैत्यराज बलि ने ग्रहण कर लिया। तदंतर समुद्र से श्वेत वर्ण का ऐरावत नाम एक हाथी निकला। उसे अपना वाहन बनाने के लिए इन्द्र ने ग्रहण कर लिया। इसके बाद कौस्तूभ नामक मणि प्रकट हुई। उसे श्रीविष्णु ने धारण किया। समुद्र मंथन से कल्पवृक्ष तथा अनेक सुंदर अप्सराएँ भी प्रकट हुई। इनके बाद ऐश्वर्य और भोगों की देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं। वे भगवान विष्णु की नित्यशक्ति हैं। उनके रूप-सौंदर्य से सभी का मन उनकी ओर आकर्षित हो गया। देवी लक्ष्मी समुद्र की पुत्री के रूप में उत्पन्न हुईँ थी। उन्होंने प्रकट होते ही भगवान विष्णु को वरमाला डालकर पति रूप में स्वीकार कर लिया।


अंत में समुद्र से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए। दिव्य वस्त्र-आभूषणों से सुशोभित वे दिव्य पुरुष श्रीविष्णु के अंशावतार और आयुर्वेद के प्रवर्तक वैद्य धन्वन्तरि थे। उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। उन्हें देखकर दैत्यों ने समुद्र मंथन छोड़कर उनसे अमृत का कलश छीन लिया।

तब भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार धारण करके देवताओं को अमृत पान करवाया। इस प्रकार सभी देवता वैभव से संपन्न होने के साथ-साथ अमृतपान कर अमर हो गए।

Lord Shiva - Who Drank The poison during the Samudra Manthan (Churning of The Ocean) and was called Neelkanth (One with a blue neck)


I am neither the mind, intelligence, ego nor chitta (seat of memory); neither the ears nor the tongue nor the senses of smell and sight; neither ether nor air ,nor fire, nor water, nor earth-I am eternal bliss and awareness - I am Siva! I am Siva.

!!!! The Gayatri Mantra and the Mahamrityunjaya Mantra are the two Mahamantras !!!!

I am neither the prana (vital force), nor the five vital breaths, neither the seven elements of the body, not its five sheaths, nor hands, nor feet, nor tongue, nor other organs of action. I am eternal, bliss and awareness - I am Siva! I am Siva.

Neither greed nor delusion, nor loathing, nor liking have I, nothing of pride or ego, neither of dharma or object, nor of desire or liberation. I am eternal, bliss and awareness - I am Siva! I am Siva.

Nothing of pleasure or pain or virtue or vice do I know, of mantra or sacred place, of Vedas or sacrifice; neither am I the eater, nor the food nor the act of eating. I am the eternal bliss and awareness - I am Siva! I am Siva.

!!!! Worship of Shiva leads to peace and Calm !!!!

Death or fear have I none, nor any distinction of race or color, neither father nor mother, nor even birth have I; neither friend nor comrade, neither disciple nor Guru (Teacher). I am the eternal bliss and awareness - I am Siva! I am Siva.

I have no form or fancy, the all pervading am I; everywhere I exist, yet am beyond the senses; neither salvation am I, nor anything to be known. I am eternal, bliss and awareness - I am Siva! I am Siva.

!!!! Shiva is not only the Destroyer-He is the Renovator also !!!!



One of the greatest philosopher of all times these are few tenets said by the Adi Guru that a individual should keep repeating to oneself. Shiva is the all powerful yogi and occupies the highest position in the Hindu trinity of Gods. Shiva symbolises supreme control over the senses and salvation is nothing but acquiring Shiva hood.

Rajesh Mishra in Wake Office

 

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