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10 जुलाई 2012

विष्णु और शिव में भेद

विष्णु++शिव 

शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। वे दोनों तो परस्पर एक-दूसरे के पूरक तत्व हैं। पुराणों के अनुसार जब-जब शिव या विष्णु पर कोई विपत्ति आई है, उन्होंने एक-दूसरे की मदद करने में देर नहीं लगाई है। श्रीरामचरितमानस में भी विष्णु ने कहा है- शिव का द्रोही तो हमारा दास कभी हो ही नहीं सकता और न ही वह मेरी कृपा हासिल कर सकता है।

इसी प्रकार रामेश्वरम में विष्णु के अवतार श्रीरामचंद्र ने शिवलिंग की स्थापना कर शिव के प्रति अपनी अनन्य भक्ति का परिचय दिया। एक और प्रसंग भी मिलता है कि जब शिव की पूजा करते वक्त विष्णु को पुष्प न मिलने पर उन्होंने अपने कमल समान नेत्र चढ़ाकर अपनी पूजा को पूर्ण किया था।

श्री शिव तत्व

शिव वही तत्व है जो समस्त प्राणियों के विश्राम का स्थान है।
मूलत: शिव एवं विष्णु एक ही हैं, फिर भी उनके उपर रूप में सत्व के योग से विष्णु को सात्विक और तम के योग से रूद्र को तामस कहा जाता है। सत्वनियंता विष्णु और तमनियंता रूद्र हैं। तम ही मृत्यु है, काल है। अत: उसके नियंता महामृत्युंजय महाकालेश्वर भगवान रूद्र हैं। तम प्रधान प्रलयावस्था से ही सर्व प्रपंच की सृष्टि होती हैं।
कृष्ण के भक्त तम को बहुत ऊँचा स्थान देते हैं। जब सृष्टिकाल के उपद्रवों से जीव व्याकुल हो जाता है, तब उसको दीर्घ सुषुप्ति में विश्राम के लिए भगवान सर्वसंहार करके प्रलयावस्था व्यक्त करते हैं। यह संसार भी भगवान की कृपा ही है। तम प्रधानावस्था है, उसी से उत्पादनावस्था और पालनावस्था व्यक्त होती है। अन्त में फिर भी सबको प्रलयावस्था में जाना पड़ता है। उत्पादनावस्था के नियामक ब्रह्मा, पालनावस्था के नियामक विष्णु और संहारावस्था एवं कारणावस्था के नियामक शिव हैं। पहले भी कारणावस्था रहती हैं, अंत में भी वही रहती है। प्रथम भी शिव हैं, अंत में भी शिव तत्व ही अवशिष्ट रहता है। तत्वज्ञ लोग उसी में आत्म-भाव करते हैं। शिव ही सर्वविद्याओं एवं भूतों के ईश्वर हैं, वही महेश्वर हैं, वही सर्वप्राणियों के हृदय में रहते हैं। एकादश प्राण रूद्र हैं। निकलने पर वे प्राणियों को रूलाते हैं, इसलिए रूद्र कहे जाते हैं। दस इन्द्रियां और मन ही एकादश रूद्र हैं। ये आध्यात्मिक रूद्र हैं। आधिदैविक एवं सर्वोपाधिविनिर्मुक्त रूद्र इनसे पृथक हैं। जैसे विष्णु पाद के अधिष्ठाता हैं, वैसे ही रूद्र अहंकार के अधिष्ठाता हैं।
शिव की आत्मा विष्णु और विष्णु की आत्मा शिव हैं। तम काला होता है और सत्व शुक्ल परन्तु परस्पर एक- दूसरे की ध्यानजनित तन्मयता से दोनों के ही स्वरूप में परिवर्तन हो गया अर्थात सतोगुणी विष्णु कृष्णवर्ण हो गए और तमोगुणी रूद्र शुक्लवर्ण हो गए।
श्री राधा रूप से श्री शिवरूप का प्राकट्य होता है, तो कृष्णरूप से विष्णु का, काली रूप से विष्णु का तो शंकररूप से शिव का।
कालकूट विष और शेषनाग को गले में धारण करने से भगवान की मृत्युंजयरूपता स्पष्ट है। जटामुकुट में श्रीगंगा को धारण कर विश्व मुक्ति मूल को स्वाधीन कर लिया। अग्निमय तृतीय नेत्र के समीप में ही चन्द्रकला को धारण कर अपने संहारकत्व-पोषकत्व स्वरूप विरूध्द धर्माश्रयत्व को दिखलाया। सर्वलोकाधिपति होकर भी विभूति और व्याघ्रचर्म को ही अपना भूषण- बसन बनाकर संसार में वैराग्य को ही सर्वापेक्षया श्रेष्ठ बतलाया। शिव का वाहन नंदी , तो उमा का वाहन सिंह , गणपति का मूषक, तो कार्तिकेय का वाहन मयूर है। मूर्तिमान त्रिशूल और भैरवादिगण आपकी सेवा में सदा संलग्न हैं। सुर, नर, मुनि, नाग ,गन्धर्व, किन्नर, असुर, दैत्य भूत , पिशाच, वेताल, डाकिनी, शाकिनी, वृश्चिक, सर्प, सिंह सभी उनको पूजते हैं। आक, धतूरा, अक्षत, बेलपत्र, जल से उनकी पूजा की जाती है। शिवजी का कुटुम्ब भी विचित्र ही है। अन्नपूर्णा का भण्डार सदा भरा, पर भोले बाबा सदा के भिखारी। कार्तिकेय सदा युध्द के लिए उध्दत, पर गणपति स्वभाव से ही शांतिप्रिय। कार्तिकेय का वाहन मयूर, गणपति का मूषक, पार्वती का सिंह और शिव का नंदी, उस पर सर्पों का आभूषण। सभी एक दूसरे के शत्रु ,पर गृहपति की छत्रछाया में सभी सुख तथा शांति से रहते हैं। घर में प्राय: विचित्र स्वभाव और रूचि के लोग रहते हैं। घर की शांति के आर्दश की शिक्षा भी शिव से ही मिलती है।
भगवान शिव और अन्नपूर्णा अपने आप परम विरक्त रहकर संसार का सब ऐशवर्य श्री विष्णु और लक्ष्मी को अर्पण कर देते हैं। श्री लक्ष्मी और विष्णु भी संसार के सभी कार्यां को संभालने, सुधारने के लिए अपने आप ही अवर्तीण होते हैं।

शिवलिगों पासना का रहस्य



सत्ता के बिना आनंद नहीं और आनंद के बिना सत्ता नहीं। मूल प्रकृति (योनि) और परमात्मा (लिंग) ही संसार और जगत की उत्पत्ति के कारण हैं। समष्टि ब्रहम का प्रकृति की ओर झुकाव अधिदैविक काम है। राधाकृष्ण, गौरीशंकर , अर्धनारीश्वर का परस्पर प्रेम, परस्पर आकर्षण है और यह शुध्द प्रेम ही शुध्द काम है। यह कामेश्वर या कृष्ण का स्वरूप ही है। सत रूप गौरी एवं चितरूप शिव दोनों ही जब अर्ध्दनारीश्वर के रूप में मिथुनीभूत होते हैं, तभी पूर्ण सच्चिदानंद का भाव व्यक्त होता है, परन्तु यह भेद केवल औपचारिक ही है, वास्तव में तो वे दोनों एक ही हैं। भगवान अपने स्वरूप को देखकर स्वयं विस्मित हो जाते हैं। बस इसी से प्रेम या काम प्रकट होता है।इसी से शिव शक्ति का संमिलन होता है। यही श्रृंगाररस है। पूर्ण सौन्दर्य अनन्त है। उसी सौन्दर्य के कणमात्र से विष्णु ने मोहिनी रूप से शिव को मोह लिया। वही सगुण रूप में ललिता, कहीं कृष्ण रूप में प्रकट होता है।

निराकर, निर्विकार, व्यापक दृक् या पुरूषतत्व का प्रतीक ही लिङग है और अनन्त ब्रहमाण्डोत्पादिनी महाशक्ति प्रकृति ही योनी, अर्घा या जलहरी है। न केवल पुरूष से सृष्टि हो सकती है , न केवल प्रकृति से। पुरूष निर्विकार, कूटस्थ है, प्रकृति ज्ञानविहीन, जड़ है।
भगवान् कहते हैं- महद्ब्रहम- प्रकृति- मेरी योनि है, उसी में मैं गर्भाधान करता हूँ, उससे महदादिक्रमण समस्त प्रजा उत्पन्न होती हैं। लिड़ग् और योनि व्यापक शब्द हैं। गेहूँ, यव आदि में भी जिस भाग में अंकुर निकलता है उसे योनि माना जाता है, दाने निकलने से पहले जो छत्र होता है वह लिड़ग् है।
उत्पत्ति का आधारक्षेत्र भग है, बीज लिड़ग् है। शिव सूक्ष्म अतीन्द्रिय लिड़ग् है। शक्ति सूक्ष्म अतीन्द्रिय योनि है। स्थूल लिड़ग् और योनि तो सूक्ष्म लिड़ग् एवं योनि की अभिव्यक्ति के संभावित रूपों में से एक रूप है। प्रतिबिम्ब मात्र है।

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