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10 जुलाई 2012

Mahatripur Sundari Maa

श्रीविद्या कि उपासना

 
अखिल चराचर जगत की अघिष्ठात्री शक्ति की महत्ता मातृ सत्ता के रूप में भारतीय वनाद्गमय में वर्णित है। वही शक्ति विश्व का सृजन, पालन, संहार, निग्रह एवं अनुग्रह इन पंच कर्मो की नियामिका है। संपूर्ण ब्रह्माण्ड की केंद्रभूता यही शक्ति शरीर में अंतर्निहित प्राण शक्ति है। इसे ही योगियों की भाषा में चेतना शक्ति अथवा कुंडलिनी शक्ति कहा गया है। अखिल ब्रह्माण्ड की प्रतीकात्मक आकृति है श्री-यंत्र।
श्रीयंत्र के मध्य बिंदु में विराजमान भगवती महात्रिपुरसुन्दरी श्री श्रीविद्या के नाम से जानी जाती हैं। इन्हें मणिपुर-द्वीप वासिनी भी कहा जाता है। श्रीविद्या धाम,इंदौर में मां की इसी इसी विश्वमोहनी स्वरूप की प्रतिष्ठा की गई है।
स्वामी गिरिजानंदजी सरस्वती का इसकी स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान है।महात्रिपुरसुंदरी का यह मंदिर श्री यंत्र की रचना के आधार पर अष्टकोणीय है, जिसके मध्य में पंच प्रेतासन पर राजराजेश्वरी जगज्जननी मां पराम्बा ललिता महात्रिपुर संुदरी श्री विद्या विराजमान हैं। सिंहासन के चार आधार-स्तम्भ के रूप में चार देव ब्रह्मा, विष्णु,रूद्र एवं इर्शान हैं। पर्यड्क पर योगिराज शिव लेटे हैं, जिनकी नाभि से निकले सहस्रदल कमल पर मातेश्वरी आसीन हैं। श्रीश्रीविद्या का स्वरूप षोडश वर्षीया बालिका का है,जिनके चार हाथ एवं तीन नेत्र हैं। भगवती ने चारों हाथों में क्रमश: इक्षु-धनुष, पंच पुष्पबाण, पाश एवं अंकुश धारण किए हैं। मुख मण्डल प्रसन्न है तथा वाम नेत्र से भगवान सदाशिव को देख रही हैं। सदगुरू के श्रीमुख से प्राप्त की जाने वाली श्रीविद्या की दीक्षा ही साधना में सफलता दिलाती है। गुरू कृपा से फलीभूत होती है। श्री विद्या उपासना करने से भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।

ऎसे करें पूजन

माघ पूर्णिमा को भगवती राजराजेश्वरी महात्रिपुर सुंदरी मां श्री विद्या की पूजा मां के स्वरूप श्री यंत्र में करें। पूर्वाभिमुख होकर बैठें। लाल आसन का प्रयोग करें। शुद्ध और स्वच्छ वस्त्रों को स्त्रान करके धारण करें। शुद्धता का विशेष ध्यान रखें। स्वर्ण,रजत,कांस्य अथवा पीतल के स्वच्छ पात्र में श्रीयंत्र की स्थापना करनी चाहिए। पुष्पों,अक्षत,गुलाब जल की बूंदों से माता को आसन देकर श्रीयंत्र स्थापित करना चाहिए।भगवती के नाम से श्री यंत्र के ऊपर श्रीविद्या का आह्वान करें। तीन बार पृथक पृथक जल चढ़ाएं। पंचामृत स्त्रान करवाएं। इसके बाद तीर्थ जल से मां को स्त्रान करवाना चाहिए। चंदन-केसर से भी श्री यंत्र को स्त्रान करवाना चाहिए। इत्र, गुलाब जल से भी स्त्रान कर मां को प्रसन्न करना चाहिए। श्री सूक्त से मां का अभिषेक दूध या गुलाब जल, गंगा जलादि अथवा गन्ने के रस से करना चाहिए। नए और शुद्ध वस्त्र से श्री यंत्र का प्रोक्षण कर स्थापित करें। पंच रंग का धागा यानी कलावा मां को अर्पित करें। इसके पश्वात श्रद्धापूर्वक मां को चंदन, केसर,अक्षत, बिल्व पत्र,कुंद,जूही, गुलाब, हार श्रृंगार ,चंपा (मां को विशेष प्रिय),कमल के फूल अथवा माला चढ़ाएं। कुंकुम-चावल, हलदी,अबीर,गुलाल, मेंहदी आदि सौभाग्य वस्तुएं जगत जननी को अर्पित करें।

मंत्र जप

अति गोपनीय और गुरू मुख से ग्राह्य श्रीविद्या की दीक्षा के अभाव में जन सामान्य इन मंत्रों से मां का जप करना चाहिए-
या देवी सर्वभूतेषु श्रीविद्यारूपेण संश्रिता।
नमस्त्स्यै नमस्त्स्यै नमस्त्स्यै नमो नम:।।
श्री ललिता अम्ब्कायै नम:।

श्रीविद्यायै नम:।
श्रीमत्त्रिपुर सुन्दरायै नम:।
श्री चक्रराज निलयायै नम:।

श्रीविद्या पूजन के तीन भेद हैं। यथा परापूजा,परापरा पूजा और अपरापूजा। परापूजा यह ज्ञान है। परापरा पूजा यह भक्ति है। अपरापूजा यह कर्म है। इस विद्या के फल की ओर दृष्टि रखकर उपासना करने से सिद्धि प्राप्त नहीं होती है। फल की अपेक्षा रखे बिना उपासना करने से जल्दी सिद्धि प्राप्त होती है। ऎसा सौभाग्य लक्ष्मी उपनिषद में कहा गया है।

आरती

जय देवि जय देवि जय मोहनरूपे
मामिह जननि समुद्धर पतितं भवकूपे।। हरि ऊं जय देवि...
प्रवरातीरनिवासिनि निगमप्रतिपाद्ये
पारावारविहारिणि नारायणि ह्वद्ये।
प्रपंचसारे जगदाधारे श्रीविद्ये
प्रपन्नपालननिरते मुनिवृन्दाराध्ये ।। 1 ।। हरि ऊं जय देवि॥
दिव्यसुधाकरवदने कुन्दोज्ज्वलरदने
पदनखनिर्जितमदने मधुकैटभकदने।
विकसित पंकजनयने पन्नगपतिशयने
खगपतिवहने गहने संकटवन दहने ।। 2।। हरि ऊं जय देवि॥
मंजीरांकित चरणे मणिमुक्ताभरणे
कंचुकिवस्त्रावरणे वक्त्राम्ब्ाुजधरणे।
शक्रामयभय हरणे भूसुर सुखकरणे
करूणां कुरू मे शरणे गजनक्रोद्धरणे ।। 3।। हरि ऊं जय देवि॥
छित्त्वा राहुग्रीवां पासि त्वं विबुधान्
ददासि मृत्युमनिष्टं पीयूषं विबुधान।
विहरसि दानव ऋद्धान् समरे संसिद्धान्
मध्वमुनीश्वरवरदे पालय संसिद्धान् ।। 4।। हरि ऊं जय देवि॥

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