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09 जुलाई 2012

Stories behind Rakshabandhan


रक्षा बंधन की पौराणिक, ऎतिहासिक, धार्मिक, सामाजिक कथाएं
stories

भारत त्यौहारों का देश है. दिवाली, होली, दशहरा और रक्षा बंधन यहां के कुछ एक प्रसिद्ध त्यौहार है. इन त्यौहारों में रक्षा बंधन विशेष रुप से प्रसिद्ध है. रक्षा-बंधन का पर्व भारत के कुछ स्थानों में रक्षासूत्र के नाम से भी जाना जाता है. प्राचीन काल से यह पर्व भाई-बहन के निश्चल स्नेह के प्रतीक के रुप में माना जाता है. हमारे यहां सभी पर्व किसी न किसी कथा, दंत कथा या किवदन्ती से जुडे हुए है. रक्षा बंधन का पर्व भी ऎसी ही कुछ कथाओं से संबन्धित है. रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है, यह जानने का प्रयास करते है.

रक्षा बंधन के पौराणिक आधार
The Pauranik significance of Rakshabandhan

पुराणों के अनुसार रक्षा बंधन पर्व लक्ष्मी जी का बली को राखी बांधने से जुडा हुआ है. कथा कुछ इस प्रकार है. एक बार की बात है, कि दानवों के राजा बलि ने सौ यज्ञ पूरे करने के बाद चाहा कि उसे स्वर्ग की प्राप्ति हो, राजा बलि कि इस मनोइच्छा का भान देव इन्द्र को होने पर, देव इन्द्र का सिहांसन डोलने लगा.

घबरा कर इन्द्र भगवान विष्णु की शरण में गयें. भगवान विष्णु वामन अवतार ले, ब्राह्माण वेश धर कर, राजा बलि के यहां भिक्षा मांगने पहुंच गयें. ब्राह्माण बने श्री विष्णु ने भिक्षा में तीन पग भूमि मांग ली. राजा बलि अपने वचन पर अडिग रहते हुए, श्री विष्णु को तीन पग भूमि दान में दे दी.
वामन रुप में भगवान ने एक पग में स्वर्ग ओर दुसरे पग में पृ्थ्वी को नाप लिया. अभी तीसरा पैर रखना शेष था. बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया. ऎसे मे राजा बलि अपना वचन नहीं निभाता तो अधर्म होगा है. आखिरकार उसने अपना सिर भगवान के आगे कर दिया और कहां तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए. वामन भगवान ने ठिक वैसा ही किया, श्री विष्णु के पैर रखते ही, राजा बलि परलोग पहुंच गया.

बलि के द्वारा वचन का पालन करने पर, भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न्द हुए, उन्होंने आग्रह किया कि राजा बलि उनसे कुछ मांग लें. इसके बदले में बलि ने रात दिन भगवान को अपने सामने रहने का वचन मांग लिया., श्री विष्णु को अपना वचन का पालन करते हुए, राजा बलि का द्वारपाल बनना पडा. इस समस्या के समाधान के लिये लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय सुझाया. लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे राखी बांध अपना भाई बनाया और उपहार स्वरुप अपने पति भगवान विष्णु को अपने साथ ले आई. इस दिन का यह प्रसंग है, उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी. उस दिन से ही रक्षा बंधन का पर्व मनाया जाने लगा.

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार
Rakshabandhan as per a story from the Puranas

एक बार देव और दानवों में युद्ध शुरु हुआ, युद्ध में देवता पर दानव हावी होने लगें. यह देखकर पर इन्द्र देव घबरा कर बृ्हस्पति के पास गये. इसके विषय में जब इन्द्राणी को पता चला तो उन्होने ने रेशम का धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र कर इसे अपने पति के हाथ पर बांध लिया. जिस दिन यह कार्य किया गया उस दिन श्रावण पूर्णिमा का दिन था. उसी दिन से ही श्रावण पूर्णिमा के दिन यहा धागा बांधने की प्रथा चली आ रही है.

रक्षा बंधन का ऎतिहासिक आधार
Historical basis of Rakshabandhan

बात उस समय की है, जब राजपूतों और मुगलों की लडाई चल रही थी. उस समय चितौड के महाराजा की की विधवा रानी कर्णवती ने अपने राज्य की रक्षा के लिये हुमायूं को राखी भेजी थी. हुमायूं ने भी उस राखी की लाज रखी और स्नेह दिखाते हुए, उसने तुरम्त अपनी सेनाएं वापस बुला लिया. इस ऎतिहासिक घटना ने भाई -बहन के प्यार को मजबूती प्रदान की. इस घटना की याद में भी रक्षा बंधन का पर्व मनाया जाता है.

महाभारत में द्वौपदी का श्री कृ्ष्ण को राखी बांधना
Rakhi of Draupadi for Sri Krishna

राखी का यह पर्व पुराणों से होता हुआ, महाभारत अर्थात द्वापर युग में गया, और आज आधुनिक काल में भी इस पर्व का महत्व कम नहीं हुआ है. राखी से जुडा हुआ एक प्रसंग महाभारत में भी पाया जाता है. प्रंसग इस प्रकार है. शिशुपाल का वध करते समय कृ्ष्ण जी की तर्जनी अंगूली में चोट लग गई, जिसके फलस्वरुप अंगूली से लहू बहने लगा. लहू को रोकने के लिये द्रौपदी ने अपनी साडी की किनारी फाडकर, श्री कृ्ष्ण की अंगूली पर बांध दी.

इसी ऋण को चुकाने के लिये श्री कृ्ष्ण ने चीर हरण के समय द्वौपदी की लाज बचाकर इस ऋण को चुकाया था. इस दिन की यह घटना है उस दिन भी श्रावण मास की पूर्णिमा थी.

रक्षा बंधन का धार्मिक आधार
Religion and Rakshabandhan

भारत के कई क्षत्रों में इसे अलग - अलग नामों से अलग - अलग रुप में मनाया जाता है. जैसे उतरांचल में इसे श्रावणी नाम से मनाया जाता है भारत के ब्राह्माण वर्ग में इस इन यज्ञोपवीत धारण किया जाता है. इस दिन यज्ञोपवीत धारण करना शुभ माना जाता है. इस दिन ब्राह्माण वर्ग अपने यजमानों को यज्ञोपवीत तथा राखी देकर दक्षिणा लेते है. अमरनाथ की प्रसिद्ध धार्मिक यात्रा भी रक्षा बंधन के दिन समाप्त होती है.

रक्षा बंधन का सामाजिक आधार - Rakshabandhan in today's society

भारत के राजस्थान राज्य में इस इद्न रामराखी और चूडा राखी बांधने की परम्परा है. राम राखी केवल भगवान को ही बांधी जाती है. व चूडा राखी केवल भाभियों की चूडियों में ही बांधी जाती है. यह रेशमी डोरे से राखी बनाई जाती है. यहां राखी बांधने से पहले राखी को कच्चे दूध से अभिमंत्रित किया जाता है. और राखी बांधने के बाद भोजन किया जाता है.

राखी के अन्य रुप
The many forms of Rakhi

भारत में स्थान बदलने के साथ ही पर्व को मनाने की परम्परा भी बदल जाती है, यही कारण है कि तमिलनाडू, केरल और उडीसा के दक्षिण में इसे अवनि अवितम के रुप में मनाया जाता है. इस पर्व का एक अन्य नाम भी है, इसे हरियाली तीज के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन से पहले तक ठाकुर झुले में दर्शन देते है, परन्तु रक्षा बंधन के दिन से ये दर्शन समाप्त होते है.

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